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दाऊद तक को चूना लगाने वाले को CBI ने किया गिरफ्तार, 32 कम्पनियाँ बनाकर लिया था लोन

गुरुवार (अप्रैल 4, 2019) को सीबीआई ने एक ऐसे व्यक्ति को लखनऊ के गोमतीनगर इलाके से गिरफ्तार किया जो डॉन दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी से लेकर चीन और साउथ अफ्रीका तक के लोगों को ठग चुका है। प्रमोद कुमार जैन नामक यह अंतरराष्ट्रीय फ्रॉड मूलतः राजस्थान के सीकर का रहने वाला है। लखनऊ के गोमती नगर में वह किनो ऑर्गेनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी चला रहा था।

प्रमोद की इस कंपनी में 50 से भी ज्यादा लोग कार्यरत हैं। ओमेक्स हाइट्स के टावर नंबर 1 में जहाँ उसका ऑफिस था वहीं टॉवर नंबर 2 के 1203 नंबर पेंटहाउस में वह अपने परिवार के साथ रहता था। प्रमोद की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई को उसके पास से 3 लग्जरी कारें भी बरामद हुई हैं।

प्रमोद पर आरोप है कि उसने अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, असम, बंगलुरु, जयपुर समेत देश के अलग-अलग शहरों में 32 से अधिक कंपनियाँ बनाकर बैंकों से लोन लिए हैं। खबरों की मानें तो प्रमोद ने सिलवासा में डी-कंपनी के ₹12 करोड़ हड़प लिए थे। लेकिन फिर भी प्रमोद पकड़ में नहीं आ पाया था।

इन सभी जालसाज़ियों के साथ उसने अपने कंपनी में काम करने वाले पवन मिश्रा के नाम पर भी साल 2008 में ₹92 लाख का लोन लिया था। लोन वापसी न होने पर जब घोटाले की जाँच कर रही सीबीआई टीम ने पवन से पूछताछ शुरू की तब पता चला कि उसने लोन लिया ही नहीं था। खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए पवन ने धोखेबाज प्रमोद की तलाश शुरू कर दी। इस कड़ी में पवन को उसके दोस्त से मेरठ में प्रमोद की बेटी की शादी का वीडियो मिला जिसके बाद पवन ने प्रमोद के लखनऊ स्थित निवास का पता लगाया। इसके बाद पवन ने 9 लोगों की एक टीम को हायर किया जिसने प्रमोद के हर कदम पर नजर रखी। पूरी जानकारी एकत्रित करने के बाद गुरुवार को पवन सीबीआई टीम के साथ लखनऊ आया और प्रमोद की गिरफ्तारी संभव हुई।

नवभारत में छपी खबर के अनुसार प्रमोद और उसका पूरा परिवार धोखेबाजी और जालसाजी के इस धंधे से जुड़ा हुआ है। प्रमोद कभी सुशील मोदी तो कभी प्रकाश फूल चंद्र छाबड़ा बनकर भी रह चुका है। उसकी पत्नी अंजू मोदी भी लखनऊ में अंजलि मोदी के नाम से रह रही है। प्रमोद पर आरोप है कि वह ईटानगर में एक सरकारी अधिकारी की पत्नी के नाम पर ₹3 करोड़ का लोन ले चुका है। साथ ही उसने लखनऊ में अर्चना सहाय नाम की महिला की जमीन भी हड़प रखी है।

मिशेल ने अगस्ता घोटाले में सोनिया के बेहद क़रीबी अहमद पटेल का नाम लिया

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अगस्ता वेस्टलैंड डील मामले में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले क्रिश्चियन मिशेल के विरुद्ध पटियाला हाउस कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की है। इस चार्जशीट में दर्ज नामों के शॉर्ट फॉर्म का खुलासा किया गया है जिसमें कॉन्ग्रेस के बड़े नेता का नाम भी शामिल है। ईडी ने चार्जशीट को लेकर बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि पूछताछ में क्रिश्चियन मिशेल ने AP का मतलब अहमद पटेल और FAM का मतलब फैमिली बताया है। इसमें ‘श्रीमती गांधी’ और ‘आरजी’ का नाम भी शामिल है। हालाँकि ‘श्रीमती गाँधी’ को लेकर अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि आरोपपत्र में उनका नाम किस संदर्भ में आया है वहीं इस दलाली में ₹50 करोड़ ‘आरजी’ को मिलने की बात भी सामने आई है।

इसके साथ ही मिशेल ने पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर दबाव की भी बात कही है। इसमें कहा गया है कि पूर्व पीएम पर बड़े नेताओं का दबाव था। मिशेल पर आरोप है कि उसने अपने दो और साथियों के साथ मिलकर यह आपराधिक षडयंत्र रचा। मिशेल के साथ इस मामले में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी और उनके परिवार के सदस्यों के शामिल रहने के भी आरोप हैं। इसमें संक्षिप्त रूप में दर्ज शब्दों का संबंध एयर फोर्स अधिकारियों, नौकरशाहों, रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और तत्कालीन सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं को दी गई ₹325 करोड़ की रिश्वत से संबंधित है।

जाँच एजेंसी ने 3,000 पन्नों के अपने पूरक आरोपपत्र में तीन नए नाम शामिल किए हैं। इनमें मिशेल के कथित बिजनेस पार्टनर डेविड सिम्स और उनके मालिकाना हक वाली दो कंपनियों- ग्लोबल सर्विसेज एफजेडई, यूएई और ग्लोबल ट्रेड ऐंड कॉमर्स लिमिटेड शामिल हैं। ये तीनों नाम पूर्व के आरोप पत्रों में दर्ज कुल 38 नामों के अतिरिक्त हैं। इससे पहले ईडी को जाँच में पता चला था कि मिशेल ने अपनी दुबई की कंपनी ग्लोबल सर्विसेज के माध्यम से दिल्ली की एक कंपनी को शामिल करके अगस्ता वेस्टलैंड से रिश्वत ली। आरोप है कि अगस्ता वेस्टलैंड ने डील फाइनल कराने के लिए क्रिश्चियन को करीब ₹325 करोड़ सौंपे थे जो भारतीय राजनेताओं, एयरफोर्स के अफसरों और नौकरशाहों को देने थे। क्रिश्चियन ने रिश्वत की रकम ट्रांसफर करने के लिए उपर्युक्त दोनों कंपनियों का इस्तेमाल किया था।

गौरतलब है कि मिशेल को पिछले साल 22 दिसंबर को दुबई से प्रत्यर्पण संधि के तहत गिरफ्तार किया गया था। ईडी ने 5 जनवरी को अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर घोटाले के मामले में पूछताछ के लिए मिशेल को न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। मिशेल, ईडी और सीबीआइ द्वारा गिरफ्तार किए गए अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के तीन आरोपितों में से एक है, मिशेल के अलवा इस सौदे में दो अन्य बिचौलिए गुइडो हाश्के और कार्लो गेरोसा हैं।

चुनावी प्रचार के दौर में ईडी के ये खुलासे राजनीतिक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल हो सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पूर्व के प्रचार अभियान में कह चुके हैं कि तिहाड़ जेल में बंद लोग कॉन्ग्रेस के कारनामे उजागर कर सकते हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस ने इसे जबर्दस्ती फंसाने की साजिश बताते हुए अधिकारियों को धमकी तक दे दी है कि मामले में ज्यादा सक्रियता दिखाने वाले अधिकारियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

AFSPA निरस्त करने का सुझाव नहीं दिया, मीडिया ने फैलाई अफवाह: सर्जिकल स्ट्राइक हीरो जनरल हुड्डा

