बिहार से जेडीयू विधायक शर्फुद्दीन की एक फ़ोटो बड़ी तेज़ी से वायरल हो रही है। इस फ़ोटो में वो तिरंगे को सलामी देते समय अपने बाएँ गाल पर हाथ रखे हुए हैं, जबकि आसपास खड़े प्रशासनिक अधिकारी व नेता लोग तिरंगे के सम्मान में सलामी देते दिख रहे हैं। इस फ़ोटो के वायरल होते ही सूबे में सियासत गर्मा गई है।
इस फ़ोटो पर जेडीयू विधायक ने तर्क दिया कि अचानक उनके गाल पर एक कीड़ा बैठ गया था, जिसे वो हटा रहे थे। ठीक इसी बीच किसी ने यह फ़ोटो खींच ली और सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। विधायक शर्फुद्दीन के इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि एक कीड़े की वजह से उन्होंने तिरंगे की शान में यह गुस्ताखी की, वो भी बाएँ हाथ से! लेकिन जेडीयू अपने इस विधायक के बचाव में पूरी तैयारी के साथ खड़ी है।
जेडीयू विधायक का तर्क, गाल पर बैठ गया था कीड़ा (तस्वीर आभार: दैनिक जागरण)
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नेताओं की इस तरह की हरक़त किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है। राजनीतिक पार्टी ऐसे नेताओं के बचाव में इसलिए भी उतरती है क्योंकि वो अपने दामन में किसी की तरह का दाग लेना पसंद नहीं करती।
किसी पार्टी का अपने नेता के बचाव में उतरना तो एक हद तक समझ में आता है, लेकिन आश्चर्य तब होता है जब कोई न्यूज़ चैनल ऐसी हरक़त पर नेता का बचाव करता दिखता है। ऐसा ही कुछ NDTV ने भी किया है, जिसे देखकर लगता है कि जैसे इस विधायक को उसने अपनी ख़बर के ज़रिए एक तरह का सुरक्षा कवच प्रदान करने की कोशिश की हो।
दरअसल, हर मीडिया हाउस की ही तरह NDTV ने भी इस ख़बर का उल्लेख किया, लेकिन कुछ इस तरह जैसे विधायक के तर्क से वो पूरी तरह संतुष्ट हों। पहली बात तो यह कि NDTV ने विधायक की वो फ़ोटो ही नहीं लगाई जिसमें वो तिरंगे के समक्ष ऐसी ओछी हरक़त करते दिखे। दूसरी बात यह कि विधायक शर्फुद्दीन के कहे अनुसार उनके गाल पर एक कीड़ा बैठा था, जिसे वो हटा रहे थे। तो NDTV को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए थी कि विधायक के बाएँ गाल पर कीड़ा बैठा था न कि दाएँ गाल पर। जहाँ तक सवाल सलामी दिए जाने को लेकर है तो वो दाएँ हाथ से दी जाती है न कि बाएँ हाथ से।
NDTV ने अपनी ख़बर में नहीं लगाई जेडीयू विधायक की वायरल फ़ोटो
इस ख़बर से NDTV ने अपनी ‘ओछी’ पत्रकारिता का स्पष्ट प्रमाण दे डाला कि संवेदनशील मुद्दों के साथ खिलवाड़ कर कैसे वो अपने पाठकों और दर्शकों को ठगने का काम करता है।
आम आदमी पार्टी (AAP) के बागी और अयोग्य करार दिए जा चुके विधायक कपिल मिश्रा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। कपिल मिश्रा ने दिल्ली में भाजपा नेता मनोज तिवारी और विजय गोयल की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। बता दें कि कपिल मिश्रा ने शुक्रवार (अगस्त 16, 2019) को ही ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि वो बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था कि वो शनिवार (अगस्त 17, 2019) को 11 बजे बीजेपी में शामिल होंगे।
Delhi: Former Aam Aadmi Party (AAP) leader, Kapil Mishra joins Bharatiya Janata Party (BJP) in presence of party leaders Manoj Tiwari and Vijay Goel. pic.twitter.com/uFHiPd8ij0
गौरतलब है कि कपिल मिश्रा कई बार आम आदमी पार्टी का विरोध करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने को लेकर सुर्खियों में रह चुके हैं और लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अभियान चलाने की वजह से पार्टी ने कपिल मिश्रा की विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी थी। करावल नगर से विधायक रहे कपिल मिश्रा ने लोकसभा चुनाव के दौरान दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर भाजपा के समर्थन में अभियान चलाया था। AAP विधायक सौरभ भारद्वाज ने इसकी शिकायत विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल से की थी। इसकी सुनवाई करते हुए बीते दिनों विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी थी।
I am joining BJP tomorrow at 11 a.m. दिल्ली चले मोदी के साथ ??
