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चल काँवड़िया शिव के धाम, राह में पत्थरबाजी करेंगे ‘शांतिप्रिय’ इंसान

क्या समुदाय विशेष के इलाकों से गुजरने वाली सड़कें मजहब विशेष के बाप की हैं? क्या हिन्दुओं के इलाकों से गुजरने वाली सड़कें हिन्दुओं के बाप की हैं? दोनों का जवाब है नहीं। फिर प्रश्न आता है कि शिवभक्त काँवड़िया जब इन इलाकों से गुजरता है तो पत्थरबाजी और मार-पीट की खबरें कैसे आती हैं? क्या इसके उलट आपने कहीं सुना है कि ईद की नमाज पढ़ते, या ईद तो छोड़िए हर शुक्रवार सड़क घेर कर देश के कई इलाके में नमाज पढ़ते लोगों पर किसी ने आवाज भी उठाई हो?

मार-पीट, पत्थरबाजी की तो बात बहुत दूर की है, यहाँ सोनू निगम को यह कहने पर सर काटने की धमकी दी गई थी जब उन्होंने बहुत ही तार्किक बात कही थी कि मस्जिदों के ऊपर लाउडस्पीकर से आने वाली आवाज हर किसी को सुनाना गैरजरूरी है। इस पर आप ट्वीट या पोस्ट लिख कर देख लीजिए, कुछ राज्यों में आप पर ब्लासफेमी का केस चलेगा और आप जेल में होंगे।

सावन चल रहा है, हर साल चलता है, एक महीने जल उठाकर शिव जी का अभिषेक करने हिन्दू भक्त शिव के धाम जाते हैं। ये कुछ लोगों के इस धरती पर आने से पहले से हो रहा है, और आगे भी होता रहेगा। न तो काँवड़िए किसी ‘शांतिप्रिय’ को छेड़ते हैं, गाली देते हैं, बल्कि पूरे रास्ते ‘बोल-बम’ का आह्वान करते हुए चलते हैं। ऐसा नहीं है कि ये ‘बोल-बम’ समुदाय विशेष के इलाके में आ कर बोलना शुरू कर देते हैं। अब खबर आ रही है कि समुदाय विशेष को इस ‘बोल-बम’ से समस्या हो रही है।

पिछले सालों में भी ऐसी खबरें आई हैं जहाँ ‘मजहबी इलाके’ से गुजरने वाले काँवड़ियों पर पत्थरबाजी भी हुई है। अगस्त 2016 में उत्तर प्रदेश के बागपत में ईंट-पत्थरों से हमला किया गया। भीड़ ने गाड़ियों में आग लगा दी। जुलाई 2017 में बरेली के खेलम गाँव में कट्टरपंथियों ने पूरी योजना बना कर काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया। वो जानते थे कि इधर से ये गुजरेंगे, और छतों पर ईंट-पत्थर लेकर बैठे हुए थे। जब पुलिस आई तो उस पर हमला किया गया। साथ ही, एसडीएम को इनकी भीड़ खींच कर अपने घर ले गई और जम कर पीटा।

अगस्त 2018 में राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे में डीजे बजाते हुए काँवड़िए आ रहे थे। कट्टरपंथियों ने डीजे बंद करने को कहा, तो काँवड़ियों ने आवाज धीमी कर दी। लेकिन, इसी के दौरान इस्लामी भीड़ ने उन पर पत्थर, लाठी, सरिया और तलवारों से हमला किया। सात लोग घायल हुए। इस घटना के कुछ ही दिन बाद जयपुर के मालपुरा में 150 काँवड़ियों के बड़े समूह पर कट्टरपंथियों ने गुंडागर्दी करते हुए पत्थरबाजी कर दी। तकरीबन 50 काँवड़िए गंभीर रूप से घायल हो गए।

अगस्त 2018 में काँवड़ में जल भरने के लिए फ़र्रूख़ाबाद से 65 लोग, जिसमें 25 महिलाएँ भी थीं, ट्रैक्टर की ट्रॉली से पांचाल घाट को निकले। रात के एक बजे जब वो जमुरा गाँव से गुजर रहे थे तो कुछ कट्टरपंथी अपनी छतों से पत्थर चलाने लगे। हमले से घबराए ट्रैक्टर चालक ने जब ट्रैक्टर रोका तो उन पर कट्टरपंथियों ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया। फिर पुलिस आई और उन्हें सुरक्षा के साथ गाँव से बाहर निकाला गया।

आज की खबर यह है कि उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में काँवड़िए ‘बोल-बम’ का नारा लगाते हुए जल चढ़ाने जा रहे थे, तो गोला बाजार इलाके में कुछ कट्टरपंथी युवकों ने उन्हें ‘बोल-बम’ कहने से मना किया। वो नहीं माने तो इन कट्टरपंथियों ने दो काँवड़ियों की बुरी तरह से पिटाई कर दी। एक भी ऐसी घटना में काँवड़ियों का कोई दोष नहीं है क्योंकि वो अपनी धर्म और आस्था के हिसाब से, बिना किसी गैरकानूनी कार्य को अंजाम देते हुए जल चढ़ाने जा रहे थे, या वहाँ से आ रहे थे।

अगर यात्रा करते भक्त अपने आराध्य का नाम लेकर उद्घोष करते हैं तो कट्टरपंथियों को क्यों आपत्ति होती है? ये काफी आश्चर्य की बात है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर पर, चाहे इलाका मजहबी हो या नहीं, अल्लाह के अकबर होने की बात सुनाई जाती है, वो लोग काँवड़ियों को ‘बोल-बम’ कहने से रोकते हैं!

