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एक देश, एक स्कूली शिक्षा: मेडिकल-इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं में सबको दिलाएगा बराबरी का मौका

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोमवार (जुलाई 5, 2019) को पूरे देश में एक स्कूली शिक्षा की माँग लोकसभा में उठाई। लोकसभा में शून्यकाल के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसा करने से ग्रामीण प्रतिभाओं को भी बराबर का मौक़ा मिलेगा।

सदन में भाजपा सांसद ने अपने मत पर तर्क दिया कि प्रदेश बोर्डों में अलग-अलग पाठ्यक्रम होने के कारण मेडिकल और इंजीनियरिंग के दाखिले की परीक्षाओं में ग्रामीण इलाकों के बच्चे स्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उन्होंने कहा कि पूरे देश में एक बोर्ड होना चाहिए ताकि सभी बच्चे एक तरह की पढ़ाई करें और सबको बराबर का मौका मिले।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक स्पीकर ओम बिरला ने बताया कि लोकसभा में कल (अगस्त 5, 2019) निशिकांत दुबे समेत 74 सदस्यों ने अपनी बात रखी। जहाँ निशिकांत ने शिक्षा का मुद्दा उठाया, वहीं शून्यकाल के दौरान बीजू जनता दल के नेता माहताब ने 2021 की जनगणना में OBC समुदाय के लोगों की अलग से जनगणना का सुझाव दिया, जबकि भाजपा के जगदम्बिका पाल ने आंगनवाड़ी कर्मियों के विषय को उठाया और माँग की कि इन कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारी होने का दर्जा दिया जाए।

इस दौरान भाजपा के राजकुमार चाहर ने अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मस्थान पर उनकी बड़ी मूर्ति स्थापित करने की माँग की। वहीं भाजपा के रवि किशन ने लड़कियों को अनिवार्य रूप से सैन्य प्रशिक्षण देने की व्यवस्था बनाने की माँग को उठाया।

शून्यकाल के दौरान भाजपा के अन्य नेताओं ने भी अपने अच्छे सुझावों को सामने रखा। भाजपा के ही सुशील कुमार सिंह ने इस दौरान किडनी संबंधी डायलिसिस योजना का जिक्र किया और बिहार के औरंगाबाद के जिला सदर अस्पताल में ऐसा केंद्र खोलने की माँग की। साथ ही भाजपा के रमेश बिधुड़ी ने दिल्ली में झुग्गी बस्ती के लोगों को बुनियादी सुविधा सुनिश्चित किए जाने की माँग को उठाया।

इसके अलावा भाजपा के अनुराग शर्मा, वाईएसआर कॉन्ग्रेस के रामकृष्ण राजू, शिवसेना के विनायक राउत और कई अन्य सदस्यों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों के मुद्दे उठाए।

‘जम्मू-कश्मीर की तरह हमारे लिए बनाओ ग्रेटर कराची: पाकिस्तान में मुहाजिरों ने उठाई हक की आवाज’

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 की ‘पावर’ को खत्म करके मोदी सरकार ने जो ऐतिहासिक कार्य कर दिखाया है, उससे पाकिस्तान में उथल-पुथल मच गई है। पाकिस्तान लगातार भारत के इस फैसले पर अपनी टिप्पणी कर रहा है। जिसपर मोहाजिर के वरिष्ठ नेता नदीम नुसरत की ओर से पाकिस्तान को दो टूक जवाब आया है। नदीम की मानें तो “पाकिस्तान को कश्मीरियों के बारे में बोलने का कोई हक नहीं, क्योंकि उसने खुद अपने नागरिकों को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा।”

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका में स्थित प्रवासी मोहाजिरों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक समूह वॉयस ऑफ कराची के अध्यक्ष नदीम नुसरत ने पाकिस्तान की टिप्पणियों पर बयान दिया है कि पाकिस्‍तान को तब तक कश्‍मीरियों के हक के लिए बोलने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि वह खुद अपने यहाँ मुहाजिर, बलूच, पश्‍तून और हजारा समुदाय के लोगों को उनके अधिकार नहीं दे देता।

उल्लेखनीय है कि इस समय भारत में इतना बड़ा फैसला आने के बाद पाकिस्तान में भी स्वायत्त क्षेत्र की माँग उठने लगी है। अमेरिका-आधारित समूह ‘वॉयस ऑफ कराची’ ने सोमवार को प्रवासी मुहाजिरों का प्रतिनिधित्व करते हुए पाकिस्तान की सरजमीं पर एक स्वायत्त ग्रेटर कराची के निर्माण का आह्वान किया है।

इसी के मद्देनजर नदीम नुसरत ने पाकिस्तान के आलाकमानों से सवाल किया है कि पाकिस्तान कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करता है, लेकिन क्‍या वह यही अधिकार अपने यहाँ के उन अल्‍पसंख्‍यकों को देने के लिए तैयार है, जो सांस्कृतिक व जातीय भिन्‍नता के कारण हाशिए पर हैं?

