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बड़ा ख़ुलासा: ‘BJP सांसद की हत्या का प्रयास करने वालों में 90% सम्प्रदाय विशेष से; प्रशासन व मीडिया ने छिपाया’

बिहार के पश्चिम चम्पारण लोकसभा क्षेत्र के सांसद संजय जायसवाल पर हमले के पीछे कुछ ऐसा है, जो मीडिया आपसे छिपा रहा है। मेनस्ट्रीम मीडिया में कहीं भी इस ख़बर की सच्चाई नहीं है। घटना के दोषियों के बारे में ‘स्थानीय लोग’ और ‘एक पक्ष’ लिख कर या तो उनकी पहचान छिपाने की कोशिश हो रही है या फिर सांसद व उनके पक्ष के दावों को छिपाया जा रहा है। इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने जब सांसद को कॉल किया, तो उधर से बताया गया कि जिस बूथ पर उन पर ये हमला हुआ, उस भीड़ में 90% सम्प्रदाय विशेष से थे। मीडिया में इसे ‘सांसद पर हमला’ के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन सांसद जायसवाल के फेसबुक पोस्ट को देखने के बाद भी इस बात की पुष्टि होती है कि हमला करने वाले कौन लोग थे? लेकिन, सबसे पहले मामले को सिरे से जानते हैं कि क्या हुआ और कहाँ हुआ?

सांसद पर हमले के बाद क्षतिग्रस्त गाड़ी, जम्मू-कश्मीर की तरह की गई पत्थरबाज़ी

रविवार (मई 12, 2019) को बिहार के चम्पारण में लोकसभा चुनाव के छठे चरण के तहत मतदान चल रहा था। इस दौरान सांसद भी सभी बूथ पर घूम-घूम कर (प्रत्याशी को मिलने वाले अनुमति के तहत) चुनाव प्रक्रिया को देख रहे थे। तभी उन्हें सूचना मिली कि नरकटिया के बूथ संख्या 162 पर भाजपा समर्थकों को पिटाई की जा रही है। सांसद जब वहाँ पर पहुँचे और उन्होंने पूछताछ शुरू की तो भीड़ उग्र हो गई। फिर क्या था, कश्मीर में पत्थरबाज़ी के तर्ज पर सांसद पर हमला किया गया। आजतक ने अपने वीडियो में भी इस बात की पुष्टि की है कि लोग दीवार के पास खड़े होकर बड़े-बड़े पत्थर फेंक रहे हैं। सांसद ने कहा कि ऐसी स्थिति आ गई थी, जिसमें उनकी व उनके साथ जो हिन्दू समाज के लोग थे, उनकी हत्या की जा सकती थी।

इस हमले में सांसद बाल-बाल बचे और कई समर्थकों को चोटें आईं। कई भाजपा समर्थक घायल भी हुए। संजय जायसवाल के आरोप गंभीर हैं। उनके अनुसार, माहौल ऐसा हो गया था कि अगर उनके गार्ड ने गोली नहीं चलाई होती तो शायद उनकी हत्या भी हो सकती थी। सांसद को वहाँ काफ़ी देर तक बंधक बना कर भी रखा गया। पुलिस के पहुँचने के बाद भी जायसवाल को पीटने के लिए भीड़ उतारू थी, लेकिन उन्हें किसी तरह सुरक्षित जगह पर पहुँचाया जा सका। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए संजय जायसवाल ने मीडिया पर कुछ बड़े आरोप लगाए हैं। उनके कई घायल समर्थक अभी भी असपताल में भर्ती हैं। जायसवाल ने कहा:

सबसे दुःखद स्थिति यह रही कि अगर यही घटना किसी ऐसे बूथ पर घटी होती जहाँ 10% अल्पसंख्यक हों और 90% बहुसंख्यक हो तो अभी देश का सारा मीडिया 7 दिनों तक मोदी जी को कोस रहा होता। सबसे दुःखद स्थिति तो मोतिहारी जिला प्रशासन की है। उनके डीएसपी की गाड़ी पत्थरबाज़ी कर के पूरी तरह से तोड़ दी गई, एसडीएम की गाड़ी तोड़ दी गई। इन सबके बावजूद भी प्रशासन इसका जिक्र करने को भी तैयार नहीं है। 3 घंटे तक मुझे झूठा आश्वासन दिया गया कि केंद्रीय बलों के जवान आ रहे हैं। मुझे बताया गया कि पूर्वी चंपारण के एसपी, डीएम आ रहे हैं। जबकि, एसपी और डीएम अपने घरों में बैठे हुए थे। हाँ,अस्पताल में यह दोनों 3 घंटे जरूर खड़े रहे।

सांसद संजय जायसवाल कोई नए-नवेले नेता नहीं हैं। उनके पिता मदन प्रसाद जायसवाल तीन बार बेतिया लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ख़ुद संजय भी 2009 और 2014 में पश्चिम चम्पारण लोकसभा क्षेत्र (नए परिसीमन के बाद बेतिया लोकसभा क्षेत्र नहीं रहा) से जीत दर्ज कर चुके हैं। ज़िले में इतना बड़ा क़द रखने के बावजूद अगर उनकी हत्या की नौबत आ जाती है और हमलावरों की भीड़ में समुदाय विशेष के होने की बात मीडिया एवं प्रशासन द्वारा छिपाई जाती है (सांसद के दावे के अनुसार), तो यह एक बहुत ही गंभीर मामला है।

एक झूठ को 100 बार बोलकर सच करने का छल: JNU के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-3

किसी झूठ को एक बार कहिए। आपकी पिटाई हो सकती है, निंदा तो होगी ही। उसी झूठ को 10 बार कहिए। आपकी निंदा तो होगी, लेकिन कुछ लोग होंगे जो आपके झूठ को सच मानने लगेंगे। अब उसी झूठ को किसी कपटी कम्युनिस्ट की तर्ज पर 100 या हज़ार बार बोलिए। समाज में वह झूठ तो सच के तौर पर स्थापित होगा ही, बहुत छोटा तबका ही ऐसा होगा जो व्यभिचारी वामपंथियों का सच समझ सके, उनको नकार दे, पूरी तरह।

कम्युनिस्टों का सबसे बड़ा योगदान क्या है, मानवता में? बर्बादी, चौतरफा बर्बादी, तबाही, भुखमरी व नरसंहार।

आप इतिहास देख लीजिए। पूर्व सोवियत संघ से शुरू कीजिए, चीन से होते हुए, क्यूबा, वेनेजुएला होते हुए बंगाल व केरल तक आ जाइए। ये ऐसे दुष्ट हैं कि जहाँ गए, उसको पूरी तरह बर्बाद कर दिया, मनुष्यता को रोने लायक नहीं छोड़ा, मानवता पर आठ आँसू बहाने वाला कोई नहीं बचा।

