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आतंकियों पर ‘एयर स्ट्राइक’ के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा ‘शुक्रिया IAF’

पुलवामा आतंकी हमले के बाद सरकार और भारतीय सेना से, मीडिया से लेकर आम जनमानस तक यही उम्मीद लगाए बैठा था कि मोदी सरकार इस बार आतंकवादियों को जरूर कोई सबक सिखाएगी। मंगलवार (फरवरी 26, 2019) की सुबह देशवासियों को सबसे पहली यही खबर मिली कि भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के घर में घुसकर जैश-ए-मोहम्मद के अड्डे पर ‘एयर स्ट्राइक’ से 1000 किलो बमबारी कर तहस-नहस कर दिया, जिसमें 300 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए। इसके बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।

भारतीय वायुसेना के 12 मिराज-2000 लड़ाकू विमानों ने बालाकोट, चाकोटी और मुजफ्फराबाद में आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को इस हमले में ध्वस्त कर दिया।

पुलवामा हमले के जवाब में भारत की एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान से लेकर भारतीय मीडिया के समुदाय विशेष में बौखलाहट देखने को मिल रही है। देशभर के लोगों में जहाँ एक बड़ा वर्ग भारतीय वायुसेना के इस जज़्बे से उत्साहित है वहीं एक ऐसा वर्ग भी है, जो आतंकवादियों पर हुई इस दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक से सदमे में चला गया है।

देखते हैं सोशल मीडिया पर क्या रही लोगों की प्रतिक्रिया

भारतीय वायुसेना की इस प्रतिक्रिया पर भारतीय सेना ने भी ट्वीट किया है। इंडियन आर्मी के ट्विटर हैंडल से इस कविता को ट्वीट किया गया है, ”क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुए विनत जितना ही, दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही।”

भारतीय वायुसेना की इस विजय गाथा पर प्रियंका गाँधी के भाई और कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी ट्वीट कर सिर्फ भारतीय वायुसेना के ‘पायलेट्स’ को सैलूट करते हुए ट्वीट किया। जिसके जवाब में ऑपइंडिया CEO राहुल रौशन ने कटाक्ष करते हुए लिखा, “क्या आप उन्हीं ‘पायलेट्स’ को सैलूट कर रहे हैं, जिन्हें आप नहीं चाहते कि आधुनिक फाइटर जेट्स दिया जाए, क्योंकि आपके परिवार को ‘कमीशन’ नहीं मिल रहा था?” राहुल रौशन का इशारा कॉन्ग्रेस पार्टी के राफ़ेल विमान को लेकर कॉन्ग्रेस की असहमति को लेकर था।

पूर्व सेनाध्यक्ष और वर्तमान भाजपा संसद जनरल वीके सिंह ने अपने ट्विटर एकाउंट पर भारतीय वायुसेना को धन्यवाद देते हुए एक ऐसी तस्वीर के ज़रिए अपनी बात रखी है, जिसमें बाज साँप को दबोच रहा है। इसके साथ उन्होंने लिखा है, “वो कहते हैं कि वो इंडिया को 1000 घाव देना चाहते हैं, हम कहते हैं कि जब भी तुम हम पर हमला करोगे, हम हर बार और मजबूती और ताकत से तुम्हें सबक सिखाएँगे।”

वरुण गाँधी ने भी ट्वीट के माध्यम से सेना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आतंकवादी अड्डों को तबाह करने के लिए बधाई दी है।

सामाजिक मुद्दों पर अक्सर मुखर रहने वाले लोगों के चाहते वीरेंद्र सहवाग ने अपने ही अंदाज में वायुसेना के इस पराक्रम पर ट्वीट किया है। सहवाग ने लिखा है, “लड़कों ने बहुत अच्छा खेला, सुधर जाओ, वरना सुधार देंगे।”

@Oyevivekk नाम के ट्विटर यूज़र ने 2009 में हुए मुंबई आतंकी हमले से पुलवामा हमले की तुलना करते हुए कॉन्ग्रेस सरकार और मोदी सरकार की तुलना की है। विवेक ने लिखा है कि 2009 में सरकार को कड़ा एक्शन लेने की राय दी गई थी लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसमें असमर्थता जताई थी। जबकि वर्तमान सरकार ने तुरंत सैनिकों की मौत का बदला लिया और सैनिकों के मनोबल को बढ़ाया है, इसलिए देश को नरेंद्र मोदी की जरूरत है।

@rishibagree ने अपने ट्वीट में लिखा है कि पाकिस्तानी आतंकवादियों को मरने के लिए अब LOC पार करने की जरूरत नहीं है, हमारी वायुसेना अब ‘होम डिलीवरी’ कर के अपना लक्ष्य पूरा कर रही है।

ट्विटर सेलिब्रिटी @Gabbbarsingh ने पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर के ट्वीट पर जबरदस्त व्यंग्य करते हुए लिखा कि घटनास्थल पर तुम्हारे एयरक्राफ्ट से पहले तुम्हारा फोटोग्राफर पहुँच गया है। गफूर ने आज सुबह घटनास्थल की तस्वीरें ट्वीट कर ये बताया था कि मुजफ्फराबाद सेक्टर में भारतीय विमानों ने घुसपैठ की कोशिश की।

अक्षय कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया में ट्वीट किया है कि आतंकवादियों के ठिकानों को खत्म करने पर हमें अपनी भारतीय वायुसेना पर गर्व है। साथ ही कि ‘अंदर घुस के मारो!’