इन कट्टरपंथियों की भीड़ें लगातार मंदिर तोड़ रही हैं, शिवलिंग पर पेशाब कर रहे हैं, गाय काट कर दंगे करवाने की योजना बना रहे हैं, खुद ही ‘जय श्री राम’ का नारा लगवा कर वीडियो बनाते हैं कि लगे हिन्दू लगवा रहे हैं नारा, अफवाह फैला कर भीड़ जुटाते हैं और पत्थरबाजी करते हुए मूर्तियाँ तोड़ देते हैं, मार-पीट करते हुए टोपी गिरती है तो कहते हैं उनकी टोपी गिरा दी गई… पिछले 50 दिनों में इनके इतने कांड सामने आए हैं जहाँ ये हिन्दुओं पर हमला भी करते हैं और खुद को डरा हुआ भी बताते हैं।

ये तो नहीं चलेगा। प्रशासन अगर मस्जिद की दीवार पर कीचड़ के छींटे पड़ने पर एक्शन में आ जाती है तो फिर उसी शिद्दत से इन कट्टरपंथियों पर भी एक्शन लेना चाहिए। सिर्फ नैरेटिव बनाने के लिए कठुआ पीड़िता का नाम आज भी मजहबी नाम वाले प्रोफाइलों से हर मौलवी द्वारा रेप के खबर (जो काफी हो रही हैं) के नीचे आ जाता है, लेकिन इन अपराधों की स्वीकारोक्ति उस मजहबी इंसान में भी नहीं है जो आतंकियों को ‘वो तो सच्चे मुस्लिम नहीं है’ कह कर खुद को सच्चा बताता फिरता है। इनके मुँह में क्या लाउडस्पीकर डाल दिया गया है?

ये लोग हमेशा समुदाय विशेष के लोगों पर हुए सामाजिक, मजहबी नहीं, सामाजिक अपराध पर भी तुरंत सैकड़ों की तादाद में पोस्ट और ट्वीट लिख कर बताते हैं कि कैसे उन्हें टार्गेट किया जा रहा है। एक कथित चोर की पिटाई होती है और इनकी तख्तियाँ गले में लटक जाती है, भारत लिंचिस्तान हो जाता है। उसी सप्ताह एक हिन्दू को तीन ‘शांतिप्रिय’ चाकुओं से इसलिए गोद देते हैं कि उसने अपने घर के आगे गाँजा पीने से मना किया। वो मर जाता है। तख्तियाँ स्थान विशेष में छुपा ली जाती हैं, अच्छे मुस्लिम गायब हो जाते हैं देश से।

यह तर्क आएगा कि ये तो महज कुछ घटनाएँ ही हैं, देश में बीस करोड़ कथित अल्पसंख्यक हैं, सारे ऐसे नहीं हैं। सारे हिन्दू भी तो ‘जय श्री राम’ नहीं करवा रहे। सिर्फ पचास दिन में आठ ऐसी घटनाएँ सामने आईं जहाँ कट्टरपंथियों ने ‘जय श्री राम’ वाला एंगल मजे-मजे में डाल दिया और इनके इमाम तक धमकी दे रहे थे कि ये उखाड़ लेंगे और वो उखाड़ देंगे। वो तर्क तो हिन्दुओं पर भी लागू होगा न कि अपराधियों का धर्म नहीं होता, आठ लोगों ने अगर बलात्कार किया तो पूरा हिन्दुस्तान और सारे हिन्दू बलात्कारी कैसे हो जाते हैं?

बात तो प्रवृत्ति की है कि अपने पर आए तो विक्टिम कार्ड खेलो, और मौका मिले तो शिवलिंग पर पेशाब कर दो। कितने शांतिप्रियों ने इस पर लिखा या ट्वीट किया कि काँवड़ियों पर पत्थरबाजी गलत है? या उन्हें अपनी मजहबी शिक्षा याद आई जहाँ काफिरों को काट देना भी सही है? यहाँ तो बस ईंट-पत्थर और तलवार-सरिया से बस थोड़ी-सी हिंसा हो रही है।

इनके नेता अपने मजहब के उन्मादी लोगों और भीड़ों द्वारा पब्लिक से लेकर पुलिस तक पर हमला बोलने की बात पर चुप रह जाते हैं, और खुद को पीड़ित दिखा कर गाँधी-नेहरू-पटेल से पूछते हैं कि उन्हें सुरक्षा क्यों नही मिल रही? क्या कट्टरपंथी इस देश के नागरिकों में कोई ऊँचा स्थान रखते हैं? क्या वो देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी नहीं? क्या वो लगातार इस देश के सत्तालोलुप नेताओं को तुष्टीकरण के कारण हर उस जगह पर भी अल्पसंख्यक होने का फायदा नहीं उठा रहे जहाँ वो बहुसंख्यक हैं?

ये अगर आतंक नहीं है तो और आतंक की परिभाषा क्या है? हर धार्मिक आयोजन पर पत्थरबाजी को कैसे सही ठहराया जा सकता है? एक बार हो तो कहें कि सामाजिक अपराध है, दो बार हो तो कहें कि दुर्घटना है, हो जाती है, लेकिन एक मजहब के लोग, दूसरे धर्म के आयोजनों पर, मंदिरों पर, मूर्तियों पर एक ही तरीके से हमला बोलें, तब तो वो पैटर्न है। इसका सीधा अर्थ है कि कट्टरपंथी कुछ संदेश देना चाहते हैं।

क्या वो संदेश ये है कि इनके इलाकों की सड़कें, जमीन और हवा इनके बाप की जागीर है? या फिर भारत के हर राज्य के हर इलाके की सड़क सार्वजनिक है, जिस पर कोई भी जा सकता है। क्या अपने मस्जिदों के लाउडस्पीकर से दिन में पाँच बार तेज आवाज में अजान देने वाले मजहब के लोग साल में एक सोमवार को, अपने इलाके की सड़क से जाते काँवड़ियों के ‘बोल-बम’ को बर्दाश्त नहीं कर सकते?

क्या सहिष्णुता सिर्फ एक धर्म में ही सन्निहित रहे और दूसरे मजहब के लोग दुर्गा विसर्जन से लेकर रामनवमी के जुलूसों और सावन के काँवड़ियों पर पत्थर बरसाते रहें? आप सोचते रहिए।

Chandrayaan-2: भारत ने रचा इतिहास, अग्रणी चार देशों में शामिल

भारत एक बार फिर गौरवशाली इतिहास रचने को तैयार है। आज 22 जुलाई, 2019 को दोपहर 2.43 बजे देश के सबसे ताकतवर रॉकेट GSLV-MK3 से लॉन्च हो गया है। इस रॉकेट को बाहुबली रॉकेट कहा जाता है।

भारत का चंद्रयान-2 चाँद के फलक पर पहुँचने के लिए तैयार है। चंद्रयान-2 का काउंटडाउन समाप्त होते ही मिशन लॉन्च हो चुका है। आज पूरा विश्व भारत के इस मिशन पर आँख गड़ाए है। आज इसरो के इस ऐतिहासिक मिशन की लॉन्चिंग देखने के लिए श्रीहरिकोटा में कई गणमान्य अतिथि मौजूद हैं।

