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बेसबॉल बैट से पिटाई मामले में AAP विधायक सोमदत्त को 6 महीने की सज़ा, ₹2 लाख का जुर्माना

दिल्ली के सदर इलाके से आम आदमी पार्टी के विधायक सोमदत्त को दिल्ली की रोज़ एवेन्यू की विशेष एमपी/ एमएलए अदालत ने 2015 के एक मामले में 6 महीने की सजा सुनाई है। साथ ही उन पर ₹2 लाख का जुर्माना भी लगाया है।

गौरतलब है कि सोमदत्त के ख़िलाफ़ यह मामला 2015 में गुलाबी बाग का है, जब आप विधायक ने चुनाव प्रचार के दौरान शिकायतकर्ता संजीव राणा की बेसबॉल बैट से पिटाई की थी। उस दौरान सोमदत्त विधायक नहीं थे।

हालाँकि चुनाव प्रचार के दौरान की गई मारपीट मामले पर संज्ञान लेते हुए पिछली सुनवाई (29 जून) में ही अदालत ने आप विधायक को दोषी ठहरा दिया था, लेकिन 4 जुलाई को सभी दलीलें सुनने के बाद सोमदत्त की सजा मुकर्रर की गई।

अदालत ने इस बात पर गौर किया है कि संजीव राणा की गवाही में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है और न ही उनके पास सोमदत्त को फँसाने के लिए कोई विशेष कारण है। इसलिए आप विधायक को आईपीसी धारा 325 यानी जान बूझकर चोट पहुँचाने के तहत दोषी माना गया।

पूरा मामला

संजीव की शिकायत के मुताबिक 10 जनवरी 2015 को वह अपने फ्लैट में थे। तभी 50-60 लोग उनके दरवाजे पर पहुँचकर, घर की घंटी बजाने लगे। जब संजीव ने इसका विरोध किया तो नाराज़ सोमदत्त ने बेसबॉल बल्ले से उनके पैर पर मार दिया। इसके बाद वह उसे खींचकर सड़क पर ले गए और वहाँ उन्हें लात-घूँसों से मारना शुरू कर दिया। इसके बाद पीड़ित के भाई ने पुलिस बुलाई और पीसीआर वैन ही उन्हें हिंदूराव अस्पताल लेकर गई।

बता दें कि इस मामले पर सोमदत्त ने अपनी सफाई में कहा था कि राजनैतिक दुश्मनी के कारण यह मामला दर्ज करवाया गया है। संजीव भाजपा के सदस्य हैं और वह जान बूझकर उनका टिकट कटवाना चाहते हैं। जबकि संजीव ने साफ़ किया है कि वह किसी राजनैतिक दल से जुड़े हुए नहीं हैं।

आपको बता दें कि दिल्ली की इसी रोज एवेन्यू कोर्ट ने जून 25, 2019 को कोंडली से आप विधायक मनोज कुमार को चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने के मामले में 3 महीने की सजा और ₹10 हजार जुर्माने की सजा सुनाई थी।

भीमा-कोरेगाँव मामले का आरोपित वारवरा राव माओवादी हमले की साजिश के सिलसिले में गिरफ्तार

भीमा-कोरेगाँव मामले के आरोपित वारवरा राव को कर्नाटक पुलिस ने करीब डेढ़ दशक पुराने एक माओवादी हमले के सिलसिले में गिरफ्तार किया। फरवरी 10, 2005 को कर्नाटक के तुमकुर के थिरुमानी थाना क्षेत्र में हुए इस हमले में आठ लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 6 कर्नाटक रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान, एक रसोइया और एक आम नागरिक था। पुलिस के मुताबिक वारवरा राव इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता था।

प्रोडक्शन वारंट लेकर पुणे पहुँची कर्नाटक पुलिस ने यरवदा जेल से राव को हिरासत में लिया। भीमा-कोरेगाँव मामले के आरोपित राव न्यायिक हिरासत में यरवदा जेल में बंद थे। इस मामले की उसकी गिरफ्तारी नवंबर 17, 2018 को हैदराबाद हाई कोर्ट का नजरबंदी का आदेश समाप्त होने के बाद हुई थी। राव बीते साल तब सुर्खियों में आया था, जब पुलिस ने देशभर में कई जगहों पर माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में छापेमारी और गिरफ्तारी की थी। भीमा-कोरेगाँव मामले में माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में पुणे पुलिस राव सहित 23 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2005 में हुए माओवादी हमले में इससे पहले राव की कभी गिरफ्तारी नहीं हुई थी। इस मामले के आरोपितों को 2016 में स्थानीय अदालत ने बरी भी कर दिया था और पुलिस ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की। इसके बाद कर्नाटक पुलिस ने एक स्थानीय अदालत से राव की गिरफ्तारी का वारंट हासिल किया और पुणे की अदालत से एनओसी मिलने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया था। अब राव को कर्नाटक पुलिस स्थानीय अदालत में पेश करेगी।

कमलनाथ से बिजली कटौती पर नाराज युवक ने फेसबुक पर लिखा ‘दर्द’, पुलिस ने कर लिया गिरफ़्तार

मध्य प्रदेश के सागर जिले में बिजली कटौती मामले को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी करना एक युवक को महँगा पड़ गया। यहाँ पुलिस ने मुख्यमंत्री कमलनाथ पर अभद्र टिप्पणी के मामले में बुधवार (जुलाई 03, 2019) को सचिन तनेजा (40) नाम के युवक को हिरासत में लिया है।

