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चिदंबरम को ले गई CBI-ED की टीम, मेडिकल के बाद, कभी भी हो सकता है गिरफ़्तारी का ऐलान

सीबीआई की चार टीम चिदंबरम के घर पर मौजूद हैं। वहीं ईडी की भी 2 टीम पूर्व गृह मंत्री के घर पर मौजूद है। दिल्ली पुलिस के 20 जवान भी चिदंबरम के घर पर हैं। ईडी की टीम ने चिदंबरम से पूछताछ शुरू कर दी है। अगर चिदंबरम की आज गिरफ़्तारी होगी तो ईडी की टीम करेगी। क्योंकि सीबीआई की चार्जशीट में चिदंबरम का नाम नहीं है। खबर है कि सीबीआई के डायरेक्टर भी सीबीआई मुख्यालय पहुँच गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार को उन्हें सीबीआई के स्पेशल जज अजय कुमार कुहार की अदालत में पी चिदंबरम को पेश किया जा सकता है।

बता दें कि INX मीडिया केस में करीब 27 घंटे से फरार चल रहे पी चिदंबरम बुधवार रात अचानक से कॉन्ग्रेस मुख्यालय में मीडिया से रूबरू हुए। यहाँ उन्‍होंने अपनी बात रखी। इसके तुरंत बाद वहकपिल सिब्बल के साथ निकल गए। थोड़ी ही देर में सीबीआई की टीम भी वहाँ पहुँच गई। लेकिन यहाँ कॉन्ग्रेस नेताओं ने दरवाजे बंद कर लिए थे। बता दें कि प्रेस कांफ्रेंस में पी चिदंबरम के साथ कॉन्ग्रेस के 9 बड़े नेता मौजूद रहे।

इसके बाद जैसे ही वह अपने घर पहुँचे, दिल्ली के जोरबाग स्थित पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के घर पर जमकर ड्रामा शुरू हो गया। सीबीआई की टीम भी जब जोरबाग पहुँची तो वहाँ सीबीआई अधिकारियों को अंदर नहीं जाने दिया गया। यहाँ भी गेट बंद कर दिया गया। इसके बाद सीबीआई की टीम चिदंबरम के घर की दीवार फाँदकर चिदंबरम के घर के अंदर पहुँची। थोड़ी ही देर में ED की टीम भी पहुँच चुकी है। चिदंबरम के साथ इस वक्त उनके घर पर कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी मौजूद हैं।  

बता दें दिल्‍ली हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत अर्जी खारिज होने के बाद से पी चिदंबरम का पता नहीं चल रहा था। सीबीआई और ईडी की टीमें उन्‍हें गिरफ्तार करने के लिए कई बार उनके आवास का चक्‍कर लगा रही थीं, पर वे नहीं मिले।

चिदंबरम ने मीडिया से कहा कि इस मामले में उनके और परिवार के खिलाफ कोई चार्जशीट नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद आजादी है, चिदंबरम ने कहा कि अगर उन्हें जिंदगी और आजादी के बीच में चुनने कहा जाए तो वे आजादी चुनेंगे।

पी चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद उनके बेटे कार्ति चिदंबरम ने कहा कि इस केस के कई साल बीतने के बाद भी सीबीआई के पास चार्जशीट में उनके पिता का नाम नहीं है। कार्ति ने कहा कि देश के कई बड़े मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सरकार ने ये कदम उठाया है।

DU में लगी सावरकर-बोस-भगत सिंह की प्रतिमा, प्रपंची लिबरल्स के आँसुओं से यमुना में बाढ़

देश में एक ऐसा वर्ग है जो राष्ट्रवाद और भारतीय इतिहास से जुड़ी हर दूसरी गतिविधि पर प्रलाप और प्रपंच का सिलसिला शुरू कर देता है। इस बार लिबरल्स के प्रलाप का विषय है दिल्ली यूनिवर्सिटी में भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और वीर सावरकर की मूर्ती की स्थापना। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव से पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने नॉर्थ कैंपस स्थित आर्ट फैकल्टी के गेट पर बिना इजाजत वीर सावरकर, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह की प्रतिमा लगा दी।

इस प्रकरण के बाद सोशल मीडिया पर लिबरल्स का एक वर्ग तुरंत सक्रीय हो गया और उन्होंने भगत सिंह, बोस और वीर सावरकर की इस प्रतिमा का विरोध करना शुरू कर दिया। इस प्रपंच में कॉन्ग्रेस पार्टी भी शामिल थी और इन सबका मकसद था सिर्फ ट्विटर पर #gaddarsavarkar हैशटैग ट्रेंड कराया जाए।

यह कॉन्ग्रेस का दुर्भाग्य ही हो सकता है कि एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सर से पाँव तक घोटालों में पकड़े जा रहे हैं वहीं उनकी पार्टी का एकमात्र लक्ष्य आज सिर्फ सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करवाने तक सीमित हो चुका है। शायद अब कॉन्ग्रेस इन्हीं छोटी-छोटी खुशियों में अपना मनोबल तलाशने लगी है। स्वतन्त्रता संग्राम के जिन नायकों पर देश हमेशा गौरवान्वित रहा है, कॉन्ग्रेस अक्सर उनका अपमान करती आई है। और यह विरोध भी उसी का एक उदाहरण है।

इसी क्रम में मीडिया का एक ख़ास लिबरल वर्ग भी इस प्रतिमा के विरोध में कॉन्ग्रेस के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा।

हालाँकि ट्विटर पर ही एक वर्ग ऐसा भी मौजूद है जो प्रपंची लिबरल्स के दुःख पर तथ्यों से मरहम भी लगाते देखे गए।

एबीवीपी नेतृत्व वाले छात्रसंघ के अध्यक्ष शक्ति सिंह का कहना है कि उन्होंने कई बार यूनिवर्सिटी प्रशासन से प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति माँगने के लिए संपर्क किया लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं आया। और उनकी चुप्पी की वजह से ही छात्रों ने यह कदम उठाया है।

DUSU अध्यक्ष शक्ति सिंह का कहना है कि डीयू कैंपस में एक तहखाना है, जहाँ भगत सिंह को ट्रायल के दौरान रखा गया था। छात्रों ने माँग की थी कि या तो भगत सिंह की प्रतिमा लगाई जाए या तहखाने को सार्वजनिक किया जाए, लेकिन डीयू प्रशासन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई।