सर्जिकल स्ट्राइक-II के बाद पत्रकारिता का धूर्त गिरोह सदमे में

पुलवामा हमले के बाद से ही देश के हर व्यक्ति के सीने में बदले की आग जल रही थी। हर कोई देश की सेना से और सरकार से उम्मीद लगाए बैठा था कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जल्द से जल्द कुछ किया जाए। ऐसे में IAF द्वारा पाकिस्तान में किए गए इस मेजर ऑपरेशन से न केवल जवानों को सच्ची श्रद्धांजलि मिली है, बल्कि आम जनता के आक्रोश को भी शांति मिली है।

देश के हर नागरिक में इस समय उत्साह की लहर है। लेकिन, IAF की इस उपलब्धि के बाद एक तरफ जहाँ पाकिस्तान में हलचल मच गई, वहीं हमारे देश में भी मीडिया समुदाय के कुछ लोग हैं जो एक्शन में आ गए।

IAF के एक्शन के बाद सोशल मीडिया पर लगातार लोगों की प्रतिक्रिया देखकर इन लोगों में खलबली मचनी शुरू हो गई। IAF समेत केंद्र सरकार की बड़ी कामयाबी पर तो इस ‘टुकड़ी’ से कुछ बोला नहीं जा रहा है, लेकिन लोगों के पूरे मामले को तोड़-मरोड़कर अलग-अलग दिशा में दिखाने के लिए यह लोग प्रयासरत हैं।

सागरिका घोष, प्रोपेगेंडा पत्रकारिता जगत की एक बड़ी हस्ती हैं। एक तरफ जहाँ पूरा देश इस कामयाबी को सराहने में जुटा है, वहीं सागरिका ट्वीट करके सवाल दाग रही हैं कि कौन से बालाकोट में IAF द्वारा बम गिराए गए हैं? पीओके के बालाकोट में या फिर पखतूनख्वा के बालाकोट में? सागरिका अपने सवाल के लिए आधिकारिक पुष्टि का इंतजार कर रही हैं।

इनके अलावा सोशल मीडिया पर और भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो बेतुके सवाल पैदा करके अपने फॉलोवर्स को बरगलाने की कोशिशें कर रहे हैं। मुशर्रफ ज़ैदी इसका ही उदाहरण हैं। इन्हीं के ट्वीट पर सागरिका ने अपना सवाल किया है।

कुछ दिन पहले तक जम्मू-कश्मीर के लोगों के प्रति शांति बनाए रखने की गुहार लगाते उमर अब्दुल्ला ने अपने ट्वीट के ज़रिए पाकिस्तान के पीएम इमरान खान के लिए चिंता जताई है और कहा है कि अब दिक्कत इमरान के लिए है क्योंकि उन्होंने कुछ दिन पहले कहा था कि भारत के एक्शन लेने पर पाकिस्तान भी जवाब देगा। अपने ट्वीट में वो पूछ रहे हैं कि इस कदम की क्या प्रतिक्रिया होगी? साथ ही संशय की स्थिति में हैं कि क्या भारत को पाकिस्तान के हमले का जवाब देना चाहिए था?

अक्सर सरकार विरोधी बयानों के लिए चर्चा में रहने वाली राणा अयूब ने इस मौक़े पर पीएम मोदी पर सवाल उठाया है कि पहले मोदी गाँधी पीस अवार्ड में शामिल हुए और कुछ मिनट बाद वो चुरू में जनसभा को संबोधित करेंगे। आज के दिन राणा के इस तरह के पोस्ट को क्या समझा जाए?

मौकापरस्ती का घोर उदाहरण पेश करने वाले शाह फैसल भी इस मौके पर चुप नहीं बैठ पाए। IAF की बड़ी कामयाबी पर अपनी राजनीति करते हुए ट्वीट करके पूछ रहे हैं कि इन सबसे कौन हार रहा है और किसे फायदा हो रहा है?

राहुल गाँधी ने भी अपने ट्वीटर हैंडल से एक ट्वीट किया जिसमें वो IAF के पॉयलटों को सैल्यूट कर रहे हैं। इस ट्वीट से मालूम पड़ता है कि वंशवाद की थ्योरी पर चल रही पार्टी के अध्यक्ष यही सोचते हैं कि IAF में बिना टीम के पायलट ही पूरी ऑपरेशन को मुमकिन कर आए।

बता दें इस समय सोशल मीडिया पर इस तरह के पोस्ट और ट्वीट करने वाला गिरोह पूर्ण रूप से सक्रिय हो रखा है। अपनी विचारधारा में लपेट कर इस कामयाबी पर सवालों की झड़ी लगाने वाले यह वहीं लोग हैं, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत माँगे थे। हर बार युद्ध के नाम पर अपनी कथित संवेदनाओं को जगा देने वाले तमामों लोग पुरजोर कोशिशें कर रहे हैं कि किसी भी तरह से चुनाव में सरकार को इसका फायदा न हो जाए।

मुझे नहीं पता कि जम्मू-कश्मीर में तिरंगे की जगह कौन से झंडे लोग लहराने को मजबूर होंगे : महबूबा

जब अपने ही नींव में मट्ठा डालने पर आमादा हो तो उन्हें कौन समझाए? कभी यहाँ के चैनल्स पुलवामा के बाद पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता के गलत बयानों वाले प्रेस कॉन्फ्रेंस का प्रसारण कर पाकिस्तान को नैतिक सम्बल देते हैं कि देखो तुम्हारी बात सही है तभी तो हम (भारत के चैनल) तुम्हे दिखा रहे हैं, बिना किसी विरोध के। हाँ, इसके पीछे की मानसिकता यही है कि हर हाल में देशहित का विरोध और राष्ट्रविरोधियों का समर्थन करना है। कभी यहाँ के नेताओं के बयानों का, तो कभी कुछ विरोधी पोर्टलों और मीडिया चैनलों के रिपोर्टों का प्रयोग पाकिस्तान न सिर्फ़ अपनी जनता को यकीन दिलाने के लिए बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में बतौर सबूत भी इस्तेमाल करता है।

ख़ैर, अभी बात जम्मू-कश्मीर के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती की, जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खुली छूट का गलत प्रयोग करते हुए एक बार फिर आतंकियों को उकसाने वाला बयान दे दिया है,  मुफ़्ती ने खुलेआम कहा “आग से मत खेलो, अनुच्छेद -35 A के साथ छेड़छाड़ न करें, अन्यथा आप वो देखेंगे जो आपने 1947 से अभी तक नहीं  देखा है। अगर उस पर (अनुच्छेद-35 A) हमला होता है तो मुझे नहीं पता कि जम्मू-कश्मीर में तिरंगे की जगह कौन से झंडे लोग लहराने को मजबूर होंगे।”