सचिन पर आरोप है कि उसने अपनी फेसबुक वॉल पर बिजली कटौती का जिक्र करते हुए राज्य सरकार को गालियाँ दी और अपने पोस्ट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ की तस्वीर भी लगाई, जिस पर एक कॉन्ग्रेस नेता ने पुलिस में उसकी शिकायत दर्ज करवा दी।

एनडीटीवी इंडिया की खबर के अनुसार मकरोनिया क्षेत्र की नगर पुलिस अधीक्षक अमृता दिवाकर ने बुधवार को पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि एक युवक ने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट की थी, जिस पर कॉन्ग्रेस की ओर से शिकायत दर्ज करवाई गई।

पुलिस ने इसी शिकायत के आधार पर युवक को हिरासत में ले लिया गया है और अब मामले पर कार्रवाई की जा रही है। हालाँकि सचिन तनेजा नाम का यह युवक कौन है, इसकी अभी जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन हिंदुस्तान की खबर के मुताबिक आरोपित के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और आईटी अधिनियम की धाराओं 67 और 67(ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

मध्य प्रदेश राज्य में यह ऐसी पहली घटना नहीं हैं, इससे पूर्व भी एक शिक्षक समेत अन्य लोगों द्वारा कमलनाथ सरकार पर अभद्र टिप्पणी करने पर कार्रवाई हो चुकी हैं। हालाँकि, बाद में मुख्यमंत्री के आदेश पर कार्रवाइयों को निरस्त करके आरोपितों को राहत दे दी गई।

हाँ, मुगलों ने हिन्दुओं का रेप किया, हजारों मंदिर तोड़े लेकिन बिरयानी बनानी भी तो सिखाई!

इतिहास से छेड़छाड़ छद्म बुद्धिजीवियों का पुरातन पेशा रहा है और अपने (कु)चिंतन को सर्वोपरि साबित करने की उनकी आदत भी। अगर इतिहास के बारे में ये अंग्रेजी में कुछ लिख दें, तो भला उसे काटने की हिम्मत किसमें होती थी? लेकिन, अब समय बदल गया है। इसी क्रम में हमारी नज़र ‘द वायर’ के एक लेख पर पड़ी, जो हिंदुत्व को लेकर लिखे गए तीन लेखों की सीरीज का दूसरा भाग है। इस आर्टिकल में सबकुछ है। अंग्रेजी है। सीरिया की बातें हैं। सन 1200 में पोप ने क्या किया, यह भी है। ऐतिहासिक घटनाओं का ज़िक्र हैं। कमी है तो बस सच्चाई की। लेख की शुरुआत ही होती है कई ऐसे धर्मों का जिक्र करने से, जो अन्य पुराने धर्मों से पैदा हुए।

यहाँ हम वायर के वरिष्ठ पत्रकार की तरह केवल उपदेश नहीं देंगे बाकि सबूतों के साथ ऐतिहासिक तथ्यों के ज़िक्र कर के लेखक द्वारा इस्लामिक आक्रांताओं को वाइटवाश करने की कोशिशों को एक्सपोज़ करेंगे। आगे बढ़ने से पहले बता दें कि प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ का यह लेख दुर्भाग्यपूर्ण है, राजपूतों और ब्राह्मणों का कुतर्कों की बिना पर अपमान करने वाला है और खिलजी, अकबर इत्यादि के गुणगान करने वाला है। भारतीय संस्कृति को कमतर आँकने की कोशिश की गई है। लेखक की नज़र में, लाखों जान देने, हज़ारों बलात्कार होने औरकई हज़ार बड़े मंदिर ढाहने की क़ीमत पर अगर एक पर्शियन कलाकृति मिलती है तो उसे पूजना चाहिए। तो आइए, पोस्टमॉर्टम शुरू करते हैं।

इस लेख को लिखने वाले प्रेम शंकर झा हैं, जिन्होंने एग्जिट पोल कैसे बुरी तरह ग़लत हो जाएँगे, इस पर भी एक लम्बा-चौड़ा लेख लिखा था। इन छद्म बुद्धिजीवियों के साथ दिक्कत यह है कि ये सुदूर सीरिया और मेसोपोटामिया की घटनाओं व इतिहास का विवरण तो सही देते हैं लेकिन जहाँ बात भारत के सांस्कृतिक व राजनीतिक इतिहास की आती है, ये गच्चा खा जाते हैं। या फिर यह भी हो सकता है कि जानबूझ कर ग़लत तथ्य पेश करते हैं। लेखकपहले तर्क से ही पगलैती करता नज़र आता है क्योंकि वह कहता है कि भारत में धर्म और इस्लाम का शुरुआती संपर्क काफ़ी शांतिपूर्ण रहा है। आप भी हँस लीजिए इस चुटकुले पर।

पहली बात, यहाँ लेखक ने चिरकाल से अरब और इस्लाम को एक कर के देखने की कोशिश की क्योंकि अरब और गुजरात के संपर्क को भी धर्म और मजहब वालों के बीच संपर्क के रूप में देखने की गई है। गुजरात में अरबों का आना-जाना इस्लाम के उत्थान से पहले से ही था और व्यापारिक रिश्तों के कारण वे गुजरातियों के संपर्क में थे। लेकिन, यहाँ लेखक ने बड़ी चालाकी से अरब और भारत के संपर्क को इस्लामी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहा, जबकि अरब तो इस्लाम अपनाने से पहले भी अरब ही थे। जब अरब में इस्लाम फैला, उसके बाद वे इस मज़हब के झंडाबरदार बन गए और उन्होंने इसे फैलाना शुरू किया।

