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मुस्लिम अगर नाली में रहना चाहते हैं तो उन्हें वहीं रहने दो: मोदी ने याद दिलाया कॉन्ग्रेस नेता का कथन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (जून 25, 2019) को लोकसभा में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर संसद को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने लोकसभा में शाह बानो केस का जिक्र करते हुए कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा।

अल्पसंख्यकों की बात करने वाली कॉन्ग्रेस की असलियत को बताते हुए मोदी ने कहा कि, “शाह बानो केस के दौरान कॉन्ग्रेस के एक मंत्री ने कहा था कि मुस्लिमों को सुधारने का ठेका सिर्फ कॉन्ग्रेस पार्टी ने नहीं ले रखा है, अगर वो नाली में रहना चाहते हैं तो उन्हें रहने दो।”

पीएम मोदी के ऐसा कहने के बाद ही विपक्ष ने हंगामा करना शुरू कर दिया और उनसे इस बात का सबूत माँगने लगे। जिसके बाद उन्होंने कहा कि हम आपको यूट्यूब का वो लिंक दे देंगे, ताकि ये बात आप भी जान सकें।

पीएम मोदी द्वारा जिस कॉन्ग्रेस नेता का जिक्र किया गया है उस पर विस्तृत रूप से इंडिया स्पेंड (India Spend) नाम की अंग्रेजी वेबसाइट में बताया गया है कि, कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके मोहम्मद आरिफ ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था –

“मुझे इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है कि राजीव गाँधी ने अपने दम पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने का निर्णय लिया था। वो एक आधुनिक सोच वाले व्यक्ति थे वो रूढ़िवादिता को नहीं पसंद करते थे। वास्तव में मैने राजीव गाँधी की फाइलों पर ध्यान दिया था, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि उन्हें प्रगतिविरोधी और रूढ़िवादी तत्वों के साथ समझौता नहीं करना है। पी. वी. नरसिम्हा राव, अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी (तत्कालीन सरकार में मंत्री) की तरफ से उन्हें ऐसा करने के लिए दबाव डाला गया था। उनकी राय थी कि मुस्लिमों को सुधारना कॉन्ग्रेस पार्टी का काम नहीं था, (उन्होंने कहा) “अगर वो नाली में रहना चाहते हैं तो उन्हें रहने दें।”

पीएम नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस समान नागरिक संहिता और शाहबानो मामले से चूक गई, आज फिर एक अवसर आया है, हम महिला सशक्तीकरण के लिए एक विधेयक लाए हैं, कृपया इसे धर्म से न जोड़ें।

शाह बानो प्रकरण: राजीव गाँधी ने कर दिया था मुस्लिम महिलाओं का अदालत जाने का अधिकार खत्म

आपको बता दें कि साल 1986 में शाह बानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने 68 वर्षीय तलाकशुदा शाह बानो बेगम के पक्ष में फैसला दिया और उनके शौहर को 179.20 रुपए का मासिक शाह बानो और उनके बच्चों के रख रखाव के लिए दिया जाए, ये फैसला सुनाया। इसके विरोध में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट कर फरवरी 25, 1986 को राजीव गाँधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) विधेयक, 1986 को लोकसभा में पेश कर दिया।

विपक्ष ने इसका जबरदस्त विरोध किया था। इसके बावजूद मई आते-आते यह राज्यसभा से भी पास होकर कानून का रूप ले चुका था। इसके जरिए तलाक के बाद गुजारा-भत्ता के लिए अदालत जाने का मुस्लिम महिलाओं का अधिकार खत्म हो गया। इस कानून में यह भी साफ कर दिया गया था कि तलाकशुदा बीवियों को उनके शौहर से केवल इद्दत (तीन महीने) तक का ही गुजारा-भत्ता मिलेगा। इसके बाद आरिफ मोहम्मद ने इस कानून के विरोध में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी सरकार की कॉन्ग्रेस सरकार को छोड़ दिया था।

जमीन से उखड़ गया है विपक्ष

कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा, “आपकी ऊँचाई आपको मुबारक हो। आप इतने ऊँचे चले गए हैं कि जमीन दिखना बंद हो गई है। आप इतने ऊँचे चले गए हैं कि आप जड़ों से उखड़ गए हैं। आप इतने ऊँचे चले गए हैं कि आपको जमीन के लोग तुच्छ लगने लगे हैं। आपका और भी ऊँचा होना मेरे लिए संतोष और आनंद की बात है।”

‘किसी को जमानत मिलती है तो वो इंजॉय करे, हम बदले की भावना से काम नहीं करेंगे’

आपातकाल का जिक्र करते हुए हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज 25 जून है, 25 जून की वो रात जब देश की आत्मा को कुचल दिया गया था। भारत में लोकतंत्र संविधान के पन्नों से पैदा नहीं हुआ है, भारत में लोकतंत्र सदियों से हमारी आत्मा है। किसी की सत्ता चली न जाए सिर्फ इसके लिए, उस आत्मा को कुचल दिया गया था।

