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गोवा में BJP सरकार ने हासिल किया विश्वासमत, CM सावंत को 20 विधायकों का समर्थन

गोवा के नए मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सदन में बहुमत साबित कर दिया है। सावंत के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने फ्लोर टेस्ट 20-15 से पास कर लिया। बता दें कि 36 सदस्यीय गोवा विधानसभा में बहुमत के लिए 19 का जादुई आँकड़ा चाहिए होता है। भाजपा को इस से 1 अधिक यानि 19 विधायकों का समर्थन मिला, वहीं विरोध में सिर्फ़ 15 विधायक थे। इसी तरह 5 मतों के अंतर से प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने विश्वासमत हासिल कर लिया। प्रमोद सावंत को भाजपा के 11, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के 3, गोवा फॉरवॉर्ड पार्टी (GFP) एवं 3 निर्दलीय का भी समर्थन मिला।

विरोध में कॉन्ग्रेस के 14 और शरद पवार की राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के 1 विधायक ने मत दिया। भाजपा के 7 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद सत्ता के लिए चल रही रस्साकशी में प्रमोद सावंत ने रात के 2 बजे ही शपथ ले लिया था।

गोवा में मनोहर पर्रिकर के उत्तराधिकारी के रूप में प्रमोद सावंत को पार्टी ने जिम्मेदारी सौंपी है। प्रमोद सावंत ने रात 2 बजे गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। प्रमोद सावंत को गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने पद और गोपनियता की शपथ दिलाई। बता दें कि प्रमोद सावंत के अलावा गोवा में दो डिप्टी सीएम भी बनाए गए हैं। इस अवसर पर प्रमोद सावंत ने कहा, “पार्टी ने जो जिम्मेदारी मुझे दी है उसे निभाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी। मैं जो भी कुछ हूँ मनोहर पर्रिकर की वजह से ही हूँ। उन्होंने ही मुझे राजनीति में लाया और उन्हीं के बदौलत मैं गोवा विधानसभा का स्पीकर बना।”

पेशे से किसान और आर्युर्वेदिक डॉक्टर प्रमोद सावंत मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले गोवा विधानसभा के अध्यक्ष हैं। 45 वर्षीय डॉ. सावंत की पत्नी सुलक्षणा भी बीजेपी में नेत्री हैं और साथ में शिक्षिका भी हैं। गोवा बीजेपी के नेता 45 साल के डॉ. प्रमोद सावंत का जन्म 24 अप्रैल 1973 को हुआ। सैंकलिम विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आए डॉ. प्रमोद सावंत का पूरा नाम डॉ. प्रमोद पांडुरंग सावंत है।

तेलंगाना में कॉन्ग्रेस को झटका, पूर्व मंत्री व दिग्गज नेता डीके अरुणा हुईं BJP में शामिल

तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी को बड़ा झटका लगा है। जहाँ बंगाल से लेकर गुजरात तक पार्टी के नेता लगातार दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं, तेलंगाना में पूर्व मंत्री डीके अरुणा ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। डीके अरुणा तेलंगाना की एक शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं और उनका परिवार 1957 से ही गडवाल की राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है। अरुणा के भाजपा के टिकट पर महबूबनगर से चुनाव लड़ने का क़यास लगाए जा रहे हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद अरुणा ने कहा:

“तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए थोड़ी भी उम्मीदें नहीं बचीं हैं और अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए मैंने भाजपा में शामिल होने का निर्णय लिया है। भाजपा सत्ता में वापस लौटेगी और नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे।”

डीके अरुणा के ससुर सत्या रेड्डी 1957 और 1978 में गडवाल के विधायक बने थे। 1983 और 1985 में उनके बेटे समर सिम्हा रेड्डी क्षेत्र के विधायक बने। अरुणा समर रेड्डी के भाई भरत रेड्डी की पत्नी हैं। अरुणा गडवाल में अपने परिवार की राजनीतिक प्रतिष्ठा को आगे ले जाने में सफल रहीं और उन्होंने 2004, 2009 और 2014 में जीत कर विधानसभा पहुँचीं। 1994 में उनके पति भरत सिम्हा रेड्डी ने भी जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में दोनों भाई आमने-सामने थे। अरुणा के पिता चित्तम नरसी रेड्डी भी कॉन्ग्रेस के टिकट पर मकथल से विधायक बने थे।

डीके अरुणा राज्य के मुख्यमंत्री के चद्रशेखर राव से अपने तल्ख़ रिश्तों के लिए भी जानी जाती हैं। दोनों के बीच अक्सर बयानबाज़ी का दौर चलता ही रहता है। अरुणा के पिता एवं भाई की 2005 के एक नक्सली हमले में हत्या कर दी गई थी। उसके बाद उनके दूसरे भाई राम मोहन रेड्डी विधायक बने थे। कुल मिला कर देखें तो अरुणा के साथ-साथ उनके पिता, पति, भाई, ससुर और देवर- ये सभी विधायक रह चुके हैं। अरुणा राजशेखर रेड्डी और रोसैया की कैबिनेट में राज्यमंत्री रह चुकी हैं।