लेखक का यह भी दावा है कि यहाँ आकर अरब वालों ने मस्जिदें बनानी शुरू की लेकिन किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक तनाव ने जन्म नहीं लिया। लेकिन, लेखक को यह समझना चाहिए कि साम्राज्यवाद और विस्तारवाद कभी भी हमारी संस्कृति नहीं रही है। अगर अरबों ने यहाँ आकर मस्जिदें बनाईं, तो इसका यह अर्थ है कि भारत तब भी उतना ही सहिष्णु था, जितना आज है। सर्वविदित है कि इस्लाम के उत्थान के बाद शुरुआती दिनों में लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्मान्तरण के लिए भारत आए थे, जिसनें बाद में लूटपाट और फिर साम्राजयवाद का रूप ले लिया। आज भी अंतिम चेर राजा के इस्लाम अपनाने के बाद मक्का जाने की कहानी पुरानी इस्लामी पुस्तकों में गर्व से उल्लेखित की जाती है।

भरता सहिष्णु है, तभी उसने धर्मान्तरण के इरादे से आए व्यापारियों को भी रहने की अनुमति दी। भारत का समाज काफ़ी खुले विचारों वाला था, तभी अरब से आए व्यापारियों में से कई ने भारतीय महिलाओं से विवाह किया और वे यहीं के होकर रह गए। जब महमूद गज़नी ने सोमनाथ पर हमला किया, तब तक इस्लाम साम्राज्यवाद का रुख अपना चुका था और धर्मान्तरण की मदांधता में गतिमान था। यहाँ लेखक ने इस बात को हाइलाइट करने की कोशिश की है कि सोमनाथ पर गज़नी द्वारा हमला करने के दौरान अरबों ने मरते दम तक मंदिर की रक्षा की। लेकिन, बड़ी चालाकी से लेखक ने एक तथ्य को छिपा दिया। इसकी सच्चाई हम आपको बताते हैं।

दरससल, लेखक धर्मान्तरण और ख़ूनख़राबे को सही साबित करने के लिए जिन अरबों द्वारा सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए जान देने की बात कर रहा है, उन्हीं अरबों के शासक ने इस मंदिर पर पर हमला किया था। वर्ष 725 में सिंध के अरब शासक अल-जुनैद ने महमूद गज़नी से पहले ही इस मंदिर में तबाही मचाई थी। ऐसे में लेखक का यह दावा खोखलेपन वाला है कि जिन अरबों ने महमूद गजनी के आने से 300 साल पहले ही इस मंदिर को तबाह किया था, उन्होंने इसकी रक्षा के लिए जान तक दे दी। हाँ, भारतियों को अपनी सहिष्णुता की कीमत क्या देकर चुकानी पड़ी, इस बारे में लेखक ने चुप्पी साध रखी है।

अब आते हैं लेखक के एक और झूठे और भ्रामक दावे पर, जिसमें यह कहा गया है कि दिल्ली सल्तनत वाला काल शायद संघ और हिदुत्व विचारधारा वाले लोग याद न करना चाहें। जिस समयावधि में न जाने उत्तर भारत में कई जगहों पर आततायियों के कारण महिलाओं को आग में कूदना पड़ा था, उस काल को तो तो याद रखना ही चहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी पता चले कि वो आक्रांता कौन थे? मुगलों ने कला को महत्त्व दिया, हुमायूँ ने मकबरा बनवाया, शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया, भारत और अरब की कलाओं के मिश्रण से नई कलाओं को जन्म दिया गया- इनकी कीमत क्या चुकानी पड़ी, इस बारे में लेखक सेलेक्टिव हो उठा है।

इंडो-इस्लामिक आर्किटेक्चर का गुणगान करते-करते लेखक ने इस बात को किनारे करने की कोशिश की है कि इस कला के अधिकतर नमूने हमारी पुरानी विरासतों को तबाह कर के बनाए गए। इसे यूँ समझिए। कोई लेखक के घर में घुस आता है और फिर उन्हें निकाल बाहर कर घर को ढाह देता है। इसके बाद वह व्यक्ति वहाँ कुछ नई कलाकृतियाँ बनता है, जो उसके अनुयायियों के लिए एक पवित्र स्थल बन जाता है। क्या लेखक की आने वाले पीढियाँ उन कलाकृतियों का गुणगान करेंगी और उस कलाकार को पूजेगी? नहीं, क्योंकि वह कलाकार नहीं बल्कि आक्रान्ता था। ठीक इसी तरह, अनगिनत मंदिरों और बौद्ध स्थलों को तबाह कर बनाई गई कलाकृतियों का गुणगान कर लेखक ने जता दिया है कि ‘द वायर’ में आक्रान्ताओं के लिए एक विशेष सम्मान है।

सल्तनत काल पर हिन्दुओं को क्यों गर्व करना चाहिए? लेखक कहता है कि इस दौरान कत्थक नृत्य का जन्म हुआ, इसीलिए। यह विचित्र तो है ही, साथ ही एक बड़ा झूठ भी है। दरअसल, कत्थक नृत्य का प्रचलन वैदिक काल से ही रहा है और पीढ़ियों से चली आ रही इस नृत्य परम्परा को पुजारियों और राजाओं तक ने संरक्षण दिया क्योंकि वे इसे हिन्दू धर्म की कथाओं के प्रचार-प्रसार का एक बड़ा माध्यम मानते थे। हाँ, मुग़ल काल के दौरान पर्शियन प्रभाव आने के बाद कत्थक नृत्य के तौर-तरीकों में बदलाव हुए लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पीढ़ी दर पीढ़ी बदलती एक व्यवस्था के जन्मकाल को लेकर झूठे दावे किए जाएँ। नहीं, कत्थक का जन्म सल्तनत काल में नहीं हुआ।

