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पाक से MFN का दर्जा लिया गया वापस; CCS की बैठक में लिए गए कई बड़े फ़ैसले

पहले से ही आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान से भारत ने ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा वापस ले लिया है। लंबे समय से इसकी माँग होती रही है। पुलवामा हमले को सरकार ने गंभीरता और भारत सरकार ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़े निर्णय लेने की शुरुआत कर दी है। आज (फरवरी 15, 2019) को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (CCS) की बैठक में कुछ अहम निर्णय लिए गए। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त मंत्री अरुण जेटली के अलावा तीनो सेनाओं के प्रमुख शामिल हुए।

2015-16 में भारत का कुल व्‍यापार 641 अरब डॉलर रहा है वहीं पाकिस्‍तान के साथ व्‍यापार 2.67 अरब डॉलर रहा। पाकिस्‍तान को भारत का निर्यात 2.17 अरब डॉलर रहा। विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियम के आधार पर व्यापार में किसी देश को मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएनएफ) यानी सर्वाधिक तरजीह वाले देश का दर्जा दिया जाता है। एमएनएफ दर्जा प्राप्त देश के कारोबार में नुक़सान पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं किया जाता है। उसके सामान पर अतिरिक्त कर भी नहीं लगाया जाता है। आयात और निर्यात वाली वस्तुओं का भी ध्यान रखा जाता है।

आतंकवाद पर कठोर क़दम उठाते हुए भारत ने पाकिस्तान को दिया गया एमएफएन का दर्जा वापस ले लिया है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने CCS की बैठक में लिए गए फ़ैसलों की जानकारी देते हुए बताया:

“प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में कल के आतंकी हमले का विश्लेषण किया गया। बैठक में हमले में शहीद जवानों के लिए दो मिनट का मौन भी रखा गया। विदेश मंत्रालय के जरिए कूटनीतिक कदम उठाए जाएंगे। पाकिस्तान को दिया गया ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा वापस ले लिया गया है।”

इसके अलावा अरुण जेटली ने यह भी कहा कि इस बैठक की सभी बातों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। जेटली ने पाकिस्तान की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि विदेश मंत्रालय कूटनीतिक स्तर पर प्रयास कर पाकिस्तान को अलग-थलग कर देगा। उन्होंने कहा कि इस घटना के जिम्मेदार लोगों को सबक सिखाने के लिए सुरक्षाबल हर संभव कार्रवाई करेंगे ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो। उन्होंने कहा कि आतंकियों को इसकी कड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के सभी मुद्दों के बारे में बताने से जेटली ने इनकार कर दिया। क़रीब एक घंटे तक चली मैराथन बैठक के बारे में जानकारी देते हुए अरुण जेटली ने कहा:

“विदेश मंत्रालय ने सभी संभव राजनयिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग किया जा सके क्योंकि इस कायराना हरकत के पीछे उसका सीधा हाथ है। जो लोग इस हमले के जिम्मेदार हैं या इस आतंकवादी हमले का समर्थन किया है उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

PM ने सेना को दी पूर्ण स्वतंत्रता, ‘आतंकी बहुत बड़ी गलती कर गए हैं, बहुत बड़ी क़ीमत चुकाएँगे’

वन्दे भारत एक्सप्रेस के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री ने पुलवामा आतंकी घटना पर बोलते हुए कहा: “साथियों, पुलवामा हमले के बाद, अभी मन: स्थिति और माहौल दुःख और साथ ही साथ आक्रोश का है। ऐसे हमलों का देश डटकर मुकाबला करेगा, रुकने वाला नहीं है।”

उन्होंने इसी विषय पर बोलते हुए निम्नलिखित बातें कहीं:

मैं पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उन्होंने देश की सेवा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए हैं। दुःख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएँ, उनके परिवारों के साथ हैं।

इस हमले की वजह से देश में जितना आक्रोश है, लोगों का खून खौल रहा है, ये मैं समझ रहा हूँ। इस समय जो देश की अपेक्षाएँ हैं, कुछ कर गुजरने की भावनाएँ हैं, वो स्वाभाविक है। हमारे सुरक्षा बलों को पूर्ण स्वतंत्रता दी हुई है। हमें अपने सैनिकों के शौर्य पर पूरा भरोसा है।

मुझे पूरा भरोसा है कि देशभक्ति के रंग में रंगे लोग सही जानकारियाँ भी हमारी एजेंसियों तक पहुंचाएंगे, ताकि आतंक को कुचलने में हमारी लड़ाई और तेज हो सके।

मैं आतंकी संगठनों को और उनके सरपरस्तों को कहना चाहता हूँ कि वो बहुत बड़ी गलती कर गए हैं। मैं देश को भरोसा देता हूँ कि हमले के पीछे जो ताकते हैं, इस हमले के जो भी गुनहगार हैं, उन्हें उनके किए की सज़ा अवश्य मिलेगी।

जो हमारी आलोचना कर रहे हैं, उनकी भावनाओं को भी मैं समझ रहा हूँ। उनका पूरा अधिकार है। लेकिन मेरा सभी साथियों से अनुरोध है कि, ये बहुत ही संवेदनशील और भावुक समय है, इसलिए राजनीतिक छींटाकशी से दूर रहें। इस हमले का देश एकजुट होकर मुकाबला कर रहा है, ये स्वर विश्व में जाना चाहिए।

पूरे विश्व में अलग-थलग पड़ चुका हमारा पड़ोसी देश अगर ये समझता है कि जिस तरह के कृत्य वो कर रहा है, जिस तरह की साजिशें रच रहा है, उससे भारत में अस्थिरता पैदा करने में सफल हो जाएगा, तो वो बहुत बड़ी भूल कर रहा है।

इस समय बड़ी आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहे हमारे पड़ोसी देश को ये भी लगता है कि वो ऐसी तबाही मचाकर, भारत को बदहाल कर सकता है। उसके ये मंसूबे भी कभी पूरे नहीं होंगे। 130 करोड़ हिंदुस्तानी ऐसी हर साजिश, ऐसे हर हमले का मुँहतोड़ जवाब देंगे।

पुलवामा के वीर: 4 दिन पहले ही लौटे थे ड्यूटी पर, किसे मालूम था तिरंगे में लिपटकर आएँगे घर

साल 2019, तारीख़ 14 फरवरी, दिन गुरुवार। जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में एक ऐसी आतंकी घटना हुई, जिसने पूरे भारत को हिलाकर रख दिया। इस घटना में सीआरपीएफ के 44 के लगभग जवान शहीद हो गए। इन 44 शहीदों में से एक नाम उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के लोक नगर से आए अजीत कुमार का भी है। कल हुई इस भयावह घटना में अजीत के घरवालों ने उन्हें हमेशा के लिए खो दिया।