सर्जिकल स्ट्राइक के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा कॉन्ग्रेस से नाराज हैं। डीएस हुड्डा की नाराजगी का कारण कॉन्ग्रेस द्वारा जारी किया गया चुनावी घोषणापत्र है। कॉन्ग्रेस द्वारा अपने घोषणापत्र में AFSPA में बदलाव करने और राष्ट्रद्रोह की धाराओं में संशोधन की बात कही है। मीडिया के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा ने ही कॉन्ग्रेस के मेनिफेस्टो के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का विस्तृत विजन दस्तावेज कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को सौंपा था।

कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ‘भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति’ पर दी गई लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा की इस रिपोर्ट के आधार पर ही कॉन्ग्रेस लोकसभा चुनाव में देश को राष्ट्रीय सुरक्षा का अपना ब्लू प्रिंट देगी। जबकि लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा ने इस दावे से इंकार किया है। मीडिया द्वारा यह अफवाह चलाई जा रही है कि हुड्डा की इस रिपोर्ट के आधार पर ही कॉन्ग्रेस ने अफ्स्पा हटाने की बात की थी।

जनरल हुड्डा ने कहा, “जहाँ तक मेरी रिपोर्ट का सवाल है, AFSPA का उसमें कोई उल्लेख नहीं है और न ही वहाँ (कश्मीर) घाटी में आवश्यक सैनिकों की संख्या का कोई जिक्र है, क्योंकि मुझे लगता है कि ये ऐसे निर्णय हैं, जो एक व्यापक रणनीति तैयार होने के बाद ही लिए जा सकते हैं।”

एक समाचार चैनल के साथ बातचीत के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा ने कहा, “पाकिस्तान के खिलाफ एक दीर्घकालिक कूटनीतिक लक्ष्य द्वारा ही सफलतापूर्वक लड़ा जा सकता है। हम चाहते हैं कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को रोक दे। इसलिए, मैंने हमेशा कहा है कि हमें दीर्घकालिक सुसंगत नीति की आवश्यकता है, जिसमें आर्थिक दबाव, राजनयिक के साथ राजनीतिक दबाव और जहाँ आवश्यक हो, सैन्य कार्रवाइयों को अपनाया जा सके।

देश में एक बार फिर आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (AFSPA) यानि सशस्त्र बल विशेष शक्तियाँ अधिनियम चर्चा में है। कॉन्ग्रेस द्वारा अपने घोषणापत्र में इसमें बदलाव करने और राष्ट्रद्रोह की धाराओं में संशोधन की बात को लेकर देश भर में बहस छिड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कॉन्ग्रेस के इस घोषणापत्र में की गई हवाई बातों को देखते हुए इसे ढकोसलापत्र बताया है।

कई सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी AFSPA जैसे मामलों को लेकर अचरज में हैं और नाराज भी। उनका मानना है कि घाटी से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट में बदलाव इतना आसान नहीं है। उनका कहना है कि ऐसा करने से वहाँ तैनात सैनिकों के हाथ बंध जाएँगे और इससे उनका मनोबल भी प्रभावित होगा। पूर्व सैन्य अधिकारीयों का मानना है कि कॉन्ग्रेस द्वारा जारी यह घोषणा केवल राजनीतिक है और वोटरों को लुभाने के लिए इस तरह की बात कही जा रही है।

ट्रोल ध्रुव राठी द्वारा 54,000 BSNL कर्मचारियों के बारे में फैलाए जा रहे झूठ का BSNL ने खंडन किया

अपने वायरल विडियोज़ की मदद से बड़े स्तर पर सरकार और सरकारी कार्यालयों के बारे में प्रोपेगैंडा और झूठी ख़बरों का कारोबार चलाने वाले ध्रुव राठी द्वारा फैलाई गई एक और अफवाह ने सरकारी कार्यालयों और पदाधिकारियों का समय बर्बाद किया है। इंटरनेट पर झूठी ख़बरें चलाने के लिए मशहूर ध्रुव राठी वही है, जिसकी झूठी ख़बरों के बड़े नेटवर्क को समझते हुए BBC ने हाल ही में राजनीति और लोकसभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी है।

इस बार ध्रुव राठी ने निशाना बनाया है BSNL को। इस अफवाह को सभी न्यूज़ चैनल्स ने अपनी सुविधानुसार तत्परता से प्रकाशित करके समाज के बीच अफवाह फैलाने का काम किया है। BSNL का कहना है कि कंपनी किसी भी तरह की छँटनी नहीं कर रही है और अभी कंपनी की ओर से रिटायरमेंट की उम्र कम करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया गया है, ये मात्र मीडिया द्वारा फैलाई गई अफवाह है।

विपक्ष अक्सर मोदी सरकार के दौरान झूठी खबरों को दिखाकर जॉब कटौतियों का मुद्दा बनाने का प्रयास करता आया है। विपक्ष, खासकर कॉन्ग्रेस को इस काम में ध्रुव राठी जैसे मुफ्त के इंटरनेट द्वारा चर्चा में आए लोग आसानी से मदद भी उपलब्ध कराते देखे गए हैं।

मीडिया में आजकल एक खबर फैलाई गई जिसमें भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) के कर्मचारियों के नौकरी जाने और रिटारमेंट की उम्र कम होने की अफवाह फैलाई गई।

BSNL ने कहा है कि कंपनी ने किसी भी तरह से कर्मचारियों की छँटनी या रिटायरमेंट की उम्र को कम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है। हालाँकि, जो कर्मचारी अपनी इच्छा से VRS लेकर नौकरी छोड़ना चाहते हैं, उन्हें ऐसा करने की आजादी है।

BSNL के CMD अनुपम श्रीवास्तव ने खुद ट्वीट कर यह जानकारी देते हुए कहा कि BSNL इस तरह की किसी भी खबर से इनकार करता है। CMD ने यह तब कहा जब मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि यह PSU 54,000 कर्मचारियों को हटाने और रिटायरमेंट की उम्र 60 से कम करके 58 साल करने का प्लान बना रहा है।

रोजगार के लिए अफवाह फैलाने वाले ध्रुव राठी ने इस ट्वीट में बेहद बचकाना तरीके से BSNL द्वारा 54,000 लोगों को नौकरी से निकाले जाने की बात को ट्वीट किया है, जिसे आधार बनाकर कई नामी न्यूज़ पोर्टल्स ने छापा भी है।

दूरसंचार विभाग का कहना है कि भारत संचार निगम लिमिटेड ने VRS प्लान के लिए कैबिनेट नोट का ड्रॉफ्ट तैयार करने के लिए चुनाव आयोग से मंजूरी की माँग की है, जिसके बाद टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) के पास चर्चा के लिए प्रस्ताव भेजा गया।  

वर्तमान में BSNL के 1.76 लाख कर्मचारी हैं। ज्यादातर BSNL के निर्माण के समय से कार्य कर रहे DoT कर्मचारी हैं, जिनका वेतन कुल रेवेन्यू का 55-60% है।

मेनस्ट्रीम मीडिया की जवाबदेही इसी बात से आँकी जा सकती की वो अपने समाचारों के लिए ध्रुव राठी जैसे इंटरनेट पर अफवाह फैलाने वाले लोगों पर निर्भर है। जबकि ध्रुव राठी जैसे ट्रोलों की जवाबदेही किसी के प्रति नहीं होती है, वो बस रोजगार के लिए किसी के भी कहने पर किसी के भी खिलाफ अपनी अभिव्यक्ति की आजादी और फ्री इंटरनेट का इस्तेमाल कर के लिख सकते हैं। लेकिन जनता को ये समझना होगा कि महँगे कैमरा और ज्यादा फॉलोवर्स होना मात्र ही किसी व्यक्ति के तथ्यात्मक रूप से सही होने की गैरेंटी नहीं हो सकता है।

भात और खून सान कर खिलाने वाले माकपाइयों को कैसे भूलोगे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं?

