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10% आरक्षण: विश्वविद्यालयों में 2 लाख से अधिक सीटें जोड़ी जाएँगी, मोदी सरकार ने लिया फैसला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सोमवार को केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों (CEI) में आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों (EWS) के लिए प्रवेश में आरक्षण के प्रावधानों को मंजूरी दे दी। जानकारी के मुताबिक, कैबिनेट में प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने चुनाव आयोग की अनुमति माँगी थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है।

ख़बर के मुताबिक, कैबिनेट की मंजूरी से, 158 केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में 2019-20 शैक्षणिक सत्र के दौरान 2 लाख से अधिक अतिरिक्त सीटें जोड़ी जाएँगी, जबकि 2020-21 में 95,783 सीटें जोड़ी जाएँगी। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के प्रवेश में आरक्षण लागू करने के लिए 158 केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों को ₹4315.15 करोड़ की मंजूरी दी गई है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (MoSJE) के 103 वें संवैधानिक संशोधन और दिशा निर्देशों के अनुसरण में EWS श्रेणी के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाएगा और इसके लिए एससी या एसटी के आरक्षण प्रतिशत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये आरक्षण उस सीमा से अलग होगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अध्ययन की सभी शाखाओं में छात्रों के प्रवेश को बढ़ाने के लिए सभी केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों को इसी साल जनवरी में निर्देश जारी किए थे। एससी/ एसटी या फिर अन्य पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित किए गए आनुपातिक आरक्षण को प्रभावित किए बिना आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था। जिसके बाद राज्यसभा ने राज्यसभा ने 9 जनवरी को संविधान में संशोधन करते हुए नौकरियों और शिक्षा में सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने के को मंजूरी दी थी।

मोदी की बायोपिक बैन करने के बाद अब EC ने योगी पर लगाया 72 घंटे का प्रतिबन्ध

जैसे-जैसे आम चुनाव के मौसम में सियासी बयार की तेज़ी बढ़ रही है, वैसे-वैसे चुनाव आयोग की सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। चुनाव आयोग ने अब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 72 घंटे तक चुनाव प्रचार करने से रोक दिया है। इसका अर्थ ये हुआ कि योगी आदित्यनाथ अगले 72 घंटों तक कोई भी रैली, रोड शो या जनसम्पर्क अभियान में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। बता दें कि उन पर ये बैन चुनाव आयोग ने मेरठ में उनके दिए गए बयान को आपत्तिजनक बताते हुए लगाया है। ज्ञात हो कि मेरठ लोकसभा के सिसौली गाँव में आयोजित जनसभा में सहारनपुर की रैली का ज़िक्र करते हुए योगी ने कहा था, “जब गठबंधन के नेताओं को अली पर विश्वास है और वह अली-अली कर रहे हैं, तो हम भी बजरंगबली के अनुयायी हैं और हमें बजरंगबली पर विश्वास है।

चुनाव आयोग के आदेश की कॉपी (पेज 1)
चुनाव आयोग के आदेश की कॉपी (पेज 2)

इसके अलावा चुनाव आयोग ने योगी के हरा वायरस वाले बयान को लेकर भी आपत्ति जताई है। चुनाव आयोग ने कहा कि एक राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते योगी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्षता के माहौल को बनाए रखें। वेस्ट यूपी से हरा वायरस पूरी तरह खत्म करने की अपील करते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा:

“राहुल गाँधी जब लोक सभा चुनाव 2019 के लिए नामांकन करने गए थे, तो उनके आसपास न तो तिरंगा था और न ही कॉन्ग्रेस का झंडा, उनके पास हरे रंग का चाँद-सितारे वाला झंडा था। कॉन्ग्रेस पार्टी ने जब अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी किया था तो उसे देखकर लगता है कि कॉन्ग्रेस के हाथ देशद्रोहियों के पास हैं। वेस्ट यूपी में इस हरे वायरस को खत्म कर दीजिए और देश में मोदी की सरकार बनवाइए ताकि देश और प्रदेश को सुरक्षित किया जा सके।”

इसके अलावा चुनाव आयोग ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी 48 घंटे तक चुनाव प्रचार करने से प्रतिबंधित कर दिया। मायावती ने मुस्लिम समुदाय से उनका वोट बँटने न देने की खुली अपील कर आचार संहिता को धता बताया था। मायावती ने देवबंद की रैली में कहा था कि मुस्लिम समुदाय के लोग अपना वोट बँटने ना दें और सिर्फ़ महागठबंधन के लिए वोट दें। बता दें कि धर्म एवं जाति के आधार पर वोट माँगना आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। सोमवार (15 अप्रैल) को सुप्रीम कोर्ट ने भी मायावती के इस बयान को लेकर आपत्ति जताई थी। अदालत में आयोग से पूछा था कि इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई की गई है?