पीएम नरेंद्र मोदी ने आगे कहा, “हमें इसलिए कोसा जा रहा है क्योंकि हमने फलाने को जेल में क्यों नहीं डाला। ये इमरजेंसी नहीं है कि किसी को भी जेल में डाल दिया जाए, ये लोकतंत्र है। ये काम न्यायपालिका का है। हम कानून से चलने वाले लोग हैं और किसी को जमानत मिलती है तो वो इंजॉय करे। हम बदले की भावना से काम नहीं करेंगे।”

आरिफ़ मोहम्मद खान का एक इंटरव्यू:

सलमान खान ने छीना सायकिल चलाते हुए फोन, लूटपाट और बदसलूकी पर पत्रकार ने कर दी FIR दर्ज

बॉलीवुड के कलाकार सलमान खान एक बार फिर मुश्किलों में घिर गए हैं। मुंबई में उनके खिलाफ एक शख्स ने मामला दर्ज कराया है। शिकायत में शख्स ने अपना फोन छीनने और अपने साथ बदसलूकी करने की बात कही है। इस शिकायत के बाद सलमान खान के बॉडीगार्ड ने मुंबई पुलिस में क्रॉस एप्लिकेशन दी है। 

इस पत्रकार ने सलमान खान पर मुंबई मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष 25 जून को धारा 323, 392, 426, 506, और 34 के तहत लूट, मारपीट और आपराधिक धमकी के लिए शिकायत दर्ज की है। यह शिकायत वरिष्ठ पत्रकार अशोक पांडे ने की है। अशोक पांडेय के अनुसार, सलमान खान ने अप्रैल 19, 2019 को एक इवेंट के दौरान उनका मोबाइल छीना था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अप्रैल के माह सलमान खान सुबह जुहू से कांदिवली की ओर साइकिल से जा रहे थे। इस दौरान अशोक पांडेय ने मोबाइल से सलमान खान का वीडियो शूट करने की कोशिश की। ये बात सलमान को अच्छी नहीं लगी और वो भड़क गए। इसी विवाद पर पत्रकार ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की थी। हालाँकि,
सलमान के बॉडी गार्ड ने अपनी शिकायत में पुलिस को बताया है कि वह शख्स सलमान खान की इजाजत के बिना उनका पीछा कर रहा था। साथ ही उनका विडियो भी बना रहा था।

पत्रकार के वकील का कहना है कि सलमान खान ने उनके मोबाइल से उनका डाटा भी डिलीट कर दिया था।

कॉन्ग्रेस समर्थक तहसीन पूनावाला ने लाइव डिबेट में अय्यर को लगाई लताड़, हार के लिए ठहराया जिम्मेदार

तहसीन पूनावाला को कॉन्ग्रेस पार्टी का बड़ा समर्थक माना जाता है, लेकिन एक लाइव न्यूज़ डिबेट के दौरान उन्होंने पार्टी और पार्टी के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के ऊपर जमकर हमला बोला। दरअसल, हाल ही में एक न्यूज डिबेट में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर और तहसीन पूनावाला हिस्सा ले रहे थे। इस दौरान उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेता को जमकर घेरा और साथ ही उन पर पार्टी की हार का कारण होने का भी आरोप लगाया। पूनावाला ने कॉन्ग्रेस में युवाओं को मौका न देने पर भी सवाल उठाया।

पूनावाला ने इस दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने मिलिंद देवड़ा और राजीव शुक्ला जैसे नेताओं को बाहर कर कुमार केतकर जैसे बेकार और फालतू नेता को राज्यसभा में भेजने के लिए पार्टी की आलोचना की। इसके साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के पूर्वी उत्तर प्रदेश के महासचिव बनाने के फैसले को भी गलत बताया।

तहसीन पूनावाला ने कॉन्ग्रेस की हार के लिए मणिशंकर को जिम्मेदार ठहराया और घमंडी बताया। उन्होंने कहा कि वो बीते जमाने में रहते हैं, उन्हें नए भारत, नए युग की समझ नहीं है। पूनावाला ने अय्यर द्वारा 2014 लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के लिए चायावाला शब्द इस्तेमाल करने का भी जिक्र किया और कहा कि इनके इस शब्द की वजह से प्रधानमंत्री को सहानुभूति मिली, जो कि कॉन्ग्रेस की हार और भाजपा की जीत का कारण बनी। 

गौरतलब है कि, पूनावाला इससे पहले भी मणिशंकर को पार्टी के लिए बोझ कह चुके हैं। 2018 में कॉन्ग्रेस नेता के राज्य सभा में प्रधानमंत्री के भाषण पर हँसने के बाद उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा था, “कॉन्ग्रेस का कट्टर समर्थक होने के नाते मैं ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ कि रेणुका चौधरी और मणिशंकर अय्यर पार्टी के लिए बोझ हैं। इनके घमंड के कारण कॉन्ग्रेस को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह गाँधी और नेहरू जैसों की पार्टी है। ऊपरी सदन में इस हँसी से मैं छटपटा गया।”