अजीत की उम्र मात्र 38 साल थी। चार दिन पहले ही अजीत अपनी छुट्टियाँ बिताकर ड्यूटी पर वापस लौटे थे। कल (फरवरी 14, 2019) देर रात को छोटे भाई रंजीत के पास अजीत के शहीद होने की खबर पहुँची। ख़बर सुनने के बाद परिवार के सभी सदस्यों में कोहराम मच गया। देर रात इसकी सूचना मिलने पर डीएम और सिटी मजिस्ट्रेट अजीत के घरवालों की हिम्मत बढ़ाने उनके घर पहुँचे।

लोकनगर निवासी अजीत कुमार सीआरपीएफ की 115वीं बटालियन में तैनात थे। बीते गुरुवार की शाम वह जम्मू से श्रीनगर सीआरपीएफ के काफ़िले के साथ जा रहे थे। इस दौरान पुलवामा के अवंतीपोरा के गोरीपोरा में एक आतंकी ने विस्फोटक से भरी गाड़ी को जवानों की बस से टकरा दी। इस विस्फोट का धमाका इतना तेज़ था कि बहुत दूर तक आवाज़ आई और ऐसा लगा जैसे धरती काँप उठी।

अजीत के भाई रंजीत ने बताया कि वो लोग आतंकी हमले की घटना को उस समय टीवी पर देख ही रहे थे, जिस समय उनके भाई के शहीद होने की ख़बर मिली। अजीत अपने घर में पाँच भाइयों में सबसे बड़े थे। अजीत के छोटे भाई विद्यालय में शिक्षक हैं। तीसरे भाई का नाम रंजीत है, और चौथे नंबर पर मंजीत है। मंजीत भी सेना में जवान है, फिलहाल इस समय मंजीत भोपाल में तैनात है। इसके अलावा घर का सबसे छोटा लड़का संजीत बीटीसी कर रहा है।

रंजीत ने बताया कि एक महीने पहले ही उनके बड़े भाई अजीत छुट्टियों में घर आए थे, लेकिन 10 फरवरी को छुट्टी समाप्त होने पर वो जम्मू वापस लौट गए थे। किसे मालूम था कि अजीत के घरवालों की मुलाकात उनसे आखिरी है, इसके बाद वो तिरंगे में लिपट कर ही वापस आएँगे।

आतंकी हमले की बाद से कई घंटो तक सन्नाता पसरा रहा। देर शाम अजीत के शहीद होने से परिजनों में कोहराम मच गया। पिता प्यारे लाल, माँ राजवंती व पत्नी मीना का रो रोकर बुरा हाल हो गया। परिजनों को रोता देख घर की मासूम बेटियाँ उन्हें संभाल रही हैं। माँ मीना को बेटी ईशा (11) व रिषा (09) संभालती रहीं।

पुलवामा हमला: IED को लेकर ख़ुफ़िया विभाग ने पहले ही किया था आगाह, 5 अहम बिंदु

पुलवामा में हुए त्रासद आतंकी हमले ने देश और दुनिया को हिला कर रख दिया है। इस आत्मघाती हमले में शहीद होने वाले CRPF जवानों की संख्या 42 हो गई है। जहाँ पूरा देश और दुनिया पाकिस्तान परस्त आतंकियों द्वारा अंजाम दिए गए इस हमले की कड़ी निंदा कर रहा है, पूरा देश प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार से इसका कड़ा प्रत्युत्तर देने की माँग कर रहा है। आइए एक नज़र डालते हैं इस आतंकी हमले से जुड़े 10 और बड़ी बातों पर:

1. ख़ुफ़िया विभाग ने 1 सप्ताह पहले ही दी थी चेतावनी

मीडिया में आई ताज़ा ख़बरों के अनुसार ख़ुफ़िया एजेंसियों ने एक सप्ताह पहले ही IED को लेकर आगाह किया था। 8 फरवरी को, ख़ुफ़िया एजेंसियों ने एक IED हमले के बारे में चेतावनी जारी की थी और सुरक्षा बलों को उस क्षेत्र से बम या आतंकियों के सफाए की भी सलाह दी थी। एजेंसियों ने कहा था कि जवानों की तैनाती से पहले क्षेत्र में यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि यह पूरी तरह से सुरक्षित है।

ख़ुफ़िया विभाग ने चेताया था

CRPF जवानों के इस काफ़िले में 2,547 जवान थे। जैश-ए-मोहम्मद द्वारा किया गया यह हमला जम्मू कश्मीर में पिछले कुछ सालों में हुआ सबसे बड़ा हमला है।

2. पाकिस्तान का बेतुका बयान, UN ने की भर्त्सना

पाकिस्तान ने अपनी धरती पर पल रहे आतंकवाद को लेकर तो कुछ नहीं कहा लेकिन इस घटना को लेकर अपने घड़ियाली आँसू ज़रूर दिखा दिए हैं। बेतुका, बेढंगा और अप्रासंगिक बयान देते हुए पाकिस्तान ने कश्मीर को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ कहा। पाक ने हमले की निंदा तो की है लेकिन पाकिस्तान से इसके तार जुड़े होने की बातों को सिरे से नकार दिया है। पाकिस्तान ने अपने बयान में कहा:

“भारत अधिकृत कश्मीर के पुलवामा में हुआ हमला चिंता का विषय है। विश्व में कहीं पर भी होने वाली हिंसा की गतिविधियों की हम कड़ी निंदा करते हैं। इसके साथ ही बिना जाँच के भारतीय मीडिया और सरकार द्वारा हमले का लिंक पाकिस्तान से जोड़े के तमाम आक्षेपों को सिरे से ख़ारिज करते हैं।”

पाकिस्तान का बेतुका बयान

वहीं संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि इस हमले से जुड़े आतंकियों तो कटघरे के भीतर लाया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र ने अपने बयान में कहा:

“हम जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए हमले की कड़ी निंदा करते हैं। जिन परिवारों ने अपनों को खोया है हमारी उनके प्रति गहरी संवेदना है। हम सभी घायलों के जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं और हमले के जिम्मेदार सभी लोगों को जल्द से जल्द कठघरे में लाया जाएगा।”

3. विशेष विमान से एयरबेस लाया जाएगा शहीद जवानों का शव

पुलवामा में अवंतीपुरा के गोरीपुरा हमले में हुए इस आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों के शवों को विशेष विमान से एयरबेस लाया जाएगा। जवानों का शव एक विशेष विमान से ग़ाज़ियाबाद के हिंडन एयरबेस लाया जाएगा। यहाँ से जवानों का पार्थिव शरीर उनके घर भेजा जाएगा। मीडिया में अभी तक आ रही ख़बरों के मुताबिक़ हमले में शहीद जवानों में क़रीब 12 जवान उत्तर प्रदेश के हैं।