हालाँकि, इसके खिलाफ कपिल मिश्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। कोर्ट में कपिल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष महोदय ने ‘लॉ ऑफ नेचुरल जस्टिस’ के खिलाफ जाकर निर्णय सुनाया। एक असंवैधानिक याचिका पर सुनवाई करके अध्यक्ष ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया।
AAP से निकाले जाने के बाद कपिल मिश्रा ने केजरीवाल सरकार के खिलाफ मोर्चा शुरू किया था। साथ ही केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टचार समेत कई गंभीर आरोप लगाए थे। केजरीवाल के खिलाफ गाने बनाए और सोशल मीडिया के जरिए तमाम चीजें ट्वीट भी की थीं। इसके अलावा उन्होंने केजरीवाल के खिलाफ धरना भी दिया था।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मुख्य चौराहे हजरतगंज को अब अटल चौक के नाम से जाना जाएगा। शहर की महापौर संयुक्ता भाटिया ने भारत रत्न व देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रथम पुण्यतिथि पर इसकी आधिकारिक घोषणा की। महापौर ने बताया कि हजरतगंज चौराहे का नाम पूर्व प्रधानमंत्री और लखनऊ से सांसद रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर कर दिया गया है। अब इसे अटल चौक के नाम से जाना जाएगा।
महापौर ने कहा कि इससे आने वाली पीढ़ी अटल बिहारी वाजपेयी के व्यवहार और कर्तव्यों के बारे में जान सकेगी और उनके विचारों से प्रेरणा ले सकेगी। इसके अलावा, इस्माईलगंज स्थित नगर निगम डिग्री कॉलेज भी अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने बताया, “पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर जरहरा स्थित नगर निगम की पाँच हेक्टेयर जमीन पर ‘अटल उदय वन’ बनाने के लिए एचसीएल फाउंडेशन के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर हुआ है।”
लखनऊ: नगर निगम और एचसीएल के बीच 80 लाख रुपये के MoU हुए साइन, 10 वर्ष में वृक्षारोपण और जल संरक्षण पर खर्च होगी ये धनराशि, महापौर संयुक्ता भाटिया और एचसीएल प्रभारी निधि पुंढीर ने प्रपत्रों का किया आदान-प्रदान।@SanyuktaBhatia@UPGovtpic.twitter.com/88mzMQig6H
बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहली पुण्यतिथि पर शुक्रवार (अगस्त 16, 2019) को लोकभवन में भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित समेत कई बड़े नेता शामिल हुए। सीएम योगी ने 25 दिसंबर को लोकभवन में अटल बिहारी वाजपेयी की 25 फुट की प्रतिमा का लोकार्पण करने की भी घोषणा की है।
उत्तर प्रदेश के मेरठ में एसएसपी अजय साहनी के सड़क पर नमाज़ नहीं अता किए जाने के आदेश की सराहना पूरे प्रदेश में हो रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीजीपी ओपी सिंह ने मेरठ में एसएसपी के इस फ़ैसले को सराहनीय बताया। साथ ही अन्य ज़िलों के आला अधिकारी भी इस फ़ैसले को अमल पर लाने का विचार कर रहे हैं। इस संदर्भ में डीजीपी ने सभी पुलिस कप्तानों को आदेश दिए हैं कि वे भी अपने ज़िलों में सड़क पर नमाज़ अदा न होने दें।
यूपी पुलिस की इस नायाब पहल के बाद मेरठ में जिन मस्जिदों के बाहर नमाज अता होती थी, वहाँ दूसरे जुमे को भी सड़क पर नमाज़ अदा नहीं की गई। इसके लिए प्रशासनिक तौर पर ऐसी व्यवस्था की गई थी कि जुमे की नमाज़ के वक़्त यातायात प्रभावित न हो सके। इसी के मद्देनज़र मस्जिदों में इंतेजामिया कमिटि ने प्रशासन का सहयोग करते हुए सभी नमाज़ियों से सड़क पर नमाज़ न अता करने की अपील की। इसके लिए उन्होंने जगह-जगह बैनर भी लगाए।
आमतौर पर यह देखा गया है कि जुमे की नमाज़ के लिए मस्जिद के अंदर जगह कम पड़ जाती है, जिससे नमाज़ियों को सड़क पर नमाज़ अता करनी पड़ती है। सड़क पर नमाज़ अता करने से यातायात तो बाधित होता ही है, साथ में पैदल आने-जाने वाले लोगों को भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इन सब को ध्यान में रखते हुए एसएसपी अजय साहनी ने उलेमाओं से मिलकर सड़क पर नमाज़ अता न करने का आग्रह किया था। दोनों के बीच सहमति बन जाने पर तय हुआ कि सड़क पर नमाज़ अता नहीं की जाएगी।
