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नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री ने ‘The Print’ की लगाई लंका

नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डेटन ने ‘उभरते हुए कहानीकार’ शेखर गुप्ता के प्रोपेगैंडा के लिए मशहूर न्यूज़ पोर्टल ‘The Print’ की उस रिपोर्ट का खंडन किया है, जिसमें दावा किया गया था कि वह कॉन्ग्रेस को न्यूनतम आय योजना बनाने में मदद कर रहे हैं।

प्रोपैगैंडा के लिए जाने जाने वाले द प्रिंट की कहानी, जिसमें उन्होंने लिखा है कि एंगस डेटन कॉन्ग्रेस की मदद कर रहे हैं

31 जनवरी को, The Print के डी के सिंह की एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें दावा किया गया था कि ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस डेटन, जिन्होंने वर्ष 2015 में फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी के साथ नोबेल पुरस्कार जीता था, कॉन्ग्रेस को अपने न्यूनतम आय गारंटी कार्यक्रम में सलाह दे रहे हैं।

The Print ने अपनी इस रिपोर्ट में लिखा है, “कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं के अनुसार, पार्टी दो अर्थशास्त्रियों के पास पहुँची क्योंकि राहुल गाँधी ने उनके काम का ‘अध्ययन’ किया था।” हालाँकि, जब OpIndia ने अर्थशास्त्री डेटन से सम्पर्क किया, तो उन्होंने कॉन्ग्रेस या राहुल गाँधी में से किसी के साथ भी जुड़े होने से स्पष्ट मना कर दिया।

नोबेल पुरुस्कार विजेता अर्थशास्त्री एंगस डेटन द्वारा OpIndia को भेजा गया जवाब

एक लाइन के ई-मेल में, डेटन ने लिखा है कि उनका इस मामले या किसी अन्य मामले के सम्बन्ध में कॉन्ग्रेस से कोई संपर्क नहीं है। हालाँकि, फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने इस बात की पुष्टि की, कि कॉन्ग्रेस के साथ उन्होंने सिर्फ इसकी ‘लागत और इसे लागू किए जाने’ के बारे में बातचीत की थी। इसके साथ ही डेटन ने कहा, “समय आ गया है कि जाति संघर्ष की राजनीति से, आय और धन के पुनर्वितरण की राजनीति की ओर बढ़ा जाए।”

पिछले सप्ताह कुछ मीडिया रिपोर्ट्स सामने आई थीं, जिनमें दावा किया गया था कि भारतीय सेना को बदनाम करने के लिए ही वर्ष 2011-2012 में कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक कहानी रची थी, जिसमें कहा जा रहा था कि सेना की मदद से तख्तापलट की कोशिश की जा रही हैं। संडे गार्जियन ने एक इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी के हवाले से स्पष्ट किया था कि ऐसी तख्तापलट की कोई कोशिश नहीं की गई थी।

इस रिपोर्ट में कहा गया है, “यूपीए 2 सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने वर्ष 2011 और 2012 के शुरुआती महीनों में अनौपचारिक रूप से इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) को यह संकेत देने का प्रयास किया था कि सेना अपने तत्कालीन प्रमुख जनरल वी के सिंह के नेतृत्व में सरकार को गिराने के लिए तख्तापलट की कोशिश कर रही थी।”

जब IB ने बताया कि वीके सिंह किसी भी राजनीतिक तख्तापलट को अंजाम नहीं देने जा रहे थे, यह कहानी मीडिया के लिए ही ‘लीक’ की गई थी, यह कहानी उसी तरह से चलाई गयी थी, जिस तरह से उस वक़्त राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सुनाई गई थी। इसमें एक नेता भी शामिल था, जिसने बाद में अपने करियर में एक शीर्ष संवैधानिक पद पर कब्जा किया था।”

ख़ास बात यह है कि रिपोर्ट में ‘सेना के तख्तापलट’ की कहानी अंग्रेजी दैनिक अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी। उस कहानी के कहानीकार भी शेखर गुप्ता ही थे। यही शेखर गुप्ता तब इंडियन एक्सप्रेस में संपादक थे।

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार पर ‘सेना द्वारा तख्तापलट’ की कहानी

कहानियों की पटकथा बनाना पत्रकारिता जितनी ही पुरानी बात हो चुकी है। हालाँकि,जब सेना से सम्बंधित मामले पर वो कहानी गढ़ रहे थे तब शेखर गुप्ता जैसे वरिष्ठ पत्रकार को मामले की पूरी जानकारी होनी चाहिए थी और उन्हें यह बेहतर तरीके से पता होना चाहिए था।

‘ऑपइंडिया’ सेना की तख्तापलट की ‘लीक’ कहानी के आरोपों पर शेखर गुप्ता के विचार जानने के लिए पहुँचने के प्रयास किए, जिस कहानी को उन्होंने भारत के प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक में बतौर ‘संपादक’ पहले पेज पर छाप लिया था।

हालाँकि, शेखर गुप्ता ने इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के समय तक कोई उत्तर नहीं दिया है।

ग़लत तरीक़े से पैसे निकलने पर बैंक होंगे ज़िम्मेदार, SMS एलर्ट मात्र से नहीं चलेगा कामः केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने बैंक उपभोक्तोओं को राहत देने वाला फै़सला सुनाया है। कोर्ट ने बैंको की ज़िम्मेदारी तय करते हुए कहा कि अगर उपभोक्ता के खाते से अनधिकृत तरीके से पैसा निकलता है तो इसके लिए सीधे तौर पर बैंक ज़िम्मेदार होंगे। न्यायाधीश पीबी सुरेश कुमार ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों में बैंक यह कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि उपभोक्ता ने SMS एलर्ट पर प्रतिक्रिया नहीं दी। बैंक खाते से किसी कस्टमर का पैसा अनधिकृत रूप से कोई न निकाल पाए इसे सुनिश्चित करना बैंक का दायित्व है।

स्टेट बैंक की याचिका रद्द करते हुए दिया आदेश

हाईकोर्ट ने कहा कि SMS एलर्ट उपभोक्ता के प्रति बैंकों की ज़िम्मेदारी ख़त्म होने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कई उपभोक्ता हो सकते हैं जिन्हें SMS देखने की आदत न हो या उन्हें देखना न आता हो। केरल हाईकोर्ट ने यह आदेश स्टेट बैंक की याचिका रद्द करते हुए सुनाया है। इससे पहले बैंक ने निचली अदालत के फै़सले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में याचिका दी गई थी। बता दें कि निचली अदालत ने एक मामले में सुनवाई करते हुए निर्देश दिए थे कि अनधिकृत विथड्रॉल के चलते ₹2.4 लाख गँवाने वाले उपभोक्ता को मुआवज़ा दिया जाए। उपभोक्ता ने यह रक़म ब्याज़ के साथ माँगी थी।