यह सच है कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होते। यह भी सच है कि राजनीति में सचमुच की नैतिकता का स्थान नहीं होता, और ज्यादा नैतिकता की चरस बोने वाले या तो केजरीवाल जी जैसे निकलते हैं, या उन्हें बर्नी सैंडर्स (अमेरिका वाले बूढ़े अंकल, जो टीवी पे उपदेश देते थे) की तरह अपनी खुद की पार्टी वाले लंगड़ी मारकर हाशिये पर धकेल देते हैं

पर इतनी तमाम स्याह सच्चाईयाँ जानने के बावजूद अगर कोई भाजपा-आरएसएस वाला केरल के कन्नूर में माकपा के खिलाफ़ या बंगाल में तृणमूल के खिलाफ़ आवाज़ उठाने में अपनी जान जोखिम में डालता है तो वह यह जानता है (कम से कम अब तक) कि खुदा-न-खास्ता कहीं वो हलाक हो गया तो कम से कम उसकी पार्टी कल को माकपा या तृणमूल को तो सिर पर नहीं बैठा लेगी। एक दुखद तंज कसना चाहूँगा कि आप कॉन्ग्रेसी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते।

क्या हुआ, राहुल गाँधी जी, तेरा वादा?

याद करिए इसी फ़रवरी को, जब यूथ कॉन्ग्रेस के दो कार्यकर्ता शरत लाल (21) और कृपेश (24) सरेराह काट दिए गए थे। मार्क्सवादियों का नाम आया था, कई गिरफ्तार भी हुए थे। माकपा वालों ने कसम भी खाई थी कि दोषी अगर हमारे लोग निकले तो भी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे न्याय में। लेकिन फिर जेल में ही सजी जॉर्ज और ए पीताम्बरन (गिरफ्तार, माकपा स्थानीय समिति का पूर्व सदस्य) को वीआइपी सुविधाएँ मिलने लगीं!

आपके अध्यक्ष राहुल गाँधी ने उस समय ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ ली थी कि जब तक अपने लोगों को न्याय न दिला लें, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे

आपके राज्य कॉन्ग्रेस कमेटी प्रमुख मुलापल्ली रामचंद्रन ने कहा कि राज्य पुलिस के जाँच अधिकारी का रिकॉर्ड संदिग्ध है। आपके केरल विधानसभा में नेता विपक्ष की कुर्सी पर बैठे नेता ने माकपा को खून की प्यासी बताया।

ऐसे में आपके अध्यक्ष और लोकसभा उम्मीदवार, और प्रधानमंत्री पद के अभिलाषी, श्री राहुल गाँधी जब आप के लोगों, आप के वैचारिक भाइयों, सहोदरों को काट डालने वालों के खिलाफ नहीं बोले तो कैसा लगा? कैसा लगा जब राहुल गाँधी न केवल अपनी विचारधारा, आप सामान्य कॉन्ग्रेसियों की विचारधारा, की रक्षा में जान गंवाने वाले लोगों के कातिलों के खिलाफ न केवल नहीं बोले, बल्कि कम-से-कम शर्म से नज़रें चुराने या सवाल टालने की बजाय आपकी नज़रों में नज़रें डाल कर उनके कातिलों के खिलाफ बोलने से साफ़ इंकार कर दिया? न्याय की गुहार तक नहीं की?

केतनी बार ठगा जाएगा रे, कॉन्ग्रेस कार्यकार्त-वा? कब खौलेगा रे तेरा खून?

न यह पहली बार आपके लोगों का पहली बार मार्क्सवादियों के हाथों क़त्ल है, प्रिय कॉन्ग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता, न ही पहली बार आपके नेतृव ने आपके खूनी बलिदान को ठेंगा दिखाया है।

एक-दो उदाहरण मैं दे देता हूँ- बाकि मुझे ‘फैक्ट-चेक’ करने जब आप इन्टरनेट खंगालेंगे, कुछ किताबें पढ़ेंगे, पुरानी, अखबारी आर्काइव्स उथल-पुथल करेंगे तो और निकल आएंगे।

1989 में राहुल गाँधी के पिता और आपके पूर्व अध्यक्ष, हम सबके पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने कहा था, ‘बंगाल में जिन्दगी ही असुरक्षित हो गई है।’ उनके बंगाल आगमन की ख़ुशी में आपके कार्यकर्ता ख़ुशी मना रहे थे कि सत्तारूढ़ साम्यवादियों ने हमला कर दिया आपके नेता राजेन्द्र यादव के घर पर- वह तो बच निकले पर उनके दो भाई जिन्दा भुन गए। हाँ, भुन गए- क्योंकि जब तक खारिश पैदा करते शब्दों का रेगमाल नहीं घिसेगा आपकी आत्मा पर, तब तक इस पत्र का हेतु पूर्ण नहीं होगा। हमलावरों का नेता स्थानीय कम्युनिस्ट शक्तिपद दत्ता को बताया गया

आपके तत्कालीन विधायक साधन पांडे ने दावा किया कि 1977 में सत्ता पर काबिज़ होने के बाद से माकपा आपके 1,000 कार्यकर्ताओं की बलि ले चुकी है। आपके तत्कालीन यूथ कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष प्रद्युत गुहा ने तो राजीव गाँधी से यह भी कहा कि अगर आपके कार्यकर्ता किसी तरह माकपा वालों से जान बचा भी लें तो पुलिस के हाथों मार दिए जाते हैं।

अगर 1977-89 में ही 1,000 लोग मारे गए आपके, तो 2011 में माकपा की सत्ता से विदाई होते-होते यह संख्या कितनी गई होगी?

सैनबाड़ी हत्याकाण्ड तो आप कॉन्ग्रेसियों के जेहन में ताज़ा होगा, आशा है। कॉन्ग्रेस का समर्थन करने के ‘आरोप’ में मार्क्सवादियों ने न केवल एक परिवार के जवान बेटों को क़त्ल कर दिया, बल्कि उनकी माँ को उसके ‘खून’ का खून पिलाया- भात में सान के

इसके बाद भी आपकी तत्कालीन अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने 2004 में कम्युनिस्टों से हाथ मिला लिया? आप लोगों के बारे में एक बार भी नहीं सोचा?

और, आपके नेतृत्व ने आपका खून केवल मार्क्सवादियों को नहीं बेचा है। ममता बनर्जी से, याद करिए, वे कितनी देर तक गठबंधन करने के लिए जोर मारते रहे थे। और जब याद आ जाए तो यह देखिए। तृणमूल के कत्ले-आम से आपकी राज्य कॉन्ग्रेस इकाई इतनी त्रस्त थी कि भाजपा के तृणमूल के खिलाफ मोर्चे का भी समर्थन करने लगी थी

फिर ऐसा क्या हुआ कि आपके सुप्रीमो को अपने लोगों का कत्ल भूलकर ममता बनर्जी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा बैठे?

सबरीमाला पर आप जमीनी कॉन्ग्रेसी शशि थरूर के साथ हैं या माकपा के?

चलिए, दो मिनट के लिए खून-खराबा भूल जाते हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि भाजपा दक्षिण भारत की संस्कृति पर हमलावर है और वह उसके खिलाफ खड़े हैं। सबरीमाला केरल का बड़ा मुद्दा है न? वहाँ पुलिस की मदद से माकपा उन औरतों को अन्दर ले जा रही है जिनका न अय्यप्पा स्वामी में विश्वास है न मंदिर की परम्पराओं में आस्था।

आपके नेता शशि थरूर ने आगे बढ़कर मंदिर की परम्पराओं की रक्षा के समर्थन का स्टैण्ड लिया- अपनी राजनीतिक गर्दन दाँव पर लगा दी, सुप्रीम कोर्ट तक के विरोध की हिमाकत की। आज आप केरल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता शशि थरूर के साथ खड़े होकर माकपा द्वारा मंदिर की परम्पराओं के अपमान का विरोध करेंगे, या राहुल गाँधी के साथ खड़े होकर माकपा का मौन समर्थन?