कई शव क्षत-विक्षत हो चुके हैं, जिसे देख कर किसी भी व्यक्ति का दिल दहल जाए। शहीद हुए जवानों की सूची जारी करने में हो रहे विलम्ब का कारण भी यही है। CRPF जल्द ही शहीद हुए जवानों के नाम की सूची जारी करेगा।

4. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने की निंदा, कई देश भारत के साथ

अमेरिका, इजराइल सहित कई देशों ने इस हमले की निंदा की है। श्रीलंका, भूटान और अफ़ग़ानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों ने भी दुःख की इस घड़ी में भारत के साथ होने की बात कही है। अमेरिका ने कहा कि आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में वह भारत के साथ है। अमेरिका ने इसे एक बेहद ही घिनौना कृत्य बताया। उसने कहा: ‘हम तमाम देशों से कहना चाहते हैं कि वह यूएन सेक्युरिटी काउंसिल के रिजोल्यूशन को स्वीकार करें और अपने देश में आतंकवाद को पनाह देना बंद करें।’

जर्मनी ने भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी बताते हुए कहा कि वह आतंकवाद की निंदा करता है, चाहे वह किसी भी रूप में हो। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया, रूस सहित तमाम बड़े देशों ने घटना की निंदा की है।

5. अज़हर मसूद पर बदल सकता है भारत का रुख

पाकिस्तान में बैठा आतंकवादी अज़हर मसूद इस हमले का मास्टरमाइंड है। हालाँकि मोदी और चिनफिंग के बीच वुहान समिट के बाद 2018 में भारत ने एक बार भी संयुक्त राष्ट्र में अज़हर के मसले को नहीं उठाया था। अब भारत अपने रुख में बदलाव कर सकता है। पठानकोट हमले का भी साज़िशकर्ता वही था। उस हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दबावों के कारण पाकिस्तान ने उसे कस्टडी में लेने का दिखावा किया था।

संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के तहत अज़हर पर बैन लगाने के भारत के प्रयासों को चीन लगातार विफल करता रहा है। दरअसल, चीन अपने सहयोगी पाकिस्तान के हितों की रक्षा करना चाहता है। भारत ने अज़हर को लेकर पाकिस्तान पर पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की माँग करते हुए कहा:

“हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्यों से जैश-ए-मोहम्मद चीफ अज़हर समेत आतंकियों की लिस्ट के प्रस्ताव को समर्थन देने की अपील दोहराते हैं। अज़हर UNSC की 1267 सैंक्शंस कमिटी के तहत एक घोषित आतंकी है।”

पश्चिम बंगालः मंदिर में घुसकर पुलिस ने की तोड़फोड़, ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन

पश्चिम बंगाल से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। राजधानी कोलकाता के पास के न्यू टाउन इलाके में पाथरघाटा गाँव के एक मंदिर में पुलिसकर्मियों द्वारा तोड़-फोड़ की गई है। ग्रामीणों के मुताबिक गाँव के इस मंदिर में धार्मिक समारोह के मौके पर एक लाउडस्पीकर लगाया गया था, जिसको लेकर पुलिस आपत्ति जता रही थी। इसके बाद ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों में विवाद बढ़ गया।

आरोप है कि पुलिस ने इसके बाद मंदिर में घुसकर जमकर तोड़-फोड़ की। पुलिस की तोड़-फोड़ से नाराज ग्रामीणों ने अपना विरोध जताते हुए गाँव में घुसने के रास्ते को बंद कर दिया है और पुलिस की गाड़ियाँ भी तोड़ी हैं। विरोध में लोग सड़कों पर टायर जलाकर प्रदर्शन भी कर रहे हैं। ग्रामीणों ने टीएमसी विधायक सब्यसाची दत्ता के ख़िलाफ़ नारे भी लगाए।

लाउडस्पीकर बंद करने के बाद भी पुलिस ने की तोड़फोड़

ख़बरों के अनुसार पुलिस ने रात में इसलिए लाउडस्पीकर बजाने का विरोध किया था, क्योंकि बच्चों की परीक्षाएँ चल रहीं थी। बताया जा रहा है कि पुलिस के समझाने के बाद लोगों ने लाउडस्पीकर बंद कर दिया था। लेकिन फिर भी पुलिस ने मंदिर में घुसकर तोड़-फोड़ की।

मामले पर पुलिस का दावा है कि ग्रामीणों ने उन पर हमला किया और एक अधिकारी को घायल कर दिया। मामले को बढ़ता देख जोन-1 के जिलाधिकारी रविन्द्रनाथ बनर्जी और असिस्टेंड कमिश्नर ऑफ़ पुलिस, अनिमेश घटनास्थल पर पहुँच गए। उन्होंने कहा कि मामले की जाँच की जाएगी और दोषियों को सजा दिया जाएगा।

इससे पहले भी ऐसी घटनाएँ आ चुकी हैं सामने

यह पहला अवसर नहीं है जब ऐसी ख़बर सामने आई हो, इससे पहले 2017 में स्कूल में सरस्वती पूजा मना रहे मासूम छात्रों पर पुलिसकर्मियों ने बंदूक से हमला किया था।

2015 में भी पुलिस प्रशाासन द्वारा मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा विरोध किए जाने पर बीरभूम जिले की नलहाटी में शारदीय (नवरात्रि) दुर्गा पूजा को लगातार 3 साल तक रोका गया था। बता दें कि इसी तरह, 2017 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में दुर्गा पूजा समारोह के दौरान मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाई थी। सरकार ने मूर्ति विसर्जन इसलिए रद्द कर दिया था, क्योंकि उसी दिन मुहर्रम भी था।

कश्मीर में सबसे बड़ा आतंकी हमला, CRPF के 40 जवान शहीद

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकियों द्वारा किए गए हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए हैं। शहीद जवानों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। श्रीनगर-जम्मू हाइवे पर स्थित अवंतीपोरा इलाके में आतंकियों ने जवानों की गाड़ी को निशाना बनाते हुए आतंकी घटना को अंजाम दिया।

हमले के बाद दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अलर्ट जारी किया गया है। बताया जा रहा है कि सुरक्षाबलों के काफ़िले पर जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन ने आत्मघाती हमला किया जिसमें करीब 40 जवान शहीद हो गए हैं, जबकि 40 से अधिक जवानों के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना है।

