पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने ऊपर लगे आरोपों को ब्यूरोक्रेट्स की तरफ़ शिफ्ट करने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान भी उनके वकील कपिल सिब्बा ने कहा था कि आईएनएक्स मीडिया को एफआईपीबी अप्रूवल देने में भारत सरकार के 6 सचिवों का हाथ था। उन्होंने पूछा था कि उन्हें क्यों नहीं गिरफ़्तार किया गया है? मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चिदंबरम ने सीबीआई को कहा कि उनके पास सभी फाइलों को पढ़ने का समय नहीं रहता था इसीलिए वह एफआईपीबी के अधिकारियों की अनुशंसा पर कार्य करते थे।
चिदंबरम ने सीबीआई से पूछताछ के दौरान कहा कि वे सभी अधिकारी अपने काम में दक्ष थे और फाइलों को वही लोग देखा करते थे। उनके इस बयान के बाद अब उनके कार्यकाल में वित्त मंत्रालय में तैनात रहे कुछ अधिकारियों से सीबीआई पूछताछ कर सकती है। चिदंबरम ने कहा कि अगर कोई अनियमितता हुई है तो उन्हें ज़रूर पता होगा। अपने परिवार के सदस्यों से मिलने के समय इमोशनल चिदंबरम ने कहा कि वे सरकार के ‘आतिथ्य का आनंद’ ले रहे हैं।
पूर्व डीईए सचिव डी सुब्बाराव ने जाँचकर्ताओं को बताया था कि ऑफिस रिकार्ड्स के अनुसार एफडीआई अप्रूवल देने में हुई अनियमितताओं को एफआईपीबी के संज्ञान में नहीं लाया गया था। अधिकारियों के अनुसार, ऐसा निर्णय लेने से पहले प्रस्ताव को रिज़र्व बैंक के पास भेजा जाना चाहिए था।
चिदंबरम ने कहा कि उन्होंने अधिकारियों की अनुशंसा पर निर्णय लिया (साभार: ABP)
आईएनएक्स मीडिया मामले में सीबीआई ने पाँच देशों के सम्बंधित विभागों को पत्र भेज कर कुछ अहम जानकारियाँ माँगी हैं। ये वही देश हैं, जहाँ से रुपयों का अवैध लेनदेन किया गया और ट्रांसफर्स किए गए। सीबीआई ने यूके, बरमूडा, मारीशस, सिंगापुर और स्विट्ज़रलैंड को पात्र भेजा है। बता दें कि अभी पी चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में हैं।
एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार का दोहरा रवैया फिर सामने आया है। अगर आप कभी भूले-भटके उनके टीआरपी-विहीन शो ‘प्राइम टाइम’ देख लेते होंगे तो आपको पता होगा कि रवीश हमेशा टीवी से दूर रहने की सलाह देते हैं। “टीवी मत देखिए“, “न्यूज़ में आजकल केवल एंकर चिल्लाते हैं“, “टीवी पर कुछ भी मत देखिए“- ये सभी रवीश के पसंददीदा शब्द रहे हैं। रवीश अक्सर झुंझलाहट में कभी पीएम मोदी को, कभी मीडिया को तो कभी-कभार जनता को ही कोसते हुए नज़र आते हैं।
अब रवीश कुमार के 2 वीडियो वायरल हुए हैं। पहले वाले वीडियो में वह लोगों को टीवी उठा कर फेंक देने की सलाह दे रहे हैं। जबकि दूसरे वाले में अपने शो की टीआरपी कम होने के लिए मोदी को दोष दे रहे हैं। पहले वीडियो में रवीश कुमार पूछ रहे हैं कि क्या आप उस टीवी को नहीं छोड़ सकते, जो भारतीय लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए दिन-रात एक किए हुआ है? अर्थात, इस वीडियो में रवीश लोगों को टीवी से दूर रहने और टीवी न देखने की सलाह दे रहे हैं।
अब बात दूसरी वायरल वीडियो की। इस वीडियो में रवीश अपने पहले वाले बयान को ही काटते हुए नज़र आ रहे हैं। विरोधाभाष की पराकाष्ठा तय करते हुए रवीश इस वीडियो में कहते हैं कि जब उनका शो आता है तो लोग टीवी बंद कर देते हैं। उन्होंने अपने एक फैन के सन्देश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जब वह टीवी पर रवीश का शो देखने बैठता है तो उसका बड़ा भाई टीवी बंद कर देता है। साथ ही रवीश पूछते हैं कि इस देश में क्या हो रहा है? दोनों वीडियो को यहाँ देखिए:
I haven’t seen a person bigger hypocrite than Ravish Kumar.