लेखक मजहबी आक्रान्ताओं को ‘अच्छा आक्रान्ता’ और ‘बुरा आक्रान्ता’ के रूप में देखना चाहता है। उसकी नज़र में खिलजी वंश ‘अच्छा आक्रान्ता’ था और मंगोल ‘बुरा आक्रान्ता’ थे। लेखक के विचारों से लगता है कि भारतियों को खिलजी की पूजा करनी चहिए क्योंकि उसनें हमें मंगोलों से बचाया। साम्राज्यवाद की इस लड़ाई में जब भारतीय पक्ष कोई था ही नहीं और दोनों ही पक्षों का मकसद खूनखराबा ही था, ऐसे में खिलजी अच्छा और मंगोल बुरा कहाँ से हो गया? मंगोलों को हराने के बाद खिलजी ने रणथम्भोर, वारंगल, चित्तौर, गुजरात और दिल्ली में क्या किया, इस बारे में लेखक ने चुप्पी साध रखी है। क्या वह कृत्य मंगोलों से अलग था?

जिस अमीर खुसरों की दुहाई देकर लेखक खिलजी की पूजा करने की बातें कर रहा है, उसी खुसरो ने लिखा है कि चित्तौर को जीतने के बाद खिलजी ने 30,000 हिन्दुओं को मार डालने का आदेश दिया था। खुसरो लिखता है कि उन्हें सूखे घास की तरह काट डाला गया। लेकिन नहीं, यह सब चलता है क्योंकि वह ‘अच्छा आक्रान्ता’ था। लेखक ने लगे हाथ धर्मान्तरण के लिए इस्लामिक आक्रान्ताओं को जिम्मेदार ठहराने की बजाय ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद को गाली भी दे दी है। यह आजकल का ट्रेंड है, कूल है, चलता है- इसीलिए छद्म बुद्धिजीवी जहाँ भी तथ्य से मार खाते हैं, यही उनका आख़िरी सहारा होता है। इसके बाद लेखक ने अकबर द्वारा शुरू किए गए धर्म दीन-ए-इलाही की प्रशंसा पर अपना ध्यान केंद्रित किया है और इसे सबसे अच्छा बताया है।

अकबर के बारे में कहा जाता है कि वह एक रुढ़िवादी था और तभी उसने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सिकरी में इबादतखाना बनवाया था, जहाँ मज़हबी चर्चे हुआ करते थे। एक वाकया है। जब मथुरा के ब्राह्मण पर पैगम्बर मुहम्मद को अपशब्द कहने का आरोप लगा तब मामला अकबर तक पहुँचा। कहा जाता है कि सभासदों की राय अलग-अलग होने के कारण अकबर कोई दंड नहीं दे पाया और उसनें यह कार्य शेख अब्दुल नबी को सौंप दिया। क्या आपको पता है उस ब्राह्मण को क्या सजा मिली? सज़ा-ए-मौत। पैगम्बर के बारे में अपशब्द कहने पर आरोपित को मार डालने वाले राजा के शासनकाल को लिबरल विचारधारा वाला बताया गया, यह सबसे बड़ी भूल है।

इस पूरे लेख का सार यह है कि जिन लोगों ने आपके घर में घुस कर महिलाओं का बलात्कार किया, उनका सम्मान कीजिए। लेखक का मानना है कि आपके घर को जबरन तोड़ कर एक कलाकृति बना दी जाए, आप उस कलाकृति की पूजा कीजिए। ‘द वायर’ का कहना है कि एक छोटे से राज्य को जीत कर 30000 हिन्दुओं को मार डालने वाले सुलतान की प्रशंसा कीजिए क्योंकि उसने मंगोलों को भगाया। इस लेख में हमें उन सारी चीजों की बानगी मिली है, जो हमें सालों से पाठ्य पुस्तकों से लेकर इतिहास की किताबों तक में पढ़ाया जाता रहा। राजस्थान के राजपूरों को गाली दीजिए और इस्लामी आक्रांताओं की तारीफों के पुल बाँधिए क्योंकि ‘उन्होंने युद्ध की नई तकनीकें सिखाई।’

जिन अरबों के शासक ने सोमनाथ मंदिर में तबाही मचाई, उन्हीं अरबों को धन्यवाद दीजिए क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर मंदिर को बचाने में अपनी जान लुटा दी। ये फेक नैरेटिव के बादशाह हैं। फेक नैरेटिव गढ़ना और उसे भुनाना इनके लिए दाएँ हाथ का खेल है। जिस कत्थक का मूल वैदिक काल तक जाता है, उस कत्थक को सुल्तानों के जमाने में पैदा होना बताया गया। भक्ति आंदोलन का श्रेय भी सुल्तानों को दीजिए, इस बात को नज़रअंदाज़ कीजिए कि भक्ति काल के कई संतों के साथ क्या किया गया? आश्चर्य नहीं होगा जब कल को ये लोग यह भी कहने लगे की रामायण और महाभारत आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं, इसका श्रेय इस्लामी आक्रांताओं को जाता है क्योंकि उन्होंने इस सहेज कर रखा। आपका इतिहास, आपको मुबारक।