सांसद नुसरत जहाँ और मिमी के साथ हुई संसद के बाहर धक्का-मुक्की

मंगलवार (जून 25, 2019) को तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद नुसरत जहाँ रूही जैन और मिमी चक्रवर्ती ने लोकसभा सदस्यता की शपथ ली। नुसरत बंगाल की बशीरहाट लोकसभा सीट से जीतीं हैं, जबकि मिमी बंगाल की जाधवपुर लोकसभा सीट से निर्वाचित हुईं। अभिनेत्री से सांसद बनीं नुसरत और मिमी ने बांग्ला भाषा में लोकसभा सदस्यता की शपथ ली। लेकिन संसद से बाहर निकलते समय दोनों को धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ा।

नुसरत और मिमी चक्रवर्ती को संसद के बाहर मीडिया ने घेर लिया। इस दौरान उनके साथ थोड़ी धक्का-मुक्की हो गई, इस पर दोनों सांसदों ने कहा- ‘धक्का न दें।’

मीडिया के सवालों का जवाब देने के बाद नुसरत और मिमी, दोनों सदन में वापस लौटने की कोशिश करने लगीं। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों ने उनके लिए रास्ता बनाया। लेकिन उनके सिक्योरिटी वालों को धक्का लगा, इस पर उन्होंने कहा, “आप धक्का नहीं मार सकते सर, समझिए बात को।” (You cannot push us sir, please try to understand) इसके बाद नुसरत और मिमी ने मीडिया को दूर कर के वहीं से तस्वीर लेने को कहा।

जब मीडियाकर्मियों ने निकलने का रास्ता नहीं दिया तो मिमी चक्रबर्ती नुसरत के पीछे जाकर खड़ी हो गईं। इस दौरान दोनों सांसद वापस संसद में लौटने लगीं। ऐसे में सुरक्षा बलों ने हस्तक्षेप करके उन्हें निकलने का रास्ता दिया।

सांसद नुसरत जहाँ के सिंदूर, मेंहदी, वंदे मातरम पर इस्लामिक चिरकुट नाराज, दी गंदी गालियाँ

इस बार के लोकसभा चुनाव में तमाम चर्चा के बीच एक सांसद भी चर्चा का विषय बनी रहीं। कारण चाहे राजनीति में ग्लैमर कहिए या फिर पार्टी, लेकिन अभिनेत्री से सांसद बनीं TMC की सांसद नुसरत जहाँ लगातार मीडिया में बनी हुई हैं। नुसरत ने बंगाल की बशीरहाट लोकसभा सीट से जीत हासिल की।

TMC की 2 सांसद, नुसरत जहाँ और मिमी चक्रबर्ती, ने मंगलवार (जून 25, 2019) को लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण की। इस दौरान उन्होंने जय हिंद-वंदे मातरम-जय बांग्ला के नारे भी लगाए। साथ ही, लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला के पैर भी छुए। अपनी शादी के चलते नुसरत जहाँ 17 और 18 जून को सदन में मौजूद नहीं थीं। ऐसे में उन्होंने मंगलवार (जून 25, 2019) को शपथ ग्रहण की।

सिन्दूर-शपथ-वन्दे मातरम: इन 3 वजहों से कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं नुसरत

शपथ लेने के लिए लोकसभा पहुँचीं नुसरत ने गुलाबी और सफेद रंग की खूबसूरत साड़ी पहन रखी थी। वहीं, उनके दोनों कलाइयाँ चूड़ियों से भरी हुई थीं। माँग में सिंदूर और हाथों में मेहंदी सजी हुई थी। उन्होंने अपने शपथ भाषण की शुरुआत ‘अस-सलाम वालेकुम, नमस्कार’ से की। इसके बाद उन्होंने पूरा भाषण बांग्ला में दिया।

उसके बाद नुसरत अचानक से कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गई हैं। कारण है उनका एक जैन व्यक्ति से शादी कर लेना और उसके बाद संसद में वन्देमातरम के साथ शपथ लेना। अक्सर देखा गया है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों की ओर से वन्दे मातरम कहने के प्रति विरोध का स्वर रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण भी इसी बार, इसी संसद में देखने को मिला जब लोकसभा में सांसद पद की शपथ लेते वक्त समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान ने ‘वन्दे मातरम’ कहने से इनकार कर दिया।

उन्होंने वन्दे मातरम को ‘इस्लाम के खिलाफ’ करार दिया है। लेकिन वन्दे मातरम को इस्लाम के खिलाफ करार देने वाले वो अकेले व्यक्ति नहीं हैं। नुसरत जैन के खिलाफ सोशल मीडिया पर लगातार आपत्तिजनक व्यंग्य और टिप्पणियाँ की जा रही हैं। उन्हें हिन्दू से शादी करने के लिए भद्दी गालियों के साथ ही जन्नत में जगह ना मिलने तक की दुआएँ की जा रही हैं।

19 जून को नुसरत जहां रूही जैन कोलकाता के बिजनेसमैन निखिल जैन से शादी के बंधन में बंध गईं। उन्होंने तुर्की में शादी की। इस वजह से नुसरत कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं।

