Home Blog Page 59

क्या है CBSE की री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया, क्यों 12वीं के छात्र वेदांत के पोस्ट से उठ रहे सवाल; अंग्रेजी-कंप्यूटर साइंस का प्रोसेस चंगा तो फिजिक्स में क्यों पंगा: जानिए सब कुछ

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वेदांत नाम के एक छात्र ने एक पोस्ट किया है। अपने ‘एक्स’ हैंडल @VEDANTSHRIV17 पर उन्होंने बताया कि वह कक्षा 12वीं के छात्र हैं और दावा किया कि उनकी फिजिक्स (Physics) विषय की आंसर शीट असल में उनकी नहीं है। हालाँकि, वेदांत के इस दावे पर कई यूजर्स ने आशंका जताई है।

पोस्ट में वेदांत ने बताया कि 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में उन्हें फिजिक्स में काफी कम नंबर मिले, जिसके बाद उन्होंने CBSE की री-इवैल्यूएशन (पुनर्मूल्यांकन) प्रक्रिया के तहत आंसर शीट की फोटोकॉपी के लिए आवेदन किया था। 23 मई 2026 को आंसर शीट की फोटोकॉपी मिलने के बाद वेदांत ने दावा किया कि जो आंसर शीट उन्हें CBSE ने दी है, वह उनकी है ही नहीं।

(स्क्रीनशॉट साभार: X-@VEDANTSHRIV17)

वेदांत ने फिजिक्स की आंसर शीट की फोटोकॉपी की शेयर

वेदांत ने अपनी शिकायत को लेकर ‘एक्स’ पर पूरा एक थ्रेड पोस्ट किया। इस थ्रेड में वेदांत ने अपनी शिकायतों के साथ-साथ कई विषयों की आंसर शीट की फोटोकॉपी शेयर करते हुए CBSE से सवाल किए। वेदांत ने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि आंसर शीट की फोटोकॉपी में जो हैंडराइटिंग है, वो उनकी नहीं है। यहाँ तक उन्होंने दावा किया कि कॉपी में वो सवाल भी नहीं थे, जिन्हें उन्होंने परीक्षा में हल किया था।

वेदांत के मुताबिक, सिर्फ उन्होंने ही नहीं, बल्कि उनके परिवार, शिक्षकों और उनकी लिखावट को पहचानने वाले हर व्यक्ति ने तुरंत यह फर्क समझ लिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने फिजिक्स की कॉपी की तुलना अपनी इंग्लिश और कंप्यूटर साइंस की आंसर शीट्स के साथ-साथ अपने हाथ से लिखे नोट्स से भी की, इन्हें वेदांत ने एक्स पर पोस्ट भी किया।

वेदांत का कहना है कि इंग्लिश और कंप्यूटर साइंस की कॉपियाँ एक-दूसरे से साफ मेल खाती हैं, लेकिन फिजिक्स की कॉपी पूरी तरह किसी दूसरे छात्र की लगती है। उन्होंने दावा किया कि कोई भी व्यक्ति खुद इन आंसर शीट्स की तुलना करके फर्क आसानी से देख सकता है।

(स्क्रीनशॉट साभार: X-@VEDANTSHRIV17)

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह सच है, तो फिर आखिर उनके रोल नंबर पर किस कॉपी का मूल्यांकन किया गया- उनकी असली कॉपी का या किसी दूसरे छात्र की कॉपी का। वेदांत का कहना है कि अब यह मामला सिर्फ ‘री-चेकिंग’ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह CBSE के OSM सिस्टम में आंसर शीट एक्सचेंज या टैगिंग में हुई किसी गंभीर गलती का मामला हो सकता है।

वेदांत ने CBSE से माँग की कि मामले की तुरंत जाँच की जाए, उनकी असली फिजिक्स आंसर शीट को सत्यापित किया जाए, OSM टैगिंग और स्कैनिंग प्रक्रिया का ऑडिट किया जाए, यह जाँच हो कि कहीं आंसर शीट्स की अदला-बदली तो नहीं हुई, और यह सुनिश्चित किया जाए कि सही कॉपी का ही मूल्यांकन हो।

तीन विषयों का री-इवैल्यूएशन करवाया, फिजिक्स में ही मिली शिकायत

मामला सामने आने के बाद ABP न्यूज ने छात्र से बातचीत की, जिसमें उन्होंने पूरी बात विस्तार से बताई। छात्र वेदांत ने दावा किया कि फिजिक्स की आंसर शीट के पहले पेज पर, जहाँ रोल नंबर और बाकी डिटेल्स लिखी हुई हैं, वहाँ उसकी हैंडराइटिंग दिखाई देती है। लेकिन जिस पेज से प्रश्नों के उत्तर लिखने शुरू होते हैं, वहाँ की लिखावट पूरी तरह अलग नजर आती है। अपने इस दावे को साबित करने के लिए वेदांत ने कई तर्क भी दिए।

वेदांत का कहना है कि उन्होंने इंग्लिश, कंप्यूटर साइंस और फिजिक्स समेत तीन विषयों का री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन किया था। छात्र ने कहा कि इंग्लिश और बाकी विषयों की आंसर शीट में उसकी असली हैंडराइटिंग साफ दिखाई देती है, जबकि फिजिक्स की कॉपी में लिखावट उससे बिल्कुल मेल नहीं खाती। उसने कहा कि फिजिक्स की आंसर शीट में मोटी और चौड़ी हैंडराइटिंग है, जबकि वह हमेशा पतला और छोटा लिखता है। छात्र वेदांत ने यह भी बताया कि फिजिक्स की कॉपी में सबसे पहले MCQ हल किए गए हैं, जबकि वह कभी भी परीक्षा की शुरुआत MCQ से नहीं करते।

वेदांत के मुताबिक, बाकी विषयों में उसके अच्छे नंबर आए हैं और उसे फिजिक्स में भी 90 से ज्यादा अंक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन रिजल्ट में उसे सिर्फ 65 नंबर मिले। वहीं परिवार का कहना है कि अगर यह कॉपी उनके बच्चे की है ही नहीं, तो री-इवैल्यूएशन करवाने का क्या मतलब रह जाता है। परिवार ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले की वजह से उनके बच्चे का ओवरऑल स्कोर खराब हो गया, जिससे उसके भविष्य पर भी खतरा खड़ा हो गया है।

सोशल मीडिया पर वेदांत के दावे पर जताई गई आशंका

सारे सबूत दिखाने के बावजूद सोशल मीडिया पर यूजर्स वेदांत के दावे पर आशंका जता रहे हैं। इस मामले को लेकर एक्टिव एडवोकेट विनीत जिंदल ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया कि लोग वेदांत को ‘पाकिस्तानी’ बता रहे हैं, लेकिन यह मामला असली है। विनीत जिंदल ने बताया कि उन्होंने वेदांत के भाई से बात की और सोशल मीडिया पर ऐसे कमेंट्स से परिवार दुखी है।

साथ ही उन्होंने बताया कि वेदांत और उनके परिवार लगातार CBSE के साथ संपर्क में है और अगर वह बोर्ड की कार्रवाई से संतुष्ट नही होते हैं तो वे कानूनी कार्रवाई करेंगे। ऐसे में एडवोकेट विनीत जिंदल ने वेदांत और उनके परिवार की सहायता के लिए निशुल्क उनका केस लड़ने का भी आश्वासन दिया है।

CBSE की री-इवैल्यूशन प्रक्रिया क्या है और कैसे होता है आवेदन?

CBSE बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट जारी होने के बाद अगर किसी छात्र को अपने अंकों को लेकर संदेह होता है, तो बोर्ड उसे री-इवैल्यूशन यानी पुनर्मूल्यांकन का मौका देता है। यह प्रक्रिया खासतौर पर उन छात्रों के लिए होती है जिन्हें लगता है कि उनकी कॉपी सही तरीके से जाँची नहीं गई, किसी उत्तर के अंक छूट गए हैं या कुल नंबर जोड़ने में गलती हुई है। CBSE हर साल रिजल्ट जारी होने के बाद इसके लिए तय समय सीमा के भीतर ऑनलाइन आवेदन की सुविधा देता है।

री-इवैल्यूएशन की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले छात्र ‘वेरिफिकेशन ऑफ मार्क्स’ के लिए आवेदन कर सकता है। इस चरण में बोर्ड यह जाँच करता है कि कहीं नंबर जोड़ने में गलती तो नहीं हुई, कोई उत्तर बिना जाँचे तो नहीं छूट गया या अंक अपलोड करने में कोई त्रुटि तो नहीं हुई। अगर छात्र इस प्रक्रिया के बाद भी संतुष्ट नहीं होता, तो वह अपनी आंसर शीट की फोटोकॉपी माँग सकता है। कॉपी मिलने के बाद छात्र यह देख सकता है कि उसकी आंसर शीट में किस तरह जाँच की गई है और किन सवालों में कितने अंक दिए गए हैं।

इसके बाद तीसरा और सबसे अहम चरण री-इवैल्यूएशन का होता है। इसमें छात्र उन सवालों को चुन सकता है जिनके मूल्यांकन पर उसे आपत्ति है। CBSE उन्हीं उत्तरों की दोबारा जाँच करवाता है। हालाँकि, बोर्ड पूरे पेपर की दोबारा जाँच नहीं करता, बल्कि केवल उन्हीं सवालों को री-इवैल्यूएट किया जाता है जिन्हें छात्र चुनकर आवेदन में शामिल करता है। इस प्रक्रिया के बाद अगर नंबर बढ़ते हैं, घटते हैं या पहले जैसे ही रहते हैं, तो वही अंतिम माने जाते हैं और उसके बाद किसी तरह की चुनौती स्वीकार नहीं की जाती।

कौन कर सकता है आवेदन?