मुगल धर्मान्तरण करने नहीं आए थे, वे बस अन्य राजाओं की भाँति अपना साम्राज्य फैला रहे थे- ऐसा लेखक का दावा है। अगर ऐसा है तो हार के डर से हुमायूँ ने अल्लाह के नाम पर अपने सैनिकों को उत्तेजित क्यों किया? खिलजी के दरबारियों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में हिन्दुओं को नीच क्यों कहा गया? कथित लिबरल अकबर के दरबार में पैगम्बर मुहम्मद को अपशब्द कहने के आरोप में ब्राह्मण को सज़ा-ए-मौत क्यों मिली? अगर इस्लामिक आक्रांता धर्मान्तरण के लिए नहीं आए थे, इस्लाम को फैलाने नहीं आए थे- तो उन सभी ने मस्जिदें ही क्यों बनवाई? बौद्ध विहार, जैन मठ और मंदिर क्यों नहीं बनवाए? ऐसे बेहूदा लॉजिक पेश कर ही इन छद्म बुद्धिजीवियों ने हमें दशकों तक ठगा है।

MP में पुलिस के सामने मरीज़ के परिजनों ने की डॉक्टर की पिटाई, वीडियो हुआ Viral

मध्य प्रदेश के भिंड में एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की पिटाई किए जाने की ख़बर सामने आई है। दरअसल, अटेर के नावली हार गाँव के निवासी लवली यादव का किसी से पुराना विवाद था। इस विवाद के चलते सोमवार (1 जुलाई 2019) को कुछ लोगों ने उसकी पिटाई कर दी। 

पुलिस की मौजूदगी में डॉक्टर को थप्पड़ मारते परिजन

पुलिस को इस मारपीट की जब सूचना मिली तो वो घटना-स्थल पर पहुँची। घायल अवस्था में पुलिस लवली को एमएलसी के लिए ज़िला अस्पताल ले गई। वहाँ पहुँचकर लवली के परिजनों ने पहले तो डॉक्टर से अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया और इसके बाद वो पुलिस के सामने ही डॉक्टर के साथ हाथापाई पर उतर आए।

डॉक्टर की पिटाई का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इस पूरे घटना में आप देख सकते हैं कि मरीज़ के साथ आए परिजनों ने किस तरह से डॉक्टर रुम में ही डॉक्टर की सरेआम पिटाई कर दी। अश्चर्य की बात तो यह है कि वहाँ पुलिस भी मौजूद थी, बावजूद इसके परिजन डॉक्टर को थप्पड़ मारने से बाज नहीं आए। इसी से पता चलता है कि दूसरों को जीवनदान देने वाले डॉक्टर मध्य प्रदेश में ख़ुद कितने सुरक्षित हैं।

जौनपुर की एक दरगाह से 17 साल की पूनम और 13 साल की पिंकी लापता, परिवार को मौलवी पर शक़

एक चौंकाने वाली घटना में, जौनपुर ज़िले के केराकत कोतवाली क्षेत्र के कढ़रा गाँव की दलित बस्ती की दो किशोरियाँ 27 जून, 2019 को एक दरगाह से लापता हो गईं। परिवार को अपनी बच्चियों के लापता होने में मौलवी पर संदेह है।

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में पुलिस थाना कोतवाली के तहत अहियापुर इलाक़े में मौला बाबा मज़ार पर महेंद्र की बेटी पूनम (17) अपनी माँ गुड्डी देवी के साथ दरगाह में दुआ माँगने के लिए गईं थी। गुड्डी देवी की भतीजी, पिंकी (13) भी उनके साथ गई थीं।

दुआ माँगने के बाद दोनों लड़कियाँ अचानक लापता हो गईं। मज़ार क्षेत्र में और उसके आसपास बड़े पैमाने पर उनकी तलाश के बावजूद, गुड्डी देवी उनका पता नहीं लगा सकीं। लापता होने के बाद इन लड़कियों के मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ़ हो गए।

गुड्डी देवी ने घर वापस जाकर अपने परिवार के सदस्यों को यह घटना सुनाई। परिजनों ने जन सुनवाई ऐप के माध्यम से जौनपुर पुलिस को इस घटना से अवगत कराया।

जन सुनवाई ऐप उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा शुरू किया गया एक मोबाइल ऐप है, जहाँ नागरिक अपनी शिक़ायतें और सुझाव दर्ज कर सकते हैं। यह यूज़र्स के अनुकूल इंटरफेस उत्तर प्रदेश सरकार के जन सुनवाई (IGRS) पोर्टल से जुड़ा है। इस ऐप के माध्यम से की गई हर शिक़ायत को ट्रैक भी किया जा सकता है।

एसपी बिपिन कुमार मिश्रा को लिखे पत्र के अनुसार, लड़कियों के अपहरण के पीछे परिवार ने मौला बाबा मज़ार के मौलवी पर संदेह जताया। उन्हें लगता है कि दरगाह के मौलवी की साज़िश से किशोरियों का अपहरण कर लिया गया है। डरे-सहमे परिजनों ने पुलिस अधीक्षक से किशोरियों की जान व इज्जत बचाने के लिए प्रभावी क़दम उठाए जाने का आग्रह किया।