चुनाव आयोग द्वारा मायावती के ख़िलाफ़ एक्शन तभी लिया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से पूछा था कि अभी तक इस मामले में नोटिस ही क्यों जारी किया गया है, सख़्त कार्रवाई क्यों नहीं की गई है? चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक को रिलीज होने से भी रोक दिया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से पुनर्विचार करने को कहा है। कोर्ट ने कहा है कि आयोग पहले फ़िल्म देख ले और उसके बाद कोई निर्णय ले। इस पर हमने बताया था कि कैसे जो तर्क देकर आयोग ने बायोपिक को रोका है, उस तर्क के हिसाब से कई लोग और मीडिया वालों को प्रतिबंधित करना होगा क्योंकि वो भी मोदी की रैलियों को टेलिकास्ट करते हैं, स्टूडियो से पक्ष लेकर बात करते हैं, इंटरव्यू चलाते हैं।

उर्मिला मातोंडकर की रैली में गूँजा ‘मोदी-मोदी’ का नारा, कॉन्ग्रेस समर्थकों ने गुस्से में की मारपीट

हाल ही कॉन्ग्रेस में शामिल होने वाली उर्मिला मातोंडकर चुनाव प्रचार के लिए आज (अप्रैल 15, 2019) मुंबई के बोरिवली इलाके में पहुँची। जहाँ उनके समर्थकों और आम जनता के बीच हुई झड़प की वीडियो सामने आई है। इस वीडियो में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता कुछ लोगों को बुरी तरह पीटते हुए भी नज़र आ रहे हैं।

दरअसल, पूरे मामले की शुरुआत उस समय हुई जब उर्मिला के स्टेशन पहुँचते ही वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने मोदी-मोदी के नारे लगाने शुरू कर दिए। मोदी के समर्थन में नारे सुनकर मानो कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भड़क उठे और उन्होंने बदले में जोर-जोर से ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। साथ ही उस युवक के साथ मारपीट भी की जो मोदी-मोदी का नारा लगा रहा था।

ट्विटर पर ANI के वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि एक लड़का जिसने ब्लैक और व्हाइट कलर की टीशर्ट पहनी है वो उर्मिला के आते ही मोदी-मोदी चिल्लाने लगता है और धीरे-धीरे पूरी भीड़ मोदी के समर्थन में खड़ी दिखाई पड़ती है। इस घटना के करीब 20 सेकेंड के भीतर ही कॉन्ग्रेस समर्थक भीड़ के करीब आते हैं और मोदी-मोदी चिल्लाने वाले लड़के को पीटने लगते हैं।

इस आपसी झड़प में वहाँ खड़ी एक लड़की को भी चोट लग जाती है, फिर भी कॉन्ग्रेस समर्थकों की आवाज़ धीमी नहीं पड़ी। घटना के दौरान पुसिल ने वहाँ मौजूद लोगों को शांत करने का प्रयास किया है। लेकिन काफी समय तक भीड़ पर इसका कोई असर पड़ता नहीं दिखा।

हैरानी की बात है कि जिस जगह पर कॉन्ग्रेस के समर्थकों ने इतना बवाल किया उसी रैली में उर्मिला मातोंडकर शासन पर जमकर सवाल उठाते नज़र आईं। उर्मिला ने महिला सुरक्षा से लेकर मीडिया सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने भाजपा सरकार पर वार करते हुए कहा कि वे सत्ता से नफरत की राजनीति फैलाने वालों को निकाल फेंके।

यहाँ सोचने वाली बात है कि जिस सत्ता को उखाड़ फेंककर बॉलीवुड अदाकारा उर्मिला मातोंडकर कॉन्ग्रेस पार्टी की जय-जयकार करवाना चाहती हैं। उसी के समर्थकों द्वारा ऐसी शर्मसार घटना को अंजाम दिया गया। अब ऐसे में देखना है कि उर्मिला का जादू कॉन्ग्रेस की हकीकत को छिपाकर उसे लोकसभा में फायदा पहुँचा सकता है या नहीं।