दलित को पीड़ित दिखाना हो तब वह ‘दलित’ है और अपराधी दिखाना हो ‘हिन्दू’ बताया जाएगा

आजकल एक नया ट्रेंड सा चल पड़ा है। कुछ नेताओं ने अंग्रेजों के ‘फूट डालो-राज करो’ की तर्ज पर हिन्दुओं को आपस में ही बाँटने की कोशिशें शुरू कर दी है। बाँटने और राज करने की राजनीति के सिरमौर बन चुके नेताओं ने मुस्लिमों और दलितों को एक साथ रख कर हिन्दुओं को उनसे अलग रखना शुरू कर दिया है। यह ऐसा ही है जैसे हाथी की सूँड़ में अगर चोट लगती है तो कहा जाए कि ये चोट हाथी को थोड़े लगी है, उसकी सूँड़ को लगी है। ये प्रयास इसीलिए किए जा रहे हैं ताकि दलित ख़ुद को हिन्दुओं से अलग देखने लगें, जो कि असंभव है। यह ऐसा ही है, जैसे क़ुरैशियों को कहना कि तुम मुस्लिम नहीं हो। यह ऐसा ही है, जैसे पठानों और मुस्लिमों को अलग कर के देखना।

यह सब चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। इसे समझने के लिए कुछ दिन पीछे कर्नाटक चुनाव से पहले वाले समय को देखने चलते हैं। उस दौरान राज्य के मुख्यमंत्री रहे सिद्धारमैया ने लिंगायत और वीरशैव समुदाय को अलग रिलिजन के रूप में का मान्यता देने की योजना बनाई। इसका सीधा अलक्ष्य था- लिंगायतों को यह एहसास दिलाना कि वे अलग रिलिजन से सम्बन्ध रखते हैं और वे हिन्दू धर्म के अंतर्गत नहीं आते। ‘अलग पहचान’ की इस राजनीति को केंद्र सरकार ने रिजेक्ट कर दिया। मामला हाईकोर्ट में गया और वहाँ मोदी सरकार ने साफ़-साफ़ कहा कि बसवन्ना के अनुयायी अलग धर्म में नहीं आते।

कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के भीतर आने वाले अधिकतर लोग अनुसूचित जाति के अंतर्गत आते हैं और अगर उन्हें हिन्दू धर्म से अलग दर्जा दे दिया जाता तो वे अनुसूचित जाति का दर्जा भी खो देते। लिंगायत समुदाय के गुरु माने जाने वाले बसावा या बसवन्ना 12वीं सदी के भक्ति काल के एक लोकप्रिय कन्नड़ कवि थे। लिंगायत समुदाय का संस्थापक उन्हें ही माना जाता रहा है। बसवन्ना भगवान शिव के परम भक्त थे। अब आप सोचिए, शिवभक्तों को हिन्दुओं से अलग दर्जा देने की कोशिश करने वाले ये नेता दलितों को अलग साबित करने के लिए क्या नहीं करेंगे? एपीजे अब्दुल कलाम ने 2003 में वाजपेयी काल के दौरान संसद में बसावा की प्रतिमा का अनावरण किया था, प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 लंदन में टेम्स नदी के किनारे उनकी प्रतिमा का अनावरण किया।

लेकिन, भाजपा के कार्यकाल में लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने की कोशिश नहीं की गई। ठीक ऐसे ही, आज मंगलवार (जून 25, 2019) को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने हिन्दुओं व दलितों को अलग-अलग रखते हुए उन्हें ऐसे साबित करने की कोशिश की, जैसे हिन्दू और मुस्लिम अलग धर्म और मज़हब हैं। उन्होंने उस कथित पुराने भारत की बात की, जहाँ ‘दलितों और हिन्दुओं’ को एक-दूसरे की फ़िक्र थी। अब ‘दलितों और मुस्लिमों’ पर कथित अत्याचार की बात करते हुए ‘डर का माहौल’ पैदा करने की कोशिश चल रही है ताकि ऐसा प्रतीत हो कि अत्याचार करने वाले हिन्दू हैं और पीड़ित मुस्लिम और दलित। जबकि असल में, अगर अत्याचारी हिन्दू है तो दलित भी उसके अंदर आ गया।

बात-बार पर संविधान की बात करने वाले ऐसे नेताओं व पत्रकारों की जमात को सबसे पहले संविधान की याद दिलानी ही ज़रूरी है। भारत में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों को दलित कहा जाता है। अगर ये नेता मानते हैं कि दलित और हिन्दू अलग-अलग हैं तो फिर मुस्लिमों में किसी जाति को एससी-एसटी का दर्जा क्यों नहीं प्राप्त है? The Constitution (SC) Order, 1950 के मुताबिक़, हिन्दू, जैन और बौद्ध- इन तीन धर्मों के लोगों को छोड़ कर किसी अन्य धर्म से सम्बन्ध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को एससी केटेगरी के अंदर नहीं रखा जा सकता। कहने को तो अगर अर्थ लगाया जाए तो हर धर्म के दबे-कुचले लोगों को दलित कहा जा सकता है क्योंकि दलित शब्द का संविधान में कहीं वर्णन नहीं है।