मुफ़्ती जी, आपका यह बयान, भारत सरकार को धमकी है या आप बता रही हैं कश्मीर में छिपे पाकिस्तानी आतंकियों को कि क्या करना है? आप ये बताइए कि क्या कश्मीर इस देश का हिस्सा नहीं, जो वहाँ के कानून न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं? एक अच्छे लोकतान्त्रिक देश की पहचान होती है कि समय के साथ वह भी परिवर्तनशील हो। वहाँ कानून वक़्त की ज़रूरत के हिसाब से न्यायसंगत हों, न कि किसी तरह के तुष्टिकरण को बढ़ावा देते हुए अपने ही देश के दूसरे लोगों के साथ अन्याय करें।

आपसे तो पहला सवाल यही है कि क्या आप नहीं चाहतीं कि कश्मीरियों का भला हो? या सिर्फ़ राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता की लालसा में लगातार कश्मीर को आतंक और देशद्रोह की फैक्ट्री बनाए रखना चाहती हैं?  

मुफ़्ती जी, माना कि आप अभी भी अपने पिता के विरासत को सँभालने में लगी हुई हैं। सत्ता के लिए राजनीति ठीक है लेकिन उसका स्तर इतना नीचे मत गिराइए कि आप कश्मीर को पाकिस्तान परस्त आतंकी राज्य में ही बदल डालिए।

याद है पिछले दिनों बिजबिहाड़ा में आपने अपने पिता के आत्मा की शांति के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में सेना की कार्रवाई में मारे गए आतंकी को शहीद का दर्ज़ा दे डाला था। आपने कश्मीर के नौजवानों से कहा था कि मैं आपकी माँ समान ही हूँ। अच्छा है! बहुत ख़ूब! लेकिन जब आपको घाटी को जहन्नुम बनाने पर आमादा आतंकियों के मर जाने पर पीड़ा होने लगी तो क्या तब आप उसी कश्मीर के अपने दूसरे बेटों को भूल गईं, जो इन आतंकियों के गोलियों का, पत्थरों का लगातार शिकार और लहूलुहान होते रहें।

जानती हैं, आप जैसे नेताओं की वजह से ही कश्मीर में आतंक न सिर्फ पनप रहा है बल्कि फल-फूल भी रहा है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद एक तरफ जहाँ सरकार आतंक की नर्सरी पर लगाम लगाने के मूड में है। वहीं आप लगातार आतंक, आतंकियों और उसके सरंक्षण कर्ताओं को प्रश्रय दे रही हैं।

सरकार जिस समय अलगाव वादी और घाटी में अशांति फैलाने वाले नेताओं पर कार्रवाई कर रही थी तो आप ट्वीट कर सरकार से पूछ रही थी कि किस कानून के तहत हुर्रियत नेताओं और जमात के कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया है? आपने तो एक कालजयी डॉयलाग भी दे मारा कि ‘आप लोगों को कैद कर सकते हैं, लेकिन उनके विचारों को क़ैद नहीं कर सकते।’

आपको तो पता ही होगा जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने शाह महमूद कुरैशी ने भारत को घेरने के लिए किया। लेकिन आपको राजनीति से फुरसत हो तब न देशहित की बात सोंचे।

कितना याद दिलाऊँ आपने तो आतंक के प्रति अपनी मुहब्बत का इज़हार करते हुए यहाँ तक कह दिया था, “मैं हमेशा से कहती रही हूँ कि कश्मीरी आतंकी (लोकल मिलिटेंट) मिट्टी के लाल हैं। हम लोगों का प्रयास हर हाल में लोकल मिलिटेंट को बचाने का होना चाहिए न सिर्फ़ हुर्रियत बल्कि जम्मू-कश्मीर के ‘बंदूकधारी लड़ाकों’ के पक्ष में हूँ।”

याद है आपको, आपका यह बयान भी ऐसे समय में आया था, जब राज्य में आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए सेना लगातार छापेमारी कर रही थी। गर सेना ने मौत के घाट उतार दिए होते उन आतंकियों को तो शायद पुलवामा में 40 CRPF के जवानों की जान नहीं गई होती!  

आप कहती हैं कि आतंकियों से बातचीत की जाए, बातचीत अच्छी बात है लेकिन तब जब आतंक पर लगाम लगे। एक तरफ कोई निर्दोष लोगों को जान से मार देने पर आमादा हो और आप कहें कि इन आतंकियों को मत मारिए, इनसे बातचीत कीजिए। क्या यह सही है?

बातचीत तब होगी जब वह बातचीत के लिए तैयार हो, इस देश ने आतंकियों को जितने मौके दिए उतना किसी ने नहीं दिया। बार-बार पाकिस्तान को मौका देने के बावजूद भी क्या वह अपनी हरकतों से बाज आया है? नहीं, आज भी वहाँ आतंक की खेती जारी है। और जब अब उस पर लगाम कसने की तैयारी हो रही तो सब पिनपिना रहें हैं जो कहीं न कहीं उसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थक हैं।

ख़ैर, आपको कितना याद दिलाया जाए, उससे कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं होने वाला, लेकिन फिर भी 30 दिसंबर 2018 की एक घटना याद दिला रहा हूँ जब आप एक संदिग्ध आतंकी के परिवार से मिलकर भारतीय सेना व गवर्नर को चेतावनी दे रहीं थी। आपने कहा था कि यदि आतंकवादियों के परिजनों के साथ उत्पीड़न नहीं रुका तो इसके ‘ख़तरनाक परिणाम’ होंगे। क्या अभी तक घाटी के आम लोग और सुरक्षा बल जो भुगत रहें वो कम ख़तरनाक है?