गौरतलब है कि उत्तर मुंबई सीट पर से बीजेपी ने सिटिंग सांसद गोपाल शेट्टी को उतारा है, जबकि
कॉन्ग्रेस ने अपने 2014 के प्रत्याशी संजय निरुपम की जगह अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर को मौका दिया है।

DM से मायावती के जूते साफ़ करवाने वाले आज़म ख़ान, आपकी तो पूरी पार्टी ही जूते चाट रही है

सपा नेता आज़म ख़ान नित नए स्तर पर गिरते चले जा रहे हैं। कभी महिलाओं के अंगवस्त्रों पर टिप्पणी करते हैं तो कभी हनुमानजी को लेकर अनाप-शनाप बकते हैं। अब उन्हीं आज़म ख़ान ने डीएम से जूते साफ़ करवाने की बात कही है। आज़म ख़ान ने नया विवादित बयान देते हुए कहा, “सब डटे रहो, कलेक्टर-पलेक्टर से मत डरियो, ये हैं तनखैया.. हम इनसे नहीं डरते हैं। देखे हैं मायावती के कई फोटो कैसे बड़े-बड़े अफसर रुमाल निकालकर जूते साफ़ करते रहे हैं। हाँ उन्हीं से है गठबंधन, हाँ उन्हीं से जूते साफ कराऊँगा इनसे अल्लाह ने चाहा तो…। आज़म ख़ान ने मायावती राज का उदाहरण देते हुए ऐसा कहा। ज्ञात हो कि फरवरी 2011 में एक डीएसपी लेवल के पुलिस अधिकारी पद्म सिंह ने झुक कर मायावती की जूती को साफ़ किया था। उन्होंने अपने पॉकेट से रुमाल निकाल कर मायावती की जूती साफ़ की थी।

आज जो आज़म ख़ान मायावती की उसी हरकत को उदाहरण के तौर पर पेश कर रहे हैं, उन्हीं आज़म ख़ान ने तब इसका विरोध किया था। सपा का सम्प्रदाय विशेष का चेहरा माने जाने वाले आज़म ने तब मुख्यमंत्री रहीं मायावती पर निशाना साधते हुए कहा था, “यह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की सामंती मानसिकता को दर्शाता है। वो शाही राजतन्त्र को फिर से जीना चाहती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सुरक्षा अधिकारी की कुछ गंभीर मजबूरियाँ थीं जिसने उसे शर्मनाक कृत्य करने के लिए मजबूर किया। मैं सुझाव दूंगा कि मायावती अपने मार्ग पर धूल की देखभाल करने और अपने सैंडल की सफाई जैसे कामों को करने के लिए एक अलग दल की नियुक्ति करेंगी।

आज़म ख़ान को ख़ुश होना चाहिए क्योंकि मायावती ने उनकी बात सुन ली, भले ही उसमें 7 वर्ष लग गएउन्होंने शायद अब उस दल की नियुक्ति कर ली है, जो उनके मार्ग पर धूल की देखभाल करेगा और उनके सैंडल की सफाई करेगा उसका नाम समाजवादी पार्टी ही है, जिसके आज़म संस्थापक सदस्य हैं।

कितनी असमानता है आज़म ख़ान के दोनों बयानों में। इन 7 वर्षों में ऐसा नहीं है कि आज़म ख़ान की प्रकृति बदल गई है। वो तब भी इतने ही विवादित थे, जितने आज हैं। वो तब भी ऐसे ही अलूल-जलूल बयान दिया करते थे, जैसे आज देते हैं। वो तब भी इतने ही महिला विरोधी और हिन्दू विरोधी थे, जितने आज हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि राजनीतिक समीकरण बदल गया है। जो मायावती और यादव परिवार एक दूसरे को कोसते थकते नहीं थे, आज वो एक ही थाली में लपेस-लपेस कर खा रहे हैं। अखिलेश-माया एक हो गए हैं और अपने नेता अखिलेश की तरह मायावती का भी गुणगान करना आज़म ख़ान का नया मज़हब बन गया है। तभी तो जो घटना सामंती मानसिकता और शाही राजतन्त्र का परिचायक थी, वो अब छाती चौड़ी करने वाली और गर्व से भर देने वाली घटना हो गई है उनके लिए।

9 बार विधायक चुने गए आज़म ख़ान सपा सरकारों के दौरान मंत्री रह चुके हैं। मोदी के आ जाने से एक-दूसरे के साथ सड़क पर गठजोड़ कर घूमने वाले इन नेताओं को जनता ने अब सही जगह पहुँचाया है। डीएम से जूता साफ़ करवाने वाले आज़म ख़ान को समझना चाहिए कि उनकी इसी मानसिकता के कारण आज वो न तो सत्ता में हैं और न ही सत्ता की रेस में। असल में मायावती की जूती साफ़ करने का काम तो उनकी अपनी ही समाजवादी पार्टी कर रही है, जिसके वो संस्थापक सदस्य हैं। लोकसभा में शून्य सीट वाली मायावती को सपा ने ख़ुद से 1 ज्यादा सीट दी, इससे ज्यादा झुकने का कोई अन्य उदाहरण कहीं और कहाँ मिल सकता है?