Odd Day: Don’t watch TV to save democracy
Even Day: People switch off TV when my show is running. This is death of democracy
पहले वीडियो में टीवी को फोड़ने की बात करने वाले रवीश दूसरे वीडियो में टीवी बंद भर करने से नाराज़ हो जाते हैं। रवीश ने ‘मीडिया द्वारा बनाए गए माहौल’ पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके शो के समय टीवी बंद कर देना तानाशाही है। लोगों ने रवीश कुमार की इस कुंठा युक्त विरोधाभासी दोहरे रवैये पर जमकर चुटकी ली।
ग्रेटर नोएडा पुलिस ने 5 पत्रकारों के ख़िलाफ़ ‘गैंगस्टर एक्ट’ के तहत मामला दर्ज किया है। ये पत्रकार अपने पेशे का ग़लत इस्तेमाल करते हुए पुलिस अधिकारियों की इमेज ख़राब किया करते थे। ये अपने पोर्टल्स पर पुलिस के जवानों के ख़िलाफ़ जानबूझ कर ऐसे कंटेंट्स डालते थे, जिससे उनकी इमेज ख़राब हो। ये पुलिस बलों पर दबाव डाल कर काम निकलवाने की कोशिश करते थे। इनमें से 4 आरोपित पत्रकारों को गिरफ़्तार कर लिया गया है जबकि पाँचवा फरार है। उनके ऊपर 25,000 रुपए का इनाम रखा गया है। इनमें से 3 पहले से ही भ्रष्टाचार के मामलों में ज़मानत पर बाहर है।
ये सभी आरोपित पुलिस पर अपने अजेंडे के अनुसार काम करने के लिए दबाव बनाते थे, जैसे- किसी आरोपित की मदद करना। इसके बदले वे आरोपित से रुपए ऐंठते थे। गौतम बुद्ध नगर के डीएम बीएन सिंह ने कहा कि एक पत्रकार की हैसियत से इन्होने थानों व पुलिस के बीच अपनी पैठ बना ली थी और वे इसका नाजायज फायदा उठाते थे। पाँचों पत्रकारों पर आरोप है कि इन्होने पुलिस की क़ानूनी कार्यवाहियों में बाधा डाला है।
अगर कोई पुलिस अधिकारी इनकी बात नहीं मानता था या फिर इनके अजेंडे के अनुसार कार्य नहीं करता था तो ये सभी आरोपित पत्रकार ऐसी-ऐसी खबरें बनाते थे, जिनसे उस अधिकारी की इमेज ख़राब हो। पुलिस ने उनके पोर्टल्स पर कुछ ऐसी भ्रामक ख़बरें भी दिखाईं। इनमें से एक ख़बर में पुलिस पर ‘जाति के आधार पर ट्रांसफर पोस्टिंग’ की बात कही गई थी। एक अन्य ख़बर में उन्होंने पुलिस पर ‘सैंड माइनिंग’ करने का आरोप लगाया था।
पांच व्यक्ति जो खुद को #पत्रकार बताकर कथित तौर पर #पुलिस कर्मियों पर दबाव डालने और व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने #मीडिया संगठनों का उपयोग करते थे, उन पर पुलिस ने #गैंगस्टर्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।
इन पत्रकारों के द्वारा निशाने पर लिए गए अधिकारियों के ख़िलाफ़ कंटेंट्स को व्हाट्सप्प और फेसबुक सहित अन्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर फैलाया जाता था। एफआईआर में दर्ज किया गया है कि इन्होने ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का ग़लत फायदा उठाते हुए आधारहीन ख़बरें चलाईं और पुलिस की इमेज को नेगेटिव करने की कोशिश की। आरोपितों ने इन बातों का खंडन करते हुए कहा कि अगर पुलिस को उनके लेखों से दिक्कत थी तो पहले उन्हें नोटिस भेजनी चाहिए थी।
जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 का पावर खत्म किए जाने के बाद श्रीनगर सचिवालय से राज्य का झंडा हटा दिया गया है। अब वहाँ सिर्फ़ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहरा रहा है। मीडिया खबरों की मानें तो पिछले हफ्ते तक दोनों झंडे एक साथ लगे हुए थे, लेकिन अब वहाँ सिर्फ़ तिरंगा अकेले अपनी शोभा बढ़ा रहा है।
इंडिया टुडे के मुताबिक उनसे खास बातचीत में वहाँ के अधिकारियों ने बताया है कि अब सभी सरकारी दफ्तरों पर तिरंगा ही लगाया जाएगा। क्योंकि जम्मू-कश्मीर से संसद ने अनुच्छेद 370 को हटा दिया है, इसलिए राज्य को जो विशेषाधिकार मिलते थे, वह खत्म हो चुके हैं।