मोहाजिर प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले नदीम पाकिस्तान सरकार के कई मंत्री व शीर्ष अधिकारी विदेशों में कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने कहा पाकिस्तान के पुनर्गठन की माँग में अपने प्रयासों को तेज करने के लिए वैश्विक अभियान शुरू किया जाएगा। उनकी मानें तो उनका संगठन ग्रेटर कराची के प्रस्तावित नक्शे को पहले ही प्रकाशित कर चुका है और जल्द ही पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पूर्व अपने प्रस्ताव का मुख्य लेख जारी करेगा।

हमने तो सिर्फ एक किताब फाड़ा, संविधान तो BJP ने फाड़ दिया: कुर्ता फाड़ने वाले सांसद

महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के सांसद नज़ीर अहमद लवे ने इंडियन एक्सप्रेस के साथ हुई बातचीत में संविधान की प्रति फाड़ने पर कहा कि उन्होंने तो सिर्फ एक किताब फाड़ा है। यानी कि उनके अनुसार देश के संविधान की प्रति उनके लिए महज एक किताब है। उनका कहना है कि संविधान उन्होंने नहीं, बल्कि भाजपा ने फाड़ा है।

इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी हरकत को सही ठहराते हुए कहते हैं कि ये तो सोचने वाली बात है कि जब सदन और संसद के प्रति सजग रहने वाले उनके जैसे सांसद सरकार की कार्रवाई को देखते हुए इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि सरकार क्या कर रही है, तो फिर कश्मीर के आम नागरिक की क्या प्रतिक्रिया होगी? 

जब उनसे पूछा गया कि अब जम्मू कश्मीर की कानून व्यवस्था को सीधे तौर पर केंद्र नियंत्रित करेगा, तो इसका वहाँ के लोगों पर क्या असर पड़ेगा तो उन्होंने कहा कि सब कुछ कानून के हिसाब से होगा, लेकिन मुश्किलें बढ़ सकती है, क्योंकि वहाँ पर जनता के पास उनके द्वारा चुनी गई सरकार नहीं होगी। इसके साथ ही परिसीमन के बारे में बात करते हुए नज़ीर अहमद ने कहा कि अभी तो नहीं, लेकिन सरकार जल्द ही इसे भी कर सकती है और इससे लोग और भी अलग हो जाएँगे।

साथ ही नज़ीर अहमद ने सरकार के इस फैसले को चुनौती देने की भी बात कही। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों को इसके विरोध में संगठित होना चाहिए और सभी राजनीतिक नेताओं को एकजुट होकर चर्चा करनी चाहिए। फिर सभी को एक साथ कोर्ट जाना चाहिए। उनका कहना है कि कश्मीर का बचाव करना होगा अन्यथा कश्मीर के हालात बदतर हो जाएँगे।

गौरतलब है कि, पीडीपी सांसद नज़ीर अहमद लवे और एमएम फ़ैयाज़ ने सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर के अनुच्छेद 370 में किए गए बदलाव का विरोध करते हुए संसद परिसर में संविधान फाड़ दिया था। उनकी इस हरक़त से नाराज़ सभापति एम वेंकैया नायडू ने दोनों को संसद से बाहर जाने को कहा। इसके बाद भी दोनों सांसदो ने अपना हंगामा जारी रखा और अपने कपड़े फाड़ दिए।

ममता की पुलिस ने Article 370 पर जश्न मनाते 5 BJP कार्यकर्ताओं को किया गिरफ्तार

सोमवार (अगस्त 5, 2019) को भाजपा सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर के संबंध में अनुच्छेद 370 में किए गए बदलाव पर जहाँ पूरा देश जश्न मना रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने जश्न मना रहे लोगोंं को हिरासत में लिया है। ममता की पुलिस ने सिलीगुड़ी में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के अध्यक्ष कंचन देबनाथ और महामंत्री समेत 5 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है।

BJYM के जिला उपाध्यक्ष अनिकेत दास ने इस पर आपत्ति जताई और न्यूज़ एजेंसी ANI से बात करते हुए कहा कि भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया गया है। ये पूरी तरह से असंवैधानिक है। देश में हर जगह लोग 370 के पावर खत्म होने पर जश्न मना रहे हैं, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार जश्न नहीं मनाने दे रही। उन्होंने कहा कि वो तिरंगे के साथ जश्न मना रहे थे। उन्होंने किसी राजनीतिक दल का झंडा भी नहीं लिया था। इसके बावजूद उन्हें गिरफ्तार किया गया। वो इसके विरोध में थाने का घेराव करेंगे।

बता दें कि गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राज्यसभा में अनुच्छेद 370 हटाने के लिए संकल्प पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा मुहर लगाने के बाद अब जम्मू कश्मीर और लद्दाख दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश होंगे। हालाँकि, जम्मू कश्मीर की अपनी विधायिका होगी, लेकिन लद्दाख में विधायिका नहीं होगी। इसके साथ ही जम्मू कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा और दोहरी नागरिकता भी खत्म हो गई है। राज्यसभा से पारित होने के बाद इस बिल को मंगलवार (अगस्त 6, 2019) को लोकसभा में पेश किया गया।