अगस्त 7, 2018 को भारतीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर मीडिया को ‘दलित’ शब्द के बदले ‘अनुसूचित जाति’ का प्रयोग करने कहा था। यहाँ बात यह है कि आख़िर हिन्दुओं में फूट डालकर अगर वोट मिल भी जाते हैं तो क्या इससे देश और समाज नहीं बँट जाएगा? जो नेता इस तरह के कार्य करते हैं, उन्हें अंग्रेजों से अलग कैसे माना जाए? उदाहरण देखिए। कई मीडिया संस्थानों ने सर्वे के आधार पर यह बताया कि कैसे भारत में मुस्लिमों व दलितों पर अत्याचार हो रहा है, उनसे भेदभाव किया जा रहा है। इसी तरह बीबीसी अपने लेख में कहता है कि नरेंद्र मोदी के भारत में मुस्लिम और दलित अपनी जान के लिए चिंतित हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वाच ने लिखा कि हिन्दू लोग मुस्लिमों व दलितों पर अत्याचार करते हैं।

यह सब किसलिए? जो दलित हिन्दू समाज का ही अंग है, उस अनुसूचित जाति को उसके ही धर्म से अलग पहचान बनाने की कोशिश कर पूरे हिन्दू समुदाय को अलग-थलग करने की कोशिश चल रही है, जिसमें ईसाई मिशनरी, लोभी नेता और हिंदुत्व-विरोधी ताक़तों के साथ-साथ भारत विरोधी ताक़तें भी शामिल हैं। इन्हें आइना दिखाने के लिए दो ऐसी घटनाओं का ज़िक्र करना ज़रूरी है, जहाँ इनके मुँह बंद हो जाते हैं। मई 2018 में तमिलनाडु के थेनी जिले में एक दलित बस्ती में किसी वृद्ध दलित महिला की मौत हो गई। जब वे उस महिला का अंतिम क्रिया कर्म करने के लिए जा रहे थे, तभी मुस्लिमों से उनकी झड़प हुई।

दरअसल, मृत दलित महिला की शवयात्रा मुस्लिम बस्ती से गुज़र रही थी, जिसपर मुस्लिमों ने आपत्ति जताई। बाद में दोनों के बीच लाठी-डंडे से लड़ाई हुई और 30 से अधिक लोग घायल हो गए। इसे क्या कहा जाएगा? इसे हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच लड़ाई कहा जाएगा या फिर दलितों और समुदाय विशेष के बीच, ऐसा हिन्दुओं और दलितों को अलग-अलग देखने वाले विद्वानों को जवाब देना चाहिए? यह निर्भर करता है। अगर दलितों ने नुक़सान पहुँचाया तो इसे हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों पर अत्याचार बना कर पेश किया जा सकता है। अर्थात यह, कि यही दलित तब तो हिन्दू हो जाते हैं (जो कि सही है) जब पीड़ित कोई मुस्लिम हो और यही दलित हिन्दू तब नहीं होते जब मुस्लिमों के साथ उन्हें एक कर के बात की जाती है।

अब दूसरी घटना पर आते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को 1981 में ‘अल्पसंख्यक संस्थान’ का दर्जा दिया गया, जिसे 2005 मे इलाहबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। यूपीए सरकार इस निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई लेकिन राजग सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस अपील को वापस ले लिया। अभी हाल ही में ख़बर आई कि एससी-एसटी कमीशन ने एएमयू से पूछा है कि संस्थान अनुसूचित जाति एवं जनजाति को एडमिशन के दौरान नियमानुसार आरक्षण क्यों नहीं दिया जाता? इस विवाद पर मुस्लिमों व दलितों पर कथित अत्याचार की बात करने वाले किसका पक्ष लेंगे? एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा जब भंग कर दिया गया है तो फिर वहाँ एससी-एसटी को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा?

यकीन मानिए, अगर किसी अन्य विश्वविद्यालय में ऐसा होता तो इसे मोदी सरकार द्वारा दलितों पर अत्याचार के रूप में पेश किया जाता। यूनिवर्सिटी के कुलपति की जाति देखी जाती कि कहीं वह कथित उच्च जाति का तो नहीं है। इसीलिए, यह निर्भर करता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पीड़ित कौन है और अपराधी किसे दिखाना है? अक्सर ख़बरों में अगर दलित परिवारों में लड़ाई हुई हो फिर भी इसे दलितों पर अत्याचार के रूप में ही पेश किया जाता है। दलित को जब पीड़ित दिखाना हो तब उसे दलित कहा जाएगा और जब उसे अपराधी दिखाना हो तो उसे हिन्दू बताया जाएगा। ध्यान दीजिए, आज ये दलितों को हिन्दू धर्म से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं, कल इनकी ज़हर बुझी तलवार ओबीसी जातियों तक पहुँचेगी और ‘मुस्लिमों और ओबीसी’ पर अत्याचार का रोना रोया जाएगा।