जोगुलाम्बा गड्वाल जिले के गठन में भी अरुणा अहम भूमिका थी। उन्होंने इसके लिए के चंद्रशेखर राव पर दबाव डाला था। उनका घर क्षेत्र की राजनीति का मुख्यालय माना जाता है। भाजपा ने डीके अरुणा का स्वागत करते हुए कहा कि उनके आने से तेलंगाना में पार्टी को मज़बूती मिलेगी। 2018 के विधानसभा चुनाव में 119 सदस्यीय तेलंगाना विधानसभा में कॉन्ग्रेस के 19 विधायक जीत कर पहुँचे थे, जिसमे से 8 विधायक पार्टी छोड़ कर टीआरएस में जा चुके हैं।

‘अश्लील वीडियो बनाकर सेवादारों ने किया था ब्लैकमेल’, पुलिस ने पेश किया 366 पन्नों का चालान

12 जून 2018 को मध्य प्रदेश के इंदौर में भय्यूजी महाराज की खुदकुशी ने सबको हैरानी में डाल दिया था। सबके भीतर सवाल उठ रहे थे कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? उस दौरान पूरे मामले की जाँच को उनके सुसाइड नोट के भरोसे छोड़ दिया गया था।

लेकिन, अब जाँच के बाद जो तथ्य निकलकर सामने आए हैं, वो बेहद हैरान करने वाले हैं। सोमावार (मार्च 18, 2019) को आज़ाद नगर सीएसपी सुरेंद्र सिंह तोमर ने 366 पेज का चालान कोर्ट में पेश किया। इसके मुताबिक भय्यूजी महाराज ने सुसाइड तो किया था लेकिन अपने तीन सेवादारों से परेशान और उनकी ब्लैकमेलिंग से तंग आकर।

इस चालान में दावा किया गया है कि भय्यूजी ने अपने सेवादार विनायक दुधाले, शरद देशमुख और पलक पुराणिक की ब्लैकमेलिंग से तंग आकर खुदकुशी की। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस मामले की छानबीन में 125 लोगों से पूछताछ की गई और 28 लोगों के बयान दर्ज हुए। साथ ही 12 चश्मदीदों के दिए बयानों का भी दो से अधिक बार परीक्षण किया गया।

इसी बीच पुलिस ने भय्यूजी महाराज के सेवादारों पलक, विनायक और शरद की चैटिंग की जाँच से पाया कि यह तीनों ही उनकी संपत्ति हासिल करने के लिए 2 साल से उनके साथ रहकर बड़ी साजिश रच रहे थे।

चूँकि भय्यूजी डिप्रेशन की बीमारी से जूझ रहे थे तो ऐसे में ये सेवादार उन्हें डॉक्टर द्वारा दी गई दवाई को हाई डोज में देते थे, जिससे वह तीन-तीन दिन तक बेहोशी की हालत में सोए रहते थे। इसी दौरान पलक और भय्यू महाराज के कई अश्लील तस्वीरें खींची गईं, जिसके बाद उन्हें ब्लैकमेल किया जाने लगा।

ब्लैकमेलिंग से परेशान होकर वह मानसिक रूप से बीमार हो गए। जाँच के आधार पर पुलिस का दावा है कि सुसाइड नोट को सेवादारों ने षड्यंत्र के तहत आत्महत्या करने से पहले लिखवाया था।

खबरों के मुताबिक पलक भय्यू जी के संपर्क में पिछले दो साल से थी और वह उनसे शादी भी करने को इच्छुक थी, लेकिन इस बीच महाराज ने डॉ. आयुषी से शादी कर ली। जिसके बाद पलक ने काफ़ी हंगामा किया और उन्हें 16 जून तक शादी करने का समय दिया था।

भय्यूजी महाराज से यह तीनों सेवादार ₹1.5 लाख महीना लेते थे। इसके अलावा ये लोग महाराज को ब्लैकमेल करके एक करोड़ से ज्यादा राशि पहले ही हड़प चुके थे और साथ ही आश्रम की संपत्ति को हथियाने के लिए तिजोरी और दान में मिलने वाली सामग्री का लेखा-जोखा अपने कब्जे में कर लिया था।

मसूद अज़हर के पीछे अब पड़ गया जर्मनी, ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के लिए EU में प्रस्ताव किया पेश

वैश्विक स्तर पर भारत को एक और कूटनीतिक सफलता मिलती दिख रही है। यूरोपियन यूनियन में मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के लिए जर्मनी ने पहल किया है। बता दें कि पुलवामा में हुए हमले के बाद से भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को घेरने की जुगत में लगा हुआ है। इसमें उसे सफलता भी मिलती दिख रही है। पहले सुरक्षा परिषद के सभी देशों द्वारा संयुक्त रूप से पुलवामा हमले की निंदा करना और फिर पाकिस्तान को मिले एमएफएन का दर्जा वापस लेना – भारत ने एक से बढ़ कर एक पहल कर के पाकिस्तान को सबक सिखाया। भारत द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी कैम्पों पर की गई एयर स्ट्राइक के बदले पाकिस्तान ने एफ-16 से भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके लिए अमेरिका भी उस से नाराज़ है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के अड़ंगे के कारण जैश सरगना अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित नहीं किया जा सका लेकिन यूरोपियन यूनियन में ऐसा प्रस्ताव आने के बाद अब चीन पर भी दबाव बढ़ेगा। जर्मनी का अगर ये प्रस्ताव काम करता है तो यूरोप के क़रीब 28 देशों में मसूद अजहर के यात्रा करने पर बैन लग जाएगा। जर्मनी ने इस प्रस्ताव को अभी सिर्फ़ पेश किया है, इसी पर किसी तरह के समाधान का प्रस्ताव अभी पास नहीं हुआ है।

