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देखिए किस तरह से वायुसेना ने तवी नदी में फँसे 2 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाला

जम्मू के तवी नदी में फँसे 2 लोगों को भारतीय वायुसेना ने बहादुरी का परिचय देते हुए बाहर निकाल लिया है। मुश्किल परिस्थितियों में भी वायुसेना द्वारा दोनों फँसे लोगों को सफलतापूर्वक बाहर निकाल लेना लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल हो रहा है और ख़ूब शेयर किया जा रहा है। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे वायुसेना के जवान ने रस्सी के सहारे हैलीकॉप्टर से नीचे उतर कर दो लोगों को बचाया, जो नदी में झंझावातों के बीच घिर गए थे।

भारतीय वायुसेना ने तवी नदी में फँसे लोगों को सुरक्षित निकाला

इस वीडियो को देख कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आपदा की स्थिति में किन मुश्किल परिस्थितियों के बीच हमारी सेना आम नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने का कार्य करती है। उक्त वीडियो में पहले तो वायुसेना का जवान दोनों फँसे नागरिकों को सेफ्टी बेल्ट पहना कर रस्सी के सहारे हेलीकॉप्टर में भेजता है और बाद में ख़ुद जाता है। वायुसेना ने एमआई-17 हेलीकॉप्टर का प्रयोग कर इस रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम तक पहुँचाया।

सुरक्षित निकाले गए दोनों व्यक्ति मजदूरी का कार्य करते हैं। तवी नदी का पानी अभी पूरे उफान पर है और बाढ़ के कारण कई इलाक़े डूब गए हैं। वायुसेना के रेस्क्यू ऑपरेशन को देखने के लिए पुल पर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था।

नाराज़ मलेशिया के PM ने ज़ाकिर नाइक को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने को कहा, समन जारी, होगी पूछताछ

भगोड़े ज़ाकिर नाइक की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं लेकिन उसकी अकड़ अभी भी कम नहीं हुई है। हिन्दुओं व चीनियों के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में मलेशिया के अधिकारियों ने उसे दूसरी बार समन जारी किया है। विवादित इस्लामिक उपदेशक को मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि उसे वहाँ की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं है। मनी लॉन्ड्रिंग और हेट स्पीच के मामलों में भारतीय एजेंसियों को भी ज़ाकिर नाइक की तलाश है।

बौखलाए नाइक ने पेनांग के उपमुख्यमंत्री पी रामासामी सहित 4 बड़े नेताओं को अदालत में घसीट लिया है। ज़ाकिर ने इन सभी से 48 घंटे के अंदर माफ़ी माँगने अथवा मानहानि का मुक़दमा झेलने की धमकी दी है। इन नेताओं ने साफ़ कर दिया कि ज़ाकिर का बयान जहरीला और विभिन्न सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य फैलाने वाला था। ज़ाकिर ने मलेशिया के मानव संसाधन मंत्री के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज कराया है। उसका कहना है कि इन नेताओं ने उसके बयान को ग़लत तरीके से पेश किया।

मलेशिया के पूर्व पुलिस प्रमुख रहीम नूर ने सरकार से माँग की है कि ज़ाकिर नाइक का ‘परमानेंट रेजिडेंट’ समाप्त कर उसे भारत को सौंप दिया जाए क्योंकि उसने आपराधिक कार्य किया है। ज़ाकिर नाइक ने अपने विवादित बयान में कहा था कि मलेशिया में रहने वाले हिन्दुओं को भारत में रह रहे अल्पसंख्यकों से सौ गुना ज्यादा अधिकार मिलते हैं, फिर भी वे (मलेशिया निवासी हिन्दू) मलेशिया के पीएम की बजाय मोदी का ही समर्थन करते हैं।

हालाँकि, मलेशिया के प्रधानमंत्री कई मौक़ों पर ज़ाकिर नाइक का समर्थन करते रहे हैं लेकिन अबकी उन्होंने कहा है कि इस्लामिक उपदेशक ने इस बार बयान देते हुए हद पार कर दी। प्रधानमंत्री महाथिर ने कहा कि चीनियों व भारतियों को वापस जाने की बात कह ज़ाकिर ने सीमा लांघी है। बाद में अपने बयान से पलटते हुए ज़ाकिर नाइक ने कहा कि उसने इस बात पर चर्चा की थी कि मलेशिया में किस तरह से हिन्दू अल्पसंख्यकों को काफ़ी अधिकार दिए जाते हैं।