चंद्रयान-2 के लॉन्च होते ही, हमारी यह ऐतिहासिक यात्रा शुरू हो चुकी है। आज भारत विश्व पटल पर ऐसे मिशन को अंजाम देने वाले अग्रणी देशों की श्रेणी में आ गया है। पृथ्वी से चंद्रमा की औसत दूरी 3,84,000 किमी है। विक्रम लैंडर मिशन के 48 वें दिन चंद्रमा पर उतरेगा, जो आज शुरू होता है। भारत चंद्रयान-2 मिशन की लॉन्चिंग के साथ वैश्विक पटल पर चाँद पर ऐतिहासिक मिशन भेजने वालों में चौथा देश बन चुका है।

आज आप भी लाइव स्ट्रीमिंग के माध्यम से इसरो के इस गौरवशाली मिशन के साक्षी हो सकते हैं। लॉन्चिंग की लाइव स्ट्रीमिंग यहाँ देखे जा सकते हैं-

आरिफ और रियाज ने ‘बोल बम’ का नारा लगाने पर की काँवड़ियों की पिटाई, इलाके में तनाव

सावन महीने के पहले सोमवार (जुलाई 22, 2019) को शिव मंदिरों में जलाभिषेक के लिए काँवड़िया गंगा जल लेकर पहुँचने लगे हैं। इसी कड़ी में जब काँवड़ियों का एक समूह ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए यूपी के जौनपुर के मड़ियाहूँ थाना क्षेत्र से गुजर रहा था, तो मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दो काँवड़ियों की बेरहमी से पिटाई कर दी। इसमें दोनों काँवड़िया गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों काँवड़ियों को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से एक काँवड़िया की हालत बेहद नाजुक है। उन्हें जिला अस्पताल रेफर किया गया है।

जानकारी के मुताबिक, ठाकुर प्रसाद के पुत्र विकास गौतम मड़ियाहूँ विंध्याचल से जल लेकर विवेकानंद स्थित शिव मंदिर की ओर जा रहे थे। इस दौरान जैसे ही काँवड़ियों का समूह नगर के कजियाना मुहल्ले मे पहुँचा, वहाँ के समुदाय विशेष ने काँवड़ियों को धार्मिक नारा ‘बोल बम’ लगाने पर आपत्ति जताई। मगर कांँवड़ियों का समूह फिर भी नारा लगाता रहा। इसके बाद गुस्से में आकर समुदाय विशेष ने उनकी पिटाई कर दी।

साथी काँवड़ियों की पिटाई से आक्रोशित काँवड़ियों ने मड़ियाहूँ जौनपुर मार्ग पर कजियाना मोहल्ले में सड़क जाम कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। मौके पर पहुँची पुलिस ने सड़क जाम कर रहे काँवड़ियों को समझाया और पीड़ित विकास गौतम की शिकायत पर कजियाना निवासी आरिफ व रियाज के विरुद्ध दलित उत्पीड़न सहित अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। मामले में एक आरोपित को हिरासत में भी ले लिया गया है। जिसके बाद पुलिस अधीक्षक विपिन कुमार मिश्रा, अपर पुलिस अधीक्षक ग्रामीण संजय कुमार राय, प्रभारी निरीक्षक लाइन बाजार संजीव कुमार मिश्रा, क्षेत्राधिकारी मडियाहूँ अवधेश कुमार शुक्ला ने आरोपित के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन देकर सड़क जाम समाप्त करवाया।

कई बार लात मारी, चेहरे पर मुक्के मारे: एक्टर मोहसिन अब्बास हैदर की पत्नी ने लगाए गंभीर आरोप

पाकिस्तानी एक्टर, मॉडल और सिंगर मोहसिन अब्बास हैदर पर उनकी पत्नी फातिमा सोहेल ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाया है। फातिमा ने फेसबुक पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर आपबीती बताई। साथ ही उन्होंने अपनी कुछ तस्वीरें भी शेयर की हैं, जिसमें उनके चेहरे और हाथ पर चोट के निशान नजर आ रहे हैं।

फातिमा ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में अपने पति पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा कि 26 नवंबर 2018 को उन्होंने अब्बास को धोखा देते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया था और जब वो उनसे इस बारे में बात करने गईं तो बजाय शर्मिंदा होने के अब्बास ने फातिमा की बेरहमी से पिटाई कर दी। उन्होंने लिखा कि अब्बास ने उनके बाल खींचे, कई बार फर्श पर घसीटा, कई बार लात मारी, चेहरे पर मुक्के मारे, सिर को दीवार पर दे मारा। इस पोस्ट में फातिमा ने इस बात का भी जिक्र किया कि जब उनके साथ ये घटना हुई थी, उस समय वो गर्भवती थीं।

फातिमा ने आगे लिखा कि वो इस घटना से काफी डरी हुई थीं। उन्होंने इसके बारे में परिवार के किसी सदस्य को नहीं बताया और फिर अपनी एक दोस्त के साथ हॉस्पिटल गई, जहाँ डॉक्टर ने इसे पुलिस केस मानते हुए इलाज करने से मना कर दिया। मगर फिर उनके निवेदन पर डॉक्टर ने इलाज करना शुरू किया। फातिमा ने अपनी डिलीवरी के बारे में बताते हुए लिखा, “जब मैं लाहौर के एक अस्पताल में कराह रही थी तब मेरा मशहूर पति कराची में अपनी गर्लफ्रेंड नजीश जहाँगीर के साथ सो रहा था। 2 दिन बाद केवल दिखावे और प्रचार के लिए वो अस्पताल आया, बच्चे के साथ फोटो ली और फिर उसे पोस्ट कर दिया। उसे बच्चे की फिक्र नहीं थी। वह केवल प्रचार करना चाहता था।”