आज़म ख़ान को समझना चाहिए कि अब वो ज़माना गया जब उनकी खोई भैंसे खोजने के लिए पूरा सरकारी महकमा सड़कों पर उतर आता था। यूपी में अब वो ज़माना गया जब अधिकारियों को सत्ताधीशों के जूते साफ़ करने पड़ते थे। अब वो ज़माना गया जब मुख़्तार अंसारी, राजा भैया और अतीक अहमद की तूती बोलती थी और सत्ता के संरक्षण के कारण पुलिस और अधिकारी तक उनके सामने झुकते थे। इस यूपी में अपराधी भाग कर पड़ोस के राज्यों की जेल में बंद हो जाते हैं। जो जेल में हैं, वो बाहर नहीं निकलना चाहते। जो बाहर हैं वो फूँक-फूँक कर क़दम रखते हैं। इस यूपी में सड़कों पर विचर रहे बौखलाए आज़म ख़ान को कभी ख़ुद को भी निराहना चाहिए कि जनता ने उनकी और उनकी पार्टी की क्या हालत की है।

अव्वल तो यह कि सम्प्रदाय विशेष के एक अन्य नेता उमर अब्दुल्ला ने भी जूती साफ़ करने वाली घटना के समय मायावती पर तंज कसा था। आज वो भी चुप रहेंगे क्योंकि उनके ही साथी अब उसी घटना को गर्वित करने वाला वृत्तांत की तरह पेश करते फिर रहे हैं। कट्टरपंथियों के स्वघोषित नेताओं के बयानों पर कोई ख़ास आउटरेज नहीं होता, इसे नॉर्मल मान लिया जाता है। माना जाता है कि इनका तो काम ही है ये सब बोलना, किसी पर भी भद्दी टिप्पणियाँ कर देना, हिन्दू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाना, महिलाओं का अपमान करना और साल दर साल प्राथमिकताएँ बदलते हुए अपने ही बयानों से पलट जाना। इसीलिए, इनके बयानों को ज्यादातर नज़रअंदाज़ ही किया जाता है।

आज़म ख़ान सपा नेता अखिलेश यादव के समक्ष ही ऐसे बयान दिया करते हैं। उस समय नैतिकता, राजनीतिक शुचिता और युवाओं की बात करने वाले अखिलेश यादव हँस कर बगले झाँकते नज़र आते हैं। अगर ऐसा ही बयान किसी भाजपा के सरपंच के समधी के साले की तरफ से आया होता तो इस पर यही अखिलेश आज हंगामा कर रहे होते और कह रहे होते कि भारत में महिलाओं का सम्मान नहीं किया जाता, भाजपा के नेतागण महिलाओं की इज़्ज़त नहीं करते और देश में महिला विरोधी माहौल को बढ़ावा दिया जा रहा है। अगर सरकारी अधिकारियों के बारे में किसी भाजपा नेता का ऐसा बयान आता तब तो कहना ही क्या। इससे ‘मोदी सारी सरकारी संस्थाओं को अपने इशारे पर नचा रहा है‘ वाले नैरेटिव को और मज़बूती मिल जाती। हालाँकि, निंदा हर मामले में होनी चाहिए, चाहे बयान भाजपा नेता का हो या सपा नेता का।