री-इवैल्यूशन के लिए आवेदन केवल वही छात्र कर सकते हैं जिन्होंने संबंधित परीक्षा दी हो और तय समय सीमा के भीतर फीस जमा की हो। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होती है और छात्र CBSE की आधिकारिक वेबसाइट cbse.nic.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। हर चरण के लिए अलग-अलग फीस निर्धारित होती है, जो हर विषय या हर प्रश्न के हिसाब से ली जाती है। बोर्ड आमतौर पर रिजल्ट घोषित होने के कुछ दिनों बाद आवेदन की तारीखें जारी करता है, इसलिए छात्रों को नियमित रूप से CBSE की वेबसाइट पर नजर बनाए रखने की सलाह दी जाती है।

महर्षि कपिल का श्राप, भगवान विष्णु के चरण और महादेव की जटाएँ: गंगा दशहरा पर जानिए धरती पर कैसे हुआ ‘मैया’ का अवतरण, पवित्र धाराओं के क्या हैं 7 प्रमुख नाम

सनातन धर्म में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि आस्था, जीवन, मोक्ष और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक मानी जाती हैं। भारतीय संस्कृति में माँ गंगा को ‘मोक्षदायिनी’, ‘पापहारिणी’ और ‘पतित पावनी’ कहा गया है। हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा इसी दिव्य आस्था और पौराणिक परंपरा का महापर्व है।

मान्यता है कि इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति, आस्था, तपस्या, त्याग और मोक्ष की भावना का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें प्रकृति, नदियों और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति सम्मान करना भी सिखाता है।

क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा?

गंगा दशहरा माँ गंगा के स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, इसी दिन माँ गंगा राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर धरती पर आई थीं। गंगा का अवतरण केवल पृथ्वी को पवित्र करने के लिए नहीं था, बल्कि राजा सगर के पुत्रों की आत्मा को मोक्ष दिलाने और समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए हुआ था।

‘दशहरा’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है, ‘दश’ यानी दस और ‘हरा’ यानी नाश करने वाला। वराह पुराण के अनुसार, इस दिन गंगा स्नान और पूजा करने से मनुष्य के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इसलिए इसे गंगा दशहरा कहा जाता है।

मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन माँ गंगा में स्नान करने, गंगा जल का प्रयोग करने, मंत्र जाप, पूजा-पाठ और दान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक शुद्धि आती है। इस दिन किए गए दान-पुण्य का फल कई गुना बढ़ जाता है।

गंगा अवतरण की पौराणिक कथा

गंगा दशहरा का सबसे प्रमुख आधार राजा भगीरथ और माँ गंगा की पौराणिक कथा है, जिसका उल्लेख कई पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। कथा के अनुसार, सूर्यवंशी राजा सगर ने अपनी शक्ति और साम्राज्य की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था।

यज्ञ का घोड़ा पूरे राज्य में घूम रहा था, लेकिन देवराज इंद्र ने भय और ईर्ष्या के कारण उस घोड़े को चुराकर महर्षि कपिल के आश्रम में बाँध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते-करते कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँच गए। वहाँ घोड़ा देखकर उन्होंने महर्षि कपिल पर चोरी का आरोप लगाना शुरू कर दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI)

उनके शोर और अपमान से महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई। क्रोधित होकर उन्होंने अपने तेज से सभी पुत्रों को भस्म कर दिया। बाद में बताया गया कि इन आत्माओं को तभी मुक्ति मिल सकती है जब स्वर्ग की पवित्र गंगा पृथ्वी पर उतरकर उनकी अस्थियों को स्पर्श करे। कई पीढ़ियों तक प्रयास चलता रहा, लेकिन सफलता नहीं मिली।

आखिरकार राजा सगर के वंशज महाराज भगीरथ ने कठोर तपस्या की। वर्षों तक तप करने के बाद ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। लेकिन एक समस्या थी वो ये कि गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी।

तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। गंगा का तेज और वेग शिव की जटाओं में बंध गया। बाद में शिव जी ने धीरे-धीरे अपनी जटाओं से गंगा की धाराओं को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। यही दिव्य घटना ‘गंगावतरण’ कहलाती है।

गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुई उस स्थान तक पहुँचीं जहाँ राजा सगर के पुत्रों की अस्थियाँ थीं। गंगा के जल के स्पर्श से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसी कारण गंगा को ‘भागीरथी’ भी कहा जाता है।

माँ गंगा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ और आध्यात्मिक महत्व

हिंदू धर्म में माँ गंगा को सबसे पवित्र नदी माना गया है। पुराणों के अनुसार, गंगा का उद्भव भगवान विष्णु के चरणों से हुआ था और वे भगवान शिव की जटाओं में निवास करती हैं। यही कारण है कि गंगा को देवत्व प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा स्नान से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है।

माना जाता है कि गंगा जल कभी अशुद्ध नहीं होता और उसमें दिव्य ऊर्जा विद्यमान रहती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने गंगा को सात धाराओं में विभाजित किया था। ये धाराएँ थीं, नलिनी, हृदिनी, पावनी, सीता, चक्षुष, सिंधु और भागीरथी। इनमें भागीरथी धारा ही आगे चलकर गंगा कहलायी।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार ऋषि जह्नु की तपस्या में गंगा के वेग से बाधा उत्पन्न हुई तो उन्होंने क्रोधित होकर गंगा को पी लिया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को अपनी जांघ से बाहर निकाला। तभी से गंगा ‘जान्हवी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

स्कंद पुराण और वराह पुराण में गंगा दशहरा के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, गंगा केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन और आत्मा की भी शुद्धि करती हैं।

गंगा दशहरा पर क्या-क्या किया जाता है?

गंगा दशहरा के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। यदि संभव हो तो गंगा नदी या किसी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है। जो लोग गंगा तट तक नहीं पहुँच पाते, वे घर में स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करते हैं।

इस दिन श्रद्धालु माँ गंगा की विशेष पूजा करते हैं। पूजा में दस प्रकार के पुष्प, दस दीपक, दस फल या दस प्रकार की पूजन सामग्री रखने की परंपरा है। यह दस पापों के नाश का प्रतीक माना जाता है। गंगा स्तोत्र, गंगा चालीसा और ॐ नमः शिवाय जैसे मंत्रों का जाप किया जाता है। कई लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गंगा आरती में भाग लेते हैं।

दान-पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व है। कई लोग ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और पितरों की शांति के लिए तर्पण भी करते हैं।

हरिद्वार, प्रयागराज और काशी में गंगा दशहरा की भव्यता

गंगा दशहरा के अवसर पर देशभर के प्रमुख गंगा घाटों पर विशेष रौनक दिखाई देती है। हरिद्वार की हर की पौड़ी पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होकर गंगा स्नान करते हैं। मान्यता है कि यहाँ अमृत की बूंदें गिरी थीं और भगवान विष्णु के चरण चिह्न आज भी मौजूद हैं।

हरिद्वार में गंगा दशहरा के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ (फोटो साभार:NDTV)

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालु गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करते हैं। यहाँ लोग पितृ तर्पण और विशेष पूजा भी करते हैं।

काशी यानी वाराणसी में गंगा दशहरा का अलग ही आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिलता है। बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान को अत्यंत शुभ माना जाता है। शाम के समय दशाश्वमेध घाट की भव्य गंगा आरती श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

काशी में गंगा आरती का अलौकिक दृश्य (फोटो साभार: Tripadvisor)

गंगा दशहरा का आध्यात्मिक संदेश

गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन को शुद्धता, सेवा, तपस्या और मोक्ष का संदेश देने वाला उत्सव है। राजा भगीरथ की तपस्या यह सिखाती है कि संकल्प और श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। माँ गंगा का अवतरण यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए होती है।

आज जब नदियों को बचाने और प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब गंगा दशहरा हमें यह भी याद दिलाता है कि गंगा केवल पूजा की नहीं, संरक्षण की भी अधिकारी हैं। आस्था तभी पूर्ण होगी जब हम माँ गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने का संकल्प भी लें।

गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति, श्रद्धा और अध्यात्म का ऐसा पर्व है जो केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा भी देता है। माँ गंगा की पावन धारा सदियों से मानवता को जीवन, शांति और मुक्ति का संदेश देती आई है और आगे भी देती रहेगी। यह पर्व हमें अपने धर्म, संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान करना सिखाता है।

गंगा की धारा केवल जल नहीं बहाती, बल्कि युगों-युगों से श्रद्धा, विश्वास और मुक्ति की भावना भी प्रवाहित करती आ रही है। इसलिए गंगा दशहरा का पर्व भारतीय संस्कृति में सदैव विशेष महत्व रखेगा और आने वाली पीढ़ियों को भी आध्यात्मिकता और मानवता का मार्ग दिखाता रहेगा।

यूक्रेन में रूस की जिस Oreshnik मिसाइल ने मचाई तबाही, क्या भारत के पास भी है वैसा हथियार?: जानें अग्नि-V के बारे में, जिसकी MIRV तकनीक है बेहद खास

रूस ने यूक्रेन पर ओरेश्निक (Oreshnik) हाइपरसोनिक मिसाइल और ड्रोन से कीव समेत कई शहरों पर भीषण हमले किए हैं। रविवार रात हुए इन भीषण हमलों में रिहायशी इलाकों और नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया। इस हमले से भारी तबाही मची है और कई लोगों की मौत हो गई है। ओरेश्विक मिसाइल परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम है जो IRBM (Intermediate-Range Ballistic Missile) यानी मध्यम दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल है।

