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J&K: हिरासत में हॉलीवुड मूवी देख रहे उमर अब्दुल्ला तो महबूबा मुफ़्ती पढ़ रहीं किताबें

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पिछले कई दिनों से हिरासत में चल रहे नेशनल कॉन्फ्रेन्स पार्टी के उपाध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हॉलीवुड मूवी देखकर और जिम में पसीना बहाकर अपना समय व्यतीत कर रहे हैं। उन्हें श्रीनगर के गुपकर रोड स्थित सरकारी गेस्ट हाउस हरि पैलेस में रखा गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को चश्मे शाही में रखा गया है। उनके बारे में पता चला है कि वो अपना समय किताबें पढ़कर काट रही हैं। इसके अलावा प्रशासन की ओर से उन्हें पास के मुगल गार्डन में टहलने की अनुमति मिली हुई है। इससे पहले दोनों नेताओं को एक ही जगह पर रखा गया था, लेकिन दो ही दिनों में इनके बीच आपसी विवाद हो गया था, जिसके बाद महबूबा मुफ्ती को चश्मे शाही में शिफ्ट कर दिया गया था।

ख़बर के अनुसार, कस्टडी में रह रहे उमर अब्दुल्ला को हॉलीवुड फ़िल्मों की कुछ डीवीडी उपलब्ध कराई गई है। उन्हें भी हरि निवास के भीतर टहलने की अनुमति दी गई है। बता दें कि हरि निवास पैलेस 9 हेक्टेयर में फैला हुआ है, इसी निवास में जिम की सुविधा भी उपलब्ध है।

इसके अलावा, गुपकर रोड पर स्थित सांसद और नेशनल कॉन्‍फ्रेंस के अध्‍यक्ष फारूक अब्‍दुल्‍ला के घर के बाहर पुलिस जीप देखि जा सकती है। ऐसा माना जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को भी उनके घर में नज़रबंद किया गया है। एनसी, पीडीपी के अन्‍य नेताओं और पीपुल्स कॉन्‍फ्रेंस के सज्‍जाद लोन को संतूर लेक व्‍यू होटेल के कमरों में रखा गया है। यह होटेल डल झील के किनारे बना है।

काबुल में मानव बम ने खुद को उड़ाया: शादी का जश्न मातम में बदला, 63 मरे-182 जख्मी

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में शनिवार (अगस्त 17, 2019) देर रात हुए बड़े आत्‍मघाती बम विस्फोट में लगभग 63 लोगों की मौत हो गई, जबकि 182 से अधिक लोग घायल हैं। अफगानिस्तान के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता नुसरत रहीमी ने इसकी जानकारी दी। विस्फोट पश्चिम काबुल के एक वेडिंग हॉल में हुआ। शादी समारोह में एक हजार से ज्‍यादा मेहमान उपस्थित थे। मरने वालों की संख्या और बढ़ने की आशंका है।

नुसरत रहीमी ने बताया कि घटना शनिवार रात स्थानीय समय के अनुसार 10.40 (भारतीय समयानुसार रात 11.40) बजे की है। उनका कहना है कि हमलावर ने समारोह के दौरान उपस्थित लोगों के बीच विस्‍फोट कर दिया। यह विस्‍फोट शादी के स्‍टेज के पास हुआ, जहाँ म्‍यूजिशियन उपस्थित थे। एक प्रत्‍यक्षदर्शी का दावा है कि हमले में कई बच्‍चे भी मारे गए हैं। विस्‍फोट के बाद वेडिंग हॉल में अफरातफरी और चीख पुकार मच गई। फिलहाल इस हमले की किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली है। धमाका दारुलमान इलाके में हुई, जहाँ अल्पसंख्यक शिया हजारा समुदाय के लोग काफी संख्या में रहते हैं।

गौरतलब है कि, है कि काबुल में इस महीने यह दूसरा हमला है। 8 अगस्त को हुए धमाके में 14 लोग मारे गए थे जबकि 145 घायल हुए थे। पश्चिमी इलाके में अफगान सुरक्षाकर्मियों को तालिबान ने अपना निशाना बनाया था। उस समय आतंकियों ने सबसे पहले सरकारी कार्यालय के बाहर एक विस्फोट किया था और उसके बाद दो बंदूकधारी इमारत के अंदर घुसे और वहाँ उपस्थित लोगों तथा सुरक्षाकर्मियों पर गोली बरसाने लगे। पश्चिमी काबुल का इलाका तालिबान के आतंकियों के निशाने पर हमेशा से ही रहा है।

