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राज्यसभा चुनाव: अमित शाह गुजरात पहुँचे, विधायकों को लेकर ‘अज्ञात स्थान’ पर भागी कॉन्ग्रेस

आगामी राज्यसभा चुनावों को देखते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने विधायकों को किसी ‘सुरक्षित जगह’ पर भेज दिया है। कॉन्ग्रेस ने गुजरात के सभी पार्टी विधायकों को राज्य के उत्तरी क्षेत्र में किसी ख़ास जगह पर रखा है। पार्टी ने अंदेशा जताया है कि विपक्षी पार्टी उसके विधायकों को ख़रीदने की कोशिश कर सकते हैं। विधायकों को पहले तो बस से अम्बाजी ले जाया गया, जिसके बाद सभी को पास ही किसी रिसोर्ट में ठहराने की बात सामने आई है। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें राजस्थान के माउंट अबू भेजा गया है। लोकसभा चुनाव के दौरान कई विधायकों द्वारा भाजपा का दामन थाम लेने के बाद पार्टी चिंतित है

कॉन्ग्रेस अपने विधायकों को गँवाना नहीं चाहती और इसीलिए सब पर कड़ी नज़र रखी जा रही है। पार्टी ने यह निर्णय उन मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर लिया है, जिसमें कहा जा रहा था कि कॉन्ग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में जा सकते हैं। बता दें कि कॉन्ग्रेस में कई ऐसे विधायक हैं जो राज्य में पार्टी के नेतृत्व से ख़फ़ा चल रहे हैं और राज्यसभा चुनाव के दौरान उनके भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग करने की संभावना है। कॉन्ग्रेस ने चन्द्रिका चुडास्मा और गौरव पंड्या को उम्मीदवार बनाया है।

ज्ञात हो कि केंद्रीय विदेश मंत्री इस जयशंकर को गुजरात से ही राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया है। एक राज्यसभा सीट के लिए एस जयशंकर को उम्मीदवार बनाया गया है, वहीं दूसरे के लिए जुगलजी माथुरजी ठाकोर भाजपा उम्मीदवार होंगे। जेएम ठाकोर उत्तर गुजरात के नेता हैं और उन्हें सामाजिक उत्थान हेतु सक्रियता से किए गए कार्यों को लेकर जाना जाता है। चूँकि गुजरात से राज्यसभा सांसद रहे अमित शाह गाँधीनगर से जीत कर लोकसभा सांसद बन चुके हैं और उसी तरह स्मृति ईरानी अमेठी से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को हरा कर लोकसभा पहुँच चुकी हैं, गुजरात में इन दोनों की जगह भरी जानी है।

कॉन्ग्रेस नेता आश्विन कोतवाल ने कहा कि भाजपा उनके विधायकों को ख़रीदने की कोशिश कर रही है और हॉर्स ट्रेडिंग से बचने के लिए विधायकों को छिपाया गया है। विधायक अल्पेश ठाकोर भी बाग़ी हो चुके हैं। कॉन्ग्रेस ने अपने विधायकों से कहा है कि वे चुनाव खत्म होने तक सीएम विजय रुपानी, उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल या किसी अन्य मंत्री से न मिलें, भले ही जनता का ही कोई काम क्यों न हो। अगस्त 2017 में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान भी कॉन्ग्रेस ने अपने विधायकों को बंगलोर के एक रिसोर्ट में ठहराया था।

उधर कल बुधवार (जुलाई 3, 2019) को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी गुजरात में कई नेताओं से मुलाकात की। गुजरात पहुँचे भाजपा अध्यक्ष ने आयकर फ्लाईओवर का उद्घाटन किया। इसके बाद उन्होंने गुजरात विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। सरकार में पद संभालने के बाद यह उनकी पहली गुजरात यात्रा है। गाँधीनगर लोकसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने भाजपा की बड़ी जीत के लिए अमित शाह का सम्मान भी किया।

बच्चों के बीच झगड़े के बाद किस्मत अली व उसके दर्जन भर लोगों ने महिलाओं को पीटा, पुलिस पर पथराव

बहराइच में बच्चों के बीच हुए विवाद ने तब बड़ा रूप ले लिया, जब इसे लेकर मुस्लिम समाज के लोगों ने लाठी-डंडे से लैस होकर आतंक मचाया। दरअसल, कोतवाली नानपारा क्षेत्र के नूरीपुरवा गाँव में दो बच्चों के बीच कहासुनी हो गई। इस कहासुनी के बाद ‘विशेष समुदाय’ के लोगों ने न सिर्फ़ एक बच्चे के परिवार पर हमला बोल दिया, बल्कि सबकी पिटाई भी की। इस हमले में 6 लोग घायल हुए, जिसमें 4 महिलाएँ हैं। यहाँ भी पत्थरबाज़ी वाला ट्रेंड देखने को मिला और ‘समुदाय विशेष’ के लोगों ने पीड़ितों के घरों पर पत्थरबाज़ी भी की। यहाँ तक कि यूपी पुलिस को भी नहीं बख़्शा गया।

जब घटना की सूचना मिलने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस मौके पर पहुँची, तब पुलिस की गाड़ी पर भी पथराव किया गया। पुलिस ने जब हमलावरों को खदेड़ना शुरू किया तो वे गन्ने के खेतों का फायदा उठा कर भाग निकले। दोनों बच्चों के बीच बुधवार (जुलाई 3, 2019) को विवाद हुआ था। खेल-खेल में हुए इस विवाद को लेकर दोनों बच्चों ने अपने-अपने घरों में एक-दूसरे की शिकायत की। इसके बाद दोनों घरों की महिलाओं में कहासुनी हुई और बात हाथापाई तक भी पहुँची। हालाँकि, ग्रामीणों ने सही समय पर हस्तक्षेप करते हुए मामले को शांत करा दिया।

लेकिन, मामला शांत होने के बाद किस्मत अली दर्जन भर ‘अपने लोगों’ के साथ गाँव में पहुँचा, जिसमें शहीद और गोपासु नामक व्यक्ति भी शामिल था। उन्होंने लाठी-डंडे से लैस होकर तिलकराम के घर धावा बोल दिया। जब तिलकराम के परिजनों ने इसका विरोध किया, तब किस्मत अली व उसके लोगों ने तिलकराम के परिजनों की पिटाई की। महिलाओं तक को भी नहीं छोड़ा गया और उनकी भी पिटाई की गई। इस मामले में किस्मत अली समेत 20 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है।