Video: ‘हिन्दुस्तान तो फासिस्ट है, ये हमारे लिए लानत है’ – JNU में फिर शुरू हुआ ‘आजादी गैंग’ का खेल

अनुच्छेद-370 के ‘पॉवर’ के खत्म होने और उसके साथ 35-A खत्म होते ही देश भर में जश्न का माहौल है। लोग इसे ‘एक देश एक संंविधान’ बता रहे हैं, तो वहीं कुछ विपक्षी दलों द्वारा इसका विरोध भी किया जा रहा है। इसी बीच एक बार फिर से जेनयू से देश विरोधी नारों और ‘आजादी की गूँज’ सुनाई पड़ रही है। सोमवार (अगस्त 5, 2019) को राज्यसभा से विधेयक पारित होने के बाद आधी रात के अंधेरे में एक युवक काफी लोगों को इकट्ठा करके देश विरोधी बयान देता है और वहाँ मौजूद लोग भी उसका साथ देते हैं। आजादी-आजादी के नारे लगाते हैं।

ऊपर के वीडियो में आप देख सकते हैं कि एक युवक वहाँ उपस्थित लोगों से कहता है, “आप लोग डरिए मत, ये हम कह रहे हैं, इससे आपका कोई लेना-देना नहीं है। मैं यहाँ उपस्थित तमाम लोगों से कहना चाहता हूँ कि अगर आपके मकान पर मैं जाकर कब्जा कर लूँ, तो ये जुल्म होगा और ये जुल्म कश्मीरी बर्दाश्त नहीं करेगा। जब उसका कल्चर नहीं रहेगा, उसका तहजीब नहीं रहेगा, तो वो खुद को दुनिया के सामने क्या बताएगा? उसका क्या अस्तित्व रहेगा? वो दुनिया को क्या बतलाएगा कि मैं कौन हूँ? हिन्दुस्तान तो फासिस्ट है… ये हमारे लिए एक लानत है और मैं इस लानत को स्वीकार नहीं करूँगा।”

आगे उसने हिन्दुस्तान के तमाम बादशाऊर लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जिनकी खोपड़ी में दिमाग है, वो अपने इलाके के तमाम लीडर को कहें कि वो कश्मीर के साथ खड़े हो जाएँ। अगर वो खड़ा नहीं होगा कश्मीर को खो देगा और उसे खोना सबके लिए शर्मनाक होगा। इसके साथ ही वो बार-बार ‘370 वापस लाओ’ के नारे लगाता है और कहता है कि उसे ‘आजादी चाहिए- इस पार भी और उस पार भी।’

गौरतलब है कि इससे पहले भी जेएनयू ऐसे ही कारणों के कारण 3 साल पहले भी सुर्खियों को हिस्सा बना था। जब 9 फरवरी 2016 को वहाँ जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेताओं ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को फाँसी पर लटकाए जाने के विरोध में कार्यक्रम आयोजित किया था। इस दौरान एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) ने आरोप लगाया था कि यहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और आतंकी ‘अफजल तेरे कातिल जिंदा हैं’, जैसे नारे लगे। जिसके बाद इस मामले पर बाकायदा कार्रवाई हुई। अभी फिलहाल इस मामले में दिल्ली की एक कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

‘Pak को कश्मीर देने को तैयार हो गए थे सरदार पटेल, नेहरू की वजह से ये भारत के पक्ष में आया’

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का ‘पॉवर’ खत्म किए जाने के बाद राज्यसभा में बहस के दौरान कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल ने सरदार पटेल पर विवादित बयान दे दिया। उन्होंने कहा, ”हम समझते हैं कि नेहरू की वजह से कश्मीर हमारे पक्ष में आया। अगर रेडक्लिफ अवॉर्ड न होता और गुरदासपुर हमारे पास न होता और मैजॉरिटी का सिद्धांत माना जाता तो शायद यह राज्य हमारे पक्ष में न आता। उस वक्त सरदार पटेल होम मिनिस्टर थे और वही यहाँ 370 लेकर आए।”

सिब्बल के इस बयान के बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया और भाजपा ने उनके बयान के मद्देनजर उन्हें सदन की कार्यवाही से बाहर भेजने की बात कही। इतना ही नहीं, सभापति वैंकया नाडडू ने भी कपिल सिब्बल को सलाह दी कि उन्हें जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के बारे में इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए।

गौरतलब है कि अपना बयान देते हुए सिब्बल सिर्फ़ यही नहीं रुके, उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि सरदार पटेल तो पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर को देने को तैयार हो गए थे। लेकिन कश्मीर के शासक अगर भारत में शामिल होना चाह रहे थे तो इसकी वजह नेहरू ही थे। उन्होंने मोदी सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हम कहना चाहते हैं कि हमने कश्मीर जीता था और आप कश्मीर हार गए।”