अभिनेता की पत्नी ने उन पर फिर से पीटने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब वो 17 जुलाई को बच्चे को लेकर उनके घर गईं और उनसे बच्चे की जिम्मेदारी उठाने को कहा, तो अब्बास ने बच्चे के लिए कुछ भी करने से मना कर दिया और उन्हें बुरी तरह पीटा। फातिमा का कहना है कि उनके परिवारवालों ने इस बात को सार्वजनिक करने से काफी रोका, मगर इस जुल्म को वो अब और बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। इसीलिए उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी आपबीती को सबके सामने रखा। उन्होंने कहा कि अब वो अपने पति से कोर्ट में मिलेंगी।

वहीं, मोहसिन अब्बास ने फातिमा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने जो तस्वीरें शेयर की हैं, वो मारपीट की नहीं, बल्कि फातिमा के सीढ़ियों से गिरने की है और ये तस्वीर 2018 की है। उनका कहना है कि फातिमा झूठ बोल रही हैं और अगर सच बोल रही हैं तो अपनी मेडिकल रिपोर्ट पुलिस स्टेशन में जमा कराएँ। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि वो दोनों एक साथ खुश नहीं हैं। वो तलाक लेने वाले थे, लेकिन फिर बच्चा होने की वजह से रुक गए। फिर उन लोगों ने तलाक न लेकर हमेशा के लिए अलग रहने के बाारे में सोचा, मगर फातिमा इसके लिए तैयार नहीं हुईं। अब्बास ने ये भी कहा कि वो दूसरी शादी करने वाले हैं और परिवारवाले भी इसके लिए तैयार है। अब्बास का कहना है कि इसी वजह से फातिमा ये सब नाटक कर रही है, क्योंकि वो किसी भी हालत में ये शादी नहीं होने देना चाहतीं।

VIDEO वायरल: ‘जरुरत का सामान इधर-उधर से खरीदो, लेकिन BJP-समर्थित दुकानदार से नहीं खरीदो’

विवादित बयानों को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले उत्तर प्रदेश के शामली स्थित कैराना के सपा विधायक नाहिद हसन एक बार फिर चर्चाओं में हैं। उनके विवादित बयान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में नाहिद हसन अपने विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम समाज के लोगों से भारतीय जनता पार्टी से संबंधित दुकानदारों से सामान न खरीदने की अपील करते हुए दिख रहे हैं।

नाहिद का कहना है कि उनके जैसे लोगों के सामान खरीदने से ही भाजपाइयों की दुकान और उनका घर चलता है। अगर वो लोग उनकी दुकान से सामान नहीं खरीदेंगे, तो उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ जाएगी। इसलिए वो सभी से अपील करते हैं कि बीजेपी समर्थित दुकानों से सामान लेना बंद करें। साथ ही विधायक ने कैराना के उच्च अधिकारियों पर आरोप लगाते हुए कहा कि वो लोग बीजेपी नेता और बीजेपी समर्थकों के इशारे पर काम कर रहे हैं।

हालाँकि, इस विरोध और अपील के पीछे नाहिद का तर्क है कि वो गरीब लोगों के हक और रोजगार के लिए लड़ रहे हैं। वीडियो में नााहिद कैराना के सराय इलाका के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इस क्षेत्र में उनके वालिद और पूर्वजों ने सालों पहले गरीब लोगों को बसाया था और वो यहाँ पर कई सालों से रह रहे थे, लेकिन भाजपा के कुछ लोग और कुछ भाजपाई दिमाग वाले अधिकारियों ने गरीबों को वहाँ से हटाने की साजिश रची। वो लोग वहाँ पर ठेला लगाकर अपना घर चला रहे थे, लेकिन प्रशासन ने इस जमीन को अवैध अतिक्रमण व कब्जामुक्त कराकर खाली करा दिया है, जिससे इन गरीबों का रोजगार ठप्प हो गया है।

दरअसल, रविवार (जुलाई 21, 2019) को स्थानीय प्रशासन व नगरपालिका ने नगर के हर बाजार व मुख्य मार्ग पर खड़े होने वाले ठेलों को हटवाकर उन्हें सराय वाली भूमि में खड़े करने का निर्णय लिया। सरकार के इसी निर्णय को गलत बताते हुए नाहिद का ये वीडियो वायरल हो रहा है। नाहिद लोगों से अपील करते हैं कि वो 10 दिन या एक महीने अपने जरुरत की सामान इधर-उधर से या हरियाणा के पानीपत से खरीद लें, लेकिन जितने भी भाजपा समर्थित लोग बैठे हैं, उनसे सामान न खरीदें। वैसे, नाहिद जिन लोगों के हक और रोजगार की बात के लिए लड़ाई लड़ने और हक के लिए आवाज उठाने की बात कह रहे हैं, वो लोग कैराना के सराय इलाके में अवैध रुप से रह रहे थे। प्रशासन का कहना है कि यह सरकारी जमीन है, जिस पर केवल सरकार का अधिकार है और सरकार इनका इस्तेमाल सरकारी भवन निर्माण के लिए कर सकती है।

‘उमर अब्दुल्ला एक राजनैतिक नौसिखिए हैं, मुझे वो बयान नहीं देना चाहिए था लेकिन मेरी निजी सोच वही’

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर पलटवार किया है। राज्यपाल मलिक ने कहा, “वो एक राजनैतिक नौसिखिए हैं, जो हर मुद्दे पर ट्वीट कर रहे हैं। उनके ट्वीट पर आई प्रतिक्रियाएँ पढ़ लें, आप खुद ही जान जाएँगे।”

दरअसल यह सारा मामला शुरू हुआ तब जब गवर्नर सत्यपाल मलिक ने रविवार (जुलाई 21, 2019) को आतंकवादियों के नाम पर एक बड़ा लेकिन विवादित बयान दिया। एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आतंकवादी सुरक्षाकर्मियों समेत बेगुनाहों को बेवजह मारना बंद करें। इससे आगे उन्होंने यह भी कह डाला कि अगर मारना है तो उन लोगों को निशाना बनाएँ, जिन्होंने वर्षों तक कश्मीर की सम्पदा को लूटा है।

एएनआई के ट्वीट के मुताबिक, उन्होंने कहा, “ये लड़के जो बंदूक लिए फिजूल में अपने लोगों को मार रहे हैं, पीएसओ, एसडीओ को मारते हैं… क्यों मार रहे हैं इनको? उन्हें मारो जिन्होंने तुम्हारे मुल्क को लूटा, जिन्होंने कश्मीर की सारी दौलत लूटी… इनमें से किसी को मारा है अभी तक? बंदूक से कुछ हासिल नहीं होगा।”