हालाँकि, और यही हालाँकि महत्वपूर्ण है। आज भी नैरेटिव क्या है? कि, कम्युनिस्ट वे होते हैं, जो समाज की बराबरी के लिए काम करते हैं, दुनिया में सबके हको-हुकूक का झंडा बुलंद करते हैं, धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना करते हैं, वगैरा-वगैरा। यह नैरेटिव ठीक उसी तरह का है, जैसे इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री ‘दुर्घटनावश हिंदू’ जवाहरलाल नेहरू ने इस देश को आधुनिक, विकासमान और महान बनाने का काम किया, जबकि इस देश में भ्रष्टाचार का विष-वृक्ष बोने वाले, निर्लज्ज वंशवाद के संस्थापक, हमारे राष्ट्र को हिंदू-विरोध में फिर से इस्लामिक बनाने की ओर धकेलने वाले अपने नेहरू चाचा ही थे।

उसी तरह का एक और नैरेटिव है कि नक्सली दरअसल गरीबी से लड़ने वाले आदिवासी-वंचित, शोषित-पीड़ित आदि-इत्यादि हैं। उसी तरह कम्युनिस्टों ने एक और नैरेटिव यह बनाया है कि वे बहुत पढ़े-लिखे, बल्कि इस दुनिया के एकमात्र पढ़े-लिखे लोग और जमात के प्रतिनिधि हैं, जो गलती से इस दीन-हीन देश को सौभाग्य पहुँचाने आ गए हैं। वे सत्य के अंतिम प्रतिनिधि से लेकर अल्लाह या जीसस तक कुछ भी हो सकते हैं।

अब देखिए सच क्या है? सच यह है कि कपटी कम्युनिस्टों ने हमेशा इस देश को बाँटने का काम किया है, तोड़ने का काम किया है और झूठ को, कोरे-सफेद झूठ को स्थापित किया है, उसके बाद कूड़े की तरह लिखे कुछ को भी विश्व-साहित्य का महान तत्व निरूपित कर दिया है।

शुरुआत के लिए यही देखें कि वामपंथी उपन्यासकारों – रोमिला, इरफान से लेकर बिपन चंद्र और मुखर्जी तक ने – यह बात बकायदा हम सबको बताई कि आर्यों ने बाहर से आकर इस देश के ‘मूलनिवासियों’ के साथ धोखाधड़ी की। हालाँकि, ये सभी द्वितीयक शोध या भाषा संबंधी उलटबाँसी का परिणाम है, किसी भी उपन्यासकार ने पुरातत्व या प्राथमिक शोध की मदद लेने की जहमत नहीं उठाई।

अब पूरी दुनिया में वह मिथ ध्वस्त हो चुका है, लेकिन आपके पाठ्य-पुस्तकों में वही कूड़ा फैलाया जा रहा है, आपकी कई पीढ़ियों को तो उसी जूठन से लाद दिया गया।

व्यभिचारी वामपंथियों ने अपने कूड़ा-लेखन की मदद से रामायण और महाभारत को मिथक बना दिया, पुराणों को इतिहास-बाह्य करार दिया, हम शुतुरमुर्ग हिंदू पागलों की तरह अपने राम और कृष्ण का ही ‘प्रमाण’ लेने लगे। आत्मघाती जो हैं।

उन्होंने सरस्वती नदी की गाथा को कल्पित सिद्ध कर दिया, पूरी सभ्यता को ही 4000 वर्षों में कसने लगे, अपने यूरोपीय आकाओं की मदद से, जिनका उच्छिष्ट खाकर ये कपटी कम्युनिस्ट और कुकर्मी कॉन्ग्रेसी जीवित रहे, इस देश को लूटते रहे, अब, आप तमाम सबूत इनके मुँह पर मारते रहिए, इनका झूठ दानवाकार बन आपके ही मुँह पर अट्टहास करता रहेगा।

है कोई रणनीति? इनसे निबटने के लिए कभी सोचा भी है, अकादमिक स्तर पर? इस जहर को काटने का कभी ख्याल भी आया है?

लेख का दूसरा हिस्सा यहाँ पढ़ें।
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— व्यालोक पाठक

‘फैक्ट-चेकर’ ने छिपाया फैक्ट, मीडिया गिरोह ने फैलाया झूठ: मोदी इंटरव्यू पर प्रतीक सिन्हा की ‘नंगई’

स्वघोषित ‘फैक्ट-चेकर’ प्रतीक सिन्हा आजकल इतने रौले में हैं कि वह झूठ ही नहीं, सामान्य से सच का भी फैक्ट-चेक करने लगे हैं। सच को भी ऐसे ‘रहस्यात्मक’ अंदाज में ट्वीट करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा ‘खुलासा’ कर रहे हों। मोदी के न्यूज़ नेशन को दिए इंटरव्यू पर भी उन्होंने यही ‘कला’ आजमाने की कोशिश की। बिना कोई सीधा दावा या हमला किए ऐसे दिखाया मानो इंटरव्यू में सवाल पहले से तय होना कोई दबा-छुपा गुप्त रहस्य था, कोई केजीबी-सीआईए की साजिश थी, जिसका उन्होंने पर्दाफ़ाश कर दिया।

पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने भी सामान्य ज्ञान को “ब्रेकिंग न्यूज़” बनाने में देर नहीं लगाई

पर (प्रतीक सिन्हा और स्क्रॉल के) दुर्भाग्य से कुछ लोगों को आज भी याद है कि पत्रकारिता का असली स्वरूप क्या है। तो आदरणीय(?) प्रतीक सिन्हा जी, इंटरव्यू ऐसे ही होता है- यही नियम है इंटरव्यू का कि कोई भी औड़म-बौड़म सवाल झटके में नहीं पूछा जा सकता। इंटरव्यू में सवाल पहले से ही बताए जाते हैं, ताकि जिसका इंटरव्यू हो रहा है उसे अपने जवाब के लिए विस्तृत दस्तावेज, तथ्य आदि जुटाने का मौका मिल सके।

इंटरव्यू और प्रेस कॉन्फ्रेंस में अंतर

इंटरव्यू यानी साक्षात्कार लेने के लिए जब पत्रकारिता से ग्रेजुएशन कर रहा कोई छात्र अपने प्रिंसिपल के पास भी जाता है तो पहले से सवाल उसे बता देने होते हैं। साक्षात्कार का यही सामान्य शिष्टाचार भी होता है, और मान्य प्रणाली भी। अतः आप “अरे, देखो, मोदी के पास सवालों की लिस्ट पहले से थी” दिखाकर कोई नई बात नहीं बता रहे, बल्कि बड़े सधे तरीके से फेक न्यूज़ फैला रहे हैं, वह भी बिना खुद कोई झूठ बोले। जिन आम लोगों को पत्रकारिता के गहरे डिटेल्स नहीं पता, आप उन्हें बरगलाना चाहते थे। उन्हें ऐसा महसूस कराना चाहते हैं कि मोदी को सवाल पहले से मिले होना कोई नई या अनोखी (और गलत) बात हो गई, जबकि यही पत्रकारिता का दस्तूर है।