ख़बरों के अनुसार, जर्मनी का कहना है कि सभी 28 देश अपनी तरफ से इस बात के लिए पूरी कोशिश करेंगे कि पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। इसे भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है। फ्रांस पहले ही मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध लगा चुका है। फ्रांस ने अन्य देशों से भी जैश पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने की अपील की थी। अड़ंगा लगाने पर अमेरिका ने चीन को फटकारते हुए बयान जारी किया था।

अमेरिका की ओर से जारी बयान में मसूद अज़हर को साफ तौर पर ग्लोबल आतंकी कहा गया था। तीखे शब्दों का प्रयोग करते हुए अमेरिकी बयान में इस तथ्य को उभारा गया था कि चौथी बार चीन ने मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित होने से बचाया है। और, उसे सुरक्षा परिषद को अपना काम करने देने में बाधक नहीं बनना चाहिए। दक्षिण एशिया में शांति और स्थायित्व के लिए चीन अगर प्रतिबद्ध है तो उसे पाकिस्तान या किसी भी देश के आतंकियों को संरक्षण नहीं देना चाहिए। अंत में बयान की भाषा और सख्त हो गई, जब चीन को एक तरह की वॉर्निंग देते हुए कहा गया कि यदि आतंकियों को संरक्षण देने की आपकी नीति में बदलाव नहीं आता है तो सुरक्षा परिषद के सदस्य देश अन्य कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की 1267 अलकायदा प्रतिबंध कमिटी के तहत अज़हर पर प्रतिबन्ध का प्रस्ताव रखा गया था। यह प्रस्ताव पुलवामा आतंकी हमले के बाद फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका की ओर से पेश किया गया था। पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। जिस तरह से सभी शक्तिशाली देश अज़हर को आतंकी घोषित करने की पहल में लगे हुए हैं, भारत को पाकिस्तानी आतंकी गतिविधियों के ख़िलाफ़ बड़ी सफलता मिलती दिख रही है।

‘जब भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर वंशवादी पार्टी को मिला था पूर्ण बहुमत’

लोकसभा चुनाव अब नजदीक है। ऐसे में लोकतंत्र का असली स्वरूप क्या होना चाहिए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कैसे काम करना चाहिए – इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक ब्लॉग लिखा है। इस ब्लॉग में उन्होंने 2014 के चुनाव में मतदाताओं की प्राथमिकता से लेकर वंशवाद और सत्ता-सुखवाद तक का जिक्र किया है।

पढ़िए उस इंसान का ब्लॉग, जो न सिर्फ प्रधानमंत्री है बल्कि एक ऐसा शख्स भी जिसने बहुमत के बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों को जिन्दा रखने के लिए गठबंधन धर्म को भी बखूबी निभाया।

वह 2014 की गर्मियों के दिन थे, जब देशवासियों ने निर्णायक रूप से मत देकर अपना फैसला सुनाया:

परिवारतंत्र को नहीं, लोकतंत्र को चुना।

विनाश को नहीं, विकास को चुना।

शिथिलता को नहीं, सुरक्षा को चुना।

अवरोध को नहीं, अवसर को प्राथमिकता दी।

वोट बैंक की राजनीति के ऊपर विकास की राजनीति को रखा।

2014 में देशवासी इस बात से बेहद दुखी थे कि हम सबका प्यारा भारत आखिर फ्रेजाइल फाइव देशों में क्यों है? क्यों किसी सकारात्मक खबर की जगह सिर्फ भ्रष्टाचार, चहेतों को गलत फायदा पहुंचाने और भाई-भतीजावाद जैसी खबरें ही हेडलाइन बनती थीं।

तब आम चुनाव में देशवासियों ने भ्रष्टाचार में डूबी उस सरकार से मुक्ति पाने और एक बेहतर भविष्य के लिए मतदान किया था।

वर्ष 2014 का जनादेश ऐतिहासिक था। भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर वंशवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था।

जब कोई सरकार ‘Family First’ की बजाए ‘India First’ की भावना के साथ चलती है तो यह उसके काम में भी दिखाई देता है।

यह हमारी सरकार की नीतियों और कामकाज का ही असर है कि बीते पांच वर्षों में, भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है।

