AIUDF (ऑल इंडिया यूनाईटिड डेमोक्रेटिक फंड) पार्टी के प्रमुख बदरूद्दीन अजमल ने पीएम मोदी को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उन्होंने असम के चिरांग में कहा कि जितने भी मोदी विरोधी गठबंधन है, वो सभी मिलकर मोदी को देश से बाहर निकालेंगे, जिसके बाद मोदी कहीं न कहीं जाकर चाय की दुकान चलाएगा और साथ में पकौड़े भी बेचेगा। आए दिन राजनीति में बयानबाजी का स्तर काफी नीचे गिरता जा रहा है और समूचा विपक्ष जिस तरह की बयानबाजी कर राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहा है, उससे ऐसा लग रहा है जैसे वो भाजपा सरकार से कम मोदी से अधिक बौखलाया हो। उनका निशाना कोई पार्टी नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी हैं। वैसे बदरूद्दीन अजमल का विवादों से पुराना नाता रहा है और ये भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों को ही अपनी विरोधी पार्टी बताते हैं।
Badruddin Ajmal. All India United Democratic Front (AIUDF) in Chirang, Assam: Modi virodhi jitna gathbandhan hai, hum bhi usme hain, vo sab mil ke Modi ji ko iss desh se bahar nikalega. Modi ji jake kahi na kahi chaye ka dukaan bana ke chalayega, pakoda bhi bechega. (12/4/19) pic.twitter.com/KH5kfgvsQ3
गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले ही AIUDF के प्रत्याशियों के खिलााफ कॉन्ग्रेस द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने पर बदरूद्दीन ने कॉन्ग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाया था। बदरूद्दीन ने असम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी पर आरोप लगाया था कि वो AIUDF को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि कॉन्ग्रेस का मकसद AIUDF को खत्म करना है। कॉन्ग्रेस के मुस्लिम नेता नहीं चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIUDF में गठबंधन हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनका राजनैतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
अजमल ने कहा था कि अगर भाजपा उनकी पहली दुश्मन है, तो वहीं कॉन्ग्रेस दूसरी नंबर की दुश्मन है। उनका कहना था कि उन्होंने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर सीटों का त्याग किया था, उनकी कॉन्ग्रेस को मदद करने की कोई मंशा नहीं थी। बदरूद्दीन का कहना है कि उन्होंने यह निर्णय असम की भाषा, संस्कृति, पहचान और हर परिप्रेक्ष्य को देखकर लिया था। वो चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भी उन तीनों सीटों पर अपने प्रत्याशी न उतारकर उनकी तरह त्याग करे इससे वो तीन सीटों पर तो कॉन्ग्रेस 7 सीटों पर और भाजपा को मुश्किल से 2 सीटें मिलती।
इसके साथ ही बदरूद्दीन ने कॉन्ग्रेस की कठोरता पर प्रहार करते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस अपने रवैये के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं। उनकी मानें तो राज्य में कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम आधारित पार्टी है क्योंकि पार्टी में 25 में से 15 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसके साथ ही अजमल का आरोप है कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोटों के लिए मुस्लिम को बेवकूफ बनाकर ब्लैकमेल कर रही है। उनकी मानें तो दशकों से समुदाय विशेष के वोट का इस्तेमाल करके, अब कॉन्ग्रेस को AIUDF जैसी पार्टी से डर लग रहा है कि कहीं उनके वोट न छिन जाएँ।
रामनवमी के साथ ही चैत्र नवरात्र का समापन हो जाता है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्याह्न के समय पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में राजा दशरथ के यहाँ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। यही वजह है कि इस दिन को राम नवमी के नाम से जाना जाता है। रामनवमी के दिन माँ दुर्गा के नौवें रूप सिद्धिदात्री की पूजा के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की पूजा का भी विधान है।
इससे पहले कि राम के व्यक्तित्व के कुछ विशेष पहलुओं पर बात करें, कुछ मूलभूत बातें जैसे कि हिन्दू कैलेंडर के अनुसार रामनवमी हर साल चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह पर्व हर साल मार्च या अप्रैल महीने में आता है। इस बार राम नवमी दो दिन मनाई जाएगी। विक्रमी संवत के अनुसार 13 अप्रैल को 11:40 तक अष्टमी है उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। पंडितों के अनुसार इस बार रामनवमी दो दिन अर्थात 13 और 14 अप्रैल को मनाई जाएगी।
सनातन धर्म में रामनवमी का विशेष महत्व है। इसी दिन भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या की कोख से भगवान राम के रूप में मनुष्य योनि में जन्म लिया था। हिन्दू धर्म की मान्यताओं में भगवान राम को सृष्टि के पालनहार श्री विष्णु का सातवाँ अवतार माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने बनारस के तुलसीघाट पर जिस राम चरित मानस की रचना की थी, उसका आरंभ भी राम के जन्मदिवस अर्थात रामनवमी को ही हुआ था।
रामकथा पर लगभग 1000 से भी ज़्यादा प्राप्त ग्रन्थ हैं। इनमें वाल्मीकि रामायण को आधार माना जाता है। राम की लगभग सम्पूर्ण गाथा इस महाकाव्य में है। आज रामनवमी के अवसर पर श्रीराम के व्यक्तित्व की कुछ मूलभूत बातों पर गौर करते हैं जिन्हे अगर हमने ठीक से समझ लिया तो आज रामनवमी मनाने का यह एक नया अंदाज होगा। वैसे भी सनातन में हर भक्त की भगवान हो जाने की पूरी सम्भावना व्यक्त की गई है।