भारत की बात करें तो यहाँ अग्नि 4 इस तरह की मिसाइल है, वहीं अग्नि-5 ICBM (Intercontinental Ballistic Missile) यानी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है, जो लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल है।

रूसी ओरेश्रिक मिसाइल की खासियत

रूस का ओरेश्निक (Oreshnik) हाइपरसोनिक क्षमता वाली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे रूस ने 2024 में पहली बार सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल करने का दावा किया था। यह अपनी तेज गति, कई वारहेड ले जाने की क्षमता यानी एक साथ कई लक्ष्यों को साधना और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में माहिर है। रूसी भाषा में ओरेश्निक शब्द का मतलब होता है- हेजल ट्री यानी जब मिसाइल के कई वॉरहेड रोशनी की लकीरों की तरह गिरते हैं, जो ये पेड़ की तरह दिखते हैं।

रूस का कहना है कि यह मिसाइल ध्वनि की गति से 10 गुणा तेज चल सकती है। लंबी दूरी तक हमला कर सकती है और बीच में जरूरत के मुताबिक रास्ता बदल सकती है, जिससे इसे ट्रैक करना और रोकना काफी मुश्किल होता है। यह दोनों तरह के हथियारों यानी परमाणु हथियारों के साथ-साथ पारंपरिक हथियारों को ले जाने में सक्षम है।

ओरेश्निक एक न्यूक्लियर हथियार भी है। इसका मतलब है कि इसे न्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है, इसलिए इसकी मारक क्षमता एक न्यूक्लियर हथियार के बराबर है, भले ही उसमें पारंपरिक वॉरहेड लगा हो।

इसकी रफ्तार करीब 1000–16000 किमी प्रति घंटा (620 से 990 मील) है यानी इतनी तेज रफ्तार की वजह से सामान्य एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया का बहुत कम समय मिलता है, इसलिए इसे इंटरसेप्ट करना काफी मुश्किल है।

रूस ने अब तक तीन बार यूक्रेन युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया है। पहली बार नवंबर 2024 में निप्रो शहर पर हमला किया गया। दूसरी बार जनवरी 2026 में पॉलेंड के बॉर्डर के नजदीक के पश्चिमी लवीव क्षेत्र में किया गया। तीसरी बार 24 मई 2026 को इसका इस्तेमाल राजधानी कीव में किया गया है।

अमेरिका का मानना है कि ओरेश्निक मिसाइल 2008 में पहली बार डेवलप की गई ‘RS-26 रुबेज’ इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) पर आधारित है। यह शक्तिशाली हथियार जमीन के नीचे तीन, चार या उससे भी ज्यादा मंजिल नीचे बने बंकरों को तबाह करने में सक्षम है। 30 दिसंबर, 2025 को रूस ने बेलारूस में ओरेश्निक सिस्टम तैनात किया था, जिससे यूरोप के किसी भी देश को टारगेट किया जा सकता है।

यूक्रेन पर तीन ओरेश्निक हमले के तीन संदेश

रूस ने इसका इस्तेमाल यूरोप और दुनिया को मैसेज देने के लिए किया है। एक तरह से हाइपरसोनिक मिसाइल से हमला शक्ति प्रदर्शन भी है। पहली बार इस मिसाइल से हमला कर रूस ने अमेरिका को संदेश दिया था, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही पूर्व डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति जो बाइडेन के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार ने यूक्रेन को रूस में टारगेट पर हमला करने के लिए आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम (ATACMS) का इस्तेमाल करने की अनुमति दी। ये अमेरिका ने ही यूक्रेन को दिए थे और इसके इसके इस्तेमाल से पहले अमेरिका की मंजूरी जरूरी है।

दूसरी बार रूस ने यूरोप और नाटो को संदेश देने के लिए हमला किया। यही वजह है कि हमला नाटो के सदस्य पॉलेंड के बॉर्डर के नजदीक के पश्चिमी लवीव क्षेत्र में किया गया। दरअसल नाटो ने यूक्रेन को मदद देने का ऐलान किया था। दरअसल इस युद्ध की शुरुआत ही यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की नाटो में शामिल होने की जिद की वजह से शुरू हुई थी। रूस किसी भी हाल में अपने पड़ोसी यूक्रेन को नाटो में शामिल होने की अनुमति देने को तैयार नहीं था।

तीसरा हमला दरअसल यूक्रेन की राजधानी पर करके रूस ने साफ कर दिया है कि उसे कोई नहीं रोक सकता। यूक्रेन और पश्चिमी देशों को संदेश भी दिया है कि रूस के पास उन्नत मिसाइल तकनीक अभी भी मौजूद हैं।

भारत के पास है अग्नि-V

रूस के इस कदम के बाद भारत की मारक क्षमता पर भी दुनिया की नजरें टिक गई हैं। भारत ने हाल ही में ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से MIRV तकनीक से लैस एडवांस्ड अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित अग्नि-V एक इंटरकॉन्टिनेंटली बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) है, जिसकी मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा है। यानी पूरा एशिया, चीन और यूरोप का एक बड़ा हिस्सा इसकी जद में आता है।

भारत ने पिछले कुछ समय में ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत इसके जो परीक्षण किए हैं, उसने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा 6-7 देशों की लीग में खड़ा कर दिया है जिनके पास इतनी लंबी दूरी की मारक क्षमता और MIRV तकनीक है।

अग्नि-5 भारत की सतह से सतह पर मार करने वाली लंबी दूरी की सबसे उन्नत मिसाइलों में शुमार होता है। इसे भारत के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम यानी आईजीएमडीपी के तहत विकसित किया गया है। ये एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक आसानी से वार कर सकते हैं। इन्हें दुनिया की सबसे शक्तिशाली और खतरनाक हथियारों में गिना जाता है। ये हवा से 10 गुणा से ज्यादा तेज गति से पृथ्वी के सब-ऑर्बिटल (sub-orbital) मार्ग से आगे बढ़ता है, जिससे दुश्मन देश तुरंत में भाप नहीं पाते। भारत की अग्नि-5 ऐसी ही मिसाइल है।

क्या अग्नि-V भी हाइपरसोनिक है?

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों और विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नि-V की रफ्तार भी मैक 24 (लगभग 29,400 किमी/घंटा) तक पहुँच सकती है, जो इसे हाइपरसोनिक श्रेणी की मिसाइलों से भी तेज बनाती है। हालाँकि भारत सरकार ने इसकी सटीक टॉप स्पीड और इसकी कुछ अन्य घातक क्षमताओं को लेकर हमेशा चुप्पी साधे रखी है। भारत का यह ‘साइलेंट’ रवैया ही इसे चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के लिए सबसे रहस्यमयी और घातक हथियार बनाता है।

अग्नि-5 भारत को अमेरिका, रूस, चीन, फ्राँस जैसे चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल में करता है, जिनके पास IRBM तकनीक वाली आधुनिकतम मिसाइल है। इसे किसी भी जगह से यानी जहाजों या पनडुब्बियों से किसी भी लक्ष्य पर हमला करने के लिए भेजा जा सकता है। लक्ष्य जमीन पर हो या समुद्र में। यह जमीन के अंदर तीन या चार मंजिला मकान के अंदर बने बंकर को भी नष्ट कर सकता है।

ओरेश्निक बनाम अग्नि-V, दो सबसे बड़े ब्रह्मास्त्र

यदि हम रूस की ओरेश्निक और भारत की अग्नि-V मिसाइल की आमने-सामने तुलना करें, तो दोनों ही मिसाइलें अपनी-अपनी जगह पर दुनिया को तबाह करने की ताकत रखती हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य और उनकी खूबियाँ अलग हैं। रूस की ओरेश्निक एक इंटरमीडिएट-रेंज (मध्यम दूरी) की बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी अनुमानित रेंज 3,500 से 5,500 किलोमीटर के बीच है।

वहीं दूसरी ओर भारत की अग्नि-V एक शुद्ध इंटरकॉन्टिनेंटल (अंतरमहाद्वीपीय) बैलिस्टिक मिसाइल है, जो आसानी से 5,000 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय कर सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि अग्नि-V की वास्तविक क्षमता 8,000 किलोमीटर तक की हो सकती है, जिसे भारत ने आधिकारिक तौर पर उजागर नहीं किया है।

रफ्तार और मारक क्षमता के मामले में दोनों ही मिसाइलें दुश्मन के पसीने छुड़ाने के लिए काफी हैं। ओरेश्निक जहां मैक 10 की रफ्तार से हमला करती है, वहीं अग्नि-V अपनी उड़ान के आखिरी चरण में मैक 20 से मैक 24 की अविश्वसनीय गति हासिल कर सकती है। हालाँकि, ओरेश्निक को पूरी तरह हाइपरसोनिक क्रूज या ग्लाइड व्हीकल के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन अग्नि-V भी अपनी री-एंट्री (अंतरिक्ष से वापस धरती के वायुमंडल में आते समय) के दौरान इतनी तेज होती है कि दुनिया का कोई भी मिसाइल डिफेंस सिस्टम, चाहे वह अमेरिका का थाड (THAAD) हो या चीन का HQ-19, इसे बीच में नहीं गिरा सकता।

इन दोनों मिसाइलों की सबसे बड़ी समानता इनकी ‘MIRV’ तकनीक है, लेकिन यहाँ भी इनका इस्तेमाल अलग तरीके से देखा गया है। यूक्रेन युद्ध में ओरेश्निक ने एक ही मिसाइल से कई सब-म्यूनिशन्स (छोटे बमों) को एक साथ छोड़कर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। भारत की अग्नि-V भी इसी तकनीक से लैस है, जो एक ही लॉन्च में अलग-अलग शहरों या सैन्य ठिकानों को एक साथ निशाना बना सकती है।

सबसे बड़ा अंतर यह है कि रूस जहाँ युद्ध के मैदान में अपनी मिसाइल का लाइव टेस्ट करके दुनिया को डरा रहा है, वहीं भारत ने अपनी तकनीक को बेहद गोपनीय और शांत रखा है, ताकि जरूरत पड़ने पर यह दुश्मन के लिए एक ऐसा अप्रत्याशित झटका साबित हो जिसका कोई तोड़ न हो।

बच्ची के यौन उत्पीड़न-हत्या केस पर PC करते हुए ठहाके मारकर हँसने लगी तमिलनाडु पुलिस: Video देख भड़के नेटिजन्स, कहा- और बनाओ एक्टर को CM!