हमारी सरकार के दृढ़संकल्प का ही नतीजा है कि आज भारत ने सेनिटेशन कवरेज में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। 2014 में जहां स्वच्छता का दायरा महज 38% था, वो आज बढ़कर 98% हो गया है। हमारी सरकार के प्रयासों से ही हर गरीब का आज बैंक में खाता है। जरूरतमंदों को बिना बैंक गारंटी के लोन मिले हैं। भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया गया है। बेघरों को घर उपलब्ध कराए गए हैं। गरीबों को मुफ्त चिकित्सा की सुविधा मिली है और युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिले हैं।

आज हर क्षेत्र में हुए इस बुनियादी परिवर्तन का अर्थ यह है कि देश में एक ऐसी सरकार है, जिसके लिए देश की संस्थाएं सर्वोपरि हैं।

भारत ने देखा है कि जब भी वंशवादी राजनीति हावी हुई तो उसने देश की संस्थाओं को कमजोर करने का काम किया।

संसद:

16वीं लोकसभा की कुल प्रोडक्टिविटी शानदार तरीके से 85% रही, जो 15वीं लोकसभा से कहीं अधिक है।

वहीं 2014 से 2019 के बीच राज्यसभा की प्रोडक्टिविटी 68% रही।

अंतरिम बजट सत्र में लोकसभा की प्रोडक्टिविटी जहां 89% रही, वहीं राज्यसभा में यह महज 8% देखी गई।

दोनों सदनों की प्रोडक्टिविटी के इन आंकड़ों का क्या अर्थ है, इसे देश भली-भांति जानता है। यह स्पष्ट हो जाता है कि जब भी किसी गैर वंशवादी पार्टी की संख्या सदन में अधिक होती है तो उसमें स्वाभाविक रूप से अधिक काम करने की प्रवृत्ति होती है।

देशवासियों को यह पूछना चाहिए कि आखिर राज्यसभा ने उतना काम क्यों नहीं किया, जितना लोकसभा में हुआ? वे कौन सी शक्तियां थीं, जिन्होंने सदन के भीतर इतना हंगामा किया और क्यों?

प्रेस और अभिव्यक्ति:

वंशवाद को बढ़ावा देने वाली पार्टियां कभी भी स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता के साथ सहज नहीं रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया सबसे पहला संवैधानिक संशोधन फ्री स्पीच पर रोक लगाने के लिए ही था। फ्री प्रेस की पहचान यही है कि वो सत्ता को सच का आईना दिखाए, लेकिन उसे अश्लील और असभ्य की पहचान देने की कोशिश की गई।

यूपीए के शासनकाल में भी ऐसा ही देखने को मिला, जब वे एक ऐसा कानून लेकर आए, जिसके मुताबिक अगर आपने कुछ भी ‘अपमानजनक’ पोस्ट कर दिया तो आपको जेल में डाल दिया जाएगा।

यूपीए के ताकतवर मंत्रियों के बेटे के खिलाफ एक ट्वीट भी निर्दोष आदमी को जेल में डाल सकता था।

कुछ दिनों पहले ही देश ने उस डर के साये को भी देखा, जब कुछ युवाओं को कर्नाटक में एक कार्यक्रम के दौरान अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया, जहां कांग्रेस सत्ता में है।

लेकिन, मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि किसी भी तरह की धमकी से जमीनी हकीकत नहीं बदलने वाली है। अगर वे जबरदस्ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने का प्रयास करेंगे, तब भी कांग्रेस को लेकर लोगों की धारणा नहीं बदलेगी।

संविधान और न्यायालय:

25 जून, 1975 की शाम जब सूरज अस्त हुआ, तो इसके साथ ही भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की भी तिलांजलि दे दी गई।

तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा जल्दबाजी में दिए गए रेडियो संबोधन को सुनें तो स्पष्ट होता है कि कांग्रेस एक वंश की रक्षा करने के लिए किस हद तक जा सकती है।

आपातकाल ने देश को रातों-रात जेल की कोठरी में तब्दील कर दिया। यहां तक कि कुछ बोलना भी अपराध हो गया।

42वें संविधान संशोधन के जरिए अदालतों पर अंकुश लगा दिया गया। साथ ही संसद और अन्य संस्थाओं को भी नहीं बख्शा गया।

जनता की भावनाओं को देखते हुए इस आपातकाल को तो समाप्त कर दिया गया, लेकिन इसे थोपने वालों की संविधान विरोधी मानसिकता नहीं बदली। कांग्रेस ने अनुच्छेद 356 का लगभग सौ बार इस्तेमाल किया। सिर्फ श्रीमती इंदिरा गांधी ने ही लगभग पचास बार ऐसा किया। अगर उन्हें कोई राज्य सरकार या नेता पसंद नहीं आता था, तो सरकार को ही बर्खास्त कर दिया जाता था।

अदालतों की अवमानना करने में तो कांग्रेस ने महारत हासिल कर ली है। श्रीमती इंदिरा गांधी ही थीं, जो “Committed Judiciary” यानि ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ चाहती थीं। वो चाहती थीं कि अदालतें संविधान की जगह एक परिवार के प्रति वफादार रहें।

‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ की इसी चाहत में कांग्रेस ने भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की नियुक्ति करते समय कई सम्मानित जजों की अनदेखी की।