अब ‘एक प्रधान, एक विधान, एक निशान’ की नीति के तहत वहाँ भारतीय संविधान लागू होगा। सरकारी इमारतों पर तिरंगा लहराएगा और आईपीसी का पालन होगा। अभी तक जहाँ राज्य से बाहरी व्यक्ति के लिए वहाँ जमीन खरीदने की मनाही थी, वहीं अब वहाँ ऐसा नहीं होगा। अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद लोग वहाँ जमीन भी खरीद पाएँगे और अपने कारोबार का विस्तार भी कर पाएँगे।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार द्वारा 5 अगस्त को लिए गए फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को 2 अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया है। जिससे जम्मू-कश्मीर का चेहरा पूरी तरह बदल गया है। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर राज्य के राज्यपाल अब केंद्र शासित जम्मू एवं कश्मीर और केंद्र शासित लद्दाख के उपराज्यपाल होंगे। इसके अलावा वहाँ विधानसभा का कार्यकाल भी 6 नहीं 5 साल का होगा।
बिहार में पटना ज़िले के मोकामा से बाहुबली निर्दलीय विधायक अनंत कुमार सिंह को रविवार (अगस्त 25, 2019) को बाढ़ अनुमंडल अदालत में पेश किया गया। रविवार को अवकाश होने के बावजूद अनंत सिंह की कोर्ट में पेशी हुई। जिसके बाद कोर्ट ने उनको 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का फैसला सुनाया। इस फैसले के साथ ही अनंत सिंह को बेउर जेल भेज दिया गया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। बता दें कि, अनंत सिंह को उनके घर से 16 अगस्त को 1 एके-47 राइफल, एक मैग्जीन और दो ग्रेनेड बरामद होने संबंधित मामले में आज कोर्ट में पेश किया गया था।
बाढ़ कोर्ट में अनंत सिंह को प्रभारी एसीजेएम पंकज तिवारी की अदालत में पेश किया गया। अदालत से बेउर जेल ले जाने के क्रम में अनंत सिंह ने इस मामले पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। वहीं, पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) कांतेश कुमार मिश्र ने बताया कि नियमित अदालत नहीं होने के कारण पूछताछ के लिए विधायक का रिमांड माँगने के लिए आज (अगस्त 25, 2019) आवेदन नहीं किया जा सका। पुलिस अधीक्षक ने कहा कि सोमवार (अगस्त 26, 2019) को पुलिस इसके लिए प्रयास करेगी।
वहीं, अनंत सिंह ने प्रशासन की तरफ से दिए गए खाने को खाने से मना कर दिया है। अनंत सिंह को खाने में 300 ग्राम आटा से बनी 4 रोटियाँ, 300 ग्राम चावल, 150 ग्राम दाल और हरी सब्जी दिया गया, लेकिन उन्होंने जेल का खाना खाने से इनकार कर दिया। विधायक होने के नाते वो जेल प्रशासन से विशेष सुविधा की माँग कर रहे हैं।
गौरतलब है कि, अनंत कुमार सिंह ने शुक्रवार (23 अगस्त) को दिल्ली की साकेत कोर्ट में सरेंडर कर दिया था। कुछ दिनों पहले विधायक अनंत सिंह ने एक वीडियो जारी कर कहा था कि वो पुलिस के समक्ष नहीं बल्कि कोर्ट में सरेंडर करेंगे, क्योंकि उन्हें न्यायालय पर भरोसा है। अब अनंत सिंह का नया ठिकाना पटना का बेऊर जेल होगा। अनंत सिंह का इस जेल से पुराना नाता रहा है और वह पहले भी इस जेल में कैद हो चुके हैं।
पिछले एक वर्ष में भाजपा के तीन ऐसे बड़े नेताओं का निधन हो गया, जो पार्टी के लिए संकटमोचक की भूमिका में थे। अनंत कुमार, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज- तीनों ने ही केंद्रीय मंत्री के रूप में मोदी कैबिनेट की शोभा बढ़ाई। जहाँ अनंत कुमार बिना मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा हुए दुनिया को अलविदा कह गए, सुषमा और जेटली ने स्वास्थ्य कारणों से दूसरी बार बनी मोदी सरकार का हिस्सा बनने से मना कर दिया। अनंत कुमार के रूप में भाजपा के पास कर्नाटक में एक बहुत बड़ा चेहरा था। सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्रालय को ह्यूमन टच देकर मोदी सरकार की साख बढ़ाई। जेटली ऑल राउंडर थे और पार्टी के लिए सभी किरदारों में फिट बैठे।