इंटरव्यू के पहले इंटरव्यू में किन-किन चीजों पर बात होगी, इसकी मोटी-मोटी रूपरेखा तैयार कर ली जाती है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री जैसे लोग, जिनका एक शब्द भी इधर-उधर होना मुसीबत कर सकता है, आम तौर पर सवालों की सूची पहले से ही ले लेते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जिसका इंटरव्यू लिया जा रहा है उसे अपने जवाब के पक्ष में दस्तावेज, आँकड़े आदि जुटाने का समय मिल सके। फॉलो-अप सवाल भी जवाब में आए आँकड़ों/दस्तावेज के इर्द-गिर्द या फिर उनका सीधा खंडन करते हुए आँकड़े/दस्तावेज को केंद्र में रखकर ही होते हैं।

इसके अलावा उनके कार्यालय द्वारा हर सवाल की पड़ताल होती है- देखा जाता है कि कुछ ऐसा तो नहीं जिसे बिना संदर्भ के कहीं चिपका दिया जाए तो जनसामान्य के लिए ही समस्या खड़ी हो जाए। यहाँ तक कि राहुल गाँधी के एनडीटीवी को दिए गए दोनों (हिंदी और अंग्रेजी) ‘औचक’ इंटरव्यू के लिए भी एक मोटी रूपरेखा पहले से दी गई होगी।

इतने सब के बाद भी अंतिम इंटरव्यू प्रकाशित/प्रसारित होने के पहले जिसका इंटरव्यू हुआ है, उसे या उसके कार्यालय को अंतिम जाँच के लिए भेजा जाता है। वहाँ इस बात को चेक किया जाता है कि कहीं इंटरव्यू में कोई घालमेल, कुछ आगे-पीछे करना या कोई दुर्भावनापूर्ण एडिटिंग तो नहीं हुई है। याद करिए बाबा रामदेव का एनडीटीवी को ही दिया हुआ इंटरव्यू। अगर रामदेव ने उसे खुद चुपचाप रिकॉर्ड न कर लिया होता तो एनडीटीवी ने सब आगे-पीछे करके बाबा के शब्दों से ही फेक न्यूज़ चला दी थी

यह पत्रकारिता की मानक पद्धति है- स्टैंडर्ड प्रोसीजर। और इसे ‘फिक्सिंग’ वही मान सकता है जो या तो पत्रकारिता के बारे में काला अक्षर भैंस बराबर हो, या जानबूझकर बना ‘बकलोल’।

लगे हाथ आपको प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में भी बता देते हैं, जिसका आप इंटरव्यू के साथ घालमेल कर रहे थे। तो जनाब! ऐसा है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी पत्रकार झटके में सवाल तो पूछ सकता है लेकिन उसके भी अपने कुछ कायदे-कानून होते हैं। जैसे सवाल पहले कौन पूछेगा, कौन-कौन सवाल पूछेगा यह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे व्यक्ति का सहायक ही तय करता है, खुद से “पहले मैं, पहले मैं” नहीं करते। इसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस अगर अंडे के आयात-निर्यात पर हो रही हो तो आप “वॉट अबाउट 2002”, “इनटॉलेरेंस”, “बालाकोट का सबूत क्या है?” नहीं पूछ सकते। वहाँ आपको अंडे के व्यापार से संबंधित सवाल ही पूछ सकते हैं। आपके जैसे पत्रकार तुर्रे खाँ बनने के लिए शायद पूछ भी लें उट-पटांग लेकिन जवाब नहीं मिलेगा, इसकी गारंटी है।

अगर ‘छुपाना’ होता तो कैमरे के सामने मोदी क्यों माँगते ‘फाइल’

चलिए, पत्रकारिता के कायदे वगैरह साइड में कर दीजिए, कॉमन सेंस की बात करते हैं। अगर मोदी कोई ‘गुनाह’ कर रहे होते, उनको सवाल पहले से मालूम होने की बात को ‘छुपाना’ ही होता तो क्या वे कैमरे पर फाइल माँगते? फिर इसके अलावा उनके कविता लेकर चलने का तुक क्या था? मोदी क्या कोई कुमार विश्वास जैसे फुलटाइम कवि, पार्टटाइम नेता हैं, जो अपनी कविताओं की डायरी लेकर चलते? या वाजपेयी जैसे कविता के लिए मशहूर नेता, जो पता होता कि सामने वाला एक कविता तो पूछ ही देगा? उनका कविता वाली फाइल कैमरे पर माँगना ही अपने आप में यह बता सकता है कि उन्हें सवाल पता होने की बात छिपानी नहीं थी।

‘सवाल फिक्स थे’ से ‘Scripted interview’ तक का सफर: तथ्य-आधारित फेक न्यूज़

मशहूर गणितज्ञ, लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार नासिम निकोलस तालेब ने एक बार पत्रकारों के ही संदर्भ में कहा था, “The Facts are True, the News is Fake” (तथ्य सही हैं पर खबर झूठी है)। पत्रकारिता का समुदाय विशेष आज इसे ही चरितार्थ कर रहा है। पहले प्रतीक सिन्हा ने पत्रकारिता के सामान्य-से तथ्य और आम चलन को मोदी के लिए बनाया गया कोई अपवाद दिखाने की कोशिश की, और उसके ऊपर एनडीटीवी की पत्रकार झूठ की चाशनी पोतकर सीधे-सीधे फेक न्यूज़ बना देती हैं। यह और बात है कि ‘बेचारी’ समोसा पत्रकारिता के लिए आज बहुत फेमस हो गईं।

‘स्क्रिप्टेड इंटरव्यू’ का मतलब होता है सिर्फ सवाल ही तय नहीं हो बल्कि सवाल पूछने वाले ने ही जवाब भी बनाकर दिया हो – अपनी लॉबी, अपने मालिक के अनुसार। यह व्यावसायिक कदाचार होता है। पीएम को भूल जाइए, क्या अपने साथी पत्रकारों पर कदाचार जैसा संगीन आरोप लगाने के लिए सबूत है कोई कादम्बिनी शर्मा के पास? कोई सबूत है कि दीपक चौरसिया ने सवालों के जवाब भी भेजे, और मोदी को ‘ये वाली’ कविता भी भेजी कैमरे पर पढ़ने के लिए? अगर दीपक चौरसिया या न्यूज़ नेशन मानहानि का दावा कर दें तो ‘स्क्रिप्टेड’ शब्द कादम्बिनी शर्मा को भारी पड़ेगा…

‘BJP में विवाहित महिलाएँ अपने पतियों को PM मोदी के नज़दीक जाते देख घबराती हैं’