सरदार पटेल पर होती इस तरह की टिप्पणी का भाजपा ने तीखा विरोध किया। भाजपा नेता और पार्टी के राष्ट्रीय मुख्य सचिव भूपेन्द्र यादव ने सिब्बल की टिप्पणी पर उन्हें सदन की कार्यवाही से बाहर निकालने की बात रखी। साथ ही उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस जम्मू-कश्मीर मसले पर सरदार पटेल को लेकर अपना मत स्पष्ट करे। सभापति वैंकया नायडू ने भी इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता को समझाया कि उन्हें नेहरू-पटेल के बारे में ऐसी बात नहीं करनी चाहिए।

बता दें कि कपिल सिब्बल ने इस बहस में ये भी कहा, “370 इतिहास पर धब्बा था या फिर हमारे संविधान की आत्मा को खत्म करने की कोशिश, ये तो इतिहास ही बताएगा।” इसके अलावा उन्होंने 370 हटाने और जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शाषित प्रदेशों में विभाजित करने के फैसले को जल्दबाजी बताया।

‘जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इसमें पाक अधिकृत कश्मीर भी आता है… जान दे देंगे इसके लिए’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में आज (अगस्त 6, 2019) बहस के दौरान पाकिस्तान द्वारा अधिकृत कश्मीर पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। और कश्मीर की सीमा में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) भी आता है… जान दे देंगे इसके लिए।”

गौरतलब है कि कल गृह मंत्री ने जम्मू-कश्मीर को लेकर सालों से चल रही असंमजस की स्थिति को दूर करते हुए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370(1) के अलावा अनुच्छेद 370 के सभी खंड हटाने का मोदी सरकार का निर्णय
राज्यसभा में पेश किया था। इसके बाद शाम में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल भी 125-61 मतों से राज्यसभा में पास हो गया था।

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी अलग ही राग छेड़ते दिखे। उन्होंने बेतुकी बात कहते हुए कश्मीर मसले को UN का मसला बता दिया। इस पर अमित शाह ने करारा जवाब देते हुए कहा कि अब कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र मॉनिटर करेगा?

अमित शाह ने कल राज्यसभा में बताया कि अनुच्छेद 370 (1) के अलावा सभी खंड राष्ट्रपति के अनुमोदन से खत्म होंगे। साथ ही कहा कि राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद अनुच्छेद 370 के सभी खंड लागू नहीं होंगे।

9 बच्चों की मौत, 5 की हालत गंभीर: उत्तराखंड के टिहरी में स्कूल बस खाई में गिरी

उत्तराखंड के टिहरी में स्कूल बस के खाई में गिरने से 9 बच्चों की मौत हो गई है। ये घटना टिहरी के कांगसाली में मंगलवार (अगस्त 6, 2019) की सुबह हुई। जानकारी के मुताबिक इस बस में हादसे के समय 18 बच्चे सवार थे।

दुर्घटना की सूचना मिलते ही SDRF की टीम मौक़े पर पहुँच गई है और घायल बच्चों को नजदीकी जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हादसे में 5 बच्चों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। अस्पताल में घायल बच्चों को हर संभव इलाज देने का प्रयास किया जा रहा है।

एएनआई की खबर के मुताबिक इस हादसे में 7 बच्चों की मौत हुई है जबकि आजतक अपनी खबर में 9 बच्चों की जान जाने की पुष्टि कर रहा है। जानकारी के मुताबिक बच्चे एंजेल पब्लिक स्कूल के बताए जा रहे हैं।

उत्तराखंड टिहरी में हुए इस हादसे पर राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ट्वीट करके दुख जताया है। मुख्यमंत्री ने ट्वीट पर अपनी शोक संवेदनाओं को व्यक्त किया है और हादसे की उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दिए हैं।

रवीश जी, इतने दुबले क्यों हो रहे हैं कश्मीर को लेकर?

मैग्ससे अवॉर्ड से पुरस्कृत रवीश कुमार जी को अवॉर्ड मिला ही था कि अमित शाह ने पूरी कोशिश कर दी कि आदमी गुस्से में अवॉर्ड वापसी कर दे। अभी चॉकलेट फ्लेवर केक की महक स्टूडियो के एग्जॉस्ट फैन ने पूरी तरह से बाहर फेंकी भी नहीं थी कि अमित शाह ने उनकी खुशियों की चमक को हैलोजन लाइट से सीधा लाल-हरी एलईडी में बदल दिया। प्राइम टाइम इंट्रो करते-करते रवीश जी कश्मीर पर पूरा प्राइम टाइम ही निकाल ले गए।

स्टूडियो में परममित्र फैजान मुस्तफा जी के अलावा किसी राजनैतिक दल के प्रतिनिधि नहीं थे। ये बात और है कि रवीश भक्त मानते हैं कि रवीश जी स्वयं ही अपने आप में सारे राजनीतिक दल हैं। अगर महाभारत की बात करें तो रवीश जी आने वाले दिनों में अपना विराट रूप दिखा सकते हैं, जिसमें हम देखेंगे कि ‘सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं’। उस हिसाब से उन्होंने विपक्षी दलों की भूमिका में स्वंय को रखते हुए, पत्रकारिता के स्वनिर्धारित फर्जी मापदंड कि ‘पत्रकार का काम हमेशा सरकार के विरोध में रहना होता है’ को शिद्दत से निभाया। पक्ष में अमित शाह के क्लिप्स तो आ ही रहे थे।