नक्सलियों ने जवानों को मारने का बनाया था प्लान, ‘आसमानी बिजली’ ने किया फेल

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर से बम ब्लास्ट की ख़बर सामने आई है। दरअसल, सामरी क्षेत्र के माओवादी प्रभावित क्षेत्र पुंदाग में माओवादियों द्वारा चुनाव के दौरान जवानों को निशाना बनाते हुए IED की सीरीज़ बिछाई गई थी। घटना की जानकारी मिलते ही सामरी थाना क्षेत्र से SI विनोद पासवान अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुँचने के लिए रवाना हुए, लेकिन बारिश के चलते वहाँ नहीं पहुुँच सके, लेकिन CRPF जवानों की टीम बाइक से वहाँ पहुँचने में क़ामयाब रही। इस ब्लास्ट से क्षेत्र तो ज़रूर दहल गया, लेकिन माओवादियों की मंशा पर पानी भी फिर गया।

ख़बर के अनुसार, शुक्रवार (21 जून) की शाम को बारिश के साथ आकाशीय बिजली के सम्पर्क में आने से सड़क पर बिछाए गए सभी 56 IED बम ब्लास्ट हो गए। इतनी भारी मात्रा में IED बिछाने का मक़सद किसी बड़ी घटना को अंजाम देना था। इस घटना के बाद सामरी पुलिस के साथ सामरी, सबाग व बंदुरचुआ में तैनात CRPF के जवान एलर्ट हो गए हैं। फ़िलहाल सुरक्षा की दृष्टि से एक एन्टी लैंड माइंस वाहन भी ज़िले से भेजा गया है।

हालाँकि, इस बम ब्लास्ट में किसी के हताहत होने की कोई ख़बर नहीं है। जानकारी के अनुसार, बलरामपुर-रामानुजगंज ज़िले के चुनचुना-पुंदाग क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शासन-प्रशासन द्वारा कई काम कराए जा रहे हैं। इनमें से एक सबाग से पुंदाग तक सड़क निर्माण कार्य भी है और इस कार्य में माओवादी बाधा बन रहे हैं। उन्होंने इस सड़क निर्माण कार्य में लगी मशीनों और वाहनों को आग लगा दी थी। इतना ही नहीं माओवादियों ने निर्माण कार्य में लगे इंजीनियर और मुंशी का अपहरण तक कर लिया था। 

माओवादियों ने जवानों की जान से मारने के मक़सद से कई बार उन जगहों पर IED बिछाई जहाँ से वो गुजरते हैं। कई बार इन बमों का शिकार स्थानीय चरवाहे और उनके मवेशी हो जाते हैं। ऐसी हरक़तों से माओवादियों ने सड़क निर्माण कार्य में बाधाएँ उत्पन्न की।

बिहार: बच्चों के परिजनों पर प्रशासन ने दर्ज की FIR, डर के मारे पुरुषों ने छोड़ा गाँव

एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) के कारण बिहार में बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है। अस्पतालों में सुविधाओं की कमी है और राज्य सरकार के स्तर पर फिलहाल जो प्रयास हुए भी हैं, वे नाकाफी हैं। इन सबके बीच नेताओं के बयानों ने भी पीड़ितों का दर्द और बढ़ाया है और अब जिला प्रशासन ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिस पर चौतरफा सवाल उठ रहे हैं। जिला प्रशासन ने बच्चों की मौत और जल आपूर्ति को लेकर प्रदर्शन कर रहे 39 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

दरअसल, एईएस के कारण बच्चों की मौत और जल आपूर्ति में कमी को लेकर वैशाली जिले के हरिवंशपुर में लोग सड़क पर उतर आए थे। लोगों ने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और जल आपूर्ति बेहतर करने और बीमारी के खिलाफ जल्द ठोस कदम उठाने की माँग की। जिला प्रशासन ने इनकी माँगें तो नहीं मानीं, मगर प्रदर्शन कर रहे 39 लोगों के खिलाफ एफआईआर जरूर दर्ज करा दी।

जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, उनके रिश्तेदारों ने कहा कि जब उनके बच्चे मर रहे हैं और उनके पास पीने तक के लिए पानी नहीं है तो हम विरोध क्यों ना करें? उन्होंने कहा, “हमारे बच्चे मर रहे हैं। पानी नहीं है। हमने इसके खिलाफ रोड घेराव किया तो प्रशासन ने हम पर केस दर्ज कर दिया। केस दर्ज होने के बाद हमारे परिवारों के पुरुष गाँव छोड़कर भाग गए हैं। घर में कमाने वाले वही थे और अब उनके न होने से हमें और दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।”

गौरतलब है कि, रविवार (जून 23, 2019) को हरिवंशपुर पहुँचे हाजीपुर के सांसद पशुपति कुमार पारस और लालगंज के लोजपा विधायक राजकुमार साह को ग्रामीणों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। बच्चों की मौत से लोग इतने गुस्से में थे कि कोई सांसद को दरवाजे पर कुर्सी तक देने को तैयार नहीं था। उग्र ग्रामीणों ने तो विधायक को बंधक भी बना लिया था। फिर बाद में जब शाह ने पीड़ित परिवारों को ₹5,000 की आर्थिक सहायता दी और साथ ही जरूरी दवाओं का वितरण किया, तब जाकर लोगों ने विधायक को जाने दिया।