कांग्रेस के काम करने का तरीका एकदम साफ है – पहले नकारो, फिर अपमानित करो और इसके बाद धमकाओ। यदि कोई न्यायिक फैसला उनके खिलाफ जाता है, तो वे इसे पहले नकारते हैं, फिर जज को बदनाम करते हैं और उसके बाद जज के खिलाफ महाभियोग लाने में जुट जाते हैं।

सरकारी संस्थान:

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी एक टिप्पणी में योजना आयोग को ‘A bunch of jokers’ यानि ‘जोकरों का समूह’ कहा था। उस समय योजना आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. मनमोहन सिंह थे।

उनकी इस टिप्पणी से साफ जाहिर होता है कि कांग्रेस सरकारी संस्थाओं के प्रति किस प्रकार की सोच रखती है और कैसा सलूक करती है।

यूपीए शासन के दौर को याद कीजिए, उस समय कांग्रेस ने CAG पर सिर्फ इसलिए सवाल उठाए थे, क्योंकि उसने कांग्रेस सरकार के 2G घोटाला, कोयला घोटाला जैसे भ्रष्टाचार को उजागर किया था।

यूपीए शासन के समय में CBI कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन बनकर रह गई थी- लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों के खिलाफ इसका बार-बार दुरुपयोग किया गया।

आईबी और RAW जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में जानबूझकर तनाव पैदा किया गया।

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय को एक ऐसे व्यक्ति ने फाड़ दिया था, जो कैबिनेट का सदस्य भी नहीं था और वह भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान।

NAC यानि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को प्रधानमंत्री कार्यालय के समानांतर खड़ा कर दिया गया था। और वही कांग्रेस आज संस्थानों की बात करती है!

इतना ही नहीं, जरा याद कीजिए, 1990 के दशक में केरल कांग्रेस के राजनीतिक फायदे के लिए देश की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी ISRO में एक काल्पनिक जासूसी कांड की कहानी गढ़ी गई। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि इसका खामियाजा एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और देश को भुगतना पड़ा।

सशस्त्र बल:

कांग्रेस हमेशा से रक्षा क्षेत्र को कमाई के एक स्रोत के रूप में देखती आई है। यही कारण है कि हमारे सशस्त्र बलों को कभी भी कांग्रेस से वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।

1947 के बाद से ही, कांग्रेस की हर सरकार में तरह-तरह के रक्षा घोटाले होते रहे। घोटालों की इनकी शुरुआत जीप से हुई थी, जो तोप, पनडुब्बी और हेलिकॉप्टर तक पहुंच गई।

इनमें हर बिचौलिया एक खास परिवार से जुड़ा रहा है।

याद कीजिए, कांग्रेस के एक बड़े नेता ने जब सेना प्रमुख को गुंडा कहा तो उसके बाद पार्टी में उसका कद बढ़ा दिया गया। इससे पता चलता है कि अपनी सेना के प्रति भी वे कैसा तिरस्कार का भाव रखते हैं।

जब हमारी सेना आतंकियों और उसके सरपरस्तों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो कांग्रेस के नेता राजनीतिक नेतृत्व पर ‘खून की दलाली’ का आरोप लगाते हैं।

जब हमारी वायुसेना के जांबाज आतंकियों पर हमला करते हैं, तो कांग्रेस उनके दावे पर सवाल उठाती है।

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव:

राजनीतिक दल उस जीवंत संस्था की तरह होते हैं, जहां भिन्न-भिन्न विचारों का सम्मान होता है। लेकिन दुख की बात है कि कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र में कोई विश्वास ही नहीं है।

अगर कोई नेता पार्टी अध्यक्ष बनने का सपना भी देखे, तो कांग्रेस में उसे फौरन बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया में भी उनके व्यवहार में घमंड और अधिकार का भाव दिखाई देता है। वर्तमान में उनका शीर्ष नेतृत्व बड़े-बड़े घोटालों में जमानत पर है। जब कभी कोई अथॉरिटी घोटाले से जुड़े सवाल पूछती है, तो वे लोग जवाब देना तक उचित नहीं समझते।

क्या वे लोग अपनी जवाबदेही से डरे हुए हैं?

जरा सोचिए:

प्रेस से पार्लियामेंट तक।

सोल्जर्स से लेकर फ्री स्पीच तक।

कॉन्स्टिट्यूशन से लेकर कोर्ट तक।

संस्थाओं को अपमानित करना कांग्रेस का तरीका रहा है।

उनकी सोच यही है कि सब गलत हैं, और सिर्फ कांग्रेस सही है। यानि ‘खाता न बही, जो कांग्रेस कहे, वही सही’।

जब भी आप वोट देने जाएं, अतीत को एक बार जरूर याद करें कि किस प्रकार एक परिवार की सत्ता की लालसा के चलते देश ने भारी कीमत चुकाई।

जब उन्होंने हमेशा ही देश को दांव पर लगाया है तो यह तय है कि अब भी वे ऐसा ही करेंगे।

याद रखिए, अगर हम अपनी स्वतंत्रता बचाए रखना चाहते हैं तो हमें हर पल सतर्क रहना होगा।

