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‘अमेठी में राहुल गाँधी की जान को खतरा, 7 बार सिर पर दिखी बंदूक वाली हरी लेजर लाइट’

कॉन्ग्रेस ने बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को अमेठी में नामांकन कराने पहुँचे पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की सुरक्षा सेंध के आरोप में गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में कॉन्ग्रेस के तीन वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र से जाँच और निगरानी की माँग की है। साथ ही पत्र में सुनिश्चित करने को कहा गया है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के सुरक्षा विवरण से संबंधित प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया जाए।

पत्र में दावा किया गया है कि जिस समय राहुल गाँधी अपना नामांकन भरने के बाद मीडिया से बात कर रहे थे उस दौरान उनके सिर पर 7 बार किसी ने हरी लेजर से निशाना साधा। कॉन्ग्रेस ने संभावना जताई कि यह लेजर लाइट किसी स्नाइपर की बंदूक से हो सकती है।

कॉन्ग्रेस का कहना है कि थोड़े-थोड़े समय में ऐसा कम से कम 7 अलग-अलग मौक़ों पर हुआ कि उनके सिर के पास हरी लेजर दिखी। इसमें दो बार ये लेजर उनके सिर के दाई ओर से लेजर देखने को मिली।

इस पत्र में कॉन्ग्रेस नेताओं ने सुरक्षा सेंध के कारण राहुल के पिता राजीव गाँधी और दादी इंदिरा गाँधी की मौत का भी हवाला दिया है। अहमद पटेल, जयराम रमेश और रणदीप सुरजेवाला द्वारा हस्ताक्षर किए गए इस पत्र में लिखा है कि राजनैतिक मतभेदों के अलावा सरकार और मंत्रालय की पहली जिम्मेदारी राहुल गाँधी की सुरक्षा होनी चाहिए, क्योंकि 2019 चुनाव के चलते उन पर जोखिम का ख़तरा है।

पाकिस्तान से बचकर आई ‘भारत की बेटी’ कर रही है नई शुरुआत, चुनाव के बाद बनेगी फिल्म

‘25 मई 2017 को पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त जे पी सिंह के प्रयासों से उज़्मा अहमद को भारत वापस लाया गया था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तब उज़्मा को भारत की बेटी कहा था। उज़्मा की दर्दभरी कहानी भी बड़ी अजीब है। 14 साल पहले पढ़ाई के लिए अपने परिवार को छोड़कर मलेशिया जाने का फैसला कितना गलत साबित होने वाला था इसका अंदाज़ा शायद उज़्मा को नहीं था।

मलेशिया में उज़्मा को एक टैक्सी ड्राइवर ताहिर अली से प्रेम हुआ जो मूलतः पाकिस्तानी था। वह उसे बहला फुसला कर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह के किसी गाँव में ले गया और जबरन बंदूक की नोक पर उससे निकाह किया। ताहिर उज़्मा को नींद की दवाइयाँ देता था, मारता पीटता था और जबरन यौन संबंध भी बनाता था। निकाह से पहले ताहिर के 4 बच्चे और थे। खैबर पख्तूनख्वाह के अनजान से गाँव बुनेर में उज़्मा का दम घुटता था। वहशी दरिंदे ताहिर के ज़ुल्मों से ऊबकर एक दिन उज़्मा ने उस जहन्नुम से भागने की ठानी। लेकिन उसे पकड़ लिया गया और अंतहीन यातनाएँ दी गईं।

उज़्मा ने फिर भी हार नहीं मानी और एक दिन भारतीय उच्चायोग पहुँचने में कामयाब हो गई। वहाँ जे पी सिंह ने उसकी की मदद करने की ठानी और भारत में विदेश मंत्रालय से संपर्क किया गया। तब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान के अधिकारियों से बातचीत कर उज़्मा अहमद को भारत लाने का रास्ता साफ किया।

अब उज़्मा अपनी बेटी संग दिल्ली के सीलमपुर इलाके में रहती है। वहाँ बेटी के नाम पर ही एक पार्लर चलाकर अपना गुजारा कर रही है और अपने माँ बाप परिवार सबकी यादों के सहारे जी रही है। उसके बाप NRI हैं और 14 सालों से उनसे कोई बातचीत नहीं हुई है। वह 27 साल की थी जब मलेशिया से ताहिर के साथ पाकिस्तान गई थी। अब इस दुनिया में उज़्मा का उसकी बेटी फलक के सिवा और कोई नहीं है जो उसके पहले शौहर की औलाद है। फलक को थैलेसेमिया नामक बीमारी है जिसके इलाज के लिए उज़्मा को काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

उज़्मा अहमद और जे पी सिंह के ऊपर एक बायोपिक बनने की भी खबर हैं जिसे फ़िलहाल चुनाव तक के लिए टाल दिया गया है।     

कॉन्ग्रेस को ‘चमार रेजीमेंट’ का समर्थन: दलितों को ‘दलित’ बनाए रखने की नई राजनीति

बीते दिनों बसपा सुप्रीमो मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण के बीच काफ़ी राजनीतिक खींचतान देखने को मिली थी। परिणाम स्वरूप भीम आर्मी प्रमुख ने समुदाय के सदस्यों से सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मसूद को वोट देने की बात कही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि ‘रावण’ के इस ऐलान से बसपा-सपा-रालोद के गठबंधन को झटका लग सकता है।

खबरों की मानें तो चंद्रशेखर ने यह ऐलान सोमवार (अप्रैल 8, 2019) की देर रात किया है। मायावती के समानांतर राजनीति करने वाले चंद्रशेखर हाल ही में चमार रेजीमेंट की माँग को लेकर चर्चा में आए थे। इस दौरान उन्होंने अखिलेश पर जमकर निशाना भी साधा था। दूसरी ओर खुद को मायावती का बेटा बताने वाले चंद्रशेखर ने उन्हें कुछ समय पहले मनुवादी भी करार दिया था। जिससे साफ़ जाहिर हो गया था कि वह सपा-बसपा के गठबंधन से नाखुश हैं। इन आरोपों के चलते मायावती ने उन्हें भाजपा का एजेंट बताते हुए कहा था कि वो दलितों के वोटों को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

ऐसी राजनीतिक छींटाकशी के बीच रावण का ऐलान दर्शाता है कि कभी खुद को चुनावों से दूर रखने की बात करने वाले के लिए आज सिर्फ़ राजनीति ही महत्वपूर्ण रह गई है। याद दिला दें कि कुछ समय पहले रावण ने अपने ही पूर्व बयान को झूठा साबित करते हुए ऐलान किया था कि ‘वो वहीं से चुनाव लड़ेगा, जहाँ से मोदी चुनाव लड़ेंगे।’ मोदी को लेकर नफरत और सपा-बसपा से चलती लगातार नाराज़गी का नतीजा यह निकला है कि चंद्रशेखर ने कॉन्ग्रेस पार्टी के उस मसूद को वोट देने की माँग की है, जिसने 2014 में पीएम के खिलाफ़ ‘बोटी-बोटी’ वाला बयान देकर सुर्खियों में जगह पाई थी।

याद दिला दें कि कुछ समय पहले भीम आर्मी के एक नेता ने बसपा-सपा कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया था कि उन्होंने रैली में चंद्रशेखर की तस्वीर लेकर आए कुछ दलितों के साथ मारपीट की और उनके पोस्टर फाड़ दिए थे। उन्होंने कहा था कि जब कोई भीम आर्मी के समर्थन में नहीं आया, तब मसूद ने उसकी मदद की थी।

अब ऐसे में सोचने वाली बात है कि हमेशा से दलित उत्थान पर बड़ी-बड़ी बात करने वाले चंद्रशेखर क्या वाकई में दलितों की स्थिति को लेकर गंभीर हैं? अगर हैं, तो फिर उन्होंने कॉन्ग्रेस को समर्थन देने का फैसला क्यों किया? क्योंकि भले ही मसूद ने उस समय आकर उनका समर्थन किया हो जब उनके साथ कोई नहीं था लेकिन यह भी तो सच है कि देश की सत्ता सबसे अधिक वर्षों तक कॉन्ग्रेस (जिससे मसूद जुड़े हैं) पार्टी के पास ही थी। लेकिन इस दौरान कभी भी पार्टी ने दलितों के उत्थान के लिए कोई कदम नहीं उठाया। कॉन्ग्रेस ने हमेशा देश में जाति/धर्म को आधार बनाकर लोगों में फूट डालने का प्रयास किया ताकि वो घृणा की भड़की आग में अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंकती रहे।

मसूद को समर्थन देना भावनात्मक तौर पर और निजी स्तर पर सही हो सकता है, लेकिन जब आप दलित संगठन के प्रमुख हों, और दलितों के अधिकारों की लड़ाई की बात करते हों, तब ऐसा कदम उठाना कहाँ तक उचित है… चंद्रशेखर का कॉन्ग्रेस को समर्थन देना दिखाता है कि वह केवल खुद को दलितों का हितैषी बताकर समाज में एक जाना-माना चेहरा बनकर उभरना चाहते थे। और अब जब वो उस मुकाम पर पहुँच गए हैं कि अस्पताल में भर्ती होने पर राज बब्बर और प्रियंका गाँधी जैसे बड़े लोग उनका हाल लेने पहुँच रहे हैं तो वो दलितों के मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ़ अपनी राजनीति साध रहे हैं।

वोटर ID कार्ड नहीं है तो भी कोई बात नहीं… बिना इसके भी कर सकते हैं मतदान, जानिए Process

साल 2019 में जिस लोकसभा चुनाव का इंतजार लंबे समय से सबको था, उसकी शुरुआत आज से हो चुकी है। मतदान के लिए चुनाव आयोग सभी मतदाताओं को मतदाता पहचान यानी वोटर आईडी जारी करता है। लेकिन अगर किसी कारण से वोटर के पास से उसका वोटर आईडी खो गया है, या उपलब्ध नहीं हैं तो ऐसे में उसको चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप बिना वोटर आईडी कार्ड के भी मतदान केंद्र पर जाकर अपना वोट देकर आ सकते हैं।

इसके लिए आपको सिर्फ़ करना यह है कि पहले ऑनलाइन पता करें कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं। अगर लिस्ट में नाम नहीं हैं तो आप वोट नहीं डाल सकते हैं। लेकिन अगर लिस्ट में नाम है तो आप लिस्ट की हार्ड कॉपी लेकर और दूसरे किसी आईडी प्रूफ के साथ बूथ पर जाकर वोट डाल सकते हैं।

बिना वोटर आईडी के मतदान के तरीके

निर्वाचन आयोग लगातार इस बात की कोशिशों में जुटा हुआ है कि पिछले चुनाव की तुलना में इस बार मतदान में ज्यादा से ज्यादा नागरिकों का योगदान हो। अगर आपने अपने निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज करवा लिया है, तो इसका मतलब है कि आपने अपना रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया है। ऐसी स्थिति में आप बिना वोटर कार्ड के मतदान भी कर सकते हैं।

कैसे पता लगाएँ कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं…

जैसा कि हमने ऊपर आपको बताया है कि अगर आपका वोटर आईडी कार्ड बना हुआ है और आप वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक करके मतदान करना चाहते हैं तो आप सबसे पहले https://www.nvsp.in लिंक को खोलें। इसके बाद बाईं तरफ (Search Your Name in Electoral Roll) पर क्लिक करें।

यहाँ क्लिक करने के बाद आप दो तरीकों से अपना नाम लिस्ट में चेक कर सकते हैं। पहला, अपनी जानकारी को दिए गए कॉलम में भरकर और दूसरा निर्वाचन कार्ड नंबर (EPIC) को डालकर, जोकि आपके वोटर आईडी कार्ड पर लिखा होता है।

पहला: EPIC नम्बर नहीं मालूम है तो…

NSVP के लिंक पर जाएँ फिर सर्च और डिटेल कॉलम पर क्लिक करें। अपनी जानकारी भरने के बाद आप कैपचा कोड को भरें और सर्च पर क्लिक कर दें। ऐसा करने के बाद अगर आपका नाम वोटर लिस्ट में दिखता है तो मतलब आप वोट देने जा सकते हैं।

दूसरा: अगर EPIC नम्बर पता है तो…

NSVP की वेबसाइट पर जाकर इलेक्टोरल सर्च पर जाएँ। इसके बाद यहाँ Search by EPIC No पर क्लिक करें और फिर अपना राज्य चुनें। इसके बाद कैपचा कोड को खाली स्थान में भरें और फिर सर्च पर क्लिक करें। अगर इतना करने के बाद आपको आपका नाम वोटर लिस्ट में दिखता है तो लिस्ट की हार्ड कॉपी लेकर अपना कीमती वोट देकर आएँ।

पोलिंग बूथ की जानकारी हेतु

इसके लिए आपको पहले NSVP की वेबसाइट पर जाकर इलेक्टोरल सर्च पर क्लिक करना होगा। फिर नागरिक सूचना के विकल्प पर जाकर बूथ पर क्लिक करें। यहाँ आपको पिता/पति में से किसी का नाम भरना होगा। इसके बाद कैपचा कोड भरें। आपको अपने पोलिंग सेंटर से जुड़ी अन्य सभी जानकारियाँ मिल जाएँगी।

वोटर आईडी कार्ड के अलावा इन दस्तावेजों के सहारे होगा मतदान

अगर ऊपर बताए तरीकों के जरिए आपने ‘ऑनलाइन मतदाता सूचना पर्ची’ का प्रिंट ले लिया है तो फिर इन 11 आईडी प्रूफ को साथ ले जाकर आप वोट देकर आ सकते हैं। इन 11 आईडी प्रूफ में आप – पैन कार्ड, आधार कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, केंद्र सरकार/राज्य सरकार/पब्लिक लिमिटेड कंपनी द्वारा जारी किया जाने वाला ड्यूटी आईकार्ड, बैंक या पोस्ट ऑफिस द्वारा जारी पासबुक/मनरेगा का जॉब कार्ड/ फोटो समेत पेंशन के कागज/श्रम मंत्रालय की स्कीम में जारी स्मार्ट कार्ड /श्रम मंत्रालय की स्कीम में जारी स्वास्थ्य बीमा स्मार्ट कार्ड/विधायक या सांसदों को जारी किए जाने वाले आधिकारिक कार्ड शामिल हैं।

₹8,58,650: रेगुलर काम-धंधा नहीं करने वाले ‘बेरोजगार’ कन्हैया कुमार की कमाई

कन्हैया कुमार जेएनयू के पूर्व छात्र हैं। फिलहाल बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार भी। कन्हैया कुमार ने कुछ दिन पहले बेगूसराय के जिला निर्वाचन कार्यालय जाकर अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है। उनके द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे [pdf] में, उनकी आय, संपत्ति और रोजगार संबंधी विवरण दिया गया है। और यही खुलासे का कारण है।

‘बेरोजगार’ कन्हैया का सबूत

खुलासा शब्द इसलिए क्योंकि कन्हैया कुमार ‘बेरोजगार’ हैं। मतलब वो कोई भी रेगुलर काम-धंधा नहीं करते हैं। खाने-पीने-पहनने भर की कमाई वो स्वतंत्र लेखन से करते हैं। एक किताब लिखी है उन्होंने – ‘बिहार से तिहाड़’ – इसकी रॉयल्टी और कुछ व्याख्यानों से मिले पैसों से ही उनका खर्चा चलता है।

‘बुरा बेटा’ कन्हैया कुमार

‘बेरोजगार’ कन्हैया की कमाई

‘बेरोजगार’ कन्हैया कुमार अब तक 8,58,650 रुपए की कमाई कर चुके हैं। 2017-18 में कन्हैया कुमार की आय 6,30,360 रुपए जबकि 2018-19 में उनकी आय 2,28,290 रुपए की रही। पिछले दो साल में बेरोजगारी के बावजूद 8 लाख रुपए से ज्यादा कमाने वाले कन्हैया अपने घर में एक गैस सिलिंडर तक नहीं खरीद कर दे पाते हैं अफसोस! श्रवण कुमार की धरती पर शायद ऐसे ही बेटों को ‘कपूत’ की संज्ञा दी जाती होगी। हालाँकि कन्हैया यह तर्क फिर से दे सकते हैं कि 3-4 दिन में खत्म हो जाने वाले सिलिंडर को वह साल भर में 100 से ज्यादा खरीदें तो कैसे खरीदें!

कन्हैया कुमार के हलफनामे पर गौर करें तो उनके पास नकद 24,000 रुपए, दो बैंक खातों में नकद 1,63, 648 रुपए और 50 रुपए के अलावा 1,70,150 रुपए की एक बीमा पॉलिसी भी है। उन्होंने बेगूसराय के अपने घर का बाजार मूल्य 2 लाख रुपए बताया है।

राष्ट्र विरोधी मामले में जमानत पर कन्हैया कुमार

बस जानकारी के लिए यह याद रखें कि कन्हैया कुमार फिलहाल बेल मतलब जमानत पर स्वतंत्र घूम पा रहे हैं। ‘टुकड़े टुकडे गैंग’ के कुख्यात लीडर कन्हैया पर 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्र विरोधी नारे लगाने का आरोप है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इस मामले में 1200 पन्नों का आरोप-पत्र भी दाखिल कर चुकी है।

चुनावी माहौल में यह भी याद रखें कि कन्हैया कुमार बेगूसराय से महागठबंधन के उम्मीदवार बनने वाले थे। लेकिन अपराधी लालू यादव की पार्टी आरजेडी और कॉन्ग्रेस के गठबंधन ने सीपीआई और सीपीआई-एम को एक भी सीट नहीं दी। बेगूसराय की संसदीय सीट पर अब कन्हैया कुमार का मुकाबला केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और आरजेडी के तनवीर हसन के साथ है। और इस लड़ाई में आँकड़ों की बात करे तो ‘बेचारे’ कन्हैया नंबर तीन पर फिसल गए हैं। खुद गाँव वाले कन्हैया कुमार की जगह मोदी-मोदी का जयकारा लगाए घूम रहे हैं।

वाराणसी में मोदी के ख़िलाफ़ कौन? 6 महीने जेल की सजा काट ‘काला इतिहास’ रचने वाला HC जज कर्णन

वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन ने नामांकन दाखिल करने का निर्णय लिया है। मद्रास और कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके कर्णन पहले ऐसे जज थे, जिन्हें पद पर रहते हुए अदालत की अवमानना का दोषी पाया गया था। जस्टिस कर्णन पहले ही मध्य चेन्नई लोकसभा सीट के लिए नामांकन दाखिल कर चुके हैं और वाराणसी दूसरा ऐसा क्षेत्र होगा जहाँ से वह चुनाव लड़ेंगे। कर्णन ने 2018 में एंटी-करप्शन डाइनेमिक पार्टी का गठन किया था। वो इसी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे। जून 2017 में रिटायर हुए कर्णन को 6 महीने जेल में गुज़ारने पड़े थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछली बार वाराणसी से रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी। 2014 के आम चुनाव में पीएम मोदी सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीत दर्ज करने वाले उम्मीदवार थे। कुल मतों का 56% से भी अधिक प्राप्त करने वाले मोदी को उस चुनाव में वाराणसी से 5,81,122 मत मिले थे जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी अरविन्द केजरीवाल 2,09,238 मतों दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें कुल मतों का 20.3% हिस्सा प्राप्त हुआ था। इस तरह नरेंद्र मोदी ने रिकॉर्ड 3,71,884 मतों से जीत दर्ज की। मोदी ने केजरीवाल को 36% मतों से हराया था।

अगर जस्टिस कर्णन की बात करें तो उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने इस सिलसिले में जस्टिस कर्णन की लिखी चिट्ठियों का स्वत: संज्ञान लेते हुए उनके ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना का मुक़दमा शुरू किया था। जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए कहा था:

“8 फरवरी 2018 से ही ये सात जज (जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे) मुझे कोई भी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य नहीं करने दे रहे हैं। इन लोगों ने मुझे परेशान कर दिया है और मेरा सामान्य जीवन खराब कर दिया है। इसलिए, मैं सभी सात न्यायाधीशों से मुआवजे के रूप में 14 करोड़ रुपये लेना चाहता हूँ।

तेज बहादुर यादव भी मोदी के ख़िलाफ़ मैदान में

वाराणसी में चुनाव प्रचार करते तेज बहादुर यादव

उधर बीएसएफ से बरख़ास्त तेज बहादुर यादव भी वाराणसी से मोदी के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे हैं। जिन्होंने बीएसएफ में रहते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से वीडियो बनाकर जवानों को दिए जाने वाली भोजन की गुणवत्ता को ख़राब बताया था। कुछ दिनों पहले उनके बेटे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। तेज बहादुर ने कहा कि क़रीब दस हज़ार पूर्व सैनिक वाराणसी आकर ‘नकली चौकीदार के ख़िलाफ़ घर-घर में प्रचार करेंगे। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की है। तेज बहादुर को अनुशासनहीनता का दोषी पाते हुए बीएसएफ से बरख़ास्त कर दिया गया था।

लालची और अविवेकी है AAP: गठबंधन की सारी उम्मीद खत्म, दिल्ली कॉन्ग्रेस ने लगाया आरोप

दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस के बीच गठबंधन नहीं होगा। AAP के संजय सिंह ने कहा, ”आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस में कोई गठबंधन नहीं होगा। कॉन्ग्रेस अव्यावहारिक समझौता करना चाहती थी, जो संभव नहीं।” अब नए राजनीतिक हालातों के बीच संभव है कि कॉन्ग्रेस जल्द ही अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करे। टाइम्स ऑफ इंडिया के सूत्रों के अनुसार, गुरुवार (अप्रैल 11, 2019) की शाम तक कॉन्ग्रेस सब कुछ साफ़ कर देगी। पार्टी आलाकमान ने दिल्ली यूनिट को कह दिया है कि वो राज्य की सभी सीटों पर त्रिकोणीय मुक़ाबले के लिए तैयार रहें और अपने सबसे बेहतर उम्मीदवारों की सूची तैयार करें। इस बीच गाँधी परिवार के वफादार अहमद पटेल ने दिल्ली कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष शीला दीक्षित से उनके आवास पर मुलाक़ात की। दोनों नेताओं ने आगामी रणनीति पर चर्चा की। 40 मिनट तक चली इस बैठक में संभावित उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा की गई।

असल में कॉन्ग्रेस की स्क्रीनिंग कमिटी ने दिल्ली की सभी सीटों के लिए 7 उम्मीदवारों के नामों की सूची आलाकमान को भेज दी थी लेकिन पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने उस सूची को रिजेक्ट कर दिया। पार्टी की केंद्रीय चुनावी समिति द्वारा अवलोकन के बाद हाईकमान को अब नए उम्मीदवारों की सूची भेजी जाएगी। आज शाम को कमिटी की बैठक होगी। इसी बैठक में हरियाणा के लिए भी उम्मीदवारों की सूची तैयार की जाएगी। पार्टी के एक सूत्र ने TOI से कहा:

“पार्टी आलाकमान से दिशा-निर्देश जारी हुआ है कि 2014 के आम चुनाव में हमारे जो भी उम्मीदवार हार गए थे, उन्हें इस साल फिर से मौक़ा दिया जाना चाहिए। अगर पिछले आम चुनाव का कोई उम्मीदवार उपलब्ध नहीं है या चुनाव नहीं लड़ना चाह रहा हो तो उसकी जगह कोई लोकप्रिय या जाने-पहचाने चेहरे को ही मौक़ा दिया जाना चाहिए। कम से कम पाँच पूर्व सांसदों को टिकट मिलने की उम्मीद है। पूर्वी दिल्ली में कोई नया उम्मीदवार खोजा जाएगा क्योंकि शीला दीक्षित के बेटे और 2004 एवं 2009 में चुनाव जीत चुके संदीप दीक्षित ने लड़ने से इनकार कर दिया है। उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में पिछली बार हार गई कॉन्ग्रेस उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं।”

कॉन्ग्रेस पार्टी यह मान कर चल रही है कि 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर बढ़ा है और अब आत्मविश्वास से भरी पार्टी पूरे जोशीले तरीके से चुनावी लड़ाई के लिए तैयार है। कॉन्ग्रेस ने केजरीवाल की पार्टी को लालची और अविवेकी बताते हुए कहा कि सीटों के बँटवारे पर उनके गलत रवैये के कारण सहमति नहीं बन सकी। एक वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने बताया कि कॉन्ग्रेस आम आदमी पार्टी की दिल्ली में 4 और हरियाणा में 1 सीट की माँग मान गई थी लेकिन केजरीवाल की माँगें बढ़ती चली गई। वरिष्ठ नेता ने आगे कहा:

“आप दिल्ली में बड़े भाई की भूमिका निभाना चाहती थी और पहले उसने 5 सीटों की माँग की, जिसे हमारे द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद उसने 4-2 के समीकरण की माँग की और 1 सीट पर दोस्ताना लड़ाई की बात कही लेकिन उनके इस प्रस्ताव को भी तुरंत नकार दिया गया। इसके बाद में 4-3 पर सहमत हुए लेकिन उन्होंने फिर यू-टर्न लेते हुए अन्य राज्यों में भी सीटों की माँग रख दी। मंगलवार को हुई बैठक में कॉन्ग्रेस हाईकमान ने आप के इस ऑफर को रिजेक्ट कर दिया”

गठबंधन पर दिल्ली कॉन्ग्रेस के नेताओं की राय विभाजित है। जहाँ एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष और तीन अन्य कार्यकारी अध्यक्ष आप के साथ गठबंधन के विरोध में हैं, तो दूसरी ओर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन व राज्य में पार्टी के प्रभारी पीसी चाको इस गठबंधन के पक्ष में हैं। गठबंधन की संभावनाओं से इनकार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री दीक्षित ने कहा कि गठबंधन पर असमंजस की स्थिति होने से पार्टी के कैडर में निराशा का माहौल था।

मोदी की सारी रैलियों पर रोक, चुनावों तक जलदस्यु बन कर रहें: EC और SC

बासी खबरों के अनुसार, विपक्षी दलों की लगातार शिकायतों के कारण चुनाव आयोग ने संज्ञान लेते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सारी रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले पर थोड़ा ढीला रुख़ अपनाते हुए, मोदी को राहत देते हुए जलदस्यु, यानी पायरेट या समुद्री लुटेरा, बन कर हिन्द महासागर की लहरों पर मछली मार कर जीवन व्यतीत करने का रास्ता सुझाया। उन्होंने कहा कि मोदी चाहे तो उन्हीं की अध्यक्षता वाली संविधान टेबल को अपील कर सकते हैं।

कोर्ट के अंदर बैठे सूत्रों ने ट्वीट करके जानकारी दी कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कमलनाथ जी के राज्य में पकड़े गए कैश से एक नाव बनाकर मोदी जी को देने की सिफ़ारिश की एवम् तत्काल ही उन्हें गोवा के रास्ते मैडागास्कर की तरफ निकल जाने को कहा। मोदी जी ने लाख बार ‘मित्रों’ कह कर गुहार लगाई लेकिन उनकी एक न सुनी गई।

वहीं चुनाव आयोग में इस बार ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी निवर्तमान प्रधानमंत्री को चुनाव प्रचार से रोक दिया गया हो। पहले विवेक ओबरॉय अभिनीत मोदी फिल्म पर रोक लगवाने के बाद विपक्षी दलों को यह तर्क सूझा कि अगर फिल्म पर रोक लगवाई जा सकती है, तो फिर आदमी पर क्यों नहीं। कॉन्ग्रेस की तरफ से सफ़ेद काग़ज़ का बंडल लेकर चले रणदीप सूरजेवाला ने चुनाव आयोग को बताया कि जब फिल्म के प्रदर्शन से लोगों के विचार बदल सकते हैं, तो फिर आदमी तो दिन में तीन रैलियाँ कर रहा है, उसका भी उपाय होना चाहिए।

चुनाव आयोग के कमिश्नर साहब ने इस पर थोड़ी देर विचार किया और कहा, “अगर सही तरीके से देखा जाए तो यह तर्क उचित लगता है। या तो हमें फिल्म को बैन नहीं करना चाहिए था, या फिर आदमी को भी बैन करना होगा।” यह सुनकर कपिल सिब्बल की आँखों में चमक आ गई और तत्काल ही उन्होंने राहुल गाँधी को अपनी आँख मारने वाली तस्वीर व्हाट्सएप्प कर दी।

जहाँ मोदी के विरोधियों में खुशी की लहर है, वहीं मोदी समर्थकों ने इस पर भारी नाराज़गी जताई है। हालाँकि, अमित शाह इस बात पर खासे खुश दिखे और कहा कि जल्द ही मैडागास्कर से लेकर मोज़ाम्बिक तक भाजपा के साढ़े तीन करोड़ नए सदस्य बनेंगे और हमारी सरकार वहाँ भी होगी।

एक समर्थक ने, नाम न बताने की शर्त पर, कहा, “देखिए, चाहे ये लोग जो भी कर लें, आएगा तो मोदी ही।” जब हमारे संवाददाता ने उनसे पूछा कि इसमें नाम छिपाने वाली बात क्या है, तो उन्होंने कहा कि उनके विश्वविद्यालय के कुछ बच्चे ढाबा पर उनके राजनैतिक झुकाव को लेकर उन्हें घेर लेते हैं, और डराते धमकाते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय का भी नाम लिखने से मना किया है।

राजनैतिक विश्लेषक और सामरिक मामलों के जानकार होने से लेकर वैज्ञानिक, शिल्पकार, गीतकार, नृत्य निर्देशक और समसामयिक विचारक अरविन्द शर्मा जी ने इस बात पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी, “आप देख सकते हैं कि विरोधियों में खुशी की लहर है, लेकिन खुशी की लहर से चुनाव नहीं जीते जाते। मोदी लहर चुनावों में बहुमत का जादुई आँकड़ा देते हैं। विपक्ष वाले इसी बात पर खुश हैं कि किसी भी बात की लहर तो उनकी तरफ है। आप देख लीजिएगा, इनकी खुशी की लहर दुःख की लहर में बदल जाएगी।”

मीडिया के कई हिस्सों में सुबह के चार बजे तक प्राइम टाइम होता रहा और रवीश जैसे तथाकथित पत्रकारों ने स्टूडियो से कैम्पेनिंग की शुरुआत करते हुए चार बजे सुबह प्राइम टाइम कर दिया। ख़बर है कि उनके गाँव के लोगों ने उन्हें बहुत भला-बुरा कहा क्योंकि चार बजे ब्रह्म मुहूर्त होता है, जब हिमालय से आने वाली हवा सीधे हमारे नाक में घुसती है, न कि प्राइम टाइम। उनके गाँव के लोगों ने कहा है कि अब वो रवीश का शो नहीं देखेंगे। वहीं, परसों तक दिन-रात मोदी को कोसने वाले जिस राजदीप ने कल पाला बदलकर मोदी की बड़ाई शुरु कर दी थी, आज फिर से ट्रैक बदल कर गिद्धों वाली मुस्कान के साथ वापसी की है और मोदी को आड़े हाथों लिया है।

हमारे संवाददाता ने चुनाव आयोग से पूछा कि पत्रकारों की कैम्पेनिंग पर रोक कब लगेगी तो उन्होंने माइक छीन कर तीन बार पूछा, “आर यू सीरियस? आर यू सीरियस? आर यू सीरियस।” हिन्दी पत्रकार को अंग्रेज़ी समझ में नहीं आई और वो माइक वापस माँग कर कॉन्ग्रेस मुख्यालय चला गया जहाँ राहुल गाँधी अपने कुत्ते से प्रेम करते पाए गए।

राहुल गाँधी ने कहा है कि मोदी जी चाहे कहीं भी चले जाएँ, वो उनसे हमेशा प्रेम करते रहेंगे। फिर उन्होंने अपने फोन पर एक विडियो दिखाया जिसमें कई सेलिब्रिटी सीरियस चेहरा बनाए चुटकुले सुना रहे थे जिसमें यूनेस्को द्वारा बेस्ट चुटकुला का अवार्ड पाए ‘नफ़रत की राजनीति’ वाला चुटकुला भी शामिल था। बॉलीवुड के नो वन गिव्स अ डैम क्वालिटी लेखक-कलाकार-सेलिब्रिटी समूह ने ट्वीट करते हुए कहा कि सोशल मीडिया के साथ-साथ मीडिया और फ़िल्मों में हर जगह मोदी के आने से उनके पहले से ही नाकाम करियर को मोदी ने और भी पीछे ढकेल दिया था। वो बस इसलिए ही खुश हैं कि कुछ दिन खबरों में उनका नाम भी होगा। जब उन्हें बताया गया कि उनके पूरे समूह में से बस दो लोगों के ही नाम हेडलाइन में आते हैं, तो वो लोग नाराज हो गए।

इस पूरे समूह ने इच्छा जताई कि उँगली पर खुद ही काली क़लम से निशान लगाने के बाद सेल्फी पोस्ट करने पर चुनाव आयोग को वैलिड वोट मान लेना चाहिए क्योंकि खलिहर होने के कारण उनके पास सिवाय ऐसे दो कौड़ी के स्टेटमेंट पर साइन करने के, कुछ खास काम है नहीं, अतः वो सनग्लासेज़ भी अफोर्ड नहीं कर पा रहे जो कि वोट करने जाने के लिए निहायत ही ज़रूरी है।

ख़बर के लिखे जाने तक प्रधानमंत्री मोदी जी ने चुनाव आयोग की टैक्निकैलिटी का फायदा उठाते हुए हर रैली की स्पीच पहले से ही रिकॉर्ड कर ली और होलोग्राम के ज़रिए संबोधन करने का फ़ैसला लिया है। चूँकि चुनाव आयोग ने उन्हें रैली करने से मना किया है, लेकिन उनके होलोग्राम पर कोई रोक नहीं, इसलिए भाजपा वालों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा। समर्थकों ने इसे अमित चाणक्य शाह का मास्टर स्ट्रोक कहा है जहाँ उनके अनुसार मोदी को सहानुभूति का भी फायदा मिलेगा और वोट भी।

जब आप यह ख़बर पढ़ रहे होंगे श्री मोदी जी विराट हिन्दू श्री जीवन दीप जी के जहाज ‘काले मोती’ पर होंगे।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने मसूद के लिए किया जैन मंदिर से किनारा, जैन समाज आक्रोशित

इंडिया टीवी की खबर के मुताबिक प्रियंका गाँधी वाड्रा सहारनपुर के एक जैन मंदिर का दौरा आखिरी समय में रद्द कर जैन समाज के निशाने पर आ गईं हैं। कॉन्ग्रेस महासचिव पार्टी के लोकसभा प्रत्याशी इमरान मसूद के समर्थन में रोडशो करने के लिए शहर में थीं।

पूजा की थाली ले खड़ी जनता, मसूद के लिए किया निराश?

रिपोर्ट के मुताबिक मंगलवार को प्रियंका गाँधी वाड्रा के रोडशो में भारी भीड़ उमड़ी थी, और श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर में उनके पूर्व-निर्धारित आगमन पर उनका स्वागत करने के लिए भी जैन समुदाय के उत्साहित लोग पूजा की थालियाँ ले उनका स्वागत करने को लालयित थे।

पर प्रियंका का कारवाँ मंदिर पर रुके बगैर आगे बढ़ गया, जिससे मंदिर प्रांगण में मौजूद जैन समाज में निराशा की लहर दौड़ गई। उसी दौरान रैली का माहौल ऐसा बदला कि उससे पहले तक कॉन्ग्रेस को वोट करने के लिए उत्साहित लोग ‘चौकीदार समर्थक’ नारे लगाने लगे। कईयों ने मौके पर ही अपना मत बदलकर मतदान भाजपा-मोदी को करने का ऐलान करना शुरू कर दिया।

जब संवाददाता ने लोगों से बात की तो प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि कॉन्ग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद ने सीधे-सीधे अपने ‘रथ’ से उतर कर मंदिर में जैन समाज से मिलने आने से मना कर दिया। यह माना जा सकता है कि श्रीमती वाड्रा भी अपने अल्पसंख्यक प्रत्याशी को ‘असहज स्थिति’ से बचाने के लिए मंदिर आने से बचतीं दिखीं।

सहारनपुर का वह जैन मंदिर, जिसे उम्मीद थी कि प्रियंका गाँधी-वाड्रा उसे निराश नहीं करेंगी

मोदी के टुकड़े करने वाले बयान से चर्चा में आए थे मसूद, हिन्दू वोट हो सकते हैं निर्णायक

सहारनपुर के कॉन्ग्रेस प्रत्याशी मसूद 2014 में तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे मोदी के टुकड़े कर देने की बात कहते अपने वीडियो से चर्चा में आए थे। कॉन्ग्रेस से पहले वह सपा में भी रह चुके हैं और उन पर 6 मुक़दमे दर्ज हैं।

महागठबंधन के भी फजलुर रहमान को उतारने से समुदाय विशेष वोटों के बंटने की सम्भावना बनती दिख रही है। इसीलिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी सहारनपुर के देवबंद में समुदाय विशेष को वोटों को न बँटने देने की अपील की थी।

यदि ‘सेक्युलर’ पार्टियों की यह ‘दुश्चिंता’ सही साबित हुई तो हिन्दू वोटों का झुकाव निर्णायक साबित हो सकता है। और ऐसी सूरत में कॉन्ग्रेस महासचिव का समुदाय विशेष को खुश करने के लिए मंदिर दर्शन से बचना उल्टा भी पड़ सकता है।

कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार ने उन्हें नोटिस भेजने के लिए उकसाया है: विवेक अग्निहोत्री

फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री को उनकी फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ की रिलीज से पहले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र द्वारा कानूनी नोटिस दिया गया है। विवेक अग्निहोत्री के अनुसार, लाल बहादुरी शास्त्री के पौत्र ने फिल्म को लेकर एक आपत्ति जताई है और इसकी रिलीज रोकने को कहा है।

फिल्म द ताशकंद फाइल्स का 7 अप्रैल को दिल्ली में प्रीमियर हुआ था। जिसे शास्त्री जी के पोते विभाकर शास्त्री और उनके परिवार के 25 लोगों ने देखा था। तब उन सभी को फिल्म पसंद भी आई थी, जबकि अब विभाकर शास्त्री ने लीगल नोटिस भेजा है। विभाकर, लाल बहादुर शास्त्री के बड़े बेटे के पुत्र हैं।

विवेक अग्निहोत्री की यह फिल्म लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन के कई अनछुए पहलुओं पर बनी है। लीगल नोटिस पर विवेक ने कहा, “हमें देर रात फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की माँग करने वाला कानूनी नोटिस मिला। 3 दिन पहले ही हमने दिल्ली में फिल्म की स्क्रीनिंग की थी, जिसमें उन्होंने (शास्त्री के पौत्र) फिल्म देखी थी और उन्हें फिल्म पसंद भी आई थी और उन्होंने उसकी तारीफ भी की थी।”

इसके साथ ही विवेक अग्निहोत्री ने कहा, “मुझे नहीं पता कि क्या हुआ, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार से किसी ने उन्हें हमें कानूनी नोटिस भेजने के लिए उकसाया है। यह कोई प्रोपगेंडा फिल्म नहीं है। मुझे नहीं पता कि लोगों को फिल्म से क्या दिक्कत है।”

विवेक ने कहा कि उन्होंने अभी नोटिस का जवाब नहीं दिया है लेकिन वो संवाददाता सम्मेलन करने की योजना बना रहे हैं। नोटिस में यह आरोप लगाया गया है कि फिल्म अनुचित और अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही फिल्म समाज के एक बड़े वर्ग की भावनाओं को आहत भी करेगी।

लीगल नोटिस मिलने के बाद विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया को एक्सक्लूसिव बयान देते हुए कहा:

“जैसा कि आप जानते हैं, हमारी फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ 12 अप्रैल को रिलीज होने वाली है। कल रात हमें एक क़ानूनी नोटिस भेजा गया है, जिसमें प्रमुख कॉन्ग्रेस सदस्य और पार्टी के पूर्व सचिव द्वारा फ़िल्म की रिलीज रोकने की माँग की है। नोटिस भेजने वाले कॉन्ग्रेस के सुप्रीम गाँधी परिवार के सहयोगी हैं और रिश्ते में दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते हैं। ये आश्चर्य की बात है क्योंकि 7 अप्रैल को पीवीआर में आयोजित फ़िल्म के दिल्ली प्रीमियर में उन्होंने ‘द ताशकंद फाइल्स’ देखी थी और फ़िल्म की प्रशंसा भी की थी।

उन्होंने मेरे से मुलाक़ात कर व्यक्तिगत रूप से फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ को सराहा था। मुझे पता चला है कि ये सब कॉन्ग्रेस की सुप्रीम फैमिली द्वारा करवाया जा रहा है। उन्हें ऐसा करने के लिए मज़बूर किया जा रहा है। शास्त्रीजी के पोतों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, शीर्ष परिवार द्वारा। आख़िर कॉन्ग्रेस नेता ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर वो क्यों फ़िल्म की रिलीज रोकना चाहते हैं? आख़िर क्यों वो लोग मुझे चुप कराना चाहते हैं?

मुझे लगातार धमकाया जा रहा है। फ़िल्म की रिलीज बाधित करने की धमकी दी जा रही है। यह एक दुर्लभ फ़िल्म है, जिसमें एक युवा पत्रकार ‘Right To Truth’ की चाह में विजेता बनकर उभरती हैं। वो लोग ऐसी फ़िल्म से क्यों डर रहे हैं जो नागरिकों के ‘Right To Truth’ की आवाज़ को उठाती है? मैं सभी पत्रकारों से निवेदन करता हूँ कि आप उन से पूछो कि उनको इस फ़िल्म से क्या दिक्कत है? इस फ़िल्म में ऐसा क्या है, जो वो इतने डरे हुए हैं?”