ख़बर के अनुसार, 9 अगस्त को काली सड़क छोड़कर फुटपाथ वाले हिस्से के बाहर नमाज़ अता की गई। इससे न तो यातायात प्रभावित हुआ और न पैदल यात्रियों के आने-जाने में कोई दिक्कत हुई। दूसरे जुमे (16 अगस्त) को भी यही व्यवस्था बनी रही। मुख्य हापुड़ मार्ग की इमलियान मस्जिद के बाहर नमाज़ के वक़्त काली सड़क को खाली छोड़ दिया गया था और फुटपाथ पर रस्सी लगाकर मस्जिद के बाहर नमाज़ अता करने की व्यवस्था की गई थी।
इसके अलावा मेरठ की भवानी नगर मस्जिद में इंतजामिया कमिटी की ओर से बैनर लगाकर सड़क पर नमाज़ अता न करने की अपील भी की गई।
डिस्कवरी चैनल पर आने वाले शो मैन वर्सेज वाइल्ड ने सुपर बाउल को पीछे छोड़ दिया है। और ये सब उस एपिसोड के पर हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैन वर्सेज वाइल्ड शो में बेयर ग्रिल्स के साथ हिस्सा लिया। रिकॉर्ड की बात करें तो अब तक इस शो को लेकर 3.6 बिलियन (360 करोड़) लोग चर्चा कर चुके हैं और यह लगातार जारी है। इस तरह इस शो ने सुपर बाउल शो को पीछे छोड़ दिया, जिसकी रेटिंग 3.4 बिलियन थी।
नेटजिओ पर वाइल्ड शो और नेटफ्लिक्स पर यू वर्सेज वाइल्ड शो के ईपी और को-क्रिएटर डेलबर्ट शूपमैन ने ट्वीट करके इस उपलब्धि के बारे में बताया।
#1 in India & #1 Worldwide with 3.6 billion impressions. SO AWESOME! THANK YOU!!!!
प्रधानमंत्री के इस शो में आने से ये शो न केवल भाारत में बल्कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा ट्रेंडिंग टीवी शो बन गया है। गौरतलब है कि ये शो 12 अगस्त को डिस्कवरी चैनल पर प्रसारित हुआ था और फिर दूरदर्शन द्वारा भी प्रसारित किया गया था। मैन वर्सेज वाइल्ड शो की मेजबानी करने वाले बेयर ग्रिल्स ने भी शूपमैन के ट्वीट को रीट्वीट किया और इस उपलब्धि पर खुद को गौरवांवित महसूस करते हुए अपनी टीम का शुक्रिया अदा किया।
जब पीएम मोदी ने मैन बनाम वाइल्ड शो में हिस्सा लिया, तो कई लोगों ने #PMModiOnDiscovery को ट्रेंड कराना शुरू किया और ग्लोबल मीडिया इंटेलीजेंस फर्म मेल्टवाटर के आँकड़ों के अनुसार, इस संबंध में पहला ट्वीट करने के 12 घंटे से भी कम समय में #PMModiOnDiscovery ने 206.2 हजार से अधिक यूजर द्वारा 204.2 हजार बार जिक्र किया गया और इस तरह इसने 728 मिलियन लोगों तक पहुँच बनाई।
जब शो में पीएम मोदी के भाग लेने की बात सामने आई थी, तो वामपंथियों ने प्रधानमंत्री को नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने तो झूठी मनगढ़ंत कहानी गढ़ते हुए यहाँ तक कह दिया था कि पुलवामा हमले के समय पीएम मोदी इसी शो की शूटिंग करने में व्यस्त थे। साथ ही वामपंथियों ने एक झूठे और एडिटेड वीडियो को ट्वीट करते हुए पीएम मोदी को जलवायु परिवर्तन से वंचित (climate change denier) बताया था।
इस हफ्ते की शुरुआत में मथुरा के एक दुकानदार (राहुल बंसल) की मौत के बाद दोषी ठहराए जाने के आरोप में यूपी पुलिस के एक सिपाही को गुरुवार (15 अगस्त) को गिरफ़्तार कर लिया गया।
फ़िरोज़ाबाद पुलिस लाइंस में तैनात कॉन्स्टेबल योगेंद्र चौधरी ने मंगलवार (13 अगस्त) को राहुल बंसल की कथित रूप से पिटाई की थी। यह विवाद गुटखा के लिए 5 रुपए के भुगतान पर खड़ा हुआ था। आगरा के एक अस्पताल में इलाज के दौरान घायल राहुल बंसल व्यक्ति की 24 घंटे बाद मौत हो गई।
कॉन्स्टेबल की गिरफ़्तारी से बंसल परिवार संतुष्ट नहीं है। उन्होंने कुछ स्थानीय निवासियों के साथ पुलिसकर्मी के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज करने का दबाव बनाने के लिए, राहुल बंसल के शव को सड़क पर रखकर धौली-पियाउ रोड पर जाम लगा दिया।
मृतक के परिवार के सदस्यों ने प्रशासन से पीड़ित के परिजनों को नौकरी के साथ 25 लाख रुपए मुआवज़े की भी माँग की। स्थानीय प्रशासन ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी माँगों के अनुमोदन के लिए उच्च अधिकारियों को भेज दिया जाएगा। गुरुवार को परिवार के सदस्यों से मिलने गए मथुरा के सिटी मजिस्ट्रेट मनोज कुमार सिंह ने कहा कि प्रशासन उनकी माँगों को पूरा करने की कोशिश करेगा।