आइए, हम सजग-सतर्क बनें। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो संवैधानिक संस्थाएं हमें सौंपी हैं, उन्हें और मजबूत बनाने का प्रयत्न करें।

PS: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्लॉग का संपादन नहीं किया गया है। उसे शब्दशः रखा गया है।

‘खेती-किसानी’ में फँस गए शाहरुख खान, मामले में 7 साल की सजा का है प्रावधान

कुछ समय पहले बॉलीवुड के मशहूर कलाकार शाहरुख खान पर बेनामी संपत्ति को लेकर एक केस दर्ज किया गया था। उस समय तो सहायक प्राधिकरण ने जाँच के बाद किंग खान के ख़िलाफ़ लगे सभी आरोपों को ख़ारिज कर दिया था। लेकिन, अब इस मामले ने दोबारा से तूल पकड़ा है। यह मामला अब आयकर विभाग ने अपने हाथ में ले लिया है और प्राधिकरण के फैसले को चुनौती दी है। जिससे शाहरुख की दिक्कतें बढ़ने के काफ़ी आसार हैं।

यह पूरा मामला शाहरुख के फार्म हाउस से जुड़ा हुआ है। इसे लेकर उन पर आरोप है कि उन्होंने फार्म हाउस की जमीन को खेती करने के उद्देश्य से लिया था लेकिन बाद में उन्होंने इस जमीन पर फार्म हाउस बना लिया।

साल 2016 में बेनामी संपत्ति मामले में कुछ बदलाव हुए थे। जिनके आधार पर अगर कोई व्यक्ति बेनामी संपत्ति मामले में दोषी पाया जाता है तो उसे 7 साल की सजा हो सकती है। इसके साथ ही उसे बेनामी संपत्ति की मार्केट कीमत के मुताबिक 25 फीसदी जुर्माना भी लग सकता है। अब इन बदलावों के बाद इसमें फँसने वाली मशहूर हस्तियों में पहला नाम शाहरुख खान का है।

यह मामला सुर्खियों में तब आया जब महाराष्ट्र के डिप्टी कमिश्नर उन 87 प्रॉपर्टी के बारे में जानना चाहे, जिन पर कोस्टल रेगुलेशन कानून के उल्लंघन का आरोप है। इन 87 संपत्तियों में से एक शाहरुख का फार्म हाउस भी है।

महाराष्ट्र टेनेसी एंड एग्रीकल्चर लैंड्स एक्ट के तहत कृषि योग्य ज़मीनों को गैर-कृषि कार्य के लिए इस्तेमाल या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है। ऐसे में शाहरुख का खेती के लिए खरीदी ज़मीन पर फार्म हाउस बनाना, गले की हड्डी बन गया है।

बता दें कि आयकर विभाग ने इस पूरे मामले का आकलन डेजा वु फार्म्स को बेनामदार और शाहरुख खान को फायदा लेने वाला बताते हुए किया था। बेनामी संपत्ति मामले में हुए बदलाव में बेनामदार और फायदा पहुँचने वाले शख्स को सजा मिलने का प्रावधान है।

कहानी बिहार महागठबंधन की: सास ननद भउजाई, दु रोटी में कइसे खाई?

भोजपुरी में एक पुरानी कहावत है, “सास ननद भउजाई, दु रोटी में कइसे खाई ?” ना ही ये कहावत ज्यादा मुश्किल है ना ही ऐसा है कि हिन्दीवासियों को भोजपुरी समझने में मुश्किलें आती हैं। फिर भी, अगर थोड़ी सी भी शंका हो दिमाग में तो बिहार महागठबंधन की वर्तमान हालत देख लीजिए। आपको ये कहावत आसानी से समझ आ जाएगा।

बिहार में कुल 40 लोकसभा सीटें हैं। वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य में देखे तो दो गठबंधन चुनाव लड़ रहे हैं। पहली तो सत्ता पक्ष है NDA जिसमे भाजपा, जदयू और लोजपा शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर हाल ही में बना महागठबंधन है, जिसमें राजद, कॉन्ग्रेस, हम, विकासशील इंसान पार्टी (VIP) और 4.5 साल तक सत्ता सुख भोग के अचानक से सरकार में दोष ढूँढ कर छिटकने वाले कुशवाहा जी की रालोसपा भी है। लेफ्ट के लिए महागठबंधन में लगभग हाँ या ना वाली वैसी ही हालत है, जैसी केजरीवाल की कॉन्ग्रेस ने दिल्ली में कर रखी है।

जब इतनी बड़ी संख्या में सीटें है, खटपट होना तो तय ही था। बात जब सीट शेयरिंग की आई तो राजग में ज्यादा माथापच्ची नही हुई और गठबंधन में अपने साथियों को साथ लेकर ना चलने के लिए ‘बदनाम‘ भाजपा ने बड़े भाई की भूमिका में आते हुए ख़ुशी-ख़ुशी अपनी कुछ सीटें साथी दलों के लिए छोड़ दीं और बड़ी ही आसानी से सीटों का बँटवारा हो गया। असली पेंच फँसा महागठबंधन में जिसका मुख्य मुद्दा ही मोदी को सत्ता से बाहर करना है। शुरुआत में राजद ने अपने लिए 22 सीटें माँगी और कॉन्ग्रेस ने 11 सीटों की डिमांड रखी। उस समय तक कुशवाहा जी राजग में थे तो 4-5 सीटें जीतन राम माँझी की हम को और 1-2 मुकेश साहनी की VIP को आराम से मिल जानी थी लेकिन फिर चार साल सत्ता की मलाई चाटने के बाद कुशवाहा जी अपना चावल लेकर यदुवंश के दूध में खीर पकाने और ‘हम’ तथा ‘VIP’ का पकवान ख़राब करने आ गए।