अपने ही घर से भागे बिहार के ‘छोटे सरकार’, कभी हाथ जोड़े खड़े रहते थे नीतीश कुमार

कहते हैं समय बड़ा बलवान होता है। ‘छोटे सरकार’ कहे जाने वाले बिहार के मोकामा से निर्दलीय विधायक बाहुबली अनंत सिंह को इसका अहसास गहरे से हो रहा होगा। शनिवार रात पुलिस जब उन्हें गिरफ्तार करने पहुॅंची तो उन्हें अपने ही घर से भाग खड़ा होना पड़ा।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पैतृक घर से एके-47, गोली और हैंड ग्रेनेड बरामद होने के मामले में देर रात पटना पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुॅंची थी। लेकिन, हथियारों की बरामदगी के बाद चैनलों पर इंटरव्यू दे रहे अनंत सिंह को जैसे ही गिरफ्तारी की भनक लगी वे पुलिस को चकमा देकर फरार हो गए। पुलिस ने उनकी पत्नी से पूछताछ की है।

अनंत सिंह पर गैरकानूनी गतिविधियां प्रतिबंधित कानून यानी UAPA के तहत आतंकी घोषित होने का खतरा मंडरा रहा है। घर पर छापेमारी के बाद इसे साजिश बताते हुए अनंत सिंह ने कहा था, “मैंने ललन सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा, इसलिए मुझे फॅंसाया जा रहा है। एसपी लिपि सिंह को बाढ़ केवल इसलिए लाया गया है, ताकि मुझे परेशान किया जा सके।”

अनंत सिंह केवल अपने आपराधिक इतिहास के लिए ही चर्चित नहीं रहे हैं। उनके शौक भी अजीबोगरीब हैं। अजगर पालने की सनक को लेकर वे विवादों में रह चुके हैं। एक बार उन्होंने पटना के अपने घर में एक पत्रकार को भी बंधक बना लिया था। उनका रसूख कितना था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी सुशासन बाबू के नाम से मशहूर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी उनके आगे हाथ जोड़े खड़े रहते थे।

असल में कभी अनंत सिंह जदयू में ही हुआ करते थे। 2005 और 2010 का विधानसभा चुनाव उन्होंने जदयू के टिकट पर ही जीता था। 2015 में उन्होंने जदयू छोड़ निर्दलीय चुनाव लड़ा। इस बार लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने नीतीश के एक और खासमखास मुंगेर के मौजूद सांसद ललन सिंह के खिलाफ अपनी पत्नी को मैदान में उतार दिया था।

हमारे बुजुर्गों ने गलतियॉं की भुगत हम रहे, JNU का नाम बदल कर MNU कर दो: हंसराज हंस

संगीत की दुनिया से राजनीति में आए बीजेपी सांसद हंसराज हंस ने जेएनयू का नाम प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर एमएनयू रखने का सुझाव दिया है। वे शनिवार को जेएनयू में छात्रों से मुखातिब थे।

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के फैसले पर हंसराज हंस ने कहा, “कश्मीर अब वाकई जन्नत बनने जा रहा है। मेरी यही दुआ है कि बम न चलें। सब अमन से रहें। बंदा इधर का मरे या उधर का मरे जाता एक मॉं का बेटा ही है।”

जवाहर लाल नेहरू का जिक्र करते हुए कहा, “हमारे बुजुर्गों ने गलतियॉं की, हम भुगत रहे हैं। मैं कहता हूं इसका नाम बदलकर एमएनयू कर दो, मोदी जी के नाम पर भी तो कुछ होना चाहिए।”

उत्तर पश्चिम दिल्ली से सांसद हंस ने कहा कि मोदी ने मुश्किल काम कर दिखाए हैं। इसलिए कहते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है। इससे पहले लोकसभा में भी वे पीएम मोदी की तारीफ कर चुके हैं।

वैसे, जेएनयू का नाम बदलने का सुझाव पहली बार नहीं आया है। इससे पहले 2016 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि जेएनयू ऐसे लोगों का अड्डा बनती जा रही है जो देश के खिलाफ साजिश में शामिल है। उन्होंने इसका नाम बदल कर सुभाष चन्द्र बोस यूनिवर्सिटी रखने की मॉंग की थी। जब जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगने की खबरें सामने आई थी तो सोशल मीडिया में भी जेएनयू का नाम बदलने को लेकर बहस चली थी।