दरअसल, मथुरा में एक सिपाही ने गुटखा बेचने वाले दुकानदार को पीट-पीटकर इसलिए अधमरा कर डाला था क्योंकि उसने सिपाही से गुटखे के पैसे माँग लिए थे। 25 वर्षीय राहुल बंसल एक छोटी सी चाय की दुकान चलाता था। ख़बर के अनुसार, फिरोजाबाद में तैनात एक सिपाही ने उस चाय की दुकान से गुटखा लिया, लेकिन उसके पैसे दुकानदार को नहीं दिए। लेकिन, जब राहुल ने गुटखे के पैसे माँगे तो इस पर सिपाही को काफ़ी गुस्सा आ गया।
सिपाही ने राहुल को पहले तो बड़ी बेरहमी से पीटा और फिर अधमरी हालत में उसे हाइवे थाने में बंद कर दिया। थाने में जब राहुल की हालत और गंभीर होने लगी तो सिपाही ने बजाए उसे अस्पताल में भर्ती करने के उसकी चाची को थाने में बुलवाया और राहुल को उन्हें सुपुर्द कर दिया।
दुकानदार राहुल के इलाज के लिए उसके परिजनों ने कुछ अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन राहुल की गंभीर हालत को देख कर उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया जाता। काफ़ी परेशानियों का सामना करते हुए परिजनों ने उसे आगरा के नेशनल हॉस्पिटल में भर्ती कराया जहाँ बुधवार (14 अगस्त) की शाम को उसकी मौत हो गई।
राहुल की मौत के बाद गुस्साए परिजनों ने थाना हाईवे पहुँचकर जमकर हंगामा किया और आरोपित सिपाही के ख़िलाफ़ ग़ैर-इरादतन हत्या का मुक़दमा दर्ज कराया। पुलिस अधीक्षक (शहर) अशोक कुमार मीणा ने बताया था कि फ़िरोज़ाबाद में तैनात सिपाही योगेंद्र चौधरी के ख़िलाफ़ ग़ैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए अपने संबोधन में देश की युवा शक्ति और बढ़ती आबादी का जिक्र किया। उन्होंने इस दौरान जनसंख्या विस्फोट की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये ऐसी समस्या है, जिस पर समय रहते समाधान करना जरूरी है। उन्होंने छोटे परिवार को भी देशभक्ति का प्रदर्शन ही बताया। प्रधानमंत्री के इस बात की प्रशंसा कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने भी की।
Majority of India is young & productive, but this advantage will only last till 2040@PMOIndia is clueless about what how to utilise this advantage, so he’s coming up with discarded & intrusive ideas of governance that shirk his own responsibilityhttps://t.co/ac7oZL7NiF
मगर, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी को ये बातें पसंद नहीं आई। उन्होंने इस पर असहमति जताते हुए पीएम मोदी पर निशाना साधा। उनका कहना है कि सरकार को पता ही नहीं है कि बढ़ती आबादी का फायदा कैसे उठाया जाए।
ओवैसी ने प्रधानमंत्री के विचार को खारिज किया जा चुका और बेवजह दखलंदाजी वाला बताते हुए कहा कि भारत की अधिकांश आबादी अभी युवा है, लेकिन इसका फायदा 2040 तक ही मिलने वाला है। सरकार युवा आबादी का फायदा उठाने की बजाए ऐसे आइडिया लेकर आ रही है जिससे वो अपनी जिम्मेदारी से बच सके।
ओवैसी के इस बयानबाजी को शिवसेना ने आड़े हाथों लिया और जनसंख्या नियंत्रण नीति पर प्रधानमंत्री का समर्थन करते हुए पार्टी ने अपने मुखपत्र सामना में असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोगों को धर्मांध मुस्लिम बताया। सामना के 16 अगस्त के संपादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा लेकिन देश का एक बड़ा वर्ग परिवार के आकार और जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम को लेकर बेफिक्र है।
सामना के संपादकीय में लिखा गया कि यहाँ के धर्मांध मुस्लिम तो ‘हम दो, हमारे पच्चीस’ की मानसिकता से बाहर निकलने को ही तैयार नहीं हैं। छोटे परिवार को प्रधानमंत्री ने देशभक्ति कहा है, ऐसे में क्या देश के समुदाय विशेष के लोग कुछ बोध लेंगे? ‘हम दो, हमारे पच्चीस’ की मानसिकता से वे कब बाहर निकलेंगे? छोटा परिवार व्यक्तिगत, पारिवारिक और राष्ट्रीय विकास में किस प्रकार लाभदायक है, यह बात धर्मांध मुस्लिमों के दिमाग में कब घुसेगी?