बैंक द्वारा SMS एलर्ट भेजने के तर्क़ को कोर्ट ने किया ख़ारिज

बैंक ने अपनी याचिका में यह दलील दी थी कि उसने उपभोक्ता को खाते से पैसा निकलने का SMS एलर्ट भेजा था। ऐसे में उस उपभोक्ता को तुरंत अपना खाता ब्लॉक कराने का अनुरोध करना चाहिए था लेकिन उपभोक्ता ने SMS एलर्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, इसलिए बैंक की इसमें कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती।

उपभोक्ता के हितों का ध्यान रखे बैंक

बैंक की दलील पर सुनवाई करते हुए केरल हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक बैंक अपने उपभोक्ता को सेवाएँ उपलब्ध करा रहा है, तो उसकी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपने उपभोक्ता के हितों का ध्यान रखे। कोर्ट ने कहा, “अगर किसी ग़ैरआधिकारिक विड्रॉल के चलते उपभोक्ता को नुक़सान हो, जो उसने किया ही नहीं तो बैंक उसके लिए ज़िम्मेदार है।”

उच्च न्यायालय ने कहा, “यह बैंक की ही ज़िम्मेदारी है कि वह सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग वातावरण का निर्माण करे। हर उस ग़लत हरक़त को रोकने के लिए क़दम उठाए जाएँ, जिससे बैंक के उपभोक्ताओं को नुक़सान होता हो।”

हाईकोर्ट ने कहा, “हम बैंक को केवल उसकी ज़िम्मेदारियों का अहसास दिला रहे हैं, कोई नई जिम्मेदारी या अधिकार नहीं दे रहे हैं। अगर किसी उपभोक्ता को जालसाज़ द्वारा किए गए ट्रांजैक्शन से घाटा होता है तो यह माना जाएगा कि बैंक ऐसा सिस्टम नहीं बना पाया, जिसमें ऐसी घटनाएँ रोकी जा सकें।”

RBI का किसानों को तोहफ़ा; बिना गारंटी मिलेगा ₹1.60 लाख तक का कर्ज़

बजट 2019 में पीयूष गोयल द्वारा किसानों के हित में कई सारी योजनाओं की घोषणाएँ की गई थी। अब रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RB) भी किसानों के लिए नए सौगात लेकर आया है। ताज़ा निर्णय के अनुसार, बिना कुछ गिरवी रखे मिलने वाले ऋण की अधिकतम सीमा को ₹1 लाख से बढ़ा कर सीधा ₹1 लाख 60 हज़ार कर दिया गया है, यानी कि डेढ़ गुना से भी ज़्यादा का इज़ाफ़ा। आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि केंद्रीय बैंक ने छोटे किसानों को राहत देने के लिए यह निर्णय लिया है।

इस संबंध में रिज़र्व बैंक जल्द ही सर्कुलर जारी करेगा। विशेष जानकारी देते हुए आरबीआई ने कहा:

“इससे औपचारिक ऋण प्रणाली में छोटे तथा सीमांत किसानों की भागीदारी बढ़ेगी। पछले वर्ष के मुक़ाबले, इस बार कृषि ऋण उठाव अच्छा रहा है, लेकन इसके बाद भी इसे लेकर कुछ समस्याएँ हैं। मसलन, क्षेत्रीय असमानता एवं इसका दायरा। इन समस्याओं के अध्ययन तथा निदान और इनसे जुड़े नीतिगत सुझाव के लिए हमने एक कार्यसमूह का गठन किया है।”

किसानों को यह लोन केवल कृषि संबंधित कार्यों के लिए ही मिलेगा। बता दें कि अंतरिम बजट 2019 में भी छोटे किसानों के लिए पीएम-किसान नामक योजना लाई गई थी। PM किसान योजना के अंतर्गत छोटे किसानों को सीधा उनके आय ₹6000 प्रति वर्ष दिया जाएगा। 100% भारत सरकार द्वारा भुगतान किया जाएगा, 3 किश्तों में भुगतान होगा। इस प्रोग्राम पर सरकार को ₹75,000 ख़र्च आएँगे।

इसके अलावा केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने भी अपने ब्लॉग में बताया था कि कृषि मंत्रालय के बजट का आवंटन पिछले वर्ष के मुक़ाबले ढाई गुना ज्यादा हो गया है। बजट 2019 में किसानों के सस्ते ऋण पर ख़ास ज़ोर दिया गया था।

प्रिय मुस्लिम औरतो, आप हलाला, पोलिगेमी और तलाक़ के ही लायक हो! क्योंकि आप चुप हो!

ख़बर पढ़िए, और सोचिए: एक महिला है, शादी हुई, दो साल बच्चे नहीं हुए। ससुराल वालों ने मारा, भूखा छोड़ा और पति ने कहा, “तलाक़, तलाक़, तलाक़!” हो गया तलाक़। घरवालों ने बेटे से कहा कि अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करे। पति की शर्त आई कि पहले लड़की को उसके पिता के साथ हलाला करना होगा। प्रेशर बनाया गया कि अपने ससुर के साथ ‘हलाला’ कर ले। हलाला यानी ससुर के साथ शारीरिक संबंध बनाना। 

लड़की ने मना किया। उसे इंजेक्शन दिया गया और दस दिनों तक ससुर हलाला के नाम पर उसका बलात्कार करता रहा। उसके बाद ससुर ने अपनी बहू को तलाक़ दिया ताकि उसके बेटे से उसका निकाह दोबारा हो सके। फिर से पति के साथ निकाह हुआ, और पति ने एक बार फिर 2017 में महिला को तीन तलाक़ दे दिया। फिर से परिवार ने पति से कहा कि एक बार फ़ैसले पर पुनर्विचार करे। 

इस बार पति नई शर्त लेकर आया कि इस बार हलाला उसके भाई के साथ करना होगा। इस तलाक़-हलाला की शर्त से अंततः लड़की परेशान हुई और कोर्ट की शरण में जा पहुँची। अब उस पर सुनवाई हो रही है। 

इस पर जो भी फ़ैसला आए, वो तो बाद की बात है लेकिन ऐसे मामलों में मुस्लिम समाज, और ख़ासकर मुस्लिम लड़कियाँ बिलकुल ही चुप रह जाती हैं। अपने सोशल मीडिया फ़ीड पर इन बातों पर न के बराबर मुस्लिम नाम वाले प्रोफ़ाइलों से इस पर चर्चा या भर्त्सना करते पाता हूँ। संभव है कि ऐसे लोग होंगे, लेकिन ये कभी भी इतना नहीं कर पाते कि एक हैशटैग भी ट्रेंड करा सकें। साथ ही, दुःखद बात तो यह है कि तमाम मुस्लिम नाम वाले लोग इन बातों को ‘हमारी समस्या है, हम निपटेंगे, तुम्हें क्या’ वाले तर्कों से ढकने में लगे रहते हैं।