चुनाव आने वाले हैं महबूबा जी, आपकी भी मजबूरी होगी आतंक और आतंकियों को प्रश्रय देना, लगातार उनके पक्ष में बयान देना। शायद आपको भी शांति अच्छी नहीं लगती होगी।

पहली महिला डॉक्टर: आनंदी गोपाल ने आज के दिन कहा था दुनिया को अलविदा

महिला शिक्षा आज जहाँ अभियानों का एक महत्तवपूर्ण हिस्सा है, वहीं एक समय में महिला शिक्षा का मतलब समाज में विरोध की आवाज़ों को बुलंद करना था। भारत में जब लोग महिला के अपने विचार रखने तक पर नाराज़ हो जाया करते थे उस दौर में आनंदी गोपाल जोशी नाम की महिला ने अपने हिस्से में प्रथम महिला डॉक्टर की उपाधि दर्ज की थी। मात्र 22 साल की उम्र में वह अपने जीवन के हर दौर को देखकर दुनिया को अलविदा भी कह गईं।

टीबी के कारण आज की तारीख़ 26 फरवरी साल 1887 को आनंदी गोपाल जोशी ने अपनी उपलब्धियों को जीवंत छोड़कर शरीर हमेशा के लिए त्याग दिया। आज महिलाओं के लिए आनंदी एक मानक है। उनके संघर्षों और उनके जीवन के अहम बिंदुओं को समय-समय पर याद करते रहना इसलिए भी जरूरी है ताकि शिक्षा को लेकर जागरुकता फैले।

9 साल की उम्र में विवाह

आनंदी गोपाल जोशी का जन्म 31 मार्च 1865 को हुआ और मात्र 9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह उनसे बीस साल उम्र में बड़े गोपालराव जोशी से हुआ। शादी से पहले आनंदी का नाम यमुना हुआ करता था लेकिन शादी के बाद उन्होंने इसे बदलकर आनंदी रख लिया। आनंदी के पति पहले कल्याण के पोस्ट ऑफिस में क्लर्क का काम करते थे, लेकिन इसके बाद उनका तबादला पहले अलीबाग और फिर कलकत्ता में हो गया। आनंदी में शिक्षा के प्रति रूझान देखकर उनके पति ने उन्हें बढ़ावा दिया और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने और अंग्रजी सीखने में मदद की।

(मराठी उपन्यासकार श्री.ज. जोशी ने आनंदी पर लिखे ‘आनंदी गोपाल’ उपन्यास में लिखा है कि गोपालराव से शादी करने से पहले आनंदी की शर्त थी कि वे आगे पढ़ाई करेंगी, क्योंकि आनंदी के घर वाले भी उनकी पढ़ाई के ख़िलाफ़ थे। लेकिन गोपाल राव ने उन्हें क, ख, ग से पढ़ाया। आनंदी पर लिखा यह उपन्यास इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है)

14 साल में संतान

शादी के पाँच साल बाद 14 की उम्र में उन्होंने अपनी पहली संतान को जन्म दिया। लेकिन, स्वास्थ सुविधाओं की कमी के कारण उस नवजात की मृत्यु हो गई। आनंदी के जीवन में उनके बेटे की मौत ही बदलाव का कारण बनी। इस घटना के बाद ही उन्होंने शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर बनने की ठानी।

पति से मिला प्रोत्साहन

पति की तरफ से मिलते प्रोत्साहन ने आनंदी के संकल्प को और भी दृढ़ कर दिया। पत्नी की रूचि मेडिकल में देखते हुए गोपालराव ने अमेरिका के रॉयल विल्डर कॉलेज को खत लिखा और आनंदी की पढ़ाई के लिए आवेदन किया।

इस आवेदन पर विल्डर कॉलेज ने उनके आगे प्रस्ताव रखा कि उन्हें ईसाई धर्म अपनाना होगा, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। इसके बाद न्यू जर्सी के निवासी ठोडीसिया कारपेंटर नामक व्यक्ति को इन सब बातों के बारे में पता चला, तो उन्होंने इन्हें पत्र लिखकर अमेरिका के आवास के लिए मदद का आश्वासन दिया।

साल 1883 में गोपाल राव ने आनंदी को मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश भेजने के लिए अपना मन पक्का कर लिया। एक डॉक्टर कपल ने सुझाव दिया कि उन्हें मेडिकल कॉलेज ऑफ़ पेन्सिल्वेनिया से पढ़ाई करनी चाहिए। मन में दृढ़ संकल्प था और रास्ता दिखाने वाले लोग भी आनंदी को मिल रहे थे। लेकिन सामाजिक अड़चनें पीछा नहीं छोड़ रही थी।

विरोध की आवाज़ें उठीं, लेकिन आनंदी ने उन्हें समर्थन में बदल दिया

आनंदी के बढ़ते कदमों को देखकर लोगों में विरोध की आवाज़ बड़े पैमाने पर सुनाई पड़ी। लोगों में संतोष जगाने के लिए आनंदी ने श्रीराम कॉलेज में अपना पक्ष लोगों के सामने रखा। उन्होंने इसकी जरूरत से लोगों को अवगत कराया और साथ ही आश्वासन दिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वो और उनका परिवार ईसाई धर्म नहीं स्वीकारेंगे। उन्होंने लोगों से कहा कि वह वापस लौटकर यहाँ मेडिकल कॉलेज खोलने का भी प्रयास करेंगी। आनंदी की इन बातों से लोगों के मन में आश्वासन पसरा और देश भर से लोगों द्वारा उन्हें पैसे का सहयोग भी मिला और समर्थन भी।

डॉक्टर बनने की राह में…

साल 1883 में वह अमेरिका पहुँची और मेडिकल कॉलेज ऑफ पेंसिल्वेनिया को आवेदन किया। उनकी इच्छा को कॉलेज द्वारा स्वीकार लिया गया और मात्र 19 साल की उम्र में मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया।