राज्यपाल मलिक के इसी बयान के बाद पूर्व मुख्यमंत्री व जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ट्वीट करके लिखा, “यह शख्स जो जाहिर तौर पर एक जिम्मेदार संवैधानिक पद पर काबिज है और वह आतंकवादियों को भ्रष्ट समझे जाने वाले नेताओं की हत्या के लिए कह रहा है।”

इसके बाद अब्दुल्ला ने फिर एक ट्वीट किया और कहा, “इस ट्वीट को सहेज लें- आज के बाद जम्मू-कश्मीर में मारे गए किसी भी मुख्यधारा के नेता या सेवारत/सेवानिवृत्त नौकरशाह की अगर हत्या होती है तो समझा जाएगा कि यह जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के आदेशों पर की गई है।”

विवाद को आगे बढ़ता देखकर राज्यपाल मलिक ने इस पर अपनी सफ़ाई भी दे दी है। उन्होंने कहा, “मैंने जो कुछ भी कहा, वह यहाँ लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार की वजह से आई हताशा और गुस्से में कहा। गवर्नर के रूप में मुझे ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था, लेकिन मेरी निजी सोच वही है, जो मैंने कहा। बहुत-से राजनेता और बड़े नौकरशाह भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं।”

मिथिला पेंटिंग – परंपरा Vs आधुनिकता: जो पसंद नहीं आएगा वो समय के साथ ख़त्म हो जाएगा

जब कई भाषाओं की लोकोक्तियों में कहा जाता है कि “जो होता है अच्छे के लिए होता है” तो ऐसे ही नहीं कहा जाता। बरसों तक दुनिया को मिथिला पेंटिंग नाम की किसी विधा के बारे में पता ही नहीं था। बिहार में 1934 में भयानक भूकंप आया, कई मकान गिर गए। मधुबनी के ब्रिटिश सरकारी अफ़सर विलियम जी. आर्चर जब नुकसान का मुआयना करने निकले तो अचानक टूटे घरों की अन्दर की दीवारों पर उन्हें अनोखी चित्रकला नजर आई। आर्चर कला के पारखी थे, बाद में वो विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में साउथ एशिया की कलाओं के क्यूरेटर भी बने। 1930 के ही दशक में इनमें से कुछ कलाकृतियों की उन्होंने तस्वीरें ली थीं। दक्षिण के प्रसिद्ध मॉडर्न आर्ट कलाकारों क्ली, मीरो और पिकासो की कलाकृतियों से इनकी समानता पर वो काफी अचंभित थे। आखिर 1949 में भारतीय कलाओं की पत्रिका ‘मार्ग’ में वो इस कला की विधा को दुनिया के सामने लाए, उनके लेख और तस्वीरों के छपने के बाद इस कला को प्रसिद्धि मिली।

इसके कुछ ही दिन बाद एक दूसरी त्रासदी ने इस कला को आगे बढ़ने का फिर से मौका दिया। 1960 में जब भयानक अकाल पड़ा तो भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड ने मधुबनी इलाके की स्त्रियों को इस कला को कागज़ पर बनाने की सलाह दी। इन्हें बेचकर कुछ आमदनी हो सकती थी। लेकिन ज्यादातर लोग इलाके से पलायन करने में ही रूचि दिखा रहे थे, सिर्फ कुछ मधुबनी शहर के आस-पास की महिलाओं ने इसमें रूचि दिखाई। इनमें से ज्यादातर महिलाएँ बहुत अच्छी कलाकार थीं, जल्द ही इनमें से चार तो अंतरराष्ट्रीय मंचों और सांस्कृतिक मेलों में यूरोप, रूस और अमेरिका में भी भारत का प्रतिनिधित्व करने लगीं। इनकी देखा-देखी इलाके की हरिजन और दलित महिलाओं ने भी अपनी कला को कागज़ पर उतारना शुरू किया।

सन 1970 तक इस कला को व्यापक मंच मिल चुका था। भारत की अन्य कलाओं से बिलकुल अलग इस तरीके की कलाकृतियों को ख़रीदने के लिए भी दिल्ली से व्यापारी आने लगे। बहुत कम कीमत पर भारत के प्रमुख देवी-देवताओं और रामायण के दो-तीन दृश्यों को बड़े पैमाने पर बनाने की बाजार की माँग सामने आई। गरीबी से परेशान कई कलाकारों ने तेज़ी से सिर्फ कुछ ही चित्रों को बार-बार बनाना शुरू कर दिया। इस तरह ये मिथिला पेंटिंग की कुछ ख़ास पेंटिंग “मधुबनी पेंटिंग” के नाम से भी जाने जानी लगी। लेकिन कला के दलालों के अलावा भी कला के कई कद्रदानों की नजर अब तक इस पर पड़ चुकी थी। बाजार की तड़क-भड़क से दूर कई कलाकार अलग-अलग किस्सों को दर्शाते अपनी-अपनी कला को निखारने में लगे रहे। आज जिन कलाकृतियों को हम ‘मिथिला पेंटिंग’ के नाम से जानते हैं, वो यही हैं।

मिथिला को सदियों से अपने कवियों, विद्वानों, दार्शनिकों के लिए जाना जाता है। लेकिन इनमें से लगभग सभी पुरुष होते हैं। दलित हरिजन महिलाओं के लिए यहाँ का समाज बहुत रुढ़िवादी रहा है। कुछ 50 साल भी पीछे चले जाएँ तो कुछ उच्च वर्ग की महिलाओं को छोड़कर, स्त्रियाँ घरों के बाहर नजर नहीं आती थीं। घर के काम-काज, बच्चों की परवरिश और परिवार/मोहल्ले के समारोहों को छोड़कर समाज में उनका योगदान ना के बराबर होता था। चित्रकला भी घर की दीवारों तक ही सीमित थी, कागज पर पेंटिंग बना कर उन्हें बेचने का मौका जब इन्हें मिलने लगा तो उनके लिए एक नया द्वार खुल गया। इस से आने वाले पैसे का बड़ा ही मामूली आंकलन है इस कला के स्त्रियों के लिए योगदान में। दरअसल इसने स्थानीय या राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यहाँ की महिलाओं को पहचान दिला दी है।