ये तो रही इन तीनों नेताओं की बात। अब बात जम्मू कश्मीर की। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को ख़त्म किए जाने व राज्य का पुनर्गठन करने के बाद विपक्षी दलों ने नाराज़गी जताई। कश्मीर में ख़ूनख़राबा जैसी वारदातें न होने को लेकर अधिकतर विपक्षी दल व गिरोह विशेष के पत्रकार आश्चर्य में हैं। कश्मीर की सड़कों पर ख़ून देखने व हिंसा भड़काने के अदि रहे नेताओं को राज्य की शांति नहीं पच रही है क्योंकि उन्हें मोदी सरकार पर आरोप लगाने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा है। इसीलिए नेताओं ने रट लगाना शुरू कर दिया कि वहाँ सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है।
कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी विपक्षी नेताओं का एक जत्था लेकर श्रीनगर पहुँचे ताकि अपनी आँखों से देख सकें कि घाटी में सब ठीक है या नहीं। अफ़सोस कि इन सभी नेताओं को श्रीनगर एयरपोर्ट से वापस दिल्ली भेज दिया गया। राहुल गाँधी को एयरपोर्ट से निकलने नहीं दिया गया तो वे वहाँ तैनात पुलिस अधिकारियों को कहने लगे कि राज्यपाल ने उन्हें बुलाया है। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ आए नेताओं को बस यहाँ के स्थानीय निवासियों से बातचीत करनी है। हालाँकि, अधिकारियों पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ।
The govt is saying everything is okay here & everything is normal. If everything is normal why are we not allowed out?: Shri @RahulGandhi
इससे पहले जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद भी श्रीनगर जाने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन उन्हें भी एयरपोर्ट से ही वापस दिल्ली भेज दिया गया था। इस बार भी सीताराम येचुरी और मनोज झा जैसे नेताओं के साथ वह राहुल गाँधी के प्रतिनिधिमंडल में मौजूद थे। इन नेताओं को सरकार, राज्यपाल और सुरक्षा बलों की बातों पर भरोसा नहीं है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने साफ़ कर दिया कि राहुल गाँधी का यह दौरा पूरी तरह राजनीतिक था। उन्होंने पार्टियों को देशहित में राजनीति से ऊपर उठ कर सोचने की सलाह दी।
हमनें यहाँ अनंत कुमार, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की बात की। उसके बाद हमनें देखा कि कैसे राहुल गाँधी को जम्मू कश्मीर के नाम पर राजनीति करने का मौक़ा न देते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट से वापस भेज दिया गया। अब बात भाजपा की एकता यात्रा की, जो जनवरी 2011 में हुई थी। भाजपा की एकता यात्रा को जम्मू कश्मीर के लखमपुर सीमा पर रोक दिया गया था। उस समय अरुण जेटली राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष थे तो सुषमा स्वराज लोकसभा में यही ज़िम्मेदारी निभा रही थीं। अनंत कुमार बैंगलोर साउथ से 5 बार लोकसभा चुनाव जीत चुके थे।
भाजपा के तीनों बड़े नेताओं को जम्मू कश्मीर पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया। उन्हें पुलिस ने जम्मू कश्मीर में घुसने नहीं दिया। भाजपा युवा मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष अनुराग ठाकुर भी उनके साथ थे। ठाकुर अभी केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री हैं। उस समय सुषमा स्वराज ने पूछा था कि आखिर भाजपा नेताओं को किस अपराध के तहत गिरफ़्तार किया गया है? एक शांतिपूर्ण मार्च के बदले गिरफ़्तारी को लेकर भाजपा के नेतागण नाराज़ थे। क्या आपको पता है उस समय जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री कौन था? उमर अब्दुल्ला। वही उमर अब्दुल्ला जो अभी अपने पिता फारुख अब्दुल्ला सहित गिरफ़्तार हैं।
In 2011, Sushma Swaraj, Arun Jaitley and Ananth Kumar were arrested while trying to travel to Kashmir to unfurl the national flag at Lal Chowk on Republic Day.