सोशल मीडिया पर तमिलनाडु पुलिस का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें महिला अधिकारी समेत पुलिस अफसर कोयंबटूर के सुलूर क्षेत्र में 10 साल की बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच हँसते-मुस्कुराते दिखाई दे रहे हैं। नेटिजन्स इस वीडियो की खूब आलोचना कर रहे हैं।

एक यूजर ने कहा कि राज्य में एक्टर की सरकार बनने के बाद से उन्हें यहीं उम्मीद थी कि पुलिस गंभीर मामलों में लापरवाही बरतेगी। अन्य यूजर ने कहा ऐसे लापरवाह पुलिस के ऐसे रवैये की वजह से ही आम आदमी न्याय की उम्मीद खो देता है। नेटिजन्स ने वीडियो में दिख रहे पुलिस अफसरों को तत्काल सस्पेंड करने की माँग की है। हालाँकि, अब तक इस विवादित वीडियो पर तमिलनाडु पुलिस की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

नेटिजन्स की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया यूजर्स ने तमिलनाडु पुलिस की इस तरह के गंभीर मामले में हँसने पर खूब आलोचना की है। रमेश तिवारी नाम के एक्स यूजर ने कहा, “जब सिस्टम में बैठे लोग ही इतनी बड़ी हैवानियत पर दुख और गंभीरता नहीं दिखाते, तो जनता और पीड़ित परिवार को क्या संदेश जाता है? यह प्रोफेशनलिज्म नहीं, बल्कि बेहद शर्मनाक असंवेदनशीलता है।”

सोशल मीडिया पर तमिलनाडु की नई विजय सरकार को भी घेरा गया। अमिताभ चौधरी नाम के यूजर ने कहा, “सोचिए, ये अधिकारी, जिनमें एक महिला आईजी भी शामिल हैं, ऐसे मामलों को कितनी गंभीरता से संभाल रहे हैं… और उस राज्य से आखिर क्या उम्मीद की जाए, जहाँ एक्टर्स को नेता चुनकर सत्ता में बैठाया जाता है?”

पुलिस की इस हरकत को यूजर्स ने निंदनीय बताते हुए संबंधित पुलिस अफसरों को निलंबित करने की माँग की। अंशुल नाम के एक्स यूजर ने कहा, “घिनौना और शर्मनाक… क्या इतने भयानक अपराध पर प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसे की जाती है? अगर बेशर्मी का कोई चेहरा होता, तो वो आज इन तीनों का होता 😡”

वे आगे कहते हैं, “अगर यही दर्द उनकी अपनी बेटी या किसी 10 साल की बच्ची रिश्तेदार के साथ हुआ होता, तब भी क्या ये ऐसे ही हँसते और मजाक करते? ऐसे संवेदनहीन लोगों को तुरंत सस्पेंड किया जाना चाहिए।”

एक यूजर ने तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय को टैग कर मामला में संज्ञान लेने की माँग की। उन्होंने लिखा, “माननीय @CMOTamilnadu कृपया सुलूर घटना में युवती की मौत को लेकर प्रेस मीट के दौरान पुलिस अधिकारियों द्वारा दिखाए गए असंवेदनशील व्यवहार पर ध्यान दें। ऐसे दुखद मामलों में गंभीरता, संवेदनशीलता और सम्मान दिखना बेहद जरूरी है।”

रक्षा मामलों से जुड़े एक एक्स पेज ने लिखा, “इन लोगों का काम आम नागरिकों के प्रति संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए, लेकिन लगता है कि सालों तक राजनीतिक आकाओं को खुश करने वाली नौकरी करते-करते इनके अंदर बची हुई इंसानियत भी खत्म हो चुकी है। इन तीनों के खिलाफ कुछ नहीं होगा… ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? ट्रांसफर।”

विनायक त्रिपाठी नाम के यूजर लिखते हैं, “पूरे राज्य के सदमे में होने के समय पुलिस का ऐसा असंवेदनशील व्यवहार पूरी तरह अस्वीकार्य है। हम इस गलत आचरण में शामिल अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और मामले की निष्पक्ष व पारदर्शी जाँच की माँग करते हैं।”

एक और यूजर महालक्ष्मी रामानाथम ने इसे तमिलनाडु पुलिस के लिए शर्म की बात बताया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के सुलूर इलाके में 10 साल की बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न और हत्या का है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बच्चे घर के पास की दुकान पर गई थी, लेकिन काफी देर तक वापस नहीं लौटी। इसके बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

जाँच के दौरान पुलिस को CCTV फुटेज मिले, जिनमें एक संदिग्ध व्यक्ति बच्ची को अपने साथ ले जाता दिखाई दिया। बाद में बच्ची का शव इलाके के एक तालाब के पास बरामद किया गया। पुलिस ने मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जाँच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की आशंका जताई गई है। घटना के बाद पूरे इलाके में गुस्सा फैल गया और लोगों ने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए प्रदर्शन किया।

इस बीच सोशल मीडिया पर पुलिस अधिकारियों की मामले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें महिला समेत 3 पुलिस अधिकारी हँसते और मुस्कुराते नजर आए। ऐसे गंभीर मामले में पुलिस के व्यवहार पर लोगों ने नाराजगी जताई।

मुख्यमंत्री विजय ने जताई संवेदना

इस घटना पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने गहरा दुख और सदमा जताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अमानवीय और अक्षम्य अपराधों को समाज में किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री ने पीड़ित बच्ची के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि वह इस दुख की घड़ी में परिवार के साथ खड़े हैं।

उन्होंने बताया कि मामले में दो आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। साथ ही पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि मामले की तेजी और पूरी गंभीरता से जाँच की जाए तथा जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल की जाए।

मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए तमिलनाडु सरकार पूरी मजबूती से कार्रवाई करेगी। इसके लिए सभी जरूरी और तत्काल कदम उठाए जाएंगे।

आतंकी भिंडरावाले की तारीफ से लेकर खालिस्तान के समर्थन तक: भारत विरोधी गुनिशा कौर से मिलिए, जो बनाई गई अमेरिका के USCIRF की कमिश्नर

अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने गुनीशा कौर नाम की एक खालिस्तान समर्थक महिला को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) में नियुक्त करने का एलान किया है। बता दें कि USCIRF का भारत और उसके आंतरिक मामलों के खिलाफ फर्जी खबरें फैलाने का पुराना इतिहास रहा है।

पेशे से डॉक्टर और मानवाधिकार रिसर्च की कथित विशेषज्ञ गुनीशा कौर को आयोग में शामिल होने वाली ‘पहली सिख’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि उनके भारत-विरोधी और खालिस्तान समर्थक रुख को छुपाया जा रहा है। वह अगले 2 साल तक USCIRF के 9 कमिश्नरों में से एक के रूप में काम करेंगी।

अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने अपने बयान में कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि वह आयोग में अपनी सेवा के दौरान अपने गहरे मेडिकल, एकेडमिक, रिसर्च, धार्मिक और लीडरशिप के अनुभवों का फायदा पहुँचाएँगी।”

खालिस्तान समर्थक प्रोपेगैंडा का इतिहास

गुनीशा कौर साल 2009 से ही 1984 के दंगों के दौरान सिखों पर हुए अत्याचारों को उजागर करने के बहाने खालिस्तान समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाने में जुटी हुई हैं। इस सिलसिले में उन्होंने ‘लॉस्ट इन हिस्ट्री: 1984 रिकंस्ट्रक्टेड’ नाम की एक किताब भी लिखी है।

अपनी किताब में कौर ने आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को “1970 और 1980 के दशक की शुरुआत में सिखों का एक करिश्माई और प्रभावशाली नेता” बताया था। उन्होंने उसे एक ‘धार्मिक नेता’ भी कहा और दावा किया कि भारत सरकार ने उसे जानबूझकर एक चरमपंथी और अलगाववादी के रूप में पेश किया।

किताब में USCIRF की इस नई कमिश्नर ने भिंडरावाले की देखरेख में खालिस्तानियों द्वारा हिंदुओं पर किए गए हमलों का दोष भी भारत सरकार पर मढ़ दिया। गुनीशा कौर ने दावा किया, “इस दौरान हिंदुओं के खिलाफ जो भी हिंसा की घटनाएं हुईं, चाहे वे सरकार द्वारा प्रायोजित थीं या किसी स्वतंत्र गुट द्वारा की गईं, उनका आरोप आमतौर पर जरनैल सिंह पर ही लगा दिया गया।”

‘लॉस्ट इन हिस्ट्री: 1984 रिकंस्ट्रक्टेड’ के पेज का स्क्रीनशॉट

किताब में आगे उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने उत्तरी भारत की हिंदू आबादी का राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले की छवि को खराब किया।