कुशवाहा जी आए और नया समीकरण कुछ यूँ बना- राजद 21, कॉन्ग्रेस 9, रालोसपा 4-5, हम 2-3, VIP और लेफ्ट 1 सीट पर लड़ेंगे। अब ये समीकरण कॉन्ग्रेस और ‘हम’ को पसंद नही आया। कॉन्ग्रेस 11 से कम पर मानने को तैयार नहीं थी और माँझी को रालोसपा से कमतर कुछ भी मंज़ूर नहीं था। हालाँकि, इस समीकरण पर बिहार की राजनीति की दूसरी धुरी और चारा घोटाले में सजा काट रहे लालू यादव ने मुहर नही लगाया था। आपको बता दें कि बिहार की राजनीति का यह खिलाड़ी जेल में बैठे-बैठे ही राजद के सारे निर्णय ले रहा है।

महागठबंधन तो टूटने की कगार पर है लेकिन अफवाहों के बीच ‘गुप्त सूत्रों’ से फिलहाल ख़बर यह है कि लालू यादव की मर्जी से अब नया समीकरण तय हो चुका है और इसमे राजद को 20, कॉन्ग्रेस को 9, रालोसपा को 5, हम को 4 और लेफ्ट तथा VIP को 1-1 सीटें मिली हैं। अब देखना है कि इसकी आधिकारिक घोषणा कब होती है। जब चुनाव से पहले ही ये हालात हैं तो पता नहीं चुनाव के बाद इनका क्या होगा। घोषणा होने तक इंतजार कीजिए और ये सोच के मज़े लीजिए कि जब सीटों की ये मारामारी है तो प्रधानमंत्री पद के लिए किस हद तक जाया जा सकता है?

होटल को ₹4.5 लाख का चूना लगाकर साउथ की ये हिरोईन हुई फरार, पुलिस ने किया गिरफ्तार

साउथ की 30 से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुकी अभिनेत्री पूजा गाँधी पर आरोप है कि वह एक होटल का बिल चुकाए बिना ही वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गईं।

दरअसल मीडिया खबरों के मुताबिक तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ और बंगाली सिनेमा में 50 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाली पूजा कुछ दिनों पहले बेंगलूरु के एक आलीशान बंगले में ठहरी थीं। जहाँ पर उनके नाम ₹4.5 लाख का बिल बकाया था, लेकिन जैसे ही उन्हें रकम के बारे में पता चला वो होटल से चुपचाप रवाना हो गईं।

होटल के स्टाफ को जब इसका पता चला तो उन्होंने नज़दीक के पुलिस स्टेशन में पूजा के ख़िलाफ़ शिकायत की।
पुलिस कार्रवाई के बाद पूजा को गिरफ्तार करके थाने लाया गया।

यहाँ पूजा ने बताया कि वो ₹2 लाख का बिल पहले ही दे चुकी हैं और बाक़ी का पैसा देने के लिए उन्हें कुछ समय चाहिए क्योंकि अभी उनके पास इतने पैसे नहीं हैं।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि पूजा पैसों के लेन-देन को लेकर ऐसे विवादों का विषय बनी हों। साल 2011 में भी फिल्म निर्माता किरण से पैसों को लेकर उनकी कहा-सुनी हुई थी, जिसके बाद दोनों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ केस दर्ज कराया था।

जाँच में सहयोग नहीं कर रहे रॉबर्ट वाड्रा, सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका में ED ने की कस्टडी में लेने की अपील

मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में सुनवाई करते हुए दिल्ली की एक अदालत ने रॉबर्ट वाड्रा की अग्रिम जमानत की अवधि 25 मार्च तक बढ़ाते हुए उन्हें जाँच में हिस्सा लेने को कहा। स्पेशल जज अरविन्द कुमार की अदालत ने इस बाबत निर्देश जारी किए। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जमानत की अवधि बढ़ने का विरोध करते हुए वाड्रा के जाँच में सहयोग नहीं करने की बात कही। एजेंसी ने कहा कि वह वाड्रा को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती है। प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत में कहा:

“वह विदेश में अपराध और देश में मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल हैं। वाड्रा ने अपराध की रक़म से हासिल की गई संपत्ति से फ़ायदा उठाया है। यह जाँच ब्लैक मनी से संबंधित क़ानून के तहत है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रॉबर्ट वाड्रा राजनीतिक आरोपों में शामिल हो गए हैं। जाँच के दौरान वाड्रा के व्यवहार से यह आशंका बढ़ गई है कि वह अपराध के तरीके और ब्लैक मनी का ख़ुलासा करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जाँच अघोषित विदेशी संपत्तियों और टैक्स से बचने से संबंधित है। जाँच महत्वपूर्ण चरण में है। विभिन्न दस्तावेजों से आरोपी व्यक्तियों की मिलीभगत का संकेत मिलता है। वाड्रा ‘बेहद प्रभावशाली व्यक्ति हैं और इस वजह से उनके सबूतों के साथ गड़बड़ी करने और जाँच में रुकावट डालने की आशंका है।”