इसके साथ ही सामना के 17 अगस्त के संपादकीय में तीन तलाक को अपराध बनाने वाले कानून की बात करते हुए लिखा है, “मुस्लिम समाज में एक से अधिक पत्नी रखने की धार्मिक ‘छूट’ है। इसलिए ‘हम पाँच हमारे पच्चीस’ की जनसंख्या बढ़ाने वाली जो फैक्ट्री शुरू थी, उस फैक्ट्री पर ‘तालाबंदी’ घोषित कर दी गई।”
आपको बता दें कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के जनसंख्या नियंत्रण पर कहे गए भाषण के बाद ओवैसी ने कुल चार ट्वीट को रिट्वीट किया था। इन सभी का सार यह है कि जनसंख्या नियंत्रण समय की माँग नहीं बल्कि विदेशी और विकसित देशों की एक चाल है, उनका एजेंडा है। ओवैसी द्वारा किए गए चारों रिट्वीट को आप नीचे देख सकते हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने शुक्रवार (16 अगस्त) को मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के सहायक प्रोफ़ेसर सैम्युल टेनिसन पर लगे यौन उत्पीड़न मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यह एक आम धारणा है कि ईसाई शैक्षणिक संस्थान छात्राओं के भविष्य के लिए ‘अत्यंत असुरक्षित’ हैं।
मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज (MCC) में जूलॉजी विभाग की 34 छात्राओं (तृतीय वर्ष) के यौन उत्पीड़न के आरोप का सामना कर रहे सहायक प्रोफ़ेसर सैम्युल टेनिसन को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को ख़ारिज करने से इनकार करते हुए न्यायाधीश एस वैद्यनाथन ने कहा, “छात्रों विशेषकर छात्राओं के अभिभावकों में यह आम धारणा है कि ईसाई संस्थानों में सहशिक्षा उनके बच्चों के भविष्य के लिए अत्यंत असुरक्षित है।”
न्यायाधीश ने आगे कहा कि ईसाई मिशनरी हमेशा से किसी न किसी मामले को लेकर सवालों के घेरे में रहते हैं। उन्होंने कहा,
“वर्तमान युग में, उन पर अन्य धर्मों के लोगों को ईसाई धर्म में अनिवार्य रूप से धर्मांतरित करने से जुड़े कई आरोप हैं… हालाँकि वे अच्छी शिक्षा प्रदान करते हैं, लेकिन नैतिकता की शिक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण सवाल बना रहेगा।”
न्यायाधीश वैद्यनाथन ने कॉलेज समिति के निष्कर्षों और टेनिसन के कारण बताओ (दूसरा) नोटिस में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कॉलेज द्वारा आंतरिक जाँच समिति की रिपोर्ट पर भरोसा जताया और यह स्पष्ट कर दिया कि समिति द्वारा जाँच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
आपको बता दें कि MCC कॉलेज के सहायक प्रोफ़ेसर सैम्युल टेनिसन ने ख़ुद के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न शिक़ायत की जाँच करने वाली जाँच समिति (आंतरिक शिक़ायत समिति) के निष्कर्षों और उसके ख़िलाफ़ 24 मई 2019 को जारी किया गया दूसरा कारण बताओ नोटिस को ख़ारिज करने का अदालत से अनुरोध किया था। ख़बर के अनुसार, 34 छात्राओं का यौन उत्पीड़न इस साल जनवरी में मैसूर, बेंगलुरु और कूर्ग के शैक्षणिक दौरे के दौरान हुआ।