भाजपा को वोट मत दीजिए, अपने नेता से सवाल पूछिए

इस पत्र का मकसद आपको भाजपा के पक्ष में तोड़ना नहीं, आपके ज़मीर को झिंझोड़ना है। अगर आपको लगता है कि आपके अध्यक्ष सही कह रहे हैं और आपको भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए तो बेशक मत दीजिए। पर अपने नेता से सवाल ज़रूर पूछिए। भाजपा ने भी पूछा था- जब आडवाणी जिन्ना को बँटवारे में क्लीन चिट दे आए तो पूछा, जब मोदी नवाज़ शरीफ़ के यहाँ शादी की दावत जीमने पहुँच गए थे तो भी पूछा था।

राहुल गाँधी से यह सवाल जरूर पूछिए कि क्या भाजपा इतनी बड़ी हऊआ है कि आपके हजारों लोगों के कातिलों से दोस्ती की कीमत पर भी उसे ‘रोकना’ (या राहुल गाँधी का संसद पहुँचना??) सस्ता सौदा है?

GDP और Budget का फर्क न समझने वाले राहुल गाँधी जी, गणित ख़राब हो तो प्रतिशत नहीं बाँचते

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दावा किया है कि वो जीडीपी का 3.5% हेल्थकेयर पर ख़र्च करेगी। ध्यान दीजिए, बजट का नहीं, जीडीपी का। कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र के अनुसार, पार्टी के सत्ता संभालने के बाद 2023-24 तक हेल्थकेयर पर कुल सरकारी ख़र्च जीडीपी का 3% हो जाएगा और शिक्षा पर सरकार द्वारा जीडीपी का 6% ख़र्च किया जाएगा। ये एक असंभव लक्ष्य है, बेहूदा है। इसे समझने के लिए हमें जीडीपी और बजट के बीच का अंतर समझना पड़ेगा। अगर डॉलर को रुपया में कन्वर्ट करें तो 2018-19 में भारत की जीडीपी 139.5 लाख करोड़ के आसपास आती है। वहीं अगर बजट की बात करें तो ताज़ा भारतीय बजट का कुल वार्षिक ख़र्च 27 लाख करोड़ रुपया प्रस्तावित है।

अब जरा वार्षिक बजट एवं जीडीपी को समझ लेते हैं। सीधे शब्दों में जानें तो वार्षिक बजट एक वित्त वर्ष के लिए किसी संस्था या सरकार द्वारा कमाने व ख़र्च किए जाने वाले रुपए का हिसाब-किताब है। यहाँ दो चीजें आती हैं, पहला रेवेन्यू और दूसरा ख़र्च। एक कम्पनी के लिए रेवेन्यू का अर्थ होता है उसके द्वारा बेची गई चीजें या सर्विस से प्राप्त होने वाला धन। सरकार के मामलों में, रेवेन्यू कहाँ से आता है? सरकार का अधिकतर रेवेन्यू टैक्स और शुल्क से आता है। ये टैक्स अलग-अलग तरह के होते हैं। सेवा कर, निगम कर, उधार, सीमा शुल्क इत्यादि सरकार की आय यानि कह लीजिए रेवेन्यू के प्रमुख स्रोत हैं।

अब सवाल ये उठता है कि सरकार इतना रुपया कमाती तो है, लेकिन ये रुपया जाता कहाँ है? असल में सरकार के पास आने वाले रुपयों में से अधिकतर दो चीजों पर जाता है, पहला राज्यों को करों एवं शुल्कों में दिया जाने वाला हिस्सा और दूसरा ब्याज अदाएगी। जैसा कि आपने देखा, सरकार हर वर्ष कुछ उधार लेती है जो उसकी रेवेन्यू का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा होता है। इसी तरह सरकार हर साल क़र्ज़ चुकाते हुए ब्याज का भी भुगतान करती है, जो उसके ख़र्च (Expenditure) का एक प्रमुख हिस्सा बन जाता है। बाकी रुपया केंद्रीय योजनाएँ, रक्षा, आर्थिक सहयोग इत्यादि में जाता है।

सरकार के पास रुपया कहाँ से आता है?

अब हम कह सकते हैं कि हर साल आने-जाने वाले रुपयों का हिसाब-क़िताब ही किसी संस्था या सरकार का बजट होता है। एक बैलेंस बजट तभी बनता है, जब जितना रुपया आ रहा है, उतना ही जाए भी। अर्थात यह, कि अगर किसी की मासिक सैलेरी 10,000 है और उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है, तो अगर उसका मासिक ख़र्च 10,000 रुपए से एक रुपया भी अधिक होता है तो उसका बजट बैलेंस नहीं कहा जाएगा। जब बात भारत जैसे विशाल और विकासशील देश की हो रही हो तो लाखों करोड़ रुपयों के हिसाब-किताब में बैलेंस मेंटेन करना मुश्किल हो जाता है।

सरकार का रुपया कहाँ जाता है

यहाँ एक अन्य टर्म का जन्म होता है, जिसे हम घाटा (Deficit) कहते हैं। सरकार की कोशिश रहती है कि हर वर्ष ये बजटीय घाटा कम से कम हो। सरकार की ही नहीं बल्कि किसी भी संस्था चाहे वो दो लोगों का एक परिवार ही क्यों न हो, अपना बजटीय घाटा कम करने की कोशिश करता है। अभी ये आँकड़ा 3.5% के आसपास झूलता रहता है। इस घाटे को भी हम जीडीपी के एक हिस्से के रूप में दर्शा सकते हैं। जैसे कि 2017-18 के वार्षिक बजट और जीडीपी की तुलना करें तो वार्षिक बजट कुल जीडीपी का 17% के आसपास आता है। ध्यान दीजिए, यहाँ हमने 2018-19 में भारत सरकार के बजट का आँकड़ा उठाया है, जिसके अनुसार कुल सरकारी ख़र्च 24.4 लाख करोड़ बैठता है।

अब वापस कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र पर आते हैं। जैसा कि पहले पैराग्राफ में बताया गया है, कॉन्ग्रेस ने जीडीपी का 6% हिस्सा शिक्षा पर और 3.5% हिस्सा स्वास्थ्य पर ख़र्च करने की बात कही है। सुनने में तो ये काफ़ी अच्छा लगता है, लेकिन अब जो आप जानेंगे, उसके बाद आपको पता चलेगा कि आख़िर भारत जैसे विशाल देश का 8 बजट पेश कर चुके अर्थशास्त्री की अध्यक्षता में तैयार घोषणापत्र में हुआ ये ब्लंडर कितना ख़तरनाक है। जरा सोचिए, अगर बजट जीडीपी का 17% है और कॉन्ग्रेस जीडीपी का लगभग 10% हिस्सा दो ही सेक्टर पर ख़र्च करने की बात करती है तो बाकी सेक्टर के लिए सिर्फ़ 7% हिस्सा ही बच जाएगा। फिर किसानों की क़र्ज़माफ़ी के लिए पैसे नेहरू जी की किस तिजोरी से निकाले जाएँगे?