घायल जवानों को नज़दीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि जिस वक्त सीआरपीएफ के काफ़िले पर हमला किया गया उस वक्त करीब 70 गाड़ियों में सवार होकर करी 2500 जवानों का काफिला निकल रहा था। बता दें कि उरी हमले के बाद यह बड़ा आतंकी हमला है। उरी हमले में 19 जवान शहीद हुए थे।

हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। बताया जा रहा है कि इस आतंकी घटना को अंजाम देने के पीछे आदिल अहमद डार नाम के आतंकी का हाथ है। आदिल पुलवामा के काकापोरा इलाके का रहने वाला है। सुरक्षाबलों का कहना है कि आदिल को पहले एक ऑपरेशन के दौरान घेर भी लिया गया था। लेकिन वह किसी तरह बच कर निकल गया था।

आदिल अहमद डार
डार ने यह वीडियो पुलवामा में आतंकी घटना को अंजाम देने से पहले बनाया था

आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने घटना के बाद डार के एक वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में डार ने सरकार के प्रति अपनी नफरत को दिखाया है। इसमें उसने बाबरी मस्‍ज‍िद के मुद्दे को भी उठाया है। इस वीडियो से साफ है कि इस हमले से पहले उसका ब्रेनवॉश किस हद तक किया गया था। बता दें कि, हमले से पहले आतंकियों ने पहले हाइवे खड़ी एक कार में आईईडी से ब्लास्ट किया और फिर सीआरपीएफ जवानों के वाहनों पर हथियारों से जमकर फ़ायरिंग की।

गौरतलब है कि इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने लेते हुए आदिल का फोटो जारी करते हुए कहा कि वह इस हमले का मास्टरमाइंड है। हालाँकि, उसकी संलिप्तता के बारे में सुरक्षा एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है।

इस घटना के बाद सीआरपीएफ, सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस इस हमले से जुड़े हर पहलू की पड़ताल में जुट गयी हैं। इस बीच, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने घटना को लेकर इमरजेंसी बैठक बुलाई है। उन्होंने कहा कि स्थिति की समीक्षा की जा रही है और सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारी उन्हें स्थिति पर जानकारी दे रहे हैं।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने प्रेस वार्ता करके कहा कि इस कायरतापूर्ण घटना को जैश-ए-मोहम्मद ने अंजाम दिया है। इसके साथ ही राजनाथ सिंह ने देशवासियों को आश्वस्त किया कि जल्द ही आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को मुँहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

इसके अलावा केंद्रीय मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने इस घटना पर कहा है कि शहीदों के खून की एक-एक बूंद का बदला लेंगे।

‘मैं अब जन्नत में हूँ’, पुलवामा आतंकी का वीडियो; ट्विटर पर कॉन्ग्रेस की शर्मनाक बयानबाजी चालू

पिछले लगभग 2 सालों से भारत आतंकी हमलों से खुद को सुरक्षित समझ रहा था, लेकिन बृहस्पतिवार (फरवरी 14, 2019) शाम को आतंकियों ने कश्मीर के पुलवामा में फिदायीन हमला कर दिया। मीडिया के अनुसार आतंकवादियों की इस कायराना हरकत में अब तक CRPF के लगभग 40 जवानों के शहीद होने की खबर आ रही हैं। यह हमला सितंबर, 2016 में उरी में हुए आतंकी हमले से भी बड़ा हमला है। उस समय आतंकियों ने राष्ट्रीय राइफल्स के कैंप पर अटैक किया था, जिसमें मौके पर ही 18 जवान शहीद हो गए थे।

इस घटना के बाद एक ओर जहाँ कुछ लोगों ने शहीदों को लेकर अपनी संवेदना और नाराजगी व्यक्त की है, वहीं दूसरी तरफ मीडिया और राजनीतिक दल इसे सरकार को घेरने का एक अच्छा मौका समझकर मैदान में उतर चुके हैं। सेना पर हुए इस आतंकी हमले पर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली।

पुलवामा में CRPF के काफिले पर हुए आतंकी हमले के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर इस हमले की निंदा की है। पीएम ने कहा, “पुलवामा में CRPF के जवानों पर हुआ हमला बेहद घृणित है। मैं इस कायराना हमले की कठोर निंदा करता हूँ। हमले में शहीद हुए जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। पूरा देश शहीदों के परिवार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। प्रार्थना करता हूँ कि घायल जल्द ठीक हों।”

वहीं, विपक्ष ने इस मौके को भुनाते हुए हमले में मारे गए जवानों पर राजनीति भी शुरू कर दी है। कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अपने ट्वीट में लिखा है, “उरी, पठानकोट, पुलवामा… आतंकी हमलों की लिस्ट और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता जारी है और मोदी सरकार चुप है।”

इसके बाद मीडिया से बातचीत में रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “मोदी सरकार में 5 साल में यह 17वां बड़ा हमला है। उरी और पठानकोट इससे पहले के कई बड़े उदाहरण हैं। हमारी सरकार पाकिस्तान को 56 इंची सीना नहीं दिखा सकी है। जवानों की शहादत पर अब तक पीएम मोदी ने दो शब्द तक नहीं कहे। हम मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि उनका 56 इंची सीना कब इस हमले का जवाब देगा?”  हैरानी की बात है कि ऐसे समय में जब सभी लोगों को
आतंकवाद से लड़ने के लिए सरकार के साथ खड़ा होकर साथ होना चाहिए, मीडिया गिरोह और विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए सरकार पर अपनी भड़ास निकालने का प्रयास कर रहा है।

विदेश राज्य मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने कहा, “एक सैनिक और देश का नागरिक होने के नाते मेरा खून ऐसे कायराना हमलों पर खौलता है। पुलवामा हमले में CRPF जवानों की जान गई है। मैं उनकी शहादत को सलाम करता हूँ और वादा करता हूँ कि उनके खून की एक-एक बूंद का बदला लिया जाएगा।”

सर्जिकल स्ट्राइक को हमेशा संदेहास्पद बताते रहने वाली मीडिया के समुदाय विशेष की पत्रकार सागरिका घोष ने अपने ट्वीट में लिखा है कि देश में CRPF और उरी जैसी घटनाएँ हो रही हैं और दिशाहीन सरकार तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक पर खुश होती है और धार्मिक प्रतीकों के साथ नाटक करती है। इसके जवाब में ट्विटर यूज़र्स ने लिखा है कि सरकार दुबारा सर्जिकल स्ट्राइक करेगी और तुम फिर भी इसे झूठा साबित करने के पूरे प्रयास करते रहोगे।

अरुण जेटली, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर के साथ ही अन्य लोगों ने भी ट्वीट कर इस आतंकी घटना पर अपनी प्रतिक्रियाएँ जाहिर की हैं।