प्रवर्तन निदेशालय ने कहा कि उसने मामले की जाँच के दौरान जब्त की गई डिवाइसेज और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के दौरान उनके हाथ लगे इमेल्स से इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि वाड्रा और उनके अन्य सहयोगियों के विदेशों में अघोषित संपत्ति होने के पर्याप्त सबूत मिले हैं। ये अपराध गंभीर हैं और इसमें 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। पूछताछ के दौरान वाड्रा के वकील की मौजूदगी पर सवाल खड़ा करते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने इसका विरोध किया। एजेंसी ने कहा कि पूछताछ के दौरान वकीलों की मौजूदगी का क़ानून में प्रावधान तो है लेकिन यह एक सम्पूर्ण अधिकार नहीं है। एजेंसी ने इसे देशहित के साथ संतुलित रखने की सलाह दी।

अदालत में सुनवाई के दौरान हथियार दलाल संजय भंडारी की भी चर्चा हुई। बता दें कि ऑपइंडिया ने कुछ दिनों पहले ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के भंडारी के साथ संबंधों का ख़ुलासा कर राजनीतिक भूचाल ला दिया था। इस बाबत केंद्रीय मंत्रियों स्मृति ईरानी और रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कॉन्ग्रेस से जवाब माँगा था। प्रवर्तन निदेशालय ने संजय भंडारी के बारे में कहा कि वह लुकआउट नोटिस के बावजूद देश से फरार हो गया है और उसके ब्रिटेन में होने के संदेह हैं।

वाड्रा ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने दलील दी कि उन्हें ग़ैरज़रूरी और अनुचित तरीके से दुर्भावनावश इस मामले में घसीटा जा रहा है। रॉबर्ट वाड्रा पर विदेशों में अघोषित संपत्ति ख़रीद सहित कई अवैध ज़मीन ख़रीद के मामलों में केस चल रहा है। दिल्ली की एक अदालत ने मनी लाउंड्रिंग केस में दिल्ली में चल रही जाँच के मामले में उनकी अंतरिम ज़मानत अवधि 19 मार्च तक के लिए बढ़ा दी थी।

कसाई शब्बीर गुरफान के साथ 3 लोग गिरफ़्तार: बरखा को भेजी थी ‘गंदी’ फोटो और ‘गंदी’ बात

दिल्ली पुलिस ने 45 वर्षीय कसाई शब्बीर गुरफान पिंजरी को सूरत से गिरफ्तार किया है। उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। शब्बीर पर आरोप है कि उसने पिछले महीने पत्रकार बरखा दत्त को एक अश्लील तस्वीर (लिंग की) भेजी थी। शब्बीर के अलावा अश्लील मैसेज भेजने के आरोप में तीन अन्य युवकों (23 वर्षीय राजीव शर्मा, 31 वर्षीय हेमराज कुमार और 34 वर्षीय आदित्य कुमार) को भी गिरफ्तार किया गया है।

दिल्ली पुलिस के द्वारा गिरफ्तार किए गए इन चारों आरोपियों का कहना है कि उन्हें सोशल नेटवर्किंग साइट पर बरखा दत्त का नंबर मिला था। उन्होंने यह भी कहा कि बरखा दत्त के मोबाइल नंबर को सोशल मीडिया पर ‘एस्कॉर्ट सर्विस’ के लिए उपलब्ध करके प्रचारित किया गया था। तभी उन लोगों ने अपनी तरफ से इस तरह का मैसेज भेजा।

पिछले महीने 18 फरवरी को बरखा दत्त को अनजान नंबर से उनके व्हाट्सएप पर अश्लील तस्वीर (लिंग की) भेजी गई थी। इसी के संबंध में दिल्ली पुलिस के पास उन्होंने अपनी शिकायत दर्ज की थी। लेकिन ट्विटर पर वो गलती कर गईं थी यह कहकर कि राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें लिंग की तस्वीर भेजी गई है।

बरखा दत्त के साथ जिस भी इंसान ने यह घिनौनी हरकत की थी, उसका साथ कोई भी इंसान (दिमाग वाला) नहीं दे सकता। लेकिन खुद बरखा ने भी जो आरोप राष्ट्रवाद के नाम पर मढ़ दिया, उसका समर्थन भी कोई इंसान (दिमाग वाला) नहीं कर सकता।

यही कारण है कि हमारे संपादकीय टीम की तेज-तर्रार जयंती मिश्रा ने बरखा के लिए यह लिखा था, जो आज भी प्रासंगिक है – बरखा जी… जो हुआ वो गलत है लेकिन आप राष्ट्रवाद और यौन शोषण में पहले फर्क समझिए