स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारी ख़र्च जीडीपी का 3% होगा (क्रमांक 1)

वर्ल्ड बैंक के आँकड़ों के अनुसार, अभी भारत के बजट में जीडीपी का लगभग 2.5% हिस्सा रक्षा क्षेत्र में जाता है। इस से हमारे सैनिकों के लिए साजोसामान आते हैं और देश की रक्षा होती है। अगर इसे मिला दें (अगर कॉन्ग्रेस रक्षा बजट में जीडीपी बढ़ाए) तो भारत के बजट में बच जाता है जीडीपी का सिर्फ़ 4.5% हिस्सा। यानी कि लगभग पूरा बजट शिक्षा, स्वास्थ्य और रक्षा पर ख़र्च हो गया। बचती है वो असली चीजें, जिसपर हमारा पूरा देश टिका हुआ है। शिक्षा तभी हासिल होगी जब पेट भरा होगा। भारत के बजट का कौन सा हिस्सा कृषि में जाएगा? क्या 10 बच्चों की पढ़ाई पर 100 रुपया अतिरिक्त ख़र्च कर के (जो कि होनी चाहिए) 1000 किसानों को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा (लेकिन इस इस क़ीमत पर नहीं होनी चाहिए)।

जैसा कि हमनें ऊपर सरकारी व्यय का हिस्सा बताया, भारत सरकार के वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों वेतन और पेंशन में जाता है। क्या सारे कर्मचारियों का वेतन रोक कर उन्हें स्वस्थ रखेंगे? कैसे? अब आते हैं सरकारी ख़र्च के एक ऐसे हिस्से पर, जिसपर भारत का बड़ा ग़रीब समाज टिका हुआ है। जिनके लिए सरकार को कार्य करना है, जिनकी लिए सरकारें काम करती हैं। ये हिस्सा है सब्सिडी का। महिलाओं को गैस पर सब्सिडी, कृषकों को खाद व बीज पर सब्सिडी, बीपीएल परिवारों को राशन पर सब्सिडी, पेट्रोलियम पर सब्सिडी इत्यादि के लिए बजट का कौन सा हिस्सा ख़र्च किया जाएगा? जब पूरा बजट शिक्षा और स्वास्थ्य में ख़र्च करेंगे तो ग़रीबों को भोजन कैसे मिलेगा?

शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट एलोकेशन बढ़ना चाहिए, ज़रूर बढ़ना चाहिए लेकिन इसके लिए पी चिदंबरम को राहुल गाँधी बनने की ज़रूरत नहीं है। इसके लिए किसानों, ग़रीबों और महिलाओं के हितों से समझौता नहीं होना चाहिए। अगर पूरा बजट दो-तीन सेक्टर पर ख़र्च करेंगे तो बाकी चीजों के लिए रुपया उधार लिया जाएगा क्या? इसका अर्थ हुआ कि जितना हमारा बजटीय ख़र्च होगा, लगभग उतना ही रुपया हमें उधार लेना पड़ेगा अन्यथा सारी सब्सिडी और जान कल्याणकारी योजनाएँ बंद करनी पड़ेगी। ऊपर से कॉन्ग्रेस ने5 करोड़ परिवारों को सालाना 72,000 रुपए देने का वादा किया है। इसके लिए पैसा कहाँ से आएगा?

अगर पी चिदंबरम थोड़ी देर के लिए राहुल गाँधी वाले रूप से बाहर आ जाएँ तो सिंपल गुणा-भाग जानने वाला दूसरी कक्षा का एक छोटा सा बच्चा भी उन्हें बता देगा कि कॉन्ग्रेस की NYAY योजना पर कुल ख़र्च 3.6 लाख करोड़ रुपया आएगा। लगभग इतने ही रुपए (3.3 लाख करोड़ रुपए) मनरेगा, स्वच्छ भारत, नेशनल हेल्थ मिशन और नेशनल स्वास्थ्य मिशन जैसे 29 सरकारी योजनाओं पर ख़र्च किए जाते हैं। इसका क्या होगा? क्या इन सबको हटा दिया जाएगा? ये जीडीपी का 2% हिस्सा बनता है। ये दाल-भात की थाली नहीं है जिसमे से निवाले की तरह रह-रह कर जीडीपी का प्रतिशत निकाला जाए और कहीं भी फेंक दिया जाए।

कुल मिलाकर अगर वित्त वर्ष 2019-20 की बात करें तो भारत का जीडीपी 190 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक रहने की संभावना है। अब आप बताइए, इसका 10% यानि 19 लाख करोड़ रुपया सिर्फ़ शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च कर दिया जाएगा तो 27 लाख करोड़ के ताज़ा बजट में से बाकी क्षेत्र के लिए क्या बचेगा? जीडीपी का 10% हमारे वार्षिक बजट का 70% बन गया। बस-बस, यही वो फर्क है जो पी चिदंबरम और राहुल गाँधी को समझना है।

यहाँ हम ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि बिना ‘द हिन्दू’ की तरह क्रॉप किए, बिना एन राम की तरह न समझने वाली भाषा का इस्तेमाल किए बड़ी ही आसानी से चीजों को समझा जा सकता है, समझाया जा सकता है, बशर्ते आप कुटिल प्रोपेगंडाबाज न हों और आपके इरादे नेक हों। देश का 8 बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री ने देश के ग़रीबों, महिलाओं व किसानों से उनको फैलने वाले फायदे छीनने की योजना बनाई है और मीडिया की कानों पर जूँ तक न रेंग रही, अजीब है। ये एक-दो दिखावटी तौर पर लुभावने लेकिन असल में भ्रामक और कुटिल योजनाओं के जरिए जनता से उसका हक़ छीनना चाहते हैं। नो आउटरेज? व्हाई?

पटना दफ्तर में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं में चले ताबड़तोड़ लात-घूँसे, पूर्व MP को टिकट न मिलने से थे नाराज

लोकसभा चुनाव 2019 की गहमा-गहमी के चलते पूरे देश में चहल-पहल का माहौल है। राजनीतिक बयानबाजी के साथ ही टिकट नहीं मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी उभरकर सामने आ रही है। कभी कोई अपनी नाराजगी सोशल मीडिया के जरिए व्यक्त कर रहा है, तो कुछ नेता हाथ छोड़कर अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त कर रहे हैं।

इसी तरह की एक निंदनीय घटना बिहार की राजधानी पटना से सामने आई है, जिसमें कॉन्ग्रेस कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने अपनी नारजगी खुलकर व्यक्त करते हुए एक दूसरे पर जमकर लात-घूसे बरसाए दिए। बताया जा रहा है कि कार्यकर्ताओं में टिकट वितरण को लेकर विवाद हुआ था और बढ़ते-बढ़ते बात मारपीट तक आ गई। कुछ नेताओं द्वारा बीच-बचाव कर मामला शांत करवाया गया। इस तरह से ये भी पता चल रहा है कि में कॉन्ग्रेस की मुश्किलें आसान होने नाम नहीं ले रही हैं।

हुआ यूँ कि बिहार की औरंगाबाद सीट से कॉन्ग्रेस सांसद निखिल कुमार ने टिकट की माँग की थी, लेकिन पार्टी ने महागठबंधन में शामिल हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के उपेंद्र प्रसाद को चुनावी मैदान में उतराने का फैसला लिया है। इसी बात को लेकर पटना कॉन्ग्रेस कार्यालय में बैठक के दौरान दोनों नेताओं के समर्थकों में बहस हो गई और बात मारपीट तक आ गई।

राहुल गाँधी पर फ़िल्म बनाता तो अधिकतर शूटिंग थाईलैंड में करनी पड़ती: विवेक ओबेरॉय

प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक पर बनी फ़िल्म को लेकर विवेक ओबेरॉय काफी जद्दोज़हद करते नज़र आ रहे हैं। बता दें कि यह फ़िल्म आगामी 5 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली है। फ़िल्म को लेकर विवेक काफी चिंता में हैं जिसकी वजह है इस पर लगे तमाम तरह के आरोप। इसमें ‘बैकडोर फंडिंग’ और ‘राजनीतिक प्रचार’ के आरोप शामिल हैं। इसलिए अपनी फ़िल्म का बचाव करते हुए वो समाचार स्टूडियो के चक्कर लगा रहे हैं।