इस बीच, जौनपुर पुलिस ने इस शिकायत को स्वीकार किया और बताया कि लापता लड़कियों की तलाश के लिए एक टीम का गठन किया गया है।

इस तरह की घटनाएँ नई नहीं हैं। पिछले महीने, हैदराबाद के बोरबंडा इलाक़े में घर से बुरी शक्तियों को बाहर करने के बहाने आज़म नाम के एक स्वयंभू मुस्लिम धर्मगुरू को एक लड़की के साथ बार-बार बलात्कार करने के ज़ुर्म में पकड़ा गया। पिछले साल सितंबर में, आसिफ़ ख़ान उर्फ ‘आशु महाराज’ के ख़िलाफ़ एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने के ज़ुर्म में POCSO की धारा-376 और संबंधित धाराओं के तहत लोगों को धोखा देने का मामला दर्ज किया गया था।

हजर खान का लव जिहाद: अप्राकृतिक सेक्स के लिए प्रताड़ित कर धर्म बदल चुकी बीवी से करवाता था गैंगरेप का झूठा केस

गुरुग्राम में बुधवार (जुलाई 3, 2019) को पुलिस ने 44 वर्षीय हजर खान को गिरफ्तार किया। हजर पर आरोप है कि वह अपनी 22 वर्षीय पत्नी पर जबरन दबाव बना रहा था कि वह गुरुग्राम अदालत के न्यायाधीश सहित कई लोगों पर यौन उत्पीड़न का झूठा आरोप लगाए, ताकि हजर उन लोगों से पैसे निकलवा सके।

लेकिन, हजर के मनसूबों का खुलासा उस समय हुआ जब उसकी पत्नी जिला और सत्र न्यायाधीश के ख़िलाफ़ उत्पीड़न की शिकायत करने थाने पहुँची। यहाँ काउंसलिंग के दौरान महिला ने स्वीकार लिया कि उसका पति न्यायाधीश के ख़िलाफ़ झूठा आरोप लगाने का दबाव बना रहा है। साथ ही इस बात का भी खुलासा किया कि वह इससे पहले भी लोगों को झूठे आरोप में फँसाने के लिए उसे धमका चुका है।

पुलिस के मुताबिक महिला ने बताया है कि हजर राजस्थान का रहने वाला है और वह उससे 2016 में मिली थी। इस दौरान वह प्राइवेट अस्पताल में नर्स के रूप में कार्यरत थी। हजर ने उसे खुद की पहचान एक डॉक्टर के रूप में बताई और जल्द ही उससे दोस्ती करके, उसे प्रपोज़ भी कर दिया। 2017 में उसने महिला को धर्मांतरण के लिए फोर्स किया और उससे निकाह कर लिया।

मीडिया खबरों के मुताबिक महिला का आरोप है कि हजर खान शादी के कुछ दिन बाद से ही उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगा था। इस दौरान हजर न उसे मारता-पीटता था बल्कि अप्राकृतिक सेक्स करने के लिए भी प्रताड़ित करता था।

महिला ने बताया है कि हत्या की कोशिश में चार महीने की जेल गुजारने वाला हजर 2018 से उसका इस्तेमाल लोगों को फँसाने के लिए करता था। जल्दी पैसे कमाने की चाहत में वह उससे बलात्कार के झूठे मामले दर्ज कराने को कहता था। जिसके चलते 1 मई को महिला ने रेवाड़ी के आठ लोगों पर गैंगरेप का आरोप लगाया था और बाद में सुलह के लिए पैसे की माँग की थी। इसके बाद में 29 जून को महिला ने न्यायाधीश के सामने मानेसर के 4 लोगों पर एक और गैंग रेप का आरोप लगाया था।

लेकिन इस बार जब वह अपने बयान को दर्ज करवाके पति के पास लौटी तो हजर ने गाड़ी में पूछा कि बयान दर्ज कराने में इतना समय क्यों लगा? और फिर उस पर आरोप लगाने लगा कि वो न्यायाधीश के साथ सोई है। नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक 1 जुलाई को वह उसे चंडीगढ़ ले गया और मारपीट कर जबरन एक वकील के पास बैठकर मैजिस्ट्रेट पर रेप का आरोप लगाते हुए शिकायत लिखवाई। उस शिकायत में लिखवाया कि बयान दर्ज करते समय मैजिस्ट्रेट ने रेप किया। फिर शिकायत पर जबरन साइन करवा लिए। महिला ने विरोध किया तो उसने उसकी बेटी को मारने की धमकी दी।

जानकारी के मुताबिक हजर पर केस दर्स हो चुका है और उसे गिरफ्तार भी कर लिया गया है। महिला ने पुलिस को दिए अपने बयान में स्पष्ट किया है कि उसके पति हजर को छोड़कर उसका रेप किसी ने नहीं किया है। अन्य लोगों को सिर्फ़ झूठे आरोप में फँसाया जा रहा था।

सोते वक्त 2 बेटियों से की छेड़खानी, विरोध करने पर निज़ाम, रियाज़, महताब और आफ़ताब ने माँ को मार डाला

उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िले में एक महिला को बुरी तरह से पीट-पीटकर हत्या करने का चौंका देने वाला मामला सामने आया है। मामला भदोही ज़िले के औराई थाना क्षेत्र का है, जहाँ लड़कियों को छेड़ने का विरोध करने पर बिलिकिस बेगम (45 वर्षीय) पर कुछ लोगों ने लाठी से हमला बोल दिया। इस हमले में पाँच अन्य के घायल होने की भी ख़बर है।