लेकिन, होता इसके एकदम उलट है। जैसा कि हमने ऊपर चर्चा किया, भाजपा के वार्ड सदस्य के रिश्तेदार के व्यक्तिगत बयान या हरकत को ऐसे पेश किया जाता है, जैसे ख़ुद मोदी ने ऐसा किया हो या कहा हो। वहीं दूसरी तरफ चुनावी मंच पर एक बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में उनके वरिष्ठ नेता द्वारा महिला विरोधी बयान दिया जाता है और इसे आयाराम-गयाराम मान कर हवा में उड़ा दिया जाता है। वैसे सही है, आज़म ख़ान डीएम से अपना जूता साफ़ करवाएँ न करवाएँ, उनकी पार्टी तो मायावती के सामने दंडवत हो ही रखी है। ख़ुद मुलायम सिंह यादव ने भी कह दिया है कि अपने ही लोग पार्टी को बर्बाद करने में लगे हुए हैं। कहीं उनका इशारा आज़म ख़ान जैसे लोगों की तरफ ही तो नहीं था? वैसे आज़म को बोया मुलायम ने ही है, अब फसल काटिए बैठ कर।

मोदी समर्थक को घर में घुस के महिला व बुज़ुर्ग के सामने मारा, NDTV पत्रकार हुआ ख़ुश

एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने उस घटना को कमतर आँकने की कोशिश की है जिसमे कुछ गुंडों को एक मोदी समर्थक के घर में घुस कर उसके साथ मारपीट करते हुए दिखाया जा रहा है। असल में ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया गया, जिसमे कहा गया है कि किसी भाजपा समर्थक ने फेसबुक पर मनसे सुप्रीमो राज ठाकरे की आलोचना की थी जिसके बाद कुछ मनसे के गुंडों ने उसके घर मे घुस कर उसके साथ मारपीट किया। उस वीडियो में देखा जा सकता है कि उस घर में उक्त पीड़ित व्यक्ति का बीच-बचाव करने के लिए घर का एक बुज़ुर्ग सामने आता है। एक बुज़ुर्ग महिला भी सामने ही बैठी हुई है, जिनके सामने ही गुंडे मारपीट और गाली-गलौज में लगे हुए हैं।

इसके बाद एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन ने एक फेसबुक पोस्ट की तुलना वास्तविक मारपीट से कर दी। उसने ट्विटर पर लिखा ‘गुंडागर्दी को गुंडागर्दी से नहीं जीता जा सकता’। उस पत्रकार का यह मानना था कि भाजपा समर्थक ने फेसबुक पोस्ट में राज ठाकरे की आलोचना की, जो कि गुंडागर्दी है। और, बदले में राज ठाकरे की पार्टी के गुंडे जो कर रहे हैं, वो भी वही है। असल में उस पत्रकार ने वास्तविक गुंडागर्दी की तुलना भाजपा समर्थक के फेसबुक पोस्ट से करते हुए यह साबित करने का प्रयास किया कि दोनों ही एकसमान हैं, दोनों ही पक्षों की समान गलती है।

इसके बाद एक अन्य ट्विटर यूजर ने भी इस हिंसा को सही ठहराते हुए कहा, ‘भक्त इसी भाषा को समझते हैं’। इस पर उसे जवाब देते हुए एक समझदार व्यक्ति ने पूछा कि अगर उसके मोदी-विरोधी स्टैंड के लिए कुछ गुंडे उसके घर में घुस आएँ और घर के बुज़ुर्गों व महिलाओं के सामने उसके साथ गाली-गलौज करने लगे और मारपीट करने लगे तो क्या आप इसका समर्थन करेंगे?

दिव्या नामक ट्विटर यूजर ने एनडीटीवी के प्रोपेगंडा परस्त पत्रकार से पूछा कि आख़िर वीडियो में दिख रहे पीड़ित ने ऐसी कौन सी गुंडागर्दी की थी? उसे रिप्लाई देते हुए एक अन्य यूजर ने कहा कि ये पत्रकार अपनी ही गुंडागर्दी की बात कर रहा है। इससे पहले जब लश्कर-ए-तैयबा ने आतंकी इशरत जहाँ और अन्य की मदद से पीएम मोदी की हत्या की योजना बनाई थी, तब इसी पत्रकार ने कहा था कि ये आतंकी बस छोटा-मोटा ब्लास्ट ही करना चाहते थे।

मंदिर में पूजा के दौरान शशि थरूर को लगी गहरी चोट, माथे पर आए 6 टाँके

कॉन्ग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता और केरल के तिरुवनंतपुरम से मौजूदा सांसद शशि थरूर एक मंदिर में पूजा करने के दौरान बुरी तरह गिर पड़े। जिसके कारण उनके माथे पर गहरी चोट लग गई। उन्हें वहाँ के जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें खतरे से बाहर बताया।

चोट गहरी होने के कारण उनके माथे पर छह टाँके आए हैं। मीडिया खबरों की मानें इस घटना के समय शशि थरूर मंदिर में तुलाभरम पूजा कर रहे थे।