हालाँकि, पुलिस ने बताया है कि गाँव में अब माहौल सामान्य है और तनाव की कोई स्थिति नहीं है। एएसपी रवींद्र सिंह ने पुलिस की गाड़ी पर पथराव की घटना से भी इनकार कर दिया। जानकारी के अनुसार, ग्रामीण पीड़ित परिजनों को बचाने मौके पर पहुँचे थे लेकिन हमलावरों के सनक को देख कर वे भी सहम गए।

112 अलगाववादी नेताओं के 210 बच्चे विदेश में जी रहे ऐशोआराम की ज़िंदगी, J&K के बच्चों को थमाते हैं पत्थर

जम्मू कश्मीर के अलगाववादी यूँ तो राज्य की कथित स्वतन्त्रता की वकालत करते हैं, आतंकियों की पैरवी करते हैं और विदेशों से करोड़ों रुपयों का चंदा इकट्ठा कर उसे भारत-विरोधी कार्य में लगाते हैं। लेकिन, क्या आप को पता है कि इन अलगाववादियों के बच्चे क्या कर रहे हैं? राज्य की जनता को बरगलाने वाले अलगावादी ख़ुद को उनका हितैषी दिखाते हैं लेकिन अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाते हैं। राज्य की शिक्षा व्यवस्था से लेकर चुनावों तक में खलल डालने वाले अलगाववादी जनता को इन सबके ख़िलाफ़ भड़काते हैं लेकिन अपने बच्चों की उच्च शिक्षा सुनिश्चित करते हैं। आइए हम आपको इनकी सच्चाई बताते हैं।

अमर उजाला में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, 112 अलगाववादी नेताओं के 210 बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं। कश्मीर के बच्चों के हाथों में क़िताब की जगह पत्थर देकर उनका भविष्य बर्बाद करने वाले ये अलगावादी ख़ुद के बच्चों के भविष्य को लेकर काफ़ी सजग हैं। 4 हुर्रियत नेताओं के 21 पुत्र, पुत्रियाँ, बहनें और बहुएँ अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, इरान, तुर्की, मलेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों में पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन यही अलगावादी राज्य के बच्चों का भविष्य अधर में लटका कर रखते हैं। उनके सभी परिजन विदेश में ऐशोआराम की ज़िंदगी जी रहे हैं।

दुख़्तरन-ए-मिल्लत की नेता आसिया अंद्राबी के बेटे ने मलेशिया में पढ़ाई की है और टेरर फंडिंग मामले में गिरफ़्तार ज़हूर वटाली ने उसका पूरा ख़र्च वहन किया था। एनआईए ने इस मामले में अंद्राबी से पूछताछ की। अंद्राबी ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया कि वह और उनका संगठन विदेश से रुपए जुटाता है और फिर कश्मीर में महिलाओं द्वारा प्रदर्शन कराने के लिए इन रुपयों का इस्तेमाल किया जाता है। हुर्रियत के पुराने नेता सैयद अली शाह गिलानी के बेटे ने पाकिस्तान से एमबीबीएस की पढ़ाई की है। इसी तरह कश्मीर की मस्जिदों में धमक रखने वाले अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फ़ारूक़ की बहन राबिया फ़ारूक़ भी डॉक्टर है और अमेरिका में रहती है।

इसी तरह एक अन्य कश्मीरी नेता बिलाल लोन का तो पूरा खानदान ही विदेश में रहता है। जहाँ उनकी बेटी-दामाद लंदन में रहते हैं, उनकी छोटी बेटी ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रही है। मुस्लिम लीग के मोहम्मद यूसुफ मीर और फारूक गतपुरी की बेटियाँ पाकिस्तान में हैं और वहीं पर मेडिकल की पढ़ाई कर रही है। इन अलगावादियों को पाकिस्तान से फंडिंग भी मिलती रही है, जिस सिलसिले में एनआईए जाँच कर रही है। डीपीएम नेता ख्वाजा फिरदौस वानी का बेटा भी पाकिस्तान में ही रहता है और वह भी मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। तहरीक ए हुर्रियत के अशरफ लाया की बेटी भी पाकिस्तान से ही मेडिकल की पढ़ाई कर रही है।

वाहिदत ए इस्लानी के निसार हुसैन राथर ने अपने बेटे-बेटी को ईरान भेजा हुआ है। तहरीक ए हुर्रियत के अध्यक्ष अशरफ सेहराई के तो दोनों ही बेटे सऊदी अरब में रह रहे हैं और वहाँ ऐशोआराम की ज़िंदगी जी रहे हैं। अमीर-ए-जमात के जीएम भट्ट का बेटा भी सऊदी में ही रहता है और वह डॉक्टर है। डीपीएम के मोहम्मद शफी रेशी का बेटा अमेरिका में पीएचडी की पढ़ाई कर रहा है। जबकि जहूर गिलानी का बेटा सऊदी अरब में रहता है और सऊदी एयरलाइंस में काम कर रहा है।

जब मैं 17 बरस की थी तो पंचोली ने मुझे ड्रग्स दी और मेरा रेप किया: कंगना रनौत

“जब मैं 17 साल की थी तो आदित्य पंचोली ने मेरे ड्रिंक में ड्रग्स मिला दी और बाद में कार में मेरा रेप किया। उसने मेरी तस्वीरें भी ले ली और मुझे ब्लैकमेल करता था।” यह बयान अभिनेत्री कंगना रनौत ने पुलिस को दिया है। इसी बयान के आधार पर बीते हफ्ते मुंबई पुलिस ने अभिनेता-निर्माता आदित्य पंचोली के खिलाफ रेप का मामला दर्ज किया था। यह घटना करीब दशक भर पुरानी है।

मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक कंगना ने ढाई पन्ने का बयान 26 जून को वर्सोवा पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया था। इसके आधार पर वर्सोवा पुलिस ने अगले दिन सेक्शन 376, 328, 384, 341, 342, 323, 506 के तहत मामला दर्ज किया था।