बसपा सुप्रीमो मायावती भी अब विवादित बयानों के इस दौर में खुल कर खेलने के लिए उतर आई हैं। जैसा कि हमनें पिछले कुछ दिनों में देखा है, अधिकतर विपक्षी नेताओं के विवादित बयान व अशोभनीय टिप्पणियाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही की गई है। लोकतांत्रिक तरीके से देश के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए ‘जल्लाद’ और ‘दुर्योधन’ जैसे शब्दों का प्रायोग किया गया। इन शब्दों का प्रयोग बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी जैसे नेताओं ने भी किया। अब उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी कुछ ऐसा ही कहा है, जो न सिर्फ़ पीएम मोदी बल्कि सभी महिलाओं के लिए अपमानसूचक है। मायावती ख़ुद एक महिला हैं, फिर भी उनके द्वारा ऐसे बयान देना लोगों को रास नहीं आ रहा। दरअसल, मायावती ने कहा:

“नरेंद्र मोदी अलवर गैंगरेप मामले पर चुप हैं। उन्होंने इस पर अपनी गन्दी राजनीति खेलनी चाही। ऐसा उन्होंने इसीलिए किया ताकि चुनाव में उनकी पार्टी को फ़ायदा मिल सके। ये काफ़ी शर्मनाक है। वो दूसरों की पत्नियों व बहनों की इज़्ज़त कैसे कर सकते हैं, जब उन्होंने राजनीतिक फ़ायदे के लिए ख़ुद की ही पत्नी को छोड़ दिया। मुझे तो यह भी पता चला है कि भाजपा में ख़ासकर विवाहित महिलाएँ अपने पतियों को पीएम मोदी के नज़दीक जाते देख कर यह सोचते हुए काफ़ी घबराई रहती है कि कहीं मोदी अपनी पत्नी की तरह उन्हें भी अपने पति से अलग न करा दे।”

इसके बाद गोरखपुर में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए मायावती ने न सिर्फ़ अपने बल्कि अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा भी मोदी को दी जाने वाली गालियों को सही ठहराया। हाल ही में प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्हें विपक्षी नेतागण आए दिन नई-नई गालियाँ देते रहते हैं। मायावती ने इन गालियों को स्वाभाविक करार दिया। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि नरेंद्र मोदी को गालियाँ पड़नी स्वाभाविक है क्योंकि किसी भी व्यक्ति को गालियाँ तभी दी जाती है, जब वो गाली खाने का काम करता है। उन्होंने नरेंद्र मोदी को इस बात को ध्यान में रख कर चलने की सलाह दी।

यहाँ मायावती ने दो बड़े काण्ड किए (गेस्ट हाउस काण्ड को वो गठबंधन की घोषणा करने के दिन ही भूलने का ऐलान कर चुकी हैं)। मायावती ने पहले तो पीएम मोदी का अपमान किया और फिर नेताओं की पत्नियों को जबरन घसीटते हुए उन्हें भी अपनी ग़लत राजनीतिक बयानबाज़ी का शिकार बनाया। इसके बाद उन्होंने अपने बयान को जायज ठहराते हुए पीएम मोदी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले सभी नेताओं को चुटकी में अपनी तरफ़ से क्लीन चिट दे दी। एक ऐसी नेत्री, जो कभी ख़ुद कुछ नेताओं के घृणित कृत्य (उसी पार्टी के नेता, जिनके साथ वह अभी गठबंधन में हैं) का शिकार बन चुकी हैं, उनकी तरफ़ से इस तरह के बयान आना राजनीति की गिरती मर्यादा का प्रमाण है।

मायावती द्वारा पीएम मोदी पर किए गए निजी हमले पर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने कड़ा रुख़ अख़्तियार किया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित कर कहा कि मायावती का बयान उनकी बौखलाहट को स्पष्ट दर्शाता है, इसी वजह से वो पीएम मोदी पर निजी हमले कर रही हैं। प्रेस कॉन्फ्रेन्स में रक्षामंत्री ने कहा कि अपनी अभद्र टिप्पणी के लिए उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से माफ़ी माँगनी चाहिए। पीएम मोदी और बीजेपी की महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी बेहद अपमानजनक है।

रक्षामंत्री ने अलवर गैंगरेप पर पीएम मोदी के उस सवाल का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने मायावती से पूछा था कि वो राजस्थान में कॉन्ग्रेस से अपना समर्थन वापस क्यों नहीं लेती? इस पर जवाब देने के बजाए मायावती ने प्रधानमंत्री मोदी पर निजी हमले कर दिया, इसके लिए उन्हें माफ़ी माँगनी चाहिए। रक्षामंत्री सीतारमण ने यह भी कहा कि मायावती जान चुकी हैं कि उनका गठबंधन पूरी तरह से फेल हो गया है, इसलिए वो परेशान हैं और असुरक्षा से घिरी हुईं हैं।

मायावती को अलवर काण्ड के लिए राजस्थान सरकार को चेतावनी देते हुए गंभीरता से बात करनी चाहिए क्योंकि वहाँ चल रही कॉन्ग्रेस सरकार को उनका समर्थन प्राप्त है। एक महिला का दर्द समझते हुए मायावती को प्रधानमंत्री की पत्नी को इन सबमें नहीं घसीटना चाहिए क्योंकि वह इन सबसे अलग और मीडिया कैमरों से दूर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।

श्री लंका में बवाल: मुस्लिमों और ईसाइयों के बीच झड़प, मस्जिदों को किया टारगेट – सोशल मीडिया बैन

ईस्टर पर हुए आतंकी हमले के बाद श्री लंका में अब तक हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। रविवार को देश के पश्चिमी तटीय शहर चिलॉव में मुस्लिमों और ईसाइयों के बीच हुई झड़प के कारण वहाँ मध्य रात्रि से फेसबुक और व्हाट्सअप पर अस्थाई रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है। ताजा जानकारी के अनुसार कई मस्जिदों और मुस्लिमों को टार्गेट किया गया है।

गौरतलब है कि कल (मई 12, 2019) स्थानीय आबादी और मुस्लिमों के बीच तनातनी एक फेसबुक पोस्ट को लेकर हुई थी और देखते ही देखते कर्फ्यू लगाने की स्थिति आ गई। स्थानीय पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सोमवार (अप्रैल 13, 2019) की सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगा दिया।

रॉयटर्स के अनुसार, रविवार को फेसबुक पर एक पोस्ट को लेकर तनाव का मामला इतना बढ़ गया कि चिलॉव स्थित तीन मस्जिदों और मुस्लिमों की कुछ दुकानों पर स्थानीय ईसाई समुदाय के लोगों ने पथराव किया था।

फेसबुक पर किसी यूजर ने सिंहलीज़ में लिखा था – “हमें रुलाना इतना आसान नहीं।” इसके साथ ही उसने मुस्लिमों के लिए एक स्थानीय गाली का भी प्रयोग किया। इसी पोस्ट पर अब्दुल हमीद मोहम्मद हसमार ने अंग्रेजी में कॉमेंट किया – “Dont laugh more 1 day u will cry.” मतलब ज्यादा हँसो मत, एक दिन तुम रोओगे।