ख़बर के अनुसार, औरंगाबाद में मंगलवार (2 जुलाई 2019) की रात पुरानी रंजिश को लेकर हुई मारपीट के बाद तनावग्रस्त परिजनों और ग्रामीणों ने मुआवज़ा और आरोपितों की गिरफ़्तारी के लिए हाईवे पर जाम लगा दिया। मौक़े पर पहुँचे उप जिलाधिकारी जीपी यादव और पुलिस क्षात्राधिकारी यादवेंद्र के काफ़ी समझाने-बुझाने के बाद मामला शांत हुआ। पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ़्तार भी कर लिया।

दरअसल, औराई कोतवाली क्षेत्र के औरंगाबाद निवासी मुदस्सिर और आफ़ताब के बीच पुरानी दुश्मनी थी। मंगलवार की रात गर्मी और उमस के चलते मुदस्सिर की दो बेटियाँ बाहर सो रही थीं। लड़कियों को सोता देख महताब और आफ़ताब ने उन पर फब्तियाँ कसनी शुरू कर दी। मुदस्सिर के लड़के मुजैइयम ने इस बात पर एतराज उठाया तो उनके बीच मारपीट शुरू हो गई। चीख-पुकार सुनकर उसकी माँ बिलिकिस बेगम बीच-बचाव करने पहुँची। विरोध करने पर आफ़ताब, महताब, निज़ाम और रियाज़ ने मुदस्सिर के घर में घुसकर पूरे परिवार पर लाठियाँ बरसाईं। इस बीच मुजैइयम, सफ़ीरुन, जन्नत और साफ़िया गंभीर रूप से घायल हो गए। आनन-फ़ानन में घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।

पुलिस अधीक्षक राजेश एस के अनुसार, हमले में मुदस्सिर की बीवी बिलिकिस बेगम के सिर पर लाठियाँ लगने से वो गंभीर रूप से घायल हो गईं और उन्हें वाराणसी के लिए रेफर किया गया, जहाँ बुधवार की सुबह उनकी मौत हो गई। उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि इस हमले में पाँच लोग घायल हुए हैं। आरोपित निज़ाम और उसके लड़के रियाज़ को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया है। दो अन्य फ़रार (आफ़ताब, महताब) आरोपितों की तलाश जारी है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में तनाव के चलते अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

RSS मानहानि मामला: 15000 रुपए के मुचलके पर राहुल गाँधी को बेल, बोले – मैं निर्दोष

आरएसएस मानहानि मामले में कॉन्ग्रेस पार्टी के सांसद और पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गाँधी को जमानत म‍िल गई है। गुरुवार (4 जुलाई, 2019) को मुंबई की शिवड़ी कोर्ट ने उन्हें जमानत दी।

शिवड़ी कोर्ट में सुनवाई के दौरान राहुल गाँधी ने कहा कि वह दोषी नहीं हैं। कोर्ट ने राहुल गाँधी को 15000 रुपए के मुचलके पर बेल दी। कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्‍यक्ष की तरफ से पूर्व सांसद एकनाथ गायकवाड़ ने बेल बॉन्ड भरा।

आपको बता दें कि आरएसएस से जुड़ा मानहानि का यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या से संबंधित है। राहुल गाँधी ने 2017 में गौरी लंकेश की हत्या को RSS की विचारधारा से जुड़ा और प्रभावित बताया था। इसी मामले में उन पर यह केस दर्ज हुआ था।

राहुल गाँधी के मुंबई आगमन और कोर्ट पहुँचने के बीच कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। उनके समर्थन में जुटी भीड़ चिल्ला रही थी – आपकी लड़ाई में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता साथ हैं।

जायरा ने सिनेमा छोड़ा, मैंने अपनी कला जलाई, आखिरकार कश्मीरी जीत गए: कश्मीरी मॉडल

जायरा वसीम का यूँ मजहब का हवाला देकर बॉलीवुड को अलविदा कहना हर किसी को खटक रहा है। कुछ लोग इसे उनका निजी फैसला कहकर शांत हैं, तो कुछ लोगों के लिए यकीन कर पाना अब भी मुश्किल है कि कोई मजहब की वजह से अपने पूरे करियर को कैसे दाँव पर लगा सकता है? कोई नहीं जानता उनके इस फैसले के पीछे मजहब ही वास्तविक कारण है, या फिर मजहब के ठेकेदार। लेकिन एक बात निश्चित है कि उनके इस फैसले से कई लोग हताश हैं। जिनमें एक नाम कश्मीरी कलाकार सईद रुहानी का भी है। जिन्हें जायरा के फैसले में खुद की आपबीती याद आ गई।

रुहानी ने रवीना टंडन जैसे सेलीब्रेटियों की तरह जायरा पर अपना गुस्सा नहीं उतारा है, लेकिन उन्होंने कश्मीरियों पर चोट जरूर की है। उन्होंने जायरा वसीम का हवाला देकर लिखा, “एक और ने मान ली हार ..जायरा वसीम। तो कश्मीरी दिमाग को काबू करने में कामयाब हो गए हैं। जबरदस्ती भरा व्यवहार….वल्लाह!”

