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पश्चिम बंगाल: 8वीं के बच्चे पढ़ रहे ‘आतंकी’ थे खुदीराम बोस

पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था की पोल खुलती नज़र आ रही है। वहाँ आठवीं कक्षा की पुस्तक में स्वतन्त्रता सेनानी खुदीराम बोस को आतंकी बताया गया है। खुदीराम बोस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में भाग लिया था, जिसके कारण उन्हें मात्र 18 वर्ष की आयु में अंग्रेजों ने फाँसी दे दी थी। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में जन्मे बोस को उन्हीं के राज्य में ‘आतंकी’ बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर पुस्तक के उस भाग की तस्वीरें वायरल हो गईं, जिसके बाद लोगों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को निशाने पर लिया। राज्य में लापरवाह शिक्षा विभाग ने अमर क्रांतिकारी को आतंकी बता दिया!

माध्यमिक शिक्षा परिषद के अधिकारियों ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है। मामले की जाँच के लिए राज्य सरकार ने इतिहासकार जीवन मुखर्जी के नेतृत्व में एक कमिटी गठित की है, जिसमें हिन्दू स्कूल और हेयर स्कूल के प्राध्यापकों को भी रखा गया है। शिक्षाविद पवित्र सरकार भी इस टीम का हिस्सा हैं, जो पूरी पुस्तक की समीक्षा करेगी और ग़लतियों को सुधारेगी। हालाँकि, इतिहास की इस पुस्तक को तैयार करने वाले निर्मल बनर्जी ने कहा कि ब्रिटिश सरकार ने खुदीराम बोस को ‘आतंकवादी’ कहा था, इस पाठ में उसीका उल्लेख किया गया है। उन्होंने बताया कि इतिहास से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।

आरोप है कि इतिहास लिखने वाले कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों व राजाओं को लेकर आक्रांताओं के विचारों को बढ़ावा दिया है। बंगाल में हाल ही में पाठ्यक्रम में बदलाव किया गया है, जिसमें ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए सिंगुर आंदोलन के अलावा उनके द्वारा किए गए अन्य आन्दोलनों को जगह दी गई है। कई ऐसी पुस्तकों के सामने आने की ख़बर है, जिसमें भारतीय विभूतियों को ग़लत तरीके से पेश किया गया है। इससे पहले एक निजी स्कूल की पुस्तक में मिल्खा सिंह की जगह उन पर बनी फ़िल्म में उनका किरदार अदा करने वाले फरहान अख्तर की ही फोटो लगा दी गई थी।

कौन थे खुदीराम बोस?

बंगाल से आने वाले स्वतन्त्रता सेनानी खुदीराम बोस मात्र 18 वर्ष की उम्र में देश के लिए फाँसी के फंदे पर झूल गए थे। श्री अरबिंदो और सिस्टर निवेदिता ने जब मेदनीपुर का दौरा किया था, तब खुदीराम उनके विचारों से काफ़ी प्रभावित हुए थे। उन्होंने भारतियों पर अत्याचार करने वाले कई अंग्रेज अधिकारियों को निशाना बनाया था। वह क्रन्तिकारी संगठन अनुशीलन समिति का हिस्सा थे। जब खुदीराम बोस को अंग्रेजों ने गिरफ़्तार किया था, तब उनके बारे में सुन कर उन्हें देखने के लिए बड़ी भीड़ जमा हो गई थी। कहते हैं, खुदीराम बोस को जब फाँसी पर लटकाया जा रहा था, तब भी उनके चेहरे पर हँसी थी।

धोनी जैसी गंदगी हमेशा नहीं रहेगी, अंबाती रायडू तुम फिर से खेलो: योगराज सिंह

क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह अक्सर महेंद्र सिंह धोनी को लेकर अपनी नाराजगी जताते रहते हैं। हाल ही में इंटरनेशनल क्रिकेट से रिटायरमेंट लेने वाले युवराज के पिता ने एक बार फिर धोनी को लेकर बड़ा बयान दिया है। पूर्व भारतीय क्रिकेटर योगराज सिंह ने अंबाती रायडू के संन्यास को लेकर धोनी पर निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा है कि वे रायडू के संन्यास लेने के फैसले से काफी दुखी हैं और उन्होंने जल्दबाजी में ये फैसला किया।

एनएनआईएस स्पोर्ट्स से बातचीत करते हुए योगराज सिंह ने कहा, “अंबाती रायडू को खेलते रहना चाहिए था। उसमें अभी भी क्रिकेट बाकी है। रायडू मेरे बच्‍चे तुमने जल्‍दबाजी में फैसला लिया है। संन्‍यास से वापस आओ और उन्‍हें अपनी काबिलियत दिखाओ।” इसके साथ ही युवी के पिता ने धोनी को निशाने पर लेते हुए कहा, “रायडू तुम वापस आओ। एमएस धोनी जैसे लोग हमेशा नहीं रहते, उसके जैसी गंदगी हमेशा नहीं रहेगी।”

योगराज ने अंबाती से अपील की है कि वो अपने फैसले को वापस लें और घरेलू क्रिकेट में रन बनाकर खुद को साबित करें। दरअसल, अंबाती रायडू ने क्रिकेट को हाल ही में अलविदा कह दिया था, इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि वो विश्व कप टीम में जगह ना मिलने से आहत थे।

भारत के लिए एक टेस्ट मैच और 6 वनडे खेलने वाले योगराज सिंह ने रायडू के संन्यास का कारण महेंद्र सिंह धोनी को बताया है। उन्होंने कहा कि सौरव गाँगुली युवाओं को मौका देते थे, जबकि धोनी ने ऐसा नहीं किया। योगराज ने कहा कि रायडू को खेलते रहना चाहिए था और उन्हें घरेलू क्रिकेट में रन बनाकर खुद को साबित करना चाहिए, क्योंकि उनमें अभी काफी क्रिकेट बाकी है।

एनएनआईएस स्पोर्ट्स से योगराज सिंह की बातचीत आप इस वीडियो में सुन सकते हैं –

व्यक्तिगत रूप से हम हिन्दू सभ्यता को बचाए रखने के लिए आखिर क्या कर सकते हैं?