चलिए, रामायण में घटी एक सुंदर घटना का जिक्र कर रहा हूँ। इससे पहले राम के जीवन में बहुत सी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटित हो चुकी थीं। जैसे पिता की आज्ञा पालन के लिए उन्हें अपने राज्य से बाहर 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा था। जंगल का जीवन आसान नहीं होता, ज़ाहिर है उन्हें एक मुश्किल जीवन जीना पड़ा होगा। फिर उनकी पत्नी सीता का रावण ने हरण कर लिया। प्रेम और चिंता से भरे राम दक्षिण भारत पहुँचे, एक सेना तैयार की, और लंका पहुँच कर युद्ध लड़ा, रावण पर विजय प्राप्त की। एक तरह से इस युद्ध में रावण का समूल नाश हो गया।
इतनी कहानी तो आप सभी को पता है और ये भी कि रावण के दस सिर थे। रावण को मारने के लिए, राम को सभी दस सिर काटने पड़े। सवाल यहाँ यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति के दस सिर भला कैसे संभव हैं। इसके कई जवाब हैं अभी के लिए आप इतना समझिए कि चूँकि पहले लिपि नहीं थी, ऐसे में जो भी पहली भाषा विकसित हुई होगी वह चित्रात्मक होगी। क्योंकि चित्रों के माध्यम से कुछ भी व्यक्त करना आसान रहा होगा। इस मत के कई प्रमाण हैं। बाकी दस सिरों पर आगे बात होगी।
योगवशिष्ठ में ये कथा आती है, रावण से युद्ध जीतने के बाद राम बोले, “मैं हिमालय जाकर प्रायश्चित करना चाहता हूँ, क्योंकि मैंने एक गलत काम किया है। मैंने एक ऐसे मनुष्य को मार दिया जो महान शिव भक्त था, एक विद्वान था, एक महान राजा था और दानवीर भी था।” यह सुनकर सबको बहुत आश्चर्य हुआ। कहते हैं कि राम के भाई लक्ष्मण बोले, “आप यह क्या कह रहे हैं? उसने आपकी पत्नी का हरण किया था। फिर प्रायश्चित क्यों?” राम बोले, “उसके दस सिरों में एक सिर ऐसा था जिसमें बहुत ज्ञान था, पवित्रता और भक्ति थी। उस सिर को काटने का पश्चाताप है मुझे।”
इस कथा का सार यह है कि हर किसी के दस या ज्यादा सिर होते हैं। हमारा सिर अलग-अलग प्रवृत्तियों का जन्मस्थान है जिनसे हमारा पूरा कृतित्व और व्यक्तित्व निर्धारित होता है। जैसे एक दिन, हमारा सिर लालच से भरा होता है, दूसरे दिन ईर्ष्या से फिर किसी दिन नफरत, प्रेम, कामनाएँ, सुंदर या फिर कुरूपता से या अनेक अन्य तरह की दुर्भावनाओं से, ये सारे विचार सिर में ही तो अपनी जड़ें जमाते हैं, वहीं से अपनी सत्ता चलाते हैं। या फिर हो सकता है कि एक ही दिन में कोई ऐसी सभी भावनाओं से गुजरता हो।
जैसे ही कोई किसी को ईर्ष्या के एक पल में देखता हैं, तो वह निष्कर्ष निकाल लेता हैं कि वो ईर्ष्यालु है। अगर कोई किसी को लालच के एक पल में देखता हैं, तो तुरंत निष्कर्ष निकाल लेता है कि वह लालची है। पर असल में, यह सब अलग-अलग समय पर, सभी में अलग-अलग सिरों के काम करने की वजह से होता है। हम सभी में कम-से-कम एक सिर प्रेम, सुंदरता, उदारता और करुणा का होता है। जो गलती लोग करते हैं वो यह है कि एक गुण या अवगुण की पहचान करने की जगह हम उस व्यक्ति की बुराई करते हैं।
यहाँ, राम के पश्चाताप का अर्थ है कि राम कहना चाहते थे, कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रावण ने कितने बुरे काम किए हैं, उसमें एक आयाम ऐसा था जो कि जबरदस्त संभावनाओं से भरा था। सनातन में जो भी कथाएँ हैं, उन सभी कथाओं का एक गूढ़ अर्थ भी है। अगर हम उसे समझ जाएँ तो जीवन जीने का पूरा अंदाज़ ही बदल जाए, यूँ ही किसी कथा को पीढ़ी दर पीढ़ी हज़ारों सालों से आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।
जैसे यहाँ है, किसी व्यक्ति में छिपे अवगुण की बुराई करें उस व्यक्ति की नहीं। राम को जिसने भी समझा, अनुभूत किया, वह उसमे एक नए आयाम में प्रकट हुए चाहे वह कबीर के राम हों या रामानुजन के राम, भगवान राम ने सदैव अपने आत्मसात करने वाले के व्यक्तित्व को एक नई ऊँचाई दी। गाँधी ने भी जब राम को अपनाया तो महात्मा कहलाए।
साधारण से नियम के पालन के भी कई दूरगामी परिणाम हैं। जब भी हमें किसी में कुछ गलत दिखे, तो हम उस अवगुण की बुराई करें न कि उस व्यक्ति की। अगर हम अपने जीवन में इस विवेक को शामिल कर लेते हैं तो हम निश्चित रूप से अपने कई बोझों से मुक्ति पा लेंगे। जब हम दूसरों के साथ ऐसा करेंगे तो यक़ीनन हमारे साथ भी ऐसा होगा।
राम की कहानी में प्रेम की पीड़ा भी है और प्रेम की पराकाष्ठा भी। अक्सर कहा जाता है कि ‘प्रेम एक ऐसे पुरुष और स्त्री के बीच होता है जो एक दूसरे को नहीं जानते।’ ये तभी सही हो सकता है जब कोई एक सारहीन, आलोचनात्मक या फिर नासमझी भरा जीवन जीता है। कायदे से होना तो यह चाहिए कि जितना हम किसी को जानते हैं, उतना ही अधिक प्रेम और करुणा हममें जागनी चाहिए। जब हम उनके सभी संघर्ष जान जाते हैं, तो हम समझ जाते हैं कि वे भी हमारी ही तरह मनुष्य हैं।
राम ने ऐसे मनुष्य को मारने का प्रायश्चित किया जिसने उनकी पत्नी का हरण किया था, और कई सारे बुरे काम किए थे। फिर भी राम ने रावण के उस एक सिर को पहचाना जो कि सुंदर था। राम एक जबरदस्त बोध वाले मनुष्य हैं, जिन्होंने अपने जीवन की उच्चतर सम्भावना को जीया और इसीलिए वह मानवता के आदर्श होकर पूजनीय हुए, उनकी पूजा की जाती है। माना कि वे अपने जीवन में कई सारी चीज़ों में विफल हुए, पर उनकी विफलता ने कभी उनके बोध और गुणों को नहीं बदला। जीवन ने उनके साथ चाहे जो भी किया, वे हमेशा उससे ऊपर रहे।