पूर्व PM चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर राज्यसभा में निर्विरोध निर्वाचित, सपा छोड़ BJP में हुए थे शामिल

भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी नीरज शेखर राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। उन्होंने जुलाई 15, 2019 को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वह समाजवादी पार्टी का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए थे। बलिया लोकसभा क्षेत्र उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का पारम्परिक गढ़ रहा है और नीरज शेखर ने पिता की विरासत को संभालते हुए यहाँ से 2 बार जीत दर्ज की। हालाँकि, 2014 आम चुनाव में सपा के टिकट पर लड़ते हुए उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

नीरज शेखर उत्तर प्रदेश के कोटे से राज्यसभा में निर्वाचित हुए हैं। चूँकि, उनके ख़िलाफ़ किसी अन्य प्रत्याशी ने नामांकन नहीं किया, नाम वापसी की समयसीमा ख़त्म होते ही उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही लगभग एक महीने के भीतर उनकी संसद में वापसी हो गई। यह भी जानने लायक बात है कि जिस सीट के लिए उपचुनाव हुआ, वह नीरज शेखर के इस्तीफे के बाद ही खाली हुई थी।

नीरज शेखर के आने से बिहार से लगे पूर्वांचल के क्षेत्रों में भाजपा और बढ़त बना सकती है। कहा जा रहा है कि 2019 लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें बलिया से टिकट नहीं दिया, जिसके बाद से ही वे पार्टी ने नाराज़ चल रहे थे। नीरज शेखर ने जब दिल्ली भाजपा कार्यालय में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की, तब कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी वहाँ मौजूद थे।

…क्योंकि वामपंथ का कोई लोकतंत्र नहीं होता: हॉन्गकॉन्ग के प्रदर्शनकारियों को आतंकी बता कर नहीं बच सकता चीन

चाहें वो चीन हो या उत्तर कोरिया, अधिकतर उदाहरणों से पता चलता है कि वामपंथ लोकतंत्र को नहीं मानता। इसके लिए आपको समझना पड़ेगा कि हॉन्गकॉन्ग में क्या हो रहा है? आपने सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट्स ज़रूर देखी होगी, जिसमें हॉन्गकॉन्ग में प्रदर्शनकारियों द्वारा एम्बुलेंस को रास्ता देने से लेकर शांतिपूर्वक कैंडल मार्च निकालने तक का जिक्र किया गया है। हम परत दर परत घटनाक्रम की बात करते हुए इस पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया से लेकर चीन के रुख तक की बात करेंगे लेकिन पहले जानते हैं कि आखिर मुद्दा क्या है?

हॉन्गकॉन्ग में प्रदर्शन कई हफ्तों से चल रहा है। अगर ताज़ा प्रदर्शनों की बात करें तो 12 हफ़्तों से भी ज्यादा समय से यह चालू है। यह प्रदर्शन इसीलिए शुरू हुआ क्योंकि लोगों ने चीन की साम्राज्यवादी और विस्तारवादी नीतियों को भाँपते हुए उसके इरादों को पढ़ लिया। दरअसल, चीन ने हॉन्गकॉन्ग को मेनलैंड चीन में लाने की पूरी योजना तैयार कर ली थी। हॉन्गकॉन्ग की जनता ख़ुद को चीनी कहलाना पसंद नहीं करती और ब्रिटिश राज ख़त्म होने के बाद से ही उसे आर्थिक व शासकीय स्वायत्तता हासिल है।

हॉन्गकॉन्ग और चीन के बीच का समीकरण

हॉन्गकॉन्ग विश्व के सबसे समृद्ध इलाक़ों में शामिल है। व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग का हब है। चीन ने हॉन्गकॉन्ग के कई ऐसे लोगों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया है, जिसे वह ख़तरे के रूप में देखता है। ये वो लोग हैं जो चीन द्वारा हॉन्गकॉन्ग को धीमे-धीमे पूरी तरह कब्जाने की नीति का विरोध करते रहे हैं। इलेक्शन कमिटी से लेकर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों तक, बीजिंग ने हर जगह अपने लोग बिठा रखे हैं, जिससे वहाँ की जनता ख़ुद को ठगा महसूस करती है। हॉन्गकॉन्ग का अपना अलग संविधान है, जिसे ‘बेसिक लॉ’ कहा जाता है।