जम्मू कश्मीर के नेता मिल कर जनता को उकसा सकते थे, इसीलिए सरकार ने समय रहते इन नेताओं को हिरासत में ले लिया। लेकिन, उस समय उमर अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री रहते क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि भाजपा नेताओं के राज्य में घुसने का अर्थ हुआ अलगाववादियों को उकसाना और यह सही नहीं है। अरुण जेटली ने इसे राज्य सरकार द्वारा अलगाववादियों के समक्ष आत्मसमर्पण करार दिया था। ये वो समय था जब जम्मू कश्मीर को लेकर होने वाले हर छोटे-बड़े निर्णयों पर पाकिस्तान का गुणगान करने वाले उन अलगाववादियों की छाप रहती थी, जिनमें से अधिकतर आज टेरर फंडिंग के मामले में एनआईए की गिरफ़्त में हैं।
उस वक़्त अरुण जेटली ने दो घटनाओं का जिक्र किया था। पहले घटना में दिल्ली में कुछ लोग जमा हो गए। सभी अलगाववादी थे, जिन्होंने भारत विरोधी नारे लगाए और भड़काऊ भाषण दिए। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं जब भाजपा के नेताओं ने लाल चौक पर तिरंगा फहराने के इरादे से कश्मीर में घुसने की कोशिश की तो उन्हें रोक दिया गया और गिरफ़्तार कर लिया गया। इन नेताओं में अरुण जेटली, अनंत कुमार और सुषमा स्वराज शामिल थीं। आज ये तीनों ही नेता हमारे बीच नहीं हैं। पिछले एक वर्ष के भीतर इन तीनों का जाना न सिर्फ़ भाजपा बल्कि देश के लिए बड़ी क्षति है।
अब यह जानना ज़रूरी है जनवरी 2011 में भाजपा नेताओं को गिरफ़्तार करवाने वाली जम्मू कश्मीर सरकार का कॉन्ग्रेस भी हिस्सा थी। उस समय राज्य में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस की गठबन्धन वाली सरकार चल रही थी। केंद्र में भी कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। ऐसे में, आज जब सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए इन कॉन्ग्रेसी नेताओं को जम्मू कश्मीर में नहीं जाने दिया जा रहा है तो इतनी हाय-तौबा क्यों? सवाल यह है कि जब अलगाववादियों के डर से विपक्षी नेताओं को राज्य में घुसने नहीं दिया जाता था, तब यही कॉन्ग्रेस सत्ता भोग रही थी। आज जब पार्टी विपक्ष में है और राज्य में पूरी तरह शांति है तो इसमें खलल डालने की कोशिश क्यों?