जैश-ए-मोहम्मद ने ली जिम्मेदारी, आतंकी का वीडियो वायरल

आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। बताया जा रहा है कि आदिल अहमद डार नाम के आतंकी ने इस काफिले पर हमले की साजिश रची थी। जैश के आतंकी आदिल अहमद उर्फ वकास कमांडो ने आज दोपहर 3:15 बजे यह फिदायीन हमला किया। ये वही आतंकी है जो मई 2018 में सेना के एनकाउंटर में बच निकला था। इसी ने विस्फोटक से भरी कार जवानों की बस से टकराई। जैसे ही सीआरपीएफ का काफिला लेथपोरा से गुजरा, आतंकी ने अपनी गाड़ी जवानों से भरी बस से टकरा दी।

इस हमले के बाद जैश-ए-मोहम्‍मद ने आदिल डार का एक वीडियो जारी किया। कहा जा रहा है कि इस वीडियो कोआत्‍मघाती हमले के पहले ही शूट किया गया था। इस वीडियो में आदिल के पीछे जैश-ए-मोहम्‍मद का बैनर दिख रहा है। इसमें आतंकी डार तमाम हथियारों से लेस है। इस हमले के बाद जैश के प्रवक्‍ता मोहम्‍मद हसन ने दावा किया है कि इस हमले में सेना के कई वाहन नष्‍ट कर दिए गए हैं। डार ने इस वीडियो में ऐलान करते हुए सरकार के प्रति अपनी नफरत को दिखाया है। इसमें उसने बाबरी मस्‍ज‍िद के मुद्दे को भी उठाया है, इस वीडियो से साफ है कि इस हमले से पहले उसका ब्रेनवॉश किस हद तक किया गया था।

वीडियो में आतंकी डार कह रहा है कि जब तक यह वीडियो लोगों तक पहुँचेगा वो जन्नत पहुँच चुका होगा। उसने कहा है कि दक्षिण कश्मीर के लोग कश्मीर के लिए भारत से लड़ रहे हैं, अब मध्य कश्मीर और जम्मू को भी इस लड़ाई में उतर जाना चाहिए।

फैक्ट चेक: क्या मोदी ने 1992 में लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बारे में झूठ बोला था?

14 फरवरी को, प्रोपेगैंडा वेबसाइट ‘द वायर’ ने एक स्टोरी प्रकाशित की जिसमें दावा किया गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेंद्र मोदी के एक वीडियो के तथ्यों की जाँच की है। 2 मिनट 20 सेकेंड के इस वीडियो में मोदी के भाषण के एक हिस्से को दिखाया गया है जो कि पुराना प्रतीत होता है। वीडियो के एक हिस्से में मोदी को 1992 में कन्याकुमारी से कश्मीर तक के एकता यात्रा के बारे में बात करते सुना जा सकता है।

द वायर में छपी रिपोर्ट

स्टोरी पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है कि वायर की लेखिका ने प्रधानमंत्री के भाषण के इस वीडियो को महज 2 मिनट देखने के बाद यह रिपोर्ट लिख दिया है। इस रिपोर्ट में वायर ने दावा किया है कि मोदी ने भाषण के दौरान कहा कि उन्होंने अकेले कश्मीर के लाल चौक पर जाकर झंडा फहराया और वापस आ गए। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान को गलत साबित करने के लिए वायर ने एकता यात्रा के बारे लंबा चिट्ठा तैयार करते हुए स्टोरी की है। वायर ने स्टोरी में लिखा है कि लाल चौक पर झंडा फहराने के लिए एकता यात्रा के दौरान अकेले मोदी नहीं थे, बल्कि मोदी यात्रा में जोशी के साथ आने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं में से एक थे।

इसके बाद रिपोर्ट में स्वाति चतुर्वेदी एक सनसनीखेज का दावा करते हुए लिखती हैं कि मुरली मनोहर जोशी इस वीडियो को देखने के बाद गुस्से में हैं, और उन्होंने आरएसएस से भी इस बारे में शिकायत की है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जोशी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से पूछा है कि प्रधानमंत्री मोदी इस तरह की कल्पना में क्यों लिप्त हैं और क्यों भाजपा के इतिहास को फिर से लिख रहे हैं?

पहली बात यह है कि वायर ने अपने रिपोर्ट में इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं दिया है कि दिग्गज पार्टी नेता मुरली मनोहर जोशी वास्तव में मोदी के एक पुराने भाषण से नाराज हैं और नराजगी भी इस तरह की वो आरएसएस प्रमुख से शिकायत करने की हद तक चले गए। वायर की लेखिका ने अपने लेख में जो दावा किया है उसका कोई स्रोत नहीं है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि क्या यह एक तथ्य है, या वास्तव में स्वाति चतुर्वेदी स्वयं कल्पना में लिप्त हैं। इसके अलावा इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरएसएस ने नरेंद्र मोदी के भाषण की तथ्य-जाँच की है, जैसा कि वायर की रिपोर्ट में दावा किया गया है

दूसरा, वीडियो में भाषण का केवल 2 मिनट के आसपास का हिस्सा ही दिखाई देता है, पूरे भाषण के वीडियो की क्लिप नहीं है। इसलिए यह दावा करना कि मोदी ने इस छोटी क्लिप के आधार पर एकता यात्रा का पूरा श्रेय लिया, गलत है। हमने भाषणों की छोटी क्लिप का उपयोग करके नेताओं की छवी को अपने मुताबिक प्रस्तुत करने के कई उदाहरण देखे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के भाषण को पूरा सुने बिना और उनके भाषण के संदर्भ को जाने बिना इस तरह के दावे करना गलत है।

तीसरा, हालाँकि यह सच है कि मुरली मनोहर जोशी ने 1992 में एकता यात्रा का नेतृत्व किया था। आखिरकार वह पार्टी अध्यक्ष थे और उस समय पार्टी के शीर्ष तीन नेताओं में से एक थे। परंतु इस यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी सिर्फ एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता नहीं बल्कि यात्रा के संचालन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभा रहे थे। ऐसे में वायर द्वारा रिपोर्ट में मोदी को एकता यात्रा के दौरान सामान्य नेता लिखना गलत है।