जल शक्ति मंत्री ने कहा- अब इन तीन नदियों का पानी पाक नहीं जाने देंगे

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बयान दिया है कि हिंदुस्तान अब सिंधु जल समझौते के तहत अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान को और नहीं लेने देगा। बुधवार को ANI से बात करते हुए शेखावत ने कहा, “हिंदुस्तान के हिस्से के पानी में से काफी ज्यादा पाकिस्तान को चला जाता है। इनमें से कई नदियाँ रावी, व्यास और सतलज तंत्र की उपनदियाँ हैं, और इनके कैचमेंट एरिया (हौज़, जलग्रहण क्षेत्रों) में से पानी उस तरफ (पाकिस्तान को ) चला जाता है। हम इस पर तेज़ी से काम कर रहे हैं कि कैसे हमारे हिस्से का पानी जो पाकिस्तान में चला जाता है, उसे घुमा कर अपने किसानों, उद्योगों और लोगों के प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जा सके।”

उन्होंने इस योजना की तकनीकी और जलशास्त्रीय (हाइड्रोलॉजिकल) अनुकूलता पर शोध शुरू करने की भी बात कही। उनके अनुसार उन्होंने इस विषय पर अध्ययन जल्दी खत्म करने का निर्देश दिया है, ताकि योजना को अमली जामा पहनाया जा सके।

शेखावत की बातें 370 हटाने के बाद से पाकिस्तान पर लगातार कड़े होते जा रहे मोदी सरकार के रुख में एक और कड़ी हैं। और यह कोई नई योजना भी नहीं है। मई में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने भी पाकिस्तान द्वारा जिहादियों को समर्थन में कमी न होने के चलते मोदी सरकार द्वारा पानी का बहाव रोकने पर विचार करने की बात कही थी।

1960 में नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हुए सिंधु जल समझौते में हिंदुस्तान को रावी, व्यास और सतलज के पानी का पूरा अधिकार मिला था, जिसके बदले हमें पाकिस्तान को सिंधु, चेनाब और झेलम के पानी पर पूरा हक़ देना होता है।

दिल्ली की सड़कों पर भाग रहे थे चिदंबरम, केजरी वाले 15 लाख CCTV कैमरे में आए नजर

ये हैरानी की बात है कि देश में इतना कुछ चल रहा है और इस सब के बीच एक ऐसे व्यक्ति का नाम कहीं गुम होता जा रहा है जो हर आम आदमी की पहली पसंद है। भले ही, पहली पसंद होने के कारण सबके व्यक्तिगत हो सकते हैं। वो सज्जन हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल। केजरीवाल ने एक ऐसे महत्वपूर्ण समय पर सीन में एंट्री की है, जब किसी को भी उनकी उम्मीद नहीं थी और एक ही झटके में फिल्म सुपरहिट हो गई।

दरअसल, पूरा मामला 2 दिन से कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम को लेकर है। चिदंबरम कल शाम को अचानक तब लापता हो गए जब सीबीआई और ED की टीम उनके घर जाँच के लिए पहुँची। चिदंबरम को ढूँढ निकालने की शर्त आपस में लगी ही थी कि एक फोन कॉल ने सब साफ़ कर दिया।

CBI के जाँच दल को एक अनजान नंबर से कॉल आया और उधर से एक बेहद करुण आवाज ये कहते हुए सुनाई दी- “हेलो, मैं अरविन्द केजरीवाल बोल रहा हूँ। फ़ोन मत काटना जी।”

इतना सुनते ही एक बार को तो सीबीआई को सन्देह हुआ कि शायद केजरीवाल उन्हें दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री मरहूम शीला दीक्षित के घोटालों की 370 पेजों की ऐतिहासिक फ़ाइल वाला सबूत देने के लिए कॉल कर रहे हों। लेकिन तुरंत केजरीवाल ने सस्पेंस को तोड़ते हुए पहली फुर्सत में बता दिया कि उन्हें पता है पी चिदंबरम कहाँ हैं।

अरविन्द केजरीवाल ने बताया कि जो 15 लाख CCTV कैमरे उन्होंने अपने वादे के मुताबिक़ दिल्ली की गली-गली और चप्पे-चप्पे में लगा रखे हैं, उनमें उन्होंने चिदंबरम को भागते हुए पकड़ लिया है।

दिल्ली की सड़कों पर भागते हुए पी चिदंबरम की CCTV फुटेज-

हालाँकि, सॉल्ट न्यूज़ ने इस इस CCTV फुटेज का फैक्ट चेक करते हुए पाया है कि केजरीवाल द्वारा सौंपा गया यह वीडियो पी चिदंबरम का ही है, लेकिन यह तब लिया गया था जब वो ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कम्पनी जोमैटो से खाना मँगवाने पर मुस्लिम की जगह उन्हें एक हिन्दू युवक द्वारा खाना डिलीवर करवाया गया। सॉल्ट न्यूज़ ने इस वीडियो का भांडाफोड़ करते हुए स्पष्ट किया कि इस वीडियो में चिदंबरम हिन्दू युवक द्वारा खाना डिलीवर करवाए जाने पर अपना विरोध व्यक्त करने के लिए खान मार्केट की ओर दौड़ रहे हैं।

केजरीवाल ने यह सबूत केंद्र सरकार को बिना किसी शर्त के सौंपने का भी वायदा किया है। केजरीवाल का मानना है कि जिस तरह से वो चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस से लगातार गठबंधन की भीख माँगते रहे फिर भी उन्हें इसके लिए तड़पाया गया था, इसी क्रोध में वो कॉन्ग्रेस की ईंट से ईंट बजाने की प्रतिज्ञा ले चुके हैं। हालाँकि, एक समय अरविन्द केजरीवाल के करीबी रह चुके कवि कुमार विस्वास का कहना है कि केजरीवाल ने यह सबूत पहले उन्हें सौंपने की बात कही थी।

इसके बाद यह जानकारी भी सीबीआई के हाथ लगी है कि जब भी पी चिदंबरम केंद्र सरकार से सवाल करते थे कि आखिर नीरव मोदी और विजय माल्या देश से कैसे भाग गए? तो वास्तव में वो अपने लिए ट्रिक का जुगाड़ कर रहे होते थे और उनकी प्रैक्टिस अपने घर पर एक्सपर्ट्स के निर्देशन पर किया करते थे।

केजरीवाल ने यह CCTV फुटेज सीबीआई को सौंपकर एक बार पूरी की पूरी अटेंशन फिर से वापस हथिया ली है जिसके लिए उनकी तारीफ आम आदमी पार्टी कार्यालय से लेकर ध्रुव राठी कार्यालय तक हो रही है। और ख़ास बात यह रही कि इस पूरे प्रकरण में केजरीवाल को एक भी रैपट नहीं पड़ा। अपने वादे के अनुसार तय समय से पूर्व ही 15 लाख CCTV से दिल्ली में कैमरा का जाल बिछा देने के बाद अब केजरीवाल का अगला लक्ष्य दिल्ली को लंदन बना देने का है, ताकि पी चिदंबरम को यह विश्वास रहे कि वो भी भागकर विदेश ही पहुँचे हुए हैं।

मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पति पर बेटी के बलात्कार का झूठा आरोप लगाने वाली माँ पर चलेगा मुकदमा

मद्रास हाई कोर्ट में मंगलवार (21 अगस्त) को एक कस्टडी की लड़ाई और बच्ची पर पिता द्वारा यौन शोषण के मुकदमे ने ऐसा मोड़ लिया कि अदालत के जज को कहना पड़ गया, “इस मुकदमे ने अदालत के ज़मीर को हिला कर रख दिया है…” पता चला कि बलात्कार का आरोपित पिता न केवल निर्दोष है, बल्कि उस पर उसकी पत्नी, उसकी बेटी की माँ ने इसलिए ऐसा घिनौना इलज़ाम लगाया क्योंकि दम्पत्ति की दो बेटियों में से कोई भी मॉं के साथ नहीं रहना चाहती थी। अदालत ने माँ के खिलाफ पुलिस को तुरंत पॉक्सो एक्ट के तहत झूठी शिकायत करने पर होने वाली कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है। जस्टिस आनंद वेंकटेश ने उम्मीद भी जताई कि यह निर्णय पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग करने की कोशिश करने वालों के लिए के नज़ीर होगा।

11 साल की बच्ची को बलात्कार से प्रेग्ननेंट करने का आरोप

2018 में पत्नी ने पति पर आरोप लगाया कि पति ने 2003 में विवाहित हुए दम्पत्ति की 11 साल की बेटी के साथ बलात्कार किया और उसे गर्भवती कर दिया। आगे पत्नी ने दावा यह भी किया कि उसने (पत्नी ने) वह गर्भ किसी ‘नेटिव मेडिसिन’ (देसी इलाज) से गिरा दिया। उसकी शिकायत के आधार पर पति के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा ‘पीड़िता’ बच्ची से पूछताछ के बाद आरोपित पिता को अग्रिम जमानत मिल गई। बच्ची ने पिता के द्वारा किसी भी प्रकार के अश्लील या यौन संबंध से इंकार किया। इसके बाद पिता ने अपने खिलाफ मुकदमे को पत्नी द्वारा निजी दुश्मनी से प्रेरित बताते हुए अदालत से मुकदमे को निरस्त करने की अपील की। मामले की और अधिक जाँच के पश्चात न्यायालय ने पिता की अपील स्वीकार कर ली।

‘दोनों बच्चियाँ पिता के साथ ही रहना चाहतीं हैं’

अपने आदेश में अदालत ने लिखा कि उसके (अदालत के) और 11-वर्षीया बच्ची के बीच हुई बात के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि यह झूठा मुकदमा माँ ने उस बच्ची और उसकी डेढ़-वर्षीया बहन की कस्टडी के लिए दायर किया है। बच्ची ने अदालत के सामने किसी भी प्रकार के ‘देसी इलाज’ या किसी अस्पताल में ले जाकर गर्भपात किए जाने से भी इंकार किया है। और-तो-और, बच्ची ने जज को बताया कि वह और उसकी बहन, दोनों ही अपने पिता के साथ जाना चाहतीं हैं।

‘और भी हैं झूठे मुकदमे’

इसके आगे जस्टिस वेंकटेश ने जो कहा, वह इस केस विशेष से भी महत्वपूर्ण, इस पूरे प्रकरण का सबसे ज़्यादा गौर करने और याद रखने लायक वाक्य है। “कई बार ऐसा हुआ है कि अदालत का ध्यान इससे मिलते-जुलते मामलों की तरफ आकर्षित किया गया है, कि अकसर झूठा मुकदमा किया जाता है मानों पति ने पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध किया हो; और इस अदालत को यह सूचित किया गया है कि ऐसी सस्ती चालें फैमिली कोर्ट के मुकदमों में अपनाई जातीं हैं, ताकि पतियों को दबाव डाल कर लाइन पर लाया जा सके। (इस मामले को देखने के) पहले अदालत यह मानने को तैयार नहीं थी कि ऐसा भी हो सकता है (कि कोई माँ अपनी बेटी के बलात्कार का झूठा आरोप बच्ची के पिता पर ही लगा दे), और यह मुकदमा अदालत की आँखें खोल देने वाला है। इससे अदालत को यह समझ में आया कि पॉक्सो एक्ट का किस तरह दुरुपयोग हो सकता है।”

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के अनुसार अंत में जज ने घोषित किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमा एक मिनट और भी जारी नहीं रह सकता, और पुलिस को FIR तत्काल निरस्त करने का आदेश दिया। साथ ही जोड़ा कि झूठी शिकायत करने वाली महिला भी बचनी नहीं चाहिए। अदालत ने हिदायत दी कि उसे पति के खिलाफ झूठी शिकायत, वह भी बेटी के नाम पर, करने का परिणाम भुगतवाया ही जाना चाहिए।

“पुलिस को आदेश दिया जाता है कि द्वितीय प्रतिवादी (महिला) के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत तुरंत मुकदमा झूठी शिकायत करने का दर्ज किया जाए, और उसके खिलाफ कानून के हिसाब से कार्रवाई की जाए। यह मुकदमा अपने निहित स्वार्थों के लिए इस कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग करने वालों के लिए नज़ीर होना चाहिए।”

जम्मू-कश्मीर में आम ज़िन्दगी पटरी पर: आज घाटी के साथ जम्मू में भी कई मदरसों को खोल दिया गया

जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के 15 दिन बाद बुधवार (अगस्त 21, 2019) को घाटी में कई सारे मदरसों को फिर से चालू कर दिया गया। इससे पहले राज्य के कई इलाकों में स्कूल-कॉलेजों को खोल दिया गया था। प्रशासन ने बुधवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर में दिन के समय में कोई पाबंदी नहीं रहेगी। साथ ही राज्य में माध्यमिक शैक्षणिक संस्थान भी खुले रहेंगे। प्रशासन ने कश्मीर के ज्यादातर शहरी क्षेत्र से पाबंदी हटा ली हैं। जम्मू में मदरसों को भी फिर से चालू कर दिया गया है।

वहीं, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निष्क्रिय होने के बाद राज्य के बारामूला में मंगलवार (अगस्त 20, 2019) देर रात आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ में एक आतंकी मारा गया। हालाँकि, इस ऑपरेशन के दौरान एक एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) को भी अपनी जान गँवानी पड़ी। वैसे, आर्टिकल 370 के जम्मू-कश्मीर में निष्प्रभावी होने के बाद एनकाउंटर का यह पहला मामला था।