खबरों के मुताबिक अधिकारियों ने बताया है कि उन्होंने विवादस्पद फेसबुक पोस्ट करने वाले अब्दुल हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा अधिकारियों ने कुलियापितीय और दुम्मलासुरिया क्षेत्र के पास से एक समूह को भी गिरफ्तार किया है, जो गिरफ्तार आरोपी को रिहा करने की माँग कर रहे थे।

नवीन पटनायक ने पीएम मोदी को कहा – Thank You! 5 लाख घर बनाने की माँग

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर फोनी तूफान से मची तबाही से उबरने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से ओडिशा सरकार को दी गई मदद के लिए शुक्रिया अदा किया है। पटनायक ने अपने पत्र में ओडिशा में हुए नुकसान का जिक्र करते हुए पुनर्वास के लिए केंद्र से मदद का अनुरोध किया है। उन्होंने चक्रवात से प्रभावित लोगों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के तहत 5 लाख घर बनाए जाने की माँग की है।

नवीन पटनायक ने PM मोदी को चिट्ठी लिखकर जताया आभार, पुनर्वास के लिए मदद का अनुरोध

नवीन पटनायक ने खत में लिखा है कि चक्रवात से प्रभावित जिलों में बड़ी संख्या में लोग मुश्किलों से गुजरे हैं, उनका आसरा भी छिन गया है। प्रदेश सरकार नुकसान का आकलन कर रही है, जिसके काफी जल्द पूरा होने की संभावना है। तबाह घरों की सटीक संख्या और इससे जुड़ी जानकारी सर्वे पूरा होने के बाद ही मिल पाएगी। हालाँकि शुरुआती सर्वे की मानें तो सबसे ज्यादा प्रभावित 14 जिलों में तकरीबन 5 लाख घर या तो पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं या काफी बड़े स्तर पर उन्हें नुकसान पहुँचा है। सबसे ज्यादा क्षति पुरी जिले में हुई है। इसके साथ ही सीएम ने 6 मई को प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक में उठाई गई माँग को दोहराते हुए कुछ खास आवंटनों के लिए परमानेंट वेट लिस्ट (पीडब्लूएल) में छूट देने की बात कही है।

पत्र के अंत में पटनायक ने लिखा है कि जल्द ही बारिश का मौसम आने वाला है और 10 जून तक मानसून भी ओडिशा में दस्तक दे सकता है। इससे पहले प्रभावित लोगों को पक्का मकान मिल सके, इसके लिए केंद्र सरकार के प्रस्तावों के मद्देनजर ओडिशा सरकार 1 जून 2019 से कार्य आदेश पारित करने जा रही है। गौरतलब है कि 3 मई को ओडिशा में आए चक्रवाती तूफान फोनी से हुई क्षति का जायजा लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी 6 मई को भुवनेश्वर पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने हवाई सर्वेक्षण के जरिए तूफान से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस आपदा से उबरने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से ओडिशा सरकार को कुल ₹1381 करोड़ की मदद दी गई।

पंजाब व दिल्ली में काले झंडे से केजरीवाल का स्वागत, BJP को दी ‘औकात में रहने’ की चेतावनी

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का पारा सातवें आसमान पर नज़र आ रहा है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो का स्वागत जनता ने कुछ यूँ किया, कि मंच से केजरीवाल ने भाषण देने की जगह आग उगला। पंजाब की सभी 13 सीटों पर लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के अंतर्गत 19 मई को मतदान होना है। हर राजनीतिक पार्टी की नज़र अब पंजाब पर है और सभी यहाँ अपना-अपना वोट बैंक तलाशने पहुँच गए हैं। इसी क्रम में यहाँ चुनाव-प्रचार के लिए पहुँचे केजरीवाल का स्वागत काले झंडों से किया गया। जनता ने उन्हें काले झंडे दिखाए उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया। ये सब हुआ, पंजाब के संगरूर में। लोगों का कहना भी जाएज़ था, वो आम आदमी पार्टी से नाराज़ थे।

जनता ने विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने 2014 लोकसभा चुनाव में कई आप सांसदों को जीत दिला कर भेजा, लेकिन उनमें से किसी एक ने भी पॉंच वर्षों तक जनता की सुध तक न ली। लोगों ने केजरीवाल के विरोध का कारण बताते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी के सांसदों द्वारा जनता व क्षेत्र की उपेक्षा किए जाने से वे नाराज़ हैं। लोगों का कहना था कि अरविन्द केजरीवाल ने पिछले चुनावों से पहले पंजाब में ड्रग्स समस्या को लेकर तो बड़े-बड़े भाषण दिए लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही बादलों से माफ़ी माँग ली। विरोध-प्रदर्शन कर रही जनता ने आप और केजरीवाल को धोखेबाज़ बताया। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने उन्हें ठगने का काम किया है।

इतने विरोध प्रदर्शनों के बाद मंच पर पहुँचे केजरीवाल ने अपना आपा खो दिया। इससे पहले केजरीवाल को दिल्ली में भी काले झंडे दिखाए गए, जिसके बाद गुस्से में आग बबूला होकर उन्होंने भले-बुरे शब्द कहे। उन्होंने भाजपा को जी भर धमकी दी और कई विवादित शब्दों का भी प्रयोग किया। सार्वजानिक मंच से बोलते हुए केजरीवाल ने कहा, “मैं बीजेपी वालों को भी चेतावनी देता हूँ, अपनी औकात में रहो। दिल्ली की जनता से पंगा मत लो वरना ये तुम्हारे घर में घुस कर इतने जूते मारेंगे, इतने जूते मरेंगे, कि तुम्हारी शक्ल ही नहीं दिखेगी।” अरविन्द केजरीवाल के भाषण में जगह-जगह उन्हें दिखाए जाने वाले काले झंडों को लेकर उनका गुस्सा साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था।

दिल्ली और पंजाब में नाराज़गी झेल रहे केजरीवाल कॉन्ग्रेस से गठबंधन करने में सफल न होने के कारण भी नाराज़ हैं। संगरूर में उनकी प्रतिष्ठा इसीलिए भी दाँव पर है क्योंकि पंजाब में आप के बड़े नेता भगवंत मान यहाँ से मौजूदा सांसद हैं और पार्टी ने एक बार फिर से उन पर विश्वास जताया है। कॉन्ग्रेस ने यहाँ से केवल सिंह ढिल्लों को उम्मीदवार बनाया है। वहीँ भाजपा गठबंधन की ओर से शिरोमणि अकाली दल के प्रत्याशी परमिंदर सिंह ढींढसा मैदान में हैं। कई आप विधायकों द्वारा पार्टी छोड़ने से केजरीवाल की पार्टी को झटका लगा है और आम आदमी पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है।