कश्मीर की बात करते हुए पहला दर्द जो रवीश जी के फूले हुए सीने में सुई जैसा चुभा वो यह था कि सरकार ने कश्मीर के लोगों से राय क्यों नहीं ली? उन्होंने ज़ोर दे कर पूछा कि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के सासंदों से क्यों नहीं पूछा गया। कश्मीर के लोगों की राय इसलिए नहीं ली गई क्योंकि उन्होंने किसी भी नेता को अपनी राय देने के लिए नहीं चुना था, इसलिए सरकार गिर चुकी है। जहाँ तक इन पार्टियों के सांसदों का सवाल है, एक ने अपना कुर्ता फाड़ कर श्रग नामक फैशनेबल वस्त्र बना लिया, और साथ ही संविधान को भी सदन में फाड़ गया। दूसरी बात यह है कि सासंदों को नाम लिखवा कर अपनी राय देने का प्रावधान है, उन्हें सुपारी और जनेऊ देकर बुलाया नहीं जाता कि भैया राय दे दो।

एक लाइन जो रवीश जी ने अपने डार्क ह्यूमर का प्रयोग करते हुए बार-बार कही और अपने भक्तों को रवीश प्रोफेशनल प्रोपेगेंडा यूनिवर्सिटी (व्हाट्सएप्प पत्राचार माध्यम) के नए शोध के कोर्सवर्क के तौर पर प्रदान की, वो यह थी कि ‘इससे क्या होगा, ये समस्याएँ तो बाकी राज्यों में भी है, उन्हें भी केन्द्र शासित बना दिया जाए’। रवीश जी शायद मैग्ससे वाले केक खाने के चक्कर में भूल गए कि बाकी राज्यों में न तो 370 था, न 35A, और कश्मीर बाकी राज्यों की तरह नहीं था इसीलिए ऐसा करना पड़ा।

कहने लगे कि रोजगार के अवसर अगर पैदा होते हैं तो फलाँ राज्य को भी केन्द्रशासित बना दिया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार तो हर जगह है, सबको बाँट देना चाहिए। ऐसे ही वक्त पर रवीश जी क्यूटाचारी हो जाते हैं। मतलब, एक राज्य को, जहाँ बाहरी व्यक्ति रोजगार ला ही नहीं सकता, बाहरी का बसना गैरकानूनी है, बाकी के राज्यों के समकक्ष रख रहे हैं जो नॉर्मल है? ‘रोजगार नहीं है’ का भांडा कई बार फूट चुका है, इसलिए इस पर चर्चा नहीं करूँगा।

कश्मीर सामान्य राज्य नहीं था, इसलिए वहाँ जो समस्याएँ थीं, भले ही वो बाकी राज्यों में भी हो, उसके समाधान के लिए उसकी उस विशेषता को हटाना होगा जो उसके विकास की बाधक है। इसलिए, चुटकुलेबाजी के लिए तो नकली हँसी हँसते हुए रवीश कह सकते हैं कि यूपी को भी बाँट दिया जाए, लेकिन वो कुतर्क है, उस पर चर्चा नहीं होनी चाहिए।

उसके बाद, भावुक आवाज किन्तु भावहीन चेहरे के साथ रवीश जी ने बताया कि कैसे 1948 में जब आतंकियों ने हमला किया तब नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं ने अपनी शहादत दी थी। बिल्कुल दी थी रवीश जी, बाकी पार्टियों के कार्यकर्ता भी मरे थे। और संसद में रखे गए आँकड़ों की माने तो कश्मीर में अब तक लगभग 50,000 लोग मारे जा चुके हैं।

दूसरी बात यह है कि रवीश जी 1948 में तो चले गए, क्योंकि उनको सूट कर रहा था, लेकिन 1989-90 में क्या हुआ, ये पूरे एपिसोड में नहीं बता सके। रवीश कुमार एक लाइन नहीं बोल सके कि इन दो सालों के बीच, और उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि रातों रात कश्मीर की डेमोग्रफी बदल गई और शिव की धरती पर मंदिरों में नमाज पढ़े गए। आप ये कह कर नहीं बच सकते कि उस घटना के सामने तो सारे तर्क निरस्त हो जाते हैं। आपको हर बार क्रूरता की डिग्री को माइक्रोस्कोप से देखना होगा, एक पूरी जनसंख्या की हर छटपटाहट को पढ़ना होगा और तब कहिए कि कश्मीर कैसे अलग है, और जो हुआ उसे कैसे ठीक किया जाए।