सदियों से ब्रिटिश शासकों एवं इस्लामिक आक्रांताओं द्वारा आक्रमण और दमन का दौर झेलने के बाद कुछ दशक पहले ही हिंदू सभ्यता ने राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल करके दोबारा साँस भरनी शुरू की थी, लेकिन अब लगता है शायद फिर से यह अंधकार की ओर जाने की कगार पर है।

इस पीढ़ी के अधिकांश लोगों के लिए उस संघर्ष, कठिनाई, और उत्पीड़न की कल्पना भी कर पाना असंभव है जो हमारे पूर्वजों ने शत्रुतापूर्ण और असहिष्णु राजनीतिक शासन के अधीन रहकर झेला है। लेकिन यह एक विडम्बना है कि हमारी वर्तमान ‘सेक्युलर’ शिक्षा न केवल हमारे उस कल पर लीपापोती कर बनी है, बल्कि वास्तविक अतीत तक जाने में हमारे सामने सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ी है।

अगर ऐसा नहीं होता तो आज हम सामाजिक, राजनैतिक और सभ्यागत मोर्चों पर इस्लामिक प्रभुत्व के फिर से उभरने के संकेतों को स्पष्ट देख पाते। खुद सोचिए, हमारे मंदिर उस समय भी तोड़े जाते थे, और आज भी तोड़े जाते हैं; हमारी औरतों के साथ तब भी बलात्कार होता था और आज भी होता है; हिन्दू तब भी संकट में थे और अब भी हैं। उस समय भी हमारे पूर्वज जजिया देते थे, वह भी दूसरे-तीसरे दर्जे के नागरिक बन कर जीने के लिए, और अब भी देश की बहुसंख्यक आबादी जजिया-2.0 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के लिए विशिष्ट स्कीमों को वित्तपोषित करती है। आज हिंदुओं के ख़िलाफ़ छोटे स्तर पर होते जिहाद की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, और हाल ही में हिंदुस्तान के ‘दिल’ नई दिल्ली में दुर्गा मंदिर पर हुए हमले इस बात का पुख्ता सबूत है कि हमलावर दिन-ब-दिन कितने बेख़ौफ़ होते जा रहे हैं।

इन सीधे-सीधे हमलों में अगर ईसाईयों द्वारा अपने पंथ का आक्रामक प्रचार, आदिवासी इलाकों का तेजी से ईसाइकरण, भारत को तोड़ने और हिंदूवादी ताकतों को उखाड़ने के लिए हिंदुओं की सभ्यता और संस्कृति पर हुए हमलों को जोड़ दिया जाए तो पता चलेगा कि इस सभ्यता के दोबारा अंधकार में जाने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है- अगर हिन्दू अपनी सभ्यता पर मँडराते इस खतरे को पहचान कर इसके खिलाफ कदम नहीं उठाते हैं।

मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि हम हिंदू व्यक्तिगत रूप से इस स्थिति के बारे में क्या कर सकते हैं? हम सबके पास अपनी नौकरी की चिंता है, अपना परिवार है। इसके अलावा हमारे पास एकता नहीं है, न ही धन है, और न ही कुछ करने की राजनीतिक शक्ति।

हालाँकि, यह सच है कि व्यक्तिगत रूप में हमारे साधन सीमित हैं, और यह भी सच है कि इन ज्वलंत मुद्दों को दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है, जो दुर्भाग्य से वर्तमान सरकार हिंदू जनादेश पर सत्ता में आने के बावजूद न केवल नहीं कर रही है, बल्कि उसकी जगह ‘सबका विश्वास’ के नाम पर तुष्टिकरण की नीतियों की घोषणा कर रही है, मगर उतना ही सत्य ‘यथा राजा तथा प्रजा’ का लोकतांत्रिक उलट ‘यथा प्रजा, तथा राजा’ है। इसलिए इस महान हिंदू सभ्यता के व्यक्तिगत उत्तराधिकारियों के रूप में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने-अपने स्तर पर इसका उत्कर्ष करें।

‘कौरवों’ की पहचान

किसी भी काम को करने में पहला कदम उसमें निहित चुनौतियों को पहचानना है। इन चुनौतियों को हम भिन्न-भिन्न प्रकार के ‘कौरवों’ के रूप में सोच सकते हैं। हिंदू संरचना में हम जीवन और समाज को समझने के लिए धर्म-अधर्म की श्रेणियों का प्रयोग करते हैं। महाभारत में हम ऐसे चित्रणों को पाएँगे जिनमें कई प्रकार की अधर्मी ताकतें स्पष्ट होतीं हैं।

सबसे पहले दुर्योधन, जो अधर्म का अवतरण था- धर्मराज युद्धिष्ठिर का प्रतिद्वंद्वी। दूसरा कर्ण, जो दुर्योधन (अधर्म) की कुचालों में सक्रिय रूप से सहायक था; तीसरे भीष्म, जो न चाहते हुए भी दुर्योधन की तरफ से लड़कर अधर्म का साथ दे रहे थे; चौथे धृतराष्ट्र, जो बिना कुछ किए आँख बंद करके निष्क्रिय रूप से दुर्योधन के साथ खड़े होकर अधर्म के साथी थे।

हम इन सभी प्रकार के अधर्मियों को आज के समाज में देख सकते हैं। आज इस्लाम और ईसाईकरण जैसी धर्म-विरोधी ताकतें भारत और हिंदुत्व/हिन्दू-धर्म को तोड़ना चाहतीं हैं। मीडिया, एनजीओ, नौकरशाहों का गठजोड़ इन अधार्मिक ताकतों के लिए सक्रिय सहयोगियों का काम कर रहे हैं। फिर कुछ अनचाहे सहयोगी हैं, जिन्हें बल, धोखाधड़ी और अन्य साधनों का प्रयोग करके सहयोग करने के लिए ब्लैकमेल किया जाता है। और अंत में हमारे पास बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जो खुद को धोखे में रखकर, ‘धिम्मी, बने रहकर ‘सर्वधर्म समभाव’ का प्रोपेगैंडा आगे बढ़ाते हैं, और अंततः धृतराष्ट्र की भाँति अधर्म का प्रतिरोध न कर उसके सहयोगी ही बन जाते हैं ।

संक्षेप में कहूँ तो ‘कुछ नहीं करना’ बहुत लंबे समय तक विकल्प नहीं रहने वाला है। कुछ नहीं करना आपको हिंदू सभ्यता के विरोधियों का अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी बनाता है।

हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के लिए आवश्यक तीन P

ज़रूरी गतिविधियों के विस्तार को समझने के लिए हमें ’3-P मॉडल’ को समझने की आवश्यकता है। इसे मैंने अपने मेंटॉर श्री हरि किरण वदलामणि से सीखा है। वो इसका प्रयोग इंडिक अकादमी के कार्यकलापों की कल्पना करने के लिए और हिंदू मसलों को समझने के लिए करते हैं। मैं इसका विस्तार हिंदू सभ्यता के ज्वलंत मुद्दों पर कर रहा हूँ।

3-P: Preserve(संरक्षण), Protect (सुरक्षा), Promote(प्रचार/प्रोत्साहन)

संरक्षण– हिंदू सभ्यता के संरक्षण का तात्पर्य हमारी ज्ञान-प्रणालियों, परंपराओं, संस्थाओं और प्रथाओं को संरक्षित ही नहीं, समृद्ध करना भी है। इसलिए इन ज्ञान-परंपराओं (वेदाध्ययन, संगीत, नृत्य, नाटक, धार्मिक रिवाज, मंदिरों की प्रथाएँ, त्यौहार, कथाओं की प्रथाएँ, भाषा) के प्रति हमारी गहन प्रतिबद्धता, (समय, श्रम और धन का) निवेश और तन्मयता होनी चाहिए। हम हिंदू सभ्यता को जीवित रखने के लिए इन परंपराओं में से किसी भी विधा की साधना प्रारम्भ कर सकते हैं, जिससे हम उस परंपरा और विधा के सच्चे उत्तराधिकारी बन पाएँ और उसे संरक्षित कर अन्य लोगों और अपनी आगामी पीढ़ी तक पहुँचा पाएँ। सभ्यता का संरक्षण (Preservation) तीनों ‘P’ में शायद सबसे बुनियादी है, क्योंकि इसके बिना हम अपनी पहचान, अपना आत्म-बोध ही खो देंगे। हमारा मूल-स्वरूप ही सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।