पंजाब में कॉन्ग्रेस, भाजपा-शिअद गठबंधन और आम आदमी पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुक़ाबला है।। डेरा सच्चा सौदा के अप्रासंगिक होने और आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता घटने के बाद यहाँ के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। अतः अंतिम चरण में सभी दल यहाँ ज़ोर लगा रहे हैं।

अवैध प्रवासियों के साथ-साथ मुस्लिम तुष्टिकरण: मोदी-विरोध के नाम पर राष्ट्रीय सुरक्षा से खेल रहीं ‘दीदी’

भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा का निर्धारण इच्छामति नदी के द्वारा होता है। प्रत्येक वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान दोनों देशों के हिन्दू नदी किनारे एकत्रित होकर मूर्ति विसर्जन करते हैं। इस अवसर पर दोनों देशों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। लेकिन, इसी अवसर का लाभ उठाते हुए कुछ लोग अवैध तरीक़े से भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। तमाम इंतजाम किए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक नदी पार करके भारत आने में कामयाब हो जाते हैं।

सुरक्षा बलों की सक्रियता के बावजूद अवैध रूप से भारत आने वाले लोग चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे देश की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है। ख़बर के अनुसार, लाखों ऐसे विदेशी नागरिक हैं जो अवैध रूप से भारत की सीमा में घुस जाते हैं और फिर यहीं बस जाते हैं। ऐसा काफी समय से होता आया है और कभी इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन मोदी सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस पर अपना विरोध जताया। भारत में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों को बाहर करने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे को पुरज़ोर तरीक़े से उठाया।

बीजेपी के कार्यकाल में ‘नागरिकता संशोधन विधेयक 2016’ पास हुआ था। भाजपा ने इस विधेयक को पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश से विस्थापन की पीड़ा झेल रहे हिन्दू, पारसी, ईसाई, बौद्ध, जैन और सिख अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए अहम फ़ैसला बताया है। बिल के पारित होने पर गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में अपने भाषण में कहा, “नागरिक संशोधन विधेयक सिर्फ़ असम के लिए नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों में रह रहे प्रवासियों पर भी लागू होता है। यह कानून देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा। असम का भार सिर्फ़ असम का नहीं है, पूरे देश का है।”

वहीं तृणमूल कॉन्ग्रेस ने संसद में इस विधेयक को बाँटने वाली राजनीति करार देते हुए इस पर अपना विरोध दर्ज किया था। वहीं एक और बात का ख़ुलासा हुआ था कि TMC बांग्लादेश में अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार भी कर रहीं थीं, जिसमें वो अपने पक्ष में वोट की अपील करते भी पाई गईं थी।

दरअसल, एक वीडियो सामने आया था जिसमें ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC (तृणमूल कॉन्ग्रेस) के आधिकारिक फेसबुक पेज पर सूचना और विज्ञापनों पर जब क्लिक किया गया, तो आप उन देशों को देख सकते हैं जहाँ TMC लोकसभा चुनाव में वोट देने की अपील करती नज़र आई। ड्रॉप-डाउन वाले विकल्प पर क्लिक करने पर जब एक देश के रूप में ‘बांग्लादेश’ का चयन किया गया तो वहाँ TMC अपने पक्ष में वोट माँगने की अपील करती नज़र आई। इससे यह साफ़ हो गया है TMC अपने देश के अलावा दूसरे देश में भी प्रचार कर रही थी। भारत में प्रचार करना तो समझ में आता है, लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश में प्रचार करने का भला क्या मतलब हो सकता था?

ऐसी ही एक और ख़बर सामने आई थी जब बांग्लादेशी अनिभेता फ़िरदौस का बिज़नेस वीज़ा रद्द हो गया था। उस समय इस बात का ख़ुलासा हुआ था कि वो पश्चिम बंगाल में TMC के उम्मीदवार कन्हैया लाल अग्रवाल का प्रचार कर रहा था। नोटिस मिलने के बाद उसे बांग्लादेश वापस जाना पड़ा था।

फ़िरदौस अकेला ऐसा शख़्स नहीं था जो TMC का प्रचार करने में शामिल था, उसके अलावा बांग्लादेशी फ़िल्म इंडस्ट्री के दो अन्य लोग अंकुश हाज़रा और पायल सरकार भी प्रचार-अभियान में शामिल थे। उस समय में बीजेपी ने फ़िरदौस द्वारा चुनाव किए जाने पर आपत्ति जताई थी और उसके ख़िलाफ़ चुनाव आयोग में शिकायत करने के साथ-साथ उसकी गिरफ़्तारी की माँग भी की थी। इस पर भारत में बांग्लादेश उच्चायोग ने भी फ़िरदौस को वापस जाने को कहा था। बता दें कि फ़िरदौस की वापसी का मामला थमा भी नहीं था कि TMC का प्रचार करने में जुटे एक और बांग्लादेशी अभिनेता गाज़ी अब्दुन नूर का नाम सामने आया था, जो दमदम क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे TMC उम्मीदवार सौगात के लिए प्रचार कर रहा था।

TMC द्वारा बांग्लादेशी अभिनेताओं से चुनाव-प्रचार कराने पर बीजेपी के महासचिव राहुल सिन्हा ने तर्क दिया था कि कल को ममता बनर्जी पाकिस्तान से भी अभिनेताओं को अपने पक्ष में चुनाव-प्रचार के लिए बुला सकती हैं।

लोकसभा चुनाव 2019 के अंतिम चरण में बशीरघाट में मतदान होगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि बशीरघाट में 50 फ़ीसदी से अधिक लोग मुस्लिम हैं। पिछले साल वहाँ 2 बार साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हो चुकी हैं। TMC ने इदरिस अली की जगह अदाकारा नुसरत जहाँ को टिकट दिया है, और कॉन्ग्रेस ने क़ाज़ी अब्दुल रहीम को टिकट दिया है, बता दें कि अब्दुल रहीम के पिता अब्दुल गफ्फार इलाक़े से सम्मानित व्यक्तियों में से एक रहे हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सूबे की कमान सँभालने वाली ममता बनर्जी को बांग्लादेश से बड़ी उम्मीदें हैं। शायद उन्हें यह लगता है कि भारत में उनकी राजनीति बांग्लादेश के बलबूते ही चमकेगी। स्थिति भले ही कुछ भी हो लेकिन सीधे तौर पर यह मुक़ाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच दिख रहा है।

ज़्यादा बोलने की वजह से सिद्धू की आवाज़ को ख़तरा, सभाएँ रद्द, अस्पताल में हुए भर्ती