समस्या तो यही है कि एक पूरी जनसंख्या और उनके नेताओं तक को इन कुरीतियों की सड़ाँध छूती तक नहीं। इनके पर्सनल लॉ बोर्ड और वैसे ही कई संस्थान, जो इस्लामी क़ानूनों की बात करते नज़र आते हैं, वो इन पर चुप्पी साध लेते हैं। और तो और, वो इन कुरीतियों को इस्लामी कानून के नाम पर डिफ़ेंड करने लगते हैं! ओवैसी जैसे पढ़े-लिखे नेता ने तलाक़ वाले बिल पर समुदाय विशेष को एकजुट होकर लड़ने की बात कहते हुए कहा था कि मुस्लिम अपने हिसाब से शादी करेगा और तलाक़ देगा, इसमें किसी और के निर्देशों की कोई सम्भावना नहीं।

और इन सब के बीच जो चुप बैठी रहती है, वो है भारत की दस करोड़ मुस्लिम महिला आबादी। इनके न बोलने के पीछे एक बात समझ में आती है, और वो यह है कि इनकी सामाजिक परवरिश इस तरीके से हुई है कि या तो इन बातों को वो समस्या के तौर पर देखती ही नहीं, या फिर, उन्हें डर लगता है कि अगर वो बोलेंगी तो समाज उन पर क्या प्रतिक्रिया देगा।

पहली बात तो यही है कि एक सेकुलर देश में धार्मिक परम्पराओं को छोड़कर, जिसमें शादी-निकाह जैसे संस्कार शामिल हैं, धार्मिक कानूनों (पर्सनल लॉ) का कोई औचित्य नहीं दिखता। अगर शरीयत ही लागू करना है तो फिर चोरों को कोड़ों से मारने की सजा और चौराहे पर पत्थरों से पीटकर हत्या करने की भी सजा होती रहनी चाहिए। ये क्या कि मर्दों के ईगो को संतुष्ट करने वाली परम्पराओं को धार्मिक कानून का नाम देकर स्त्रियों का शोषण किया जा रहा है?

तुर्की जैसे देश जिस ओर भारत के मुस्लिम इस हद तक देखते थे कि वहाँ चाँद दिखने पर अपना रोज़ा तोड़ते थे, उन्होंने इन सारी प्रथाओं को दरकिनार किया है। वहाँ औरतें चुन सकती हैं कि वो क्या पहने, कहाँ जाएँ, किसके साथ रहें। जबकि एक समय था इस्लाम वही से संचालित होता था। तुर्की ने बेहतर समाज के लिए इन कुरीतियों को हटाया और सामाजिक समानता की बात की। यह भी देखा गया है कि जिन मुस्लिम देशों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो, जहाँ लोकतंत्र है, वहाँ की औरतों को ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं। 

लगभग 49 देश ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग बहुसंख्यक हैं, लेकिन वैसे देश जो युद्ध से जूझ रहे हैं, अशिक्षा है, ग़रीबी है, वहाँ स्त्रियों के अधिकार न के बराबर हैं। भारत में मुस्लिम समुदाय दूसरी बड़ी आबादी हैं, और यहाँ संविधान उनके हितों को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर रक्षा करती है। यहाँ तो युद्ध की भी स्थिति नहीं है। फिर यहाँ की महिलाओं को ऐसी नारकीय यातनाएँ क्यों दी जा रही हैं? भारत के मुस्लिमों को ये सोचना चाहिए कि वो अपनी माँ, बहन, बेटी को कैसे अधिकार देने चाहेंगे। जब तक निजी तौर पर इसे न सोचा जाए, समानता की बात मुश्किल है। सरकार कानून भी बना दे तो भी क्या होगा?

एक बेहतर समाज अपने हर अंग को साथ लेकर चलता है। एक स्वस्थ समाज में ऐसी कोढ़ की कोई जगह नहीं होनी चाहिए जो मानवमात्र की इज़्ज़त ना कर सके। एक प्रगतिशील समाज हर नागरिक को आर्थिक, समाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक तौर पर सशक्त करने की कोशिश करता रहता है। 

अगर मुस्लिम महिलाओं ने इस पर मुहीम नहीं छेड़ी तो उनके अधिकार की लड़ाई कोई नहीं लड़ेगा। इस देश और समाज ने तथाकथित मजहबी नेताओं को देख लिया है कि इन क्रूर परम्पराओं को लेकर उनके विचार किसी मौलवी की ही गोद में जा गिरते हैं। इस्लाम की ढाल लेकर, औरतों के शोषण करने वाली इन बातों पर हर मंच से मजहबी नेताओं ने भागने की कोशिश की है।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे असंवैधानिक बनाए जाने के बावजूद महिलाएँ तीन तलाक़ का शिकार होकर घरों से बाहर फेंकी जा रही हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है उन्हें इस हलाला नाम के धार्मिक बलात्कार की प्रक्रिया से गुज़रना होता है क्योंकि एक महिला अपने बच्चों को लेकर कहाँ जाएगी? अपने पिता का परिवार उसे सामाजिक दबाव में, अपनी ‘बदनामी’ के डर से, नहीं अपनाता, और पति ने तो घर से ही निकाल दिया।

जब तक मुस्लिम महिलाएँ, उनकी पढ़ी-लिखी बेटियाँ, सड़कों पर अपने ही मौलवियों से, नेताओं से अपने अधिकारों की बात नहीं करेंगी, ये मुद्दा राजनैतिक या कानूनी तरीके से नहीं सुलझने वाला। कानून तो चोरी को भी लेकर बने हैं, लेकिन उसे अगर कोई समाज धार्मिक मान्यता प्रदान कर दे, तो फिर कानून अपना काम कभी नहीं कर पाएगा। 

इसीलिए, यहाँ समाज और धर्म को साफ करने का ज़िम्मा भी उसी समाज के लोगों पर है। दुर्भाग्य यह है कि जिन्हें इस कचरे को साफ करना चाहिए, वो उसे गुलदस्ता मानकर उसकी सुगंध ले रहे हैं। भीतर की सड़ाँध को बाहर का झाड़ू साफ़ नहीं कर सकता। अगर मुस्लिम महिलाएँ आगे नहीं आती है, उनके शिक्षित लोग इस पर बात नहीं करना चाहते, तो शायद ये महिलाएँ इसी समाज में रहने लायक हैं। और यह एक दुःखद स्थिति है। 

8 साल की दुष्कर्म पीड़िता को शिवराज सरकार ने दिया था घर, कॉन्ग्रेस सरकार ने दिया खाली करने का आदेश

मध्यप्रेदश के इंदौर जिले में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई 8 साल की बच्ची को मुआवजे के तौर पर मिले घर को खाली करने के निर्देश जारी किए गए हैं। इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) ने बुधवार को रेप पीड़िता बच्ची को आवंटित हुए घर को खाली करने का निर्देश दिया है। बता दें कि भाजपा सरकार और शिवराज सिंह के कार्यकाल में बच्ची को शहर में एक घर और दुकान आवंटित की गई थी।

आईडीए के अधिकारियों का कहना है कि पिछली भाजपा सरकार ने इसके लिए कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया था, इसलिए घर खाली करना होगा। ख़बरों की मानें तो पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीड़िता के लिए पुनर्वास पैकेज की घोषणा की थी। जिसके बाद आईडीए ने परिवार को ज़िला प्रशासन में एक घर आवंटित करते हुए बच्ची के पिता को मंदिर स्थल में एक दुकान आवंटित की थी। साथ ही बच्ची और उसके दो भाई बहनों का एक अच्छे स्कूल में दाख़िला भी करवाया था।