34 छात्राओं के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप झेल रहे सहायक प्रोफ़ेसर सैम्युल टेनिसन ने दावा किया कि कॉलेज की आंतरिक शिकायत समिति ने उन्हें कुछ दस्तावेज़ो और बयानों की आपूर्ति नहीं की, जो उन्होंने अपने बचाव में इस्तेमाल करने के लिए माँगे थे। वहीं, कॉलेज और समिति का कहना है कि उन्हें ख़ुद का बचाव करने और शिकायतकर्ताओं की जाँच करने का पर्याप्त अवसर दिया गया था।
370/35A किस-किस अमानवीयता के कवच थे, यह ठीक-ठीक पता करने में अगर दशक नहीं तो कई साल तो लग ही जाएँगे। लेकिन 370 हटने के बाद से लोगों के दर्द का जमा गुबार पिघलना तो शुरू हो ही गया है। ऐसा ही एक दर्द निकला कश्मीर निवासी और वाल्मीकि समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक सफाई कर्मचारी का इंडिया टुडे की पत्रकार पूजा शाली से बात करते हुए।
जब उनसे पूछा गया कि वह तो ताउम्र (कश्मीरी सरकार द्वारा स्थाई निवासी का सर्टिफिकेट न दिए जाने, और सरकारी नौकरियाँ स्थाई निवासियों के ही लिए रोककर रखने से) सफ़ाई कर्मचारी ही रह गए, लेकिन उनकी बेटी के पास विकल्प होना उन्हें कैसा लग रहा है, तो उनका जवाब देते हुए गला रूँध गया। अपने आँसुओं को रोकते हुए बताया कि वे इतनी गरीबी में रहते हैं कि जब अपनी बेटी राधिका को एक ट्रेनिंग दिलाने के लिए लेकर गए तो उन्हें वहाँ पूरे दिन भूखा ही रहना पड़ा।
370/35A के हिमायतियों को शर्म करने के लिए कहते हुए वैज्ञानिक और लेखक आनंद रंगनाथन ने यह वीडियो शेयर किया:
Radhika’s dad; his tears finally washing away DECADES of cruelty. Harrowing moment captured by @PoojaShali.
“The arc of the moral universe is long but it bends toward justice,” said Dr King.
It did bend. And yet, there are some men & women who want to look away. SHAME on them. pic.twitter.com/oLOIkhF2Ds
इसके अलावा उन्होंने 21-वर्षीय दलित युवक एकलव्य की कहानी भी साझा की जो पॉलिटिकल साइंस में पोस्टग्रेजुएट होने के साथ एक टॉपर है, लेकिन 370/35A के चलते उसे भी सफ़ाई कर्मचारी के अलावा कोई नौकरी न मिलती।
कश्मीर में 1957 में स्थानीय सफ़ाई कर्मचारियों के महीनों तक हड़ताल पर चले जाने के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने दूसरे राज्यों से सफ़ाई कर्मचारियों को बुला कर वहाँ बसाया था। लेकिन उन्हें 370/35A का हवाला दे कर स्थाई निवास प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया, और इसी 370/35A के अनुसार सरकारी नौकरियाँ केवल स्थाई निवासियों के लिए आरक्षित थीं। यानी, राज्य में रहकर उन कर्मचारियों के लिए सफ़ाई कर्मचारी के अलावा कोई नौकरी नहीं थी। और यही स्थिति 370/35A के खात्मे यानि 5 अगस्त, 2019 तक चालू थी।
जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर 370 हटने के बाद से The Wire ने केवल झूठ बोला है और ज़हर उगला है। चाहे वहाँ आतंक के हालात का मुद्दा हो, वहाँ के ‘स्थानीय निवासियों’ (‘कश्मीरी मुसलमानों’ पढ़ें) को मिल रहे विशेष अधिकारों का मुद्दा हो, या कश्मीरी पंडितों की स्थिति हो, हर मुद्दे पर केवल झूठ और भ्रमित करने वाले अर्धसत्य। उनके स्तम्भकार तो इसमें बृहदारण्यक उपनिषद और ब्राह्मणों को भी कोसने का ‘एंगल’ ढूँढ़ लाए!