इससे करीब दो हफ्ते पह​ले कंगना की बहन रंगोली चंदेल ने वर्सोवा पुलिस को ई-मेल भेजकर शिकायत की थी। इसमें रंगोली ने विस्तार से बताया था कि किस तरह पंचोली ने कंगना को शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया।

बाद में पंचोली ने आरोपों को नकारते हुए कहा था कि निजी खुन्नस में कंगना उन्हें कानूनी तौर पर फंसाने की कोशिश कर रही है। रेप के मामले में गिरफ्तारी की आशंका से बचने के लिए उन्होंने कंगना और उनके वकील रिजवान सिद्दिकी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। साथ ही सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका भी दाखिल की थी। इसके दो दिन बाद दो जुलाई को मुंबई सिटी सिविल ऐंड सेशन कोर्ट के जज एचबी गायकवाड़ ने 30,000 रुपए के निजी मुचलके पर पंचोली को 19 जुलाई तक के लिए अग्रिम जमानत दे दी।

रनौत ने अपने बयान में बताया है कि जब वह 17 साल की थीं तो पंचोली ने उन्हें ड्रग्स दी और उनका रेप किया। बयान में उन्होंने यह भी कहा है कि पंचोली ने ब्लैकमेल करने के लिए उनकी तस्वीरें भी खींची थी। उन्होंने दावा किया था कि 2004-06 में उन्होंने एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी से इसकी शिकायत भी की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अपने बयान में कंगना ने बताया है कि वह कैसे बॉलीवुड पहुंचीं और पंचोली से मिलीं, जो उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री के एक चर्चित नाम थे। उन्होंने लिखा है, “जब मैं आदित्य पंचोली से मिली वह 38 साल का था। मुझसे करीब 22 साल बड़ा। उस वक्त मैं लड़कियों के साथ एक हॉस्टल में रहती थी, जबकि वह शादीशुदा और दो बच्चों का बाप था। उसकी बेटी भी मेरे उम्र की थी।”

बयान में कंगना ने पंचोली पर उनकी ड्रिंक में नशा मिलाने और कार में रेप करने का आरोप लगाया है। उन्होंने बताया है, “2004 मेंं मैं एक पार्टी में उसके साथ गई थी। एक ड्रिंक लेने के बाद मुझे चक्कर आने लगा। मुझे संदेह हुआ कि उसने पंचोली मेरे ड्रिंक में कुछ मिला दिया था। पार्टी समाप्त होने के बाद पंचोली ने कहा कि वह मुझे घर छोड़ देगा। मैं उसके साथ उसके रेंज रोवर कार में चली गई। यारी रोड के बीच में उसने कार रोकी और मेरे साथ जबरदस्ती करने लगा। उसने तस्वीरें भी ली, जिसका मुझे पता नहीं था। जब हम अगली बार मिले तो उसने कहा कि अब हमें पति-पत्नी की तरह रहना चाहिए। मैंने उससे कहा कि वह मेरी पिता की उम्र का है और मैं किसी हमउम्र के साथ शादी करना चाहती हूं। तब उसने मुझे वो सारी तस्वीरें दिखाई जो उसने कार में ली थी और मुझे ब्लैकमेल करने लगा। उसने ये तस्वीरें दूसरों को दिखाने की धमकी दी। उस वक्त मैं युवा थी, मेरा मुंबई में कोई नहीं था और उसने इसका फायदा उठाया।”

रनौत के मुताबिक 2004-06 के बीच पंचोली कई बार उनसे मिला और जबरन शारीरिक रिश्ते बनाने की कोशिश की। एक बार जब वह उसके खिलाफ शिकायत करने के लिए पुलिस स्टेशन जा रही थी तो उसने बीच रास्ते रोककर धमकी दी। एक राहगीर ने उन्हें उससे बचाया। बकौल कंगना, उन्होंने इसकी शिकायत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी विपिन भंडारी से मिलकर की थी।

उसने बयान में कहा है, “2004-2005 में मैं अपनी आंटी के पल्लवी अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गई। पंचोली हर वक्त उस फ्लैट में अपने दोस्तों के साथ आता और मेरे साथ जबर्दस्ती की कोशिश करता। हर बार वह मेरे ड्रिंक में मिलाने के लिए ड्रग्स लाता था। ड्रिक के बाद मुझे चक्कर आने लगता। जब वह मेरे अपार्टमेंट से जाता तो मुझे अंदर बंद कर देता। वह मुझे प्रताड़ित भी करता था। वह मुझे ड्रग्स देता और मेरी तस्वीरें खींचता। उस वक्त वह एमडीएमए वगैरह का इस्तेमाल करता था।”

अपने बयान में अभिनेत्री ने बताया है कि पंचोली ने उसके वर्सोवा फ्लैट की चाभी का भी जुगाड़ कर लिया था जहां वह 2006-07 में शिफ्ट हुई थी। यहां भी उसने नियमित तौर पर आना और उसे प्रताड़ित करना नहीं छोड़ा।

उससे आजिज आकर 2006-07 में मैंने वर्सोवा में एक फ्लैट खरीदा और अकेले रहने लगी। पंचोली यहां आया और डुप्लीकेट चाभी बना ली। मेरे कमरे में चोरी-छिपे वह घुसा और मुझे प्रताड़ित किया। उसने मेरे घर के सारे सामान तोड़ दिए और वह पूरी तरह नशे में धुत था। उसने मुझसे सारी चाभी छीन ली और मुझे अंदर बंद करके चला गया।

कंगना ने बताया है कि 2008-09 में वह बांद्रा के एक घर में शिफ्ट हो गई और अपनी बहन के साथ रहने लगी। यहां भी पंचोली आने लगा और उनकी बहन को भी प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उसने कहा है, “मेरी बहन उस वक्त स्वस्थ नहीं थी। पह मेरे पास रहने के लिए आई थी। एक बार जब मैं शूटिंग के लिए बाहर गई तो वह मेरे घर आया और मेरी बहन को बुरी तरह पीटा। घर लौटने पर मैंने अपनी बहन को बदहवास पाया। मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ तो उसने बताया कि पंचोली ने उसे बुरी तरह से पीटा है।”