स्कूल के पास से अपहरण करके हुआ था दुष्कर्म

कक्षा 3 में पढ़ने वाली दुष्कर्म पीड़िता से बीते 26 जून 2018 को दो लोगों ने स्कूल के पास से अपहरण कर दुष्कर्म किया था। दुष्कर्म के बाद आरोपितों ने उसका गला काटकर उसे मरती हालत में छोड़ दिया और भाग निकले। स्थानीय लोगों को बच्ची ख़ून से लथपथ झाड़ियों में पड़ी मिली थी, जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहाँ 5 महीने इलाज के बाद वह घर वापस लौट सकी थी। बता दें कि दोनों आरोपितों को दोषी पाया गया था और उन्हें सज़ा भी दी गई थी।

कॉन्ग्रेस के आते ही छोड़ना पड़ रहा है घर

पीड़िता के पिता ने कहा कि राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार आई तो लोगों ने कहा कि सरकार बदल गई है, अब घर छोड़ना पड़ेगा क्योंकि पुरानी सरकार ने घर के लिए कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया था। वह कहते हैं कि लोगों की बात सच हो गई, लगता है हमें वापस घर जाना होगा। हमें समझ नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए।

आईडीए के एक अधिकारी एनएल महाजन का कहना है कि पिछली सरकार द्वारा की गई घोषणा के बाद घर दिया गया था, लेकिन अभी इसको लेकर मौजूदा सरकार ने कोई आदेश जारी नहीं किया है इसलिए घर खाली करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि हमें औपचारिक आदेश के बिना किसी को भी घर सौंपने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने बताया कि परिवार घर में नहीं रह रहा है बल्कि घर को किराए पर दिया गया है ताकि कुछ पैसा मिल सके। ख़ुद के लिए उन्होंने मंदिर के पास घर किराए पर लिया है, जहाँ बच्ची के पिता को दुकान मिली है।

घर खाली करने की बात सामने आने के बाद बच्ची के पिता ने कहा कि उन्हें डर है कि अगले शैक्षणिक सत्र में उनके बच्चों को स्कूल से निकाल दिया जाएगा। उन्होंने कहा, “मैं ₹4.5 लाख की फीस नहीं दे सकता हूँ।” लड़की की माँ ने कहा, “उस दर्द और पीड़ा को राजनेता भूल सकते हैं लेकिन हम अब भी काफी दर्द में हैं। मेरी बेटी अब भी उस आघात से गुजर रही है। वह अब भी नींद में चिल्लाते हुए कहती है ‘मम्मी बचाओ, मम्मी बचाओ’।”

चिटफंड घोटालों से जनता को बचाने के लिए सरकार बना रही है कानून

नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार शारदा जैसी फर्जी चिटफंड कंपनियों पर रोक लगाने के लिए नया कानून बनाने जा रही है। शारदा चिटफंड जैसी कंपनी ने देश भर के लोगों की गाढ़ी कमाई को अवैध तरह से लूटने का काम किया है।

इस कंपनी के साथ कई सारे नेता और रसूख वाले लोगों ने मिलकर इस घटना को अंजाम दिया। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने जमा योजना चलाने वाली भगौड़े कंपनियों पर रोक लगाने के लिए सख़्त कदम उठाया है।

ऐसी कंपनियाँ भविष्य में लोगों की गाढ़ी कमाई लूट कर नहीं भाग पाए इसके लिए ‘द बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम बिल, 2018’ को सरकार अंतिम रुप दे रही है।

द बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम बिल, 2018

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में इस बिल को लाने के लिए बुधवार को कैबिनेट की मीटिंग हुई। इस मीटिंग में ‘द बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम बिल, 2018’ के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई।

इस बिल के बारे में जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया कि इस बिल को कानून का रूप लेने के बाद यदि कोई कंपनी लोगों के पैसे को जमा कराती है तो उसे इस कानून के तहत खुद को पंजीकृत कराना होगा। यदि कोई कंपनी इस कानून के तहत पंजीकृत कराए बगैर जमा योजना चलाती है तो उसे अवैध माना जाएगा।

यही नहीं केंद्रीय मंत्री ने मीडिया को बताया कि अवैध पाए जाने वाली कंपनियों के मालिक के साथ ही साथ एजेंट और ब्रांड एंबेसडर के ऊपर भी कार्रवाई की जाएगी। सरकार की तरफ से मंत्री ने आश्वस्त किया कि ऐसी फर्जी कंपनियों को बेचकर गरीबों की पूँजी वापस कराई जाएगी।

जानकारी के लिए बता दें कि इस कानून के लिए वित्त मामलों की स्थाई समिति ने सरकार के समक्ष एक रिपोर्ट पेश की थी। ‘द बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम बिल 2018’ को सरकार ने 18 जुलाई को संसद में पेश किया गया, इसके बाद इस बिल को विचार के लिए संसदीय समिति के पास भेज दिया गया था।

संसदीय समिति ने इस बिल पर 3 जनवरी को रिपोर्ट दी थी। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह भी कहा कि 2015 से 30 नवंबर, 2018 तक देशभर में सीबीआई ने अवैध रूप से लोगों से धनराशि जमा कराने से संबंधित पोंजी और चिटफंड से जुड़े 166 मामले दर्ज किए हैं। सर्वाधिक मामले पश्चिम बंगाल और उड़ीसा से हैं।

चर्च यौन शोषण: पोप का चुप्पी तोड़ना उनके मौन से भी ख़तरनाक है क्योंकि…

ईसाइयों के सबसे बड़े पादरी पोप फ्रांसिस और इस्लाम के सर्वोच्च मौलवियों में से एक इमाम शेख़ अहमद अल-तैयब ने चुम्मा-चाटी कर सांप्रदायिक सौहार्दता का कथित सन्देश तो दे दिया, लेकिन इस से ज़मीनी हालात में कुछ सुधार नज़र नहीं आ रहे। बलात्कार, यौन शोषण के आरोपित पादरी अब भी खुले घूम रहे हैं, ननों को प्रताड़ित करने वाले बिशप अब भी अपने पद पर बेशर्मी से कार्यरत हैं, चर्च प्रशासन के अन्याय से तंग नन्स आज भी सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने को मज़बूर है, और वेटिकन आज भी इस संबंध में कोई कार्रवाई करने से हिचक रहा है।

हमने अपने पिछले लेख में बताया था कि कैसे जब पोप और इमाम एक-दूसरे की चुम्मी ले कर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का प्रण ले रहे थे, तभी पाकिस्तान और अमेरिका में मंदिरों को जलाने और उनमे तोड़-फोड़ करने की ख़बर आई। अब पोप ने चर्च यौन शोषण पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए काफी बेढंगी प्रतिक्रया दी है। जैसे किसी देश के संविधान में लिखे एक-एक शब्दों की अदालतें व्याख्या करती आईं हैं, ठीक उसी तरह पोप के भी बयानों की व्याख्या करने के लिए वेटिकन मुँह फाड़े खड़ा रहता है।