5 अगस्त से चालू झूठ की खेती
झूठ की खेती चालू तो 5 अगस्त से ही कर दी गई थी, क्योंकि 370 हटने का अंदेशा सताने लगा था। तभी से ‘मोदी सरकार नाकाम है’ का प्रपंच रचना वायर के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन ने चालू कर दिया था। इसका एक उदाहरण देखिए:
इस इन्फोग्राफिक में, जोकि गृह मंत्रालय के आँकड़ों के आधार पर खुद द वायर ने बनाया है, सबसे ऊपर की हरी रेखा (जो जिहादी घटनाओं में बढ़ोतरी दिखाती है) और सबसे नीचे की लाल रेखा (मारे गए सुरक्षा बल के जवान) में बढ़ोतरी की तो बात की गई है, लेकिन इनके बीच की नीली रेखा (मारे गए जिहादी) को ‘गोल’ कर दिया गया है, उस पर ध्यान जाने ही न दे कर।
नीली रेखा से पता चल जाता है कि जिस अनुपात में सुरक्षा जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं, वैसे ही मारे जा रहे जिहादियों की भी संख्या बढ़ी है। यानि इस आँकड़े की ज़्यादा सही विवेचना यह होगी कि सुरक्षा बलों और सरकार की जिहादियों के खिलाफ सरगर्मी बढ़ी है, जिसके चलते हमारे वीरगति को प्राप्त होने वाले जवानों की भी संख्या बढ़ी है।
दो लोगों से बात कर उसे पूरे कश्मीर की बात बता दी
सिद्धार्थ वरदराजन ने दावा किया कि वे घाटी में खूब घूमे और ‘आम जनता’ से मिलकर 370 के बारे में उनकी राय जानी। वीडियो भी बना लाए, और आपको-हमें उससे बरगलाने की कोशिश की। बिलकुल घूमे होंगे, बिलकुल मिले होंगे। इसपर शक नहीं किया जा सकता।
लेकिन अगर वीडियो को देखा जाए तो केवल दो लोगों से बात की गई है। मैं नाम न भी बताऊँ तो भी यह तुक्का मारना कोई मुश्किल नहीं है कि इन दो लोगों का संबंध किस ‘समुदाय विशेष’ से है। और बातें भी वे उसी तरह की करते हैं जिसके लिए ‘समुदाय विशेष’ जाना जाता है, और जिसके चलते पूरा देश 370 के ख़िलाफ़ था- जिहाद और भड़केगा, हुर्रियत की सोच सही है, अब ‘मुख्यधारा के नेता’ भी अलगाववाद की भाषा बोलेंगे, अमन तब तक कायम नहीं होगा (‘तब तक हम कायम होने नहीं देंगे‘ पढ़ा जाए) जब तक मसला-ए-कश्मीर हल नहीं होगा, हम भी देखते हैं ये क्या करेंगे, हम 6 महीने का राशन रखते हैं घरों में…
दो कश्मीर घाटी के मुसलमानों की सोच को, उनकी धमकी को पूरी घाटी द्वारा दी गई धमकी तो बेशक माना जा सकता है, क्योंकि बुरहान वानी से लेकर ज़ाकिर मूसा और पुलवामा के हमलावर आदिल अहमद डार के जनाज़े में हज़ारों की संख्या में जुटकर कश्मीरी मुसलमान तो अपनी वफ़ादारी बयान कर ही दे रहे हैं। लेकिन बात यह है कि सूबे में केवल कश्मीरी मुसलमान नहीं रहते हैं, वहाँ कश्मीरी पंडित भी हैं, जम्मू के डोगरा राजपूत भी हैं, पंजाब से कश्मीर में सफाई कर्मी के रूप में आए वाल्मीकि समुदाय के लोग हैं, लद्दाख के बौद्ध हैं, जैन और सिख भी हैं। कुछ अनीश्वरवादी भी हैं। भले ही वे वहाँ ‘अल्पसंख्यक’ हैं, लेकिन संविधान की प्रस्तावना में लिखा है कि भारत ‘सेक्युलर’ देश है, जिसकी व्याख्या यह की जाती है कि अल्पसंख्यकों का ध्यान रखना, यह ध्यान देना कि कहीं बहुसंख्यक उनके अधिकारों का हनन न करें, सरकारी मशीनरी का कर्त्तव्य है- यानि उनकी इच्छा को दबाया नहीं जा सकता है।
लेकिन यह ‘सेक्युलरिज़्म’ वरदराजन की डाक्यूमेंट्री में कहाँ है? उन्होंने एक भी हिन्दू, सिख, जैन या नास्तिक से बात की क्या? पूछा क्या कि वे अपने राज्य में, अपने पास-पड़ोस में ऐसे लोगों की भीड़ से खुश हैं क्या जो बुरहान वानी के जनाज़े में जाते हैं? उनके क्या विचार हैं इस बारे में कि उनके आसपास के उपासना स्थलों से लाउडस्पीकरों पर ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘कश्मीर में अगर रहना होगा तो अल्लाहु-अकबर कहना होगा’ की तकरीर लगातार जारी है, यह सिद्धार्थ वरदराजन ने पूछा?