भारत विरोधी नारे लगा रहे लोगों से सियोल में अकेले भिड़ गईं BJP नेता शाजिया इल्मी

भाजपा नेता शाजिया इल्मी सोशल मीडिया पर एक वीडियो को लेकर सबकी तारीफें बटोर रही हैं। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में कुछ पाकिस्तानी नागरिक भारत विरोधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारे लगा रहे थे। इस दौरान वहाँ से गुजर रही बीजेपी नेता शाजिया इल्मी और आरएसएस के कुछ लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश की।

वीडियो में आप देख सकते है कि शाजिया इल्मी नारे लगा रहे लोगों से कहती हैं कि वे भारत से हैं। फिर भी जब वे लोग नहीं शांत होते तो शाजिया इल्मी अकेले ही इंडिया जिंदाबाद के नारे लगाने लगती हैं और वहाँ से आगे बढ़ जाती हैं।

जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर चीन और पाकिस्तान को छोड़कर पूरी दुनिया भारत के साथ खड़ी नजर आ रही है, लेकिन यह बात पाकिस्तान समर्थकों के गले नहीं उतर रही है। यही कारण है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में छिट-पुट विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

दक्षिण कोरिया के सिओल में भी ऐसा ही दृश्य सामने आया, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद प्रदर्शनकारियों के बीच पहुँचकर भाजपा नेता शाजिया इल्मी ने हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। प्रदर्शनकारी मोदी विरोधी और भारत विरोधी नारेबाजी भी कर रहे थे। उसी समय शाजिया इल्मी और उनके साथ वहाँ गए आरएसएस के लोग भी गुजर रहे थे।

शाजिया इल्मी को भारत विरोधी नारों से आपत्ति हुई तो वह प्रदर्शनकारियों के बीच पहुँच गईं और उन्हें समझाने की कोशिश की। जब प्रदर्शनकारी नहीं माने, तो वे भी इंडिया जिंदाबाद के नारे लगाने लगीं।

ऐसी ही एक घटना लंदन में देखने को मिली जब 15 अगस्त, 2019 को लंदन में रहने वाले भारतीय स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे। इस दौरान कुछ पाकिस्तानी और पाकस्तानी मूल के ब्रिटिश ने उनके ऊपर हमला कर दिया। दरअसल, लंदन में भारतीय उच्चायोग के सामने भारतीय मूल के लोग शांति से स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे, तभी लगभग 1000 की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने उन पर हमला कर दिया।

गृह मंत्री अमित शाह को तड़ीपार कहने वाली कॉन्ग्रेस पार्षद यास्मीन किदवई की पुलिस से शिकायत

भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव इमप्रीत सिंह बख़्शी ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर कॉन्ग्रेस नगर पार्षद यास्मीन किदवई के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। पत्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को ‘तड़ीपार’ कहने के लिए किदवई के खिलाफ आईटी अधिनियम, 2000 के संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज करने की माँग की गई है।

बख़्शी ने कहा है कि किदवई ने 10 अगस्त को ट्ववीट कर शाह को ‘तड़ीपार’ कहा था।

NDTV के संस्थापक प्रणब रॉय को एयरपोर्ट पर विदेश जाने से रोके जाने को लेकर उनकी पैरवी करते हुए यास्मीन किदवई ने यह ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि एक तड़ीपार गृह मंत्री बन सकता है और पत्रकारों को भगोड़ा बताया जाता है।

दरअसल, प्रणब रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय को बीते दिनों मनी लॉन्ड्रिंग और ED की जाँच के कारण विदेश जाने से रोका गया था। उनके ही समर्थन में यस्मीन किदवईं ने गृह मंत्री अमित शाह को लेकर यह अपमानजनक टिप्पणी की थी। रॉय दंपती मुंबई से नैरोबी के लिए उड़ान भरने वाले थे। प्रणब एवं राधिका सीबीआई एवं प्रवर्तन निदेशलाय (ED) की जाँच का सामना कर रहे हैं। इन दोनों के साथ कुछ और लोग भी थे।

370 पर सरकार के फैसले के खिलाफ SC पहुॅंचे पूर्व एयर वाइस मार्शल कपिल काक, कविता कृष्णन के लीक ईमेल में था नाम