सुरक्षा– हिंदू सभ्यता को बचाने का अर्थ हमारी संस्कृति और प्रथाओं को बाहरी के साथ भीतरी हमलों से भी सुरक्षित करना है। इसमें शामिल है हमारे आत्मसम्मान की सुरक्षा के साथ ही हमारे विश्वास और आस्था, ज्ञान और प्रथाओं को विकृत किए जाने, तोड़े-मरोड़े जाने से रोकना। यह हमले कई स्तरों पर होते हैं: शारीरिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक, कानूनी। हमें इन हमलों का सामना करने के लिए आवश्यक प्रतिक्रियाओं और रणनीतियों को विकसित करने के लिए अपने समय और संसाधनों का निवेश करने की आवश्यकता है।

प्रचार/प्रोत्साहन– हिंदू सभ्यता को बढ़ावा देने का तात्पर्य हमारी शिक्षा, सभ्यता और मूल तत्वों को बाहरी दुनिया में पहचान दिलाना है। प्रचार और प्रोत्साहन को ऐसे करना महत्वपूर्ण है जिसमें प्रामाणिक ज्ञान और प्रथाओं को मानवता की भलाई के लिए उपलब्ध कराया तो जाए ही, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि उन्हें (अथवा उनके हिन्दू धर्म से संबंध को) क्षीण कर अन्य पंथों/मज़हबों/सभ्यताओं द्वारा उनपर दावा किए जाने से रोका जा सके।

व्यक्तिगत तौर पर हिन्दू क्या कर सकते हैं?

हालाँकि, उपरोक्त तीनों ही बिंदु (संरक्षण, सुरक्षा और प्रचार/प्रोत्साहन) हिंदू सभ्यता के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर हर व्यक्ति यह तीनों कार्य नहीं कर सकता। अतः हर व्यक्ति को अपने क्षमता, स्वभाव, रुझान, योग्यता और संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर इनमें से उन एक या 2 बिंदु का चुनाव करना चाहिए, जिनको वह सबसे बेहतर तरीके से कर सकें। जरूरी यह नहीं कि हर व्यक्ति तीनों ही चीज़ें करे, लेकिन छोटे-से-छोटे कार्य को करने के दौरान भी “360-डिग्री दूरदर्शिता” होनी चाहिए। आप यद्यपि काम, उदाहरण के तौर पर, सुरक्षा के लिए कर रहे हों, तो भी संरक्षण और प्रचार/प्रोत्साहन के तत्व आपके जेहन में हों। ऐसी दृष्टि का अभाव हमारे लिए सही नहीं होगा।

इसका उदाहरण देखिए, म्यूनिख (जर्मनी) के इंडिएन इंस्टीटुट (इंडियन इंस्टिट्यूट) ने 4 जुलाई, 2019 को भरतनाट्यम पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसकी विषयवस्तु थी “Dancing body Dancing soul- Der tanzende Jesuit by Fr. Saju George” (नाचता शरीर, नाचता मन- नृत्यरत जेसुइट, फादर साजु जॉर्ज द्वारा)। ऊपरी तौर पर भरतनाट्यम का कार्यक्रम लग रहा है। यह असल में हिन्दुओं के पवित्र,धार्मिक नृत्य भरतनाट्यम के ईसाईकरण का ‘समारोह’ था। और इस समारोह की प्रचार सामग्री में यह स्पष्ट तौर पर लिखा था कि यह म्यूनिख में भारत के महावाणिज्यदूतावास के प्रायोजन से हो रहा था। यानि भारतीय संस्कृति और कला के संरक्षण और प्रचार के नाम पर भारत सरकार ने अधार्मिक ताकतों के ईसाईयों द्वारा हिन्दू कला का अपने पंथ में सम्मिश्रण (वह भी बिना उसके हिन्दू उद्गम को स्वीकार्यता या आभार दिए) करने में सक्रिय सहयोग दिया, जो अंततोगत्वा उस कला के हिन्दू रूप और उसके स्वरूप का विघटन ही होता। सौभाग्यवश वह कार्यक्रम अंतिम समय में रद्द कर दिया गया, सोशल मीडिया पर उसके विरोध में प्रदर्शन के बाद।

हर हिंदू के लिए जरूरी है कि वह अपने सीमित दायरे में हिंदू सभ्यता के लिए काम करते हुए भी सभ्यता के संघर्ष की बात भूले न। जैसे हिंदू सभ्यता के संरक्षण में शामिल व्यक्ति को भी संरक्षण और संवर्धन में शामिल चुनौतियों के बारे में जागरुक और सतर्क तो होना ही चाहिए। इसी तरह, हिंदू प्रथाओं के संरक्षण में शामिल एक व्यक्ति को उन प्रथाओं में मूलतः आधारित होना चाहिए। अन्यथा होगा यह कि हम उनकी रक्षा के नाम पर अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपनी प्रथाओं को खुद ही समाप्त कर देंगे! इसकी एक बानगी हिन्दुओं में ‘अनिवार्य सुधार’ की प्रवृत्ति है, जो हिन्दू प्रथाओं और परम्पराओं को एक-एक ईंट कर के विखण्डित कर रही है। एक हिन्दू युवती के गैर-हिन्दू पद्धति से विवाह को हिन्दू विवाह-परम्परा और व्यवस्था को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल करने का उदाहरण कुछ दिन पहले हमने देखा ही है। हिन्दू धर्म और प्रथाओं, परम्पराओं के प्रचार-प्रसार में शामिल लोगों को भी हमेशा सचेत रहना चाहिए कि हमारे ज्ञान और प्रणालियों को इतना धूमिल या व्यवसायीकृत न किया जाए कि उनके मूल रूप, उनकी आत्मा से छेड़-छाड़ होने लगे या वह क्षीण हो जाए।

इस सावधानी और जागरुकता के साथ हिंदू सभ्यता के संरक्षण, सुरक्षा और प्रचार-प्रसार के लिए हिंदू काफी कुछ कर सकते हैं। कुछ व्यावहारिक सुझाव निम्नलिखित हैं:

संरक्षण के मोर्चे पर:

  • यदि कोई व्यक्ति बौद्धिक प्रकृति या रुझान का है, तो वह शास्त्रों का अध्ययन कर सकता है।
  • इस तरह के अध्ययन को विभिन्न विशेषज्ञताओं के आधार पर विभाजित किया जा सकता है- मसलन वेदों का अध्ययन, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, इतिहास-पुराण, काव्य, व्याकरण, आयुर्वेद, लोक ज्ञान, आदि।
  • इन ज्ञान प्रणालियों के गहन अध्ययन, इसमें नए शोध, नई अंतर्दृष्टि/पहलुओं को जोड़ना और इन शिक्षाओं को हमारे समय के लिए प्रासंगिक और समकालीन बनाना बहुत महत्वपूर्ण है।
  • किसी भी कला-विधा, संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला, मूर्तिकला, लोक, शास्त्रीय कला को लिया जा सकता है; उसे लेकर उसके सिद्धांत और व्यवहार दोनों में महारत हासिल करनी होगी।
  • योग, ध्यान (meditation), आयुर्वेद, ज्योतिष, तंत्र, इत्यादि सभी हमारे पारम्परिक ज्ञान की विभिन्न धाराएँ हैं। इनमें से किसी को भी लिया जा सकता है। इनका अध्ययन हिंदू पारंपरिक ज्ञान के हिस्से के रूप में किया जाना चाहिए न कि परंपराओं से अलग-थलग अकेले विषयों के रूप में।
  • भक्ति और भावुक प्रकृति के लोग स्तोत्र, भजन, कथा-पाठ, कथा-पाठन आदि सीख सकते हैं।
  • आप गणित और विज्ञान में भी भारत की मृतप्राय पारम्परिक ज्ञान परम्परा को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
  • भाषा और साहित्य का संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसपर ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • अभिवावकों को हिंदू संस्कृति के बारे में खुद भी शिक्षित और अवगत होना चाहिए ताकि वह उसके बारे में अपने बच्चों को भी पढ़ा सकें।
  • इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि हिंदू अपनी सभ्यता से जुड़े ज्ञान परम्पराओं, प्रणालियों और प्रथाओं के संरक्षण और संवर्द्धन/प्रोत्साहन में रत वेद पाठशालाओं, थिएटर, कला, संगीत आदि के संगठनों को आर्थिक सहयोग करते रहें, जिससे संस्कृति को सुरक्षित रखा जा सके।

सुरक्षा के मोर्चे पर

  • हिंदुओं को खुद को मोहल्ला स्तरों पर संगठित करने की जरूरत है। ऐसे स्थानीय स्तर के आयोजनों के लिए व्यक्तियों को पहल करनी चाहिए।
  • इसकी शुरुआत के लिए एक-जैसे रुझान के लोग आपस में मिल कर स्थानीय स्तर पर गतिविधियों का एजेंडा तय कर लें। ऐसी जगहों पर आवश्यकता और इच्छानुसार दोस्तों, परिवारवालों और सहकर्मियों को भी लाया जा सकता है।
  • मोहल्ले में होने वाली ऐसी बैठकें हिन्दू-सभ्यता के और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर केंद्रित हों। ऐसी बातचीत में सिर्फ़ सैद्धातिंक बातें शामिल न होकर SWOT (Strength, Weakness, Opportunity, Threat; क्षमताएँ, कमज़ोरियाँ, अवसर और खतरे) का विश्लेषण और कार्यान्वन-उन्मुख योजनाएँ शामिल हों।
  • इन योजनाओं से हिंदू सभ्यता के संरक्षण के लिए कई अन्य रणनीतियों को भी निर्मित किया जा सकता है।
  • ऐसे प्रोग्राम बनाए जा सकते हैं जिनके जरिए हिंदू सभ्यता को संरक्षित, सुरक्षित रखने के लिए लक्ष्य तय किए जाएँ, जिन्हें नगरों से लेकर मोहल्ला-स्तर तक ले जाया जा सके।
  • सक्रिय हिंदू सामुदायिक समूहों का गठन विशेष रूप से जनसांख्यिकीय (demographically) तौर पर महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाना चाहिए ताकि विपरीत परिस्थितियों में हिंदू हितों की रक्षा की जा सके और विरोधी शक्तियों का मुकाबला किया जा सके।
  • जहाँ भी संभव हो, शारीरिक प्रशिक्षण, शारीरिक-फिटनेस और लड़ने के कौशल को सिखाना शुरू किया जाना चाहिए।
  • युवाओं को सभ्यता-संबंधी मुद्दों, हिंदू इतिहास, हिंदू दर्शन की उचित शिक्षा और इनके प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न करने की तत्काल आवश्यकता है।
  • सभ्यतागत मूल्यों की शिक्षा के अलावा हिन्दू अभिवावकों को अपने बच्चों- बेटियों और बेटों, दोनों को ही आत्म-रक्षा के लिए आवश्यक युद्धकला में भी निपुण बनाने के लिए प्रयास करना होगा। यह आत्म-रक्षा केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक और कथानक के स्तर पर भी सिखानी होगी।
  • मीडिया और ‘बौद्धिक’ वर्ग में हिन्दू धर्म का जो विकृत चेहरा पेश किया जा रहा है, उसे ठीक करने के लिए हिन्दुओं को अपनी सभ्यता के गहन पक्षों को भी समझना और उनका अध्ययन करना होगा।
  • एक समाज, एक समूह के तौर पर हम नैरेटिव बनाना और ज़मीनी स्तर पर सक्रियता में से किसी एक को नहीं चुन सकते- हमें दोनों की ही आवश्यकता है। लेक्चरों, वर्कशॉप्स (कार्यशालाएँ), किताबों पर परिचर्चा के कार्यक्रमों का भी आयोजन होना चाहिए।
  • हिंदुओं को यथासंभव सक्रियता से सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा बनना चाहिए। हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारे समुदाय का कोई व्यक्ति भूखा न रहे। इससे हमारे आस-पास के समाज में एकजुटता आएगी।
  • हिंदू परिवारों को अपनी आय का छोटा सा हिस्सा धर्मांश के रूप में दान करके उन संगठनों, लोगों और पहलों को बढ़ावा देने के लिए देना चाहिए जो हिंदू सभ्यता को बचाने के लिए कार्यरत हैं। यह दान हमारी सभ्यता के मूल्यों को सँजोने में रत गौशालाओं, वेद-पाठशालाओं, आश्रमों को दिया जा सकता है। ऐसे कुछ संगठन भी हैं, जैसे Upword, People for Dharma, Indic Collective, India Pride Project, इत्यादि।
  • हिंदुत्व/हिन्दू-धर्म को बचाने के लिए ‘एक्टिविज्म’ एक बहुत बड़ी आवश्यकता है। जो लोग कानूनी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उन्हें हिंदू समाज और सभ्यता के पक्ष में कानूनी सक्रियता दिखानी चाहिए। जो बौद्धिक क्षेत्र (मीडिया और अकादमिक) से जुड़े हैं उन्हें बौद्धिक स्तर पर सक्रियता दिखानी चाहिए और उन हिंदू-विरोधी आवाजों के ख़िलाफ़ अपनी आवाज उठानी चाहिए जो आज मीडिया के नाम पर उभर रही हैं। राजनीतिक रूप से सक्रिय लोग राजनीतिक रूप से हिन्दू-विरोध से लड़ सकते हैं। हिन्दू हितों की हिमायत स्थानीय, राज्य और राष्ट्र- तीनों स्तरों पर होनी चाहिए।

प्रचार-प्रसार/प्रोत्साहन के मोर्चे पर

  • हम बहुत सारी ऐसी गतिविधियाँ कर सकते हैं जिनसे हमारी ज्ञान की प्रमाणिकता से, अविकृत रूप में प्रचार हो- विशिष्ट पाठ्यक्रम, कार्यशालाएँ आदि।