तुलाभरम एक ऐसी पूजा है जो केरल के कुछ गिने-चुने मंदिरों में ही होती है। इस पूजा में देवी-देवताओं को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं को व्यक्ति के बराबर तोला जाता है। इस कार्य के लिए वहाँ के मंदिरों में बड़ी-बड़ी मशीनें लगी हुई हैं।

साभार: शशि थरूर का ट्विटर अकॉउंट

तराजू में व्यक्ति के बराबर वस्तुओं में फल, मिठाई, अनाज, सिक्के आदि को रखा जाता है। खबरों की मानें पूजा संस्कार के दौरान जब शशि तराजू पर बैठे तो तराजू की चेन टूट गई, जिसके कारण उनके सिर में चोट लग गई।

साल 2009 में केरल के तिरुवनंतपुरम से सांसद चुने जाने वाले शशि थरूर एक बार फिर यहाँ से अपनी किस्मत आजमाने को तैयार हैं। वे तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार हैं। इस बार उनका मुकाबला भाजपा के नेता और मिजोरम के पूर्व राज्यपाल कुम्मानेम राजशेखरन और सीपीआई विधायक और राज्य के पूर्व मंत्री सी. दिवाकरन से है।

चुनाव आयोग पहले मोदी पर बनी फिल्म देख ले फिर निर्णय करे: सुप्रीम कोर्ट

माननीय उच्चतम न्यायालय ने आज (अप्रैल 15, 2019) निर्वाचन आयोग से कहा कि वह पहले नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक देख ले उसके बाद निर्णय करे कि इस फिल्म को चुनाव के समय रिलीज़ करना है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग को निर्देश दिया कि वह फिल्म को देखे और 22 अप्रैल तक अपना मत एक सीलबंद लिफाफे में प्रदान करे।

फिल्म के निर्माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी थी कि निर्वाचन आयोग ने बिना फिल्म को देखे ही उसकी रिलीज़ पर बैन लगा दिया था। इसलिए न्यायालय ने आयोग से कहा कि पहले वह फिल्म को देखे फिर उसकी रिलीज़ पर निर्णय ले। तब तक के लिए न्यायालय की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।

इसके पहले निर्वाचन आयोग ने यह कहकर फिल्म को रिलीज़ होने से रुकवा दिया था कि इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में व्यवधान उत्पन्न होने की संभावना है। निर्वाचन आयोग ने अपने आदेश में कहा था कि फिल्म में दिखाए गए राजनैतिक दृश्य सोशल मीडिया में प्रचारित हो रही चीज़ों को सच मानने का भ्रम उत्पन्न कर सकते हैं।

आयोग ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता में सभी पार्टियों को समान अवसर प्राप्त कराने के लिए और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव के समय फिल्म की विषयवस्तु में परिवर्तन आवश्यक था। आयोग ने फिल्म पर बैन लगाने के पीछे आचार संहिता का हवाला भी दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले विवेक ओबेरॉय द्वारा अभिनीत नरेंद्र मोदी के जीवन पर आधारित फिल्म को रिलीज़ करने की अनुमति दे दी थी। फिल्म पहले 5 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली थी लेकिन विपक्षी दलों की आपत्ति के कारण इसकी रिलीज़ 11 अप्रैल तक टल गई थी। फिर निर्वाचन आयोग के आदेश के कारण इसकी रिलीज़ पर अनिश्चितकालीन बैन लग गया था जिसके बाद निर्माताओं ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।  

मुस्लिम महिला ‘पक्षकार’ ने मुस्लिम नेता के ‘अंडरवियर कमेंट’ को ‘ढकने’ की कोशिश की, नाम है…

एक विवादास्पद ‘पत्रकार’ हैं आरफा खानम शेरवानी। यह अक्सर ‘द वायर’ के कर्मचारियों की तरह ही फर्जी समाचारों और प्रोपेगेंडा को शेयर करने के लिए जानी जाती हैं। अब यह समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता आजम खान के बचाव में आ गई हैं। आजम खान ने अभिनेत्री से नेता बनीं जया प्रदा के खिलाफ अपमानजनक सेक्सिस्ट टिप्पणियाँ की थीं, जिसका बचाव करने के लिए आरफा खानम शेरवानी जमाने के सामने आ गईं। नाम और पहनावे से आरफा एक महिला हैं लेकिन न जाने क्या मजबूरी रही कि ‘अंडरवियर कमेंट’ का बचाव करके उन्होंने अपने ‘मर्दवादी-मनुवादी-ब्राह्मणवादी’ चेहरे को दुनिया के सामने रख दिया।