इसके बाद 1886 में उन्होंने अपनी एमडी की शिक्षा पूर्ण की, जिसके लिए क्वीन विक्टोरिया ने खुद इसके लिए बधाई दी। लेकिन शिक्षा के दौरान वह अमेरिका के ठंड से भरे मौसम को झेल नहीं पाई और लगातार बीमार पड़ती चलीं गई। नतीजन कुछ समय बाद वह टीबी की चपेट में आ गई।

भारत लौटकर महिलाओं का किया इलाज

डिग्री प्राप्त करने के बाद से आनंदी भारत लौटी और सबसे पहले उन्होंने कोलाहपुर में अपनी सेवा प्रदान की। यह भारत की महिलाओं के लिए बेहद गर्व और संतोष की बात थी कि पहली बार उनके इलाज के लिए कोई महिला डॉक्टर उपलब्ध थी।

टीबी ने 22 साल की उम्र में ली उनकी जान

लेकिन, टीबी की बीमारी से जूझती इस डॉक्टर ने बीमारी के आगे हार मान ली, 26 फरवरी यानि आज के ही दिन 1887 में उनका निधन हो गया। केवल 22 वर्ष की उम्र में उनका निधन देश के लिए बहुत बड़ी क्षति थी। अपनी छोटी सी उम्र में उन्होंने वो कर दिखाया जिसका अंदाजा किसी को भी नहीं था।

उन्होंने महिला शिक्षा को आगे बढ़ने के लिए उम्मीद की किरण दिखाई। जिस समय वह गई उस समय पूरा देश उनकी मृत्यु के शोक में था, लेकिन उनकी उपलब्धियाँ जिंदा थीं। आनंदी की राख को न्यू जर्सी ठोडिसिया कारपेंटर को भेजा गया, इसे वहाँ के कब्रिस्तान में जगह मिली है।

आज आनंदी गोपाल जोशी के नाम पर मेडिकल क्षेत्र में बड़े सम्मान दिए गए। इसमें इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च एंड डॉक्यूमेंटेशन इन सोशल साइंस और लखनऊ के एक गैर सरकारी संस्थान ने मेडिसिन के क्षेत्र में आनंदीबाई जोशी सम्मान देने की शुरुआत की यह उनके प्रति एक बहुत बड़ा सम्मान है। साथ ही महाराष्ट्र की सरकार ने इनके नाम पर युवा महिलाओं के लिए एक फेलोशिप प्रोग्राम की पहल की। इसके साथ ही शुक्र ग्रह पर एक क्रेटर का नाम भी उनके ही नाम पर रखा गया है।

#India_Strikes_Back पाकिस्तानियों ने अपनी आर्मी और सरकार को जमकर लताड़ा, ट्विटर पर गाली-गलौच भी

पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को भारत ने चौतरफा घेरा। आर्थिक से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक और सामरिक से लेकर रसद सप्लाई तक। यह घेराव इतना ‘कष्टदायक’ था कि पाक पीएम इमरान को शांति के लिए याचना मोड में आना पड़ा। जो भी रही-सही कसर थी, उसे 26 फरवरी को पूरा कर दिया गया – पाक में घुस कर, भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों द्वारा लगभग 300 आतंकियों को मार कर।

इसकी प्रतिक्रिया हुई। पाकिस्तानी सरकार द्वारा और वहाँ की जनता से भी। जहाँ पाक सेना ने ‘कुछ भी नहीं हुआ, भारतीय वायु सेना के जहाज जल्दी भाग गए’ बोलकर अपनी इमेज बचाई, वहीं पाकिस्तानी नागरिकों ने अपनी सरकार और आर्मी की जमकर क्लास लगाई।

आपको बता दें कि भारतीय वायुसेना ने क़रीब 12 मिराज-2000 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करते हुए PoK में मौजूद आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया। भारतीय वायुसेना ने 1000 किलोग्राम वजन वाले बम गिरा कर पाकिस्तानी ज़मीन पर स्थित कई आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया। भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी दी कि नियंत्रण रेखा के पार बालाकोट में स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर भारत ने हवाई हमला कर उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान में तबाही मचाने के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तानी ड्रोन को भी मार गिराया

भारतीय वायुसेना ने मंगलवार तड़के पाकिस्तान के बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के मुख्य ठिकाने पर हवाई हमला किया, जिसमें विदेश सचिव विजय गोखले के अनुसार बड़ी संख्या में आतंकवादी, उनके ट्रेनर तथा वरिष्ठ कमांडर ढेर हो गए हैं। विदेश सचिव के मुताबिक, कैम्प का संचालन जैश के सरगना मसूद अज़हर का बहनोई यूसुफ अज़हर कर रहा था, जो मारा गया है।

पाकिस्तान में तबाही मचाने के बाद इंडियन एयर फोर्स के फाइटर प्लेन भारतीय सीमा में वापस आ गए। इसके कुछ ही घंटों के बाद एक पाकिस्तानी ड्रोन ने भारत की सीमा में घुसने की कोशिश की। ये कोशिश गुजरात बॉर्डर पर कच्छ में हुई। यहीं पर इंडियन एयरफोर्स ने पाकिस्तानी ड्रोन को तुरंत ही मार गिराया।

इंडिया टुडे के अनुसार इंडियन इंटेलिजेंस एजेंसियाँ पुलवामा हमले के बाद से ही पाकिस्तान के 13 लॉन्च पैड पर निगरानी रख रहीं थीं। इन्हीं में से एक लॉन्च पैड से पाकिस्तानी ड्रोन ने भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश की।

राम जन्म भूमि मामले में अब 5 मार्च को होगा फैसला

अयोध्या भूमि विवाद पर कोर्ट ने आज (फरवरी 26, 2019) सुनवाई करते हुए कहा है कि कोर्ट इस मामले पर अगले मंगलवार (मार्च 5, 2019) को आदेश देने के लिए निर्णय लेगा कि क्या समय बचाने के लिए मामला अदालत की निगरानी में मध्यस्थता के लिए भेजा सकता है।

बता दें कि आज सुबह राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू हुई, जिसके बाद एक बार फिर से इस मामले को अगले मंगलवार तक के लिए टाल दिया गया।