बता दें कि, राज्य प्रशासन ने प्रदेश के सभी स्कूलों-कॉलेजों और सरकारी दफ्तरों को पहले ही खोलने के निर्देश जारी किए थे। प्रशासन ने बताया था कि कुल 190 स्कूलों को खोला जाएगा। गौरतलब है कि, 5 अगस्त को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने की घोषणा करने से पहले ही सुरक्षा के मद्देनज़र प्रशासन ने कश्मीर में कर्फ्यू लगा दिया था। इसके बाद से ही स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया था।

कानूनी विवाद और चिदंबरम के परिवार का है काला इतिहास, सभी कानूनी मामले एक नजर में

आईएनएक्स मीडिया केस (INX Media Case) में कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम को सुप्रीम कोर्ट से आज बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज होने के बाद आज जस्टिस रमन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच में सुनवाई हुई। केस में पी चिदंबरम की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई गई थी। लेकिन अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। बुधवार सुबह जस्टिस रमन्ना की कोर्ट में ये मामला गया। लेकिन उन्होंने इस केस को चीफ जस्टिस की कोर्ट में भेज दिया था।

चिदंबरम की अर्जी में कुछ खामियों की वजह से उसमें सुधार किया गया और एक बार फिर जस्टिस रमन्ना की अदालत में उनके वकीलों ने दलील दी। लेकिन दूसरी बार भी जस्टिस रमन्ना ने सुनवाई से इनकार कर दिया।

पी चिदंबरम पर प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के कठोर रुख के बाद से कॉन्ग्रेस नेता पर लगातार गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। यही वजह है कि चिदंबरम कल शाम से ही गायब हैं और उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी कर दिया गया ताकि वो देश छोड़कर भाग न सकें। चिदंबरम के परिवार का और कानूनी मामलों का रिश्ता नया नहीं है।

एक नजर कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम से जुड़े कानूनी विवादों के इतिहास पर-

  • एयरसेल मैक्सिस मामलों में पूर्व केंद्रीय मंत्री चिदंबरम को पहली बार पिछले साल जुलाई में अंतरिम राहत मिली थी। इसके बाद समय-समय पर उनकी अंतरिम राहत की अवधि बढ़ाई जाती रही है।
  • पिछले साल 19 जुलाई को सीबीआई द्वारा दाखिल आरोप पत्र में चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के नाम थे।
  • सीबीआई जाँच कर रही है कि UPA-1 के दौरान वर्ष 2006 में वित्त मंत्री के पद पर रहते हुए चिदंबरम ने एक विदेशी कंपनी को एफआईपीबी मंजूरी कैसे दे दी? क्योंकि ऐसा करने का अधिकार केवल आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) के पास ही होता है।
  • पी चिदंबरम के अलावा उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के खिलाफ भी ये आरोप हैं कि उन्होंने आईएनएक्स मीडिया के खिलाफ संभावित जाँच को रुकवाने के लिए 10 लाख डॉलर की माँग की थी। इस मामले में कार्ति चिदंबरम को बीते साल 28 फरवरी को गिरफ्तार भी किया गया था।
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) एयरसेल मैक्सिस प्रकरण में धनशोधन के एक अलग मामले की जाँच कर रहा है। इस मामले में एजेंसी चिदंबरम से पूछताछ कर चुकी है और उनकी अग्रिम जमानत याचिका लंबित है।
  • चिदंबरम 3,500 करोड़ रुपए के एयरसेल मैक्सिस सौदे तथा 305 करोड़ रुपए के आईएनएस मीडिया मामले की जाँच कर रही एजेंसियों के दायरे में हैं।
  • दोनों ही उपक्रमों को एफआईपीबी से मंजूरी UPA सरकार के पहले कार्यकाल में दी गई थी और तब चिदंबरम वित्त मंत्री थे।
  • आईएनएक्स मीडिया मामले में सीबीआई (CBI) ने मई 15, 2017 में FIR दर्ज की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2007 में जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे तब 305 करोड़ रुपए की विदेशी धनराशि प्राप्त करने के लिए मीडिया समूह को दी गई विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) मंजूरी में अनियमितताएँ बरती गईं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस संबंध में 2018 में धनशोधन का एक मामला दर्ज किया।
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने चिदंबरम से एयर इंडिया से जुड़े एक खरीद मामले की जाँच में सहयोग करने को कहा था। इस मामले में चिदंबरम के पूर्व मंत्रिमंडलीय सहयोगी प्रफुल्ल पटेल से भी जाँच एजेंसी ने पूछताछ की थी।
  • पी चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई (CBI) सारदा चिटफंड घोटाले में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है। उन पर 1.4 करोड़ रुपए की कथित रिश्वत लेने का आरोप है। इस साल फरवरी में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उन्हें मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी थी।
  • इसके अलावा, मद्रास HC ने पी चिदंबरम, उनकी पत्नी नलिनी, बेटे कार्ति, कार्ति की पत्नी श्रीनिधि कार्ति चिदंबरम पर काला धन (अज्ञात विदेशी आय एवं परिसंपत्ति) तथा कर अधिनियम, 2015 के अधिरोपण के तहत मुकदमा चलाने के लिए पिछले साल नवंबर में आयकर विभाग द्वारा जारी मंजूरी संबंधी आदेश रद्द कर दिए थे।
  • उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। फिलहाल यह मामला लंबित है।
  • सीबीआई ने इन आरोपों की भी प्राथमिक जाँच शुरू की है कि तमिलनाडु में एक होटल को पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम के एक संबंधी ने इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) के अधिकारियों की कथित मिली-भगत से हड़प लिया है।
  • इसके अलावा पी चिदंबरम के खिलाफ इशरत जहाँ मामले से जुड़े एक हलफनामे में कथित छेड़छाड़ करने से संबंधित शिकायत दिल्ली पुलिस में लंबित है। आरोप है कि जब हलफनामे में छेड़छाड़ की गई थी तब चिदंबरम गृह मंत्री थे।

चिदंबरम और अमित शाह का फर्क: एक 9 साल पहले डटा था, दूसरा आज भागा-भागा फिर रहा

गिरफ्तारी के डर से भागे-भागे फिर रहे वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम और मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच का फर्क जानना हो तो आपको वक्त को नौ साल पीछे ले जाना पड़ेगा। वह रविवार (जुलाई 25, 2010) का दिन था। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में सीबीआई को गुजरात के गृह मंत्री की तलाश थी। उस व्यक्ति की जो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद सरकार में सबसे ज्यादा रसूख रखने वाला शख्स माना जाता था। जिसके पास एक साथ 12 मंत्रालयों की जिम्मेदारी थी। ये शख्स थे अमित शाह।

सीबीआई को गुजरात पुलिस के आतंकरोधी दस्ते द्वारा नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन शेख को एक एनकाउंटर में मार गिराने के मामले में उनकी तलाश थी। अमित शाह उस दिन सबसे पहले गुजरात भाजपा के दफ्तर पहुँचे। उससे एक दिन पहले उन्होंने अपने ख़िलाफ़ चार्जशीट फाइल होने के बाद मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। वहाँ उन्होंने घोषणा किया कि वे भाजपा दफ्तर से सीधा सीबीआई दफ्तर जाकर आत्मसमर्पण करेंगे।