दरअसल, आजम खान के द्वारा किए गए महिला विरोधी बयान की वजह से महागठबंधन को किसी तरह का कोई राजनीतिक नुकसान ना हो, इसलिए आरफा खानम शेरवानी आजम खान के समर्थन में आ गई। उन्होंने दावा किया कि आजम खान ने जो बयान दिया था, वो जया प्रदा के लिए नहीं, बल्कि पूर्व सपा नेता अमर सिंह के खिलाफ था। लेकिन प’क्ष’कार आरफा को यह मालूम होना चाहिए कि अमर सिंह का रामपुर लोकसभा क्षेत्र से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है।

आरफा ने अपने ट्ववीट में दावा किया कि आजम खान द्वारा दिया गया भद्दा बयान रामपुर की भाजपा उम्मीदवार जया प्रदा के खिलाफ नहीं था, यह अमर सिंह द्वारा चलाया गया ‘प्रोपेगेंडा वॉर’ था। हालाँकि आरफा ने जल्द ही अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया क्योंकि इससे उसका ढोंग और बनावटीपन जाहिर हो रहा था।

आरफा खानम शेरवानी द्वारा डिलीट कर दी गई ट्वीट

समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता और रामपुर निर्वाचन क्षेत्र के विधायक आज़म खान ने रामपुर से भाजपा के लोकसभा उम्मीदवार जया प्रदा के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करके अपनी रही सही इज्जत को और भी गिरा लिया। आजम खान ने अपने भाषण में जया प्रदा के खिलाफ बेहद अपमानजनक बयानों का इस्तेमाल करते हुए दावा किया कि उनके अंडरवियर का रंग खाकी था।

गौरतलब है कि आजम खान ने रामपुर में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि उन लोगों ने 17 सालों में उनको (जया प्रदा) को नहीं पहचाना, जबकि उन्होंने केवल 17 दिन में उनकी वास्तविकता को पहचान लिया। उन्होंने कहा, “उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लग गए। मैं तो 17 दिन में ही पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवियर है, वो भी खाकी रंग का है। यह टिप्पणी करते हुए आजम खान ये दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि जया प्रदा के संबंध आरएसएस से थे और जया ने जो उनके खिलाफ आरोप लगाए थे, वो भी आरएसएस की साजिश थी। आजम ने जब यह शर्मनाक टिप्पणी की थी, उस समय सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी मंच पर मौजूद थे।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि आजम खान ने जया प्रदा के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है। आजम खान और उनकी पार्टियों ने पहले भी जया प्रदा के खिलाफ अपमानजनक बयानबाजी और सेक्सिस्ट बयानों का इस्तेमाल किया है। जया प्रदा ने यह भी आरोप लगाया है कि आजम खान ने पिछले दिनों उन पर एसिड हमले का प्रयास किया था और साथ ही उन्हें परेशान और बदनाम करने के लिए उनकी भद्दी तस्वीरों को भी फैलाया था।

इतनी घटिया स्तर की महिला विरोधी बात राजनीतिक मंच से कह दी गई और आरफा उसका बचाव करने आ गई! खैर, वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ से जुड़े पत्रकारों के लिए इस तरह की ढोंग और बनावटीपन का सामने आना कोई बड़ी बात नहीं है। द वायर को काफी लंबे समय से आधे सच और पूरे झूठ के लिए जाना जाता है। ये इस वेबसाइट की आदत बन चुकी है। द वायर, जिस पर मानहानि का मुकदमा चल रहा है, अक्सर हुर्रियत प्रेस के बयानों की तरह पढ़ने वाले आर्टिकल प्रकाशित करता है। द वायर को हाल ही में सीबीईसी द्वारा फेक न्यूज़ फैलाने के लिए लताड़ लगाई गई थी।

EVM के खिलाफ विपक्ष एकजुट, मामले को लेकर SC जाने का एलान

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद विपक्ष एक बार फिर से ईवीएम को लेकर हमलावर हो गया है। इस मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों के नेताओं ने रविवार (अप्रैल 14, 2019) को एक बैठक की। इसमें तय हुआ कि 21 विपक्षी दल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। कोर्ट से आग्रह किया जाएगा कि चुनाव आयोग हर विधानसभा में कम से कम 50% मतों का ईवीएम-वीवीपैट से मिलान करे। इस बात को लेकर विपक्ष ने पूरे देश में अभियान चलाने की भी बात कही है।