2011: भाजपा की एकता यात्रा के दौरान अरुण जेटली, अनंत कुमार और सुषमा स्वराज (तीनों ही हमारे बीच नहीं रहे), साथ में अनुराग ठाकुर
जम्मू कश्मीर में ख़ूनख़राबा क्यों नहीं हो रहा है ताकि हमे मोदी सरकार को घेरने का मौक़ा मिले? विपक्षी दलों के मन में बस एक यही सवाल है। भाजपा के तीनों दिवंगत नेताओं को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि राज्य में शांति बनी रहे और जो भी नेता या अलगाववादी इस शांति में खलल डालने या जनता को उकसाने की कोशिश करें, उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया जाए। अरुण जेटली ने भी अपने आखिरी ब्लॉग में जम्मू कश्मीर को लेकर सरकार द्वारा लिए गए निर्णय का स्वागत किया था। सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री को धन्यवाद दिया था कि उन्हें जीते जी जम्मू कश्मीर पर लिए गए ऐतिहासिक निर्णय के साक्षी बनने का मौक़ा मिला।
कॉन्ग्रेस उस पाप में बराबर की हिस्सेदार थी क्योंकि तीनों भाजपा नेताओं को गिरफ़्तार कर जबरन पंजाब भेजने का निर्णय अब्दुल्ला सरकार ने केंद्र से विचार-विमर्श के बाद ही लिया था। अंतर इतना ही है कि तब अलगाववादियों और आतंकियों के डर से ऐसा किया गया था, आज सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए विपक्षी नेताओं को वापस भेजा गया है। कॉन्ग्रेस ने जो बोया है, उसे पूरी तरह काटना अभी बाकी है। अभी तो पार्टी शुरू हुई है।
शिवसेना सांसद संजय राउत ने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अगर कॉन्ग्रेस नेता घूमने और मौज-मस्ती के लिए जम्मू कश्मीर जाना चाहते हैं, तो इसके लिए व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने कहा कि वो पर्यटन विभाग से इसकी व्यवस्था करने के लिए निवेदन करेंगे।
बता दें कि, राहुल गाँधी 8 विपक्षी दलों के 11 नेताओं के साथ शनिवार (अगस्त 24, 2019) को श्रीनगर पहुँचे थे, मगर उन्हें एयरपोर्ट से बाहर नहीं जाने दिया गया और फिर वापस दिल्ली भेज दिया गया। राउत ने जम्मू कश्मीर प्रशासन के इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अगर इन लोगों को वहाँ जाने दिया होता तो वहाँ के हालात बिगड़ सकते थे।
If Rahul wants to visit J-K for enjoyment, will make arrangements: Sanjay Raut
संजय राउत ने केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वो ये तो नहीं बता सकते कि अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म करने के फैसले से किसके सपने पूरे हुए, लेकिन वो इतना जरूर कह सकते हैं कि पूरा देश यही चाहता था और इस फैसले के लिए वो गृह मंत्री का शुक्रिया अदा करते हैं।
दरअसल, कॉन्ग्रेस, सीपीआई, डीएमके, आरजेडी, टीएमसी, एनसीपी, और जेडीएस जैसे विपक्षी दलों के नेताओं के प्रतिनिधिमंडल जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को रद्द करने के बाद जमीनी हकीकत देखने के लिए वहाँ गए थे। इसमें राहुल गाँधी, गुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा, सीताराम येचुरी, शरद यादव, मनोज झा, मजीद मेमन, तिरुचि शिवा और डी राजा जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे।
सैफई मेडिकल कॉलेज रैंगिंग मामले में मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया की सख्ती के बाद प्रशासन द्वारा 7 छात्रों को निलंबित कर दिया गया है। ये सभी निलंबित छात्र 2018 बैच के हैं। इनपर अपने जूनियर्स की रैंगिग करते हुए उनके सिर मुंडवाने का इल्जाम है। सभी आरोपित छात्रों पर कार्रवाई करते हुए 25-25 हजार का जुर्माना भी लगाया गया है।