हाल ही में, उन्होंने उन सवालों के जवाब देने के लिए NDTV स्टूडियो का दौरा किया। विष्णु सोम को एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा कि इस फ़िल्म को बनाने का निर्णय लेने में उन्हें केवल 30 सेकंड लगे।

साक्षात्कार के दौरान ही सोम ने उनसे पूछा कि क्या वो कभी राहुल गाँधी की भूमिका निभाएँगे? इस पर विवेक ने तुरंत जवाब दिया, “अगर उन्होंने (राहुल गाँधी) भूमिका निभाने लायक कुछ किया होता, तो मैं निभाता।” राहुल गाँधी के लगातार विदेशी दौरों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए मुझे फ़िल्म की अधिकतर शूटिंग थाईलैंड में करनी पड़ती। विवेक के इस जवाब के बाद दर्शकों के बीच हँसी के ठहाके गूँज उठे।

विवेक ने पूरे साक्षात्कार में इस बात को स्वीकार किया कि वो पीएम नरेंद्र मोदी पर विश्वास करते हैं और आज के समय में देश को उनके जैसे नेता की ही आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी के चाय वाले बनने से लेकर एक विश्व नेता बनने तक की कहानी हर दूसरे वैश्विक नेता के लिए प्रेरणादायक है।

विवेक ओबेरॉय ने बार-बार ज़ोर देकर कहा है कि उन्होंने भले ही अतीत में भाजपा के लिए प्रचार किया है, लेकिन वे पार्टी के सदस्य अभी तक नहीं हैं। उन्होंने साक्षात्कर्ता सोम से कहा कि वह (विवेक) प्रधानमंत्री के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। NDTV के पत्रकार ने यह भी पूछा कि क्या नरेंद्र मोदी ने फ़िल्म की स्क्रिप्ट की समीक्षा की थी या कम से कम इसे पढ़ा था। इस पर विवेक ने कहा, “एक आदमी जो राष्ट्र चलाता है, उसके पास इन चीजों के लिए समय कैसे हो सकता है?” सोम ने चुटकी लेते हुए कहा, “वह प्रतिदिन 18 घंटे काम करते हैं, वह एक पटकथा तो पढ़ सकते थे।” इस पर विवेक ने कहा कि हाँ, वो बहुत काम करते हैं यही उनकी कुशल कार्यशैली की पहचान है और इसीलिए उनके पास स्क्रिप्ट के लिए समय नहीं होता।

MP में कॉन्ग्रेस नेता को ट्रैफिक सूबेदार ने बताई उसकी जगह, पुलिस विभाग ने किया लाइन हाज़िर

कर्तव्य के प्रति निष्ठा और ईमानदारी आज के समय में भी अचानक से ही सही लेकिन देखने को मिल जाती हैं। मंगलवार (मार्च 02, 2019) को इंदौर के राजबाड़ा इलाके में पुलिस विभाग के अरुण सिंह ने एक बड़ी मिसाल पेश की है। हालाँकि, तारीफ़ करने के बजाए पुलिस विभाग द्वारा फिलहाल उन्हें तनाव पर काबू करने के लिए स्पेशल सेशन अटेंड करने भेज दिया गया है।

मंगलवार को राजवाड़ा क्षेत्र में चालान बनाने की बात को लेकर ट्रैफिक सूबेदार अरुण सिंह का झगड़ा कॉन्ग्रेस के एक नेता से हो गया था। नेता मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चला रहे थे, इस पर ट्रैफिक सूबेदार ने उसे रोका और कार्रवाई की बात कही। इस वीडियो में युवक मध्य प्रदेश में ‘कॉन्ग्रेस-राज’ का जिक्र करते हुए ट्रैफिक सूबेदार पर कार्रवाई नहीं करने का दबाव बना रहा था।

ड्यूटी पर तैनात ट्रैफिक सूबेदार अरुण सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, इस वीडियो के वायरल होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस विभाग ने अरुण सिंह को सप्ताह भर के प्रशिक्षण के नाम पर लाइन हाजिर कर दिया है। वीडियो में जिस बाला बच्चन का जिक्र किया गया है, वो मध्य प्रदेश के गृह मंत्री और इंदौर के प्रभारी मंत्री बाला बच्चन हैं। वही बाला बच्चन, जिन्होंने गत फरवरी माह में कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान अधिकारियों से कहा था कि वे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को अधिक महत्व दें।

वीडियो में सूबेदार अरुण सिंह का कहना था कि उन्होंने चलती बाइक पर मोबाइल से बात कर रहे नीलेश जैन नाम के एक व्यक्ति को रोका था। इस पर नीलेश के साथी अखिलेश जैन नेताओं की धौंस देने लगे। इन तथाकथित नेता और उनके रिश्तेदारों ने सूबेदार से कहा कि अब प्रदेश में कॉन्ग्रेस का राज है और आपको यहाँ रहना है तो बात माननी पड़ेगी।

मैं सूबेदार अरुण सिंह थाना यातायात पश्चिम… गलती होने पर चालान कार्रवाई जरूर करूँगा

अरुण सिंह इस वीडियो में कह रहे हैं, “हमने इन्हें मोबाइल पर बात करते हुए रोका, तो इन्होंने खुद को पूर्व विधायक अश्विन जोशी का भाँजा बताया और उनसे बात करने को कहा। हम व्यस्तता के कारण हर इनसान से बात नहीं कर सकते। ये नियम नहीं है कि फँसे हैं तो बात करें। ये बोल रहे हैं कि कॉन्ग्रेस का राज है, आपको ये करना पड़ेगा। राजबाड़ा में आपको रहना है तो आपको यह बात माननी पड़ेगी। मैं सूबेदार अरुण सिंह थाना यातायात पश्चिम… मैं किसी की बात नहीं मानूँगा। कोई गलत मिला तो चालानी कार्रवाई बिलकुल करूँगा। चाहे आप बाला बच्चन की धमकी दें या किसी और की। ये अपने आप को कॉन्ग्रेस का बता रहे हैं और कह रहे हैं कि हमारा राज है और हमारी चलेगी। ये कह रहे हैं कि तुम्हारी वर्दी उतार दूँगा। मैं सब को बता रहा हूँ, जो भी इस वीडियो को देख रहे हैं या सुन रहे हैं, मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा। मैं किसी शासन की नहीं सुनूँगा। मैं वर्दी पहने हूँ, इसके पैसे मुझे शासन से मिलते हैं। सही कार्रवाई करूँगा।”

सूबेदार अरुण सिंह को लाइन हाजिर करने की सूचना मिलते ही मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट पर इस घटना की निंदा की। उन्होंने लिखा कि कमलनाथ सरकार ने निडर पुलिस अफसर को अपना कर्तव्य निभाने के लिए और कॉन्ग्रेस की गुंडागर्दी को न मानने पर लाइन अटैच करवा दिया है। इस ट्वीट में उन्होंने कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी को भी टैग किया है, लेकिन वो शायद नए लोकसभा क्षेत्र में वोट की अपील में व्यस्त हैं।

वहीं अखिलेश जैन का कहना है कि उनके मित्र नीलेश जैन मोबाइल पर बात करते हुए जा रहे थे। पुलिसकर्मी ने उन्हें रोका। एक हजार रुपए लेकर 500 रुपए की रसीद दे रहा था। इसकी जानकारी मुझे मिली तो मैं पहुँचा और अपना परिचय दिया तो वह वीडियो बनाकर हम पर हावी होने लगे।