उन्होंने अपने ख़िलाफ़ सारे आरोपों को बनावटी और कॉन्ग्रेस की साज़िश करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के बहाने गुजरात की भाजपा सरकार का एनकाउंटर करना चाह रही है। साथ ही उन्होंने पूरे भरोसे के साथ कहा कि न्यायपालिका में यह मामला नहीं टिकेगा। आप भी उस प्रेस कॉन्फ्रेंस को देखिए, जिसमें अमित शाह ने आत्मसमर्पण से पहले अपनी बात रखी थी:

जुलाई 2010 में आत्मसमर्पण से पहले अमित शाह ने जो बातें कहीं, वो आज भी सुलगते हुए सवाल हैं

इसके बाद अमित शाह सीधे सीबीआई दफ़्तर पहुँचे, जहाँ से उन्हें मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया और फिर जेल भेज दिया गया। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या देश के गृह मंत्री रह चुके पी चिदंबरम ऐसा करने का साहस रखते हैं? क्या वो मीडिया या सरकारी एजेंसियों के समक्ष प्रस्तुत होकर अपना पक्ष रखेंगे? या फिर वो इसीलिए भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके पास अपने बचाव में कहने को कुछ नहीं है? अमित शाह के पास था तो अपनी बात कह वे सीधे
सीबीआई के पास पहुँच गए।

अमित शाह के ख़िलाफ़ क्या खेल रचा गया था, इसकी एक जरा सी बानगी देखिए। जुलाई 22, 2010 को अमित शाह को सीबीआई का समन मिला की वो दोपहर 1 बजे एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत हों। यह समन उन्हें सिर्फ़ 2 घंटे पहले यानी 11 बजे दिया गया था। इसके बाद उनसे कहा गया कि वह 23 जुलाई को एजेंसी के सामने पेश हों। उसी दिन शाम 4 बजे चार्जशीट दाखिल कर दिया गया और उसके अगले दिन अमित शाह ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन, इन सारे प्रकरण में अमित शाह की नाराज़गी केवल इस बात को लेकर थी कि एक तो उन्हें जवाब देने का समय नहीं दिया गया और फिर उनकी बात सुने बिना चार्जशीट दाखिल कर दिया गया।

चिदंबरम के मामले में ऐसा नहीं था। उन्हें अदालत से कई बार राहत मिली। अगर उनके ख़िलाफ़ चल रहे आईएनएक्स मीडिया केस और एयरसेल-मैक्सिस केस को मिला दें तो पाएँगे कई महीनों से अदालत से उन्हें गिरफ़्तारी से राहत मिल रही थी। बचाव के लिए उन्हें भरपूर समय मिला। अमित शाह के मामले में ऐसा नहीं था। उनका सवाल था कि किसी व्यक्ति को दोपहर 1 बजे पूछताछ के लिए बुलाया जाए और फिर 3 घंटे बाद ही 4 बजे हजारों पेज की चार्जशीट पेश कर दी जाए, तो उसका क्या मतलब निकाला जाए?

अमित शाह के कहने का अर्थ यह था कि चार्जशीट पहले से तैयार कर के रखी गई थी, क्योंकि हजारों पेज की चार्जशीट 3 घंटे में तो नहीं ही तैयार की जा सकती है। चिदंबरम के पास कोई जवाब नहीं है? कोई दलील नहीं है? तभी तो वे अपनी गाड़ी और ड्राइवर को छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं। क़ानून के शिकंजे का ऐसा खौफ कि फोन भी स्विच ऑफ कर लिया। क्या चिदंबरम के पास आज 2010 वाले अमित शाह जैसी हिम्मत है, जिससे वह आत्मसमर्पण कर सकें?

चिदंबरम राष्ट्रीय नेता है, बड़े वकील हैं और केंद्र में कई मंत्रालय संभाल चुके हैं। उनकी तुलना में 2010 वाले अमित शाह कहीं नहीं ठहरते। उस समय शाह वह भले गुजरात के शक्तिशाली नेता थे, लेकिन थे तो राज्य के ही नेता न। क्या आपको पता है सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस का निष्कर्ष क्या निकला? दिसंबर 2014 में सीबीआई की विशेष अदालत ने अमित शाह को इस केस से बरी कर दिया। उनके ख़िलाफ़ कोई भी आरोप सही साबित नहीं हुए।

जस्टिस एमबी गोसावी ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ पूरा का पूरा मामला गवाहों के बयानों पर आधारित है, जो अफवाहों की तरह लग रहे हैं। अर्थात, यह खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात हो गई। अमित शाह ने गिरफ़्तारी के बाद 3 महीने जेल की सज़ा भुगती। उन्हें गुजरात से तड़ीपार करने का निर्देश दिया गया। केस को गुजरात से बाहर मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया। 2012 तक वह गुजरात से बाहर ही रहे।

शाह अकेले नेता नहीं थे जिसे उस समय की यूपीए सरकार ने घेरने की कोशिश की थी। उस समय कई भाजपा नेताओं व हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोगों को इसी तरह पकड़-पकड़ कर परेशान किया गया था।

भारतीय इतिहास में शायद ही ऐसी कोई बानगी मिले जहाँ किसी मुख्यमंत्री से 9 घंटे लगातार बैठा कर पूछताछ की गई हो। मार्च 2010 में एसआईटी ने ऐसा किया था। यह सब कुछ चिदंबरम के गृह मंत्री रहते हुआ था। इस मामले में भी मोदी दोषी साबित नहीं हुए और सरकारी एजेंसियाँ कुछ भी साबित नहीं कर पाई।

आज समय बदल गया है। चिदंबरम भाग रहे हैं और अमित शाह गृह मंत्री हैं। बस अंतर इतना है कि इस बार मामला भ्रष्टाचार का है, बना-बनाया नहीं है। इसके ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस नेताओं के पास भी कोई तर्क नहीं हैं सिवाय यह कहने के कि ‘मोदी बदला ले रहा है’।

चिदंबरम देश के सबसे बड़े वकीलों में से एक हैं। उनके पास दशकों का राजनीतिक व प्रशासनिक अनुभव है। ऐसे में, आज अगर वो ‘फरार’ हैं तो सवाल उठने लाजिमी हैं। अगर उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया है तो वह भाग क्यों रहे हैं? उनके पक्ष में कपिल सिब्बल और सलमान ख़ुर्शीद जैसे वकीलों की लाइन लगी हुई है, जो कल से ही सुप्रीम कोर्ट में जमे हुए हैं और हर पैंतरा आजमा रहे हैं। अमित शाह के मामले में ऐसा नहीं था। अगर आप निर्दोष हैं तो आपके पास लोगों के सम्मुख आकर सच्चाई कहने की ताक़त होनी चाहिए। कानून का सामना करने की हिम्मत चाहिए।