इसके साथ ही मामले की सूचना समय पर न देने के कारण संस्थान कर्मियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई हुई है। 2018 बैच के सभी 150 छात्रों पर भी 5,000 का जुर्माना लगाया गया है। विश्वविद्यालय ने स्टूडेंट्स वेल्फेयर के डीन को हटाने और सुरक्षाकर्मियों पर लिए एक्शन के अलावा हॉस्टल के प्रबंधक को भी बर्खास्त कर दिया है। इसके अलावा प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा भी यूनिवर्सिटी के कुलपति को समन भेजा गया है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने सैफई मेडिकल कॉलेज के कुलपति को नोटिस जारी कर MBBS छात्रों के साथ हुई रैगिंग के संबंध में 24 घंटों के भीतर जवाब माँगा था। साथ ही एमसीआई ने उन्हें चेतावनी दी थी कि अगर 24 घंटों के भीतर वो जवाब नहीं दे पाते तो उन्हें 1.5 करोड़ रुपए का जुर्माना देना पड़ेगा।
MCI ने मेडिकल कॉलेज से साफ़ कह दिया है कि अगर उन्हें 24 घंटे के अंदर जवाब नहीं मिला तो वह प्रति छात्र एक लाख रुपए का जुर्माना संस्थान पर लगाएँगे। यानी 150 छात्रों के साथ हुए रैगिंग के लिए 1.5 करोड़ रुपए का जुर्माना संस्थान को भरना होगा।https://t.co/odgdBJWkBn
बता दें कि बीते दिनों सैफई मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले एमबीबीएस के नए छात्रों (फर्स्ट ईयर) के सिर के बाल मुंडवाकर परेड कराए जाने के मामला सामने आया था। मामला प्रकाश में उस समय आया जब ये सभी छात्र सिर झुकाए अपने कॉलेज पहुँचे। घटना का पता चलने के बाद कॉलेज प्रशासन ने इस मामले को ‘परंपरा’ बताकर खारिज करना चाहा। खुद वहाँ के डीन ने कहा कि छात्रों ने अपनी मर्जी से ही सिर के बाल मुड़वाए हैं, वैसे भी ये परंपरा है जो सभी जूनियर छात्र अपनी मर्जी से अपनाते हैं। फिर भी रैगिंग जैसी कोई बात सामने आती है तो वे कार्रवाई करेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हाल ही में यूएई में सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘जायद’ से नवाजा गया। उन्हें यह सम्मान यूएई के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए दिया गया। इस सम्मान के मिलने के साथ ही इस्लामिक देशों से प्रधानमंत्री मोदी को मिलने वाले सम्मानों की संख्या 5 वर्ष के अंदर 6 हो गई।
खास बात यह है कि ये सम्मान प्रधानमंत्री को उस समय मिला है जब भारत लगातार आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को दरकिनार कर रहा है। ये सम्मान दर्शाता है कि मोदी के कार्यकाल में मुस्लिम देशों के साथ भारत के रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत हो रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सरकार के कुछ शीर्ष सूत्रों ने इन सम्मानों को पाकिस्तान के मुँह पर तमांचा करार दिया है। जो अपनी लाख कोशिशों के बाद भी भारत को अलग-थलग करने में नाकामयाब रहा। खासकर मुस्लिम देशों से।
एएनआई की खबर के मुताबिक इन सूत्रों ने कहा है कि पाकिस्तान को अब एहसास होगा कि ये नया भारत है जो विश्व के साथ जुड़ा भी हुआ है और साथ ही सुनिश्चित भी करता है कि आतंक फैलाने वाले अलग-थलग हों।
उल्लेखनीय है कि भारत में आर्टिकल 370 निष्प्रभावी होने के बाद पाकिस्तान लगातार विश्व के कई देशों से अपना रोना रो चुका है, लेकिन उसे किसी भी ओर से कोई आस नहीं दिखाई दी। ऐसे में अब जब बहरीन में उन्हें ‘द किंग हमाद ऑर्डर ऑफ़ द रेनेसां’ , यूएई में जायद, फिलिस्तान में ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ , अफ़गानिस्तान में आमिर अमानुल्लाह खान अवार्ड, सउदी अरब में किंग अब्दुल्लाजीज शैश अवार्ड और मालदीप में रुल ऑफ निशान इज्जुद्दिओं से सम्मानित किया गया है तो लगता है मुस्लिम देशों से भारत देशों के सम्बंध पहले के मुकाबले बेहतर हो रहे हैं।
प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत राजनयिक ने इस्लामिक देशों से सुधरते रिश्तों के बारे में बात करते हुए इसे भारत के लिए बेहतर परिणाम वाला बताया। उनके मुताबिक इस्लामिक देशों से सुधरते रिश्तों के कारण हज कोटा के निवेश में भी ठोस बढ़त देखने को मिलेगी और वेस्ट एशिया में फँसे कई कैदियों की आजादी को सुनिश्चित करके उन्हें उनके परिजनों ने मिलवाया जा सकेगा। क्योंकि प्रधानमंत्री हर सम्मान मिलने के बाद कहते आए है कि ये किसी एक इंसान के लिए नहीं है बल्कि देश की 130 करोड़ जनता के लिए है।