अरुण सिंह का इस घटना के बारे में कहना है, “मैं अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से कर रहा था। वर्दी और कानून से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है। आगे भी मैं इसी तरह से बिना किसी दबाव में आए अपना फर्ज निभाता रहूँगा।”

इस प्रकरण में सही और गलत का निर्णय होना अभी बाकी है, लेकिन फिलहाल सूबेदार अरुण सिंह को एक हफ्ते के स्ट्रैस मैनजमेंट सेशन के लिए भेज दिया गया है। PTI से बात करते हुए SSP इंदौर रूचि वरधान मिश्रा ने बताया है कि प्रेशर के वक्त उनका रवैया सही नहीं था, जो उन्हें सीखने की ज़रूरत है। इसलिए उन्हें स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए भेज दिया गया।

कॉन्ग्रेस का ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’: राजद्रोह और AFSPA जैसे कानूनों में बदलाव देश की अखंडता पर संकट है

कुछ दिनों पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपना मैनिफेस्टो जारी किया जिसमें कुछ कानूनों में संशोधन करने का वादा किया गया है। कांग्रेस का कहना है कि यदि वह सत्ता में आई तो ‘राजद्रोह’ को परिभाषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (A) को समाप्त कर देगी। इसके पीछे कॉन्ग्रेस पार्टी का तर्क है कि इस धारा का दुरुपयोग होता है। इसके अतिरिक्त चुनावी घोषणापत्र में यह भी लिखा गया कि कॉन्ग्रेस के सत्ता में आते ही सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम (1958)- जिसे सामान्यतः ‘AFSPA’ कहा जाता है- में भी संशोधन किया जाएगा।

दोनों ही कानूनों का प्रयोग विशेष परिस्थितियों में किया जाता है और इन्हें संशोधित करने अथवा समाप्त करने की बात चुनावी घोषणापत्र में कहना यह दिखाता है कि कश्मीर के आतंकियों और देश में चुनी हुई सरकार से नफरत करने वालों के तुष्टिकरण लिए कॉन्ग्रेस कितनी तत्पर है। हम इतिहास देखें तो कम्युनिस्ट और माओवादी विचारधारा वाली पार्टियाँ भी ऐसे हर कानून को समाप्त करने की बात समय-समय पर उठाती रही हैं जो देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने में सहायक हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी का इतिहास देखें तो 2004 में सत्ता में आते ही इन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण भारत में लागू होने वाले देश के पहले कानून ‘पोटा’ (Prevention of Terrorism Act) को समाप्त कर दिया था जिसका खामियाज़ा देश को आने वाले एक दशक तक भुगतना पड़ा था। आज आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने वाला एक ही कानून देश में बचा है जिसे Unlawful Activities (Prevention) Act 1967 कहा जाता है। बीते कुछ सालों में UAPA के अंतर्गत पकड़े गए आतंकियों और अर्बन नक्सलियों ने इस कानून के विरुद्ध अभियान चला रखा है।

ध्यान रहे कि आनंद तेलतुंबडे की गिरफ्तारी और जेकेएलएफ पर प्रतिबंध UAPA के अंतर्गत ही संभव हो पाया था। इसीलिए अर्बन नक्सली गुटों ने तुरंत इंडिया सिविल वाच जैसी संस्था पैदा की और सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा जैसों के लिए समर्थन जुटाया। इस समर्थन का उद्देश्य UAPA को ‘draconian’ घोषित कर इसे भी समाप्त करना है। वास्तव में कॉन्ग्रेस और वामपंथी-माओवादी एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं जो हर वो कानून समाप्त कर देना चाहते हैं जिससे देश की एकता और अखंडता सुरक्षित रहती है।    

राजद्रोह को परिभाषित करने वाला कानून: IPC सेक्शन 124 (A)

राजद्रोह कानून समाप्त करने या न करने के पीछे ढेरों तर्क दिए जा सकते हैं। सामान्यतः यह समझा जाता है कि आईपीसी 124 (A) के अंतर्गत ‘देशद्रोह’ की परिभाषा बताई गई है लेकिन ऐसा नहीं है। यह कानून विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध शत्रुता उत्पन्न करने के उद्देश्य से दिए गए बयान या अन्य माध्यमों से किए गए ऐसे किसी आचरण पर दंड का प्रावधान स्थापित करता है। इसमें देश से द्रोह नहीं बल्कि विधि द्वारा स्थापित सरकार से द्रोह को परिभाषित किया गया है।

जहाँ एक तरफ यह कानून विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरोध में घृणास्पद अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाता है वहीं दूसरी तरफ संविधान के अनुच्छेद 51A में लिखित मूलभूत दायित्वों की रक्षा भी करता है। संविधान में लिखित मूलभूत दायित्व यह कहते हैं कि प्रत्येक नागरिक को देश की एकता, अखंडता, संविधान और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं करना चाहिए। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जनादेश और विधि द्वारा स्थापित सरकार भारतीय संविधान के अधीन कार्य करने वाली संस्था है। यह कैसे हो सकता है कि कोई नागरिक संविधान और राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करे लेकिन उसी संविधान द्वारा स्थापित निर्वाचन प्रक्रिया और विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध शत्रुता फैलाने वाला आचरण करे?  

ध्यान देने वाली बात है कि मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए तो हम कोर्ट जा सकते हैं लेकिन कोई नागरिक अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है या नहीं यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। ऐसे में राजद्रोह कानून देश के नागरिकों में एक प्रकार से अनुशासन की भावना जगाता है कि विधि द्वारा स्थापित देश की सरकार की आलोचना करो लेकिन शासन व्यवस्था के प्रति शत्रुता मत पालो। निर्वाचन प्रक्रिया द्वारा विधिवत चुनी गई सरकार की नीतियाँ गलत हो सकती हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम उसको शत्रु मानकर हथियार उठा लें और क्रांति करने निकल पड़ें।

राजद्रोह कानून वामपंथी माओवादी जैसी रक्तपिपासु विचारधारा से देश को बचाने का कार्य भी करता है क्योंकि इस विचारधारा का बीजमंत्र ही मौजूदा सरकार को उखाड़ फेंकना और समानांतर सरकार चलाना है। देश के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में नक्सलियों की समानांतर सरकारें ही तो चलती रही हैं। नक्सली विधि द्वारा स्थापित भारत सरकार के विरुद्ध घृणा फ़ैलाने का काम कई दशकों से करते रहे हैं इसीलिए आज नक्सलवाद देश की एकता और अखंडता पर संकट बन चुका है। ऐसे में कॉन्ग्रेस का यह आश्वासन देना कि उनके सत्ता में आते ही राजद्रोह कानून समाप्त हो जाएगा, यही दिखाता है कि उनका गठबंधन अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र विरोधी ताकतों से है।

जहाँ तक किसी कानून के दुरुपयोग की बात है तो देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसका दुरुपयोग न हुआ हो। कानून का सदुपयोग अथवा दुरुपयोग सरकार की नीयत पर निर्भर करता है। किसी कानून का अस्तित्व देश की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर संभावित संकट की स्थिति पर निर्भर करता है। अभी देश में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई है कि आईपीसी की धारा 124A को समाप्त करने का वादा चुनावी घोषणापत्र में किया जाए।

दूसरी बात यह कि राजद्रोह का कानून अंग्रेज़ों के जमाने का कानून है। यदि कॉन्ग्रेस को इसे हटाना ही था तो स्वतंत्रता के पश्चात 60 वर्ष के शासनकाल में क्यों नहीं हटाया गया? सन 2012 में असीम त्रिवेदी को संविधान पर मूत्र विसर्जन करने वाले कार्टून के लिए राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करने वाली इसी कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार थी। क्या उस समय धारा 124A का दुरुपयोग नहीं हुआ था?  


सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम [AFSPA 1958, 1990]

स्वतंत्र भारत में सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम या ‘अफ्स्पा’ से अधिक विवादास्पद कानून कोई नहीं हुआ। कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र कहता है कि सत्ता में आते ही इसमें भी संशोधन किया जाएगा। अफ्स्पा में संशोधन करने के पीछे जो तर्क दिया गया है उसके शब्दों पर ध्यान देना आवश्यक है। कॉन्ग्रेस ने घोषणापत्र में लिखा है: “Congress promises to amend the Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 in order to strike a balance between the powers of security forces and the human rights of citizens and to remove immunity for enforced disappearance, sexual violence and torture.”

अर्थात कॉन्ग्रेस पार्टी दुनिया के सामने यह मानती है कि कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा लोगों को जबरन गायब करवाया गया और सेना के जवानों द्वारा यौन हिंसा और अत्याचार किया गया। इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या होगी कि भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध जारी प्रोपेगंडा युद्ध का हिस्सा बन चुकी है। इस प्रोपेगंडा युद्ध को समझे बिना कॉन्ग्रेस की कारस्तानी समझना कठिन है। यह सर्वविदित है कि जन्म लेते ही पाकिस्तान ने भारत विरोधी गतिविधियाँ आरंभ कर दी थीं। गत 70 वर्षों में उन गतिविधियों ने एक पैटर्न का रूप लिया।

इस पैटर्न में पहले भारत के साथ प्रत्यक्ष युद्ध (1947, 1965, 1971) किया गया जिसमें असफल होने पर पाकिस्तान ने आतंकवाद रूपी परोक्ष युद्ध लड़ा जो अभी तक जारी है। इसी क्रम में आईएसआई अब भारत के साथ प्रोपेगंडा युद्ध कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर पाकिस्तानी हुक्मरान यह कहते हैं कि भारतीय सेना कश्मीर में मानवाधिकार हनन में लिप्त है। भारत में पाकिस्तान समर्थित अर्बन नक्सली नित नए फर्ज़ी उदाहरण सामने लाते हैं और सेना को बदनाम करते हैं। इसी प्रक्रिया में अब कॉन्ग्रेस पार्टी भी सम्मिलित हो चुकी है।  

कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा की पैदाइश अर्बन नक्सलियों द्वारा अफ्स्पा के विरोध में लंबे-लंबे लेक्चर दिए जाते हैं लेकिन इन्हें गिलगित बल्तिस्तान और बलोचिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा रोज़ाना किए जा रहे क़त्लेआम पर आँसू बहाने का समय नहीं मिलता। अफ्स्पा के विरोध में यह कहा जाता है कि यह ‘draconian law’ है और सेना इसका दुरुपयोग करती है। यह सही है कि सेना के कुछ अधिकारियों और जवानों द्वारा इसका दुरुपयोग किया गया है, लेकिन यह भी सच है कि उन अधिकारियों और जवानों को सिविल और सैन्य कानून के दायरे में दंड भी मिला है।

अफ्स्पा वास्तव में सन 1958 से 1990 के बीच जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों में अलग-अलग समय पर लागू किए गए कानून हैं। सबसे पहले 1958 में यह कानून जवाहरलाल नेहरू पूर्वोत्तर राज्यों के लिए लाए थे क्योंकि वहाँ उग्रवादी गतिविधियाँ जन्म ले रही थीं। बाद में जब जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पनपा तो 1990 में वहाँ भी अफ्स्पा लागू किया गया। अफ्स्पा सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों और जवानों को यह विशेषाधिकार देता है कि वे यदि उन्हें उचित लगता है तो वे किसी संदिग्ध व्यक्ति या वाहन की जाँच कर सकते हैं, बिना वारंट गिरफ्तार कर सकते हैं या गोली तक मार सकते हैं।

ऐसे सख्त कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के कारण परिस्थितियाँ विकराल रूप धारण कर चुकी थीं। स्थिति ऐसी थी कि यदि सेना को इतने अधिकार न दिए जाते तो पूर्वोत्तर की सात बहनें भारत का साथ छोड़ चुकी होतीं। जैसे-जैसे परिस्थितियाँ सामान्य हुईं, पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों से यह कानून हटा लिया गया। लेकिन कश्मीर में आज भी हालात युद्ध जैसे ही हैं इसलिए वहाँ अफ्स्पा लागू रहना अनिवार्य है।

ऐसा नहीं है कि भारत अकेला ऐसा देश है जहाँ सेना देश के भीतर छिपे शत्रुओं से लड़ रही है। कनाडा के ओका में 1990 में जब समस्या हुई तब वहाँ की सेना ने विद्रोह को कुचला था। ब्रिटिश सेनाओं ने 1969 से 2007 तक आयरलैंड में विद्रोह को कुचला। सन 1996 में फ़्रांस ने आंतरिक सुरक्षा के लिए ‘ऑपरेशन विजिपायरेट’ के अंतर्गत 2,00,000 सैनिकों की तैनाती की थी। लेकिन भारत में जिन क्षेत्रों में अफ्स्पा लागू है उस ‘कन्फ्लिक्ट ज़ोन’ की प्रकृति को समझने की आवश्यकता है।

जहाँ अफ्स्पा लागू है वहाँ पाकिस्तान समर्थित परोक्ष युद्ध के हालात हैं। हम जम्मू कश्मीर में पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहे हैं इसलिए वहाँ स्थिति संभालने के लिए हमें अफ्स्पा जैसे कानून की आवश्यकता है। भारत ने अफ्स्पा के अंतर्गत सेना को जो विशेषाधिकार दिए हैं वह उन क्षेत्रों में दिए हैं जहाँ वास्तविक शत्रु अपने देश का नागरिक नहीं बल्कि दूसरे देश का मज़हबी घुसपैठिया है। यदि अर्बन नक्सलियों के स्थापित नैरेटिव के अनुसार भारत ‘अपने ही देश के नागरिकों के साथ युद्ध’ कर रहा होता तो अफ्स्पा नक्सल-माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया जाता जबकि ऐसा नहीं है।

कॉन्ग्रेस और वामपंथियों को इसका भी उत्तर देने की आवश्यकता है कि यदि अफ्स्पा में संशोधन किया जा सकता है तो अनुच्छेद 370 और 35A में संशोधन क्यों नहीं किया जा सकता जिनके कारण जम्मू कश्मीर राज्य में वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी और वाल्मीकि समुदाय समेत अनेक समुदाय के लोगों के साथ कानूनी रूप से भेदभाव किया जाता है। आज़ादी की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाली कॉन्ग्रेस को यह पता होना चाहिए कि नेहरू के विश्वस्त गोपालस्वामी आयंगर ने संविधान में अनुच्छेद 370 जुड़वाने के पीछे यही कारण बताया था कि जम्मू कश्मीर में युद्ध की स्थिति थी।

अफ्स्पा भी नेहरू 1958 में इसीलिए लाए थे क्योंकि पूर्वोत्तर में युद्ध जैसे हालात थे। ये अलग बात है कि 1990 में नेहरू की ‘कश्मीर गलती’ को सुधारने के लिए अफ्स्पा को जम्मू कश्मीर में भी लागू करना पड़ा। इस दृष्टि से यदि अफ्स्पा संशोधित हो सकता है तो इसका निष्कर्ष यह होगा कि कश्मीर की स्थिति अब बेहतर है। और यदि ऐसा है तो कॉन्ग्रेस को अपने घोषणापत्र में अनुच्छेद 370 में भी संशोधन करने का वादा करना चाहिए।