जब व्यक्ति निर्दोष होता है और उसे पता होता है कि उसे फँसाया जा रहा है, तो उसके पास क़ानून का सामना करने की हिम्मत होती है। जैसे उस समय अमित शाह ने कहा था कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है और उनका आत्मविश्वास ही था कि उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका में यह बना-बनाया हुआ मामला टिकेगा ही नहीं।

वैसे आपको बता दें कि राफेल-राफेल चिल्लाने वाले और कश्मीर पर मोदी सरकार को कोसने वाले चिदंबरम का भगोड़ो से पुराना नाता रहा है। मार्च 2013 में माल्या ने चिदंबरम को पत्र लिख कर माँग की थी कि उन्हें एसबीआई से एनओसी दिलाया जाए। एसबीआई उस बैंक समूह का नेतृत्व कर रहा था, जिन्होंने माल्या की एयरलाइन्स को लोन दिए थे। मार्च 2013 में विजय माल्या और पी चिदंबरम की मुलाक़ात भी हुई थी। यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में पी चिदंबरम ने सोना के आयात को लेकर बनी पॉलिसी में अहम बदलाव किए, जिससे नीरव मोदी सहित 13 व्यापारियों को काफ़ी फायदा पहुँचा।

देश की जनता आज चिदंबरम से एक ही बात पूछना चाह रही है। उन्होंने कभी आईएनएक्स मीडिया को एफडीआई के लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड से क्लियरेंस दिलाने के लिए पीटर और इन्द्राणी मुखर्जी से अपने बेटे के व्यापार में मदद करने को क्यों कहा? रिश्वत क्यों माँगी?

NDTV के प्रणय रॉय, राधिका रॉय, विक्रम चंद्रा पर साज़िश, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार का मामला: पढ़ें नए FIR में क्या है

सीबीआई ने प्रणय रॉय, राधिका रॉय और NDTV के पूर्व सीईओ विक्रम चंद्रा पर मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में नई FIR दर्ज की है। इसके अलावा एजेंसी ने विक्रम चंद्रा के घर पर छापा मारकर तलाशी अभियान भी चला रखा है। आरोप है कि उन्होंने FDI के नियमों का उल्लंघन किया है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की प्रति के अनुसार यह टैक्स चोरी का मामला है, और आयकर विभाग के कुछ अधिकारियों की भी इसमें मिलीभगत है। आगे आरोप यह भी है कि आरोपितों ने पैसा घुमाकर फ़र्ज़ी लेनदेन के ज़रिए भारत लाने के लिए ‘टैक्स-हेवन’ देशों में सब्सिडरी इकाईयाँ बनाईं। NDTV में अज्ञात लोकसेवकों (जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और सरकारी कर्मचारी) के पैसे का निवेश होने की भी बात FIR में कही गई है।

FIR के अनुसार NDTV ने Network PLC (NNPLC) को लंदन में 30 नवंबर, 2006 को स्थापित किया। FIR के अनुसार “NNPLC ने मेसर्स जेफ्फ्रीज़ इंटरनेशनल के ज़रिए 100 मिलियन डॉलर की राशि मई 2007 में step-up coupon convertible bonds के ज़रिए इकठ्ठा की। जेफ्फ्रीज़ इंटरनेशनल को इस काम के लिए 55 लाख डॉलर का कमीशन मिला। इसके बाद NNPLC ने भारत में NDTV ग्रुप की कई कंपनियों NDTV Group viz. NDTV imagine Ltd., NDTV LifeStyle Limited, NDTV Emerging Market BV, NDTV Convergence Ltd. और NDTV Labs Limited के खाते में ₹193,98,44,3251 ट्रांसफर किए।”

हॉलैंड (नीदरलैंड्स) में NDTV पर एक दूसरी कंपनी NDTV lnternational Holding BV 10 अप्रैल 2008 को शुरू करने का भी आरोप है। इसका इस्तेमाल अमेरिका की कम्पनी General Electric (GE) की सब्सिडरी कंपनी NBCU से $15 करोड़ का फंड इकठ्ठा करने के लिया गया। इस राशि का निवेश NDTV International Holding में करके, आरोप है कि, NBCU ने NNPLC में 26% अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी खरीद ली। FIR में आगे आरोप है कि यह राशि मॉरीशस और लंदन में खोली गईं NDTV Ltd. की सब्सिडरियों में से होते हुए आखिर में भारत में NDTV lmagine Ltd., NDTV Lifestyle, NDry Lab, NDTV convergence, NDTV NGEN and NDTV studio आदि भारत में NDTV की कंपनियों में बटोर ली गई।

साज़िश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार

FIR में NDTV के प्रमोटरों प्रणय रॉय, राधिका रॉय और विक्रम चंद्रा और मरहूम केवीएल नारायण राव पर अज्ञात लोकसेवकों के साथ FDI के रास्ते मनी लॉन्ड्रिंग की साज़िश को अंजाम देने का आरोप है। उनपर साज़िश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि NNPLC को FIPB बोर्ड की मंजूरी उस समय के FDI प्रावधानों को ताक पर रखकर दी गई। प्रणय रॉय, राधिका रॉय और विक्रम चंद्रा पर मुकदमा IPC की धारा 120-B, 420, और भ्रष्टाचार-निरोधी अधिनियम, 1988 की धारा 13(1) और 13(2) के अंतर्गत दर्ज किया गया है।

बात रवीश कुमार के ‘सूत्रों’, ‘कई लोगों से मैंने बात की’, ‘मुझे कई मैसेज आते हैं’, वाली पत्रकारिता की

कल एक लेख में मैंने वामपंथी मीडिया की कार्यशैली में आए बदलाव की बात की थी कि कैसे मोदी के 2014 में आने से पहले और उसके बाद, उनकी रिपोर्टिंग, विश्लेषण और लेखों के मुद्दों को प्रोपेगेंडा की चाशनी में डुबा कर छानने की बातों में बदलाव आया। उसी बात को आगे बढ़ाते हुए, वामपंथी लम्पट पत्रकार समूह की एक विशुद्ध देशी तकनीक पर बात करना चाहूँगा।

आपने एक स्वघोषित महान एंकर को बहुत बेचैन पाया होगा। वो स्वयं ही अपने फेसबुक वाल पर हैशटैग चलाते हैं जिसमें वो लिखते हैं कि रवीश जी, आपसे उम्मीद है। इस हैशटैग को रवीश जी ने अगर सही तरीके से समझा होता तो वो समझ जाते कि लोगों ने बिना हैशटैग के उनसे कहा कि रवीश जी, आपसे अच्छी पत्रकारिता की उम्मीद है। लेकिन नब्बे प्रतिशत खबरों को ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ के नाम पर चलाने वाले रवीश जी से वैसी उम्मीद बेकार ही है।