कंगना ने अपने बयान में इस बात का भी उल्लेख किया है कि पंचोली ने उसकी बहन को परेशान नहीं करने के एवज में एक करोड़ रुपए की मांग की थी। उसने कहा, “उसने एक करोड़ की मांग की। मैंने उसे 50 लाख रुपए दिए भी और उसने कुछ वक्त के लिए हमें परेशान करना बंद कर दिया।”

रनौत के मुताबिक जब उसे स्टारडम मिल गया तो पंचोली ने फिर से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया और पुराने फोटो सबको दिखाने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगा तथा पैसों की मांग की।

इस मामले में 19 जुलाई को सुनवाई होनी है।

नहीं महुआ मोइत्रा, दक्षिणपंथी लोग नहीं, वामपंथी ‘आसहोल्स’ हर जगह होते हैं एक जैसे

महुआ मोइत्रा ने जो ‘बहुत ही क्रांतिकारी’ भाषण संसद के पटल पर दिया था, उस में कुछ लोगों को मार्टिन लॉन्गमैन के 2017 के उस लेख से समानता मिली, जो लॉन्गमैन ने ट्रम्प के अमेरिका का राष्ट्रपति निर्वाचित होने पर लिखा था। ज़ाहिर तौर पर यह समानता वायरल हो गई, और महुआ मोइत्रा पर ‘plagiarism’ यानि ‘बौद्धिक चोरी’ के आरोप लगने लगे। और इन आरोपों के जवाब में पहले तो लेखक मार्टिन लॉन्गमैन ने कूदते हुए महुआ मोइत्रा को ‘क्लीन चिट’ दे दी कि नहीं, महुआ ने नहीं की मेरे लेख से चोरी! (उन्होंने उसी म्यूज़ियम में लगी एक तख्ती पर यह पढ़ा जहाँ से उठा कर मैंने अपना लेख बना दिया) साथ ही उन्होंने लगे हाथ हिंदुस्तान के ‘राइट विंग’ को केवल ‘राइट विंग’ होने के कारण अपशब्द भी बोल डाले। उन अपशब्दों का लब्बोलुआब यह था कि हर देश के दक्षिणपंथी ‘एक जैसे’ होते हैं।

उसके बाद महुआ मोइत्रा भी ‘तलवार लहराते’ मैदान में आ डटीं और सार्वजनिक जीवन की सारी सभ्यता, सभी शिष्टाचार भुला कर उनके अपशब्दों को ज्यों-का-त्यों दोहराना शुरू कर दिया।

अपशब्दों के अलावा उन्होंने लगभग वही सब बातें दोहराईं जिन्हें गला फाड़कर चिल्लाते-चिल्लाते राहुल गाँधी की आज ‘संन्यास’ की नौबत आ गई है, भाजपा ने तृणमूल के गढ़ में सेंध नहीं लगाई है, बल्कि दीवार लगभग ढाह दी है, और ममता बनर्जी ‘मोन्जोलिका’ की तरह श्री राम का उद्घोष सुनकर लोगों पर झपट रहीं हैं। नई बात केवल एक आरोप है, और वह यह कि हर देश के ‘राइट विंग’ वाले एक जैसे होते हैं। इससे हास्यास्पद क्या हो सकता है कि वामपंथी, जिन्होंने एक ही मार्क्सवादी फॉर्मूले से रूस, चीन, पूर्वी जर्मनी, कम्बोडिया, क्यूबा, वेनेज़ुएला और न जाने कितने और मुल्कों में कत्लेआम मचाया है, वह अपने विरोधियों पर ‘एक जैसा’ होने का आरोप लगाएँ।

हर देश में ‘बराबरी’ के नाम पर बराबर खून-खराबा, बर्बादी और भ्रष्टाचार

अपनी ‘बराबरी’ की विचारधारा, ‘सर्वहारा के हित में, बुर्जुआ के ख़िलाफ़’ के नारे और हिंसा, कब्जा और पुनर्वितरण की विचारधारा का पालन करते हुए वह वामपंथ है, जिसने ‘कम्युनिस्ट प्रोजेक्ट’ हर देश में चलाया। हिटलर, नाज़ीवाद, फासीवाद ने तो 1920 के दशक में शुरू होकर 1945 में दम तोड़ दिया, लेकिन पूरी 20वीं शताब्दी भर अपने विरोधियों को ‘एनेमी ऑफ़ द स्टेट एंड द पीपल’ (राज्य और लोगों के दुश्मन) बना कर ‘राज्य और क्रांति के नाम पर’ उनकी हत्या, उनका दमन, उन्हें मजदूरी के कैम्प में भेजने वाला वामपंथ रहा है। वह वामपंथ रहा है, जिसने रूस के रशियन ऑर्थोडॉक्स ईसाई और ईसा-पूर्व के इतिहास से लेकर कम्बोडिया के हिन्दू और बौद्ध व चीन के डाओ इतिहास पर रोडरोलर चलाया, ताकि लोगों को ‘तुम तो हमेशा से अमीरों द्वारा प्रताड़ित किया जा सके’ का प्रोपेगैंडा पढ़ा कर उनकी हिंसक ब्रेनवॉशिंग की जा सके।

हिंदुस्तान में तृणमूल, अमेरिका के डेमोक्रैट भी एक जैसे

अगर 20वीं सदी को एक ओर करके अभी के कालखंड में भी लौटें तो भी वह ‘राइट’ नहीं, ‘लेफ्ट’ है, जो ‘एक जैसा’ सुनाई पड़ता है। कुछ कथनों पर नज़र डालिए- “हमारे विरोधी फासीवादी हैं”, “मुस्लमान खतरे में हैं, और बचने के लिए हमें ही वोट दें”, “वो नफरत फैला रहे हैं, हम प्यार बाँट रहे हैं”, “वे प्रतिभाविहीन, अनपढ़ जाहिल लोग हैं”, “वो मज़हब के आधार पर आपको बाँटना चाहते हैं, और हम आपसे उम्मीद करते हैं कि आप उन्हें ही नहीं, मज़हब को भी नकार दें”, से लेकर “हम इसलिए हारे क्योंकि निर्वाचन प्रणाली में खोट था”, “हम इसलिए हारे क्योंकि लोगों ने उनके बहकावे में आना स्वीकार किया”, “ये हमारी नहीं, लोकतंत्र की हार है”, “(जीतने वाले को) हम राष्ट्राध्यक्ष नहीं मानते”। मार्टिन लॉन्गमैन और महुआ मोइत्रा संयुक्त बयान जारी कर बताएँ कि यह वैचारिक और कथनों की समानता हिंदुस्तान और अमेरिका के राइट विंग में है या लेफ्ट?