लेकिन, दिक्कत की बात यह है कि बेसिक लॉ 2047 में एक्सपायर हो जाएगा। उसके बाद क्या? क्या उसके बाद कोई भी निर्णय लेने से पहले चीन हॉन्गकॉन्ग की जनता की राय लेगा? हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव भी चीन के किसी विश्वस्त को ही बनाया जाता है और जजों की नियुक्ति में अहम रोल होने के कारण क्षेत्र की न्यायिक व्यवस्था भी कमोबेश चीन के ही प्रभाव में काम करती है। यूनिवर्सिटी ऑफ हॉन्गकॉन्ग के एक सर्वे के अनुसार, वहाँ की 71% जनता अपने-आप को चीनी कहलाने में गर्व महसूस नहीं करती। ऐसी भावना युवाओं में और भी अधिक है।

चीन ने एक नया प्रत्यर्पण बिल लाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि हॉन्गकॉन्ग के नागरिकों को न्यायिक कार्रवाई के लिए उन्हें मेनलैंड चीन ले जाया जा सकेगा। इससे वहाँ की जनता सतर्क हो गई और उन्होंने बिल का कड़ा विरोध किया, जिसके बाद इसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। लेकिन, इसने हॉन्गकॉन्ग की जनता के भीतर की उस आग को बढ़ा दिया जो अरसे से भभक रहा था।

विरोध-प्रदर्शनों को लेकर चीन का रवैया

हॉन्गकॉन्ग में विरोध-प्रदर्शन करने वाले लोगों को चीन किसी आतंकवादी से कम नहीं मानता है। हॉन्गकॉन्ग के एयरपोर्ट पर जब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, उसके बाद चीन ने इसे आतंकवादियों वाली हरकत बताया। जैसा कि आप जानते हैं, चीन में मीडिया सरकार के नियंत्रण में होती है और चीनी मीडिया संस्थान ‘ग्लोबल टाइम्स’ के एक पत्रकार की कुछ हरकतों के कारण हॉन्गकॉन्ग के लोगों से उसे बंधक बना लिया था। लोगों का कहना था कि वह चीनी जासूस है।

एक पुलिसकर्मी ने एक प्रदर्शनकारी महिला को नीचे गिरा कर उसकी तरफ बन्दूक तान दिया, जिसके बाद लोग भड़क गए। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों की पिटाई भी की। क्षेत्र में लाखों लोग लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और चीन ने हॉन्गकॉन्ग से कुछ दूर एक शहर में सुरक्षाबलों का जमावड़ा लगाया है ताकि ज़रूरत पड़ने पर कभी भी क्रैकडाउन किया जा सके। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी आशंकाएँ जता चुके हैं कि चीनी सेना हॉन्गकॉन्ग में घुस कर गड़बड़ी कर सकती है।

ट्रम्प ने हॉन्गकॉन्ग की जनता की सुरक्षा व क्षेत्र की शांति पर जोर दिया। चीनी मीडिया लगातार सेना द्वारा पूरे साजो-सामान के साथ शेनजिन शहर में जमावड़ा लगाने की वीडियोज और फोटोज शेयर कर रहा है। उनका इरादा प्रदर्शनकारियों को डराने का है और यह सन्देश देने का है कि ज़रूरत पड़ने पर सेना कोई भी कार्रवाई करने के लिए तैयार है। ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने तो चीनी सेना का धौंस दिखाते हुए यहाँ तक लिखा कि हॉन्गकॉन्ग के लोग ‘आत्म विनाश’ की ओर बढ़ रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का नज़रिया