रवीश जी ने हिन्दी पत्रकारिता को कई शब्द और वाक्यांश दिए हैं जिनमें ‘गोदी मीडिया’, ‘व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी’, ‘डर का माहौल’, ‘आपातकाल आ रहा है ब्रो’ आदि प्रमुख हैं। आजकल रवीश जी नई बात को मेनस्ट्रीम करने की कोशिश में लगे हैं। उनका कहना है कि लोगों में ‘साहस का मंदी’ आ गई है। ‘बोलने का खतरा’ नामक वाक्यांश को भी रवीश जी धीरे से प्रचलित करने की फिराक में हैं। उसे आप आने वाले दिनों में उनके फेसबुक वाल पर और प्राइम टाइम में देख और सुन पाएँगे।

रवीश जी का दुर्भाग्य देखिए कि उन्होंने गोदी मीडिया की बात की और उन्हें ये ही नहीं पता कि उनका पूरा स्टूडियो, मालिक समेत किसकी गोद में है। ये भी हो सकता है कि रवीश जी पत्रकारिता छोड़ कर जबसे लिंग्विस्ट बनने की राह पर चल पड़े हैं, तब से वो बैठे तो गोद ही में हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं है। कई बार लोग गोद में इतना ज़्यादा कम्फर्टेबल हो जाते हैं कि उन्हें लगता है कि यही कुआँ संसार है।

वैसे ही व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी की बात करने वाले रवीश कब उसके चांसलर बन गए, उन्हें पता ही नहीं चला। इनकी खबरों को आप सुनिए जिसमें सत्य और तथ्य के अभाव के कारण रवीश जी आपको विश्वास दिलाने की भरपूर कोशिश करते नजर आते हैं। वो किसी क्रेडिबल आदमी से बात नहीं कराते। कहते हैं सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार!

उसके बाद उनकी वैचारिक क्रांति का अगला पड़ाव ‘मुझे कई लोगों ने मैसेज किया’ पर आ कर रुकता है। कभी सोचा है आपने कि एक बड़ी कम्पनी, एक बहुत बड़ा पत्रकार, अपने इनबॉक्स पर इतना आश्रित क्यों हो जाता है? कभी सोचा है कि वो ये क्यों कहता है कि लोग ‘ऑन द रिकॉर्ड’ बोलना नहीं चाहते?

ये समझने के लिए आपको टीवी पत्रकारिता को समझना होगा। खास कर, जब टीवी के लोग कहीं जाते हैं तो उन्हें कैमरे पर वही बुलवाना होता है, जो प्रोग्राम के प्रोड्यूसर ने सोच रखा है। इसलिए, लोगों को तैयार किया जाता है कि उन्हें क्या बोलना है, कैसे बोलना है। ये हमेशा नहीं होता पर जब भी मुद्दा आपके मतलब का हो, ऊपर से आदेश हो कि इसे ऐसे ही कवर करना है, तब लोगों को तैयार किया जाता है।

जब लोग कैमरे पर आने को तैयार न हों, तो दो बातें होती हैं। पहली यह कि वो व्यक्ति वाकई डरा हुआ हो, दूसरी यह कि टीवी पर बैठा पत्रकार जो चाह रहा है वो उसे मिल नहीं रहा। अब आप सोचिए कि किसी की नौकरी जा चुकी हो, उसके पास खोने को और क्या है? वो व्यक्ति कैमरे पर आ कर क्यों नहीं बोल सकता?

बकौल रवीश कुमार, 25 से 50 लाख लोगों की नौकरी जा चुकी है। आप इस बड़ी संख्या को देखिए जिसमें अंदाजा भी लगाया है तो 25 से 50 लाख तक का लगाया है। इन दोनों संख्याओं में 25 लाख का अंतर है। ये हमारे आज के पत्रकार हैं जिनके अंदाजे का रेंज सौ प्रतिशत होता है। जब हम अंदाजा लगाते हैं तो कहेंगे कि 25-30 लाख लोगों की नौकरी गई। ये भी बहुत बड़ा मार्जिन है। लेकिन रवीश कह रहे हैं कि ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ लाखों लोगों की नौकरियाँ जा चुकी है तो वो यह भी कह सकते थे कि लगभग 1 से 2 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई। रवीश भक्त ‘आह रवीश जी, वाह रवीश जी’ कहते रहेंगे।

दूसरी बात आप यह सोचिए कि इन 25 से 50 लाख लोगों में रवीश को दस लोग ऐसे नहीं मिले जो कैमरे पर कहते कि उनकी नौकरी चली गई। जब पत्रकार ‘मुझे कई लोगों ने मैसेज किया’ से लेकर ‘मैंने कई लोगों से बात की’ कहते हुए आपको यह कहने लगे कि लोगों के ‘साहस में मंदी’ आ रही है तो आपको समझ जाना चाहिए कि पत्रकार का मुख्य उद्देश्य किसी उद्योग से नौकरियों के जाने का नहीं, बल्कि उसके नाम एक और नया मुहावरा हो जाए, इसका प्रयास है।

ऐसे शब्दों का प्रयोग रिपोर्ट को साहित्यिक बनाने के लिए लोग करते हैं लेकिन इसके साथ ही आपके पास पर्याप्त सबूत होने चाहिए। ‘साहस की मंदी’ बहुत ही पोएटिक बात है लेकिन इसका आधार क्या है? ‘ऑन द रिकॉर्ड नहीं आना चाहते’ के नाम पर आप वही पुराना कैसेट घिस रहे हैं कि मोदी ने लोगों को इतना डरा दिया है कि लोग बोलना नहीं चाहते!

ये फर्जीवाड़ा कब तक चलेगा?

ये पत्रकारिता नहीं है। ये किसी भी तरह अपनी बात मनवाने का एक तरीका है। ये एक कुत्सित प्रयास है जहाँ आपके पास न तो तथ्य हैं, न ढंग के मुद्दे हैं, न दिखलाने के लिए लोग हैं, इसलिए सबसे आसान तरीका है ‘मैंने कई लोगों से बात की’। अगर आपने कई लोगों से बात की तो कहाँ हैं वो लोग? आपको कई लोगों ने मैसेज किया तो क्या आपकी टीम उन लोगों से मिलने गई? या पिछले दिनों जो कविता कृष्णन जैसे नक्सलियों ने चार लोगों के पैर दिखा कर पूरे कश्मीर के परेशान होने की बात की थी, वही तरीका है आप लोगों की पत्रकारिता की?