आतंकवादी का बचाव करते हुए कौर ने लिखा, “जरनैल सिंह पर जो आरोप थे वे मामूली थे, जिनमें सबसे गंभीर आरोप उन पर भड़काऊ भाषण देने का था।”

यह उनकी उस कट्टरपंथी सोच को दिखाता है जो एक आतंकवादी को हर तरह से सही ठहराने की कोशिश करती है।

जून 2013 में गुनीशा कौर ने ‘हफिंगटन पोस्ट’ के कंट्रीब्यूटर प्लेटफॉर्म पर इसी तरह का एक लेख लिखा था। इस वेबसाइट पर लिखा होता है कि लिखने वाले अपने काम के खुद जिम्मेदार हैं और आजादी से पोस्ट कर सकते हैं।

इस लेख की मुख्य तस्वीर के कैप्शन में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को ‘संत’ और ‘सिख नेता’ बताया गया था, जबकि खालिस्तान को ‘एक स्वतंत्र सिख राज्य की कल्पना को दिया गया नाम’ लिखा गया था।

भारत विरोधी बयानबाजी का अतीत

इसके बाद दिसंबर 2020 में USCIRF की यह नई कमिश्नर सीएनएन (CNN) जैसे विदेशी वामपंथी प्रकाशनों में भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने में व्यस्त थीं। गुनीशा कौर ने एक साझा लेख लिखा, जिसमें झूठा आरोप लगाया गया कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए 3 कृषि कानून किसी तरह ‘छोटे किसानों को नुकसान पहुँचा रहे हैं और बड़े कॉरपोरेट्स को फायदा दे रहे हैं’।

इस लेख में ‘पुलिस की बर्बरता’ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के साथ-साथ खालिस्तान के एजेंडे को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की गई कि ‘पंजाब में सिखों का एक हिस्सा आत्मनिर्णय के लिए सालों से सशस्त्र विद्रोह में शामिल था।’ किसानों की परेशानी उठाने के बहाने प्रोपेगैंडा फैलाने वाली गुनीशा कौर ने इसमें भी खालिस्तानी एजेंडा घुसा दिया।

बता दें कि अलग-अलग राज्यों के मौजूदा कृषि उपज मंडी समिति (APMC) कानूनों में कमियों को देखते हुए, नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में एक एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार (NAM) की घोषणा की थी। ई-नाम (e-NAM) पूरे भारत का एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है जो मौजूदा मंडियों को जोड़कर कृषि उपजों के लिए एक साझा राष्ट्रीय बाजार बनाता है। सुधारों को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून पेश किए ताकि फसलों का व्यापार आसान हो सके और किसानों को मंडियों के बाहर भी एक प्रतिस्पर्धी बाजार मिल सके।

सीएनएन के आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

मोदी सरकार द्वारा लाए गए ये तीन कानून थे- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। हालांकि, देश की आंतरिक स्थिरता बनाए रखने के लिए बाद में इन्हें वापस ले लिया गया था।

इसके 3 साल बाद दिसंबर 2023 में गुनीशा कौर ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को खराब करने के लिए ‘टाइम’ (Time) मैगजीन में एक और लेख लिखा। इस लेख का शीर्षक था, ‘व्हाई इंडिया इज टारगेटिंग सिखों एट होम एंड अराउंड द वर्ल्ड’ (भारत देश और दुनिया भर में सिखों को निशाना क्यों बना रहा है)।

इसमें उन्होंने खालिस्तानी दावों को बढ़ावा देने के लिए झूठ फैलाया कि भारत सरकार विदेशों में रहने वाले सिखों पर कथित अत्याचार कर रही है। कौर ने आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने के बेबुनियाद दावों को फिर से दोहराया।

टाइम मैगजीन के आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दिलचस्प बात यह है कि कनाडा के अखबार ‘द ग्लोब एंड मेल’ के मुताबिक आतंकवादी कैंप चलाने वाले निज्जर को USCIRF की नई कमिश्नर ने सिर्फ ‘एक कनाडाई नागरिक’ बताया। वहीं भारत में प्रतिबंधित संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ चलाने वाले वांटेड आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू को भी उन्होंने ‘एक सिख कार्यकर्ता और अमेरिकी नागरिक’ के रूप में पेश किया।

खालिस्तान की वकालत करते हुए गुनीशा कौर ने लिखा, “मोदी सरकार सिखों के आत्मनिर्णय की माँगों से इतनी असुरक्षित क्यों महसूस करती है कि वे अमेरिका और कनाडा जैसे वैश्विक महाशक्तियों के साथ अपने संबंधों को भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं?”

वह यहाँ भी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले की तारीफ करना नहीं भूलीं और उसे फिर से ‘एक मजहबी सैक्ट का करिश्माई सिख नेता’ बताया।

अब जब USCIRF में एक जानी-मानी खालिस्तान समर्थक को नियुक्त कर दिया गया है, तो भारत के खिलाफ और अधिक बयानबाजी, उसके आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में भारत की छवि को खराब करने की कोशिशों की आशंका बढ़ गई है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कानपुर में ITBP जवानों के कमिश्नरेट घेराव की खबर फर्जी: माँ का हाथ काटने के मामले में पुलिस-CMO करेंगे दोबारा जाँच, जानें पूरा मामला

उत्तर प्रदेश के कानपुर की एक घटना शनिवार (23 मई 2026) को सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगी। जिसमें दावा किया गया कि भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के जवानों ने पुलिस कमिश्नरेट कार्यालय का घेराव कर दिया और परिसर में तनावपूर्ण स्थिति बन गई।

हालाँकि बाद में पुलिस और ITBP अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि घेराव जैसी कोई स्थिति नहीं थी। अधिकारियों के मुताबिक जवान अपने साथी को न्याय दिलाने और जाँच रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कमिश्नर कार्यालय पहुँचे थे।

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल और ITBP कमांडेंट गौरव प्रसाद दोनों ने साफ कहा कि जवान अपॉइंटमेंट लेकर आए थे और पुलिस प्रशासन की ओर से पूरा सहयोग दिया गया। ऐसे में सोशल मीडिया पर फैलाया गया कमिश्नरेट घेराव का दावा भ्रामक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मामला है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल पूरा मामला ITBP के जवान विकास सिंह की माँ निर्मला देवी के इलाज और उनका हाथ काटे जाने से जुड़ा है। विकास सिंह इस समय महाराजपुर स्थित ITBP की 32वीं बटालियन में तैनात हैं और मूल रूप से फतेहपुर जिले के हथगाम क्षेत्र के रहने वाले हैं।

विकास के अनुसार उनकी 56 साल की माँ को सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी और कब्ज की शिकायत थी। पहले उनका इलाज ITBP अस्पताल में हुआ, लेकिन 13 मई को अचानक हालत बिगड़ने पर उन्हें हायर सेंटर रेफर किया गया।

विकास अपनी माँ को एंबुलेंस से लेकर निकला, लेकिन रास्ते में भीषण जाम लग गया। माँ की हालत गंभीर होने पर वे उन्हें टाटमिल चौराहे स्थित कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल ले गए। आरोप है कि अस्पताल में इलाज के दौरान उनके हाथ में कैनुला लगाया गया और गलत इंजेक्शन दे दिया गया, जिसके बाद हाथ में सूजन और संक्रमण बढ़ने लगा।

बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें बिठूर रोड स्थित पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों के काफी प्रयास के बाद भी संक्रमण को नहीं रोका जा सका और अंततः 17 मई को उनका हाथ काटना पड़ा।

घटना के बाद पुलिस से माँगी मदद

इस घटना के बाद विकास सिंह 19 मई को अपनी माँ का कटा हुआ हाथ लेकर पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुँचे। उन्होंने कृष्णा हॉस्पिटल पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की माँग की थी। विकास ने कहा था कि “मेरी माँ ने इन्हीं हाथों से मुझे बचपन से पाला-पोसा और आज मेरे सामने उनका हाथ काटना पड़ा। मैं सेना में होने के बाद भी अपनी माँ को इंसाफ नहीं दिला पा रहा हूँ।”

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने जाँच CMO कार्यालय को सौंप दी थी। CMO डॉ हरिदत्त नेमी की ओर से गठित जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन उस रिपोर्ट पर ही सवाल उठ गए। ITBP अधिकारियों का आरोप था कि रिपोर्ट साफ है और उसमें यह साफ नहीं किया गया कि आखिर लापरवाही किस स्तर पर हुई।

ITBP के जवान पहुँचे कार्यालय  

इसी को लेकर शनिवार को ITBP के अधिकारी और कुछ जवान पुलिस कमिश्नर के कार्यालय पहुँचे थे। कई जवान परिसर में मौजूद जरूर थे, क्योंकि वे अपने अधिकारी के साथ आए थे, लेकिन पुलिस और ITBP दोनों ने घेराव या किसी टकराव से इनकार किया।

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने कहा कि “कार्यालय में किसी तरह का कोई घेराव नहीं हुआ। सेना के अधिकारियों को एस्कॉर्ट मिलता है और वही जवान उनके साथ थे। विवाद जैसी कोई स्थिति नहीं थी।”

ITBP कमांडेंट गौरव प्रसाद ने भी कहा कि जवान केवल अपने साथी के समर्थन में आए थे। उन्होंने कहा कि पुलिस प्रशासन की तरफ से पूरा सहयोग मिल रहा है और दोबारा जाँच कराने पर सहमति बनी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामले को गलत तरीके से दिखाया गया है।