पोप का ताज़ा बेढंगा बयान और वेटिकन की अज़ीबो-ग़रीब व्याख्या

पोप से जब एक रिपोर्टर ने चर्चों में हो रहे यौन शोषण के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा:

“यह सच है…कई ऐसे पादरी हैं, और बिशप भी- जिन्होंने ये (यौन शोषण) किया है। मुझे लगता है कि यह अभी भी चल रहा है क्योंकि कुछ सिर्फ़ इसलिए नहीं रुकता क्योंकि आप इसके बारे में जागरूक हो गए हैं। हम इस पर लम्बे समय से कार्य कर रहे हैं, और हमने इन आरोपों के कारण कुछ पादरियों को निलंबित भी किया है।”

इसके बाद पोप ने ख़ुद से ही सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया। “क्या और अधिक किया जाना चाहिए?” पोप ने पोप से पूछा। “हाँ” पोप ने ज़वाब दिया। “क्या हमारे पास इच्छाशक्ति है?” पोप ने पोप से फिर सवाल दागा। “यह एक रास्ता है जिस पर हम पहले ही चलना शुरू कर चुके हैं।”- पोप ने पोप को निरुत्तर कर दिया। इस सवाल-जवाब में मीडिया, आम जनता और पीड़ित नन्स- सबकी समस्याओं का समाधान हो गया।

बिशप फ्रांको मुलक्कल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली ननों के साथ क्या किया गया, यह जगज़ाहिर है। बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार होकर ज़मानत पर बाहर आए उस बिशप का जिस तरह से स्वागत किया गया, इसकी ख़बर पोप तक जरूर पहुँची होगी। द एसोसिएट प्रेस सहित अन्य मीडिया पोर्टल्स ने ऐसी अनगिनत कहानियों की चर्चा की, जहाँ ननों को पादरियों द्वारा ‘सेक्स टॉयज’ की तरह इस्तेमाल किया गया।

सबसे पहले पोप के बयान पर ध्यान देते हैं। उनके अनुसार, कार्रवाई की जा रही है। इस पर हर एक व्यक्ति उनसे पूछना चाहेगा कि बिशप मुलक्कल पर क्या कार्रवाई की गई? सड़क पर तख़्तियाँ लेकर खड़े ननों को न्याय दिलाने के लिए वेटिकन ने क्या किया? ऐसी सूरत में, जब ख़बर स्थानीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक में चली और चर्च की किरकिरी हुई, वेटिकन ने इस बारे में एक बयान तक जारी करना क्यों ज़रूरी नहीं समझा? महिलाओं के बारे में बात करते हुए पोप ने कहा:

“पूर्व पोप बेनेडिक्ट ने 2005 में अपने चुनाव के बाद शीघ्र ही महिलाओं के धार्मिक क्रम (Religious Order) को भंग कर दिया “क्योंकि दासता इसका हिस्सा बन गई थी (धार्मिक आदेश), यहाँ तक कि पादरियों और संस्थापकों की ओर से भी यौन दासता जैसे कृत्य किए जा रहे थे।”

वेटिकन ने पोप के बयान की जो व्याख्या की, वो और भी अज़ीबो-ग़रीब है। वेटिकन ने पोप के बयान को लेकर कहा:

“जब होली फादर ने एक संघटन के विघटन का ज़िक्र किया, तो ‘यौन दासता’ की बात की, जिसका अर्थ था ‘हेरफेर (Manipulation),’ शक्ति का दुरुपयोग- जो कि यौन शोषण में भी परिलक्षित होता है।”

वेटिकन का यह रवैया उसके भीतर चल रहे विरोधाभाषों को दिखता है। ‘महिलाओं के यौन शोषण’ की तुलना ‘शक्ति के दुरूपयोग’ से नहीं की जा सकती। पहला वाला कहीं अधिक घृणित और वीभत्स कार्य है। वो भी ऐसी महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करना, जो ईश्वर की सेवा करने की पवित्र भावना के साथ चर्च में आती हैं।

फ़िल्मों से लेकर सोशल मीडिया तक छाया है मुद्दा

द बोस्टन ग्लोब नामक अख़बार की खोजी पत्रकारिता पर बनी ऑस्कर विजेता फ़िल्मस्पॉटलाइट‘ में पादरियों द्वारा किए जाने वाले बाल यौन शोषण को उजागर किया गया है। अख़बार द्वारा गठित स्पॉटलाइट टीम की खोजी पत्रकारिता की मदद से इस सच को सामने लाया गया था। द बोस्टन ग्लोब की स्पॉटलाइट टीम को पुलित्जर सम्मान मिला था। लेकिन, तब भी वेटिकन की आँखें नहीं खुलीं। इस फ़िल्म के पहले और बाद में कैथोलिक चर्च सिर्फ़ यौन शोषण के मामलों में करोड़ों का जुर्माना भर चुका है।

हमने भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में आई यौन शोषण की कई स्टोरीज़ प्रकाशित की थी, जिसमे ननों ने अपने साथ हुए अत्याचार को उजागर किया था। हाल ही में अमेरिका के इलिलोईस प्रांत में करीब 700 पादरियों पर बच्चों के यौन शोषण का आरोप लगा था। इलिनोइस के अटॉर्नी जनरल ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि चर्च इन आरोपों से निपटने में अक्षम रहा है। ज्ञात हो कि चर्च ने यौन शोषण के आरोपित पादरियों की संख्या 185 बताई थी लेकिन अटॉर्नी जनरल लीसा मैडिगन के अनुसार ऐसे पादरियों की संख्या इस से कहीं बहुत ज़्यादा है।

अब सवाल यह उठता है कि मामले के इतने बड़े स्तर पर जाने के बावजूद शक्तिशाली वेटिकन और पोप ने किसी भी प्रकार के बयान देने, इस घटनाओं की निंदा करने, और दोषी पादरियों पर कार्रवाई करने की ज़हमत क्यों नहीं उठाई। पोप ने आख़िरकार अपना मौन तो तोड़ा, लेकिन इस बयान से अच्छी तो उनकी चुप्पी थी। उनकी चुप्पी से कम से कम तरह-तरह के क़यास तो लगाए जा सकते थे, लेकिन उनके इस बयान ने दुनियाभर की हज़ारों पीड़ित ननों को निराशा के अलावा और कुछ नहीं दिया है।

अगर वेटिकन चर्च में हो रही इन वारदातों को सँभालने में नाकाम रहा है, तो उसे यह घोषणा कर देनी चाहिए कि उसने दुनियाभर के पादरियों का ठेका नहीं ले रखा है, और वो उसके जुरिडिक्शन में नहीं आते। खुल्ले साँड की तरह घूम रहे दोषी पादरी और बिशप फ़िलहाल आश्वस्त हैं- उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