आज रामनवमी के अवसर पर जब राजनीतिक बयानबाजी की बिसात बिछी है, राजनेताओं में गिरने की होड़ मची है तो आज राम-राज्य और राम ज़्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं। राम के व्यक्तित्व का ये उदाहरण यदि हम याद रखें। सोचिए, अगर व्यक्ति की बुराई करने के बजाए गुणों को पहचानने की समझ है तो उसके जीवन में दैवीय गुणों अर्थात जीवन के उच्चतर आयामों का समावेश क्यों नहीं होगा।
कहते हैं कि गुलाब के पौधे में गुलाब से ज्यादा काँटे होते हैं। पर हम फिर भी उसे गुलाब का पौधा कहते हैं, काँटे का नहीं, क्योंकि हम सुंदरता को देखते हैं। जीवन के उच्चतर आयाम को। आम के पेड़ में आम से ज्यादा पत्ते होते हैं, पर हम फिर भी उसे आम का पेड़ कहते हैं क्योंकि हम फलों की मिठास को देखते हैं।
ऐसे ही हर मनुष्य में मिठास की कम-से-कम एक बूँद तो होगी ही। फिर हम उसे क्यों नहीं देख पाते? जरा सोचिए अगर राम को ठीक से समझ जाएँ तो भी जीवन की गुणवत्ता में आमूल परिवर्तन संभव है। कल्पना कीजिए अगर हर किसी के साथ हम ऐसा ही करें। ऐसे लोग जिन्हें हम भयानक समझने की भूल करते हैं, उनमें भी मिठास की एक बूँद को भी यदि पहचानने में हम सफल हो जाएँ तो निश्चित रूप से हमारी मिठास को पहचानने की काबिलियत हमारे भी व्यक्तित्व को ऊपर उठाएगी। उसकी मिठास हमारे व्यक्तित्व में भी झलकेगी। राम हो जाने की संभावना को चरितार्थ करने की दशा में यह एक बड़ा कदम होगा।
इसका यह मतलब भी नहीं कि कोई अपनी आंखें मूँद अन्धे हो जाए। हम पेड़ में पत्ते देखते हैं, पेड़ में काँटे देखते हैं पर हम फूलों और फलों का होना भी स्वीकारते हैं। बस एक सार्थक और आनंददायक जीवन जीने की इतनी ही मर्यादा है जिसके पालन की जरुरत है। फिर हमें मर्यादा पुरुषोत्तम होने से कोई नहीं रोक सकता। तो क्यों न सनातन की इस सबसे बड़ी सीख को जीवन का हिस्सा बनाएँ। आज रामनवमी के दिन से ही राम को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाएँ, फिर जीवन चाहे जिस पथ पर ले जाए विजय हमारी होगी। राम के वंशज होने के कारण हमें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की 14 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में होने वाली रैली पर विवादों का साया छाया रहा। सिलीगुड़ी पुलिस ने राहुल गाँधी के हेलीकॉप्टर को लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पुलिस ने हेलीकॉप्टर लैंडिंग से मना किया है।
देश में लोकसभा चुनाव 2019 का प्रचार चरम पर है। सभी नेता देश भर में घूम-घूम कर रैली कर रहे हैं। इस बीच पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय प्रशासन ने उनके हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।
कॉन्ग्रेस ने बताया इसे ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल
इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विमान को उतरने की अनुमति नहीं मिली थी। कॉन्ग्रेस नेता इसे ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल बता रहे हैं। कुछ दिन पहले ही राहुल गाँधी ने ममता बनर्जी के एक बयान पर पलटवार किया था। ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया था कि कॉन्ग्रेस भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर नहीं लड़ रही है।
राहुल गाँधी ने तंज कसते हुए कहा था, “ममता बनर्जी ने केंद्र में मंत्री पद पाने के लिए कभी न कभी बीजेपी से समझौता किया था और अब ममता बनर्जी पूछ रही हैं कि हम बीजेपी के खिलाफ सच में नहीं लड़ रहे हैं।”
पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। यहाँ सभी 7 चरणों में मतदान होना है। बृहस्पतिवार (अप्रैल 11, 2019) को पश्चिम बंगाल की 2 सीटों पर प्रथम चरण का मतदान हुआ। लोगों ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया और मतदान प्रतिशत करीब 81% रहा।
अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में गैर विवादित जमीन पर पूजा करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिका को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि आप देश में किसी को शांति से रहने नहीं देंगे, कुछ ना कुछ अड़चन डालनी है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘’आप देश में शांति नहीं रहने देना चाहते हैं, कोई न कोई हमेशा फच्चर फँसाने में लगा रहता है।”
The Supreme Court on April 12 dismissed a plea to conduct puja in temples located on the undisputed sites in #Ayodhyahttps://t.co/zPbXqH2qLf
सुप्रीम कोर्ट ने पंडित अमरनाथ मिश्रा की याचिका को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर भी रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें इस याचिका को दाखिल करने पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया गया था।
अयोध्या और बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मध्यस्थता से सुलझाने की कोशिश की जा रही है। इस मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों की एक समिति गठित की और इसे कैमरे की निगरानी में की जा रही है। समिति के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एफएमआई खलीफुल्ला हैं और इसमें आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त किए गए चंदे का ब्योरा निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि बॉन्ड के माध्यम से 15 मई तक प्राप्त धनराशि का विवरण, दानकर्ताओं के नाम के साथ, राजनीतिक दलों द्वारा 30 मई तक चुनाव आयोग को बताना होगा।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वो संबंधित क़ानून में किए गए बदलावों की व्यापक समीक्षा करेगी और यह भी सुनिश्चित करेगी कि इससे किसी ख़ास दल को अनावश्यक लाभ न मिल पाए।