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ती एस ए बोबड़े, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ की पाँच सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की।

बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के ख़िलाफ 14 याचिकाएँ दाखिल की गई। इस मामले में हाई कोर्ट ने मामले को निपटाते हुए फैसला सुनाया था और कहा था कि अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बाँट दी जाए।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लगातार आगे खींच रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले के कुल दस्तावेज 38000 पेज से ज्यादा हैं। और हाईकोर्ट का फैसला ही 8170 पन्नों का है। ऐसे में अनुवाद की स्वीकार्यता पर विवाद चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुवाद को लेकर हिंदू पक्ष ने कभी भी ऐतराज़ नहीं किया है जबकि मुस्लिम पक्ष को अब भी आपत्ति है। कोर्ट का कहना है कि यदि अभी सभी पक्षों को दस्तावेजों का अनुवाद स्वीकार्य है तो वह सुनवाई शुरू होने के बाद उस पर सवाल नहीं उठा सकेंगे। मुख्य न्यायाधीश का इसपर कहना है कि यदि दस्तावेजों के अनुवाद पर विवाद जारी रहा तो हम इस पर अपना समय बर्बाद नहीं करने जा रहे।

कोर्ट ने दस्तावेजों की स्थिति और मामले से जुड़े सीलबंद रिकॉर्ड पर सेक्रेटरी जनरल की ओर से दायर रिपोर्ट की प्रतियों का जिक्र करते हुए दोनों पक्षों के वकीलों से उनका अध्ययन करने को कहा।

जानिए IAF ने बालाकोट को क्यों चुना… क्योंकि एक आतंकवादी ने खोल दिया था इसका राज

भारतीय वायुसेना ने जिन पाकिस्तानी क्षेत्रों में स्थित आतंकी ठिकानों पर बमबारी कर उन्हें तबाह किया है, उनमें बालाकोट सबसे अहम है। बालाकोट पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रान्त के मानसेहरा ज़िले में स्थित है। कंधार विमान हाईजैक कांड के बाद भारत सरकार द्वारा छोड़े गए आतंकियों में शामिल आतंकी मसूद अज़हर ने पाकिस्तान पहुँचते ही जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की और उसका सबसे पहले बेस कैम्प बालाकोट में ही बनाया था। अभी हाल ही में पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकियों को भी बालाकोट की तरफ ढकेल दिया गया था, ताकि भारत द्वारा किसी भी तरह की संभावित जवाबी कार्रवाई के दौरान उन्हें सुरक्षित रखा जा सके।

मानसेहरा के इलाके जिनमें बालाकोट भी शामिल है

पाकिस्तान को सपने में भी यह अंदेशा नहीं था कि भारतीय वायुसेना इतनी अंदर तक घुस सकती है। सूत्रों के अनुसार, वायुसेना ने बालाकोट में आज मंगलवार (फरवरी 26, 2019) तड़के 3.45 से 3.53 तक बमबारी कर आतंकी कैम्पों को तबाह कर दिया। बालाकोट स्थित आतंकियों को मार गिराना भारतीय वायुसेना बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि यह क्षेत्र पूरी तरह से पाकिस्तान में स्थित है। इसे आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का होमग्राउंड माना जाता है। आतंकी सैफुर रहमान सैफ़ी सहित अन्य तालिबानियों की मदद से यहाँ आतंक का गढ़ का निर्माण किया गया था ताकि भारत में हमले किए जा सके। सैफ़ी को आत्मघाती दस्ते का संस्थापक माना जाता है।

ताज़ा स्ट्राइक के बाद आतंकियों सहित उनके पोषकों का भी मनोबल टूट गया होगा क्योंकि यह आतंकियों के सबसे बड़े प्रशिक्षण कैम्प में से भी एक था। भारतीय ख़ुफ़िया सूत्रों के मुताबिक़, सिर्फ़ बालाकोट में स्थित कैम्पों से हज़ार से भी अधिक आतंकीयों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। एक और जानने लायक बात यह भी है कि बालाकोट एबटाबाद से बस 50 किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है। एबटाबाद में ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। इस स्ट्राइक के बाद भारत ने यह भी दिखा दिया है कि अगर अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए पाकिस्तान के भीतर किसी बड़े ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है तो भारत भी देश की सुरक्षा के लिए ऐसा करने में सक्षम है।

आपको जनवरी 2016 में हुआ पठानकोट हमला याद होगा। उस हमले में हमारे 7 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे व एक नागरिक की भी मृत्यु हो गई थी। जैश ने ही उस हमले की भी जिम्मेदारी ली थी। हमले के बाद एक आतंकी ने हिंदुस्तान टाइम्स से फोन पर बात करते हुए कहा था कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में उनका ही क़ानून चलता है और वहाँ बालाकोट क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया गया है। उसने बताया था कि बाकी छोटे-मोटे कैम्पों को इधर-उधर शिफ्ट किया जाता रहता है। यही कारण है कि जब भारतीय वायुसेना ने स्ट्राइक्स के लिए नक्शा तैयार किया होगा, तब बालाकोट को एक अहम निशाना माना गया होगा।

गूगल मैप पर श्रीनगर को रख कर समझें बालाकोट का भूगोल

रियाज़ हसन की पुस्तक ‘Life as a Weapon: The Global Rise of Suicide Bombings‘ में भी इस बात का जिक्र किया गया है कि कैसे बालाकोट 21वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका विरोधी आतंकियों का एक हब बन गया था। यहाँ बैठकें होती थी और रणनीति पर चर्चा की जाती थी। अफ़ग़ानिस्तान में आतंक फैलाने वाले तालिबानियों ने भी यही शरण ली थी। आतंकी सैफ़ी को यहीं हुई बैठक में पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र का दयित्व दिया गया था और सुसाइड बॉम्बिंग या आत्मघाती हमले वाले हथकंडे की रणनीति भी यहीं से बनाई गयी थी। पुस्तक में यह भी बताया गया था कि बालाकोट कश्मीरी आतंकियों व तालिबानी आतंकियों का एक संगम बन चुका था।