पाकिस्तान का अमानवीय चेहरा: लाखों गदहों की बलि चढ़ा कर भरेगा ख़जाना

पाकिस्तान का एक बहुत ही अमानवीय चेहरा सामने आया है। इसके मज़ाकिया पक्ष की तो ख़ूब बात हो रही है, लेकिन इसका एक ऐसा दर्दनाक पक्ष भी है, जिसे जान कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे। इस विषय पर हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर लिखा जा चुका है। इसमें बताया गया है कि कैसे गदहों की कमी से जूझ रहे चीन की पकिस्तान सहायता करेगा। दरअसल, ख़बर आई है कि क़र्ज़ में डूबा पाकिस्तान अपने ख़जाने को भरने के लिए गदहों का निर्यात करेगा। पाकिस्तान इस योजना से अपने विदेशी मुद्रा भंडार को भरना चाह रहा है।

आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि मामला क्या है। दरअसल, पाकिस्तान में गदहों की जनसँख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इस मामले में पाकिस्तान विश्व में तीसरे नंबर पर आता है। अब उसने निर्णय लिया है कि इन गदहों को चीन को निर्यात किया जाएगा ताकि हर वर्ष करोड़ों डॉलर बनाए जा सके। ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रान्त ने इस बारे में कार्य योजना भी तैयार कर ली है। पाकिस्तान में 50 लाख से भी ज्यादा गदहे हैं। अकेले लाहौर में 41,000 से ज्यादा गदहे हैं।

चीन में क्या होगा इन गदहों का

जो लोग दीपावली के पटाखों से कुत्तों को डर लगने की बात कह कर खुद को पशुप्रेमी जताते हैं पर न जाने क्यों गौपालन का विरोध कर जाते हैं। उन लोगों के लिए यह जानना भी ज़रूरी हो जाता है कि विश्व का सबसे बड़ा देश (जनसंख्या के हिसाब से) पाकिस्तान से गदहे क्यों चाहता है भला! पाकिस्तान द्वारा निर्यात किए गए गदहों का चीन में क्या किया जाएगा, इसके बारे में जान कर आपके होश उड़ जाएँगे। दरअसल, चीन में गदहों की चमड़ी व अन्य उत्पादों की काफ़ी बड़ी माँग है, जिसके कारण विश्व में गदहों की जनसँख्या घटती जा रही है।

चीन में गदहों की चमड़ी को छील कर उनसे तरह-तरह की दवाइयाँ और क्रीम बनाई जाती है, जो चेहरे से झुर्रियाँ हटाने में मदद करती है। अब यह व्यापार धीरे-धीरे ही सही लेकिन पाकिस्तान के बाजार में भी अपनी पैठ बना रहा है। अंध-आधुनिकता के इस दौर में कुछ लोगों को हमेशा जवान दिखने की लोलुप चाहत ने एक निरीह जानवर की सामूहिक हत्या को व्यवसाय बना कर रख दिया है। 2011-15 के बीच पाकिस्तान ने अकेले चार वर्षों में 1,41,000 से ज़्यादा गदहों की चमड़ियाँ निर्यात की

उन दवाइयों के लिए गदहों को चीन में कैसे मौत के घाट उतारा जाता है, ये जान कर आप सिहर उठेंगे। 5 वर्ष का गदहा हो या फिर 5 महीने का बच्चा, किसी को भी नहीं बख़्शा जाता। उन सब की निर्ममता से सामूहिक हत्या कर दी जाती है। Ejiao नामक दवा बनाने के लिए गदहों को धरती पर सुला कर उनके सिर पर हथौड़ों से जोर-जोर से प्रहार किया जाता है, जिससे कि वो एक धीमी और दर्दनाक मौत मरते हैं

इतना ही नहीं, गदहों को उनके ही मल-मूत्र के बीच मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। चीन में ऐसी भी मान्यता है कि गदहों की चमड़ी से बनी दवा के सेवन से व्यक्ति की आयु भी लम्बी होती है।

अफ्रीकन देश भुगत रहे हैं ख़ामियाजा

अपने प्राकृतिक संसाधनों व जानवरों के लिए मशहूर अफ्रीकन प्रायद्वीप पर जब चीन की नज़र पड़ी, तो उसने इसे अपने लिए एक मौके के समान लिया। उसने अफ्रीका से गदहों को ख़रीदना शुरू कर दिया। चीन में गदहों की माँग इतनी थी कि अफ्रीका से लाए जाने वाले गदहे भी कम पड़ने लगे। इसके बाद चीनियों ने अफ्रीका के गावों से गदहों की चोरी शुरू कर दी। तंग आकर कई अफ्रीकन देशों ने गदहों के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उन्होंने कहा कि चीन की इस माँग को पूरी करना उनके वश की बात नहीं।

इसे जानने के लिए एक वाक़ये का उदाहरण लेते हैं। केन्या के रहने वाले एंथोनी मौपे पानी की डिलीवरी कर अपना गुज़र-बसर चलाते हैं। इसके लिए वो एक गाड़ी और गदहे का प्रयोग करते हैं। उनके गदहे का नाम था- ‘कार्लोस’, जो उनके काम में उनकी मदद करता था। उस गदहे पर उनका पूरा व्यवसाय और जीवनयापन जुड़ा हुआ था। लेकिन एक सुबह यह सब कुछ बदल गया। जब वह सो कर उठे, तब उनका कार्लोस गायब था।

जब उन्होंने उसकी ख़ोजबीन शुरू की, तो उन्हें उनका प्यारा जानवर मरा हुआ मिला। जब वो उसके क़रीब गए तो उन्होंने जो देखा, वो काफ़ी वीभत्स था। गदहे की चमड़ी को छील कर निकाल लिया गया था और उसके अधकटे शरीर को वहीं छोड़ दिया गया था

सीएनएन के आँकड़ों के अनुसार, चीन में पिछले 20 वर्षों में 50 लाख से भी अधिक गदहों को मार डाला गया है। अफ्रीका में इस घृणित व्यवसाय के फैलने से वहाँ के स्थानीय लोगों को भी ख़ासी परेशानी हुई। उनके नालों में अक्सर गदहों के ख़ून बहते हुए पाए जाते थे, जो कई तरह की बीमारियों को जन्म दे सकते हैं। केन्या, मिस्र से लेकर नाइजीरिया तक- चीनी दलालों ने हर जगह पाँव पसारे और इस व्यापार को फैलाने में पूरी मदद की।

आख़िर पकिस्तान क्यों इस नीचता पर उतर आया?