कश्मीर के ‘बाप’ ऋषि कश्यप हैं, अब्दुल्ला नहीं
एक रुदाली जो वायर पर बार-बार यह हो रही है, जोकि कश्मीर के दो ‘शांतिप्रिय’ लोगों के वरदराजन वाले इंटरव्यू में भी दिखी, वह यह है कि इस फ़ैसले से कश्मीर की तस्वीर बदल जाएगी, उसकी ‘असली संस्कृति’ गुम जाएगी। कश्मीर पर बोले जा रहे सभी झूठों में इससे बड़ा झूठ नहीं हो सकता।
कश्मीर की संस्कृति लाउडस्पीकर से हिन्दुओं को डराने के लिए चिंघाड़े जा रहे जिहादी नारों की संस्कृति नहीं, “नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनि। त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे ॥” की संस्कृति है। काल भैरव और मार्तण्ड मंदिर की संस्कृति है।
और यह संस्कृति केवल कश्मीरियों से सुरक्षित हो ऐसा भी नहीं। हज़ारों वर्ष से कश्मीर में हिन्दू आते रहे, बसते रहे और यहाँ की संस्कृति को और गाढ़ा ही करते रहे, फ़ीका नहीं। कश्मीर की संस्कृति यह कभी नहीं रही कि बाहर से आने वालों पर रोक-टोक लगाई जाए। केरल से आए शंकराचार्य को शारदा पीठ ने (जो जिहादियों के चंगुल में गुलाम कश्मीर में है) सिंहासन पर बिठा लिया। दुनिया भर के मंत्र साधक शिव मंत्रों की साधना के लिए यहाँ आते थे, और यहीं बस जाते थे।
हालाँकि, हिन्दू धर्म में इतिहास के किसी एक बिंदु को ‘बाप’ मानने की बात ही नहीं है, लेकिन अगर तय करना ही हो तो कश्मीर के ‘बाप’ ऋषि कश्यप हैं, शेख अब्दुल्ला या उनकी गुंडई से बना 370 नहीं; कश्मीर की माई देवी शारदा हैं, न कि आसिया अंद्राबी या महबूबा मुफ़्ती।
हिन्दूफ़ोबिया का मसाला है जरूरी
वायर किसी भी मसले पर लिखे और उसमें हिन्दूफ़ोबिया न हो, तो बात अधूरी लगती है। और सृष्टि के इसी नियम का पालन करने के लिए 35A के बारे में बात करते हुए वायर के स्तम्भकार बद्री रैना लिखते हैं कि भारतीय सरकारों और राजनीति में स्वेच्छाचारिता का कारण “ब्राह्मण हिन्दुओं को सिखाया गया ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ है, जिससे स्वार्थ और स्वेच्छाचारिता भर जाती है।”
इस एक वाक्य में जो नीच दोगलापन भरा है, उसे काटते हुए एक अलग लेखमाला लिखी जा सकती है। लेकिन फ़िलहाल अगर संक्षेप में देखें तो यह निम्न कारणों से बोगस तर्क है:
पहला, जानबूझकर अहम् ब्रह्मास्मि की गलत व्याख्या की गई है। यह यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया ‘महावाक्य‘ है, जिसमें ‘ब्रह्म’ का अर्थ सर्वशक्तिशाली या गैर-जिम्मेदार, स्वेच्छाचारी नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने शरीर और अपने कुशलक्षेम जितना ही महत्व देने की बात करता है। यानि, इस महावाक्य से यह सिखाया जाता है कि कोई भी निर्णय लेते समय केवल अपने हित का नहीं, पूरे विश्व और ब्रह्माण्ड को इस निर्णय से क्या नफ़ा-नुकसान होगा, यह सोचो।
दूसरा, यह केवल ब्राह्मणों को नहीं, गुरुकुल में जाने वाले हर एक जाति और वर्ण के बच्चे को सिखाया जाता था। यहाँ रैना बहुत ही ‘कैज़ुअल’ तरीके से जातिवादी टिप्पणी कर रहे थे।
तीसरा, हिन्दू धर्म की अच्छाई-बुराई से भारत देश का चरित्र कब से बनने-बिगड़ने लगा? वायर का पत्रकारिता का समुदाय विशेष तो भारत के हिन्दू चरित्र को नकारने के लिए ही फंडिंग पाता है! तो अगर भारत राष्ट्र-राज्य की उदारता, बहुलता जैसी अच्छाईयाँ हिन्दू नहीं ‘सेक्युलर’ हैं, तो बुराईयाँ हिन्दू नहीं हो सकतीं।
कुल मिलाकर वायर की पूरी कश्मीर रिपोर्टिंग केवल और केवल झूठ और प्रोपेगंडा पर ही आधारित है। यही नहीं, इसका मकसद भी केवल भारत की बुराई नहीं, बल्कि ‘हिन्दू फ़ासीवाद’, ‘डरा हुआ मुसलमान’ के दुष्प्रचार से हिन्दुओं को बदनाम करने के साथ दबाए रखना, और ‘इस्लाम खतरे में है’ के हौव्वे को भड़काकर जिहाद को बढ़ावा देना है। और इन सब पैंतरों के पीछे की प्रेरणा हिन्दूफ़ोबिया, हिन्दू-बहुल और हिन्दू-चरित्र वाला होने के कारण भारत देश से नफ़रत है।