ये महज़ कुछ उदाहऱण हैं जिन्हें हर हिंदू खुद के जीवन में कार्यान्वित कर सकता है। हर व्यक्ति हर कार्य नहीं कर सकता है, इसलिए जरूरी है कि हम अपनी क्षमता के अनुसार इनका चुनाव करें। हो सकता है कुछ लोग बौद्धिक स्तर की गतिविधियों को अच्छे से कर पाते हों जबकि कुछ भक्ति संबंधी। कुछ हो सकता है लोगों को संगठित करने में अच्छा कार्य करते हों, तो कुछ दूसरों को आत्म-रक्षा सिखाने में निपुण हों। हमें ऐसे सभी प्रयासों को एक दिशा देनी है जो तीन ‘P’ पर आधारित हों। ऐसा करके न केवल हम हिंदू सभ्यता को एक नया जीवन देंगे बल्कि उसे दोबारा निखारेंगे भी।

हालाँकि, संरक्षण एक बहुत लंबी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसे हम नकार नहीं सकते हैं, लेकिन फिलहाल हमारे सभ्यता को जिंदा रखने के लिए जो जरूरी है वो ये कि हम चुनौतियों का सामना करके अपनी सभ्यता को अधार्मिक, विरोधी ताकतों से सुरक्षित रख सकें। इसके लिए हमारे पास खुद को संगठित करने और खुद को शारीरिक, बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से लड़ाई के लिए तैयार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

सभ्यतागत संघर्ष को नकारना अब किसी भी हालत में सम्भव नहीं- इससे केवल सभ्यता को गर्त में धकेला ही जा सकता है। अब समय है कि हम उस खतरे को पहचानें जिसे हम ज़बरदस्ती नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं, और उस खतरे के निवारण के लिए कदम उठाएँ।

(लेखक नितिन श्रीधर के इंडियाफैक्ट्स पर प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद जयंती मिश्रा और सम्पादन मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

NIA ने जेएमबी के 3 आतंकियों को पकड़ा, कर्नाटक में धमाकों की योजना नाकाम

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) के 3 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है। ये कर्नाटक में कई जगहों पर धमाके को अंजाम देने की फिराक में थे। बेंगलुरु के सोलडेवनहल्ली से आतंकियों को गिरफ्तार किया गया। आतंकियों ने यहां बम बनाने का यूनिट खोल रखा था। मौके से आईइडी, हैंड ग्रेनेड और अन्य विस्फोटक सामग्रियां बरामद की गई। बरामद आईइडी पूरी तरह सक्रिय हालत में थे।

रिपोर्टों के मुताबिक, बर्धवान बम धमाके के आरोपी हबीबुर रहमान से एनआईए को जेएमबी के इस मॉड्यूल की जानकारी मिली थी। हबीबुर जनवरी 2019 से एनआईए की कस्टडी में है। हबीबुर से मिली जानकारी के आधार पर एनआईए ने 7 जुलाई को बेंगलुरु में कार्रवाई की।

अपने आतंकी मंसूबों को पूरा करने के लिए जेएमबी ने अरसे से कर्नाटक में ठिकाना बना रखा है। इससे पहले, पुलिस ने दो जिंदा बम बेंगलुरु से 50 किमी दूर रामनगर से बरामद किए थे। जमात से जुड़े 28 वर्षीय हबीबुर रहमान शेख उर्फ हबीबुर या शेख की कर्नाटक में गिरफ्तारी होने के कुछ घंटों बाद ही ये बरामदगी हुई थी।

शिकंजा कसने पर जेएमबी ने कुछ समय के लिए अपनी गतिविधियाँ बंद कर दी थी। लेकिन सलाउद्दीन अहमद और जहीदुल इस्लाम की अगुवाई में वह दोबारा पैर पसारने लगा है और अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने की फिराक में है। हाल ही में भारत सरकार ने जेएमबी को प्रतिबंधित किया है।

उत्तराखंड की यूनिवर्सिटी में धरना: छात्र अभी भी पढ़ रहे शीत युद्ध, रूस उनके लिए है महाशक्ति

"और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे"

ये पंक्तियाँ क्रांति के कवि कहे जाने वाले मशहूर कवि अवतार सिंह संधू “पाश” की लिखी हुई हैं। उत्तराखंड के एक विश्वविद्यालय में धरने पर बैठे छात्रों की माँगों को देखकर पाश को याद करना जरूरी है। हमने आज तक पानी, जमीन, रोजगार आदि-आदि के लिए लोगों को संघर्ष करते सुना और देखा है। लेकिन, आन्दोलनों और शहादतों से बने इस उत्तराखंड राज्य के ये छात्र जिसकी माँग कर रहे हैं, वह ‘किताब क्रांति‘ है।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक यूनिवर्सिटी के छात्र पिछले 22 दिनों से लगातार धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार शिक्षा के नाम पर बजट में बात कर रही है। ऐसे में यह भी स्पष्ट होता है कि भारत देश में घोषणाओं और हक़ीक़त के बीच कितना बड़ा फासला है। ख़ास बात यह है कि यह आंदोलन ऐसे समय में जन्म ले रहा है, जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्राथमिकता उत्तराखंड को ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ बनाने की है।

यह भी सच्चाई है कि संसाधन विहीनता उत्तराखंड का पर्याय है। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह संसाधन विहीनता उत्तराखंड के नेताओं और प्रशासन के लिए एक ढाल और आसान विकल्प तैयार करने लगी हो!

शिवम पांडे पीएचडी की तैयारी कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवम पांडे बताते हैं –

“उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में पिछले 22 दिनों से कॉलेज के छात्र धरने पर बैठे हुए हैं। 17 जून से धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी छात्र गाँधीवादी तरीके से पढ़ने के लिए पुस्तकें और पढ़ाने के लिए पर्याप्त टीचरों की माँग कर रहे हैं। कुमायूँ विश्वविद्यालय के इस दूसरे सबसे बड़े कॉलेज की लाइब्रेरी में नई पुस्तकों के साथ पर्याप्त शिक्षको की कमी है। वर्तमान में यहाँ पर छात्र 90 के दशक की पुस्तकों को पढ़ने के लिए मजबूर हैं, तो वहीं शिक्षको की कमी से भी जूझ रहे हैं।”

वहीं, धरने पर बैठे राजनीति विज्ञान के छात्र मोहित का कहना है –

“हमारे पास पर्याप्त किताबें नही हैं। हमें एक या दो ही पुस्तकें मिल पाती हैं। इस बार हमें जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पुस्तक मिली है, उसमें शीत युद्ध अपने चरम पर है। सोवियत संघ का विघटन हुआ ही नहीं है और बर्लिन की दीवार अभी गिरी नही है। मैं पिछले 3-4 साल से इसी स्थिति में पढ़ता आ रहा हूँ। मैं इस आंदोलन में इसलिए बैठा हूँ कि मेरा आने वाला भविष्य खराब न हो।”

पिछले 22 दिनों से पिथौरागढ़ महाविद्यालय के छात्र पुस्तकों और शिक्षकों के लिए सड़क पर हैं। पोस्टर और बैनरों की मदद से आम लोगों तक अपनी बातें पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। आम लोगों के जेहन में ये बात पहुँचाने की कोशिश की जा रही है कि एक आवाज बनकर ही बदलाव लाया जा सकता है।