यूरोप से लेकर जापान तक इन्हें अब लोक कलाकारों के तौर पर नहीं बल्कि समकालीन चित्रकारों/पेंटर के तौर पर जाना जाता है। कल तक जो चित्र अनाम होते थे, आज उन पर कलाकार के हस्ताक्षर पहचाने जाते हैं। आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ उन्हें सफ़र करने का मौका मिलता है, शिक्षा, रेडियो और टेलीविज़न जैसे माध्यमों से पहचान भी होने लगी है। छोटे से समाज से निकलकर दुनिया से परिचय कुछ ऐसा ही है, जैसे अँधेरे कूएँ से निकलकर समुद्र से मुलाकात होना। स्त्री-पुरुष संबंधों की परिभाषा बदलने लगी है, कुछ पुरुष भी इस कला से जुड़े हुए हैं लेकिन अगर कलाकृतियों को देखें तो पुरुषों के चित्र जहाँ अभी भी परंपरागत ही हैं वहीं कई महिलाएँ सामाजिक मुद्दों पर सवाल भी करने लगी हैं।

इन बदलावों के साथ ही इस इलाके में शुद्धतावादियों और आधुनिकतावादियों में चर्चा भी शुरू हो गई है। जहाँ कुछ लोग लोक कला से पौराणिक कथाओं का जाना कला की परंपरा का नष्ट होना बताते हैं, वहीं कुछ ये भी मानते हैं कि नए अनुभवों, सरोकारों और महिलाओं को मिली नई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस कला में भी जगह तो मिलेगी ही! मेरे ख़याल से तो ये फैसला कलाप्रेमियों और दर्शकों पर छोड़ा जाना चाहिए। जो पसंद नहीं आएगा वो खुद ही समय के साथ ख़त्म हो जाएगा।

5 साल की मासूम के साथ रेप, रोने पर गला दबाकर हत्या: 37 साल का असगर अली गिरफ्तार, स्वीकारा जुर्म

कोलकाता में 37 साल के असगर अली नामक शख्स को 5 साल की बच्ची के रेप और बाद में हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। खबरों के मुताबिक अली ने पहले फल का लालच देकर अपने पड़ोस के घर से बच्ची को उठाया और फिर जंगल में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद बच्ची का गला घोंट कर उसे मार दिया।

जब काफ़ी देर तक बच्ची घर नहीं लौटी तो उसके माता-पिता ने उसके गायब होने की एफआईआर पुलिस में लिखवाई। इसके बाद पुलिस ने ड्रोन और स्निफर डॉग्स की मदद से बच्ची को ढूँढने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस को बच्ची नहीं मिली। ग्रामीणों से पूछताछ हुई तो मामले में अली की संलिप्ता पाई गई। ग्रामीणों ने बताया कि बच्ची गायब होने से पहले आखिरी बार अली के साथ दिखी थी।

इसके बाद साउथ 24 परगना के खेयाड़ा नम्बर 1 पंचायत इलाके के नरेंद्रपुर निवासी अली के घर के बाहर गाँव वालों ने खूब हँगामा किया और उसके घर पर तोड़-फोड़ भी की। इस घटना के बाद पुलिस ने शनिवार (जुलाई 20, 2019) को अली को ट्रेन से आते हुए गिरफ्तार किया।

पूछताछ के दौरान अली ने स्वीकारा कि उसी ने बच्ची के साथ पहले बलात्कार किया और फिर उसके रोने पर उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी। अली द्वारा जुर्म स्वीकारने के बाद पुलिस अली को उस जगह लेकर गई जहाँ उसने लड़की के शव को फेंका था। ये जगह लड़की के घर से 1 किलोमीटर दूर थी। इस जगह से पुलिस ने लड़की का शव और उसके कपड़े बरामद किए।

पुलिस ने बताया है कि अली ने इस घटना के बाद अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया था और लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था। जिसके कारण उसे ढूँढना बहुत मुश्किल हो गया था। बता दें कि अली के गिरफ्तार होने से पहले इस मामले में उसके घरवालों से भी पूछताछ की गई थी। जिसमें मालूम चला कि अली का पहले भी आपराधिक रिकॉर्ड रह चुका है।

मुस्लिम कैसे लें लाइसेंसी हथियार? इमामबाड़ा में दी जाती इसकी ट्रेनिंग – अब बात से पलटे कल्बे जव्वाद

मुस्लिमों को हथियार खरीदने और उसे इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देने पर मुस्लिम धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने सफ़ाई दी है। कल्बे जव्वाद की ओर से दी गई सफाई में कहा गया है कि हथियार रखने और लाइसेंस बनवाने की खबरें गलत हैं। इस तरह का कोई भी कार्यक्रम लखनऊ के इमामबाड़ा परिसर में नहीं होगा। जव्वाद की मानें तो उन्होंने आयोजन कराने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा से उनका बयान वापस लेने के लिए भी कहा है। जबकि मॉब लिंचिंग की खबरों (ज्यादातर झूठी) के बीच मुस्लिमों को हथियार उठाने से नहीं हिचकने का विवादित सलाह दे चुके हैं कल्बे जव्वाद।

आज तक की खबर के मुताबिक मुस्लिम धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने सफाई देने के दौरान कहा, “यह कार्यक्रम अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा का है। मैंने पराचा से बयान को वापस लेने के लिए कहा है और सरकार को समय देने के लिए कहा है।”

कल्बे जव्वाद का कहना है कि यदि सरकार मॉब लिंचिंग के मामलों पर कार्रवाई करने को और कानूनों को सख्त बनाने के लिए कह रही है, तो हमें विश्वास करना चाहिए।

कल्बे जव्वाद की मानें तो भारत में मुस्लिम सबसे अधिक सुरक्षित हैं। इसलिए अब मुस्लिमों को शिक्षा, रोजगार और आधुनिकरण पर काम करना चाहिए। कल्बे कहते हैं कि मॉब लिंचिंग की घटनाएँ हर सरकार में हुई हैं। चाहे सपा हो या कॉन्ग्रेस, लेकिन किसी ने कानून बनाने की बात नहीं की। ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री सख्त कानून बनाने की बात कर रहे हैं तो हमें विश्वास रखना चाहिए।