नवजोत सिंह सिद्धू की आवाज़ पर एक बार फिर से ख़तरा मँडराने लगा है। ताज़ा ख़बरों के अनुसार, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है,जहाँ उनका इलाज चल रहा है। उनकी हालत ख़राब होने की वजह से उन्हें ‘Steroid Meditation’ पर रखा गया है और उन्हें कई इंजेक्शन भी दिए गए हैं। उनके ‘Vocal Chords’ को काफ़ी नुक्सान पहुँचा है और इलाज ख़त्म होने के बाद ही वह फिर से प्रचार अभियान में लौट पाएँगे। इससे पहले दिसंबर 2018 में भी ख़बर आई थी कि लगातार बोलने के कारण सिद्धू अपनी आवाज़ खोने की कगार पर पहुँच गए हैं।

पंजाब केसरी में छपी ख़बर के मुताबिक़, डॉक्टरों ने सिद्धू को अपने गले पर एक ख़ास बाम लगाने को कहा है। दिक्कत यह है कि उस बाम को लगाने के बाद सिद्धू 4 दिनों तक बोलने में अक्षम होंगे। वहीं अगर वो इंजेक्शन और दवाओं का सहारा लेते हैं तो उन्हें 48 घंटे आराम करना पड़ेगा। सिद्धू ने फिलहाल चुनाव को देखते हुए दवाओं व इंजेक्शन का सहारा लिया है। वो चुनाव बाद नियमित और स्थायी उपचार के लिए जाएँगे। उधर रविवार (मई 12, 2019) को मध्य प्रदेश में उनकी सभाएँ रद्द होने के कारण कॉन्ग्रेस नेताओं को जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा। पुनासा में सिद्धू के न पहुँच पाने के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा मोदी को ज़िम्मेदार ठहराया और कहा गया कि उनके हैलीकॉप्टर को इंदौर में ईंधन नहीं दिया गया। इसके बाद ग्रामीणों ने हंगामा किया।

दिसंबर में मामले की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें पाँच दिन पूरी तरह आराम करने की सलाह दी थी। डॉक्‍टरों ने कहा था कि अब यदि अधिक बोला तो उनकी आवाज़ जा सकती है। छह महीने पहले उनके ख़ून के कई परीक्षण करने के बाद नतीजों का गम्भीरतापूर्वक मूल्यांकन किया गया था। इसके बाद सिद्धू किसी अज्ञात स्थान पर चले गए थे। सिद्धू को कई दिनों से फ़िज़ियोथेरेपिस्ट कई तरह की प्रैक्टिस करा रहे थे और उन्हें विशेष दवाएँ देने के साथ-साथ साँस लेने का अभ्यास भी कराया जा रहा था।

ख़बरों के अनुसार, पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू कॉन्ग्रेस के सबसे सक्रिय स्टार प्रचारकों में से एक रहे हैं। उन्होंने अब तक पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश से लेकर कई राज्यों में जनसभाएँ की है और लगातार बोलते रहने के लिए जाने जाने वाली सिद्धू लोकसभा चुनाव 2019 में अब तक 80 के आसपास सभाओं को सम्बोधित कर चुके हैं। 19 मई को अंतिम चरण के चुनाव के तहत पंजाब में मतदान होना है और सिद्धू की अनुपस्थिति से कॉन्ग्रेस को तगड़ा झटका लगा है।

पिछले वर्ष यह भी ख़बर आई थी कि लगातार हेलीकॉप्टर और विमान यात्रा करने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा था। इससे पहले वह एंबोलिज्म (धमनी में खून का थक्का जमना या हवा का बुलबुला बनना) के लिए उपचार करवा रहे थे। उन्हें कुछ साल पहले अत्यधिक हवाई यात्रा करने के कारण सिद्धू को डीप वेन थ्रोबोसिस (डीवीटी) का भी सामना करना पड़ा था। लगातार चुनावी सभाओं को सम्बोधित कर रहे सिद्धू पंजाब में कॉन्ग्रेस का अहम चेहरा हैं और उन्हें सुनने के लिए लोग भी जुटते हैं। हाल ही में कई विवादित बयानों के कारण वे ख़ासे चर्चा में रहे हैं।

कमल हासन 2013 Vs 2019: तब ‘शांतिदूतों’ के कारण देश छोड़ रहे थे, आज हिंदू आतंकवाद का राग अलाप रहे

कमल हासन के नए काण्ड की बात तो हम करेंगे, लेकिन उससे पहले एक कहानी बताना चाहता हूँ आप लोगों को। ये कहानी उस बड़े अभिनेता की है, जिसे अपनी ज़िंदगी में कई भाषाओं में अभिनय करते-करते इतने अवॉर्ड मिले कि अंत में उसे फ़िल्मफेयर को लिखना पड़ा कि अब उन्हें अवॉर्ड्स न दिए जाएँ। ये क़रीब डेढ़ दशक पुरानी बात है। इसके बाद भी फ़िल्मों में वह अभिनेता सक्रिय रहा। लेकिन, जनवरी 2013 में एक फ़िल्म आई, जिसका नाम था विश्वरूपम, और इसके बाद सब कुछ बदल गया। कमल हासन के आलोचक भी मानते हैं कि विश्वरूपम एक उम्दा फ़िल्म थी और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इस्लामिक आतंक को इससे बेहतर शायद ही किसी भारतीय फ़िल्म में दिखाया गया हो। इस फ़िल्म को लिखने वाले, इसका निर्देशन करने वाले और इसके मुख्य अभिनेता, तीनो ही कमल हासन थे। अतः इसका पूरा का पूरा श्रेय उन्हें ही जाता है।

लेकिन, क्या आपको पता है कि इस फ़िल्म की रिलीज पर संकट उत्पन्न हो गया था? इस संकट का कारण वही लोग थे, जिन्हें लुभाने के लिए कमल हासन आज गली-गली में घूम कर कॉन्ग्रेस द्वारा यूपीए शासनकाल में क्राफ्ट किए गए ‘हिन्दू आतंकवाद’ वाले नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं। कमल हासन ने विशाल भारद्वाज वाली ग़लती की है। कश्मीर में सेना के कथित अत्याचारों को दिखने वाले विशाल भारद्वाज ने हाल ही में नाथूराम गोडसे को स्वतंत्र भारत का पहला आतंकी बताया था। कमल हासन ने एक तरह से उन्हीं की बातों को दुहराया है। हाँ, तो विश्वरूपम में आतंकियों को मुस्लिमों वाली टोपी पहने दिखाया गया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि अफ़ग़ानिस्तान के बैकड्राप में बनी इस फ़िल्म में ये चीज ग़लत नहीं दिखाई गई थी।