‘डर का माहौल’, ‘आवाज को दबाया जा रहा है’, ‘सवाल करना एंटी नेशनल बनाता है’ जैसी फर्जी बातें बेच कर, हजारों करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप झेल रहे मालिक की डुगडुगी बजाते पत्रकारिता के स्वघोषित स्तंभ ने कहा कि अगर लोग प्रश्न पूछेंगे तो उन्हें अलगाववादी कह दिया जाएगा। लगता है कि प्राइम टाइम में जिस अनौपचारिकता और उपेक्षा से रवीश आजकल बैठते हैं, बातें करते हैं, उन्होंने सिर्फ वही क्लिप्स देखीं जो उनके एडिटर ने उनके लिए छाँटी थी। अगर उन्होंने पूरी कार्यवाही देखी होती तो कैमरे में देख कर ऐसा बेहूदा झूठ नहीं बोलते। लेकिन बात तो वही है कि हमारा कैमरा, हमारा स्टूडियो और हमारे रवीश भक्त, हम जो कहेंगे वही सही है। जबकि, संसद में कई सांसदों ने सवाल किए, उन्हें जवाब दिया गया। उन्होंने स्पष्टीकरण माँगे, उन्हें स्पष्टीकरण दिया गया।

कश्मीर की बात हो और कश्मीरी पंडित कैसे नहीं आएँगे चर्चा में! लेकिन अगर रवीश का शो हो तो वो सरकार को गलत साबित करने के लिए पूरे भारत से तीन ऐसे गाँव ले आएँगे जहाँ बिजली के खंबे तो हैं लेकिन उन पर सरकार ने तार खींचने से पहले पूरे भारत के विद्युतीकरण का हल्ला कर दिया। ये इंसान इस बात पर अचंभित नहीं होता कि भारत के कई हजार गाँव अब बिजली पा सकेंगे, बल्कि वो इस पर खुश होता है कि तीन में तो नहीं हुआ न! उसी तर्ज पर, कश्मीरी पंडितों के बारे में लम्बी हाँकने के बाद रवीश ने किसी व्यक्ति को यह कहते दिखाया कि कश्मीर में 5-6000 कश्मीरी पंडित 101 जगहों पर रह रहे हैं। उन्हें कोई समस्या नहीं है।

रवीश जी किताबों का हवाला देते हैं, पन्ने का नंबर बताते हैं। मैं भी आँकड़ों की बात करते हुए बताना चाहूँगा कि सबसे कम संख्या बताने वाले लोग कहते हैं कि जनवरी 1990 से घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी हिन्दुओं की संख्या एक लाख है। कुछ के अनुसार यह संख्या डेढ़ लाख है, और कुछ इसे आठ लाख तक बताते हैं। सबसे कम वाले को भी सही माना जाए तो क्या पाँच हजार लोगों के कश्मीर में होने से बाकी के 95,000 और उनके अभी के परिवारों का न्याय हो गया? पाँच प्रतिशत के वहाँ होने की बात दिखा कर किसको सांत्वना दे रहे हैं? क्योंकि आने वाले दिनों में आपके भक्तगण काले बैकग्राउंड पर ‘भाजपा का झूठ पकड़ा रवीश ने, कश्मीरी पंडित अभी भी खुशहाल हैं घाटी में’ घुमाते मिलेंगे। उनमें से किसी को तीन साल बाद रवीश श्री या रवीश विभूषण भी मिल जाएगा, किसको पता!

उसके बाद रवीश कुमार ने बताया कि इन दोनों केन्द्रशासित प्रदेशों की राजनैतिक पहचान आधी रह जाएगी! इसका मतलब क्या है, मुझे नहीं पता क्योंकि इतनी खूफियागीरी तो मैं नहीं कर सकता। कश्मीर की पहचान, दुर्भाग्य से, एक आतंकग्रस्त राज्य के रूप में ही रही है जहाँ के लोग अपने आप को आजादी के लिए तैयार करते रहते हैं। ऐसा मानना सच है या गलत, वो अलग चर्चा है, लेकिन अब कश्मीर की राजनैतिक पहचान भारत के एक अभिन्न अंग के रूप में है जहाँ भारत का संविधान, झंडा, दंड विधान और सारी योजनाएँ लागू होंगी। इसलिए, इनकी राजनैतिक पहचान आधी नहीं हुई, बल्कि अब उन्हें पूर्णता मिली है।

इसके बाद रवीश जी बिलकुल ऐसे बोलने लगे जैसे वो कल ही पैदा हुए और आज उन्हें स्टूडियो में बिठा दिया गया। वो सत्यपाल मलिक के जून और दो दिन पहले के बयान दिखाते हुए बोले कि देखिए राज्यपाल तो कह रहे हैं कि कश्मीर में कुछ नहीं होने वाला, सब अफवाह है कि ये हटेगा, वो हटेगा। लेकिन दो दिन बाद तो हटा दिया गया। इसके बाद रवीश जी ने इसका मतलब निकाला कि इतना बड़ा फैसला था और राज्यपाल को भी ये बात पता नहीं थी। जी रवीश जी, राज्यपाल को पता नहीं था, वरना वो तो लाउडस्पीकर लेकर कहता फिरता कि कश्मीर वालों तुम्हारा स्पेशल स्टेटस गया ‘चितरा के झाँट में’, सड़कों पर उतरो और पत्थरबाजी करो, राज्य सरकार तुम्हें पाँच सौ रुपए देगी। एक ही दिल है कितनी बार सांकेतिक छुरा मार कर आत्महत्या करूँ आपके कुतर्क सुन कर? (‘चितरा के झाँट में’ मिथिला क्षेत्र की ठेठी बोली का मुहावरा है जिसका तात्पर्य है ‘चित्रा नक्षत्र की फुहार’। इसका अर्थ ‘भाँड़ में जाओ’ जैसा है।)