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बॉंटने के केंद्र सरकार के फैसलों के खिलाफ छह लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शीर्ष अदालत में याचिका में दाखिल करने वाले रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों में पूर्व एयर वाइस मार्शल कपिल काक का नाम भी शामिल है।

काक का जिक्र वामपंथी एक्टिविस्ट कविता कृष्णन के सोशल मीडिया पर वायरल हुए लीक ईमेल में भी था। स्क्रीनशॉट्स के रूप में लीक मेल में जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 से मिला विशेष दर्जा हटने के विरोध की रणनीति का ब्यौरा मौजूद है। स्क्रीनशॉट में कविता कृष्णन कपिल काक, जस्टिस शाह के बारे में बात करतीं, उनका नाम लेतीं नज़र आती हैं। हालॉंकि उनका संदर्भ किस बात से था यह मेल में साफ नहीं था। लेकिन, मेल लीक होने के अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद से दोनों मामले जोड़कर देखे जा रहे हैं।

काक सहित छह लोगों ने आर्टिकल 370 हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका पर रिटायर्ड मेजर जनरल अशोक मेहता, मनमोहन सरकार में कश्मीर पर वार्ताकार रहीं राधा कुमार, जम्मू और कश्मीर कैडर से संबंधित पूर्व आईएएस अधिकारी हिंडल हैदर तैयबजी, पंजाब कैडर के पूर्व आईएएस अभिताभ पांडे के भी हस्ताक्षर हैं।

काक रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान के उप निदेशक भी रह चुके हैं। केरल कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी गोपाल पिल्लई जो 2011 में केंद्रीय गृह सचिव के रूप में रिटायर हुए थे भी याचिकाकर्ता हैं।

PM मोदी ने भूटान में लॉन्च किया भारत का RuPay कार्ड, कुल 9 MoU पर हस्ताक्षर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (अगस्त 17, 2019) को अपने दो दिवसीय भूटान यात्रा पर पहुँचे। इस मौके पर भारत और भूटान के बीच हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट, नॉलेज नेटवर्क, मल्टी स्पेशलिएटी हॉस्पिटल, स्पेस सैटेलाइट, रूपे कार्ड के इस्तेमाल समेत कुल 9 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री मोदी की इस भूटान यात्रा को दोनों देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में निरंतर किए जा रहे प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

भूटान के पीएम लोते शेरिंग और पीएम मोदी ने संयुक्त बयान जारी किया है। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआत में भूटान आना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। नरेंद्र मोदी ने कहा, “हमने भूटान के छात्रों से मुलाकात की। हमें खुशी है कि भूटान में आज हमने रुपे कार्ड को लॉन्च किया है। इससे व्यापार में मदद मिलेगी और हमारी साझा विरासत भी मजबूत होगी।”

नोटबंदी के बाद भारत ने RuPay कार्ड लॉन्च की थी। अब इसकी शुरुआत भूटान में भी की गई है।

प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत में भूटान की सड़कों पर लोगों का हुजूम भी उमड़ा। पारो से थिम्पू जाने वाली रोड पर सैकड़ों लोग भारत और भूटान के झंडे लेकर खड़े रहे। लोगों ने पीएम मोदी का अभिवादन किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एयरपोर्ट पर ही गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।

इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोते शेरिंग से संसद में मुलाकात की। प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय के लोगों से भी मिले। इस दौरान ‘भारत माता की जय’ और ‘मोदी जिंदाबाद’ के नारे लगे।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने भारत की पनबिजली कंपनी एनएचपीसी के सहयोग से मध्य भूटान के ट्रोंगसा डोंग्खग जिले के मंगदेछु नदी पर 720 हजार मेगावाट की क्षमता वाली बिजली परियोजना का उद्घाटन भी किया। इस परियोजना की कुल लागत 1 बिलियन डॉलर है।

नेहरू-शेख की दोस्ती के कसीदों में ही छिपा है कश्मीर का शोकगीत, खुसरो की कविता से नहीं बदलेगा इतिहास

जम्मू-कश्मीर में जब से मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किया है, ​इसके विरोधियों से लेकर समर्थक तक न केवल इतिहास के प्रसंगों से जूझ रहे हैं, बल्कि अपने तर्क को धार देने के लिए गद्य और कविता तक का हवाला दे रहे हैं। इसी कड़ी में कश्मीर को लेकर जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का बचाव करने के लिए अमीर खुसरो की एक फारसी कविता परोसी जा रही है। यह कविता विशारदों से लेकर सोशल मीडिया तक आजकल नजर आ रही है।