और महुआ यह कहकर बच नहीं सकतीं कि उनकी पार्टी वामपंथी नहीं, बल्कि वामपंथ से लड़ने वाली है। उनकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो राज्य में एक ही साथ अराजकता (लेफ्ट का चरम) और फासीवाद (राइट का चरम) का राज्य स्थापित कर लिया है- दुनिया के इतिहास में मुझे नहीं लगता कि और किसी राज्य या देश तो दूर, किसी गाँव के सरपंच ने भी एनार्को-फासिस्ट (अराजकतावादी-फासीवादी) का दोहरा ख़िताब जीता होगा। उनका कैडर मूल तृणमूल से ज्यादा माकपा के गुंडों से बना है, माकपा की ही तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करतीं हैं, उसी की तरह तस्लीमा नसरीन को कठमुल्लों के दबाव में कोलकाता से भगा देतीं हैं, राजनीतिक विरोधियों की हत्याएँ होतीं हैं। अंतर क्या है ममता बनर्जी और कम्युनिस्टों के शासन में?

दक्षिणपंथ परम्पराओं का रक्षक है- परम्पराएँ अलग हैं तो रक्षक एक कैसे होगा?

दक्षिण पंथ, या ‘राइट विंग’ किसी देश, समाज या समूह की परम्पराओं का समर्थक होता है, उनकी रक्षा, पालन और क्रमबद्ध-विकास (evolution) के लिए काम करता है। अब अगर भारत (महुआ मोइत्रा का देश) और अमेरिका (मार्टिन लॉन्गमैन का देश) की परम्पराएँ एक हों, तभी उनके ‘राइट विंग’ एक हो सकते हैं! तो क्या अमेरिका और भारत की परम्पराओं में इतनी समानता है?

अमेरिकी और हिंदुस्तानी राइट विंग में समान केवल एक चीज़ है- अपने-अपने देश में संस्कृति के संरक्षण, और इस्लामी आतंकवाद से लड़ने के प्रति प्रतिबद्धता। अंतर इतने ज़्यादा हैं कि एक-दो अनुच्छेद तो क्या, एक पूरा लेख भी कम पड़ जाएगा। अतः बेहतर होगा कि महुआ मोइत्रा या मार्टिन लॉन्गमैन पहले ट्रम्प और मोदी के आगे घुटने टेकते अपने-अपने देश के वामपंथ को सुधारने, खड़ा करने और अपने-अपने देश के लोगों से जोड़ने पर ध्यान दें। दुनिया के बाकी देशों के राइट विंग की चिंता छोड़ दें।

अवॉर्ड वापसी गैंग है कि मानता नहीं: जनादेश पर उठाए सवाल, चुनाव आयोग को बताया पक्षपाती

अवॉर्ड वापसी गैंग जिसमें ‘प्रबुद्ध नागरिक’, शिक्षाविद् और सेना तथा प्रशासनिक सेवाओं से रिटायर हुए नौकरशाह शामिल हैं वापस लौट आया है। अबकी बार उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजों पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग पर पक्षपाती होने का आरोप मढ़ा है। मुख्य चुनाव आयोग को लिखे इस पत्र पर गैंग के 147 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। इसमें 2019 के जनादेश को ‘बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा गया है कि कई मसले अभी भी अस्पष्ट हैं।’

पत्र में उन मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया गया है जिनमें चुनाव प्रक्रियाओं में ‘गड़बड़ी’ का दावा किया गया था। कहा गया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के मामले में बीते तीन दशकों में सबसे निचले स्तर पर नजर आता है। ‘प्रबुद्धजनों’ ने इस बात पर जोर दिया है कि जब लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा था तो चुनाव आयोग मूकदर्शक बना हुआ था और यह अब भी जारी है।

https://drive.google.com/file/d/1y4yKGwoxi_BndxAsQzV5CF3KJcbWbkQK/view

पत्र में चुनाव आयोग पर ‘एक विशेष दल’ के प्रति वफादार होने का आरोप लगाते हुए कहा गया है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को फायदा पहुँचाने के लिए कायदों से समझौता किया गया। इसके समर्थन में उन मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया गया है जिनमें दावा किया गया था कि ‘कुछ खास अल्पसंख्यक समुदाय’ के मतदाताओं को अलग-थलग छोड़ दिया गया है। दिलचस्प है कि कॉन्ग्रेस ने भी मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। आयोग ने जाँच के बाद कॉन्ग्रेस के दावों को सत्यता से परे बताया था।

दिलचस्प संयोग यह भी है यह पत्र राहुल गाँधी की उसी भावना को परिलक्षित करता है जो उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा देते हुए सोशल मीडिया में शेयर किया था। इसमें उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव की निष्पक्षता पर संदेह जताया था।

राहुल गाँधी ने कहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस का मुकाबला एक राजनीतिक दल से नहीं था, बल्कि वह पूरी सरकारी मशीनरी से लड़ रही थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि सभी सरकारी संस्थानों को विपक्षी दलों की घेरेबंदी में लगा दिया गया था। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि संवैधानिक संस्थाएं अब तटस्थ नहीं हैं।

शौहर ने दिया तीन तलाक़, ससुर ने हलाला के नाम पर की बहू से ज़बरदस्ती, न्याय की गुहार

तीन तलाक को लेकर सरकार भले ही लाख बाते कर रही हो लेकिन इस तीन तलाक के चलते मुस्लिम महिलाओं का जीवन नारकीय हो चुका है। ताजा मामला, यमुनानगर में ट्रिपल तलाक के बाद हलाला के नाम पर एक ससुर पर अपनी बहू से जबरदस्ती करने कोशिश का है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बताया जा रहा है कि सास की मौत के बाद ससुर की बहू पर गन्दी नियत और बढ़ गई। यहाँ तक कि एक दिन वह बहू के कमरे में भी घुस गया और उससे जबरदस्ती करने लगा। वह जबरन बहू को संबंध बनाने के लिए कहने लगा। महिला ने जब यह बात पति को बताई तो उसने तीन तलाक बोलकर उसे घर से निकाल दिया।