बैठक के बाद लिया निर्णय

बैठक के दौरान पुलिस अधिकारियों, CMO और ITBP अधिकारियों के बीच करीब तीन घंटे तक चर्चा हुई। इसके बाद निर्णय लिया गया कि मामले की दोबारा जाँच होगी और इस बार जाँच में ITBP के अधिकारी भी शामिल रहेंगे।

CMO डॉ हरिदत्त नेमी ने कहा कि पहले की रिपोर्ट तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई थी, लेकिन अब ITBP और पुलिस अधिकारियों के सवालों को ध्यान में रखते हुए दोबारा जाँच की जाएगी।

जाँच कमेटी के अध्यक्ष ACMO डॉ रमित रस्तोगी ने कहा कि दोनों अस्पतालों से वेरिफाइड दस्तावेज लिए गए थे और उन्हीं के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई। उन्होंने बताया कि महिला हृदय रोगी थीं और उनके हाथ की नसों में ब्लॉकेज पाया गया था।

उन्होंने कहा कि ब्लॉकेज के पीछे दो संभावनाएँ हो सकती हैं। पहली थ्रोम्बोसिस जिसमें खून के थक्के नसों में फंस जाते हैं और दूसरी कंपार्टमेंट सिंड्रोम, जिसमें दर्द और सूजन को समय पर गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि कटे हुए हाथ की हिस्टोपैथोलॉजी जाँच से स्थिति पूरी तरह साफ हो सकती है।

वहीं पुलिस कमिश्नर ने CMO को फटकार लगाते हुए कहा कि जाँच रिपोर्ट स्पष्ट होनी चाहिए और अगर किसी अस्पताल या डॉक्टर की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रिपोर्ट संतोषजनक नहीं हुई तो राज्य स्तरीय समिति से जाँच कराई जाएगी।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने कृष्णा हॉस्पिटल और पारस हॉस्पिटल के CCTV फुटेज भी सुरक्षित करा लिए हैं। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर 12 घंटे के भीतर ऐसा क्या हुआ जिससे मरीज के हाथ में संक्रमण तेजी से फैल गया। यह भी जाँच की जा रही है कि कौन सा इंजेक्शन लगाया गया और किस डॉक्टर या स्टाफ ने उपचार किया।

इस पूरे मामले में अपर पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था डॉ विपिन ताडा और कल्याणपुर थाना प्रभारी डॉ सुमेध जाधव को भी जिम्मेदारी दी गई है। दोनों अधिकारियों के पास मेडिकल की पढ़ाई का अनुभव होने के कारण वे मेडिकल जाँच और रिपोर्ट की बारीकियों को समझ रहे हैं। शनिवार को दोनों अधिकारियों ने ITBP के प्रतिनिधियों के साथ लंबी बैठक भी की।

पाकिस्तान में पेट्रोल कुछ सस्ता क्या हुआ, भारत को फेल बताने लगे सोशल मीडिया के वीर: आधा सच बेचने वालों का पूरा खेल यहाँ समझिए

पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल के दाम घटाए जाने पर सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ‘ज्ञान’ बड़ी तेजी से बाँटा जा रहा है कि ‘पाकिस्तान में पेट्रोल सस्ता हो गया, भारत में महँगा है’। एक गुट के लोग मोदी सरकार का मजाक उड़ा रहे हैं और इसे ऐसे पेश कर रहे हैं मानो पाकिस्तान कोई आर्थिक महाशक्ति बन गया हो और भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में तस्वीर इतनी ही सीधी है? या फिर सोशल मीडिया पर आधा सच दिखाकर पूरा नैरेटिव बेचा जा रहा है?

पहली बात, तथ्य क्या कहते हैं? पाकिस्तान ने हाल में पेट्रोल की कीमतों में कटौती जरूर की है। पाकिस्तान में 23 मई 2026 से पेट्रोल लगभग 403.78 पाकिस्तानी रुपए प्रति लीटर पर आ गया जो पहले 409.78 पाकिस्तानी रुपए था। यानी वहाँ कीमत घटी है, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन अब आते हैं उस हिस्से पर, जिसे सोशल मीडिया के बहादुर बड़े आराम से छिपा ले जा रहे हैं। कीमत कम हुई, लेकिन क्या भारत से सस्ती हो गई? इसका सीधा सा जवाब है- नहीं।

पाकिस्तान समेत दुनियाभर में बढ़ती कीमतें

मिडिल ईस्ट में ईरान VS अमेरिका-इजरायल संघर्ष शुरू होने के करीब 75 दिनों तक भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर थे जबकि दुनिया में हाल ऐसा नहीं था। जब दुनिया के कई देशों में तेल महँगा होने लगा, तब वहाँ की सरकारों ने इसका बोझ सीधे जनता पर डाल दिया। यानी पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ा दिए गए। लेकिन भारत ने ऐसा तुरंत नहीं किया। इतने लंबे समय तक कीमतें स्थिर रखने वाला भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अकेला देश रहा।

भारत में पहली बार 15 मई को पेट्रोल-डीजल महँगा किया गया। इसके बाद 19 मई और 23 मई को कीमतें बढ़ाई गईं। तीन बार की बढ़ोतरी मिलाकर पेट्रोल-डीजल की कीमत करीब ₹5 प्रति लीटर बढ़ी है। दिल्ली में पेट्रोल ₹99.51 प्रति लीटर पहुँच गया है। अगर दूसरे देशों को देखें तो इस दौरान अमेरिका में पेट्रोल 44.5% महँगा हुआ, पाकिस्तान में करीब 55%, यूएई में 52.4%, ब्रिटेन में 19.2%, बांग्लादेश में 16.7% और जापान में 9.7% महँगा हुआ। यानी कई देशों में लोगों को पेट्रोल के लिए पहले से काफी ज्यादा पैसे देने पड़े, जबकि भारत में बढ़ोतरी कम रखी गई।

मिडिल ईस्ट संकट से पहले और अब पाकिस्तान में तेल की कीमतें

पाकिस्तान स्टेट ऑयल कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट शुरू होने से पहले 16 फरवरी 2026 को पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 258.17 पाकिस्तानी रुपए थे। फरवरी के आखिरी में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हुई और 1 मार्च 2026 को पाकिस्तान में कीमतें बढ़कर 266.17 पाकिस्तानी रुपए पहुँच गईं। पाकिस्तान में 3 अप्रैल 2026 को कीमतों में बेहताशा बढ़ोतरी की गई है और ये बढ़कर 458.41 पाकिस्तानी रुपए पर पहुँच गईं।

पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें (फोटो :- PetrolPriceinpakistan.com)

हालाँकि, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल सवाल है- क्या पेट्रोल के दाम कुछ रुपये घट जाना किसी देश की आर्थिक ताकत का प्रमाण है? अगर जवाब ‘हाँ’ है, तो फिर पाकिस्तान दुनिया की टॉप अर्थव्यवस्था घोषित कर दो भाई।

वही, पाकिस्तान जो साल-द-साल IMF के सामने बार-बार मदद की भीख माँगने के लिए खड़ा रहता है। वही, पाकिस्तान जहाँ डॉलर की कमी, विदेशी मुद्रा संकट, बिजली कटौती, रिकॉर्ड महँगाई और सरकारी वित्तीय बदहाली लगातार खबरों में रही। पेट्रोल पर थोड़ी राहत देना वहाँ सरकार की मजबूरी भी होती है क्योंकि जनता पहले से आर्थिक दबाव में पिस रही होती है।

यानी सोशल मीडिया पर जो लोग पाकिस्तान के पेट्रोल को लेकर भारत पर तंज कस रहे हैं, वे बड़ी सुविधा से पूरी तस्वीर गायब कर देते हैं। वे यह नहीं बताएँगे कि पाकिस्तान में बीते वर्षों में पेट्रोल 400 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर के पार पहुँच चुका था। वे यह नहीं बताएँगे कि वहाँ ईंधन नीति कई बार विदेशी कर्जदाताओं, खासकर IMF के दबाव में बदलती रही है। वे यह भी नहीं बताएँगे कि पाकिस्तान की मुद्रा में आई गिरावट ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।

भारत की स्थिति को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से खरीदता है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महँगा होगा, मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ेगा या सप्लाई प्रभावित होगी, तो उसका असर भारत पर भी पड़ेगा।

इसके बावजूद भारत ने लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की और बढ़ोतरी भी सीमित रखी। यह बहस अलग हो सकती है कि टैक्स कम होना चाहिए या नहीं, लेकिन यह कहना कि ‘पाकिस्तान आगे निकल गया, भारत पिछड़ गया’ एक राजनीतिक मूर्खता ज्यादा लगती है, आर्थिक विश्लेषण कम।

बिहार में जहाँ खुद भगवान राम ने की महादेव की पूजा, वहाँ अब सम्राट सरकार बनाएगी श्रीराम की भव्य मूर्ति: जानें- त्रेता युग से जुड़े इस जगह का महात्म्य

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी शनिवार (23 मई 2026) को अपने पहले बक्सर दौरे पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने जिले की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को लेकर बड़ी घोषणाएँ कीं।

उन्होंने सबसे पहले बक्सर केंद्रीय कारा परिसर स्थित प्राचीन श्री वामनेश्वर नाथ मंदिर में पूजा की और उसके बाद रामरेखा घाट पहुँचकर ऐतिहासिक श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर में माथा टेका। इस दौरान उन्होंने मंदिर और रामरेखा घाट के भव्य विकास का भरोसा दिलाया।

मुख्यमंत्री ने यहाँ भगवान श्रीराम की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा भी की। बक्सर का रामरेखा घाट और श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और पौराणिक परंपराओं का केंद्र है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने स्वयं यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी।