श्लाघ्य विचारकों की मानें तो नेहरू ने कहा था कि कश्मीर के भाग्य का का फैसला कश्मीर की जनता ही करेगी और उसे अपने राजनैतिक भविष्य को चुनने का मौका दिया जाएगा। नेहरू ने यह बयान नवंबर 02, 1947 को दिया था। कश्मीर के भविष्य को लेकर यह बयान उस शख्स का है जिसके फैसलों का आज तक वहॉं के लोग भुगत रहे। इन फैसलों के पीछे एक बड़ी वजह शेख अब्दुल्ला से नेहरू की गाढ़ी दोस्ती भी थी।

श्रीनगर का लाल चौक इस दोस्ती का गवाह रहा है। यहीं शेख अब्दुल्ला ने अपने दोस्त पंडित नेहरू की जमकर प्रशंसा करते हुए खुसरो की वह कविता पढ़ी थी जो आजकल इनके गुनाह छिपाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। फ़ारसी की वह कविता है;
मन तू शुदम तू मन शुदी
मन तू शुदम, तू जान शुदी

इस कविता का अर्थ है-
मैं अब तुम हो जाता हूँ और तुम मैं बन जाओ
मैं तुम्हारा शरीर और तुम मेरी आत्मा बन जाओ
ताकि कोई यह न कह सके कि हम-तुम अलग-अलग हैं।

हैरानी की बात है कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद प्रगतिशील इस कविता की दुहाई दे रहे। नेहरू की गलती को उनकी यारी-दोस्ती में पढ़े गए कसीदों से भुलाया जा रहा है ताकि किसी को नेहरू के किए छल की भनक भी ना लग सके। कश्मीर में आज मानवता की दुहाई देने वाले लोग नेहरू की गलती के कारण सदियों से चले आ रहे रक्तपात और वैमनस्य को नेहरू-शेख की शायरी और नज्मों के आवरण में छुपा देना चाहते हैं।

विचारकों को नेहरू के जुमले याद हैं, ताकि वो उस भीषण गलती को भूल सकें जो नेहरू की कमजोरियों का परिणाम थी। वही नेहरू, जिन्हें सरदार पटेल अविवेकी नेता कहते थे। हालाँकि, वर्तमान प्रगतिशील विचारक चाहें तो वो सरदार पटेल को भी नेहरू के प्रति इस मत के लिए ‘हाइपर नेश्नलिस्ट’ का विशेषण देकर नेहरू के गुनाहों को फिर से नजरअंदाज कर सकते हैं।

एक समय था जब 1946 में महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था और जवाहरलाल नेहरू इससे इतने आक्रोशित हो गए थे कि अपने मित्र की वकालत करने तुरंत कश्‍मीर पहुँच गए थे। नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया निहायत भावुकतापूर्ण था। जून, 1946 में अपने गिरफ्तार मित्र शेख अब्दुल्ला को वे प्रोत्साहित करना चाहते थे, लेकिन राज्य सरकार ने उनके प्रवेश पर रोक लगा दी। फिर भी नेहरू नहीं माने और गिरफ्तार कर लिए गए। कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी इसके पक्ष में नहीं थी कि नेहरू राज्य का कानून तोड़ें और वहाँ गिरफ्तार कर लिए जाएँ, फिर भी नेहरू गए।

सरदार पटेल की नजरों में भावुक और अविवेकी नेता थे नेहरू

शेख अब्दुल्ला से मित्रता के पीछे जवाहरलाल नेहरू की इस दीवानगी से सरदार पटेल बेहद नाराज थे। सरदार पटेल ने जुलाई 11, 1946 को डीपी मिश्र लिखे एक पत्र में कहा था-

अभी- अभी उन्होंने (नेहरू ने) ऐसी अनेक नादानियाँ की हैं, जिनकी वजह से हमें बड़ी परेशानियाँ हुई हैं। कश्मीर में उठाया गया उनका कदम, संविधान सभा के लिए किए गए सिख चुनाव में उनका हस्तक्षेप और कॉन्ग्रेस महासमिति की बैठक के तुरंत बाद उनका अखबारी परिषद, ये सब भावुकतापूर्ण अविवेक के कृत्य हैं। इनकी वजह से परिस्थितियों को सही मार्ग पर ले जाने में हमें जबर्दस्त तनाव से गुजरना पड़ता है। परंतु इन सारे अविवेक के बावजूद जवाहरलाल में स्वाधीनता के लिए अनुपम उत्साह और उत्कट लगन है।