कुछ दिन पहले इन छात्रों ने एक मौन आन्दोलन शुरू किया, एक बैनर पर एक नारा था, “उम्मीद है, इसलिए चुप हैं।” इस उम्मीद का ये बाईसवाँ दिन है। विश्वविद्यालय के से लेकर सरकारी तंत्र भी इस विषय पर मौन है। छात्रों के साथ-साथ अब अभिभावक भी इस आंदोलन का हिस्सा बन चुके हैं।

इसी विश्वविद्यालय की एक छात्रा का कहना है कि यह कॉलेज कुमायूँ यूनिवर्सिटी का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा कॉलेज है। यहाँ पुस्तकों के अलावा शिक्षको की भी भारी कमी है। 40 से भी कम शिक्षक हैं जिससे न तो सही ढंग से क्लास लग पा रही हैं और न ही कोर्स कम्प्लीट हो पा रहे हैं। कई-कई विभाग तो ऐसे हैं, जिसमें एक या दो टीचर पूरे डिपार्टमेंट को संभाले हुए हैं। पुस्तकालय की हालत ऐसी है कि वहाँ पर 3 साल हो गए सेमेस्टर सिस्टम को लगे हुए लेकिन अभी तक सेमेस्टर सिस्टम की किताबें नहीं आई हैं।

छात्रों का कहना है कि वो अभी 90 के दशक की पुस्तकें पढ़ रहे हैं जो अधूरी हैं। कॉलेज में प्रयोगशाला की हालत इतनी खराब है कि विज्ञान जैसे विषय भी किताबी ज्ञान पर चल रहे हैं और अधिकतर छात्र-छात्राओं को किताबें भी उपलब्ध नहीं हो पातीं।

उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था यूँ तो हमेशा से ही बदहाल रही है और इसके लिए जिम्मेदार यहाँ की भौगौलिक स्थिति को ठहराया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह लगातार बनी हुई बदहाली सिर्फ और सिर्फ नकारा शासन और प्रशासन की कमजोर इच्छाशक्ति का नतीजा है। उत्तराखंड में यह एकमात्र ऐसी यूनिवर्सिटी नहीं है जो संसाधन विहीन है और जिसमें सुधार की आवश्यकता है, बल्कि लगभग हर दूसरे शिक्षा के केंद्र का यही हाल है।

बात चाहे प्राथमिक विद्यालय की हो, या फिर विश्वविद्यालय की हो, कमजोर इच्छाशक्ति के लोग और शासन की प्राथमिकताओं के कारण उत्तराखंड के छात्रों की कई पीढ़ियाँ इसका परिणाम भुगत चुकी हैं और पिथौरागढ़ में चल रहा यह आंदोलन इस बात का सबूत है कि आगामी भविष्य भी अन्धकार में ही कटने वाला है। इस सबके बीच यह सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात है कि उत्तराखंड राज्य लगातार 2 लोकसभा चुनाव में 5 की 5 लोकसभा सीटें भाजपा के नाम करता आया है।

“ना किताब हैं, ना मास्साब हैं, तो फिर क्या हैं?” स्थानीय कुमाउँनी बोली में लिखा गया एक पोस्टर
“हम लड़ते आए हैं जवानों, हम लड़ते रहेंगे”

इस बार उत्तराखंड के ही रमेश पोखरियाल निशंक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाल रहे हैं, क्या वो इस किताब क्रांति को आधार बनाकर सारे उत्तराखंड के लिए कोई ऐसा ठोस कदम उठा सकते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के शब्दकोश में ‘पहाड़ यानी अभाव’ जैसे जुमले गायब हो सकें?

फिलहाल, यह आंदोलन जारी है और छात्र अपने शिक्षक-पुस्तक की माँग पर डटकर खड़े हैं। देखना यह है कि शासन-प्रशासन मिलकर उत्तराखंड राज्य के इस विश्वविद्यालय के साथ-साथ पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए क्या प्रयास कर सकते हैं।

हौज़ काज़ी दुर्गा मंदिर ध्वंस मामला: भुगता हिन्दुओं ने फिर भी समुदाय विशेष को पीड़ित मान रहा FactChecker

30 जून को इस्लामी भीड़ ने पुरानी दिल्ली के हौज काजी इलाके के लाल कुआँ स्थित एक दुर्गा मंदिर में तोड़-फोड़ की। विवाद की शुरुआत पार्किंग को लेकर झगड़े से हुई जो जल्द ही हेट क्राइम में तब्दील हो गई। इसमें कोई शक नहीं कि उस रात और उसके बाद जो कुछ हुआ उसका खामियाजा केवल हिन्दुओं को भुगतना पड़ा। हिंसा में शामिल सभी लोग समुदाय विशेष थे। इसके बावजूद ऑनलाइन फैक्ट-चेकिंग का दावा करने वाली FactChecker.in ने अपने Hate Crime Watch डेटाबेस में समुदाय विशेष को भी इस घटना का पीड़ित बताया है।

साभार: स्वाति गोयल-शर्मा (स्वराज्य पत्रिका)

फैक्टचेकर ने दावा किया है कि इलाके में तनाव 2 जुलाई को बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद की बाइक रैलियों से फैली। उन्होंने दुसरे मजहब के लोगों को हेट क्राइम पीड़ितों की श्रेणी में रखा है और हिन्दुओं को कथित तौर पर साजिशकर्ता बताया है, जबकि मंदिर पर हमला कर मूर्तियों को तोड़ा गया। वास्तविकता यह है कि 30 जून को दुर्गा मंदिर में तोड़-फोड़ के बाद से ही तनाव चरम पर था। लेकिन, उनका कहना है कि सुरक्षा बलों की मौजूदगी से बाजार में हालात सामान्य हो रहे थे। जबकि, प्रत्यक्ष तौर पर हिंसा नहीं होने का मतलब हालात सामान्य होना नहीं है।

मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध कोई हेट क्राइम नहीं होने पर भी फैक्टचेकर ने उन्हें इस मामले में पीड़ितों में शामिल किया है, जबकि इस हिंसा में उनके शामिल होने को लेकर कोई संदेह नहीं है। यह बताता है कि कैसे एजेंडे के तहत फैक्टचेकिंग वेबसाइटें मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए काल्पनिक नैरेटिव गढ़ कर प्रोपेगंडा फैलाती हैं।

ऑपइंडिया नियमित तौर पर फैक्टचेकर के हेट क्राइम वॉच के संदिग्ध पहलुओं को उजागर करता रहता है। स्वराज्य पत्रिका की स्वाति गोयल शर्मा ने भी कई मौकों पर इस नैरेटिव को उजागर किया है। कई मौकों पर फैक्टचेकर ने जानबूझकर तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा ताकि अपने डेटाबेस में मुस्लिम पीड़ितों की संख्या बढ़ा सके। इसके लिए उसने उन मामलों को भी शामिल किया जहाँ पीड़ित और अपराधी दोनों ही मुस्लिम थे।