एकता यात्रा 11 दिसंबर, 1991 को कन्याकुमारी से शुरू हुई थी, और 26 जनवरी को श्रीनगर में लाल चौक पर तिरंगा फहराने के साथ समाप्त होने वाली थी। और इस यात्रा के संचालन की जिम्मेदारी एक सक्रिय पार्टी कार्यकर्ता और पार्टी की राष्ट्रीय चुनाव समिति के एक सदस्य नरेंद्र मोदी संभाल रहे थे। उन्हें यात्रा के संयोजक के रूप में नामित किया गया था। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी एकता यात्रा के दौरान एक समान्य पार्टी कार्यकर्ता से कहीं ज्यादा अहम भूमिका में इस कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे। मोदी ने दो साल पहले लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के आयोजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था।

1992 में जब मुरली मनोहर जोशी ने गणतंत्र दिवस पर लाल चौक पर राष्ट्रध्वज फहराया था, तो उसके ठीक बगल में नरेंद्र मोदी थे। झंडा फहराने के बाद, पार्टी अध्यक्ष ने प्रेस के सामने नरेंद्र मोदी को “ऊर्जावान और होनहार” पार्टी नेता के रूप में पेश किया था। इसलिए, नरेंद्र मोदी सिर्फ एक समान्य नेता की तौर पर यात्रा में हिस्सा लेने के बजाय प्रमुख भूमिका निभा रहे थे।

द वायर की रिपोर्ट में 2011 की एक वीडियो भी लगाया गया है जिसमें मुरली मनोहर जोशी एकता यात्रा के बारे में बात करते हुए दिखाई दे रहे हैं। लेकिन बता दें कि यह वीडियो जनवरी 2011 का है, और जोशी 1992 की बजाय 2011 की राष्ट्रीय एकता यात्रा के बारे में बात कर रहे थे, जो पूरी तरह से अलग घटना है।

2011 में होने वाले एकता यात्रा का नेतृत्व तत्कालीन भाजयुमो अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने किया था। 1992 के विपरीत, 2011 में होने वाले एकता यात्रा के दौरान राज्य सरकार ने भाजपा नेताओं को लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोका दिया था। पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार और अन्य ने 2011 एकता यात्रा के दौरान जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें राज्य पुलिस ने सीमा पर रोक दिया और हिरासत में ले लिया था। 2011 की यात्रा के दौरान न तो जोशी और न ही मोदी कश्मीर गए, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वायर ने उस वीडियो को कहानी में क्यों शामिल किया।

राष्ट्र-निर्माण नहीं, राष्ट्र-विरोध की पाठशाला बनता जा रहा है AMU

गर्व से अपने अल्पसंख्यक दर्जे का बखान करने वाला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) शैक्षणिक गतिविधियों के अलावा बाक़ी सभी कारणों से सुर्ख़ियों में रहता है। यहाँ बात-बात में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क जाती है। देश-विरोधी नारे और राष्ट्र विरोधी गतिविधियाँ तो जैसे यहाँ एक सामान्य बात हो चुकी है। अभी हाल ही में भड़की हिंसा और छात्रों के उग्र प्रदर्शन के बाद इस सवाल का उठना लाज़िमी है कि आख़िर AMU राष्ट्र-निर्माण में क्या योगदान दे रहा है? देश में हज़ारों समस्याएँ हैं। उन्हें सुलझाने के लिए अलग-अलग यूनिवर्सिटीज और लैब्स में रिसर्च चल रहे हैं। छात्र अक्सर ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इत्यादि बनाते रहते हैं जो देश के काम आए। क्या AMU इन सब के लिए कार्य कर रहा है?

अगर AMU में हाल के दिनों में हुई घटनाओं पर नज़र डाली जाए, तो इस से पता चलता है कि संस्थान अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। ऐसा नहीं है कि यूनिवर्सिटी का पुराना इतिहास (आज़ादी के बाद से) बहुत ही चमकदार रहा है, ऐसी घटनाएँ पहले भी हुईं हैं। लेकिन, हाल के कुछ महीनों में जिस तरह के विषाक्त वातावरण ने कैंपस के शैक्षणिक परिवेश को अपने पैरों तले कुचल कर रख दिया है, उस से लगता है कि संस्थान अब ग़लत दिशा में बढ़ रहा है। सबसे पहले ताज़ा घटना को समझते हैं। इसके बाद पिछली कुछ घटनाओं को समझ कर हम इस बात का विश्लेषण करेंगे की आख़िर ऐसी गतिविधियों के पीछे कौन सी मानसिकता है।

मीडियाकर्मियों और अन्य गुट के छात्रों की पिटाई

मामला कुछ यूँ शुरू हुआ। यूनिवर्सिटी कैंपस में मुस्लिम फ्रंट बनाने के लिए बैठक चल रही थी। इस बैठक में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल होने वाले थे। ओवैसी तो बैठक में नहीं पहुँच सके लेकिन उनके आने और छात्रों द्वारा मुस्लिम फ्रंट बनाने की ख़बर सुन कर कुछ छात्र नाराज़ हो गए। जब दो महिला पत्रकार कैंपस में पहुँची, तब छात्रों ने उसके साथ बदतमीज़ी की और कैमरे को भी तोड़ दिया। एक अन्य पत्रकार को दौड़ा-दौड़ा कर बेल्ट से पीटा गया। इतना ही नहीं, जब कुछ हिन्दू छात्र हॉस्टल में खाना खाने पहुँचे, तब उनके साथ मारपीट की गई। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यकर्ता की बाइक को आग के हवाले कर दिया।

बहुत सारे ऐसे शैक्षणिक संस्थान हैं, जो राजनैतिक वजहों से सुर्ख़ियों में रहते हैं। छात्रों की अलग-अलग विचारधाराएँ होती है, अलग-अलग समझ होती है। अल्पसंख्यक दर्जे का ढ़ोल पीटने वाले AMU ने कभी यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत नहीं समझी कि यहाँ पढ़ रहे अन्य छात्रों को सुरक्षित माहौल मुहैया कराने के लिए क्या कोशिशें की जाए। जब यूनिवर्सिटी में अधिकतर छात्र एक ख़ास समुदाय से आते हैं, तब यह यूनिवर्सिटी प्रशासन की ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें सुरक्षित महसूस कराया जाए।

एक छात्र ने प्रधानमंत्री मोदी को ख़ून से पत्र लिख कर मदद की गुहार लगाई है। उसने कहा है कि अगर समय रहते कैंपस में पल रहे राष्ट्र विरोधी मानसिकता को ख़त्म करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हिन्दू छात्रों का हाल भी कश्मीरी पंडितों की तरह ही होगा। छात्र अब भी धरने कर रहे हैं। प्रॉक्टर के कार्यालय में ताला जड़ दिया गया है। भाजपा-संघ के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हो रही है। मोदी-योगी को जी भर गालियाँ दी जा रही है। उनके पुतला-दहन की धमकी दी जा रही है। यह सब देख कर लगता नहीं कि हम किसी बड़े शैक्षणिक संस्थान की बात कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे यह कोई राजनीतिक अखाड़ा हो।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि AMU प्रशासन भी पीड़ितों के ख़िलाफ़ ही खड़ा दिख रहा है। छात्र नेता अजय, जिनकी पिटाई की गई- अस्पताल में भर्ती हैं। महिला पत्रकारों ने छात्रों के ख़िलाफ़ थाने में मामला दर्ज कराया है। लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पुलिस को जो दलीलें दी है, उसमे पीड़ितों के ही विरोध किया गया है। यूनिवर्सिटी पुलिस छावनी बन चुकी है। ज़िले के डीएम एवं एसपी वहाँ कैम्प कर रहे हैं। यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है? यह कैसा शैक्षणिक संस्थान है जहाँ छात्रों के झगड़े सुलझाने के लिए ज़िले के सबसे बड़े अधिकारियों को कैम्प करना पड़ रहा है?