नेहरू के मित्र शेख अब्‍दुल्‍ला के खानदान ने जम्मू-कश्मीर को हमेशा त्रिशंकु बने रहने दिया। इसी दोस्ती की वजह से अब्दुल्ला की सांप्रदायिक, राजनैतिक महत्वकांक्षा कश्मीर की नियति बन गई। अलीगढ़ से पढ़े शेख अब्दुल्ला प्रगतिशील विचारक माने जाते थे। इस तरह से वो हर समय, हर काल के ‘प्रगतिशील विचारकों’ के मानसिक खोखलेपन का प्रतीक भी अपने आप बन जाते हैं। शेख के दादा एक हिंदू थे और उनका नाम था राघौराम कौल। शेख अब्दुल्ला के जन्‍म के महज 15 साल पूर्व ही, यानी वर्ष 1890 में उन्‍होंने इस्‍लाम स्‍वीकार किया था।

दोस्ती की वजह से हाशिए पर सरदार के विचार

नेहरू और शेख की इसी मित्रता ने कश्मीर के अत्याचार और नरसंहार की पटकथा लिखी। कालांतर में इसी मित्रता ने बहुसंख्यक आबादी के नेता शेख़ अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर के आपातकालीन प्रशासन का मुखिया बना दिया। इसके बाद इतिहास गवाह है कि आपातकालीन प्रशासन के मुखिया बनते ही शेख़ अब्दुल्ला तानाशाही पर उतर गए। कुछ ही दिन बाद शेख़ सरकारी ही नहीं, व्यक्तिगत तौर पर भी महाराजा हरि सिंह का कड़ा विरोध करने लगे। यह वो समय था जब नेहरू की नीतियों से नाराजगी के बावजूद उनके सम्मान में सरदार पटेल का अस्तित्व हाशिए पर जाता रहा।

प्रोग्रेसिव, सेकुलर, लिबरल शेख़ अब्दुल्ला अचानक से सांप्रदायिक नहीं हुए, वो बस इस मौके के इन्तजार में थे। उन्होंने हिन्दुओं को जेल में डालना और मुस्लिमों को प्रश्रय देना शुरू कर दिया था। शेख़ की साम्प्रदायिकता का जिक्र महाराजा हरि सिंह के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए पत्रों में मिलता है।

कश्मीर के इतिहास में हमारे नेताओं की, जिन्हें महामानव बनाने में एक पूरे इकोसिस्टम ने आज भी पूरा जोर लगाए रखा है, की अनगिनत ग़लतियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं। मुद्दा चाहे रक्तपिपासु वामपंथियों के प्रतीक लाल चौक का हो, या फिर घाटी में तनाव का, इन सबके पीछे नेहरू-शेख की जुगलबंदी सबसे ज्यादा जिम्मेदार थी। यह कहना कोई अतिरेक नहीं होगा कि नेहरू खुद को जहाँ भारत का प्रधानमंत्री मानते थे वहीं शेख को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। दूसरी ओर, इस सब घटनाक्रम के बीच सरदार पटेल को नजरअंदाज किया जाना, नेहरू की अनीतियों के सामने नतमस्तक होते रहना जारी रहा।

इस सारे घटनाक्रम के बीच जम्मू-कश्मीर और उसकी जनता का भाग्य तय होता रहा। इन्हीं कमजोर नीतियों की वजह से इस राज्य में अलगाववाद,आतंकवाद, चरमपंथ, वामपंथ आराम से पैर पसारता रहा। हालत इस तरह बन गए कि महाराजा हरि सिंह को ही कश्मीर से निकाल दिया गया। पहले शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और फिर उन्हीं की संतुष्टि के लिए उनकी रिहाई की गई।

इसके बाद एक विशेष विचारधारा के तुष्टिकरण के लिए घाटी में हमेशा के लिए अनुच्छेद-370 का बीजारोपण कर दिया गया। यह विशेष राज्य का दर्जा जम्मू-कश्मीर की जनता के लिए कम और नेहरू की ओर से शेख अब्दुल्ला के लिए मित्रता का उपहार ज्यादा था।