इस संस्थान ने कुछ ऐसे मामलों को भी हेट क्राइम डेटाबेस में महज इसलिए शामिल कर रखा है, क्यूँकि कथित तौर पर पीड़ित मुस्लिम और गुनहगार हिन्दू थे, जबकि बाद में ये मामले गलत साबित हो चुके हैं। फैक्टचेकर वालों के हिसाब से पुलवामा आतंकी हमला हेट क्राइम नहीं था, जबकि आतंकवादी ने खुद ‘गौ-मूत्र पीने वालों’ पर हमला करने की बात कही थी। यह दूसरी बात है कि दुराग्रही एजेंडे और संदेहास्पद ट्रैक रिकॉर्ड के बावजूद फैक्टचेकर को हाल ही में उसके ‘हेट क्राइम डेटाबेस’ के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है।

डियर सेकुलरों, जिन्हें बाँधकर गौ माता की जय बुलवाया गया, वे ‘सिर्फ़ 25 लोग’ नहीं… बल्कि गौ तस्कर थे

मध्यप्रदेश के खांडवा जिले से कुछ दिन पहले खबर आई थी कि 7 जुलाई को वहाँ कुछ ग्रामीणों ने 22 गायों को ले जा रहे 8 वाहनों के साथ 25 गौ तस्करों को पकड़ा और फिर उन्हें रस्सी से बाँध दिया। गाँव वालों ने इसके बाद उन्हें सड़क पर बिठाया और उनसे ‘गौ माता की जय’ के नारे लगवाए। इतना ही नहीं, गुस्साए ग्रामीणों ने इस दौरान 2 किलोमीटर दूर स्थित पुलिस थाने तक इन गौ तस्करों की परेड भी करवाई। बाद में पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए इन गौ तस्करों के वाहन, और पशु समेत कुछ कीमती गहने और रुपए जब्त करके पुष्टि की कि हिरासत में लिए गए लोगों के पास न तो पशुओं को ले जाने की अनुमति थी और न ही ऐसे कोई भी दस्तावेज..। इस मामले में पुलिस ने ग्रामीणों पर भी मामला दर्ज किया था क्योंकि वे लोग आरोपितों को सीधे थाने नहीं लाए थे।

अब इस खबर में जहाँ हर एंगल स्पष्ट था वहाँ कुछ लोगों ने इस को हिंदुओं द्वारा की मॉब लिंचिंग का चेहरा देने की कोशिश की। अलग-अलग मीडिया हाउस से लेकर, पत्रकारों और राजनेताओं ने इस पूरे मामले में इस तथ्य को छुपाने का प्रयास किया कि ग्रामीणों द्वारा पकड़े गए ये 25 लोग ‘गौतस्कर’ थे। इन लोगों ने अपनी बातों के जरिए ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कि ये 25 लोग निर्दोष हैं, जो सिर्फ़ वाहन के जरिए गायों को ले जा रहे थे और गाँव वालों ने उन्हें बेवजह पकड़कर प्रताड़ित किया।

वकील प्रशांत भूषण ने तो इस मामले में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को जोड़कर अलग तरीके से पेश करना चाहा और ग्रामीणों को बजरंग दल का बताया।

शेखर गुप्ता ने भी इस मामले को आगे पहुँचाना तो जरूरी समझा, लेकिन ये बताना जरूरी नहीं समझा कि जिन लोगों को ग्रामीणों ने पकड़ा वे गौ तस्कर थे।

अन्य मीडिया संस्थानों ने भी इस मामले को इस तरह पेश किया जैसे गायों को वाहनों के जरिए ले जाने वाले निर्दोष पशु व्यापारी थे, जिन्हें कुछ गौ रक्षकों ने पकड़ लिया और मिलकर प्रताड़ित किया।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में तो इस खबर को हिंदू-मुस्लिम एंगल देने का भी प्रयास किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि ग्रामीणों द्वारा पकड़े गए 25 लोगों में 7 लोग मुस्लिम थे, जबकि सच्चाई ये है कि पकड़े गए लोगों में अधिकतर हिंदुओं का होना और उनके साथ समान बर्ताव होना, इस बात का सबूत है कि पूरे मामले में हिंदू-मुस्लिम जैसा एंगल बिलकुल नहीं था।

खैर, ये सारे सबूत इसलिए ज्यादा हैरान करने वाले नहीं है क्योंकि जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है तबसे ‘हिंदुओं द्वारा मॉब लिंचिंग’ का एक नैरेटिव गढ़ा जाना और आपराधिक मामले में पकड़े गए आरोपितों पर लोगों द्वारा की गई कार्रवाई को ‘निश्चित’ एंगल देना आम हो चुका है

उपर्युक्त मामले में ग्रामीणों द्वारा कानून को हाथ में लेना किसी रूप में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता, लेकिन ये जरूरी है कि हम खबर को उचित तथ्यों के साथ दर्शकों और पाठकों के समक्ष पेश करें। क्योंकि मामले में एक भी बिंदु से की गई छेड़-छाड़ खबर की प्रमाणिकता पर सवाल तो उठाती ही है, साथ में समाज पर भी गलत प्रभाव छोड़ती है।

इसका हालिया उदहारण हम तबरेज की मौत के मामले से लगा सकते हैं। जहाँ तबरेज को लोगों की भीड़ ने चोरी के आरोप में मारना शुरू किया, लेकिन 4 दिन बाद जब पुलिस हिरासत में उसकी मौत हुई, तो इस एंगल को बिलकुछ छिपा लिया गया कि उसे लोगों ने चोरी के आरोप में मारा था, और जो नैरेटिव तैयार किया वह ये कि हिंदुओं की भीड़ ने मुस्लिम को मारा।

हम पाकिस्तानी हैं, पाकिस्तान हमारा है: भारत में रहने वाले अलगाववादी नेता का Video Viral

जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है। जिसमें वो ‘हम पाकिस्तानी हैं, पाकिस्तान हमारा है’ कहते सुने जा रहे हैं। बता दें कि यह वीडियो सैयद अली गिलानी के नाम से ही मौजूद एक गैर-वेरिफायड ट्विटर अकाउंट से 23 मई को शेयर किया गया था।

इस वीडियो में गिलानी एक रैली में भड़काऊ भाषण देते हुए सुने जा रहे हैं। वीडियो की शुरुआत में वो इंशाल्लाह, इंशाल्लाह का नारा लगाते हैं और लोगों से भी लगवाते हैं। फिर आगे वो कहते हैं, “इस्लाम के मोहब्बत से, इस्लाम के ताल्लुक से हम पाकिस्तानी हैं, पाकिस्तान हमारा है।” यह नारेबाजी काफी देर तक चलती रहती है। हालाँकि, अभी यह नहीं पता चल पाया है कि यह रैली कश्मीर के किस हिस्से में कब और कहाँ आयोजित की गई थी। इस वीडियो को देखकर रैली के आयोजन के वक्त और स्थान के बारे में बता पाना काफी मुश्किल है।

गौरतलब है कि हाल ही में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा था कि हुर्रियत नेता केंद्र सरकार से बातचीत को तैयार हैं। मलिक ने कहा था, “पहले हुर्रियत कॉन्फ्रेंस बातचीत के लिए तैयार नहीं थी। रामविलास पासवान (2016 में) उनके दरवाजे पर खड़े थे, लेकिन वे बातचीत के लिए तैयार नहीं थे। अब वे बातचीत को तैयार हैं और वार्ता करना चाहता हैं। सबमें बदलाव आया है।”