मामला शहर थाना जगाधरी एरिया की कॉलोनी का है। पीड़ित महिला अपनी शिकायत लेकर जब थाने पहुँची तो स्थानीय पुलिस ने महिला की सुनवाई नहीं की। बाद में उसने एसपी कुलदीप यादव से गुहार लगाई।  

दैनिक जागरण के अनुसार, एसपी को दी शिकायत में यमुनानगर निवासी पीड़िता ने कहा, “15 जनवरी 2005 को उसका निकाह जगाधरी के युवक से हुआ। अब्बू ने हैसियत से बढ़कर दहेज दिया। उसकी एक बेटी और बेटा है। निकाह के करीब दो साल बाद उसके ससुर ने उस पर गलत नीयत रखते हुए जोर-जबरदस्ती शुरू कर दी। जब इस बारे में शौहर को बताया, तो उसने उसका ही कसूर निकल दिया।”

पीड़ित महिला का आरोप है कि उसके शौहर ने कुछ समय पहले उसे तीन तलाक दे दिया था। लेकिन उसके ससुर ने बहू के मायके में जाकर इस तलाक के न होने की बात कह डाली। हालाँकि, शरीयत के हिसाब से तलाक के बाद हलाला भी होता है और ऐसे में आरोप है कि ससुर की गंदी नजर बहू पर पहले से ही थी और उसने घर में ही उसका हलाला करने की बात कह कर उसे वापस ले गए।

गौरतलब है कि, उस समय तो बहू ने ससुर के साथ किसी भी प्रकार के संबंध रखने से साफ मना कर दिया। लेकिन कुछ दिन पहले ही सुसर ने बहू के साथ जबरदस्ती कर दी और ऐसे में उसने विरोध भी किया। लेकिन ससुर ने बहू की एक नहीं सुनी और उसके साथ जोर-जबरदस्ती करने के बाद उसे मुँह बंद रखने की हिदायत दी और लालच देकर यहाँ तक कह दिया कि अगर वह चुप रहेगी तो वह उसके नाम पचास गज का प्लाट भी लिख देगा और उसका सारा खर्च भी वही उठाएगा।

फिलहाल, पीड़िता अपनी माँ के पास आ गई है और उसने एसपी यमुनानगर को लिखित में शिकायत देकर इंसाफ की गुहार लगाई है।

यह मामला पहला नहीं है और न ही आखिरी, जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं को लगातार तीन तलाक़ और हलाला के नाम पर शोषण और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। वह बहुत ज़्यादा भयावह है। तीन तलाक़ बिल प्रक्रिया में है। जल्द ही ऐसे शख्त कानून को अमल में लाने की ज़रूरत है ताकि तमाम पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिल सके।

तीन तलाक के बाद बड़े भाइयों के साथ मिलकर शौहर ने किया गैंगरेप

उत्तरप्रदेश से तीन तलाक का एक और मामला सामने आया है। पीड़िता के मुताबिक मामूली पारिवारिक विवाद की वजह से पति ने पहले उसे तीन तलाक दे दिया और बाद में अपने बड़े भाइयों के साथ मिलकर उसके साथ रेप किया। बुलंदशहर के पुलिस अधीक्षक से मिलकर पीड़िता ने मामले की शिकायत करते हुए इंसाफ दिलाने की गुहार लगाई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मामला जिले के गुलावठी कोतवाली क्षेत्र का है। पीड़िता की शादी तीन महीने पहले ही मेरठ के इंचाली के सलमान के साथ हुई थी। पीड़िता के अनुसार मामूली विवाद की वजह से सलमान ने उसे तीन तलाक दे दिया। इसके बाद सलमान ने अपने तीन भाइयों के साथ मिलकर उसका रेप किया।

पुलिस अधीक्षक से ​महिला के गुहार लगाने के बाद बुलंदशहर को गुलावठी कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई गई है। मेरठ के एडीजी प्रशांत कुमार ने बताया कि मामले की पड़ताल की जा रही है। उन्होंने कहा कि महिला ने अपने पति पर तीन तलाक देने का आरोप लगाते हुए कहा है कि पति और जेठों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म भी किया। उन्होंने आरोप सही जाने पर कड़ी कार्रवाई किए जाने का भरोसा दिलाया है।

गौरतलब है कि तीन तलाक को लेकर केंद्र सरकार काफी सख्त है। फिर भी तीन तलाक रुकने का नाम नहीं ले रहा। हाल में तीन तलाक का एक मामला यूपी के सीतापुर से सामने आया था। इस मामले में शराब पीने से मना करने पर नाराज होकर पति ने पत्नी को तीन तलाक दे दिया। इसके बाद पत्नी की बेरहमी से पिटाई की और उसे घर से निकाल दिया।

सोनिया जी, दो-चार प्रचलित शब्दों का हौआ बना कर देश की जनता को डराने की कोशिश बेकार है

कॉन्ग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्षा और कॉन्ग्रेस संसदीय पार्टी की अभी भी अध्यक्षा सोनिया गाँधी के रेलवे के ‘खतरे में होने’ के आरोपों से साफ है कि न केवल राहुल गाँधी ने यह सबक नहीं सीखा कि चौकीदार चोर नहीं है, बल्कि समूची कॉन्ग्रेस को अभी कई, कई सबक सीखने बाकी हैं। इन्हीं में से एक सबक अर्थशास्त्र की बदली हुई राजनीति का है- कि न ही अब लोगों को ‘निजीकरण’ का हौव्वा खड़ा कर के और ठगा जा सकता है, और न ही ‘निजी’ या ‘कॉर्पोरेट’ ऐसे कोई काला भूत है भी, जिससे आम जनता को नफरत होती हो।

बंद हो ‘निजीकरण’ का दानवीकरण

लोक सभा में मंगलवार को सोनिया गाँधी ने दावा किया था कि मॉडर्न कोच फैक्ट्री का ‘निजीकरण’ (जब कि प्रस्ताव केवल उसे एक सार्वजनिक उपक्रम में परिवर्तित कर कॉर्पोरटीकरण करने का था) कई कामगारों को बेरोजगार कर देगा। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘कॉर्पोरेटीकरण निजीकरण की ही दिशा में पहला कदम है।’ यह कुछ-कुछ वैसा ही हौआ खड़ा करने वाली बात हो गई, जैसे ‘राष्ट्रवाद फासीवाद की तरफ पहला कदम है’ या ‘भगवाकरण हिन्दू पाकिस्तान की तरफ पहला कदम है’।