पाकिस्तान में 2018 में हुए चुनावों में इमरान ख़ान की पार्टी तहरीक़-ए-इंसाफ़ को बड़ी जीत मिली और वो ‘नया पाकिस्तान’ का नारा देकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। चुनाव के दौरान उन्होंने पाकिस्तान द्वारा विदेशी देशों से आर्थिक मदद माँगे जाने को मुद्दा बनाया था। उन्होंने इसे ‘कटोरा लेकर भीख माँगने’ तक की संज्ञा दी थी। लेकिन, उनके सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तान के हालात और बदतर ही हुए हैं।

हाल ही में चीन ने पकिस्तान को 2.5 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ देने का निर्णय लिया। इसके अलावा पकिस्तान ने सऊदी अरब के सामने भी झोली फैलाई, जिसके बाद उसे वहाँ से भी 3 बिलियन डॉलर की सहायता मिली। अब पकिस्तान वर्ल्ड बैंक से 400 मिलियन डॉलर माँग रहा हैक़र्ज़ में डूबे पकिस्तान की हालत इतनी खस्ती हो गई है कि उसे अन्य देशों के सामने झोली फैला कर घूमना पड़ रहा है। यही कारण है कि वो अब अपने मुद्रा भंडार को मज़बूत करने के लिए तरह-तरह के उपायों पर विचार कर रहा है।

अभी हाल ही में पकिस्तान ने चीन को 1,00,000 किलोग्राम बाल (Human Hairs) निर्यात किए थे। चीन में मेक-अप इंडस्ट्री काफ़ी फल-फूल रही है, जिसके कारण वहाँ मनुष्य के केशों की माँग बढ़ती जा रही है। यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन गदहों की निर्मम हत्या के लिए उनका निर्यात करने का निर्णय लेकर आतंकवाद का पोषण करने वाले पाकिस्तान ने अपने अमानवीय, क्रूर और निष्ठुर चेहरा फिर से दिखा दिया है।

डियर सोसायटी, लड़की को आप ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ पर आँक लेते हैं… लड़कों के लिए भी ऐसा ही कुछ किया जाए?

कुछ समय पहले पुणे के कुछ युवकों ने समाज की एक भद्दी कुरीति ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को ख़त्म करने के लिए ऑनलाइन मुहिम की शुरूआत की थी। जिसके मद्देनज़र महाराष्ट्र सरकार द्वारा महिलाओं के हित में बुधवार (फरवरी 6, 2019) को बेहद सराहनीय फ़ैसला लिया गया। इस फ़ैसले में महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि किसी भी महिला को उसके ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ के लिए बाध्य करने को जल्द ही सरकार एक दंडनीय अपराध बनाएगी।

ये क़दम उठाने के पीछे महाराष्ट्र सरकार का उद्देश्य साफ़ था कि राज्य के कुछ समुदायों में आज भी यह परंपरा है कि शादी के बाद महिला ख़ुद को ‘वर्जिन’ साबित करे। ज़ाहिर है ये कार्य स्वेच्छा से जुड़ा हुआ तो बिल्कुल भी नहीं हैं, इसलिए समुदाय से संबंधित लोग उस नवविवाहिता को ऐसा करने के लिए बाध्य करते थे।

इस बाध्यता को कभी ‘परंपरा’ मानकर तो कभी ‘संस्कार’ मानकर समुदाय विशेष से जुड़ी अधिकतम लड़कियाँ ख़ुद को इस कुरीति की भेंट बनाकर चढ़ा देती हैं। ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को लेकर कई समुदायों में मान्यता है कि इससे लड़की की पवित्रता और अपवित्रता के बारे में पता चलता है।

हालाँकि बढ़ते हुए भारत की तस्वीर में यह चीज़ें थोड़ी पिछड़ी हुई बातें लगती हैं। लेकिन थोडा जूम इन करके देखा जाए तो पता चलेगा कि यह आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में और विशेष जाति में नवविवाहिताओं के साथ बीतने वाली कड़वी हकीकत है।

वर्जिनिटी टेस्ट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करती महाराष्ट्र की महिलाएँ

देर-सवेर सही लेकिन इस मामले को संजीदगी से लेते हुए गृह राज्य मंत्री रंजीत पाटिल ने बुधवार संवाददाताओं के सामने कहा है कि वर्जिनिटी टेस्ट को यौन हमले का एक प्रकार समझा जाएगा। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में विधि एवं न्याय विभाग के साथ सलाह के बाद परिपत्र जारी होगा, जिसमें इसे दंडनीय अपराध के रूप में घोषित किया जाएगा।

हमारे समाज में आज से ही नहीं बल्कि पौराणिक काल से कभी सती के नाम पर तो कभी वर्जिनिटी टेस्ट के नाम पर महिलाओं का शोषण किसी न किसी कुरीति के रूप में होता आया है। ऐसी ढकोसलों से भरी परंपराओं की शुरूआत करने वालों की सबसे विशेष बात होती है कि वो लड़कियों को शुरू से ही इस प्रकार प्रशिक्षित करते हैं कि महिलाओं की श्रेणी में आते-आते उनके लिए यह सब जीवन का एक हिस्सा हो जाए। वे न कभी ख़ुद पर कोई बात करें और न ही कभी अपने अधिकारों पर।

क्षेत्रों से लेकर समुदायों और देश से लेकर समाज तक यह कुरीति सिर्फ़ महाराष्ट्र के चुनिंदा समुदायों की हक़ीकत नहीं हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हर बार अधिकतर जगहों पर आज भी लड़की के वर्जिन होने का प्रमाण हर कोई माँगता ही रहता है।

अपने तय किए मानदंडों पर महिलाओं की पवित्रता को आँका और पहचाना जाता है। अगर कहीं पर भी महिला उन मानदंडो पर किन्हीं कारणों से असफल हो जाए तो उसे हीन नज़र से देखा जाता है और वैवाहिक जीवन तक पर खतरा बन ही जाता है। महाराष्ट्र में कंजरभाट समुदाय में आज भी दूल्हे की इच्छा पर दुल्हन को अपने वर्जिन होने का सबूत देना पड़ता है।

सोचने वाली बातें हैं कि अगर किसी समुदाय में वर्जिन होना ही परंपरा और संस्कार का आईना हैं तो फिर यह सब सिर्फ़ महिलाओं तक ही क्यों सीमित है? लड़की के वर्जिनिटी टेस्ट पर सवाल खड़ा करने वाले लोग लड़के के वर्जिन होने पर कभी भूले-बिसरे भी उँगली नहीं उठाते। इसे कुरीति का नाम न मिले तो और किसका मिलेगा जिसमें सिर्फ़ लड़की को ऐसी परीक्षाएँ भी देनी है और असफल होने पर सबके आगे शर्मसार भी होना है।

अभी हाल ही में कंजरभाट समुदाय के नवविवाहित जोड़े का ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ से जुड़ा मामला सामने आया। इस ख़बर में सबसे दुखद बात थी कि लड़का और लड़की दोनों ने उच्च शिक्षा ग्रहण की हुई है। साथ ही परिवार भी शिक्षित है। लड़का पढ़ाई करके इंग्लैंड से लौटा था। लेकिन फिर भी लड़के ने लड़की के वर्जिनिटी टेस्ट की माँग की थी जैसे यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो। ऐसे पढ़े-लिखे लोगों का इन गिरे मुद्दों को लेकर खबरों में आना हमें बताता है कि आज भी शिक्षा के प्रभाव से ज्यादा समुदाय के माहौल का फर्क हम पर पड़ता है।

यहीं कारण है कि पितृसत्ता से जकड़ा हुआ समाज शिक्षित होने के बाद भी इन कुरीतियों को विकल्प के तौर पर अधिकार मानकर चलता है और सोचता है कि वो जब चाहें समुदाय विशेष द्वारा मिले इन अधिकारों का इस्तेमाल करके महिलाओं के दमन को बढ़ावा दे सकते हैं।

याद दिला दूँ अभी हाल ही में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर का आपत्तिजनक बयान सुर्खियों का हिस्सा बना था जिसमें उन्होंने अपने छात्रों को वर्जिनिटी की महत्वता बताते हुए फेसबुक पोस्ट में कहा था कि क्या आप टूटी सील के साथ कोल्ड ड्रिंक की बोतल या बिस्किट के पैकेट ख़रीदना चाहेंगे?