इंडिया टुडे को दिए अपने एक साक्षात्कार में रुहानी ने इस मुद्दे पर बात करते हुए बताया कि उन्हें जायरा से सहानुभूति है। क्योंकि वह भी उस राह पर चल चुकी हैं जहाँ उन्हें सिर्फ़ मजहब के कारण अपनी कला छोड़नी पड़ी थी। वह कहती हैं कि हर कोई इतना प्रतिभाशाली नहीं होता, लेकिन जायरा हैं।

रुहानी का कहना है कि जायरा ने बॉलीवुड छोड़ा क्योंकि शायद उन्हें ग्लानि महसूस होनी शुरू हो गई थी, जिसके पीछे का कारण सामाजिक प्रभाव है। उनका मानना है कि आस-पास का समाज हम पर इस प्रकार से असर डालता है कि यकीन होने लगता है कि हम अपने अल्लाह से दूर जा रहे हैं। वे बताती हैं कि वह खुद इस रास्ते पर जाकर अपने चार साल के काम को जला चुकी हैं।

उनके मुताबिक, हो सकता है कि जायरा ने अपना फैसला खुद लिया है, तो उन्होंने अपनी राह मोड़ ली हो, लेकिन रुहानी के लिए यह उनका रास्ता नहीं था। उनके लिए अपनी प्रतिभा को छोड़ना किसी चरम स्थिति से कम नहीं था, जहाँ उन्होंने कला त्यागकर खुद को भी खो दिया था। रुहानी का मानना है कि जायरा का फैसला कई हद तक समाज से प्रभावित होकर लिया गया है, जैसे उनका खुद का निर्णय भी लोगों की सुना-सुनी में ही लिया गया था।

अपने जीवन का एक लंबा समय कश्मीर में गुजारने के बाद रुहानी जानती हैं कि ‘समाज का प्रभाव’ किसी भी व्यक्ति के निर्णय को कैसे बदलता है, क्योंकि उन्होंने इसे बहुत करीब से महसूस किया है। आज खुद को एक कलाकार, कवियित्री और मॉडल के रूप में पहचान दिलाने वाली रुहानी कहती हैं कि उन्हें उनके काम की वजह से बहुत धमकियाँ मिलीं। कुछ लोगों ने यहाँ तक कहा कि वह अपने काम के कारण मरेंगी, जिस वजह उन्होंने हमेशा अंडर ग्राउंड रहकर काम किया।

अपने इस साक्षात्कार में रुहानी ने सपनों की उड़ान भरने के दौरान और समाज से प्रभावित होने के वक्त जो फर्क़ महसूस किया, उसके बारे में भी बताया है। उन्होंने कहा, “जब मैंने मॉडलिंग शुरू की, तो मैंने देखा कैसे लोग मुझे ट्रीट कर रहे हैं कि मुझे अच्छा लग रहा है, जबकि दूसरी ओर मदरसे में मुझे मारा जाता था, मुझे गाली दी जाती थी, मेरे साथ गलत बर्ताव होता था, और मुझे बंधक बनाकर रखा जाता था, सिर्फ़ इसलिए ताकि मैं अल्लाह के बारे में पढ़-सीख सकूँ।

रुहानी के अनुभव कहते हैं कि कश्मीर एक ऐसी विचारधारा से चलता है जो समाज से प्रभावित है, जहाँ गृहस्थी संभालना बेहद जरूरी है। लेकिन, ऐसी विचारधारा में बढ़ने के साथ उन्हें अपना काम छोड़कर बिलकुल अच्छा नहीं लगा था, क्योंकि उन्हें अपने ही काम से खुशी मिलती थी। वे कहती हैं कि इस्लाम के अनुसार अश्लीलता हराम है, लेकिन ये कहीं नहीं लिखा कि खूबसूरती भी हराम है और जो वो करती थीं वो खूबसूरती की सूची में आता है।

रुहानी के अनुसार उन्हें उनके काम को छोड़ने के लिए बाहर का हर इंसान बहुत जोर डालाता था, दुकानदार से लेकर पड़ोसी तक ने उनसे बात करनी छोड़ दी थी। और फिर ये सब सिर्फ़ बाहरी समाज में नहीं चला बल्कि स्कूल में भी उन्हें कई सालों तक ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

रुहानी कहती हैं कि इस बीच उन्हें मदरसे में भेजा गया, जहाँ जाकर उन्होंने मौत तक को करीब से देखा। वहाँ उन्हें न केवल उन्हें शारीरिक रूप से आघात पहुँचाया गया बल्कि उन्हें कीड़े खिलाए गए। जिस कारण उन्हें आईसीयू तक में जाना पड़ा। मौत को इतने नजदीक देखकर उन्होंने खुद से वादा किया कि वो दोबारा इस तंत्र में पैर नहीं रखेंगी।

ये वही समय था जब उन्होंने बुर्के से भी आजादी पाने की ठान ली थी। क्योंकि वह इस कट्टर तरतीब से अपना विश्वास खो चुकी थीं। उनका मानना है कि ये मजहब के कट्टर ठेकेदार इस बात तक को नहीं जानते कि बुर्के का पर्याय क्या है।

रुहानी की कहानी एक संघर्ष की कहानी है, जिससे आज की लड़कियों को प्रभावित होना चाहिए, लेकिन ये कहानी ये भी बताती है कि कहीं न कहीं जायरा के बॉलीवुड से अलविदा कहने की वजह वही सब कारक हैं जो रुहानी द्वारा कला को जलाने के पीछे थे। शायद इसलिए ही रुहानी उम्मीद लगाती है कि जिस तरह से वे अपने काम पर वापस लौटीं, उसी तरह जायरा भी लौटेंगी। क्योंकि उनका मानना है एक कलाकार हमेशा कलाकार रहता है।