इसके अलावा न्यायालय ने वित्त मंत्रालय को निर्देश दिया कि वो अप्रैल-मई में चुनावी बॉन्ड की ख़रीद के लिए 10 दिन के बजाय पाँच दिन का समय रखे। न्यायालत ने ग़ैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर सुनवाई के बाद कल ही अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया था।
ख़बर के अनुसार, केंद्र सरकार की इस योजना के ख़िलाफ़ एक NGO (असोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने जनहित याचिका दाखिल की है और कोर्ट में इस NGO का पक्ष सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण रख रहे हैं। इस जनहित याचिका के माध्यम से इस योजना पर रोक लगाने या इसके तहत चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करने की माँग की गई थी।
NGO की याचिका पर अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि केंद्र की इस योजना का उद्देश्य चुनावी माहौल में ब्लैक मनी के इस्तेमाल को रोकना है। केंद्र ने कोर्ट से आग्रह किया था कि न्यायालय को इस मामले में अपना हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और चुनावी प्रक्रिया को सम्पन्न होने तक इस पर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। उन्होंने केंद्र के पक्ष में बहस की थी कि इससे चुनावी बॉन्ड राजनीतिक दान के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक बड़ा क़दम है।
बता दें कि जनवरी, 2018 में केंद्र ने चुनावी बॉन्ड के लिए योजना को अधिसूचित किया था जिसे एक भारतीय नागरिक या भारत में निगमित निकाय द्वारा खरीदा जा सकता था। इसके अलावा इन बॉन्डस को एक अधिकृत बैंक से ही खरीदने का प्रावधान किया गया और फिर राजनीतिक दलों को जारी किया जा सकता था। राजनीतिक पार्टी 15 दिनों के अंदर इन बॉन्डस की राशि को प्राप्त कर सकती है।
कर्नाटक में कॉन्ग्रेस पार्टी के नाटक थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। कर्नाटक के कुछ नेताओं को राज्य के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे की उम्मीदवारी का विरोध करने का फैसला भारी पड़ गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी ने मंड्या सीट से CM कुमारस्वामी के बेटे निखिल की उम्मीदवारी का विरोध करने पर अपने 7 ब्लॉक अध्यक्षों को पार्टी से बाहर कर दिया है ।
पार्टी नेतृत्व के निर्णय के खिलाफ स्थानीय कार्यकर्ता अपना विरोध भी दर्ज करा चुके हैं। पार्टी कार्यकर्ता इस सीट से दिवंगत अभिनेता अंबरीश की पत्नी सुमालता को टिकट दिए जाने की माँग कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि पार्टी सुमालता को मैदान में नहीं उतारती है, तो उन्हें देवगौड़ा के पोते के पक्ष में प्रचार करने के लिए दबाव नहीं दिया जाना चाहिए।
कॉन्ग्रेस पार्टी ने यह कदम नेताओं के पार्टी लाइन के खिलाफ जाने पर उठाया है। राज्य में गठबंधन की घोषणा के बाद मंड्या लोकसभा सीट के JDS के खाते में जाने के बाद से यहाँ उठापठक थमने का नाम नहीं ले रही है। कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेताओं में इस सीट के JDS के खाते में जाने को लेकर बहुत असंतोष व्याप्त है।
यह वही कॉन्ग्रेस है, जिस पर परिवारवाद की राजनीति आरोप लगता रहता है। पार्टी इस विरोध को दबाने को लेकर कई दौर की बातचीत कर चुकी है। कॉन्ग्रेस के पदाधिकारियों का कहना है कि व्यापक हित में सेक्युलर ताकतों को एकजुट होने की जरूरत है। पिछले सप्ताह पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर पार्टी कैडर से संयुक्त उम्मीदवार का समर्थन करने का आग्रह किया था।
विरोध थमता नहीं दिखते हुए पार्टी ने मांड्या के पदाधिकारियों को शुक्रवार (अप्रैल 12, 2019) को निष्कासित कर दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी ने भाजपा से मुकाबला करने के लिए JDS के साथ लोकसभा में गठबंधन किया है। वहीं, भाजपा ने येदियुरप्पा के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है।
मशहूर शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां के पोते ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनके नामांकन प्रक्रिया में शामिल होने का आग्रह किया है। ‘भारत रत्न’ बिस्मिल्ला खां के पोते नासिर अब्बास बिस्मिल्ला ने PM को लिखे पत्र में कहा, “मेरी इच्छा है कि मैं आपके नामांकन प्रक्रिया में शामिल रहूँ। 2014 में कॉन्ग्रेसी हमारे घर आए और हमें कहा गया कि जैसा हम कहें वैसे ही करो और उनके पीछे, मेरे परिवार ने PM मोदी जैसे महान नेता के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था।”
2014 में ठुकरा दिया था मोदी के नामांकन में आने का निमंत्रण
नासिर अब्बास बिस्मिल्ला ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि वे वाराणसी में लोकसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन भरने आ रहे नरेंद्र मोदी की टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं। बता दें कि बिस्मिल्लाह परिवार को 2014 में भी नामांकन कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया था, लेकिन तब इस परिवार ने भाजपा के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था। उस समय परिवार द्वारा कहा गया कि वह किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ नहीं जुड़ना चाहते।
नासिर अब्बास बिस्मिल्ला ने PM मोदी को पत्र लिखते हुए कहा, “मैं भारत रत्न (दिवंगत) उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का पोता नासिर अब्बास बिस्मिल्ला आपसे निवेदन करता हूँ कि जब आप हमारे शहर वाराणसी से लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने आएँ तो, मैं उस दौरान आपके साथ रहना चाहता हूँ। यह हमारे लिए बहुत ही यादगार और शुभकामनाओं भरा पैगाम होगा।”
उन्होंने पत्र में आगे लिखा, “मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि एक साल पूर्व मैंने अपने दादा जी की एक शहनाई जिस पर वे धुन बजाया करते थे, आपके हाथों राष्ट्र को समर्पित की थी। जो वाराणसी के बड़ा लालपुर स्थित Trade Facilitation Centre and Craft Museum में रखी है। हमें आपसे उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा यकीन है कि आप हमें अपने नामांकन कार्यक्रम में जरूर आमंत्रित करेंगे।”
Nasir Abbas Bismillah, grandson of Shehnai maestro late Ustad Bismillah Khan on letter to PM asking to join his nomination process: It’s our desire to join him. If we get an offer we’ll accept; regret we didn’t accept in 2014 as few Congressmen brainwashed our elders. pic.twitter.com/jNE4xfnJ7m
बिस्मिल्ला ने पत्र में लिखा, “2014 में, हमें राजनीति की दुनिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, हम साधारण लोग हैं अब भी हमें राजनीति के बारे में कोई जानकारी नहीं हैं। हम संगीतकार है जो धुन बनाया करते हैं। लेकिन लोकल कॉन्ग्रेसी हमारे घर आए और हमें कहा गया कि जैसा हम कहें वैसे ही करो और उनके पीछे, मेरे परिवार ने पीएम मोदी जैसे महान नेता के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था।’
उन्होंने आगे कहा कि हमें बहुत पछतावा है कि कॉन्ग्रेस के कहने पर हमारे परिवार में बुजुर्गों ने ऐसा किया। हमने पीएम मोदी द्वारा दिए गए महान सम्मान का अपमान किया, इसके लिए हमें खेद है। बिस्मिल्लाह ने आगे बताया, “हमारे परिवार को जानने वाले स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेताओं ने परिवार में बड़ों का ब्रेनवॉश किया और उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार करने को कहा। ये नेता मेरे दादाजी के समय से हमारे परिवार के करीब हैं और इसलिए मैं उनके नामों का खुलासा नहीं करना चाहता।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 अप्रैल को वाराणसी से नामांकन करेंगे। इससे पहले वह रोड शो भी करेंगे। वाराणसी में 19 मई को मतदान है। 2014 चुनाव में बिस्मिल्ला खां के बेटे दिवगंत जामिन हुसैन से BJP ने प्रस्तावक बनने का संपर्क किया था लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। उनका कहा था कि आजादी से लेकर आखिरी सांस तक उनके पिता ने सियासत से खुद को दूर रखा था।
आज (अप्रैल 11, 2019) सुबह AIUDF के प्रमुख बदरूद्दिन अजमल से जुड़ी एक खबर आई है। जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की। अजमल ने ढुभरी में रैली को संबोधित करते हुए कहा कि अगर एक बार वो चुनाव जीत जाते हैं तो वो प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और असम के मंत्री हिमंत बिस्वा को बांग्लादेश भेज देंगे।
यह पहली बार नहीं था कि विपक्ष के किसी नेता ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ऐसा ज़हर उगला हो। इससे पहले भी लोकतांत्रिक देश के कई तथाकथित राजनेताओं ने देश के पीएम के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिसे शायद 2014 से पहले केवल गलियों में घूमते लोफरों के मुँह से ही सुना जाता रहा।
वैसे तो मोदी को लेकर घटिया बयानबाजियों का दौर उनके प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के साथ ही शुरू हो गया था लेकिन 2019 के चुनाव करीब आते-आते तो मानो इस तरह के बयानों की झड़ी लग गई। इस दौर की शुरुआत इमरान मसूद के बोटी-बोटी वाले बयान से हुई थी, और आज ये कहानी पीएम को अनपढ़, जाहिल, धोबी का कुत्ता, नामर्द कहने तक पहुँच चुकी है।
मोदी सरकार के प्रति विपक्ष में इतनी नफरत और घृणा है कि शायद वो भूल चुके हैं कि पीएम पद की गरिमा को बनाए रखना सिर्फ़ मोदी का ही काम नहीं हैं। राजनीति में शब्दों के बाण शुरूआती समय से ही चलते आए हैं। लेकिन जिस नीचता पर आज राजनेता उतर आए हैं, वैसा इतिहास में कभी भी देखने को नहीं मिला था।
इसे मोदी का प्रभाव कहा जाए या मोदी के लिए नफरत, लेकिन जो राजनेता कुछ समय पहले तक समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ाते घूमते थे, वो अब खुद ही नैतिकता के सिद्धांत भूलकर, मोदी को गाली देने के लिए हर जनसभा, रैली में व्याकुल नज़र आते हैं।
बीते कुछ समय में अगर गौर किया जाए तो फारूक़ अब्दुल्ला, चंद्रबाबू नायडू, दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज़ नामों ने पीएम मोदी पर जमकर निशाना साधने के क्रम में मर्यादा की सभी सीमाएँ लाँघते नज़र आ रहे हैं। नीचता की हद को पार करने वाले इन राजनेताओं के कुछ बेलगाम-बेतुके बयानों के उदाहरण नीचे दिए गए हैं, देखिए ये सभी राजनेता राजनीतिक बयानबाजी के स्तर को किस रसातल में जाकर छोड़े हैं, इसे सिर्फ इनके बिगड़े बोल कहने से काम नहीं चलेगा।
चंद्रबाबू नायडू: पिछले महीने टीडीपी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली को संबोधित करते हुए PM को खूँखार उग्रवादी और देश में रहने लायक तक नहीं बताया था। इसके अलावा एक बार आँध्र के सीएम, मोदी की माँ पर सवाल उठाने के कारण भी आलोचनाओं का शिकार हुए थे, जिसमें उन्होंने पीएम से सवाल किया था कि “मुझे लोकेश के पिता, देवांश के दादा और भुवनेश्वरी के पति होने पर गर्व है, मैं आपसे (नरेंद्र मोदी से) पूछ रहा हूँ- आप कौन हैं?”
फारूक़ अब्दुल्ला: बालाकोट हमले के बाद देश में बहुत से राजनेताओं ने एयर स्ट्राइक के सबूत माँगकर IAF की बहादुरी पर सवाल उठाए, लेकिन इस बीच फारूक़ अब्दुल्ला एक ऐसी आवाज़ थे जिन्होंने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बयानबाजी करते हुए यह तक बोल डाला कि उन्हें शक हैं पुलवामा हमले पर…
मजीद मेमन: याकूब मेमन के वकील मजीद मेमन ने हाल ही में प्रधानमंत्री को लेकर कहा था कि वे एक अनपढ़, जाहिल और रास्ते पर चलने वाले व्यक्ति की तरह बात करते हैं। यहाँ मजीद का कहना था कि पीएम इतने बड़े पद पर बैठे हैं, उनका पद एक संवैधानिक पद है। उस संवैधानिक पद के लिए प्रधानमंत्री रास्ते में नहीं चुना जाता।
बी नारायण राव: एक तरफ़ जहाँ लोकतांत्रिक देश की सबसे सेकुलर पार्टी के प्रमुख लोग नागरिकों के बीच जाकर उन्हें उनके अधिकारों से परिचित करवा रहे हैं, वहीं उसी पार्टी के कुछ नेता देश के प्रधाममंत्री पर निजी टिप्पणी करने से भी नहीं चूँक रहे। हाल ही में कॉन्ग्रेस के विधायक बी नारायण राव ने मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि जो लोग शादी कर सकते हैं लेकिन बच्चे नहीं पैदा कर सकते, वे नामर्द हैं।
तनवीर हसन: प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में वंशवाद की आलोचना करते हुए एक ब्लॉग लिखा था जिस पर बार सांसद रह चुके तनवीर हसन ने कहा था कि चूँकि मोदीजी को आगे भी अपना वंश बढ़ाना नहीं है, इसीलिए वंशवाद की आलोचना करते हैं।
ओवैसी: AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के मोदी से मतभेद हमेशा उनके बयानों में झलकते रहे हैं। कुछ दिन पहले ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला था। हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी और वर्तमान सांसद ओवैसी ने पूछा, “जब पुलवामा का हमला हुआ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या बीफ बिरयानी खा कर सो रहे थे।”
पवन खेड़ा (कॉन्ग्रेस प्रवक्ता): कुछ समय पहले इंडिया टीवी पर एक डिबेट के दौरान कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने आवेश में आकर मोदी के अंग्रेजी शब्द का विच्छेद करते हुए उन्हें मसूद अज़हर, ओसामा बिन लादेन, दाऊद इब्राहिम और पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई बताया। इसके बाद जनता ‘शेम-शेम’ बोलती हुई खड़ी हो गई और कॉन्ग्रेस प्रवक्ता को दुत्कारा।
ये सिर्फ़ कुछ एक नेताओं की टिप्पणियाँ हैं। ऐसी अनेकों टिप्पणियाँ चुनाव के नज़दीक होने के कारण आए दिन दोहराई जा रही है। इन टिप्पणियों में धड़ल्ले से दलाल, हरामज़ादा, पूतना, दरिंदा, चोर, भड़वा, खूँखार उग्रवादी जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। कभी मोदी से उनकी मर्दानगी का सबूत माँगा जाता है, तो कभी उनकी बूढ़ी माँ को लेकर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। उनसे राफेल जैसे मुद्दों पर सवाल किया जाता है जिसकी क्लिन चिट खुद सुप्रीम कोर्ट मोदी सरकार को दे चुका है।
यहाँ मोदी पर हुई इन विवादित टिप्पणियों को हाईलाइट करने का मतलब ये बिलकुल भी नहीं हैं कि उन्होंने कभी किसी के लिए जनसभाओं में रैलियों में उपनाम (युवराज, नामदार, कामदार) नहीं बोले। लेकिन पीएम द्वारा चुने गए शब्दों में और उनके ख़िलाफ़ विपक्ष की टिप्पणियों में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में जमीन और आसमान का फर्क़ है।
संसद में सवाल पहले भी उठाए जाते थे, विपक्ष पहले भी मौजूद होता था, रैलियाँ-जनसभाएँ-चुनाव प्रचार पहले भी आयोजित होती थीं, लेकिन विपक्ष का इतना ओछा रूप कभी भी नहीं देखने को मिलता था। आज भावों को प्रकट करने के लिए शब्द की हर गरिमा को तार-तार कर दिया गया है। मोदी से घृणा करते हुए विपक्ष अब इतना आगे निकल चुका है कि सेना के पराक्रम पर सवाल भी उठाता है और माँ की ममता को भी राजनीति करार देता है।
दिल्ली में लोकसभा चुनाव के बीच आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई जारी है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक हथियार तस्कर को गिरफ्तार किया है। ये बदमाश अवैध रूप से हथियारों का जखीरा सप्लाई किया करता था। पुलिस पिछले 10 महीनों से इस शातिर बदमाश की तलाश में जुटी थी। इसका नाम मोहम्मद इसरार बताया जा रहा है।
इसरार अवैध रूप से हथियार की खरीद-बिक्री किया करता था। पुलिस ने इसके ऊपर एक लाख का ईनाम भी घोषित किया था। पुलिस से हुई पूछताछ के दौरान इसरार ने बताया कि वो मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के किसी जीत नाम के व्यक्ति से अवैध हथियार खरीदता था और फिर अपने आदमियों के जरिए दिल्ली और यूपी में संबंधित गिरोह को इसकी आपूर्ति किया करता था। पुलिस को इसरार की खोज मई 2018 से ही थी, जब इसके लिए काम करने वाले दो बदमाशों को पुलिस ने हिरासत में लिया था, जिसके पास से 21 पिस्टल और 42 मैगजीन बरामद हुआ था। उस समय भी पुलिस ने इसरार को खोजने की काफी कोशिश की थी, लेकिन अब जाकर पुलिस अपने मिशन में कामयाब हुई है।
एक कहानी कई बार कही जाती है सनातन धर्म के लोगों के बारे में। बताया जाता है कि इस्लामी लुटेरों और आतंकियों को यह बात समझ में आ गई थी कि भारत के हिन्दू गाय का बहुत सम्मान करते हैं। जबकि यहाँ के लोग लड़ने में सक्षम होते थे, फिर भी इस्लामी आक्रांताओं के इस जुगाड़ के कारण अपना सब कुछ खो देते थे। कहा जाता है कि लूटने से पहले ये लोग गायों की एक भीड़ छोड़ देते थे, और हिन्दू उन पर हथियार नहीं उठा पाता था, क्योंकि गौहत्या का पाप लगेगा।
हो सकता है कि यह कहानी सही हो। क्योंकि सदियाँ बीत गईं लेकिन इस तरह के विचारों को हम लोग आज तक अनजाने में ही आत्मसात किए चल रहे हैं। हिन्दू जनता सहिष्णुता का सबसे बड़ा उदाहरण होने के बावजूद असहिष्णुता के डिबेट में खींच लाई जाती है, और कुछ हिन्दू ही इस बात को सच भी मानने लगते हैं।
जिस धर्म के लोगों ने न तो किसी देश को लूटा, न किसी के मजहबी स्थलों को तोड़ा, न किसी देश-समाज के सामूहिक इतिहास को आग लगाई, जो भी आया, भले ही लुटेरा, हत्यारा और बलात्कारी हो, उसे यहाँ रहने दिया, उसके साथ रहे, उस धर्म की सहिष्णुता पर भी सवाल उठाए जाते हैं, पैनल डिस्कशन्स होते हैं, आम चर्चाएँ होती हैं, और हिन्दुओं को यह अहसास दिलाने के साथ-साथ विश्वास दिला दिया जाता है कि उनके पूर्वज और वो सबसे ज़्यादा असहिष्णु थे।
हिन्दू आतंक जैसे शब्द गढ़े जाते हैं, सामाजिक अपराधों को धार्मिक और राजनैतिक रंग दिया जाता है क्योंकि उसमें शामिल व्यक्ति हिन्दू था। जबकि उस अपराध को करने की पीछे की मंशा मानवीय गलती होती है, आपराधिक सोच होती है, न कि उसका हिन्दू होना। उदाहरण के लिए अगर कोई सीट के झगड़े में किसी को छुरा मार दे, तो ये एक सामाजिक अपराध है क्योंकि वहाँ झगड़े में धर्म या मज़हब शामिल नहीं। हाँ, अगर किसी हिन्दू को कोई कट्टरपंथी, या हिन्दू ही, उसके हिन्दू होने के कारण मार दे, तब वह एक धार्मिक अपराध हो जाएगा।
अब आइए आज के दौर में जबकि चुनाव प्रचार ज़ोरों पर है। सारी पार्टियाँ लगी पड़ी हैं, पीएम मोदी भी लगातार रैलियों और इंटरव्यू के माध्यम से अपनी बातें रख रहे हैं। उनकी बोली में शहज़ादा की जगह नामदार-कामदार ज़्यादा है, और पुलवामा से लेकर उरी तक का ज़िक्र है। बाकी पार्टियाँ, मुद्दों के अभाव में और अपनी हार को सामने देख कर मोदी पर निजी आक्षेप से होते हुए घटिया टिप्पणियाँ करने लगी हैं जिसमें मोदी को नामर्द बताने से लेकर उनकी पत्नी, उनकी माँ तक को घसीटा जा रहा है।
इस बात पर भी चर्चा होनी ज़रूरी है कि सोनिया गाँधी एक सांसद हैं, उन्होंने पार्टी चलाई है, यूपीए की चेयर पर्सन हैं, और कॉन्ग्रेस की अध्यक्षा थीं। प्रियंका गाँधी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उनके पति पर कई मामले चल रहे हैं। राहुल गाँधी पब्लिक लाइफ में हैं, घोटालों वाली पार्टी के मुखिया हैं, और कॉन्ग्रेस के मुख्य चुनाव प्रचारक भी (और भाजपा के भी) इसलिए मोदी या भाजपा का उनकी पार्टी, सोनिया, प्रियंका, वाड्रा पर हमला बोलना ज़ायज है। लेकिन मोदी की माँ या पत्नी तो कहीं पोलिटिकल सीन में हैं ही नहीं, फिर उन्हें किस लिहाज से इसमें घसीटा जा रहा है?
फिर भी, अगर शब्दों के चुनावों की बात करें तो मर्यादा का भार मोदी पर ही क्यों? जबकि बाक़ियों ने तो भाजपा पर हर दिन दंगे भड़काने से लेकर साम्प्रदायिकता और झूठे घोटाले का आरोप लगाया है, और गिरते-गिरते पत्नी, माँ के साथ मर्दानगी तक पहुँच गए। क्या मोदी के बच्चे न होना, उनका अपनी पत्नी से अलग रहना, माताजी से कभी-कभार मिलने जाने से देश की राजनीति पर कोई प्रभाव डालता है? मुझे नहीं लगता कि ऐसा होता है। लेकिन सत्ता की लगाम पकड़े सोनिया, राहुल, प्रियंका या वाड्रा के ज़मीन घोटाले, FTIL से संबंध, राफेल की जगह यूरोफाइटर की लॉबीइंग, अगस्टावैस्टलेंड घोटाले आदि का देश की राजनीति से सीधा संबंध है।
दूसरी बात आजकल खूब चल रही है कि मोदी ने सेना का राजनीतिकरण कर दिया है। पुलवामा और उरी के नाम पर वोट माँग रहे हैं। अब याद कीजिए गाय और इस्लामी आक्रांताओं वाली कहानी। लोग तुरंत मर्यादा और गरिमा को ले आते हैं कि सेना को इससे दूर रखा जाना चाहिए। मेरा सवाल यह है कि सेना तो दूर ही थी, सबूत किसने माँगे थे? चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो, एयर स्ट्राइक हो या कुछ और, सबूत माँगने वाली लॉबी में कौन नेता रहते हैं!
और हाँ, सेना को दूर क्यों रखें? कमरे में बैठे हम और आप यह सवाल तो पूछ ही लेते हैं कि आखिर पुलवामा हमला हुआ ही कैसे? जबकि, हम यह बात आसानी से भूल जाते हैं कि ऐसे कई हमले नहीं हुए क्योंकि सेना और सुरक्षा एजेंसियों ने उसे होने से रोका। वो ख़बर नहीं बनती क्योंकि बम तो फटा ही नहीं। दूसरी बात, लोन वूल्फ अटैक, यानी जब हमलावर एक ही हो, तब उसे ट्रैक करने में फ़्रान्स, ब्रिटेन से लेकर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका तक नाकाम रहे हैं, फिर भारत तो उनसे तकनीकी मामले में पीछे ही है।
चाहे ऑस्ट्रेलिया के रेस्तराँ में हुआ हमला हो, नीस-पेरिस-लंदन में कार, ट्रक या चाकू से लेकर मारने की आतंकी वारदातें हों, या ओरलैंडो के समलैंगिक बार में गोलियाँ बरसाता आतंकी, ये सब हमसे ज्यादा सक्षम देशों में हुआ है। ये हुआ है, ये होता है, और होता रहेगा क्योंकि आपको हर दिन हमला रोकना है, किसी को बस एक दिन सफल होना है। ऐसा नहीं है कि हमारे सैनिक सोए रहते हैं।
इसलिए, जब ऐसे हमले होते हैं तो स्वतः ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है, उसके लिए मोदी या राजनाथ सिंह को यह कहना नहीं पड़ेगा कि सरकार ज़िम्मेदारी लेती है। ज़ाहिर सी बात है कि जिस सरकार के अंदर यह घटना हुई उसकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन उसके बाद जो कार्रवाई होगी, उसकी ज़िम्मेदारी भी सरकार ही लेगी। इसलिए अगर छप्पन इंच का सीना नापा जाता है, तो फिर एयर स्ट्राइक का भी श्रेय सरकार को जाएगा।
इसलिए, रैलियों में यह बोला जाएगा, बार-बार बोला जाएगा क्योंकि हाँ, भारत के नागरिकों को पहली बार महसूस हो रहा है कि पाकिस्तान या बाहरी आतंकी मनमर्ज़ी से हमला कर के भाग नहीं सकते। यह सरकार उनकी सीमाओं को लाँघ कर निपटाएगी, बार-बार। इसलिए, जब जनता में क्षोभ हो कि हम इतने कमजोर क्यों है, तो जब सेना जवाब देगी तो प्रधानमंत्री की ड्यूटी है कि वह देश को आश्वस्त करे कि सक्षम नेतृत्व जनता की भावनाओं का सम्मान करती है, और बदला लिया जाएगा।
वैचारिक लड़ाई और भारतीयता पर दम्भ भरने का समय है यह
अगर विपक्ष सरकार को सेना का नाम लेकर नीचा दिखाते हुए, सेना को ही नीचा दिखाने लगे, तो सरकार को गाय की भीड़ को प्रणाम करने की ज़रूरत नहीं। वैचारिक लड़ाई ऐसे नहीं जीती जाती। वैचारिक लड़ाई में विरोधियों को उसी की भाषा में, उससे ज़्यादा तेज ज़हर से धावा बोला जाता है। यही कारण है कि मेरी सहमति हमेशा ऐसी हर सरकार को रहेगी जो सेना के योगदान को आम जनता तक लाता है। अगर संसद में जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है, और सेना उनकी सहमति से अपना कार्य करती है, तो सरकार सेना का नाम लेकर रैलियों में वाहवाही भी लूटेगी।
हम इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ भारतीयता का अहसास पहले जैसा नहीं है। हम एक झुके हुए राष्ट्र नहीं है। हमारे नेता को कोरिया से लेकर यूएई और रूस तक शांति और सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत कर रहा है। हमारे नेता को विश्व का हर देश जानता है, उसे अपने एक्सक्लूसिव क्लब में जगह दे रहा है। यह नया भारत है, और हर भारतीय को यह जानने का हक़ है कि आखिर नया भारत होता कैसा है।
इसीलिए, इस अहसास को हवा देकर ज़िंदा रखना ज़रूरी है। इस अहसास को पोषित करना ज़रूरी है। इसलिए, जब कोई पूछे कि मोदी सेना का राजनीतिकरण कर रहा है तो पूछिए कि क्यों न करे? सेना को स्वतंत्रता देने का कार्य अगर सरकार करती है, तो उसे भी क्रेडिट लेने का हक़ है। असली राजनीतिकरण तो वो लोग कर रहे हैं जो देश की इस पवित्र संस्था पर, अपने निजी और राजनैतिक हितों को साधने के लिए, सबूतों का बोझ डालते हैं।
मोदी ने तो जयकार लगाया है, घृणित कार्य तो राहुल, केजरीवाल, ममता, फ़ारूख, ओमर, नायडू, लालू, अखिलेश, मायावती, महबूबा से लेकर राजदीप, रवीश, सगारिका जैसे बकचोन्हर नेताओं और पत्रकारों ने लगाया है। ‘भारत माता की जय’ या ‘भारतीय सेना ज़िंदाबाद’ कहना सेना का राजनीतिकरण नहीं है, ‘उरी के सबूत लाओ’, ‘बालाकोट में तो पेड़ गिराए, सबूत दो’, ‘पुलवामा भाजपा ने ही करवाया’ आदि कहना उसका राजनीतिकरण है।
चूँकि, विपक्ष के लोग कह देते हैं कि राजनीतिकरण हुआ है, उससे वो हो नहीं जाता। इन चोरों की शक्लें देखा कीजिए जब ये ऐसी बेहूदगी करते हैं कि बालाकोट में तो कुछ हुआ ही नहीं। अगर आपको लगता है कि सेना के नाम पर राजनीति यह नहीं, बल्कि मोदी द्वारा सेना का अभिनंदन करना है, तो आप दिमाग का इलाज कराइए या फिर सही व्यक्ति से बात कीजिए।
इस देश के हर नागरिक को पचास बार यह सुनना चाहिए कि इस देश की पराक्रमी सेना ने मुंबई हमले के बाद भी एयर स्ट्राइक की अनुमति माँगी थी, जो मनमोहन ने नहीं दी। इसलिए, इस देश की जनता को पचास बार यह सुनना चाहिए कि तुमने जिसे सत्ता दी, उसमें यह हिम्मत थी कि पाकिस्तान को घुस कर मारे, बार-बार मारे, उसे अपाहिज बना दे, और वो उस हालत में पहुँच जाए कि उसे आकाश में अपने लड़ाकू विमानों की भी गर्जना सुनाई दे, तो उसकी पतलून यह सोचकर गीली हो जाए कि कहीं भारतीय सेना हमला तो नहीं बोल रही।
इसलिए, मर्यादा की बात रहने दीजिए। इस वैचारिक लड़ाई में, हर नियम तोड़े जाएँगे जो माओवंशियों और कॉन्ग्रेस के चोर नेताओं ने बनाए थे। चूँकि साठ साल से यही चल रहा था, तो ये सार्वभौमिक सत्य नहीं हो जाता। अब इतिहास और वर्तमान को नए सिरे से लिखा जाएगा, ताकि हमारा भविष्य बेहतर हो। हम इतिहास फिर से लिखेंगे क्योंकि चोरों और घूसखोरों ने इसे रेलवे स्टेशन पर बिकते उपन्यास की तरह लिखा है। ग़ुलामी की दास्ताँ पर तीन चैप्टर और गौरवगाथा एक पैराग्राफ़ में?
हर रैली में इस देश की जनता को अपने पराक्रमी सेना और सक्षम नेतृत्व की बातों को सुनने-जानने का हक़ है। पहले विपक्ष अपनी तरफ से व्यक्तिगत हमले बंद करे, मुद्दों पर लौटे, सेना पर प्रश्न उठाना बंद करे, तब स्वतः पब्लिक डिस्कोर्स साफ हो जाएगा। क्योंकि गंदगी फैलाने का काम इन्हीं लोगों ने किया है, मोदी तो सफ़ाई अभियान पर निकला आदमी है। सड़क पर कूड़ा फैलाओगे तो एक-दो बार तो झाड़ू खाना ही पड़ेगा।