रोजगार के मुद्दे पर रवीश कुमार ने आँकड़ों, एजेंसियों से आए तथ्यों की दूसरी तरफ खड़े होने पर चुनाव तक चिल्लाते रहे कि बेरोजगारी बढ़ रही है जबकि उस समय ऐसा बिलकुल नहीं था। रवीश हमेशा वैसी जगहों पर चले जाते थे जहाँ छात्र तैयारी करते हैं। जहाँ लोग नौकरियों की तैयारी करते हैं वहाँ आपको बेरोजगार नहीं मिलेंगे तो कौन मिलेगा? फिर भी, जब लगातार भाजपा की सरकारें बनती रहीं तो थक हार कर रवीश ने कहा था कि पता नहीं मोदी ने क्या कर दिया है कि ये लोग अभी भी उसी को वोट करना चाहते हैं! ऐसा कहते हुए रवीश के चेहरे की मुस्कान ऐसी विचित्र थी की जीवन में दूसरे किसी जीव को मैंने वैसे मुस्कुराते नहीं देखा है।

ये पत्रकारिता कुछ ऐसे चलती है कि आपको रिपोर्ट बनाने से पहले हेडलाइन लिखना होता है और उसमें निष्कर्ष होना चाहिए कि आपको जाना कहाँ है। यहाँ रवीश कुमार और उनके पूरे गिरोह की लड़ाई किससे है यह छुपा नहीं है। इसलिए अब ये सारे लोग एक जगह, एक दूसरे का इंटरव्यू लेते मिलेंगे आपको। हर जगह यही बोला जा रहा है कि पत्रकारिता तो अब बस ये लोग ही बचा सकते हैं।

ऐसा बोलना अपने आप में किस तरह के घमंड के भरने से फलित होता है, ये हम सब जानते हैं। ‘हम चुनी दीगरे नेस्त’ वाली भावना एक अलग तरह की असहिष्णुता है। आप सोचिए कि ये गुमान कहाँ से आता है कि पत्रकारिता तो वही कर रहे हैं, बाकी तो गीत गा रहे हैं। इस तरह के इन्टॉलरेंस का कोई अंत नहीं। ये अपने गिरोह को छोड़ कर कभी भी बाहर नहीं जाते। क्या आपने इन्हें कभी भी अपने गिरोह के बाहर के लोगों की रिपोर्ट को शेयर करते देखा है? क्या कभी भी टीवी पर कहते सुना है वैसे अखबार का नाम जो वामपंथी विचार के न हों?

आपने नहीं सुना होगा क्योंकि अहम के चरम पर बैठे हैं ये लोग। जब काम की खबरें न हों तो खबरें बनाते हैं, सबूत न मिले तो ‘मुझे कई लोगों ने मैसेज किया’ बताते हैं, कैमरे ले कर कहीं चले भी गए, और मतलब की बात करने को कई तैयार न हो तो कह देंगे कि लोगों में ‘साहस की मंदी’ है। ये है वामपंथी पत्रकारिता जो खबरों को देखता नहीं, दिखाता नहीं, बल्कि खबरों को बनाता है, मेकअप करता है उनका और तब आपको गंभीर चेहरे के साथ बताता है कि भाई साहब आप देखते कहाँ हैं, रवीश का हलाल खबर शॉप यहाँ है!

हम क्रेडिबल हैं, हम पर विश्वास करो… पिलीज ब्रो…

पैटर्न पर गौर कीजिए। पहले इन्होंने खबरों में झुकाव दे कर कवर करना शुरु किया। मोदी बोले कुछ, उसको घुमा कर कुछ और कहना शुरु किया। उसके बाद दौर आया एक घटना को इस तरह से सारे सियार मिल कर हुआँ-हुआँ करते थे, मानो वो घटना पूरे भारत की पहचान हो। कोई अपराध हुआ तो उसमें हिन्दू, सवर्ण आदि को ऐसे प्रोजेक्ट किया जाने लगा जैसे अपराध का कारण दो लोगों की आपसी दुश्मनी नहीं, धर्म और जाति थी। जबकि ऐसा होता नहीं था।

इस दौर के बाद जब दूसरे धड़े का मीडिया सक्रिय होने लगा और इनके झूठ पकड़ कर पूछने लगा कि एक मुद्दे पर हाय-तौबा करते हो, दूसरे पर क्यों नहीं, तब इन्होंने नया तरीका अपनाया। वो नया तरीका था खबरें पैदा करने का। इस शृंखला में अमित शाह के बेटे से लेकर अजित डोवाल तक पर पैसों के होराफेरी के आरोप लगे जो साबित नहीं हो सके। ये बात और है इनके मालिक पर सैकड़ों करोड़ों के शेयर की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग के मुकदमे चल रहे हैं, उस पर कभी बात नहीं करते। इनके मालिक की पेशी भी हो तो वो प्रेस फ्रीडम पर हमला हो जाता है।

खबरें पैदा करने की कड़ी में दक्षिणपंथी मीडिया द्वारा इनकी करतूतों को एक्सपोज करते रहने के कारण इन पर से लोगों का विश्वास लगातार गिरता जा रहा है। इनके पोर्टलों का ट्रैफिक नीचे जा रहा है, टीवी देखने वाले कम हो रहे हैं, और ये लोग अपने आप को फर्जी अवार्ड दे कर खुश हो रहे हैं।

‘द वायर’ से लेकर ‘न्यूज लॉन्ड्री’ तक रवीश के इंटरव्यू करते दिखते हैं जहाँ रवीश कुमार बताते हैं कि मीडिया की स्थिति खराब है। जबकि बात इसके उलट यह है कि इनके विचारधारा वाली मीडिया की स्थिति खराब है। लोगों ने इन्हें देखना-पढ़ना बंद कर दिया है और वैसे लोगों को पसंद किया जा रहा है जिनकी पत्रकारिता किसी से घृणा के आधार पर नहीं हो रही, जो नकारात्मक नहीं है, जो जीडीपी के ऊपर जाने पर ये सवाल नहीं पूछते कि गरीब जीडीपी नहीं खाता, और जब वो नीचे जाए तो पलट कर ये नहीं कहते कि अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई।

इसलिए, अब इनके जो स्वघोषित प्रतिमान हैं, वो स्वयं ही कहते नजर आ रहे हैं कि पत्रकारिता तो वही कर रहे हैं। इसलिए सड़क पर निकलिए तो बच कर निकलिए। कोई राह चलते पकड़ लेगा और कहेगा कि ‘मैं सही पत्रकारिता कर रहा हूँ, प्लीज मेरी बात मान लो, मुझे कई लोगों ने मैंसेज किया है’। ऐसा कहने के बाद क्या पता वो आपको अपने फोन का पासवर्ड बता कर मैसेज पढ़वा ही दे!