इसके अलावा खबरों की मानें तो मुस्लिम धर्मगुरु ने सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद की बात पर असहमति दर्ज कराते हुए यह भी कहा कि हमें पहले सरकार से कानून बनाने की माँग करनी चाहिए। अगर वे इसमें असफल होते हैं तब इस तरीके से कैम्प का आयोजन किया जाए और सभी धर्मगुरुओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाया जाए।

गौरतलब है कि इस समय कार्यक्रम के आयोजन से मना करके अपने बयान पर यू-टर्न लेने वाले कल्बे जव्वाद इससे पहले कह चुके हैं कि 26 तारीख को जो परिसर में कैंप लगेगा, उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ इस बात की जानकारी दी जाएगी कि सरकार से हथियार कैसे लें, इसके लिए कैसे अप्लाई करें। इसमें कोई हथियार की ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी और न ही किसी प्रकार के हथियार के बारे में बताया जाएगा।

जबकि इस विवादित आयोजन कराने वाले महमूद पराचा ने इस कैंप के बारे में बयान देते हुए कहा था कि इस कैंप में मॉब लिंचिंग से बचने के लिए हम सभी को ट्रेनिंग देंगे, क्योंकि ये मॉब लिंचिंग सरकार करा रही है। यह मॉब लिंचिंग किसी एक संप्रदाय के प्रति हो रही है। इसमें मुस्लिम मारे जा रहे हैं, दलित मारे जा रहे हैं।

The Print वालों, रोना बंद करो- हिन्दुओं की हालत ‘शांतिप्रियों’ से बदतर है तुम्हारे ‘सेक्युलर’ राज में

मुगल इस देश पर कमोबेश 700 साल राज कर चुके हैं- उससे पहले मुहम्मद बिन कासिम के 670 के दशक में सिंध पर हमले से 1200 ई. के करीब दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बीच करीब 400-500 साल इस्लामी आक्रांताओं ने हिन्दुस्तान को लूटा, औरतों को नोंचा-खसोटा, मर्दों का कत्ले-आम किया, यानि कुल मिलाकर भरपूर राज किया। उसके बाद 90 सालों की अंग्रेजी हुकूमत में भी अधिकांश नवाबों की नवाबी सलामत ही रही, और उसके बाद नेहरू का तो यह मानना ही था कि इस देश के दो टुकड़े कर देने और लाखों के खून की होली के बाद भी मुस्लिमों को ‘विशेष ध्यान से’ इस देश में रखा जाना चाहिए।

670 ईस्वी से 500 साल हमलावर-हत्यारे-लुटेरे, अगले 700 साल निरंकुश शासक, उसके बाद 90 साल के अंग्रेजी राज में सीमित शक्तियों के साथ शासन और उसके बाद 70 साल से एक सेक्युलर राज्य के ‘लाडले’ बने रहने के बाद भी अगर कोई कौम ‘भेदभाव’ की शिकायत करे तो इससे ज्यादा क्रूर मज़ाक कोई नहीं हो सकता। The Print में छपे लेख के मुताबिक़ हिंदुस्तान में मुस्लिम होना आसान नहीं- “राज्य की एजेंसियों का इस्तेमाल हमें निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है।” इस बेहूदा तर्क के लिए सहारा लिया जाता है कुल दो घटनाओं का- हाशिमपुरा हत्याकाण्ड, और 11 मुस्लिमों को 25 साल बाद टाडा मुकदमे में बरी कर दिया जाना। महज इन दो घटनाओं के दम पर यह साबित हो गया कि मुस्लिम सताई हुई ‘माइनॉरिटी’ कौम हैं।

पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार कौन?

इस लेख की शुरुआत में ही मुस्लिमों को आत्ममंथन करने और अपनी कमज़ोरियों, अपने पिछड़ेपन के लिए दूसरों को दोषी ठहराने की बजाय खुद से ज़िम्मेदारी उठाने की बात करने वाले एक दूसरे लेख पर हमला किया जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि हाशिमपुरा और टाडा से डरकर कट्टरपंथी अपनी ‘ghetto’ के नाम से जानी जाने वाली बस्तियों तक सीमित हो गए। लेखिका फातिमा खान ने रोना रोया कि मुस्लिमों में स्वच्छता की कमी की धारणा उनके खिलाफ ‘नैरेटिव’ है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि स्कूलों, कॉलेजों आदि सार्वजनिक स्थलों पर मुस्लिमों को ‘इस्लामोफ़ोबिया’ झेलना पड़ता है।

इसके बाद ‘हर कौम को मूलभूत सुविधाएँ निष्पक्ष रूप से मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है’ का ज्ञान बाँचा जाता है। वह इसलिए ताकि इसकी आड़ में यह घटिया तर्क दिया जा सके कि जबकि मुस्लिमों ने खुद को अपनी मर्ज़ी से उन बस्तियों में कैद कर लिया जहाँ घुसने में गैर-मुस्लिमों के प्राण निकलते हों, लेकिन फिर भी उन तक मूलभूत सुविधाएँ पहुँचाना सरकार की जिम्मेदारी है।

आगे न बढ़ पहले इतने ही प्रोपेगण्डे की बात करें। तो हाशिमपुरा तो हुआ 1987 में, और टाडा के अंतर्गत गिरफ्तारियाँ हुईं 1994 में। तो हमारी पिछली पीढ़ी, और उसके पहले की पीढ़ी, और उनके भी पहले की पीढ़ी और न जाने कितनी पीढ़ियों से मौजूद मुस्लिम बस्तियों के पीछे क्या था? किसका डर था? मुस्लिमों में स्वच्छता के अभाव की धारणा भी, चाहे जितनी गलत हो या न हो, हाशिमपुरा से कम-से-कम दो पीढ़ी पुरानी है। रही बात अपनी जान जोखिम में डालकर इस्लामी बस्तियों में घुसने और स्वच्छता सेवाएँ पहुँचाने की, तो फातिमा जी को यह पता होना चाहिए कि अगर मुस्लिमों ने ‘ghettos’ के रूप में अपनी बंद बस्तियाँ बना लीं, जिनमें कोई अपराध होने पर पुलिस भी जाने में डरती रही, तो उनमें सफ़ाई व्यवस्था पहुँचाना न ही सरकार की ज़िम्मेदारी है, और न ही सरकार ने झाड़ू लगाने या नालियाँ साफ़ करने वालों की जान खरीद रखी है कि उन्हें ज़बरदस्ती ऐसी जगह धकेल दे जहाँ जाने में हथियारों से लैस पुलिस बल भी घबराते रहे हों।

हिन्दू-मुस्लिम अशांति का ज़िम्मेदार कौन?