अंतर केवल इतना है कि देश में अगर ‘फासीवाद’ बढ़ने लगे, या हिंदुस्तान सही में पाकिस्तान का हिन्दू समकक्ष बनने लगे तो यह बेशक बुरी बात है, लेकिन ‘कॉर्पोरेटीकरण’ या ‘निजीकरण’ कोई बुरी बात नहीं, बल्कि देश की प्रगति और विकास की तरफ एक सराहनीय कदम है। जो देश अपने नाकारा और सुस्त सरकारी तंत्र को लेकर निर्विवादित रूप से बदनाम हो, जहाँ फ़ाइलें इतना धीमें चलें कि नेहरू द्वारा उद्घाटित सरदार सरोवर बाँध का लोकार्पण मोदी के हाथों हो, उस देश में सरकारी काम में तेजी के लिए ‘कॉर्पोरेटीकरण’ या ‘निजीकरण’ को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए या उसका दानवीकरण होना चाहिए?

‘इसलिए नहीं लगाई थी संप्रग ने फैक्ट्री’ 

सोनिया गाँधी के अनुसार ‘हमने इसलिए संप्रग काल में यहाँ फैक्ट्री नहीं लगाई थी’। अगर ऐसा है तो सोनिया गाँधी को ज़रा संसद को यह भी समझाना चाहिए कि आखिर उन्होंने वह फैक्ट्री किस लिए लगाई थी, अगर कुशलतापूर्वक कार्य करना मकसद नहीं था?

डीएनए ने रेलवे के ही एक अनाम कर्मचारी के हवाले से सोनिया गाँधी के आरोप के जवाब में जो आँकड़े गिनाए, वह खुद ही इसका जवाब देंगे कि आखिर ‘कॉर्पोरेटीकरण’ से लेकर ‘निजीकरण’ क्यों निकम्मे सरकारी तंत्र से निजात पाने के लिए समय की माँग है। फरवरी 2007 में जिस फैक्ट्री के शिलान्यास का पत्थर संप्रग-1 के कार्यकाल में रखा गया, उस फैक्ट्री में नहीं, फैक्ट्री का ही निर्माण मई, 2010 में शुरू हुआ- जब 2-जी से लेकर सीडब्लूजी तक का घोटाला सामने आने से कॉन्ग्रेस की इज़्ज़त तार-तार हो रही थी, देश दुनिया के 2008 के आर्थिक संकट से उबार जाने के बाद भी कराह रहा था और शायद इस फैक्ट्री की शुरुआत कर ध्यान भटकाया जा सकता था। 1,000 कोचों का निर्माण करने की क्षमता के साथ बनी इस फैक्ट्री ने 2011-14 तक केवल कपूरथला से निर्मित होकर आने वाले कोचों में ‘कुछ’ काम हुआ- वह भी केवल 375 कोचों पर। 1,000 कोचों का निर्माण करने की क्षमता के साथ बनी फैक्ट्री में 375 कोचों पर रंग-रोगन या छोटा-मोटा काम। मोदी ने क्या गलत कहा था जब उन्होंने आरोप लगाया था कि यह फैक्ट्री केवल स्क्रू टाइट करने का काम करती है, उक्त अधिकारी पूछता है।

मोदी राज में फैक्ट्री के ‘अच्छे दिन’

यह अधिकारी यह भी गिनाता है कि कैसे मोदी सरकार ने चरणबद्ध तरीके से इस फैक्ट्री की कायापलट की। जुलाई 2014 में रेलवे की निर्माण इकाई घोषित होने के महीने भर के भीतर इस फैक्ट्री ने पूरे कोचों का निर्माण शुरू कर दिया। 140 कोच 2014-15 में, 576 कोच 2016-17 में, 711 डिब्बे 2017-18 में, और जब बीते वित्त वर्ष 2018-19 के जब आँकड़े आएँगे, तो उम्मीद है 1,400 के करीब कोचों के निर्माण का आँकड़ा आने की। इस साल का भी लक्ष्य 2,158 कोचों के निर्माण का है। ₹667 करोड़ की खरीद इस दौरान MSME उद्योगों से की गई, और रायबरेली की स्थानीय इकाईयों खरीद 2013-14 के बमुश्किल ₹1 करोड़ से बढ़कर बीते वित्त वर्ष में ₹124 करोड़ पहुँच गई।

और जिस दौरान यह सब हो रहा था, सोनिया गाँधी की कॉन्ग्रेस यही ‘सॉफ़्ट कॉर्पोरेटीकरण- सॉफ़्ट कॉर्पोरेटीकरण’ का हौव्वा खड़ा कर रही थी। अब ज़रा सोचिए कि अगर सॉफ़्ट कॉर्पोरटीकरण से यह इकाई इतना सुधार कर ले गई तो ‘हार्डकोर कॉर्पोरेटीकरण’ के बाद इस फैक्ट्री की क्या तस्वीर होगी! क्या सोनिया गाँधी देश की जनता को, रायबरेली की जनता को अकुशल, भ्रष्ट और सुस्त सरकारी फैक्ट्री के युग में दोबारा धकेल देना चाहतीं हैं?