तिरंगा यात्रा मना, ‘वन्दे मातरम्’ पर रोक

जनवरी 2019 में जब कुछ छात्रों ने तिरंगा यात्रा निकाली और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगाए तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उन पर गंभीर आरोप लगा कर नोटिस थमा दिया। उन छात्रों पर यूनिवर्सिटी को बदनाम करने, कैंपस में भय का माहौल पैदा करने और अन्य छात्रों को बहकाने सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए। क्या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी भारत के अंदर नहीं आता है? क्या AMU कैम्पस में भारतीय संविधान, भारतीय प्रतीक चिह्नों व राष्ट्रगीत के लिए कोई इज्ज़त नहीं? संस्थान चलता है नागरिकों के भरोसे से। अगर देश के नागरिकों का किसी संस्थान से भरोसा ही उठ जाए तो फिर उसे अस्तित्व का कोई औचित्य नहीं बनता है।

छात्रों की ग़लती बस इतनी थी कि वो वीर ऐप के जरिए शहीदों के लिए धन जुटा रहे थे। AMU में इसे भी अपराध माना गया। तिरंगा यात्रा निकालने पर न सिर्फ़ छात्रों को नोटिस थमाई गई, बल्कि मुस्लिम छात्रों ने उन्हें मारा-पीटा भी। ये ख़बरें जल्दी कैंपस से बाहर नहीं आ पाती। अगर बाहर आती भी है, तो दबा दी जाती है। जब इसे लेकर आवाज़ें उठतीं हैं, तब दोनों गुटों के छात्रों पर कार्रवाई कर इतिश्री कर ली जाती है। तिरंगा यात्रा निकालने वाले छात्रों को हादी हसन हॉल में देर रात पीटा गया। पीटने वाले कौन लोग थे और वह किस समुदाय से थे- यह साफ़ है। आप बिना लिखे समझ सकते हैं।

आतंकियों के प्रति इतना प्रेम कहाँ से लाता है AMU?

अभी जब AMU के कट्टर छात्रों ने पत्रकारों को अपने लपेटे में लिया तब ये एक बड़ी ख़बर बनी। लेकिन एक बार और ऐसा हुआ था, जब छात्रों ने पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया था। अक्टूबर 2018 में जब सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में हिज़्बुल मुज़ाहिद्दीन के आतंकी बशीर मन्नान वानी को मार गिराया था, तब AMU में उसके लिए नमाज पढ़ी गई थी। उस दौरान भी छात्रों ने प्रॉक्टोरियल बोर्ड के साथ नोंक-झोंक की। घटना की सूचना पर पहुँचे एक पत्रकार को पीटा गया और उसके फोन छीन लिए गए।

आतंकवाद से भी ज़्यादा ज़हरीला है आतंकवाद का समर्थन। एक आतंकी को जब समाज या क्षेत्र के किसी हिस्से में समर्थन और सहानुभूति मिलती है, तब 10 अन्य आतंकी भी पैदा हो जाते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय इसमें अव्वल दिख रहा है। बशीर वानी भी उसी यूनिवर्सिटी का छात्र था। यह कैसी फक्ट्री है जहाँ एक योग्य नागरिक के बदले आतंकी निकलते हैं? ऐसे संस्थान का क्या तात्पर्य जहाँ आतंकियों के मरने पर मातम मनाया जाता हो। यह न सिर्फ़ आतंकियों का आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है, बल्कि सुरक्षा बलों के मनोबल को चोट पहुँचाने वाला कृत्य भी है।

जिस यूनिवर्सिटी में सुरक्षा बलों के लिए सम्मान होना चाहिए वहाँ आतंकियों के लिए नमाज़ पढ़ी जाती है। जहाँ से स्कॉलर निकलने चाहिए, वहाँ से आतंकी निकलने की ख़बर आती है। जहाँ शहीदों को सम्मान के भाव से देखा जाना चाहिए, वहाँ उनके लिए धन एकत्रित करने वालों पर ही कार्रवाई की जाती है। जहाँ राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों को सर-आँखों से लगाया जाना चाहिए, वहाँ उन्हें घृणाभाव से देखा जाता है।

शाकाहारियों को परोसा माँस वाले तेल में बना खाना

शैक्षणिक संस्थानों के छात्रावासों में हर प्रकार के विद्यार्थी रहते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक विशाल भारतवर्ष के कोने-कोने से छात्र देश के किसी भी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में अपनी योग्यतानुसार दाख़िला पाते हैं। ऐसे में, किसी ख़ास गुट के छात्रों की भावनाओं का ख़्याल रखना और हिन्दू (चूँकि AMU अपने-आप को अल्पसंख्यक संस्थान मानता है) समूह के छात्रों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना- क्या यह अनुचित नहीं है?

दिसंबर 2018 में जिस तेल में मुर्गे का माँस तला गया, उसी तेल में भोजन बना कर शाकाहारी छात्रों को भी परोस दिया गया। छात्रों ने उस वक़्त कहा था कि वे यूनिवर्सिटी कैम्पस में हो रहे ऐसे व्यवहार के कारण मानसिक तनाव से गुज़र रहे हैं। मना करने का बावजूद उसी तेल में पूरी-सब्जी तल कर छात्रों को खाने दे दिया गया।

अव्वल तो यह कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस मामले को भी गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया। कुलपति को मेल द्वारा शिक़ायत भेजी गई, प्रॉक्टर को इस बात की जानकारी दी गई, लेकिन कार्रवाई शून्य। शिक़ायत मिलने के कई दिनों बाद तक यूनिवर्सिटी ने इन छात्रों की कोई सुध नहीं ली। क्या अपने-आप को अल्पसंख्यक संस्थान कहने का अर्थ है कि बहुसंख्यकों को मानसिक प्रताड़ना दे कर उन्हें तनाव दिया जाए?