संयुक्त राष्ट्र ने हॉन्गकॉन्ग में बढ़ती हिंसक वारदातों को लेकर चिंता ज़ाहिर की। जम्मू-कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक बुलाने वाले चीन ने हॉन्गकॉन्ग पर यूएन के बयान को ग़लत करार देने में तनिक भी देरी नहीं की और कहा कि इससे ‘अपराधियों’ को और बढ़ावा मिलेगा। चीन ने अपने प्यादे और हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव कैरी लैम का भी बचाव किया। चीन हॉन्गकॉन्ग को मेनलैंड की तरह ट्रीट करना चाह रहा है और इसमें कैरी लैम उसकी भरपूर मदद कर रही हैं। ऐसे में, चीन का पूरा जोर इस बात पर है कि ‘एक देश, दो संविधान’ वाला नियम ख़त्म हो जाए।

चीन ने यूनाइटेड किंगडम को पहले ही गीदड़ भभकी दे रखी है कि उनके द्वारा हस्तक्षेप न किया जाए। जब यूके के कुछ नेताओं ने हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन का समर्थन किया, चीन ने साफ़-साफ़ कहा कि यह बयान ब्रिटेन की ‘औपनिवेशिक सोच’ को दर्शाता है। बीजिंग ने ब्रिटेन को यह एहसास दिलाया कि हॉन्गकॉन्ग अब उसकी कॉलोनी नहीं है। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, बीते सप्ताह कुल 17 लाख लोग सड़कों पर उतरे। हालाँकि, पुलिस ने इस आँकड़े को झूठा बताया। पुलिस के आसार, 1.3 लाख लोगों ने विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।

हालाँकि, हॉन्गकॉन्ग की जनता ने प्रदर्शन के बीच कई बार मानवता की मिसाल पेश की। एम्बुलेंस को रास्ता देना उनमें से एक है। प्रदर्शनकारी अधिकतर प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चूँकि हॉन्गकॉन्ग एयरपोर्ट विश्व के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट्स में से एक है, यहाँ प्रदर्शनकारियों के जमावड़े ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरह खींचा। सालाना 7 करोड़ से यात्रियों द्वारा इस एयरपोर्ट का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए यहाँ हुई हिंसक झड़पों ने पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया।

अब आगे क्या होगा?

हॉन्गकॉन्ग का भविष्य क्या होगा? प्रदर्शनकारियों के प्रति चीन क्या रवैया अपनाएगा? क्या कैरी लैम इस्तीफा देंगी?इतना तो तय है कि इस महानगर को मिली स्वायत्ता अब पहले जैसी नहीं रही है और आगे भी चीन इसे कम करता जाएगा। वह अपनी विस्तारवादी नीति को नहीं छोड़ेगा। चीनी मीडिया द्वारा सेना का धौंस दिखाना भी इसी का एक हिस्सा है। कुल मिला कर देखें तो वामपंथी सत्ता के आधीन चीन में लोकतंत्र का अभाव तो है ही, हॉन्गकॉन्ग में भी मेनलैंड चीन की दमनकारी नीतियों को लागू करने की कोशिश जारी है।

आपको थियानमेन स्क्वायर नरसंहार याद होगा ही ? चीन में हॉन्गकॉन्ग ही एक ऐसी जगह है, जहाँ उस वीभत्स घटना की बरसी पर मारे गए लोगों को याद किया जाता है क्योंकि मेनलैंड चीन में किसी की हिम्मत नहीं है। चीनी सेना द्वारा 10 हज़ार लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था, जिनमें से कई छात्र थे, युवा थे। बेख़ौफ़ बेशर्मी का आलम यह है कि चीन के सत्तासीन बड़े नेता आज भी अपनी इस कार्रवाई को सही ठहराते हैं। इस घटना के बारे में चीन में न कोई बोल सकता है, न मीडिया छाप सकती है और न ही सोशल प्लेटफॉर्म्स पर इसकी चर्चा हो सकती है।

हॉन्गकॉन्ग के बेसिक लॉ में जो बातें है, उनका आज कोई मोल नहीं रहा है, क्योंकि उसमें जनप्रतिनिधियों से लेकर न्यायिक व्यवस्था तक, सब पर चीन की छाया न पड़ने देने की कोशिश की गई थी। आज इसका उल्टा हो रहा है। कुल मिला कर देखें तो चीन को बस हॉन्गकॉन्ग की विदेश और रक्षा नीति पर ही निर्णय लेने का अधिकार सौंपा गया था। आर्थिक रूप से समृद्ध, पर्यटन के आधार पर अति व्यस्त और व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण हॉन्गकॉन्ग पर चीन का जितना ज्यादा कब्जा होगा, वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार को उतना ही फायदा है।