2001 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर जो हमला हुआ था, उसकी पूरी की पूरी प्लानिंग भी बालाकोट में ही की गई थी। उस हमले में 38 लोग मारे गए थे। भारतीय वायुसेना के ताज़ा स्ट्राइक के बाद पाकिस्तानी खेमे में बड़ा हड़कंप मच गया है और बैठकों का दौर शुरू हो गया है। वहाँ के विदेश मंत्री क़ुरैशी ने एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, जिसमे पाकिस्तानी नेताओं व अधिकारियों के लटके हुए चेहरे देखने लायक थे। पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी एक बैठक बुलाई है। जो भी हो, भारत ने पाकिस्तान के इतने भीतर घुस कर उसे अपनी शक्ति का एहसास करा दिया है।

‘लगातार बढ़ते हमलों के बीच बड़ी कार्रवाई की जरूरत थी, जैश के कमांडर समेत कई आतंकी ढेर’

भारतीय विदेश मंत्रालय में टॉप IFS अधिकारी विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी दी है कि नियंत्रण रेखा के पार बालाकोट में स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर भारत ने हवाई हमला कर उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

श्री गोखले ने बताया कि जैश-ए-मोहम्मद की भारत पर और भी हमले करने की योजना थी जिसकी हमें पक्की सूचना मिली थी इसलिए नियंत्रण रेखा के पार जाकर ‘preemptive strike’ करना जरूरी हो गया था। भारत ने नियंत्रण रेखा के पार बालाकोट में जैश के सबसे बड़े ठिकाने पर हमला किया है जिसमें बड़ी संख्या में आतंकी और जैश के टॉप कमांडर मारे गए हैं। श्री गोखले ने यह भी कहा कि यह ऑपरेशन जंगल के भीतर स्थित आतंकी ठिकानों को लक्षित कर के ही किया गया था इसलिए कोई सिविलियन नहीं मारा गया है।

पाकिस्तान को जैश की आतंकी गतिविधियों के बारे में जानकारी कई बार दी गई थी लेकिन पाकिस्तान ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की इसलिए भारत को यह एक्शन लेना पड़ा। मसूद अज़हर 2001 पर भारतीय संसद पर हमले के अलावा कई दूसरे आतंकी हमलों का दोषी है। जैश-ए-मोहम्मद ने ही 14 फरवरी 2019 को CRPF के काफिले पर हमला किया था जिसमें 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

सर्जिकल स्ट्राइक 2.0: ख़ून के प्यासे ‘अपर कास्ट हिन्दू’ मानवता के नाम पर धब्बा – वामपंथी पत्रकार गिरोह

सुबह जगते ही पहली ख़बर मिली कि भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट तक जाकर 3:30 से 4:00 बजे सुबह के बीच 1000 किलो के विस्फोटक 10 से 12 मिराज फ़ाइटर जेट्स के ज़रिए गिराए और आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद के तीन कैम्पों को तबाह कर दिया। पाकिस्तानियों ने इस बार उरी हमले के बाद के सर्जिकल स्ट्राइक की तरह इसे नकारा नहीं है, बल्कि उन्होंने बताया कि उनकी धरती में भारतीय वायुसेना के जेट घुस आए थे, जिन्हें उन्होंने ‘भगा दिया’।

हालाँकि, रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे हमलों के लिए कुछ मिनट का समय काफी होता है। हम भारी मात्रा में विस्फोटक लेकर उड़ते हैं, हमें पता होता है कि कहाँ गिराना है, गिराते हैं, और वापस लौट आते हैं। ये बात और है कि विडियो फ़ुटेज और तमाम तरह की बातों के लिए सेना और सरकार को अब तैयार रहना होगा क्योंकि पिछली बार पाकिस्तान तो छोड़िए, अपने ही घर के लोगों ने अपनी सेना की क्षमता पर, उनकी बातों पर सवाल खड़े करते हुए सबूत माँगे थे। 

आगे पाकिस्तानी सेना ने ख़बर की है कि भारतीय वायुसेना के जेट ‘जल्दबाज़ी में विस्फोटक कहीं भी गिराकर भाग गए’ और उन्हें कोई डैमेज नहीं हुआ। पाकिस्तान ने न सिर्फ स्वीकारा है, बल्कि चार तस्वीरें भी शेयर की हैं। जबकि, भारतीय सेना ने कहा है कि तीन कैम्प तबाह कर दिए गए हैं, और पाकिस्तानियों ने फर्जी तस्वीरें जारी की हैं क्योंकि वो अपने देश के लोगों के सामने डैमेज की बात स्वीकार नहीं सकते। भारतीय वायुसेना ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सेना के सूत्रों ने बताया है कि न सिर्फ लाइन ऑफ़ कंट्रोल बल्कि पाकिस्तान के भीतर जाकर इंडियन एयर फ़ोर्स ने जवाबी हमला किया है।  

ज़ाहिर है कि इससे हमारी मीडिया के पत्रकार समुदाय विशेष को ये पसंद नहीं आ रहा, वो भी तब जब पाकिस्तान ने स्वयं ही स्वीकार कर लिया हो। भारतीय माओवंशी पत्रकार गिरोह के चुने हुए सदस्य अभी तक सबूत नहीं माँग रहे, और शायद ‘अपर कास्ट हिन्दू नेशनलिस्ट’ लोगों के ट्वीट के स्क्रीनशॉट्स लेने में व्यस्त हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि खूफिया मैग्जीन के पत्रकारों ने पाकिस्तान फोन लगाकर पूछा है कि पाकिस्तान के जिस हिस्से में बम गिराया गया, वहाँ के लोग किस जाति के थे। 