सत्यपाल मलिक के बयान के बाद जम्मू- कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी काफी एक्टिव नज़र आईं। उन्होंने हुर्रियत नेताओं की पैरवी करते हुए कहा था कि यदि वो (हुर्रियत) बातचीत के लिए तैयार हैं, तो भारत सरकार को उनके साथ बातचीत करनी चाहिए। महबूबा मुफ्ती पहले भी हुर्रियत के साथ बातचीत की पैरवी कर चुकी हैं।

वीडियो वायरल होने के बाद इस पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। लोगों का कहना है कि जब वह खुद यह कह रहे हैं कि वह पाकिस्तानी हैं तो उन्हें भारत में रहने का अधिकार नहीं, उन्हें पाकिस्तान भेज दिया जाए।

खुद की करनी से हारी पार्टी, 10% आरक्षण पर नहीं सुनी थी मेरी बात: कॉन्ग्रेस के पूर्व महासचिव

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद पार्टी नेताओं की आपसी खींचतान भी सामने आने लगी है। पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी भीतरी कारणों से हारी है। राहुल के इस्तीफे को आदर्श बताते हुए कहा है कि अन्य लोग जो जिम्मेदारी के पदों पर हैं उन्हें इससे सीख लेनी चाहिए। लेकिन, पार्टी अध्यक्ष के इस्तीफे के बाद भी स्थिति जस की तस है।

द्विवेदी ने कहा है की तकनीकी तौर पर राहुल अब भी पार्टी अध्यक्ष हैं और अपने उत्तराधिकारी के नाम का सुझाव देने के लिए उन्हें एक समिति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि मौजूदा वक़्त में अध्यक्ष के नाम पर अनौपचारिक चर्चा कर रही पैनल के मुकाबले यह समिति ज्यादा विश्वसनीय होगी। उन्होंने कहा है, “कार्यसमिति की बैठक बुलाकर अध्यक्ष के नाम पर जल्द फैसला किया जाना चाहिए।’

जनार्दन द्विवेदी ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस संगठन में उन्होंने पूरा जीवन लगाया, उसकी स्थिति देख कर पीड़ा होती है। उन्होंने कहा कि हार के कारण पार्टी के भीतर हैं, न कि बाहर। उन्होंने कहा कि पार्टी में कई ऐसी बातें हुईं, जिससे वो सहमत नहीं थे और उन्होंने इससे पार्टी नेतृत्व को अवगत कराया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने आर्थिक आधार पर आरक्षण की माँग की थी, तब पार्टी अध्यक्ष ने इससे किनारा कर लिया। बाद में जब मोदी सरकार 10% आरक्षण लेकर आई तो सारी पार्टियों ने चुप्पी साध ली। उनका कहना है कि भारतीयता और भगवाकरण को लेकर उनके विचार से पार्टी सहमत नहीं थी और फिर बाद में भारतीय संस्कृति से नजदीकी दिखाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए गए।

जनार्दन द्विवेदी सबसे लंबे समय तक कॉन्ग्रेस महासचिव रहे हैं। उन्होंने 5 कॉन्ग्रेस अध्यक्षों इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और सोनिया गाँधी के साथ काम किया है। द्विवेदी को सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का करीबी माना जाता है। उन्होंने 2018 में स्वेच्छा से रिटायरमेंट ली थी। 

जनार्दन ने कहा कि वे 15 सितंबर 2014 को सोनिया गाँधी को लिखे पत्र, जिसमें उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की थी, सार्वजानिक कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि जिस समाज, संगठन, देश में स्वतंत्र विचार और मुक्त आत्मा का स्वर नहीं सुना जाता, वो समाज, वो देश मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं रह सकता और वहाँ लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता।

RaGa ने लगाए We Want Justice के नारे, स्पीकर बोले- सदन को नगर निगम न बनाएँ

राहुल गाँधी आज सदन में अपने स्थान से बैठे-बैठे ही नारा लगाते देखे गए। 17वीं लोकसभा में राहुल गाँधी ने पहली बार नारेबाजी की। लोकसभा में मंगलवार (जुलाई 09, 2019) को कॉन्ग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर कर्नाटक में जेडीएस+कॉन्ग्रेस गठबंधन सरकार को सत्ता से हटाने के लिए ‘षड्यंत्र रचने’ और ‘शिकार की राजनीति’ करने का आरोप लगाया, जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘कॉन्ग्रेस के घर की समस्या’ कहते हुए खारिज कर दिया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि कॉन्ग्रेस सदस्यों को सोमवार को भी इस विषय को उठाने का मौका दिया गया था। इस बारे में कार्यस्थगन प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया है। इस पर कॉन्ग्रेस सदस्य अपने स्थान से ही नारेबाजी करने लगे। कुछ देर बाद कॉन्ग्रेस सदस्य आसन के पास आकर नारेबाजी करने लगे। कॉन्ग्रेस सदस्यों के साथ द्रमुक सदस्य भी आसन के समीप आकर नारेबाजी कर रहे थे।

इस दौरान राहुल गाँधी की माताजी सोनिया गाँधी भी सदन में मौजूद थीं। राहुल गाँधी को भी अपने स्थान पर बैठकर ‘वी वांट जस्टिस (हमें न्याय चाहिए)’ कहते सुना गया। उनके साथ ही सदन में कॉन्ग्रेस सदस्य ‘वी वांट जस्टिस’, ‘लोकतंत्र की हत्या बंद करो’, ‘शिकार की राजनीति बंद करो’ के नारे लगा रहे थे। इस पर लोकसभाध्यक्ष ने हंगामा कर रहे सदस्यों से कहा कि सभी को सदन की गरिमा और मर्यादा को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि सदन में वाद-विवाद करें, संवाद करें, चर्चा करें लेकिन नारेबाजी और तख्ती लेकर आना बंद होना चाहिए। ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने सदस्यों को बिना बारी भी बोलने की अनुमति दी है और सदन को नगर निगम जैसा बनाना ठीक नहीं है, पूरा देश आपको देख रहा है।

संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा, “नियम में स्पष्ट है कि अगर किसी विषय पर चर्चा हो चुकी है तब उस पर फिर चर्चा नहीं हो सकती है, इस विषय (कर्नाटक) को उठाया जा चुका है, रक्षा मंत्री जवाब दे चुके हैं। जोशी ने कहा कि कर्नाटक के मुद्दे से हमारा कोई लेना देना नहीं है। यह राहुल गाँधी के इस्तीफा देने के आह्वान के कारण हो रहा है। सदन में महत्वपूर्ण विधेयक आने हैं, चर्चा होनी है। यह पहला सत्र है और इस तरह से इसे बाधित करना ठीक नहीं है।”

दरअसल, कर्नाटक में जेडीएस-कॉन्ग्रेस सरकार गठबंधन के 13 विधायकों द्वारा राज्य विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय को इस्तीफा सौंपने के बाद प्रदेश सरकार संकट का सामना कर रही है। राज्यसभा में भी कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस सदस्यों ने हंगामा किया। इसके कारण मंगलवार को राज्यसभा की बैठक दो बार के स्थगन के बाद दोपहर दो बजे पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई।