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BJP की टोपी और मुस्लिम लड़की कॉलेज से सस्पेंड: टाइम्स ऑफ इंडिया ने चलाई फर्जी खबर, घटिया प्रोपेगेंडा

Times Of India, देश के प्रमुख प्रकाशनों में से एक है, जिसे अक्सर फेक न्यूज़ फैलाते पाया गया है। एक बार फिर ऐसा ही कुछ हुआ जिसमें एक ख़बर को ग़लत तरीके से प्रचारित करने का प्रयास किया गया। मेरठ लॉ स्कूल की एक 22 वर्षीया छात्रा के संबंध में टाइम्स ने अपनी ख़बर में फिर से आधी-अधूरी जानकारी दी।

Times Of India के पत्रकार पीयूष राय ने मेरठ लॉ स्टूडेंट की एक ख़बर की जिसमें बताया गया कि बीजेपी की टोपी पहनने से मना करने के बाद एक छात्रा को कॉलेज से निलंबित कर दिया गया। अपनी इस झूठी ख़बर के ज़रिए पत्रकार ने भाजपा को निशाना बनाने को कोशिश की। उन्होंने आगे दावा किया कि जिन ‘कथित’ छात्रों ने उमाम खानम को कथित तौर पर ‘बीजेपी की टोपी पहनने से मना’ किया था, उन्हें भी निष्कासित कर दिया गया।

The Times Of India report

हालाँकि, Times Of India के पत्रकार द्वारा किए गए सभी दावे पूरी तरह से झूठे हैं। पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने इस बात की सच्चाई जानने के लिए कॉलेज का दौरा किया, जहाँ उन्होंने साथी सहपाठियों और कॉलेज के छात्रों से केवल यह जानने का प्रयास किया कि पत्रकार पीयूष राय द्वारा किए गए दावे जिनमें दोनों छात्रों के निष्कासन की बात कही गई थी वो कितने सच्चे और कितने झूठे हैं।

अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकारिता को आगे बढ़ाने की कोशिश में, पत्रकार पीयूष ने आगे आरोप लगाया कि 22 वर्षीया उमाम खानम को कॉलेज द्वारा निलंबित कर दिया गया, क्योंकि उसने कॉलेज ट्रिप में भाजपा की टोपी पहनने से इनकार कर दिया था जिसके लिए उसे अन्य छात्रों द्वारा परेशान भी किया गया। पीयूष राय के झूठे आरोपों को उस समय मुँह की खानी पड़ी जब ट्रिप पर गए अन्य छात्रों के साथ-साथ टीचर्स ने पत्रकार के दावों का खंडन किया और यह स्पष्ट रूप से कहा कि न तो बस में मौजूद छात्र शराब के प्रभाव में थे और न ही कोई भाजपा की टोपी पहने हुए थे।

इसके अलावा, कॉलेज के अधिकारियों ने उमाम खानम द्वारा की गई शिकायतों को देखने के लिए एक समिति बनाई। कॉलेज ने उन दो छात्रों को भी तुरंत निलंबित कर दिया, जिन पर कथित उत्पीड़न करने का आरोप लगाया गया था। हालाँकि, घटना के एक सप्ताह बाद भी, समिति द्वारा एक भी बैठक नहीं की जा सकी क्योंकि न तो पीड़िता और न ही अभियुक्त या उनके माता-पिता अपना बयान देने के लिए समिति के सामने उपस्थित हुए। इसलिए, कॉलेज ने 22 वर्षीया छात्रा को अगली सुनवाई तक निलंबित कर दिया।

OpIndia.com ने कॉलेज की एक छात्रा से बात की गई उसके अनुसार, शिक़ायत करने वाली उमाम खानम को कथित रूप से झूठे आरोप लगाने के लिए निलंबित कर दिया गया। सभी सबूत उसके ख़िलाफ़ थे और उसके पास कोई सबूत नहीं था जिससे उसके द्वारा लगाए गए आरोप सही साबित हो सकें।

2 अप्रैल को, उमाम खानम ने एक विवाद शुरू कर दिया था जब उसने अपने साथी छात्रों और अपने फैकल्टी के सदस्यों के ख़िलाफ़ परेशान किए जाने संबंधी गंभीर आरोप लगाए थे। अपने ट्वीट्स में खानम ने दावा किया था कि परेशान करने वाले छात्र शराब के नशे में थे।

खानम ने आरोप लगाया कि छात्रों ने उसे बीजेपी की टोपी पहनने के लिए मजबूर किया। इसी के लिए उसे परेशान किया गया क्योंकि खानम ने वो टोपी पहनने से इनकार कर दिया था। खानम ने अपने ट्वीट में यह भी लिखा कि जब वो छात्र उसे टोपी पहनने के लिए मजबूर कर रहे थे और परेशान कर रहे थे तो वहाँ मौजूद पुरुष अध्यापकों ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया।

हालाँकि, छात्रों के साथ ट्रिप पर जाने वाले शिक्षकों ने सभी आरोपों का खंडन किया था और ट्रिप के दौरान ऐसी किसी भी घटना से इनकार किया, जिसके आरोप 22 वर्षीया लॉ स्टूडेंट उमाम खानम ने लगाए थे।

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा की एक ग्राउंड रिपोर्ट में इस घटना से संबंधित एक और रोचक जानकारी सामने आई है क्योंकि लगभग 35 छात्र, जो कथित पीड़िता खानम के सहपाठी भी थे, ने स्पष्ट तथ्यों द्वारा समर्थित कहानी यानी इस घटना पर अपना पक्ष साझा किया।

कई अन्य छात्र भी स्वराज्य के लिए अपनी गवाही देने के लिए आगे आए कि कैसे उमाम एक ‘धार्मिक कट्टरपंथी’ है जिसने ‘शेहला राशिद और अरफा ख़ानम की गुड बुक में शामिल होने के लिए’ ऐसा किया।

उमाम खानम की सहपाठी ने साझा किया था स्क्रीनशॉट

उमाम की सहपाठी ज्योति सिंह ने उमाम खानम के खिलाफ अपने दावों को मजबूत करने के लिए उमाम के सोशल मीडिया पोस्ट के कई स्क्रीनशॉट भी लिए। उमाम ने एक दिन में तीन सौ ट्वीट डिलीट किए। हम उनमें से कई के स्क्रीनशॉट लेने में कामयाब रहे। ज्योति ने होली से जुड़ी एक और घटना साझा की। “अमित और अंकुर ने उस पर रंग लगाया। जब तक रंग सफेद और हरा था, वह ठीक थी। जिस क्षण उन्होंने उस पर केसरिया रंग डाला, और उन्होंने अनजाने में ऐसा किया, उसने कहा कि यह ठीक नहीं किया गया और रोना शुरू कर दिया।

ज्योति ने कहा, “वह हमेशा अपने धर्म के बारे में बात करती रही है। एक बार हमारे एक सीनियर जो कि एक मुस्लिम हैं और बहुत धर्मनिरपेक्ष हैं, ने कहा कि वह किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करते, उस दिन उमाम इतना पागल हो गई कि वह वहाँ से बाहर निकल गई और आज तक, वह उनसे बात नहीं करती है।”

स्वराज्य टीम ने घटना के उसके पक्ष को सुनने के लिए उमाम तक पहुँचने की कोशिश की, जिसने कहा कि वह केवल फोन पर बात कर सकती है क्योंकि वह कॉलेज नहीं जाएगी।

जब इस बारे में सवाल किया गया कि कोई चश्मदीद गवाह क्यों नहीं है, तो उमाम ने कहा कि वह अपनी शिकायत पर अडिग है। यह पूछने पर कि उसके सहपाठी उसके खिलाफ अभियान क्यों चला रहे हैं, उमाम ने कहा कि उसके खिलाफ एक साजिश चल रही है। रिपोर्टर ने उमाम के ट्वीट्स और लिखित कम्प्लेन में विसंगति पर सवाल उठाया और पूछा कि लिखित शिकायत कम्प्लेन में उसकी मुस्लिम पहचान का कोई उल्लेख नहीं था, उसने कहा कि वह ऐसा महसूस करती है और अपनी शिकायत पर अडिग है। हालाँकि, उमाम ने यह पता चलने के बाद कॉल काट दिया कि रिपोर्टर स्वराज्य के लिए काम करती है।

एक अन्य छात्र ने यह भी कहा कि उमाम एक धार्मिक कट्टरपंथी है। उन्होंने कहा है कि उमाम बहुत ही रूढ़िवादी है, उसने दाऊद इब्राहिम को भारत के ‘बाप’ के रूप में संदर्भित किया था और चाहती थी कि मोदी को भी लिंच किया जाए। उनके सहपाठियों में से एक ने यह भी कहा कि उमाम ने शरिया कानूनों का समर्थन किया था, गौ-मूत्र पर चुटकुलों का समर्थन किया था और हर किसी को अंध भक्त और हिंदुत्व टाइप कहा था जो उससे असहमत थे।

सत्तारूढ़ भाजपा और हिंदुओं को निशाना बनाने की जल्दबाजी में, टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार ने भाजपा को बदनाम करने के लिए ऐसी घटिया प्रोपेगेंडा का सहारा लिया है कि यात्रा के दौरान किसी तरह की उत्पीड़न की रिपोर्टिंग में बुनियादी पत्रकारिता की नैतिकता का पालन किए बिना या कम से कम दूसरे को सुने बिना ही ऐसी फर्ज़ी कहानी छाप दी।

‘The Tashkent Files की रिलीज रोक रही कॉन्ग्रेस की सुप्रीम फैमिली’, विवेक अग्निहोत्री को नोटिस और धमकी

12 अप्रैल को रिलीज हो रही फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस पूरी जद्दोजहद कर रही है। इसके लिए निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को लीगल नोटिस भी भेजा गया है। बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री और उनके नाती संजय नाथ सिंह फ़िल्म के समर्थन में खड़े हैं। ट्रेलर लॉन्च के मौके पर संजय नाथ सिंह ने कहा भी था कि लाल बहादुर शास्त्री का पार्थिव शरीर जब दिल्ली लाया गया था तब किसी ने आकर उनके मुँह पर चन्दन मल दिया था। विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने इस पर कुछ सुलगते हुए सवाल भी दागे थे। विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया को इंटरव्यू देते हुए कई सवालों के जवाब दिए थे। उसमें उन्होंने कहा था कि वामपंथियों को ‘द ताशकंद फाइल्स’ ज़रूर देखनी चाहिए।

ट्रेलर लॉन्च के मौके पर पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री के बड़े बेटे अनिल शास्त्री ने अपने पिता की तुलना वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तुलना की थी। हाल ही में ऑपइंडिया ने ‘द ताशकंद फाइल्स’ का रिव्यु भी प्रकाशित किया था, जिसमें फ़िल्म के सभी आयामों की समीक्षा करते हुए बताया गया था कि ये वास्तविकता पर आधारित फ़िल्म है जिसमें तथ्यों से छेड़छाड़ नहीं की गई है। फ़िल्म में इंदिरा गाँधी का नाम नहीं लिया गया है और तथ्यों को दर्शकों के समक्ष रखते हुए चीजें उनके विवेक पर छोड़ दी गई हैं। लेकिन, बेचैन कॉन्ग्रेस इसकी रिलीज रुकवाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। ऊपर आप निर्देशक अग्निहोत्री को भेजी गई लीगल नोटिस को डाउनलोड कर के पढ़ सकते हैं।

लीगल नोटिस मिलने के बाद विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया को एक्सक्लूसिव बयान देते हुए कहा:

“जैसा कि आप जानते हैं, हमारी फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ 12 अप्रैल को रिलीज होने वाली है। कल रात हमें एक क़ानूनी नोटिस भेजा गया है, जिसमें प्रमुख कॉन्ग्रेस सदस्य और पार्टी के पूर्व सचिव द्वारा फ़िल्म की रिलीज रोकने की माँग की है। नोटिस भेजने वाले कॉन्ग्रेस के सुप्रीम गाँधी परिवार के सहयोगी हैं और रिश्ते में दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते हैं। ये आश्चर्य की बात है क्योंकि 7 अप्रैल को पीवीआर में आयोजित फ़िल्म के दिल्ली प्रीमियर में उन्होंने ‘द ताशकंद फाइल्स’ देखी थी और फ़िल्म की प्रशंसा भी की थी।

उन्होंने मेरे से मुलाक़ात कर व्यक्तिगत रूप से फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ को सराहा था। मुझे पता चला है कि ये सब कॉन्ग्रेस की सुप्रीम फैमिली द्वारा करवाया जा रहा है। उन्हें ऐसा करने के लिए मज़बूर किया जा रहा है। शास्त्रीजी के पोतों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, शीर्ष परिवार द्वारा। आख़िर कॉन्ग्रेस नेता ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर वो क्यों फ़िल्म की रिलीज रोकना चाहते हैं? आख़िर क्यों वो लोग मुझे चुप कराना चाहते हैं?

मुझे लगातार धमकाया जा रहा है। फ़िल्म की रिलीज बाधित करने की धमकी दी जा रही है। यह एक दुर्लभ फ़िल्म है, जिसमें एक युवा पत्रकार ‘Right To Truth’ की चाह में विजेता बनकर उभरती हैं। वो लोग ऐसी फ़िल्म से क्यों डर रहे हैं जो नागरिकों के ‘Right To Truth’ की आवाज़ को उठाती है? मैं सभी पत्रकारों से निवेदन करता हूँ कि आप उन से पूछो कि उनको इस फ़िल्म से क्या दिक्कत है? इस फ़िल्म में ऐसा क्या है, जो वो इतने डरे हुए हैं?”


विवेक अग्निहोत्री को भेजे गए लीगल नोटिस का एक अंश

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आज बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को निर्देशक विवेक अग्निहोत्री द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति स्पष्ट की जाएगी। फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में मिथुन चक्रवर्ती, श्वेता बासु प्रसाद और नसीरुद्दीन शाह सहित कई बड़े अभिनेता-अभिनेत्री हैं। फ़िल्म को समीक्षकों द्वारा भी सराहा गया है।

कॉन्ग्रेस को अस्तित्व में लाने की बहुत कोशिश की… 15 साल तक कोई उम्मीद तो नहीं दिखती: पूर्व कॉन्ग्रेसी नेता

बीते कुछ समय में कॉन्ग्रेस पार्टी की बिगड़ी स्थिति किसी से छिपी नहीं है। एक तरफ जहाँ चुनावों के मद्देनजर आए दिन भाजपा में किसी न किसी नेता के शामिल होने की खबरें आती हैं, वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी से बड़े-बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने की खबरें भी सुनने को मिलती है। कॉन्ग्रेस की कमियों के कारण उसका दामन छोड़ने की लिस्ट में कई कद्दावर नेताओं के नाम भी शामिल हैं। इसमें एक नाम आँध्र प्रदेश में तीन बार विधायक रह चुके कोटला जयसूर्या प्रकाश रेड्डी का भी है। जयसूर्या, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कोटला विजय भास्कर रेड्डी के बेटे हैं। उन्होंने हाल ही में कॉन्ग्रेस को छोड़ कर टीडीपी का हाथ थामा है। और एक बार फिर वह करनूल से अपनी किस्मत आजमाने को तैयार हैं।

जयसूर्या प्रकाश के इस फैसले के बाद और चुनावों से ठीक पहले उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने इंटरव्यू में कॉन्ग्रेस छोड़ने के पीछे की वजह बताई। इस साक्षात्कार में जयसूर्या ने बताया कि उन्हें करनूल के किसानों की चिंता है। उन्होंने कहा कॉन्ग्रेस की छोटी-छोटी गलतियों के कारण राज्य में अब पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा है। जयसूर्या ने कहा कि उन्होंने पार्टी की हालत सुधारने की कोशिश लगभग साढ़े 4 साल तक की। लेकिन जब कोई भी उम्मीद नहीं बची… तब उन्होंने दुखी होकर कॉन्ग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक सफर पर विराम लगाने की सोची, साथ ही राजनीति से भी संन्यास लेने का मन बना लिया था। लेकिन लोगों ने उन्हें राजनीति छोड़ने से मना किया। बाद में उन्होंने चंद्र बाबू नायडू से मिलकर टीडीपी जॉइन की।

कॉन्ग्रेस छोड़ने वाले सवाल पर उन्होंने आँध्र प्रदेश के विभाजन का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के लोगों को अब भी लगता है कि कॉन्ग्रेस ने आँध्र प्रदेश के साथ अन्याय किया है। लंबे समय से कॉन्ग्रेस से जुड़े रहने के बावजूद जयसूर्या खुद स्वीकारते हैं कि ग्रामीण इलाकों में लोग अब खुलेआम ‘नो कॉन्ग्रेस’ कहते हैं। रेड्डी बताते हैं कि लोग उनकी छवि को हाथ (कॉन्ग्रेस) का पर्याय समझते हैं। जिसकी उन्हें बहुत चिंता है। वो उन्हें समझाने की कोशिश में जुटे हुए हैं कि उन्होंने पार्टी बदल ली है।

इस साक्षात्कार में रेड्डी ने कहा कि कॉन्ग्रेस की नीतियाँ बिल्कुल भी सही नहीं हैं। कॉन्ग्रेस को लगता है कि उन्हें काम करने की क्या जरूरत है। लोग इंतजार करेंगे और 10 साल बाद खुद उनके पास वापस लौट आएँगे।

इस साक्षात्कार में रेड्डी ने पार्टी बदलने के कारण अपने नाम की विश्वसनीयता पर पड़े प्रभाव को लेकर कहा कि जनता बुद्धिमान है। जनता को मालूम है कि उन्होंने टीडीपी इसलिए जॉइन की है ताकि वो किसानों का भला कर सकें। उनका कहना है कि 85 प्रतिशत करनूल के लोग खेती पर आश्रित हैं। उनकी मानें तो उन्होंने ये फैसला अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं से बातचीत के बाद लिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी बदलने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं था और अब कॉन्ग्रेस के लौटने के चांस नहीं हैं।

जयसूर्या से जब यह पूछा गया कि क्या उन्होंने पिछले साढे़ चार सालों में राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी से मिलकर अपनी परेशानी बताने का प्रयास किया? तो जयसूर्या ने बड़ा ही तालमेल बिठा के जवाब देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उन्होंने सितंबर 2018 में करनूल में राहुल गाँधी को रैली संबोधित करने के लिए बुलाया था। उन्होंने नेता के रूप में राहुल को और उनके परिवार को अच्छा बताया, लेकिन साथ मे ये बार-बार कहा कि आँध्र प्रदेश के विभाजन के बाद से कुछ ऐसी चीजें हुई हैं, जिसने लोगों को ‘नो कॉन्ग्रेस’ कहने पर मजबूर कर दिया है। उनकी मानें तो कॉन्ग्रेस को आँध्र प्रदेश में लौटने में अब कम से कम 15 साल लगेंगे।

यहाँ बता दें कि साल 2013 में कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए तेलंगाना को आँध्र प्रदेश से अलग कर दिया था। जिसे लेकर वहाँ के लोगों में खासी नाराजगी है। जयसूर्या का यह इंटरव्यू साबित करता है कि आँध्र प्रदेश में न केवल जनता बल्कि वहाँ के नेता भी पार्टी से असंतुष्ट हैं।

SC में लालू की ज़मानत के लिए गिड़गिड़ाए कपिल सिब्बल, CJI ने कहा – अपराधी है आपका क्लाएंट

चारा घोटाला में दोषी पाया गया और राँची में सजा काट रहा बिहार का पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के वकील ने ज़मानत के लिए कोर्ट में गुहार लगाई। लालू की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उसका वकील कपिल सिब्बल CJI रंजन गोगोई के समक्ष पेश हुए। कपिल सिब्बल ने अदालत में लालू की तरफ से ज़िरह की। इस से पहले सिब्बल अनिल अम्बानी के लिए भी पैरवी कर चुके हैं। एक ही दिन में उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अनिल अम्बानी पर तथाकथित राफेल घोटाले में शामिल होने का आरोप भी लगाया था और फिर एरिक्शन मामले में उसी दिन अम्बानी की तरफ से अदालत में पेश भी हुए थे। सिब्बल राम मंदिर के विरोधी पक्ष की तरफ से भी अदालत में पैरवी कर चुके हैं।

सिब्बल के माध्यम से लालू यादव ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, “अगर मुझे ज़मानत पर रिहा किया तो मैं भाग नहीं जाऊँगा। मेरे निवेदन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अगर मुझे ज़मानत पर रिहा किया जाता है तो इसमें ख़तरा ही क्या है?” लालू की इस अपील के जवाब में सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा, “कोई ख़तरा नहीं है सिवाए इसके कि तुम दोषी करार दिए जा चुके हो। हम ऐसा नहीं सोचते कि तुमको ज़मानत पर रिहा किया जाएगा। तुम्हारी ‘Special Leave Petition’ को खारिज किया जाता है।

इससे पहले सीबीआई ने लालू यादव की ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि उसे किसी भी क़ीमत पर अपनी राजनीतिक गतिविधियों को संचालित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। सीबीआई ने कहा कि अगर लालू यादव को मिली सारी सज़ाओं को एक साथ रखें तो उसको मिली सजा कुल 27.5 वर्ष हो जाती है। सीबीआई ने कहा कि लालू द्वारा बिहार का मुख्यमंत्री रहते की गई कुटिल और बेईमान हरकतों ने पूरे देश की अंतश्चेतना को हिला कर रख दिया था।

सीबीआई ने कहा कि लालू स्वास्थ्य कारणों का बहाना बनाते हुए ज़मानत की माँग कर अदालत को गुमराह कर रहा है। वैसे भी देखा जाए तो लालू अपना अधिकतर सज़ा-काल राँची स्थित अस्पताल RIMS में ही गुज़र रहा है, जहाँ उससे मिलने कई विपक्षी नेता भी पहुँचते रहते हैं। अभी हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद सुप्रीमो लालू यादव पर बड़ा आरोप लगते हुए कहा था कि वह जेल से ही चुनाव को प्रभावित कर रहा है। इसके बाद सूचना मिलते ही सिटी एसपी व सदर डीएसपी के नेतृत्व में पुलिस ने लालू यादव के पेइंग वार्ड की गहन तलाशी ली थी। झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी कहा था कि लालू से मिलने आने वाले लोगों के लिए जेल के नियम ताक पर नहीं रखे जा सकते।

जनवरी में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माँझी लालू से मिलने पहुँचे थे। जदयू के पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा से अयोग्य करार दिए गए शरद यादव भी लालू से मिले। फरवरी में पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश साहनी ने लालू के साथ बैठक की। सजा के बावजूद लालू यादव उम्मीदवार चुनने से लेकर पार्टी के आंतरिक निर्णयों तक, सभी चीजों पर नेताओं से मिलकर सलाह देता है और अपनी राजनीति चला रहा है। पिछले कुछ सप्ताह में विधायक भोला यादव और वामपंथी नेता सीताराम येचुरी, डी राजा ने भी लालू से मुलाक़ात की।

600 वामपंथी कलाकारों के विरोध पर भारी रजनीकांत का BJP संकल्प-पत्र को समर्थन, किया वाजपेयी को याद

सुपरस्टार रजनीकांत ने भाजपा के घोषणापत्र की प्रशंसा की है। बता दें कि भाजपा द्वारा ज़ारी किए गए ‘संकल्प पत्र’ में कहा गया है कि जल प्रबंधन के लिए एक नया मंत्रालय बनाया जाएगा। सामाजिक मुद्दों पर हमेशा से मुखर रजनीकांत ने भाजपा द्वारा नदियों को जोड़ने की घोषणा का स्वागत किया है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में लिखा है कि नया जल प्रबंधन मंत्रालय देश के अलग-अलग हिस्सों में देश की बड़ी नदियों को जोड़ने का अटल जी का सोचा हुए महत्वकांक्षी कार्यक्रम को द्रुत गति से आगे बढ़ाएगा, जिससे कि पीने योग्य पानी और सिंचाई समस्या का समाधान हो। साथ ही भाजपा ने ‘जल जीवन मिशन’ के तहत ‘नल से जल’ कार्यक्रम के माध्यम से 2024 तक हर घर को नल का पानी उपलब्ध कराने की बात कही है।

भाजपा के ‘संकल्प पत्र’ में जल शक्ति

जल के क्षेत्र में इस तरह के कार्यों की घोषणा से ख़ुश 69 वर्षीय सुपरस्टार ने कहा कि वो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही नदियों को जोड़ने (Interlinking of the Rivers) वाली परियोजना के लिए वकालत करते आए हैं। उन्होंने कहा कि अटल जी ने उनकी इस सलाह को स्वीकार किया था। उन्होंने कहा “भाजपा ने इस योजना को चालू करने की बात कही है। अगर ऐसा होता है तो जनता ख़ुश होगी।” रजनीकांत ने कहा कि इससे किसानों को तो फ़ायदा होगा ही, साथ ही ग़रीबी मिटाने में भी ये सहायक सिद्ध होगा।

पिछले 6 महीनों में अपनी दो फ़िल्मों (2.0, पेट्टा) से भारतीय सिनेमा को एक हज़ार करोड़ का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन दे चुके रजनीकांत के इस बयान को उन 600 कलाकारों के बयान पर भारी माना जा रहा है, जिन्होंने भाजपा के ख़िलाफ़ वोट देने की अपील की है। हालाँकि, रजनीकांत ने आगामी चुनाव में किसी भी पार्टी का समर्थन न करने की भी बात कही है लेकिन उन्होंने राज्य की जनता से उसी पार्टी को वोट देने को कहा जो जल संकट का स्थायी हल निकाल सके।

बता दें कि अमोल पालेकर और नसीरुद्दीन शाह सहित 600 कलाकारों, लेखकों और थिएटर से जुड़े लोगों ने पत्र लिखकर भाजपा को सत्ता से बाहर करने की अपील की है। संयुक्त बयान में इन कलाकारों ने कहा:

“आज भारत का विचार ख़तरे में है। आज गीत, नृत्य और हँसी ख़तरे में है। आज हमारा प्रिय संविधान ख़तरे में है। सरकार ने उन संस्थानों का दम घोंट दिया है जहाँ तर्क, बहस और असंतोष पर बात हो सकती थी। लोकतंत्र का सबसे कमज़ोर व्यक्ति हाशिए पर है। उसे सशक्त बनाना होगा। किसी भी लोकतंत्र में सवाल, बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र जीवंत विपक्ष के बिना काम नहीं कर सकता। लेकिन मौजूदा सरकार इस सब को नष्ट कर रही है।”

अगर प्रोफेसनल फ्रंट पर बात करें तो रजनीकांत अभी अपनी फ़िल्म ‘दरबार’ की तैयारी में व्यस्त हैं। अक्षय कुमार की ‘हॉलिडे’ और आमिर खान की ‘गजनी’ का निर्देशन कर चुके प्रसिद्ध निर्देशक एआर मुर्गदास इस फ़िल्म के डायरेक्टर हैं। दक्षिण भारत की लोकप्रिय अभिनेत्री नयनतारा इस फ़िल्म में उनके साथ काम करेंगी। नयनतारा उनके साथ ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ‘चंद्रमुखी (2006)’ में भी काम कर चुकी हैं। कल इस फ़िल्म का फर्स्ट लुक जारी किया गया, जो दिन भर सोशल मीडिया में टॉप पर ट्रेंड होता रहा। इस फ़िल्म में रजनी 25 वर्षों बाद एक पुलिस अधिकारी के किरदार में दिखेंगे।

YouTube पर नंबर #1 हैं इंडियन: इस्तेमाल में अमेरिका को पछाड़ा, सस्ते टैरिफ़ और किफ़ायती मोबाइल का कमाल

भारत में काफ़ी सस्ते मोबाइल डेटा और क़िफ़ायती स्मार्टफोन से YouTube को ज़बरदस्त लाभ मिला है। अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए भारत अब YouTube का सबसे बड़ा और तेज़ी से बढ़ रहा बाज़ार बन गया है। सीखने के साथ-साथ शिक्षा, संगीत, स्वास्थ्य, खाना पकाने जैसे विविध विषयों पर स्थानीय भाषाओं में जानकारियों के उपयोग से YouTube का इस्तेमाल पहले की तुलना में दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है।

YouTube अमेरिका की दिग्गज टेक कंपनी Google का हिस्सा है। कंपनी के एक अधिकारी ने TOI को बताया कि फ़िलहाल भारत में उसके 26.5 करोड़ सब्सक्राइबर हैं। उन्होंने बताया कि YouTube पर 95 फ़ीसदी वीडियो की खपत टियर 2 और टियर 3 शहरों में स्थानीय भाषाओं में हो रही है।

सितंबर 2016 में मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो द्वारा मोबाइल सेवाओं की शुरुआत के बाद से भारत में डेटा टैरिफ दुनिया में सबसे कम क़ीमत में उपलब्ध है। वहीं अगर मात्र 2-3 साल पहले की बात की जाए तो 1 जीबी डेटा के लिए ₹100 का भुगतान करना पड़ता था, लेकिन अब 1 जीबी डेटा की क़ीमत ₹10 से भी कम है।

भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है। औसतन बात करें तो जहाँ 2016 तक कुछ सौ एमबी डेटा की ही खपत प्रति मोबाइल होती थी, वहीं अब अनुमानित तौर पर एक मोबाइल यूज़र हर महीने 10 जीबी डेटा का इस्तेमाल करता है।

YouTube के अधिकारियों ने कहा कि YouTube पर भारतीय सामग्री की विविधता से संबंधित जानकारी जुटाने वालों की संख्या पहले कभी भी इतनी अच्छी नहीं रही। कम लागत वाले डेटा के साथ, संगीत, तकनीक, सौंदर्य, स्वास्थ्य, फिटनेस, नृत्य और कुकिंग जैसे विविध विषयों की जानकारियों जुटाने वाले यूज़र्स की संख्या में अब लगातार बढ़त देखी गई है।

2018 में, लर्निंग और शिक्षा सामग्री भारत में YouTube पर सबसे तेज़ी से विकसित होने वाली श्रेणियों में से एक बन गई, जिसके तहत विश्व स्तर पर YouTube पर प्रतिदिन एक बिलियन से अधिक यूज़र्स अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

YouTube की सीईओ सुजैन वोजसिकी ने बताया कि भारतीय अब इस वीडियो प्लेटफॉर्म पर दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते दर्शकों में से एक हैं। YouTube आज यूज़र्स की पहली पसंद बन गया है, फिर चाहे वो मनोरंजन हो या किसी विषय पर जानकारी जुटाना।

नेहरू और भारत एक भैंस: श्वेत-धवल बगुलों के सरगना का सिलसिला बदस्तूर जारी

चीन ने 1957 से ही भारत की सीमा में अतिक्रमण करना शुरू कर दिया था। नेहरू को पीएमी क्योंकि खैरात में मिल गई थी इसलिए वे उसे भरपूर एन्जॉय कर रहे थे।

उस दौर में एक फ़िल्म आई थी ‘आवारा’ जिसमें एक ड्रीम सॉन्ग था, जिसे भारतीय फिल्मों का पहला ड्रीम सॉन्ग भी कहा जाता है – “घर आया मेरा परदेसी”, राजकपूर और नरगिस पर फिल्माया गया था।

दीन-दुनिया से दूर स्वप्न लोक का यह गीत, लोगों को बहुत पसंद आया था, और उन लोगों में जवाहर लाल नम्बर वन थे, इसलिए वे भी पड़े-पड़े ऐसे ही ख्वाब देखते थे। कभी कभी तो ख़्वाबों के भीतर भी ख़्वाब की एक ऐसी दुनिया गढ़ते थे, जिसमें न अमेरिका का दखल हो न रूस का, बस मैं (मतलब नेहरू), नासिर (इजिप्ट वाले) और यूगोस्लाविया वाले टीटो हों और इस दुनिया का नाम ‘गुटनिरपेक्ष’ हो।

जब नहर वाले पंडित जी यह एडवेंचर कर रहे थे, तब पाकिस्तान; अमेरिका के पाले में घुसकर खुद को सामरिक और आर्थिक तौर पर मजबूत कर रहा था। इसकी परिणति 1964 में नेहरू के गुजरने के साल भर बाद हुए भारत-पाक युद्ध के रूप में हुई। जब हम पाक के सामने बैकफुट पर थे, किन्तु वह युद्ध हम शास्त्री की सेना को खुली छूट और भारतीय सेना की जीवटता से ही जीत सके थे।

बहरहाल, जब चीन सीमा से उस दौर में अतिक्रमण, घुसपैठ की खबरें आतीं तो उसकी रिपोर्ट नेहरू के सामने पेश की जाती। नेहरू उसको देखते और उस पर ‘फ़ाइल’ लिखकर वापस भेज देते, जिसका मतलब था कि इसे चीन वाली फ़ाइल में लगा दो। बाद में यह ऐसा रूटीन बन गया कि अधिकारी बिना नेहरू को दिखाए इस तरह की खबरें चीन वाली फ़ाइल में लगा देते थे। उस वक्त राजनीतिक गलियारों में यह मजाक भी चल पड़ा था कि जिस समस्या का समाधान नहीं करना हो उसे नेहरू के दफ्तर में मौजूद चीन फ़ाइल में नत्थी कर दो।

दरअसल नेहरूवाद की चर्चा करने वाले लोग नेहरू की अंग्रेजियत, नफासत, स्वैग, ठाठ, अमीरी और उनके ख़ानदानी रूवाब पर न्यौछावर हो जाते हैं। वे नेहरूवाद का जिक्र करते समय नेहरू की गवर्नेंस की बात नहीं करते हैं।

नेहरू की गवर्नेंस क्या थी, हम संक्षिप्त में समझ लेते हैं। कश्मीर में घुसपैठ हो गई, हमारी सेना निर्णायक मोड़ पर दुश्मन को खदेड़ रही है, हम जीतने वाले हैं; तभी इस सीन में नेहरू का प्रवेश डायलॉग के साथ होता है; “हम इस समस्या को खुद नहीं हल करेंगे, लोग क्या सोचेंगे हमारे बारे में, हम गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सिरमौर देश हैं, इसलिए हम इस समस्या को UNO ले जाएँगे, और अपनी जीती हुई बाजी को हारने के लिए खेलेंगे।” वह साल और आज का दिन हम दुनिया और पाकिस्तान के सामने UN के उसी रेज़ोल्यूशन के आगे कच्चे पड़ जाते हैं, जहाँ हमें बतौर कश्मीर में जनमत संग्रह के लिए कहा गया है।

नेहरू का गवर्नेंस मॉडल भारत के शासकों के लिए ऐसी नजीर बना कि नेहरू से लेकर वाजपेयी तक कोई भी इसके इंद्रजाल से अछूता नहीं रह सका। और जब वाजपेयी ने कश्मीर समस्या के सन्दर्भ में इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का वाहियात राग अलापा था, तब वस्तुत: वे अपने राजनीतिक गुरु नेहरू को एक सच्ची श्रद्धांजलि ही दे रहे थे।

इसी प्रकार शासन का नेहरू मॉडल कश्मीर में भारत से अलग होने की माँग करने वाले लोगों से निपटने का क्या समाधान बताता है, देखिए जरा! नेहरू पुराण के अनुसार समस्या के समाधान से भी जरूरी है, उस समस्या को खाद-पानी देना, इसलिए सबसे पहले उस समस्या को एक संस्था बनाओ, और उसी तर्ज पर कश्मीर में भारत को गाली देने वाले और पाकिस्तान से जा मिलने के लिए बेकरार लोगों को ‘अलगाववादी’ नाम दे दिया गया। और मजेदार बात यह है कि भारत की सरकारें इन्हें किसी सेपरेट देश के प्रतिनिधियों की तरह ट्रीट भी करती हैं। क्यों! क्योंकि नहर वाले पंडित जी का मान जो रखना है।

इसी प्रकार भारत के नक्सलबाड़ी जिले में कुछ लोग सिस्टम और राज्य के खिलाफ़ विद्रोह कर देते हैं! अब इनका क्या किया जाए! करना क्या है, सारा काम नेहरू ही थोड़े करेगा और 2014 में मोदी भी तो पीएम बनेगा इसलिए नेहरू जी क्या करेंगे! वे इस समस्या का नामकरण ‘नक्सलवादी समस्या’ करके दुनिया से निकल लेंगे, बाद में… बाद में जो पीएम बनेगा अपने आप भुगतता रहेगा।

पंजाब में कुछ लोग देश के खिलाफ उग्र हो रहे हैं, नेहरू जी का नाम लो और इनको ‘उग्रवादी’ नाम दे दो।

देश में गरीब हैं, गरीबी है। कैसे निपटा जाए इनसे… इसका भी लोड मत लो ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाओ और मस्त रहो। और आज जबकि 1969 में शुरू की गई इस योजना के 50 साल पूरे हो रहे हैं तब आपको मानना ही पड़ेगा कि नेहरू; राजकपूर से भी बड़े शो मैन और छलिया थे।

कभी-कभी लिखते-लिखते या तो मैं थक जाता हूँ, या फिर भटक जाता हूँ, इसलिए नेहरू गाथा को यहीं विराम देना चाहूँगा, आज कर्नाटक के चित्रदुर्ग में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का जिक्र करके।

पीएम मोदी अमूमन जब दक्षिण में होते हैं, तो उनकी सभाओं में एक अनुवादक होता है, जो तमिल, तेलुगू, कन्नड़ या मलयालम में सम्बन्धित राज्य के अनुसार भाषण का अनुवाद जनता तक पहुँचाता है।

पर आज मोदी जब चित्रदुर्ग में भाषण दे रहे थे, तब उनके हिन्दी में दिए जा रहे भाषण का कोई अनुवादक नहीं था। वे जो भी बोल रहे थे, उस पर लोगों का रिएक्शन वैसे ही था, जैसे हिन्दी भाषी राज्यों में होता है, और जब उन्होंने बालाकोट का जिक्र किया तो जनता के बीच से उठने वाला शोर यह बता रहा था कि हिन्दी एक ऐसी भाषा है, जिसमें इस देश को जोड़ने की क्षमता है लेकिन नेहरू ने यह भी नहीं होने दिया।

संविधान लागू होने के दस साल बाद जब हिन्दी को देश की सम्पर्क भाषा बनाने का समय आया तो देश के गैर हिन्दी क्षेत्रों में इसका विरोध हुआ, नेहरू इस विरोध को हैंडल नहीं कर पाए, उन्होंने हिन्दी को इस दौरान खासकर दक्षिण भारत में विलेन बनने दिया और हिन्दी देश की भाषा बनने से हमेशा-हमेशा के लिए चूक गई।

और इसलिए मैं जब भी कॉन्ग्रेसियों की तुलना भैंस के ऊपर बैठे बगुले के रूप में करता हूँ तो नीचे से लेकर ऊपर तक श्वेत-धवल नेहरू को इन सभी बगुलों के सरगना के तौर पर देखता हूँ। जिसके लिए भारत एक ऐसी भैंस थी, जिसका उपयोग उन्होंने पहले ख़ुद के लिए और बाद में अपने खानदान के लॉन्च होने के लिए किया और यह सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है।

गौतम गंभीर के छक्कों से तिलमिलाई महबूबा ने उन्हें Twitter पर किया ब्लॉक

सोशल मीडिया पर पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज़ गौतम गंभीर और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के बीच तीखी नोंकझोंक हुई। दरअसल, ये सब शुरू हुआ फ़ारूक़ अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दाख़िल करने के बाद। दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और पीडीपी सुप्रीमो महबूबा मुफ़्ती को लोकसभा चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की माँग की गई। वकील संजीव कुमार द्वारा दायर इस याचिका में इन तीनों नेताओं के हालिया देश-विरोधी बयानों के मद्देनज़र इन्हें चुनाव लड़ने से रोकने की माँग की गई। याचिका में कहा गया है कि इन तीनों नेताओं की निष्ठा देश के संविधान के प्रति न होकर किसी और के लिए है।

इस जनहित याचिका से बौखलाई महबूबा मुफ़्ती ने ट्विटर पर अनाप-शनाप बकना शुरू कर दिया। महबूबा ने लिखा कि अदालत में समय बर्बाद करने से क्या फ़ायदा? उन्होंने दावा किया कि भाजपा द्वारा धारा 370 हटाने के साथ ही जम्मू कश्मीर में भारत का संविधान लागू नहीं होगा। ऐसे में वो लोग स्वतः ही चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएँगे। इसके बाद उन्होंने पूरे भारत को धमकी देते हुए लिखा, “ना समझोगे तो मिट जाओगे हिन्दुस्तान वालों, तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।

इसके बाद गौतम गंभीर कहाँ चुप रहने वाले थे। हाल ही में भाजपा में शामिल हुए पूर्व भारतीय ओपनिंग बैट्समैन ने महबूबा की गेंद को ऐसे ही छक्के के लिए उठाया, जैसे उन्होंने 2007 टी-20 वर्ल्ड कप फाइनल में बेसबॉल स्टाइल में पाकिस्तानी गेंदबाज़ उमर गुल की गेंद को लेग साइड के ऊपर से छक्के के लिए भेजा था। दिल्ली रणजी टीम, भारतीय टीम और कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी कर चुके गौतम ने महबूबा मुफ़्ती को याद दिलाया था कि ये भारत देश है, उनकी तरह कोई धब्बा नहीं जो मिट जाए।

फिर क्या था, महबूबा मुफ़्ती ने अपने ख़राब क्रिकेट ज्ञान का परिचय देते हुए गंभीर को नसीहत दे डाली कि कहीं उनका राजनीतिक करियर भी उनके क्रिकेट करियर की तरह बहुत बुरा न हो। लगातार पाँच मैचों में टेस्ट शतक जड़ने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके गंभीर भी कहाँ चुप रहने वाले थे। उन्होंने महबूबा को तड़ाक से जवाब दिया कि क्या उन्हें 10 घंटे सिर्फ़ यही जवाब देने में लग गए? वर्ल्ड कप 2011 के फाइनल में दो विकेट गिरने के बाद जब टीम मुश्किल में थी, तब तीन घंटे से भी अधिक समय तक टिककर श्रीलंकाई गेंदबाज़ों की ख़बर लेने वाले गौती ने महबूबा की व्यक्तित्व में गहराई की कमी बताते हुए उनसे कहा कि यही कारण है कि वे लोग (कश्मीरी नेता) आज तक इस समस्या का हल नहीं निकाल पाए।

इसके बाद तिलमिलाई महबूबा मुफ़्ती ने गंभीर की मानसिक हालत पर कमेंट करना शुरू कर दिया। उन्होंने गंभीर पर उनका पीछा करने और ट्रोल करने का आरोप मढ़ा। उन्होंने कहा कि गंभीर कश्मीर के बारे में कुछ नहीं जानते। उन्होंने गंभीर के ट्वीट की क़ीमत दो रुपए लगाते हुए ब्लॉक कर दिया। महबूबा द्वारा ब्लॉक किए जाने पर गंभीर ख़ुश ही नज़र आए और उन्होंने कहा कि ऐसे बेदिल इंसान द्वारा उन्हें ब्लॉक करना अच्छी बात है। हालाँकि, उन्होंने महबूबा से पुछा कि वो 135 करोड़ भारतीयों को कैसे ब्लॉक करेंगी?

बता दें कि महबूबा समय-समय पर ऐसी धमकी देती आई हैं और आजकल कश्मीर के सारे नेता देश-विरोधी बयान दे रहे हैं। महबूबा ने हाल ही में कहा था कि अगर धारा 370 से छेड़छाड़ की गई तो पूरा देश जल कर खाक हो जाएगा। उस से पहले उन्होंने कहा था कि अगर 370 हटाया गया तो कश्मीर के लोग न जाने कौन सा झंडा उठाने को मज़बूर हो जाएँगे।

आचार संहिता लागू है, हम क्या करें: इनकम टैक्स की रेड पर बोले गृहमंत्री राजनाथ सिंह

इनकम टैक्स विभाग और ED ऑफिस द्वारा पिछले एक सप्ताह के अंदर मध्य प्रदेश के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी विभिन्न राजनेताओं और उनके करीबी सहयोगियों के खिलाफ अवैध रूप से जमा की गई संपत्ति और पैसे की तलाशी के लिये छापेमारी की गई है। हमेशा की तरह ही विपक्ष द्वारा इसे जबरदस्ती की गई कार्रवाई बताया जा रहा है। हालाँकि, करोड़ों में बरामद की जा रही बड़ी रकमों के बाद भी इसे कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने सत्तारूढ़ भाजपा के उकसावे पर की गई कार्रवाई बताया है।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष के लगाए आरोपों पर जवाब देते हुए कहा, “ये छापेमारी एजेंसी अपने इनपुट के आधार पर कर रही है। इसमें केंद्र सरकार का किसी तरह का हाथ नहीं है। सरकार को दोष देना गलत बात है। ऐसा कई वर्षों से हो रहा है, आज अचानक तो शुरू नहीं हुआ है। इसके पीछे की तरह की राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया गया है। देश में आचार संहिता लागू है। हम क्या करें?”

राजनाथ सिंह ने अपने इंटरव्यू में कहा, “आज जो एजेंसी रेड कर रही है, वो पहले भी करती रही हैं। उनके ऊपर आचार संहिता लागू नहीं होता है। जहाँ से उन्हें जो इनपुट मिलता है, उस आधार पर वे कार्रवाई करते हैं। हम उनको कैसे रोके। यदि किसी ने गलत पैसा इकट्ठा कर रखा है, गलत तरीके से उसका उपयोग करना चाहता है, तो ऐसे में ये स्वतंत्र संगठन अपनी-अपनी जिम्मेदारी संभालते हुए कार्रवाई कर रहे हैं। इस छापेमारी को लेकर केंद्र सरकार को दोष देना उचित नहीं होगा और सरकार के साथ न्याय भी नहीं होगा। यह एक सतत प्रक्रिया है। यदि कोई मानता है कि किसी के कहने पर हो रहा है, यह कहना न्यायसंगत नहीं होगा। गृहमंत्रालय सिर्फ उपलब्धता के आधार पर केंद्रीय सुरक्षाकर्मियों को सहायता के लिए भेजता है।”

चुनाव आयोग ने आयकर विभाग की पिछले 2 दिनों से जारी छापेमारी को कॉन्ग्रेस द्वारा सत्तारूढ़ भाजपा के उकसावे पर की गयी कार्रवाई बताए जाने संबंधी आरोपों पर संज्ञान लेते हुय राजस्व सचिव और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष से विस्तृत जानकारी माँगी है। रविवार (अप्रैल 07, 2019) को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी सहयोगियों के ठिकानों पर छापेमारी की कार्रवाई, जिसमें ₹281 करोड़ की बेहिसाब नकदी के बाद भी आयोग ने वित्त मंत्रालय को इस बारे में सख्त परामर्श जारी किया था। इसमें आयोग ने मंत्रालय से उसकी जाँच एजेंसियों की चुनाव के दौरान कोई भी कार्रवाई निष्पक्ष और भेदभाव रहित होने निर्देश दिया था। इसके साथ ही चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता का हवाला देते हुए इस तरह की कार्रवाई से पहले आयोग से भी संपर्क करने को कहा था।

काँचा इलैया जी, धूर्तता से सने शब्दों में आपका ब्राह्मण-विरोधी रेसिज़्म निखर कर सामने आता है

ओबीसी समुदाय में पैदा होने के बाद भी दलित पहचान जबरिया हड़पने वाले काँचा इलैया शेफर्ड ने ‘द वायर’ में लिखा, ‘मोदी की तरह चौकीदार बनने से इंकार कर सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी जातिवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता जताई!’

और ब्राह्मणवाद को (और इसके बहाने ब्राह्मणों को) गरियाना इतना जरूरी हो गया कि जो वायर मोदी को संघ के ‘गुंडा हिन्दूवाद’ का वाहन बताता था, वही आज मोदी को ‘ब्राह्मणवादी’ भाजपा के अन्दर ‘बेचारा’ दिखाने को तैयार हो गया। मतलब ब्राह्मणों के प्रति नफरत फैलानी इतनी जरूरी है कि मोदी से सहानुभूति भी चलेगी?

हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, और हार्ड वर्क- तीनों से ज्यादा बड़ा होता है परिप्रेक्ष्य

काँचा इलैया शुरू में ही हमें याद दिलाते हैं कि कैसे मोदी ने एक बार ‘हार्ड वर्क’ (परिश्रम) को हार्वर्ड (विश्वविद्यालय) से बड़ा बताया था, और बताते हैं कि आज हार्वर्ड से पढ़े सुब्रमण्यम स्वामी मोदी का अपमान कर रहे हैं। तो काँचा इलैया जी, परिप्रेक्ष्य देखिए, परिप्रेक्ष्य। मोदी ने ‘हार्वर्ड’ नाम के पीछे केवल अमर्त्य सेन या पी चिदंबरम को नहीं घेरा था बल्कि अपने आलोचकों की उस पूरी लॉबी को निशाने पर लिया था जिनका मोदी का विरोध करने के लिए एक ही तर्क था, ‘हम हार्वर्ड (या ऐसे ही ‘एलीट’ विश्विद्यालय) से पढ़े हैं/में पढ़ाते हैं, इसलिए हमारी बात ‘अनपढ़’ मोदी से बेहतर है…’

वहीं यहाँ इस मसले में सुब्रमण्यम स्वामी ने कहीं भी अपने ‘हार्वर्डत्व’ का हवाला नहीं दिया। ऐसे में आपको एक ‘कैची हेडलाइन’ देने के अलावा इस “हार्वर्ड-हार्ड वर्क” की हाय-हत्या का यहाँ कोई काम नहीं था।

रही बात जो आप मणिशंकर अय्यर के ‘कैम्ब्रिज वाला ब्राह्मण’ होकर मोदी के चायवाले होने के अपमान की बात करते हैं, तो यह भी मणिशंकर अय्यर का दोष था- न कैंब्रिज का, न उनके ब्राह्मण घर में पैदा होने का।

आइए मूल मुद्दे पर- ब्राह्मणों से racist नफरत

काँचा इलैया जी, आपके अनुसार सुब्रमण्यम स्वामी का कथन समूची भाजपा और वृहद् संघ परिवार में मौजूद ‘जातिवादी’ मानसिकता का सबूत है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि डॉ स्वामी कुछ मामलों में पुराने ख्यालात के हैं- वह समलैंगिकता के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी आपत्ति खुल कर जता चुके हैं, पर इसे पूरे एक राजनीतिक दल से आपने किस आधार पर जोड़ दिया?

क्या भाजपा में और किसी ने अपने ट्विटर हैंडल को बदलने से इस आधार पर इंकार किया कि उसके जन्मना-वर्ण में चौकीदारी नहीं हो सकती?

आप संघ को भी लपेटे में ले लेते हैं। क्या संघ चुनाव लड़ रहा है?

‘मैं भी चौकीदार’ राहुल गाँधी के भाजपा पर एक राजनीतिक आरोप के जवाब में शुरू किया गया था। क्या राहुल गाँधी ने संघ पर ‘चोरी’ का आरोप लगाया था?

संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है- वह भाजपा ही नहीं, करीब दर्जन भर अनुषांगिक संगठनों के चलने के लिए मार्ग की सलाह भर देता है। क्यों बदले ट्विटर हैंडल वह, या उसके स्वयंसेवक?

इसके अलावा, अगर आप कथनों के आधार पर ही चलना चाहते हैं तो आपको यह पता है या नहीं कि मोदी प्रशासन में लाख मीन-मेख निकालने के बाद भी सुब्रमण्यम स्वामी मोदी को ही एस देश की इकलौती उम्मीद बताते हैं आगामी चुनावों में। कौन जातिवादी ऐसा करता है?

और अगर एक मिनट के लिए सुब्रमण्यम स्वामी को ‘दुष्ट जातिवादी-ब्राह्मणवादी’ मान भी लिया जाए, तो सुब्रमण्यम स्वामी के ऐसे होने से भाजपा-संघ के और इस देश के सभी ब्राह्मण सुब्रमण्यम स्वामी जैसे ही हो गए? ऐसे तो आप पत्रकारिता के जिस समुदाय विशेष में घूम रहे हैं, उसके काले कारनामों की फेहरिस्त के चलते सभी पत्रकारों को बौद्धिक रूप से दिवालिया और नैतिक रूप से पतित मान लिया जाए?

और ब्राह्मणों को आप इतना गरिया ही रहे हैं तो एक बात यह भी बताइए – अगर पुरानी जाति व्यवस्था ब्राह्मणों ने ही अपने स्वार्थ और एकाधिकार के लिए बना रखी थी तो केवल ब्राह्मणों से ही फटेहाल-कंगाल होने की उम्मीद क्यों होती थी पुरातन काल में? क्यों उनके भिक्षावृत्ति के अलावा हर अन्य प्रकार से धनोपार्जन पर रोक थी? क्यों हर अपराध में उन्हीं के लिए सबसे ज्यादा समय तक के कारावास का निर्धारण था? क्यों ‘स्वादिष्ट’ माँस-मछली-मदिरा केवल उन्हीं के लिए अभक्ष्य था? आज भी बिहार निकल जाइए तो ऐसे गाँवों की फ़ेहरिस्त है जहाँ का ब्राह्मण बाकी जगह दलित (यानि दबाया हुआ) कहलाने वाले समुदाय से ज्यादा बदहाल है।

इसके अलावा और सबूत चाहिए तो अपने (छद्म)-उदारवादी गैंग के आधे-दुलारे शशि थरूर की किताब ‘Era of Darkness’ का चौथा चैप्टर ‘Divide et Impera’ पढ़ लीजिए, कि कैसे वह अंग्रेज थे जिन्होंने जाति को एक गतिमान, परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था से एक रूढ़ियों में जकड़ी उत्पीड़न व्यवस्था में बदल दिया।

सच्चाई यह है कि पुरानी वर्ण-व्यवस्था में जकड़न से बनी जाति-व्यवस्था में सभी जातियों के लिए किसी न किसी प्रकार की समस्या निहित थी। इसीलिए आज उसे पीछे छोड़ समाज आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि एक समय (पाँच हजार साल पहले से नहीं, केवल अंग्रेजों की मौजूदगी वाली कुछ सदियों में) कुछ जातियों ने अन्य जातियों का सामाजिक उत्पीड़न किया, यह भी सच है कि कुछ स्थानों पर यह आज भी जारी है। पर आज का समाज इन्हें प्रश्रय या बढ़ावा नहीं दे रहा, इनका प्रतिकार और उन्मूलन कर रहा है।

पर आपके जैसे लोग हैं असली जातिवादी, जो अपनी NGO-वादी, victimology पर आधारित मुफ़्त की रोटी बचाने के लिए जाति का मसला ख़त्म नहीं होने देना चाहते। आपके जैसे लोग एक-दो साल के लिए अपने सुर या तो बदल दें या शांत हो जाएँ जातिवाद प्राकृतिक मौत मर जाएगा।