विश्वरूपम का ट्रेलर आया। ट्रेलर में ही आतंकियों को मजहब विशेष वाली टोपी पहने गोलियाँ चलाते हुए देखा गया। ये सच्चाई थी। अफ़ग़ानिस्तान के तालिबानी आतंकियों की वेश-भूषा वही होती थी या है, जो एक कट्टरपंथी की होती है। स्कल कैप, टखने तक पजामा और कुर्ता, बिना मूछों वाली दाढ़ी और जबान पर बात-बात पर अल्लाह का नाम। कमल हासन ने ‘हे राम’ में नाथूराम गोडसे का किरदार भी अदा किया था, लेकिन उस वक़्त उनकी फ़िल्म की रिलीज रोकने की धमकी नहीं दी गई थी। ऐसा इसीलिए, क्योंकि पूरा भारत मानता है कि गोडसे एक हत्यारा था। उस पर हत्या का आरोप सिद्ध हुआ था और इसकी सजा उसे मिली थी। लेकिन, मारते समय उसने राम का नाम नहीं लिया था, गाँधीजी ने मरते वक़्त ‘हे राम’ कहा था।

गोडसे का पक्ष जानने के लिए लोग उन्हें और उनके विचारों को पढ़ते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं। जब लाशें बिछाने वाले हिटलर की ऑटोबायोग्राफी पढ़ी जाती है तो गोडसे ने तो एक ही हत्या की थी (जिसकी निंदा की जाती है) तो उन्हें पढ़ने में क्या बुराई है। लेकिन हाँ, उन्होंने गाँधी को मारते वक़्त ‘अल्लाहु अकबर’, ‘वाहेगुरु’ या ‘जय श्री राम’ नहीं कहा था। विश्वरूपम की रिलीज रोकने में वही शांतिप्रिय समाज के लोग शामिल थे, जिन्हें इस बात पर आपत्ति थी की फ़िल्म में उन्हें आतंकी दिखाया गया है। कमल हासन ने गोडसे को दिखाया, वे जैसा चाहते थे उसी तरह से गोडसे को प्रदर्शित किया, लेकिन उन्होंने देश छोड़ने की बात विश्वरूपम के समय कही। विश्वरूपम को मद्रास हाई कोर्ट के ऑर्डर के बावजूद समय पर रिलीज नहीं किया जा सका था।

कमल हासन ने उस समय कहा था कि वो तमिलनाडु छोड़ देना चाहते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत छोड़ने की बात भी कही, वही देश जहाँ वो 1960 से ही अभिनय कर रहे हैं। एक बाल कलाकार के रूप में साठ के दशक से लेकर सुपरस्टार और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाने के बाद भी, कमल हासन को देश छोड़ने की ज़रूरत पड़ गई। क्यों? क्योंकि कमल हासन की राय थी कि वह एक धर्मनिरपेक्ष जगह, राज्य या देश में जाकर बसना चाहते हैं। उन्हें भारत धर्म निरपेक्ष नज़र नहीं आ रहा था क्योंकि 2013 में ऐसे विषय पर 100 करोड़ रुपए से भी अधिक बजट वाली फ़िल्म बनाना एक साहस का कार्य था और उन्होंने लगभग अपनी ज़िंदगी भर की कमाई, मेहनत और अनुभव का इस्तेमाल इसमें कर दिया था। उन्हें कंगाल होने का ख़तरा नज़र आ रहा था। ख़ुद को संभावित आर्थिक संकट को देखते हुए उनके मन में भारत छोड़ने का विचार आया।

कौन लोग थे कमल हासन की इस पीड़ा के पीछे? जब पूरा का पूरा समुदाय विशेष उनके विरोध में खड़ा हो गया था और उन्हें भारत एक सांप्रदायिक राष्ट्र लगने लगा था, उस समय के वो साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोग आज उनके लिए सहानुभूति के पात्र कैसे हो गए? जो देश के सबसे बड़े और पुराने अभिनेताओं में से एक को देश छोड़ने को मज़बूर कर दे, वो समाज होता है सांप्रदायिक। जो सबसे ज्यादा फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स जीतने वाले अभिनेताओं में से एक को देश में डरा कर रख दे, उस समाज को कहते हैं सांप्रदायिक। वह कौन सा समाज था, वो कौन से लोग थे, इसका उत्तर कमल हासन से बेहतर कोई नहीं जानता। कमल हासन ने बाद में अपने बयान पर कायम रहने की बात करते हुए कहा था कि अगर आगे ऐसा कुछ होता है तो वह फिर से देश छोड़ने की सोचेंगे। बस कुछ दिनों के विरोध के कारण कमल हासन को उस समय 60 करोड़ का घाटा हुआ था।

राजनेता कमल हासन को समुदाय विशेष का वोट चाहिए। अभिनेता कमल हासन कहीं गुम हो गया है। उस अभिनेता की फ़िल्म को जब समुदाय विशेष ने रोक दिया था, तब रजनीकांत और जयललिता जैसी शख़्सियतों ने आगे आकर कमल का समर्थन किया था। राजनेता कमल हासन के लिए हिन्दू आतंकवाद एक सच्चाई है, कॉन्ग्रेस का वो नैरेटिव, विशालक भारद्वाज की वह सोच, कमल हासन इन सबके प्रमुख वाहक हो चुके हैं। आतंकवाद क्या है और इसकी परिभाषा क्या है, अगर कमल हासन ये पढ़ लें तो उन्हें भी पता चल जाएगा कि गोडसे कहीं से भी इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते। व्यक्तिगत दुश्मनी पाल कर एक हत्या करने वाला अगर आतंकी है तो ‘अल्लाहु अकबर’ बोलकर अब तक हज़ारों लाशें बिछा चुके कौन लोग हैं, ये सवाल हम हर उस व्यक्ति से पूछते हैं जिसे हिन्दू आतंकवाद के अस्तित्व पर विश्वास है।

कमल हासन ने अरवाकुरीचि में ये बात कही। उनके मन में कहीं न कहीं खोट था, क्योंकि अपने इस बयान के बाद उन्होंने जो सफ़ाई दी, उससे साफ़ पता चलता है कि उनकी सोच क्या थी? कमल हासन ने कहा कि वो सिर्फ़ इसीलिए गोडसे को आतंकी नहीं बोल रहे क्योंकि यह एक मजहब विशेष के प्रभाव वाला इलाक़ा है, ऐसा वो गाँधीजी की प्रतिमा को सामने देख कर कह रहे हैं। कमल हासन की इन बातों से ही पता चल जाता है कि उन्होंने गोडसे को आतंकी क्यों कहा। एक हत्या करने वाला व्यक्ति आतंकी है तो गाँधीजी की हत्या भी आज़ादी के 5 महीनों बाद हुई थी। उस दौरान न जाने कितने ख़ून-ख़राबे हुए और कितने ही लोगों की जानें गई। कमल हासन को उन सबके नाम खोजकर लाने चाहिए क्योंकि हत्याएँ उस समय भी हुईं थी और हासन की परिभाषा के अनुसार, वो सभी आतंकी थे। उनकी थ्योरी में यहीं त्रुटि निकल आती है, अगर अपराध और हत्या ही आतंकवाद है तो फिर इस शब्द की ज़रुरत ही क्या थी?