जिंदगी से परेशान हैं पाकिस्तानी, कुछ नहीं मिला तो मेरे ऊपर निकाल रहे भड़ास: अदनान सामी

पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी ने कहा है कि पाकिस्तान के लोग अपने जीवन से निराश हो चुके हैं और इसकी भड़ास वे उन पर निकाल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों निष्प्रभावी किए जाने के बाद से ही सामी पाकिस्तानियों के निशाने पर हैं। इसी क्रम में ट्विटर पर एक यूजर ने उनसे पूछा कि उन्हें पाकिस्तानियों की काफी आलोचना सुनने को मिल रही है। वो इन सबका सामना कैसे करते हैं?

सामी ने इसका जवाब देते हुए कहा कि पाकिस्तान के नागरिक खुद के जीवन से निराश हो चुके हैं और जब से उन्हें यह एहसास हुआ है कि वो इन सब से आगे निकल चुके हैं, तब से वो उनके ऊपर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो उन लोगों को माफ करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि भगवान उनके जीवन में सुधार करें। वे वास्तव में पीड़ित हैं।

गौरतलब है कि, इससे पहले भी अदनान सामी ने अपने जवाब से ट्विटर पर ट्रोल करने वाले लोगों का मुँह बंद कर दिया था। सामी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ लिखने वाले सर मोहम्मद ‘अल्लामा’ इक़बाल की इन्हीं पंक्तियों में ट्विटर पर शेयर किया था, इस तथ्य के साथ कि पाकिस्तान के ‘बौद्धिक पिता’ माने जाने वाले इक़बाल तकनीकी रूप से हिंदुस्तानी ही रहे, सारी उम्र। इक़बाल की मौत देश के विभाजन से 9 साल पहले 1938 में हो गई थी। उनका जन्म भी हिंदुस्तान में ही हुआ था। अदनान सामी ने इक़बाल की तस्वीर के साथ तिरंगा भी लगाया था।

इसके बाद बौखलाए पाकिस्तानी ट्रोल मुहम्मद शफ़ीक़ ने अदनान से पूछा कि उनके वालिद कहाँ पैदा हुए और मरे थे? अदनान ने शफ़ीक़ के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए जवाब दिया कि उनके वालिद हिंदुस्तान में ही 1942 में पैदा हुए थे, और 2009 में हिंदुस्तान में ही उन्होंने अंतिम साँस ली।

शाहिद ने तलाक़शुदा बीवी शबनम की काटी नाक, शाहिद के अब्बू-भाई समेत 3 के ख़िलाफ़ FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश के बरेली में शौहर द्वारा अपनी तलाक़शुदा बीवी की चाकू से नाक काट देने का मामला सामने आया है। इससे पीड़िता का चेहरा पूरी तरह से लहूलुहान हो गया। पीड़िता ने पुलिस को जो बयान दिया उसके आधार पर तीन आरोपितों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है।

हफीजपुर क्षेत्र के नसरुद्दीन और सकीरा के अनुसार, उन्होंने अपनी बेटी शबनम (35 वर्षीय) का निक़ाह चार साल पहले शाहिद से किया था, जोकि पहले से शादीशुदा था। तीन महीने पहले शाहिद ने शबनम को तलाक़ दे दिया था जिसके बाद वो अपने अम्मी-अब्बू के साथ रहने लगी।

पीड़िता का कहना है कि रविवार (18 अगस्त) सुबह उसके पिता नसरुद्दीन सब्जी का ठेला लेकर फेरी लगाने गए थे। बड़ा भाई नफीसुद्दीन बीमार था। उसे लेकर छोटा भाई शफीकुद्दीन और अम्मी सकीरा इलाज के लिए अस्पताल गई थी। इसके आगे उसने बताया कि जब वो पड़ोस में अपने रिश्तेदार के यहाँ जा रही थी तभी अचानक शाहिद और उसके अब्बू जाहिद, भाई सादे और बासिद ने रोककर बुरा-भला कहते हुए उसके साथ मारपीट की। इसी बीच शाहिद ने चाकू निकालकर शबनम की नाक काट दी।