यही कारण है कि यह मंदिर देश की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहरों में गिना जाता है। अब मुख्यमंत्री की घोषणाओं के बाद इस ऐतिहासिक स्थल को नए स्वरूप में विकसित करने की तैयारी तेज हो गई है।

लाइट एंड साउंड कॉम्प्लेक्स और महर्षि विश्वामित्र मंडपम का उद्घाटन

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का दौरा धार्मिक कार्यक्रमों और विकास योजनाओं दोनों पर केंद्रित रहा। उन्होंने सबसे पहले श्री वामनेश्वर नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना कर राज्य की सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिर परिसर के ले-आउट प्लान का निरीक्षण करते हुए अधिकारियों को आवश्यक निर्देश भी दिए।

इसके बाद मुख्यमंत्री रामरेखा घाट स्थित श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ मंदिर के पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उनका स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में पुजारियों और स्थानीय श्रद्धालुओं से बातचीत की। इस दौरान पुजारियों ने रामरेखा घाट और मंदिर को अयोध्या की तर्ज पर विकसित करने की माँग रखी।

मुख्यमंत्री ने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार इस धार्मिक धरोहर के समग्र विकास के लिए गंभीरता से काम करेगी। दौरे के दौरान उन्होंने करीब छह करोड़ रुपये की लागत से बने लाइट एंड साउंड कॉम्प्लेक्स और महर्षि विश्वामित्र मंडपम का उद्घाटन भी किया।

इसके अलावा उन्होंने रिमोट के जरिए महाराजा कमल बहादुर सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया और पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।

श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर और रामरेखा घाट का इतिहास, भगवान राम ने स्थापित की है शिवलिंग

नारद पुराण में बक्सर के पुराने नाम ‘सिद्धाश्रम’ का उल्लेख मिलता है, जिसे भगवान शंकर की तपोभूमि कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ महर्षि विश्वामित्र सहित 88 हजार ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी। गंगा के उत्तरायणी प्रवाह के कारण यह क्षेत्र ‘मिनी काशी’ के रूप में भी प्रसिद्ध है।

रामरेखा घाट स्थित श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर का इतिहास त्रेतायुग से जुड़ा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब महर्षि विश्वामित्र का यज्ञ राक्षसों द्वारा बार-बार बाधित किया जा रहा था, तब वे अयोध्या पहुँचे और राजा दशरथ से भगवान राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले आए।

इसके बाद भगवान राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध कर ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की और यज्ञ को सफल बनाया। यज्ञ संपन्न होने के बाद भगवान राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र गंगा तट पर पहुँचे। मान्यता है कि यहीं भगवान राम ने गंगा स्नान किया और गंगा की मिट्टी से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की।

यही शिवलिंग आगे चलकर श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है कि जनकपुर में सीता स्वयंवर में भाग लेने और शिव धनुष भंग करने से पहले भगवान राम ने यहीं अपने इष्टदेव भगवान शिव की आराधना की थी।

स्थानीय कथाओं के अनुसार, भगवान राम ने इस स्थान पर एक विशेष रेखा भी खींची थी, ताकि चारों दिशाओं सहित आकाश और पाताल मार्ग से भी कोई राक्षस इस क्षेत्र में प्रवेश न कर सके। इसी रेखा के कारण इस स्थान का नाम ‘रामरेखा घाट’ पड़ा। धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में इस स्थल को अत्यंत पवित्र माना गया है।

सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

रामेश्वरनाथ मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष भीड़ देखने को मिलती है। बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से भक्त यहाँ जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं। सावन के दौरान मंदिर परिसर और आसपास का इलाका मेले जैसा दिखाई देता है।

बाबा ब्रह्मेश्वर धाम और गुप्ताधाम जाने वाले श्रद्धालु भी यहाँ गंगा जल लेकर पूजा करने के बाद आगे की यात्रा करते हैं। मंदिर के पुजारियों का कहना है कि यहाँ आने वाला भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता। शिवलिंग के सामने सच्चे मन से की गई प्रार्थना जरूर पूरी होती है। यही वजह है कि यह मंदिर लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।

रामरेखा घाट को कैसे विकसित करेगी सरकार?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने दौरे के दौरान स्पष्ट किया कि रामरेखा घाट को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। योजना के तहत यहाँ कंट्रोल रूम, शुद्ध पेयजल, चेंजिंग रूम, आधुनिक पाथ-वे और गंगा आरती की विशेष व्यवस्था की जाएगी।

इसके अलावा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अत्याधुनिक 5D थिएटर, रेस्टोरेंट, ड्राई डेक फाउंटेन और अन्य सुविधाओं को भी विकसित किया गया है। सरकार का उद्देश्य बक्सर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करना है। इसी कड़ी में भगवान श्रीराम की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की योजना को भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

बक्सर की पहचान को मिलेगा नया विस्तार

स्थानीय लोगों और धार्मिक न्यास परिषद से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सरकार की योजनाएँ सही तरीके से लागू हुईं, तो बक्सर आने वाले समय में देश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। इससे न केवल धार्मिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय व्यापार, रोजगार और पर्यटन को भी बड़ा लाभ मिलेगा।

हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ गंगा स्नान और दर्शन के लिए पहुँचते हैं, लेकिन अब तक सुविधाओं की कमी महसूस की जाती रही है। मुख्यमंत्री के दौरे और घोषणाओं के बाद लोगों को उम्मीद है कि वर्षों से उपेक्षित यह ऐतिहासिक धरोहर अब नए और भव्य स्वरूप में दुनिया के सामने आएगी।

जहाँ से जरूरी होगा, वहीं से लेंगे ईंधन: अमेरिकी विदेश मंत्री के सामने जयशंकर की दो टूक, कहा- जैसे इनके लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ है वैसे हमारे लिए ‘इंडिया फर्स्ट’

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्क रुबियो ने दिल्ली में अहम बैठक की। दिल्ली के हैदराबाद हाउस में बैठक के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों नेताओं ने बयान दिया।

इस दौरान रूसी तेल खरीदने को लेकर विदेश मंत्री ने बड़ा बयान दिया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के सामने एस. जयशंकर ने कहा कि इस मुद्दे पर चर्चा हुई है, लेकिन ऊर्जा बाजार को बाजार की ताकतों पर ही छोड़ देना चाहिए।

US सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मार्को रुबियो के साथ साझा बयान में जयशंकर ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने अपनी विदेश नीति में अमेरिका फर्स्ट को सबसे आगे रखा है। उसी तरह हमारा नजरिया भी इंडिया फर्स्ट है। तो जाहिर तौर पर हम दोनों अपने-अपने राष्ट्रहित को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। “

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक ​​एनर्जी के मामलों की बात है, हमारी एनर्जी सिक्योरिटी के लिए, यह जरूरी है कि हमारे पास कई सोर्स हों, बड़े सोर्स, भरोसेमंद सोर्स, सस्ते सोर्स। यूनाइटेड स्टेट्स कई मामलों में सही बैठता है। कुछ दूसरे देश भी सही बैठते हैं। इसलिए, हम सबसे सही कीमत पर सप्लाई के कई सोर्स को अलग-अलग तरह से इस्तेमाल करते रहेंगे और बनाए रखेंगे क्योंकि आखिर में, अपने लोगों को सस्ती और आसानी से मिलने वाली दरों पर एनर्जी देना हमारी जिम्मेदारी है।”

उन्होंने रूस का बगैर नाम लिए संकेत दे दिए कि भारत अपनी ऊर्जा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देता रहेगा। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच जयशंकर का यह बयान सामने आया है। इससे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की स्पष्ट झलक मिलती है।

अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “भारत और यूनाइटेड स्टेट्स दोनों ही समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने और बिना रुकावट के व्यापार करने में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। दोनों ही देश चाहते हैं कि दुनिया भर में एनर्जी की कीमतें कम रहें और एनर्जी सोर्स का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हों।

भारत के साथ व्यापार को लेकर मार्को रुबियो ने कहा, ” हमें उम्मीद है कि हमारे व्यापारिक प्रतिनिधि बहुत जल्द यहाँ आ सकते हैं। इससे पहले पिछले हफ्ते या उससे पहले, यूनाइटेड स्टेट्स में भारत का ट्रेड डेलीगेशन गया हुआ था। हम बहुत आगे बढ़ गए हैं और जल्द ही यूनाइटेड स्टेट्स और इंडिया के बीच एक ट्रेड एग्रीमेंट होने जा रहा है, जो लंबे समय तक चलने वाला होगा और दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होगा और हमारे राष्ट्रीय हित को पूरा करेगा। इसके अलावा, हम कई फील्ड्स में सहयोग करना जारी रखेंगे।”

अपने पहले भारत की यात्रा पर आए मार्को रुबियो और जयशंकर ने दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की रूपरेखा शेयर की। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सुरक्षा ऊर्जा और आर्थिक सहयोग की समीक्षा कर रिश्तों को और मजबूत करना उनका मकसद है। इस दौरान क्षेत्रीय और विश्वस्तर पर दोनों देशों ने अपने विचार शेयर किए।

अमेरिका में भारतीय अमेरिकियों के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणियों के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, “मैं इन टिप्पणियों को बहुत गंभीरता से लूँगा। मुझे यकीन है कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने ऑनलाइन और दूसरी जगहों पर कमेंट्स किए हैं, क्योंकि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग होते हैं। मुझे यकीन है कि यहाँ भी बेवकूफ लोग हैं, यूनाइटेड स्टेट्स में भी बेवकूफ लोग हैं जो हर समय बेवकूफी भरे कमेंट्स करते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स एक बहुत ही स्वागत करने वाला देश है। हमारे देश को दुनिया भर से आने वाले लोगों से फायदा हुआ है।”