पाकिस्तानी और आतंकियों के हिमायती पत्रकार समूह ने लोगों की भावनाओं का, उनके संवेदनाजन्य गुस्से को हिन्दू और सवर्ण जातियों से जोड़ते हुए, पुलवामा के बलिदानियों की जाति का विश्लेषण करते हुए बताया था कि राष्ट्रवाद की भावना सिर्फ इन्हीं हिन्दुओं में है, वो भी जो सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित हैं। जबकि अपने इस वाहियात बात के लिए कोई प्रूफ नहीं दिया था। जबकि एक फेसबुक पोस्ट लिखकर हमें छोटे शहरों और गाँवों के लोगों के सेना प्रति कृतज्ञता और हमले के प्रति रोष की कई तस्वीरें मिलीं।

जब पुलवामा हमला हुआ था, तब पाकिस्तान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कुछ दिनों के बाद इमरान खान ने घिसे हुए कैसेट की तरह ‘एक्शेनेबल एविडेंस’ माँगा और एक भी बार हमलों की निंदा भी नहीं की। उसके बाद भारत ने लगातार कई क़दम उठाते हुए पाकिस्तान को आर्थिक रूप से क्षति पहुँचानी शुरू की, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग किया, सिंधु जल समझौते पर एक्शन लिया, कश्मीरी अलगाववादियों की सुरक्षा वापस ली और 150 को गिरफ़्तार किया, कश्मीर में अर्धसैनिक बलों की 100 अतिरिक्त टुकड़ियाँ तैनात की, यासीन मलिक जैसे लोगों पर रेड की जा रही है। 

इसके बाद से पाकिस्तान बिलबिलाया हुआ था, और वहाँ की मीडिया में हास्यास्पद रूप से टमाटरों की ख़रीद न होने पर अपने ‘एटमी ताकत’ होने की बात भी की गई थी। इसके साथ ही वाघा बॉर्डर पर सैकड़ों करोड़ों के माल के साथ फँसे पाकिस्तानी व्यापारियों के पास कहीं जाने को नहीं। 

जब पाकिस्तान को लग गया कि इस बार शायद भारत दोबारा हर तरफ से घेर कर मारेगा, तब इमरान खान ने ‘शांति का एक मौका दीजिए‘ की अपील की थी। शांति के लिए भारत ने, और खासकर मोदी सरकार ने इतने मौक़े दिए कि उनके समर्थक और विरोधी दोनों ही उनके सीने का नाप माँगने लगे थे। लेकिन पाकिस्तान की तरफ से आतंकी हमले रुके नहीं, कश्मीर में लगातार आतंकी पनपते ही रहे। 

यही कारण था कि पुलवामा हमलों के बाद पूरे देश में, छोटे से लेकर बड़े शहरों में, बच्चे-युवा-बुज़ुर्गों, सोशल मीडिया पर, स्कूलों में, हर जगह रोष था, और जवानों के बलिदान के बदले पाकिस्तानियों को सबक सिखाने की माँग की जा रही थी। लेकिन वामपंथी मीडिया को ये पसंद नहीं था। ऐसे माहौल में संवेदना और क्रोध दोनों ही एक सामान्य और सहज भाव बनकर सामने आते हैं, उस वक्त वामपंथी मीडिया गिरोह के लोगों ने जनसामान्य की भावनाओं का मजाक उड़ाया और बलिदानियों की जाति बताकर पूरे नैरेटिव को मोड़ने की कोशिश की।

हालाँकि, ये लोग भूल गए कि भारतीय नागरिक हर ऐसे मौक़े पर सेना के साथ डटकर खड़े रहते हैं, और इनके जैसे पाकिस्तान-हिमायती पत्रकारों और छद्मबुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर लताड़ते हैं। कल ही ‘राष्ट्रीय समर स्मारक’ पर राजनीति करते हुए कपिल सिब्बल ने पूछा कि स्मारक बनाने से क्या होता है! 

सुबह जब से यह ख़बर आई है, पाकिस्तानियों के ट्विटर हैंडलों को पढ़कर प्रतीत होता है कि वो ख़ौफ़ में हैं। साथ ही, जैसे-जैसे इस स्ट्राइक की डीटेल्स आ रही हैं, भारत से प्रेम करने वाले लोग संतुष्टि से सरकार को, सेना को आभार प्रकट कर रहे हैं कि ऐसा करना बहुत ज़रूरी था। 

अब वामपंथी मीडिया गिरोह के धूर्त पत्रकारों का इंतजार है कि वो कैसे हमें ज्ञान देते हैं कि ‘जब पाकिस्तान शांति के लिए हाथ बढ़ा रहा है, तब हम उस पर हमला क्यों कर रहे हैं’। अब हमें वही पत्रकार, जो मोदी के सीने का नाप माँग रहे थे, बताएँगे कि शांति का कोई विकल्प नहीं, युद्ध से कुछ नहीं मिलता। मोदी विरोधी नेता और दोनों हाथों में लड्डू लेकर घूमने वाले लोगों ने सुर बदल लिए हैं। 

यूजुअल सस्पैक्ट्स ने ट्वीट करते हुए सवाल उठाना शुरु कर दिया है।  

भारत के लोग, राष्ट्रवादी लोग जो हर उम्र, जगह, जाति, धर्म और समुदाय से आते हैं, वो लगातार फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप्प के ज़रिए अपनी बातों को शेयर कर रहे हैं। इसमें आश्चर्य नहीं होगा कि एक दिन बाद माओवंशियों के गिरोह का कोई पत्रकार इस हेडलाइन के साथ आर्टिकल न लिख दे: वॉर मोंगरिंग अपर कास्ट हिन्दूज बेइंग फ़ॉर ब्लड ऑन सोशल मीडिया। मतलब, ‘युद्ध की बात करने वाले उच्च जाति के हिन्दू सोशल मीडिया पर ख़ून और हिंसा की बातें कर रहे हैं’।

ज़ाहिर है कि कोई भी राष्ट्रवादी ऐसी हेडलाइन पढ़कर आह्लादित ही होगा।

नोट: लेख सुबह 10 बजे के करीब लिखा गया था, और समय बीतने के साथ धूर्त पत्रकार मंडली अपना नैरेटिव उसी पैटर्न पर फैलाती पाई गई।