कुल मिला कर, अंग्रेजी की एक कहावत रवीश जी के प्राइम टाइम को समेट देती है कि ‘some people speak because they have something to say, while some speak because they have to say something’. इसका अर्थ है कि कुछ लोग इसलिए बोलते हैं कि उनके पास बोलने के लिए कुछ होता है, जबकि कुछ लोग बस इसलिए बोलते हैं क्योंकि उन्हें कुछ बोलना होता है।

रवीश कुमार की एक समस्या यह भी है कि चालीस मिनट के प्राइम टाइम में वो इस बात पर खुश नहीं होते कि हजारों गाँवों में बिजली पहुँची, बल्कि वो पूरे समय यह बताने में लगे रहते हैं कि नहीं, तीन गाँव में नहीं पहुँची। यही पत्रकारिता उन्हें बाकी पत्रकारों से अलग बनाती है। उनमें यह दैवप्रदत्त कला है कि वो जब पत्रकार होते हैं तो वो अपने भाई और मालिक को भूल जाते हैं कि उनके कांड क्या हैं। वो जब पत्रकार होते हैं तो जेडीयू को यह याद जरूर दिलाते हैं कि वो भाजपा के साथ सरकार में हैं, और उन्हें कश्मीर वाले मसले पर जब सूचना भी नहीं दी गई तो उन्होंने इस्तीफा भी नहीं दिया।

जबकि उन्हें ही पत्रकारिता का आदर्श मानने वाले भक्तों से मेरा सवाल यह है कि मोदी से हर रात कठिन सवाल पूछने वाले रवीश अपने जमीर से कब कठिन सवाल पूछेंगे? आखिर वो कब इस्तीफा देंगे क्योंकि जब तक प्रणय रॉय अपने पैसों वाले कांड से बाइज़्ज़त बरी नहीं हो जाते, वो एनडीटीवी से नैतिकता के आधार पर तो जुड़े नहीं रह सकते? लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि फिर अपने हृदय में अंधेरा लिए घूमने वाले पत्रकार शिरोमणि भारत की जनता को कैसे बताएँगे कि उनके डिश की छतरी की तार मोदी रात में काट देता है!

वो व्यक्ति पत्रकारिता का स्तंभ होने का दंभ भरता है जिसके पैनल में हमेशा एक ही विचार के लोग होते हैं, और विरोध के मत वालों को बुलाने की कोशिश भी नहीं होती। रवीश के प्राइम टाइम से ज्यादा अलोकतांत्रिक न्यूजरूम कहीं नहीं होता जहाँ, नेता तो चलिए आते नहीं है, जानकार भी अपने विरोध की आवाज को प्रदर्शित करने नहीं बुलाए जाते। क्या राजनैतिक विश्लेषक सिर्फ एक ही विचारधारा के होते हैं, या भाजपा के बायकॉट के बाद, भाजपा के समर्थकों में कोई विश्लेषक नहीं है? ऐसा नहीं है, बात इतनी है कि ऐसे तानाशाही प्रवृत्ति के लोग, हर रात यह चिल्लाते हैं कि असली पत्रकारिता वही कर रहे हैं, वो जो कह रहे हैं वही शाश्वत सत्य है, जबकि नंगा सच यह है कि रवीश कुमार से ज़्यादा मैनेज्ड पैनल किसी भी स्टूडियो में नहीं दिखता।

दुनिया से कठिन सवाल पूछना और उन्हें आदर्श से कम की स्थिति में नहीं स्वीकार पाना, रवीश जी की कई अदाओं में से एक है। सत्तर साल से जिस अस्थाई बात को ढोया जा रहा था, रवीश जी इतने छिछले तरीके से उसे डिफेंड करेंगे, ये नहीं सोचा था। वो ये बात भूल गए कि कश्मीर की डेमोग्रफी कैसे एक तय तरीके से बदली गई। वो यह भूल गए कि 1957 में पंजाब के गुरदासपुर और अमृतसर से कश्मीर में वाल्मीकि समुदाय का एक समूह कश्मीर सरकार की माँग पर उनका कचरा साफ करने आया था, और आज तक उसे वहाँ का नागरिक होने का हक भी नहीं दिया गया है। इसलिए रवीश जी यह ज्ञान तो न दें कि केन्द्रशासित बनाने से क्या हो जाएगा।