ट्रंप प्रशासन और क्वाड को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि क्वाड असल में, मौजूदा रूप में, प्रेसिडेंट ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान आया था और आगे बढ़ा। विदेश मंत्री के मुताबिक, “रुबियो के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के तौर पर जब वे पहली बार मिले थे तो वह बैठक क्वाड मीटिंग के लिए था। इंडो-पैसिफिक रिश्तों को देखते हुए आने वाले समय में क्वाड का महत्व और बढ़ेगा। इसलिए क्वाड पर काम जारी है, और मुझे लगता है कि अब से दो दिन बाद आप हमें पोडियम पर क्वाड के बारे में बात करते हुए देखेंगे। “

नेताओं-जजों-अफसरों का वो ‘पावर सेंटर’, जहाँ रसूखदारों को भी 30 साल तक नहीं मिलती सदस्यता: जानें- दिल्ली के जिमखाना क्लब का इतिहास, जिस पर सरकार करेगी कब्जा

देश के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार क्लबों में एक दिल्ली के जिमखाना क्लब को सरकार ने खाली करने का आदेश दिया है। क्लब की लीज डीड तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी गई है और पूरे परिसर को 5 जून तक खाली करने को कहा गया है। ये प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने मौजूद 27.3 एकड़ जमीन में फैला हुआ है। सरकार देश की सुरक्षा और रक्षा ढाँचे को मजबूत करने जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहती है।

22 मई 2026 को केन्द्र सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट विभाग ने क्लब सेक्रेटरी को खत भेजकर जगह 5 जून तक खाली करने का आदेश दिया है। आदेश के मुताबिक, राष्ट्रपति मुर्मू ने जमीन लीज खत्म करने पर हस्तक्षर कर दिए हैं। 5 जून को होने वाली इस ‘री-एंट्री’ प्रक्रिया के तहत जमीन के साथ-साथ वहाँ निर्मित सभी ऐतिहासिक इमारतें, खेल परिसर और दूसरे ढाँचे भारत के राष्ट्रपति के अधीन हो जाएँगे।

सरकार ने क्लब को शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा देने के लिए कहा है, ऐसा नहीं होने पर कानूनी तरीके से बल प्रयोग किया जा सकता है। हालाँकि क्लब के सदस्य सिद्धार्थ ने कहा है कि सरकार के आदेश को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। ये ऐतिहासिक भवन है। इसको बनाने की शुरुआत 1913 में हुई थी। मौजूदा भवन 1930 के दशक में बनी।

क्यों अहम है दिल्ली जिमखाना क्लब

यह ऐतिहासिक इमारत प्रधानमंत्री आवास से सटा हुआ है। लुटियंस दिल्ली में प्राइम लोकेशन और रसूखदारों के जमावड़े के कारण यह बेहद अहम है। राजनीतिक नेताओं, न्यायधीशों, नौकरशाहों और उद्योगपतियों का एक तरह से मिलन स्थल है। यहाँ बड़ी बड़ी बैठकें होती हैं और अनौपचारिक तौर पर कहा जा सकता है कि सत्ता का यह केन्द्र भी है।

इसकी सदस्यता पाना बेहद मुश्किल काम है। एक समय यहाँ की सदस्यता पाने के लिए 30-37 साल तक लोगों को इंतजार करना पड़ता था। एक तरह से औपनिवेशक धरोहर रहे इस इमारत को सत्ता की धूरी भी कहा जा सकता है।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 80 के दशक में सुरक्षा कारणों और वीवीआईपी कल्चर का हवाला देते हुए इसे बंद करने या इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हुए। दरअसल क्लब के सदस्यों के भारी विरोध और उनके रसूख के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की नहीं चल पाई।

दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास

जुलाई 1913 में इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से इसका निर्माण कार्य शुरू किया गया। 1928 में करीब 15 साल बाद यह पूरी तरह बन कर तैयार हुआ। अंग्रेजों के जमाने में सिर्फ अंग्रेजी अधिकारी और कुछ भारतीय रियासतों के महाराजाओं को इस क्लब की सदस्यता दी गई थी। शुरुआत से ही यह क्लब रसूखदारों का अड्डा माना जाता है। इसका सदस्य बनना शान की बात थी। इसके पहले अध्यक्ष अंग्रेजी अधिकारी हारकोर्ट बटलर थे।

इसके वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल थे, जिन्होंने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति भवन डिजाइन किया था। यही वजह है कि इसकी बड़ी-बड़ी बालकनी, ऊँची छतें और हर तरफ से दिखता हरा-भरा लॉन तीन मूर्ति भवन और कनॉट प्लेस की तरह है। इसका भव्य डिजाइन ब्रिटिश स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण है।

1930 में तत्काली वायसराय विलिंगडन की पत्नी लेडी विलिंगडन जब इस क्लब में आईं, तो उन्हें स्वीमिंग पूल की कमी नजर आई। उन्होंने 1936 में स्वीमिंग पूल बनाने के लिए 21000 रुपए दान किए। इसके बाद यहाँ स्वीमिंग पूल के साथ साथ स्क्वैश कोर्ट बनी। इसके बाद यहाँ कई खेल की सुविधाएँ बढाई गई। अभी यहाँ कई खेलों की उच्चस्तरीय सुविधाएँ हैं।

वर्तमान में भारत में सबसे ज्यादा 26 घास वाले टेनिस कोर्ट यहाँ हैं। इसके अलावा 7 क्ले कोर्ट और सिंथेटिक टेनिस कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स रूम, कवर स्विमिंग पूल के अलावा 3 बार और 43 ट्रांजिट कॉर्टेज हैं।

यहाँ हुआ था महात्मा गाँधी-इरविन समझौता

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1931 में महात्मा गाँधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच यहाँ समझौता हुआ था। इससे पहले यहाँ दोनों के बीच कई बैठकें भी हुई। इस नजरिए से देखा जाए तो यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी भी रहा है।

1947 में जब देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना, तो पाकिस्तान जाने का फैसला ले चुके अपने साथियों के सम्मान में जनरल के.एम.करिअप्पा ने विदाई भोज का आयोजन किया था।

भारत की आजादी के बाद 1947 में ही इस क्लब के नाम से ‘इंपीरियल’ शब्द हटा दिया गया। इसके बाद आज तक इसे दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से जाना जाता है। आजादी के बाद देशी रिसासतों को मिलाने का सरदार पटेल का संकल्प भी इस इमारत से जुड़ा हुआ है। दरअसल इस क्लब में सरदार पटेल ने अपने सहयोगी वीपी मेनन के साथ कई गुप्त बैठकें की। इसके बाद करीब 500 देशी रियासतों के विलय को अमली जामा पहनाया गया। वीपी मेनन ने महाराजाओं को समझाने और मनाने के लिए इस क्लब में उनके साथ गुप्त बैठकें की और देशी रिसासतों का विलय कराया गया।

यहाँ की सदस्यता लेना उसी तरह मुश्किल रहा, जैसा अंग्रेजों के वक्त हुआ करता था। अब बस अंतर यह है कि बड़े बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों, न्यायधीशों और नौकरशाहों को यहाँ की सदस्यता मिलती थी। एक तरह से यह सत्ता का अनौपचारिक केन्द्र भी है।

इतना ही नहीं, दिल्ली जिमखाना क्लब में स्कवैश, बैडमिंटन, क्रिकेट के ग्राउंड के अलावा 26 घास के टेनिस कोर्ट हैं। स्क्वैश चैंपियन भुवनेश्वरी कुमारी ने यहाँ जमकर प्रैक्टिस की थी। माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने वाले कप्तान एमएस कोहली ने यहाँ जमकर पसीना बहाया। एक तरह से देखा जाए तो यह खेलों का भी अहम केन्द्र है।

इस क्लब की खासियत यहाँ का विशाल लाइब्रेरी भी है। इनमें कई ऐतिहासिक अखबार, पत्रिका भी शामिल हैं। 1843 की मशहूर व्यंग्य पत्रिका ‘पंच’ के अंक यहाँ मिलते हैं। लाइब्रेरी में 36000 से ज्यादा किताबें हैं। एक तरह से खेल, राजनीति के साथ-साथ यह ज्ञान का केन्द्र भी रहा है। यहाँ पहले कई तरह की साहित्यिक चर्चाएँ होती थी।

दिल्ली के अहम ऐतिहासिक इमारत, जिस पर सरकार ने कब्जा किया

शेख अली की गुमटी- दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी इलाके में मौजूद शेख अली की गुमटी लोधी काल की करीब 600 साल पुरानी इमारत है। यहाँ स्थानीय RWA ने दशकों तक अपना कार्यालय बना रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में आदेश दिया कि इमारत खाली कर सरकार को सौंपी जाए और RWA पर 40 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया।

नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक- सरकार अब ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ की तरह इस्तेमाल करने का फैसला किया है। पहले मंत्रालयों द्वारा इसका इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन अब सरकार इनके उपयोग और नियंत्रण का स्वरूप बदल रही है।

उदयपुर हाउस- सिविल लाइंस स्थित यह ऐतिहासिक भवन लंबे कानूनी विवाद के बाद राजस्थान सरकार के कब्जे में वापस आया। इसकी कीमत लगभग 1500 करोड़ रुपये बताई गई थी।

महल ऑफ पठान- इसको लेकर विवाद उस समय सामने आया जब दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व अधिकारी ने इसके कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। बाद में पुरातत्व विभाग ने संरक्षण और खाली कराने की कार्रवाई शुरू की।