प्रतापगढ़ मर्डर: हाथ-पाँव काटकर खाट से बाँधा और झोपड़ी सहित फूँक दिया गया दलित

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के रामपुर बेला गाँव में 35 वर्षीय विनय नामक दलित व्यक्ति को देर रात उसके ही खेत में बनी झोपड़ी में जलाकर मार दिया गया था। इस घटना का पता उस समय चला था जब 17 जून की सुबह विनय की झोपड़ी से धुआँ उठता दिखाई दिया। गाँव के लोगों ने जाकर देखा तो विनय की झोपड़ी और झोपड़ी के अंदर विनय का शव बुरी तरह जल चुका था। खबरों के मुताबिक पता चता चला था कि विनय को उसकी खाट से बाँधकर जलाया गया है। साथ ही उसकी मोटरसाइकल भी उसी आग में जला दी गई।

इस घटना में पहले ग्रामीणों को लग रहा था कि ‘विशेष समुदाय’ के लोगों द्वारा इस घटना को अंजाम दिया गया है, क्योंकि एक दिन पहले ही भारत-पाक की जीत पर विनय की उनसे झड़प हुई थी, जबकि विनय के परिवार ने बताया कि विनय अपने परिवार के साथ मैच देख रहा था लेकिन उसने ऐसे किसी झगड़े के बारे में नहीं बताया।

इस मामले पर स्वराज मैगजीन की पत्रकार स्वाति गोयल ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट की, ताकि मामले के अनसुलझे सिरों पर प्रकाश डाला जा सके। स्वाति की रिपोर्ट के अनुसार विनय की इतनी बेरहमी और क्रूरता से हत्या की गई कि न केवल ग्रामीण बल्कि मेडिकल प्रोफेशनल्स भी उसे देखकर हैरान रह गए।

रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीणों ने बताया कि विनय का शव विखंडित हो रखा था, उसके हाथ-पाँव काट दिए गए थे और उसका शव लोहे की तार से खाट में बंधा हुआ था। विनय के भाई का कहना है कि उसे यह भी संदेह है कि विनय का गला तक काट दिया गया था। साथ ही, उसके पेट की जगह उन्हें सिर्फ़ राख़ दिखाई दे रही थी।

स्वाति के मुताबिक पट्टी पुलिस थाने के एसएचओ अखिलेश प्रताप सिंह ने बताया कि ‘अनजान’ व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया। जाँच जारी है और पुलिस ने पूछताछ के लिए 2 लोगों को हिरासत में लिया है। इन 2 लोगों में विनय का एक साथी प्रेम सरोज भी शामिल किया है जो सूअर चराने के काम में विनय के साथ काम करता था। हालाँकि विनय के परिवार ने इस हत्या में प्रेम के नाम होने की संभावना को मना किया है क्योंकि उनके लिए वह एक परिवार जैसा है।

विनय के परिवार वालों का शक इस हत्या में उन लोगों पर जा रहा है जो उस रात 100 मीटर दूरी पर निर्माणाधीन फार्म हाउस में मांस और शराब के साथ पार्टी कर रहे थे। परिवार के शक के पीछे बहुत से कारण हैं, जिनसे गाँव वाले भी सहमति जता रहे हैं।

परिवार के शक का कारण:

  • जिस तार से विनय को बाँधा गया, बिलकुल वैसी ही तार का प्रयोग निर्माण स्थल पर किया जा रहा था।
  • ऐसा मुमकिन ही नहीं कि विनय पर इतनी क्रूरता से हमला किया गया और पार्टी कर रहे उन लोगों को सुनाई ही नहीं दिया हो।
  • फार्महाउस की तरफ़ खून के निशान मिले हैं।
  • दो लोग जो कि फार्महाउस के पार्टनर्स से संबंधित है, वो आपराधिक प्रवृति के हैं।

हालाँकि विनय के परिवार के पास फार्महाउस में पार्टी कर रहे लोगों पर इल्जाम लगाने का कोई मकसद नहीं है, उनका कहना यह भी है कि विनय की किसी के साथ कोई दुश्मनी नहीं थी, वह लोग इस बात को भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कोई विनय की हत्या क्यों करेगा।

परिवार के शक के बारे में पुलिस का कहना है कि अभी तक उनके पास इस तरह की कोई शिकायत दर्ज नही हुई है। और ग्रामीणों का इस घटना को लेकर कहना है कि उन्होंने इस तरह का भयंकर अपराध 1998-99 के बाद देखा जब एक 5 लोगों के परिवार की अज्ञात हत्यारों द्वारा हत्या कर दी गई थी।

गौरतलब है इस गाँव की आधे से ज्यादा आबादी दलितों की है जिन्होंने जाति और सांप्रदायिक संघर्ष कभी नहीं देखे। इस घटना के बाद कई स्थानीय राजनेताओं ने परिवार से मिलकर उन्हें मदद की पेशकश की। जानकारी के अनुसार इस मामले में पुलिस के पास अब तक हत्यारों को लेकर कोई सुराग नहीं हैं और विनय के परिवार वालों के पास भी इन सवालों का कोई जवाब नहीं है कि हत्यारे कौन हो सकते हैं और विनय को मारने के क्या कारण हो सकते हैं?