नायडू ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से खुश नहीं हैं, जिसमें कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि लोकसभा सीट की प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के पाँच बूथों पर ईवीएम और वीवीपैट का मिलान हो। बैठक में शामिल नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा और मतदाता के अधिकार के हित के लिए फिर से सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।

इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पहले चरण के चुनाव के बाद से ही ईवीएम पर सवाल उठे हैं, उन्हें नहीं लगता कि चुनाव आयोग इस पर पर्याप्त ध्यान दे रहा है। उनका कहना है कि जिस पार्टी का बटन दबाया जा रहा है, वोट उस पार्टी को न जाकर किसी और पार्टी को जा रहा है और वीवीपैट में भी पर्ची 7 सेकंड की जगह केवल 3 सेकंड में ही दिख जाती है।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मशीनों में कोई गड़बड़ी नहीं है, बल्कि उनके साथ छेड़छाड़ की गई है। केजरीवाल ने कहा कि ईवीएम को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि बटन दबाने पर सिर्फ भाजपा को ही वोट जाता है। सीएम केजरीवाल ने कहा कि वे इंजीनियर हैं, ऐसे में वे इन चीजों को अच्छी तरह से समझते हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर ईवीएम के हेरफेर की शिकायतों पर ध्यान नहीं देने का भी आरोप लगाया है।

गौरतलब है कि इससे पहले चंद्रबाबू नायडू के साथ विपक्षी दलों के कई नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने 50% ईवीएम-वीवीपैट का मिलान करने की माँग की थी। 21 विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में भी इसके लिए याचिका दाखिल की थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच, विपक्षी पार्टियों की 50% पर्चियों के मिलान की माँग पर सहमत नहीं हुई और कहा था कि इसके लिए बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत पड़ेगी, बुनियादी ढाँचे को देखते हुए ये मुमकिन नहीं लगता। मगर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ईवीएम और वीवीपैट के मिलान का दायरा बढ़ाते हुए हर लोकसभा सीट के प्रत्येक विधान सभाओं के 5 बूथों पर ईवीएम और वीवीपैट का मिलान करने के निर्देश दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हमने कभी नहीं कहा चौकीदार चोर है, राहुल गांधी को किया जवाब तलब

राफ़ेल डील पर पीएम मोदी को ‘चौकीदार चोर है’ की टिप्पणी करना राहुल गाँधी को काफी महँगी पड़ गई। सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ नोटिस जारी किया है। अब इस मामले की सुनवाई 23 अप्रैल को होगी। तब तक राहुल गाँधी को अपना जवाब देना होगा।

जस्टिस रंजन गोगोई ने यह स्पष्ट किया कि हमने यह बयान कभी नहीं दिया, इसलिए हम इस मसले पर सफाई माँगेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हम यह बात साफ करना चाहते हैं कि कोर्ट के संदर्भ में राहुल गाँधी ने जो भी बातें मीडिया में कहीं, वे पूरी तरह से ग़लत हैं। इस मामले की पूरी जानकारी हम सफाई माँगना चाहते हैं। हमें उम्मीद है कि राहुल गाँधी अपने बयान पर सफाई देंगे।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कोर्ट का नाम लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए टिप्पणी की थी, “सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि चौकीदार चोर है।” इसी बयान पर आपत्ति दर्ज करते हुए भारतीय जनता पार्टी की नेता मीनाक्षी लेखी ने शुक्रवार (12 अप्रैल) को सुप्रीम कोर्ट में राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ अवमानना याचिका दाखिल की थी।

अपनी याचिका में मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि राहुल ने अपनी निजी टिप्पणियों को शीर्ष अदालत द्वारा किया गया बताया और लोगों के मन में पीएम के ख़िलाफ़ ग़लत धारणा पैदा करने की कोशिश की। मीनाक्षी लेखी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा था कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने टिप्पणी की थी कि ‘अब सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया, चौकीदार चोर है।’

आपको बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट राफ़ेल मसले पर केंद्र सरकार को क्लीन चिट दे चुकी है। कोर्ट ने राफ़ेल विमान की ख़रीद प्रक्रिया को सही ठहराया था। वहीं प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने कोर्ट के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था और एक अख़बार द्वारा छापे गए दस्तावेज़ों को सबूत मानने की सहमति व्यक्त कर दी थी।