खून से लथपथ शबनम को जान से मारने की धमकी देकर हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए। पुलिस ने सीएचसी भेजकर मेडिकल कराया। शबनम की शिक़ायत पर पुलिस ने उसके शौहर और उसके दोनों भाइयों के खिलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है। फ़िलहाल, आरोपित अपना घर बंद कर वहाँ से भाग गए हैं।

संतों संग राम जन्मभूमि न्यास पहुँचे मुस्लिम समर्थक, मंदिर निर्माण के लिए तराशे पत्थरों को किया साफ़

सर्वोच्च न्यायालय में राम मंदिर को लेकर चल रही सुनवाई के मध्य मुस्लिम समाज के वह लोग जो मंदिर बनने के समर्थन में हैं आज राम जन्मभूमि न्यास कार्यशाला पहुँचे और मंदिर निर्माण हेतु तराशे गए पत्थरों की सफाई की।

जानकारी के मुताबिक बबलू खान के नेतृत्व में 6 दर्जन मुस्लिम लोग न्यास पर पहुँचे और बड़ी संख्या में उन्होंने राम मंदिर न्यास में श्रम दान किया। इस दौरान मौक़े पर महंत परमहंस दास, महंत बृजमोहन दास, महंत डॉ. राघवेश दास वेदांती सहित विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय मीडिया प्रभारी शरद शर्मा भी मौजूद रहे।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी भी अयोध्या में राम मंदिर बनवाए जाने का खुला समर्थन कर चुके हैं। जिसके कारण इस्लामिक कट्टरपंथी उन्हें आलोचनाओं का शिकार बना चुके हैं। वहीं इसके अलावा खुद को बहादुर शाह जफर का वंशज बताने वाले प्रिंस हबीबुद्दिन तूसी भी कह चुके हैं कि अगर राम मंदिर बना तो वह उसके लिए सोने की ईंट देंगे।

तूसी तो यहाँ तक स्पष्ट कह चुके हैं कि वो चाहते हैं सुप्रीम कोर्ट राम जन्मभूमि की जमीन उन्हें सौंप दें। क्योंकि वहीं इस भूमि के आधिकारिक हकदार हैं।

बता दें इन दिनों राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में कोर्ट प्रतिदिन सुनवाई कर रहा है। माना जा रहा है कि नवंबर के अंत तक इस विषय पर अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा। दोनो पक्षों द्वारा अपनी दलीले दी जा रहीं हैं। मामले की सुनवाई खुद सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का काम तेज़ कर दिया गया है और इसके लिए अतिरिक्त कारीगरों को भी बुलाया जा रहा है। जिसके मद्देनजर राम मंदिर के मुस्लिम समर्थक भी इसमें अपना योगदान दे रहे हैं।

तिरंगे पर गाय को काटा: इमाम ने कहा ये जगह पूरी धरती पर धब्बा

हिंदुस्तान के अधिकांश लोगों का मानना है कि कट्टर जिहादियों और चरमपंथी इस्लामियों में भी पाकिस्तानी अलग ही ‘लेवल’ के बीमार और विक्षिप्त लोग हैं। हिंदुस्तान और हिन्दुओं से नफ़रत में अंधे हो वे अपनी आत्मा, अपना होशो-हवास पूरी तरह खो चुके हैं। पहले तो लिबरल गैंग इसे ‘विभाजन की प्रतिक्रिया से उपजी सोच’, ‘कट्टर हिन्दूवाद’, ‘नफ़रत’, ‘हिन्दू तालिबान’ आदि कहकर नकार दिया करते थे। लेकिन आज सोशल मीडिया के युग में दिख रहा है कि हमारी सोच गलत नहीं थी- पाकिस्तान में सच में आत्मा का ही अभाव है।