स्पीकर ही नहीं हम तमिलनाडु की सरकार को भी हटाना चाहते हैं: स्टालिन

द्रमुक अध्यक्ष एमके स्टालिन ने सोमवार को धमकी दी कि पलानिस्वामी की अन्नाद्रमुक सरकार को तमिलनाडु की सत्ता से जल्दी-से-जल्दी हटाने के लिए उनकी पार्टी प्रयासरत है। हालाँकि वह राज्य की विधानसभा में स्पीकर के खिलाफ महज अविश्वास प्रस्ताव की बात कर रहे थे जिस पर 1 जुलाई को बहस होनी है, लेकिन उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि स्पीकर ही नहीं, द्रमुक पूरी सरकार को ही हटा देना चाहता है। “निर्वाचन के बिना भी सत्ता-परिवर्तन सम्भव है और द्रमुक जल्दी ही सत्ता की बागडोर छीन लेगा। स्पीकर से ज्यादा मुख्यमंत्री को हटाना जरूरी है।” स्टालिन तमिलनाडु में पानी के अभूतपूर्व संकट से निपटने में राज्य सरकार की नाकामी के खिलाफ हो रहे भारी विरोध प्रदर्शन को सम्बोधित कर रहे थे।

‘लोकतान्त्रिक नैतिकता’ से यू-टर्न 

स्टालिन का यह नया रुख द्रमुक की पहले की स्थिति के ठीक उलट है। पहले द्रमुक की नीति थी कि वह सरकार गिराने के लिए निर्वाचन के अलावा कोई रास्ता नहीं अख्तियार करेगा। यहाँ तक कि लोक सभा निर्वाचन के साथ हुए विधानसभा की सीटों के उप-निर्वाचन में भी स्टालिन ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि द्रमुक सत्ता-परिवर्तन के लिए अनैतिक तरीके नहीं अपनाएगा। लोकसभा में भी तमिलनाडु की 38 सीटों में से 37 पर अपने प्रत्याशियों को जिताने में सफल रहा था।

ऐसे में यह माना जा रहा है द्रमुक के विधानसभा निर्वाचन में जाने से कतराने का कारण विधानसभा उप-निर्वाचन हैं। लोक सभा के लिए उसी जनता द्वारा बुरी तरह नकारे जाने के बाद भी अन्नाद्रमुक 22 में से 9 सीटों पर अपने प्रत्याशियों को जिताने में कामयाब रहा था। स्टालिन शायद इसे इस रूप में देख रहे हैं कि भले ही तमिल जनता उन्हें राष्ट्रीय फलक पर राज्य के प्रतिनिधित्व के लिए बेहतर माने, लेकिन राज्य पर शासन के लिए अभी वह निर्णायक रूप से अन्नाद्रमुक सरकार से विमुख नहीं हुई है।

‘अविश्वास प्रस्ताव से घबरा गई है सरकार’  

स्टालिन का कहना है कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव से घबरा रही है। ऐसे में 28 जून (शुक्रवार) को शुरू हो रहे विधानसभा सत्र पर निगाहें टिक गईं हैं। द्रमुक ने यह अविश्वास प्रस्ताव लोक सभा निर्वाचन के पहले पेश किया था, जब स्पीकर पी धनपाल ने अन्नाद्रमुक के बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने की कार्रवाई शुरू कर दी थी। स्टालिन ने मंत्रियों और अन्नाद्रमुक के पदाधिकारियों द्वारा वर्षा के लिए पूजा-पाठ कराए जाने पर भी तंज कसते हुए कहा कि यह बारिश कराने के लिए नहीं बल्कि सत्ता बचाने के लिए हो रहा है।

स्टालिन ने यह भी कहा कि उन्होंने जब इस आसन्न जल-संकट की चेतावनी एक साल पहले दी थी तो अन्नाद्रमुक सरकार ने उनकी बात अनसुनी कर दी थी। “अन्नाद्रमुक के पिछले आठ साल के शासनकाल में एक भी बड़ी पेयजल योजना पूरी नहीं हो पाई है।” 234 सदस्यों की विधानसभा में अन्नाद्रमुक के पास 119 विधायकों का साधारण बहुमत है। इसके अलावा उसके तीन विधायक बागी हैं, और तीन अन्य की निष्ठा संदिग्ध है। वहीं द्रमुक के पास 100 और उसकी गठबंधन की साथी कॉन्ग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के पास 7 सीटें हैं। अन्नाद्रमुक ने स्टालिन के दावे को ‘दिन के ख्वाब’ कह कर खारिज कर दिया है।