नौकरियाँ निजी क्षेत्र में ही हैं

यह दीवार पर लिखी इबारत है कि हिंदुस्तान की अंधाधुंध बढ़ती आबादी, और नेहरूवियन, समाजवादी अर्थशास्त्र के युग से बाहर आ जाने- दोनों ही कारणों से अब नौकरियों का भविष्य, देश की अर्थव्यवस्था का भविष्य निजी क्षेत्र में ही है। कायदे से कॉर्पोरेटीकरण उसी दिशा में आहिस्ता बढ़ाया हुआ कदम है जिसका स्वागत होना चाहिए कि सीधे निजीकरण कर प्रतिस्पर्धा के अनभ्यस्त ‘सरकारी’ नवाबों को निजी क्षेत्र के साथ टकराव में अपने हाल पर छोड़ देने की बजाय (जोकि मुक्त बाजार का असली मॉडल है) सरकार पहले यूनिट को भारतीय रेलवे के अंदर ही एक कॉर्पोरेट तरीके से चलने वाली कम्पनी बना रही है। इससे कर्मचारियों को वह सब कौशल विकसित करने का मौका मिलेगा जो किसी भी रेलवे कोच बनाने वाली आधुनिक कॉर्पोरेट कम्पनी के संचालन में आवश्यक हैं।

मोदी और कॉन्ग्रेस दोनों के लिए राह सुधारने की ज़रूरत

मोदी सरकार 2014 में ‘Government has no business of being in business’ और ‘Minimum government, maximum governance’ के वादे कर के आई थी। लेकिन बहुत हद तक उन वादों पर अमल बाकी है। बहुत सारे बीमारू या ख़राब प्रदर्शन कर रहे सार्वजनिक उपक्रमों को सुधारा ज़रूर गया है, लेकिन एयर इंडिया या बीएसएनएल जैसे न सुधर रहे पीएसयू का क्या होगा, यह साफ़ नहीं हो रहा है। बीते वित्त वर्ष में बीएसएनएल का घाटा तकरीबन 7,000 करोड़ रुपए के करीब रहने का अनुमान है। ऐसे में मोदी भले ही सार्वजनिक उपक्रम पूरी तरह बंद न भी करें, तो भी उनमें से जो नहीं चलने हैं, उनमें टैक्स धन की बर्बादी रोकने का तरीका उन्हें सोचना ही होगा।

कॉन्ग्रेस के लिए तो यही कहा जा सकता है कि उसे अपने दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र सबमें आमूलचूल बदलाव की तत्काल आवश्यकता है। कुछ चीज़ें समय के साथ घूम-फिरकर वापिस वहीं आ जातीं हैं, लेकिन कुछ चीज़ें समय के साथ सीधी लकीर पर ही चलतीं हैं। जनता अब एक बार ‘कुशल, कॉर्पोरेटीकृत’ सरकार को चखने के बाद वापिस कॉन्ग्रेस के ‘माई-बाप समाजवाद’ के उस युग में नहीं जाना चाहेगी, जहाँ उसके (पूर्व??) अध्यक्ष राहुल गाँधी ₹72,000 और 22 लाख सरकारी नौकरियाँ देकर जनता को आर्थिक रूप से सरकार पर निर्भर रखना चाहते थे। कॉन्ग्रेस को ही आगे आकर जनता की इच्छा के साथ कदम-से-कदम मिलाना होगा।

बंगाल : सार्वजनिक जगहों पर नमाज के विरोध में बीजेपी कार्यकर्ताओं का सड़क पर हनुमान चालीसा पाठ

सड़कों पर नमाज अता किए जाने पर पाबंदी लगाने की माँग को लेकर पश्चिम बंगाल में बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं का विरोध जारी है। मंगलवार को एक बार फिर युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने अपनी माँग के समर्थन में हावड़ा की एक सड़क पर हनुमान चालीसा का पाठ किया। हावड़ा के एसी मार्केट स्थित हनुमान मंदिर के करीब हुए इस पाठ के कारण सड़क पर करीब एक घंटे तक आवागमन बंद रहा। पाठ में अबकी बार महिलाओं और बच्चों ने भी शिरकत की।

युवा मोर्चा के प्रदेश इकाई के अध्यक्ष ओम प्रकाश और पार्टी की युवा नेत्री प्रियंका शर्मा की अगुआई में पाठ किया गया। सड़कों पर जुमे की नमाज पर रोक लगाने को लेकर बीते सप्ताह भी युवा मोर्चा के कार्यर्ताओं ने इसी तरह पाठ किया था।

मोर्चा के अध्यक्ष ओम प्रकाश का कहना है कि जब दूसरे मजहब वाले हर शुक्रवार को नमाज के नाम पर सड़क बंद कर सकते हैं और प्रशासन उन्हें नहीं रोकता तो हम हनुमान चालीसा का पाठ सड़क पर क्यों नहीं कर सकते। उन्होंने बताया कि जब तक उनकी माँग नहीं मानी जाती युवा मोर्चा के कार्यकर्ता हर मंगलवार को हावड़ा के विभिन्न मार्गों पर स्थित हनुमान मंदिर के करीब पाठ करेंगे। बीते सप्ताह हावड़ा जिले के बाली खाल इलाके में पाठ किया गया था।

ओम प्रकाश ने बताया कि सड़क पर जुमे की नमाज अता किए जाने के कारण हावड़ा का जीटी रोड बंद हो जाता है। इसके कारण होने वाली अव्यवस्था और ट्रैफिक जाम की वजह से लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। खासकर, मरीजों को अस्पताल और कामकाजी लोगों को दफ्तर पहुँचने में।

उन्होंने बताया, “ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद से जुमे की नमाज के कारण जीटी रोड और अन्य मुख्य सड़कें बंद हो जाती है। इसके कारण मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं और लोग समय से दफ्तर नहीं पहुँच पाते। जब तक इस पर पाबंदी नहीं लगती, हम सभी मुख्य मार्गों पर स्थित हनुमान मंदिर के करीब हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।”

सड़क पर नमाज से न केवल आम लोगों को परेशानी होती है, बल्कि यह प्रशासन के लिए भी बड़ा सिरदर्द है। यही कारण है कि हरियाणा में हिंदू संगठन सार्वजनिक जगहों पर नमाज अता किए जाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग कर रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी इसकी आलोचना करते हुए कह चुके हैं कि नमाज मस्जिदों में अता की जानी चाहिए न कि सार्वजनिक जगहों पर। बीते साल मद्रास हाईकोर्ट ने भी कहा था कि प्रार्थना के लिए सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

बीते साल दिसंबर में नोएडा पुलिस ने सेक्टर 58 में स्थित कंपनियों को एक एडवाइजरी नोटिस जारी करते हुए कहा था कि वे अपने कर्मचारियों को नजदीक के पार्कों में नमाज अता करने से रोकें। पुलिस ने इस बात पर जोर दिया था कि कंपनी के कर्मचारी अपने दफ्तर या मस्जिद में नमाज अता करें न कि सार्वजनिक जगहों पर।