इसी आत्मा का, इंसानियत का अभाव पाकिस्तानी लोगों ने दिखाया। हिंदुस्तान के हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए पाकिस्तानी हैदराबाद शहर की सुन्नी तहरीक के कठमुल्लों ने इंसानियत की हद पार करते हुए तिरंगे पर लिटाकर गाय को काटा।

सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि यह घटना 15 अगस्त की है। अपनी पड़ताल में हमने पाया कि यह घटना पाकिस्तान की ही है। शायद इसी साल फरवरी में इसे अंजाम दिया गया था। इस घटना की तस्वीरें इसी साल एक मार्च को एक पाकिस्तानी वेबसाइट पर अपलोड की गई थी। हालॉंकि उस समय का कोई वीडियो हमें नहीं मिल पाया। लेकिन, तस्वीरों और वीडियो के मिलान से ऐसा लगता है कि ये एक ही घटना की हैं।

चूँकि अधिकाँश हिन्दू गाय को पवित्र पशु मानते हैं, माँ मानते हैं और उनकी आस्था का सम्मान करते हुए हिंदुस्तान के अधिकाँश राज्यों में गौवध पर प्रतिबंध है, इसलिए ‘पाकिस्तानी सुन्नी तहरीक हैदराबाद’ संगठन के लोगों ने अपने देश में सड़क पर गौवध किया, हिंदुस्तान के झंडे पर, ताकि हिंदुस्तान और हिन्दू दोनों को नीचा दिखाया जा सके। यही नहीं, गाय की हत्या भी सामान्य हलाल करने वाले तरीके से एक बार में रेत कर नहीं, गाय को तड़पा-तड़पा कर की गई। पहले आधा गला काटकर तड़पने के लिए, दर्द से पैर पटकने के लिए गाय को छोड़ दिया गया, उसके बाद धीरे-धीरे मारा गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि हिन्दुओं को ‘ठेंगा’ दिखाया जा सके कि देखो, तुम्हारी गऊ माता यहाँ पाकिस्तान में तुम्हारे ही झंडे पर रख कर न केवल मारी जाती है, बल्कि बेरहमी से, तड़पा-तड़पा कर मारी जाती है और तुम कुछ नहीं कर पाते।

तड़पती गाय के दर्द को ‘एन्जॉय’ करते न केवल वयस्क देखे जा सकते हैं, बल्कि किशोर भी दर्द और प्रताड़ना के इस वीभत्स खेल का हिस्सा हैं। एक बमुश्किल 7-8 साल का बच्चा भी कौतूहल और ‘इंट्रेस्ट’ के साथ इसे देखता है। यह गाय से अधिक पाकिस्तान की उस खुद की इंसानियत की हत्या है, जिसका तकाज़ा होता है कि यदि पेट भरने या ज़बान के चटखारे के लिए किसी पशु-पक्षी की जान लेना ज़रूरी है भी, तो इसे उस जंतु को कम-से-कम दर्द पहुँचा कर किया जाए न कि उसके दर्द, उसकी तड़पती हुई मौत का नंगा-नाच किया जाए।

‘ये कोई सामान्य समाज नहीं, धब्बा है’

इस्लाम से ही ताल्लुक रखने वाले ऑस्ट्रेलियाई इमाम मोहम्मद तौहीदी ने इस घटना का वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “पाकिस्तानी हिंदुस्तान को नीचा दिखाने के लिए हिन्दुस्तान के झंडे पर, हिंदुस्तान के स्वतंत्रता दिवस के दिन गाय की हत्या कर रहे हैं। यह कोई सामान्य समाज नहीं है। ये इस ग्रह पर ही एक धब्बा हैं। ये हमारे टैक्स के पैसे या किसी विदेशी सहायता के लायक नहीं हैं।”

PETA को भी चुनौती

इमाम तौहीदी ने पशु अधिकारों के नाम पर हिन्दुओं के त्योहारों में अड़ंगा डालने के लिए बदनाम संस्था पेटा को चुनौती दी कि वह इस अमानवीय व्यवहार के खिलाफ कुछ करके दिखाए। तौहीदी ने यह भी साफ किया कि उनकी चुनौती का अर्थ केवल पेटा का ट्वीट देखना नहीं है। वह देखना चाहेंगे कि इसके खिलाफ पेटा में कोई अंतरराष्ट्रीय याचिका, किसी संसद में कोई प्रस्ताव या किसी तरह के बहिष्कार के लिए लॉबिंग कर पाने की हिम्मत है।

कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने फिर अलापा अनुच्छेद-370 पर निर्णय वापस लेने का राग

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 के मुख्य प्रावधानों को हटाए जाने के बाद विशेष राज्य का दर्जा समाप्त हो गया है। मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फ़ैसले से घाटी के नेताओं में खलबली मची हुई है। देश भर में इस मुद्दे पर सियासत गर्मा गई है, इसी बीच कॉन्ग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद ने एक बार फिर से अपना पुराना राग अलापा है। 

गुलाम नबी ने कहा, “मैं सरकार से माँग करता हूँ कि उनके द्वारा लिया गया ग़लत निर्णय वापस लिया जाए। ये एक बार फिर सिद्ध हो गया है क्योंकि इससे राज्य में कोई भी ख़ुश नहीं है। ऐसा निर्णय वापस लिया जाना चाहिए। राजनेताओं को छोड़ा जाना चाहिए और सामान्य हालात बनाए जाना चाहिए।”

ग़ौरतलब है कि गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त को राज्यसभा में संकल्प पत्र पेश करने के साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने संबंधी विधेयक पेश किया था। इसके पारित होने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये क़ानून बन गया, तभी इस मुद्दे पर राजनीतिक गलियारे में उथल-पुथल मची हुई है।

जम्मू-कश्मीर में स्थिति को क़ाबू में रखने के लिए केंद्र सरकार ने भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती कर रखी है। घाटी में माहौल ख़राब करने की आशंका के चलते कई नेताओं को नज़रबंद भी किया गया है। हालाँकि, जम्मू-कश्मीर में अब धीरे-धीरे हालात सामान्य हो रहे हैं।

बता दें कि अनुच्छेद-370 को लेकर कॉन्ग्रेस में दो धड़े बँट गए हैं। एक धड़ा जहाँ सरकार के समर्थन में खड़ा है, वहीं दूसरी धड़ा इसके विरोध में है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व महासचिव जनार्दन द्विवेदी, मिलिंद देवड़ा और कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने अनुच्छेद-370 हटाने के सरकार के फ़ैसले का समर्थन किया है।

हुड्डा ने कॉन्ग्रेस आलाकमान को दी मोहलत, हरियाणा में टूट फिलहाल टली

हरियाणा कॉन्ग्रेस में टूट फिलहाल कुछ दिनों के लिए टल गई है। दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पार्टी अलाकमान को मोहलत देने के संकेत दिए हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से ही हुड्डा के अलग पार्टी बनाने के कयास लग रहे हैं। रोहतक में रविवार को उन्होंने एक बड़ी रैली की थी जिसमें कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा था।

सोमवार (अगस्त 19, 2019) को दिल्‍ली में हुड्डा ने कहा, “एक-दो दिनों में एक समिति गठित की जाएगी। इसके बाद एक बैठक होगी जिसमे आगे की रणनीति तय होगी। मैं वहीं करूंगा जो यह समिति तय करेगी। यदि वे मुझे कहेंगे तो मैं राजनीति छोड़ दूॅंगा।”

इससे पहले रविवार को भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि कॉन्ग्रेस अब पहले जैसी नहीं रही। वह रास्ता भटक गई है। उन्होंने कहा कि वो ख़ुद को अतीत से मुक्त करने जा रहे हैं।

हुड्डा ने महापरिवर्तन रैली में जम्मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 को हटाने के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस के रुख को गलत बताकर पार्टी को कठघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा था कि देशभक्ति और आत्मसम्मान के मुद्दे पर वह कोई समझौता नहीं कर सकते। आर्टिकल 370 के मसले पर हुड्डा ने सरकार का समर्थन करते हुए कहा था, “मैं एक देशभक्त परिवार से हूॅं। जो आर्टिकल 370 पर फैसले का विरोध कर रहे मैं उनसे कहना चाहता हूॅं-वसूलों पर जहॉं आँच आए वहॉं टकराना जरूरी है, जो जिंदा है तो जिंदा दिखना जरूरी है।”