इस बात पर हालाँकि बवाल बहुत हुआ लेकिन सोचने वाला विषय यह है कि फेसबुक पोस्ट पर लिखी यह बात भले ही चर्चाओं में आ गई हो, लेकिन क्लासरूम के भीतर ऐसे शिक्षक का होना आने वाली लड़कियों के लिए किसी ख़तरे से कम नहीं हैं। शिक्षा के नाम पर लड़की के वर्जिन होने की महत्तवता पर बात करना कुंठित मानसिकता की न सिर्फ़ पहचान है बल्कि उसे बढ़ावा देना भी दर्शाता है।

इसके अलावा कुछ समय पहले ख़बर आई थी कि कुवैत में एक शख़्स ने अपनी बीवी की वर्जिनिटी पर शक़ करते हुए फॉरेंसिक जाँच माँगी थी। इस मामले का इतना तूल पकड़ना बताता है कि आज महिलाओं की वर्जिनिटी का यह मुद्दा सिर्फ़ देश, राज्यों और क्षेत्रों तक सिमटा हुआ नहीं हैं बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाएँ इस पीड़ा से गुज़र रही हैं।

आज न केवल समाज और समुदायों द्वारा इसे बढ़ावा दिया जा रहा है बल्कि बाज़ार भी इसे ढाल बनाने से नहीं पीछे हट रहा। लगातार बाज़ार में ऐसे प्रोडक्ट उतारे जाते रहे हैं जो महिलाओं की वर्जिनिटी को टारगेट करके अपनी ज़मीन तैयार करते हैं। साल 2012 में ऐसा ही मुद्दा गर्माया था जिसमें ऐसी क्रीम के विज्ञापन विवाद का हिस्सा बने थे। इनमें ख़ासियत यह थी कि यह उत्पाद महिलाओं की योनि को गोरा करने से लेकर उन्हें दुबारा वर्जिन बनाने का दावा करते थे।

सोचिए, बढ़ते हुए भारत की तस्वीर में जहाँ पर लड़कियाँ घर से लेकर नौकरियों में, व्यापार में, सिने-जगत, खेलजगत में लगातार अपनी उपस्थितियाँ दर्ज करा रही हैं। भागदौड़ भरी ज़िंदगियों में वो हर प्रकार का संघर्ष कर रही हैं और खुद को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम से लेकर योग कर रही हैं। और, इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ लड़कियाँ साइकिल चलाने से लेकर पेड़ पर चढ़ते हुए कार्यों को करने से पीछे नहीं हटती हैं।

वहाँ ऐसी स्थितियों में अगर एक हाइमन के ब्रेक हो जाने से उसके चरित्र पर ही उँगलियाँ उठें और शर्मसार हो जाना पड़े तो जरूरी है कि न केवल महाराष्ट्र की सरकार बल्कि पूरे देश में इस ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को अपराध घोषित कर दिया जाए। ताकि, पितृसत्ता से जकड़ा हुआ समाज आज ख़ुद ऐसे रीति-रिवाज़ों को गढ़ने से पहले क़ानूनी रूप से अपराधी बन जाए।

राइफ़लमैन औरंगजेब की हत्या: आतंकियों से मिलकर कश्मीर के जवानों ने ही दिया था धोखा?

पिछले साल (2018) जून में कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादियों द्वारा राइफ़लमैन औरंगज़ेब के अपहरण और हत्या करने की घटना के संबंध में सेना ने सुरक्षा बलों के तीन जवानों को संदिग्ध माना है और उनसे पूछताछ कर रही है।

जानकारी के मुताबिक, 44 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के तीन जवानों को हिरासत में लिया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है। सेना को संदेह है कि राष्ट्रीय राइफ़ल्स के जवानों ने राइफ़लमैन औरंगजेब से जुड़ी जानकारी आतंकवादियों से साझा की थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, जिन तीन जवानों से पूछताछ की जा रही है, वो सभी दक्षिण कश्मीर से हैं। आबिद वानी, तजामुल अहमद और आदिल वानी – ये उन तीन जवानों के नाम हैं। रक्षा प्रवक्ता कर्नल राजेश कालिया के अनुसार सेना उन परिस्थितियों की जाँच कर रही है, जिनके कारण औरंगज़ेब का अपहरण और फिर हत्या की गई।

बता दें कि राष्ट्रीय राइफ़ल्स के जवानों से पूछताछ संबंधी जानकारी तब उजागर हुई, जब बीते सोमवार (4 फ़रवरी 2019) को पुलवामा के जवान आबिद वानी (तीनों संदिग्ध जवानों में से एक) के भाई तौसीफ़ अहमद वानी को राष्ट्रीय राइफ़ल्स के द्वारा पूछताछ के लिए बुलाया गया।

औरंगज़ेब 4 जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के साथ थे लेकिन उन्हें 44 राष्ट्रीय राइफ़ल्स में तैनात किया गया था। वह सैन्य अधिकारी मेजर शुक्ला के निजी गार्ड थे, जिन्होंने आतंकवादी समीर टाइगर को मारा था। मेजर शुक्ला 30 अप्रैल, 2018 को पुलवामा ज़िले के द्रुबगम गाँव में समीर टाइगर से हुई मुठभेड़ में घायल हो गए थे।

मारे गए राइफ़लमैन औरंगज़ेब ने पिछले साल जून में अपने परिवार के साथ ईद मनाने की योजना बनाई थी। घर जाने के लिए वह बस पकड़ने को कार से पुलवामा बस स्टैंड की ओर जा रहे थे। तभी आतंकवादियों ने उनकी कार को कुछ किलोमीटर पहले ही रोक लिया और अपहरण कर उन्हें मार डाला। उनका शव पुलवामा ज़िले के कलामपोरा में अपहरण के स्थल से लगभग 10 किलोमीटर दूर बरामद किया गया था। पोस्टमॉर्टम से पता चला था कि उनकी गर्दन और सिर पर गोलियाँ दागी गईं थी।

औरंगज़ेब जिस कार से जा रहे थे, उसके ड्राइवर की पहचान एक स्थानीय सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के फार्मासिस्ट फ़ारूक अहमद अल्लई के रूप में हुई है। अल्लई के अनुसार, पुलवामा ज़िले के कलामपोरा इलाक़े में आतंकवादियों द्वारा उनकी कार रोक ली गई थी। अल्लाई ने बताया कि आतंकवादियों ने उन्हें भी पीटा था। बाद में अल्लई ने घटना की विस्तृत जानकारी पुलवामा के राजपोरा पुलिस स्टेशन में दी थी।