फातिमा के लेख में कम-से-कम एक बात की सत्यनिष्ठ अभिव्यक्ति है- हिन्दू-मुस्लिम इस देश में ‘शांतिपूर्ण’ नहीं, तनावपूर्ण माहौल में ही रहे हैं; आधुनिक युग में केवल यही तनाव असल हिंसा के रूप में अभिव्यक्त होने लगा है, और सूचना-क्रांति के बाद से हमारे टीवी और मोबाइल के ज़रिए हमारी ज़िंदगियों तक पहुँचने लगा है। लेकिन फातिमा को यह बताना चाहिए कि इस तनाव के पीछे ज़िम्मेदार कौन रहा?

अगर हिन्दू जिम्मेदार रहे तो मुस्लिमों (और कुछ हद तक ईसाईयों) को छोड़ कर और किसी से कभी टकराव क्यों नहीं हुआ? हिन्दू खुद में हजारों जात-पाँत, सम्प्रदाय में विभाजित रहे, लेकिन कभी सुना क्या कि किसी शाक्त क्षत्रिय ने बौद्ध पर या यहूदी पर या किसी शूद्र वैष्णव पर भी पंथिक टकराव के चलते हमला कर दिया हो? हिन्दू-इस्लामिक इतिहास लगभग इस्लाम जितना ही पुराना है, शायद एक-आध सदी का फ़र्क हो। क्या किसी भी हिन्दू राजा ने किसी भी मुस्लिम को उसके मज़हब के चलते मारा है? या आधुनिक काल में भी आ जाएँ तो एक भी ऐसे हिन्दू-मुस्लिम दंगे का रिकॉर्ड है क्या जो हिन्दुओं ने भड़काया हो? या मुस्लिमों के गैर-हिंसक उकसावे पर भी हिन्दुओं ने हिंसा की हो?

फिर से मॉब-लिंचिंग का झूठ

‘मॉब-लिंचिंग’ पत्रकारिता के समुदाय विशेष का नया ‘वॉट अबाउट 2002’ बन चुका है- यह जानकर भी कि काठ की यह हांडी फिर नहीं चढ़नी, कोशिश जारी रहेगी। बार-बार मॉब लिंचिंग का नैरेटिव झूठा निकला, ‘हमसे जय श्री राम बुलवाया गया’ की कलई खुल रही है, लेकिन कोशिश बदस्तूर जारी है।

हिन्दुओं की हालत

अब ज़रा फातिमा द्वारा ही तय किए गए मानदंडों पर हिन्दुओं की हालत देख लें- फिर ही यह सोचा जा सकता है कि किसे देश में शोषण और प्रताड़ना का रोना रोने का अधिकार है।

सबसे पहले स्वच्छता की बात करें। लिबरल गैंग का ही पोर्टल है लाइवमिंट। उस पर 2014 में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हिन्दू बस्तियों की हालत स्वच्छता के मामले में मुस्लिमों से भी बुरी है- इतनी अधिक कि हिन्दुओं के घर शिशुओं की मौत भी गंदगी से हो जाती थी। यानि या तो गंदगी का हिन्दू-मुस्लिम कनेक्शन नहीं है, और हर गरीब, हर हाशिए पर पड़ा इंसान गंदगी में जीने के लिए मजबूर है, और नहीं तो अगर गंदगी को साम्प्रदायिक एंगल देना ही है तो रोना रोने का अधिकार तो हिन्दुओं को है!

अगर बात गलत आतंकी हमले के आरोप में ज़िंदगी बर्बाद होने की करें तो बेशक उन 11 आरोपितों के साथ गलत हुआ, लेकिन यही तो साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानन्द, और समझौता धमाकों के आरोपितों के साथ भी हुआ! उन्हें भी तो समझौता मामले में बरी कर दिया गया! उनके लिए फातिमा कूदीं पैरवी में कि इनकी ज़िंदगी महज़ शक में जेल में सड़ा कर बर्बाद मत करो, अदालत का फैसला आने दो? उनका लेख जिस पोर्टल में छपा, उसके सम्पादक शेखर गुप्ता बिना साध्वी प्रज्ञा पर मालेगाँव का आरोप साबित हुए उन्हें शर्म का विषय कहते हैं। इस पर फातिमा का क्या कहना है?

फातिमा सरकारी मशीनरी की बात करना चाहतीं हैं? जिस सरकारी मशीनरी को वह महज़ दो घटनाओं के चलते अपनी पूरी कौम के खिलाफ खड़ा मान रहीं हैं, वही मशीनरी सबरीमाला, तिरुपति बालाजी समेत हिन्दुओं के हज़ारों मंदिरों को निगल चुकी है। RTE का बोझ केवल हिन्दू शैक्षिक संस्थान उठा रहे हैं- मुस्लिमों के मदरसे इससे आज़ाद हैं। सरकारी AMU और जामिया मिलिया इस्लामिया आरक्षण देने से मना करते हैं और उसके पक्ष में तोड़-मरोड़ कर कुतर्क देते हैं। केवल हमारे गुरुओं, पूजा-परम्पराओं पर ‘वैज्ञानिकता’ की आड़ में हमला ‘fair game’ और ‘free speech’ होता है। तबरेज़ और इकलाख की मौत पर मीडिया से लेकर प्रधानमंत्री तक सब बोले, भारत यादव और मंगरू का नाम भी आपको पता है?

कड़वा सच यही है फातिमा खान जी कि इस देश पर लगभग 1000 साल तक राज करने और उसके बाद से आज तक हर एक सरकार की आँखों के तारे बने रहने के बाद भी मुस्लिम पिछड़ा है, ‘डरा हुआ’ है तो उसे अपने अंदर ही झाँक कर देखने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों है? यही नसीरुद्दीन शाह ने कहा था, जिन्हें आपने आड़े हाथों ले लिया; यही आरिफ मोहम्मद खान ने कहा, जिनपर आप हमलवार हो गईं; और यही बात उस लेख में कही गई थी, जिसके जवाब में आपने यह झूठा विषवमन किया है।