रवीश बहुत आराम से भूल गए कि किस अनुच्छेद की आड़ में आजादी की बात होती है। रवीश यह भूल गए कि आईसिस के झंडे गुजरात सा राजस्थान के गाँवों में नहीं दिखते, बल्कि कश्मीर घाटी में वो एक आम दृश्य है। रवीश जी ने कश्मीरी पंडितों की पीड़ा की वो किताबें नहीं पढ़ीं जो वो पीढ़ी लिख रही है जिसका बचपन उनसे छीन लिया गया था और जवानी अपने ही देश में भटकते हुए बीत रही है। रवीश जी ने उस बच्चे के बारे में नहीं सुना जो सेना के जवानों द्वारा दागी गई गोलियों के खोले चुनता है, उसे स्क्रैप मार्केट में बेचता है ताकि वो कुछ खा सके।

किताबें तो मैंने भी बहुत पढ़ी हैं, और पेज नंबर मुझे भी याद हैं, लेकिन मैं अभी तक इतना धूर्त नहीं बन पाया कि उस ज्ञान का इस्तेमाल अपनी फर्जी विचारधारा और मालिकों के प्रोपेगेंडा की रोटी सेंकने में कर सकूँ। वो तरीके रवीश को ही मुबारक हों।

Article 370 पर टूट रही कॉन्ग्रेस! 2 धुरंधर युवा नेता के साथ जनार्दन द्विवेदी भी मोदी सरकार के पक्ष में

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के ‘पावर’ को खत्म किए जाने के बाद अब कॉन्ग्रेस पार्टी 2 हिस्सों में बँटती दिखाई दे रही है। खबरों की मानें तो पार्टी के आधिकारिक व्हॉट्सऐप ग्रुप में पार्टी प्रवक्ताओं के बीच जम्मू-कश्मीर पर आए फैसले पर पक्ष और विपक्ष की बहसें हो रही हैं। पार्टी के कुछ नेता केंद्र सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ होते विरोध से सहमत हैं तो कुछ इससे नाराज़ हैं। जो नेता नाराज़ हैं उनका डर है कि इस विरोध के कारण उन्हें राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन फिर भी पार्टी के शीर्ष को देखकर वह चुप हैं।

बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर पर लिए इस ऐतिहासिक फैसले पर एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस के आलाकमान इसका विरोध कर रहे हैं तो वहीं पार्टी के कुछ नेता पार्टी के मत से हटकर अपना बयान दे रहे हैं। इनमें कॉन्ग्रेस के युवा चेहरे और पूर्व सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा, मुंबई कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा भी शामिल हैं। ये दोनों मोदी सरकार के इस फैसले का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। इनके अलावा वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता जनार्दन द्विवेदी ने भी अनुच्छेद 370 हटाए जाने का स्वागत किया।

मोदी सरकार का फैसला आने के बाद हुड्डा ने अपने फेसबुक पर अपना पुराना पोस्ट शेयर किया और बताया कि वो शुरुआत से कहते आ रहे है कि 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 का कोई औचित्य नहीं है। इसके अलावा उन्होंने अपने ट्वीट पर भी लिखा, “मेरी व्यक्तिगत राय रही है कि 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 का औचित्य नहीं है और इसको हटना चाहिए? ऐसा सिर्फ देश की अखंडता के लिए ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर जो हमारे देश का अभिन्न अंग है, के हित में भी है। अब सरकार की यह जिम्मेदारी है कि इसका क्रियान्वयन शांति और विश्वास के वातावरण में हो।”

वहीं, कॉन्ग्रेस अध्य मिलिंद देवड़ा ने भी इस मामले पर खुलकर अपनी बात की। उन्होंने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनुच्छेद 370 को उदार बनाम रूढ़िवादी बहस में तब्दील कर दिया गया। पार्टियों को अपनी विचारधारा से अलग हटकर इस पर बहस करनी चाहिए कि भारत की संप्रभुता और संघवाद, जम्मू-कश्मीर में शांति, कश्मीरी युवाओं को नौकरी और कश्मीरी पंडितों के न्याय के लिए बेहतर क्या है?”

बता दें कि मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिलने वाले विशेषाधिकारों को हटाए जाने का कॉन्ग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने समर्थन किया है। उन्होंने कहा, “राजनीति में मेरे गुरु रहे राम मनोहर लोहिया जी हमेशा से ही अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे। इतिहास में की गई एक बड़ी गलती आज सुधार ली गई है।”

कॉन्ग्रेस के सांसद और चीफ व्हिप भुवनेश्वर कालिता ने पार्टी के साथ-साथ अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। वो अनुच्छेद-370 का ‘पावर’ खत्म होने पर अपनी पार्टी के द्वारा विरोध किए जाने को लेकर असहज थे। उनकी माने तो अनुच्छेद-370 का ‘पावर’ खत्म होना ही जम्मू-कश्मीर समस्या का एकमात्र विकल्प था।

गौरतलहब है कि इन कॉन्ग्रेसी नेताओं के अलावा बहुजन समाज पार्टी ने भी मोदी सरकार के इस फैसले का आदर किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने भी इस फैसले का खुले सुर में स्वागत किया।