वर्ष 2013 में भाजपा नेता अरुण जेटली ने जम्मू में आयोजित नरेंद्र मोदी की ललकार रैली के बाद अपने ब्लॉग में लिखा था- “जम्मू और कश्मीर को भारत में पूरी तरह मिला लेना भारतीय जनसंघ और अब बीजेपी की विचारधारा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।” अनुच्छेद-370 भाजपा सरकार की एक बड़ी विजय है, इसीलिए इसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को समर्पित किया जा रहा है।

नेहरू की कविताएँ शायद तब लोगों का दिल जीतने के लिए काफी थीं, जब घाटी में भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करने के लिए किराए पर लोग नहीं बुलाए जाते थे। आज कश्मीर पर जनमत का विचार उठाने वाले पकिस्तान द्वारा दिए गए घावों का जिक्र नहीं करना चाहते हैं। कश्मीर की समस्या के मूल में जाए बिना कश्मीर का समाधान एक कोरी कल्पना ही है।

आज चाहे बुद्धिजीवी किसी भी पक्ष की वकालत कर रहे हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वो कम से कम मानवता की वकालत नहीं कर रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 पर लिया गया फैसला इस सरकार के विराट स्वरुप और उसकी इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह निर्णय ऐतिहासिक है।

हम कह सकते हैं कि इस सरकार ने नेहरू की एक महान भूल को ठीक करने का काम किया है। इसलिए खुसरो की कविताओं से पहले कल्हण की राजतरंगिणी को याद करना जरूरी है, जिसमें कश्मीर को ‘कश्यपमेरू’ बताया गया है।

कल्हण की राजतरंगिणी में कश्मीर का वृहद इतिहास है। इसमें कश्मीर के इतिहास को अति प्राचीनकाल से दर्शाया गया है। कश्यपमेरू या कश्यपमीर; कहा जाता है कि महर्षि कश्यप श्रीनगर से तीन मील दूर हरि-पर्वत पर रहते थे। जहाँ आजकल कश्मीर की घाटी है, वहाँ अति प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में एक बहुत बड़ी झील थी, जिसके पानी को निकाल कर महर्षि कश्यप ने इस स्थान को मनुष्यों के बसने योग्य बनाया था। यही कश्मीर आठवीं सदी के सम्राट मुक्तापीड ललितादित्य की भूमि है, यह विवरण भी राजतरंगिणी में ही मिलता है।

हमारा इतिहास हर तरह से सम्पन्न है, और इसे ठीक करने की दलीलों के लिए हमें ना ही फ़ारसी कविता की जरूरत है और ना ही किसी अंतरराष्ट्रीय सुलह संस्था की। इसलिए नेहरू-शेख़ की मित्रता के क़सीदों को शोक गीत की तरह ही देखा जाना चाहिए न कि नेहरू की गौरवगाथा के तौर पर।

भारत के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस जाने वाले थे शाह फैसल: सूत्र

सिविल सर्विसेज छोड़कर नेता बने शाह फैसल को हाल ही में दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में लेकर कश्मीर में नजरबंद किया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर 14 अगस्त को शाह फैसल दिल्ली में नहीं रोके गए होते तो वह इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में भारत के खिलाफ मामला दर्ज करा चुके होते। वह घाटी में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में थे।

फिलहाल, जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के नेता शाह फैसल को शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में नजरबंद रखा गया है। वहाँ पीडीपी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, जेकेपीएम और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कई नेता और कार्यकर्ता भी रखे गए हैं।

तुर्की से हेग जाने वाले थे

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शाह फैसल गत बुधवार तुर्की के लिए रवाना हो रहे थे, जहाँ से वो हेग (नीदरलैंड) ICJ जाने की योजना बना रहे थे। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के मुताबिक कोई भी आम आदमी निजी हैसियत से ICJ में केस दायर नहीं कर सकता है।

370 पर फैसले के बाद से पकिस्तान और विरोधी संगठन लगातार सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने की साजिश रच रहे हैं। शाह फैसल ने कश्मीर को लेकर विवादित बयान देते हुए कहा था कि हमारे सामने दो ही रास्ते हैं- कश्मीर कठपुतली बने या फिर अलगाववादी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। 370 पर केंद्र सरकार के फैसले के बाद शाह फैसल ने कहा था कि राजनीतिक अधिकारों को दोबारा पाने के लिए कश्मीर को लंबे, निरंतर और अहिंसक राजनीतिक आंदोलन की जरूरत है।