भारत का विभाजन कराने वाले जिन्ना का पोस्टर

जब यूनिवर्सिटी में भारत का विभाजन कराने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के पोस्टर को लेकर सरकार से शिक़ायत की गई, तब यूनिवर्सिटी पोस्टर के समर्थन में खड़ा हो गया। जिसने देश के टुकड़े कर दिए, उसी देश के एक बड़े शैक्षिक संस्थान में उसके पोस्टर लगे हैं। कितना अजीब है न? यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता ने जिन्ना के पोस्टर को हटाने से मना कर दिया और उसके समर्थन में दलीलों की झड़ी लगा दी।

जिस यूनिवर्सिटी में देश बाँटने वालों से प्यार करना सिखाया जाता हो, वहाँ के छात्र एक अच्छे नागरिक कैसे बन पाएँगे? AMU को जिन्ना प्रिय हैं, वह उन्हें अपने सीने से लगाए रखना चाहता है।

भारत के पोस्टर से जम्मू एवं कश्मीर ग़ायब

पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानता। जिस भी विदेशी राष्ट्र या संस्थान ने भारत के नक़्शे से खिलवाड़ किया है, भारत सरकार ने उस से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। लेकिन, देश के ही एक बड़े शैक्षिक संस्थान में भारत के नक़्शे से उसके एक अभिन्न अंग को ग़ायब कर दिया गया। नवम्बर 2018 में AMU में लगे एक पोस्टर में भारत के नक़्शे से जम्मू-कश्मीर को ग़ायब कर दिया गया। ऐसा यूनिवर्सिटी के कल्चरल एजुकेशन सोसाइटी की तरफ से मंचन किए जाने वाले एक नाटक के पोस्टर में किया गया था।

जब मामला राष्ट्रीय मीडिया में पहुँचा, तब यूनिवर्सिटी ने एक्शन लेते हुए उन पोस्टर्स को हटवाया। यह सिर्फ़ एक छोटी सी घटना ही नहीं है, बल्कि यूनिवर्सिटी के अधिकतर कर्मचारियों, अधिकारियों और छात्रों की मानसिकता का परिचायक है। वह मानसिकता, जो दिन प्रतिदिन और गहरी होती जा रही है, जिसकी जड़ें लगातार फैलती जा रही है। क्या AMU ने कुछ बाक़ी भी रखा है? आतंकियों का समर्थन, सुरक्षा बलों का विरोध, राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों का अपमान, भारत के नक़्शे से छेड़छाड़…..कुछ बाक़ी नहीं रहा।

कैसे सुधरेंगे हालात? कैसे बदलेगी तस्वीर?

आज स्थिति यह हो गई है कि सरकार भी AMU कैम्पस में पल रही ऐसी मानसिकता और उसके प्रभाव में आकर किए जा रहे राष्ट्रविरोधी कार्यों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में ख़ुद को असहाय महसूस कर रही है। अंध-विरोध के इस दौर में इसका एक हल यही है कि यूनिवर्सिटी कैम्पस के भीतर राष्ट्र प्रेम भी सिखाया जाए। यूनिवर्सिटी के प्रशासक ऐसे लोग हों- जिनका देश सेवा में योगदान रहा हो, जिनकी राष्ट्र निर्माण में भागीदारी रही हो।

यह अच्छा नहीं है कि पुलिस और सुरक्षा बल आतंकियों और अपराधियों की धड़-पकड़ के बजाय छात्रों के झगड़े सुलझाते फिरें। ज़िले के डीएम विकास कार्यों पर ध्यान देने के बजाय छात्रों के राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को रोकने में व्यस्त रहें। अगर यूनिवर्सिटी से देश को फ़ायदा नहीं हो रहा, तो इसमें आमूलचूल बदलाव कर इसे एक नया रूप देना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कैंपस के अंदर वातावरण स्वच्छ हों, विषैला नहीं। ऐसा तभी संभव है जब प्रशासक और छात्र- दोनों ही की काउंसलिंग की व्यवस्था की जाए। अच्छे लोगों को आमंत्रित कर सेमिनार आयोजित किए जाएँ।

सैनिकों की शहादत पर कॉन्ग्रेस का घटिया बयान

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों ने भारतीय सुरक्षा बल के जवानों पर आत्मघाती हमला किया। इस हमले में सेना के दो दर्जन से अधिक जवान शहीद हो गए। आतंकी द्वारा इस कायरतापूर्ण घटना को अंजाम देने के बाद कॉन्ग्रेसी नेता रणदीप सुरजेवाला का एक बेकार-सा बयान सामने आया है।

कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट करके सेना के शहीद 18 बहादुर जवानों को श्रद्धांजलि दी। इसके अलावा उन्होंने दु:ख की इस घड़ी में घटिया बयान देते हुए कहा, “इस मोदी सरकार के पिछले 5 वर्षों में यह 18वाँ बड़ा आतंकी हमला है। 56 इंच की छाती कब जवाब देगी?”

इस तरह सुरजेवाला के इस बयान से साफ ज़ाहिर होता है कि देश की सुरक्षा और सम्मान से भी अधिक वोट बैंक की राजनीति कॉन्ग्रेसी नेताओं के लिए मायने रखती है। जब पूरा देश सेना के जवानों के शहीद होने पर दु:ख महसूस कर रहा है, तब देश की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के प्रवक्ता द्वारा राजनीतिक बयान देना बिल्कुल शर्मनाक है।

यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस से इस तरह के बयान आए हैं। दिसंबर 2018 में शगीर सईद खान ने राज्य के लोगों से भरोसा दिलाया था कि अगर कॉन्ग्रेस की सरकार बनी तो आतंक के नाम पर मारे गए लोगों के परिवार को एक करोड़ रुपए और सरकारी नौकरी दी जाएगी।

ऐसे में साफ जाहिर होता है कि कॉन्ग्रेस को देश के सुरक्षा या स्वाभिमान की जरा भी चिंता नहीं है। सत्ता पाने के लिए सुरजेवाला जैसे नेता किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकते हैं। दर्द की इस घड़ी में जब देश के सभी राजनीतिक दलों को एक साथ इस आत्मघाती हमले के ख़िलाफ़ आवाज बुलंद करना चाहिए था, जब शहीद जवानों के परिवार के साथ खड़ा होना चाहिए था, तब सुरजेवाले ने राजनीतिक बयान देकर कॉन्ग्रेस पार्टी के असली चेहरा को उजागर किया है।


CRPF पर आतंकी हमले के बाद नीच लोगों की ‘संवेदनशील’ राजनीति शुरू हो गई है