इंडिया टुडे की पत्रकार मौसमी सिंह ने शनिवार (अगस्त 24, 2019) को श्रीनगर एयरपोर्ट पर बड़ा हंगामा करते हुए पुलिसकर्मियों पर बदतमीजी का आरोप लगाया। मौसमी सिंह के इस ड्रामे का सहारा लेकर अब पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर अपने नैरेटिव को भुनाना शुरू कर दिया है।
पाकिस्तानी मीडिया ने इंडिया टुडे पर मौसमी सिंह द्वारा पोस्ट किए गए उस क्लिप का इस्तेमाल किया है, जिसमें ये दिखाया गया है कि कश्मीर में हिंसा हो रही है। हालाँकि, यह पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है। पाकिस्तान ने इस वीडियो का इस्तेमाल करके यह दिखाने का झूठा प्रयास किया है कि कश्मीर में अत्यधिक बल का उपयोग किया जा रहा है।
वैसे, इंडिया टुडे ने जो पोस्ट शेयर किया है, उसमें कोई पुलिसकर्मी मौसमी सिंह के साथ बदतमीजी करते हुए नहीं दिखाई दे रहा है। बता दें कि, श्रीनगर एक रक्षा हवाई अड्डा है और यह सामान्य सी बात है कि वहाँ वीडियोटेप करना प्रतिबंधित है। यही बात जब सुरक्षाकर्मियों ने मौसमी को बताने की कोशिश की, तो वो भड़क गई और उन पर बदतमीजी का आरोप लगाया।
श्रीनगर का शेख उल-आलम हवाई अड्डा भारतीय वायु सेना के स्वामित्व वाला एक रक्षा हवाई अड्डा है। इस तरह का एक और रक्षा हवाई अड्डा महाराष्ट्र के पुणे में है, जहाँ यात्रियों को हवाई अड्डे पर अपने मोबाइल फोन के कैमरे का उपयोग करने से मना करने के निर्देश जारी किए गए हैं, और यदि कोई ऐसा करते हुए पकड़ा जाता है, तो अधिकारी उनके फोन को जब्त कर सकते हैं। देश भर के सभी रक्षा हवाई अड्डों के परिसर में कैमरों के उपयोग पर प्रतिबंध है और यात्रियों से इस नियम के पालन करने की उम्मीद की जाती है।
ये पहला मौका नहीं है, जब पाकिस्तान ने इस तरह से वीडियो का इस्तेमाल किया है। इससे पहले पाकिस्तान ने भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के पावर को खत्म करने के फैसले पर निशाना साधने के लिए कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद सहित विपक्षी नेताओं के वीडियो को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। वहीं, आईएनएक्स मीडिया घोटाले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के गिरफ्तार होने के बाद भी पाकिस्तान उनके समर्थन में आया था। पाकिस्तान के सीनेटर ने दावा किया था कि उन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीर में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के मोदी सरकार के कदम का विरोध किया था। इसके अलावा, पाकिस्तान के पैनेलिस्टों ने भारत में अपने प्रचार को आगे बढ़ाने के लिए राहुल गाँधी, ममता बनर्जी और एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय जैसे नेताओं में अपना विश्वास दिखाया है।
वैसे मौसमी सिंह भी अपनी रिपोर्टिंग से इतर दूसरी चीजों के लिए पहली बार सुर्खियों में नहीं आई हैं। इससे पहले वो 2019 के चुनाव के दौरान प्रियंका वाड्रा को लेकर बेहद उत्साहित होती हुई कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को निर्देश देती हुई कैमरे में कैद हुई थी। इसके आलावा मौसमी सिंह कॉन्ग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के बचाव में भी नजर आ चुकी है। जब मणिशंकर अय्यर ने रिपब्लिक भारत की रिपोर्टर के साथ बदतमीजी की और गालियाँ दी तो मौसमी सिंह ने न केवल मणिशंकर का बचाव किया बल्कि उसे रिपोर्टिंग करने से भी रोक दिया। वायरल वीडियो में मौसमी सिंह को मणिशंकर अय्यर का पक्ष लेते हुए देखा गया और साथी पत्रकार से कहा गया कि वे वहाँ अपने एजेंडे को न रखें।