याद कीजिए सोशल मीडिया से पहले का वह दौर जब हम टीवी पर बोलने वालों, अखबारों में लिखने वालों और सिनेमा में दिखने वालों की शख़्सियत पर अतिशय मोहित रहते थे, उनके फैन होते थे, उनको खत लिखते थे, उनसे मिलना चाहते थे, उनके ऑटोग्राफ और फोटोग्राफ के लिए लालायित रहते थे।
वे जो कहते, करते और बोलते थे हम उसे सत्य का दस्तावेज मान कर सहेज के रख लेते थे। उस वक्त किसी में इतना दुस्साहस नहीं होता था कि इन हस्तियों के कंटेंट में लेफ्ट, राइट, कम्युनलिज्म, सेकुलरिज्म, नेशनलिज्म और एंटी-नेशनलिज्म खोजे और अगर कोई दुर्लभ ज्ञानी ऐसा करने में सक्षम होता भी तो उसे अपना पक्ष रखने के लिए कोई ठौर नहीं था। टीवी, अखबार, पत्रिकाएँ सभी सिंडिकेट के हाथ में थे।
नतीजतन दृश्य, श्रव्य और छपाई के माध्यम के चुने हुए लोग खबरों और जानकारी पर एक संगठित नियंत्रण करके रखते थे, जो वह परोसते थे उसे पहले नोटों में तौल लेते थे, और इसके एवज में जहाँ वह मोटा फायदा कमा रहे थे वहीं तमाम पुरस्कारों, पदवी, सम्मान और सुविधाओं को ताश की तरह फेंट कर आपस में बांट लेते थे।
लेकिन समय के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि वह बदलता है, और यह समय भी बदला, सोशल मीडिया आया। लोगों ने कौतूहल वश लिखना शुरू किया, मन में जो दबा था उसे धीरे-धीरे बाहर लाना शुरू किया और उन्हें हैरानी तब हुई जब पता चला कि उनकी तरह तो लाखों लोग सोचते हैं, उनकी तरह तो लाखों लोगों को शिकायतें और आक्रोश हैं, जिसे न आवाज़ मिल रही थी न जगह।
और यहीं से एक सिलसिला शुरू हुआ बेबाक बोलने, लिखने का। जहाँ कोई लिहाज नहीं, कोई सेंसरशिप नहीं, किसी भाषाई अशुद्धि का कोई मलाल नहीं। हालाँकि लिबर्टी का लोगों ने अतिक्रमण भी किया, वे अभद्र हुए, अमर्यादित भी। लेकिन वो तथाकथित लेखकों, संपादकों, बुद्धिजीवियों, विचारकों, चिंतकों और कलाकारों का हुक्का भरना बन्द कर चुके थे, लोगों ने ‘महानताओं’ की पालकी को कंधे से उठाकर चौराहे पर रख दिया था।
जिसका परिणाम हुआ कि अंग्रेज़ी पत्रकारिता के कुलदीपक राजदीप सरदेसाई अमरीका में जाकर पिट गए, अपनी हथेलियाँ रगड़ कर जीरो वॉट बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी पत्रकारिता के तमाम घाटों का पानी पीकर अब एक बिस्कुट मालिक के चैनल में क्रांति कर रहे हैं। रवीश कुमार का तो यह हाल है कि वे प्रनॉय रॉय के घर में तीसरी सबसे पुरानी चीज हो चुके हैं, लेकिन तब भी उनकी नौकरी छोड़ नहीं सकते क्योंकि उन्होंने इतना ‘यश’ कमाया है कि यहाँ से जाने के बाद उन्हें शायद ही कोई रोजगार दे।
और जिनका सितारा बीते पाँच बरस में 18वीं बार गर्दिश में गया है वह बरखा दत्त हैं। आज जो हुआ, उस जिक्र को क्या दोहराना, लेकिन उसके बाद जो हो रहा है वह बड़ा दिलचस्प है कि महीने भर पहले वे ट्विटर के CEO जैक डोरसी के साथ ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को पीटने’ का प्लाकार्ड लहरा रहीं थीं, उनके बगल में फोटो खिंचवाकर, ट्विटर यूजर्स को अपनी पहुँच का संदेश दे रही थीं, आज उन्हीं को अदालत में घसीटने की धमकी दे रही हैं, क्योंकि उनकी आज की ‘हरकत’ पर ट्विटर ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू नहीं किया, सपोर्ट बरखा हैश टैग ट्रेंड नहीं किया। उल्टा उन्हें हड़का दिया और बौखलाहट में वे अब ऑलमोस्ट ‘नग्न’ नृत्य करने पर उतारू हो गई हैं। यह ताकत है सोशल मीडिया की।
धनबाद स्थित आज़ाद नगर निवासी शाहनवाज़ ने पुलवामा आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का मज़ाक बनाया। उसकी इस हरकत के बाद धनबाद के भूली इलाक़े में जनाक्रोश भड़क उठा और लोगों ने थाना का घेराव किया।
स्थानीय विधायक राज सिन्हा
ताज़ा सूचना के अनुसार, पुलिस ने युवक शाहनवाज़ को मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया है। इस से पहले फेसबुक पर शाहनवाज की आपत्तिजनक टिप्पणी की जानकारी मिलते ही लोग बेकाबू हो गए। जनता द्वारा पुलिस थाने का घेराव करने के बाद अतिरिक्त अधिकारियों को पुलिस बल के साथ बुलाया गया लेकिन स्थिति क़ाबू में नहीं हुई।
लोकल समाचारपत्र में शाहनवाज़ की ख़बर
घटना की सूचना मिलते ही विधायक राज सिन्हा समर्थकों के साथ मौके पर पहुँचे। विधायक ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। लेकिन लोगों ने टायर जलाना शुरू कर दिया। पुलिस द्वारा कई बार चेतावनी देने के बावजूद भीड़ पर पुलिस को मजबूरन लाठियाँ भाँजनी पड़ी। विधायक ने भी पुलिस पर शाहनवाज़ को गिरफ़्तार करने का दबाव बनाया। चारो तरफ से दबाव बढ़ता देख पुलिस सक्रिय हुई और एक स्पेशल टीम को मुंबई भेज कर शाहनवाज को गिरफ़्तार किया। उस पर राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज कर लिया गया है।
स्थानीय निवासी रवि कुमार मंडल की फेसबुक पोस्ट
आजाद नगर के निवासियों ने भी शाहनवाज के परिवार को मोहल्ले से निकालने के लिए बैठक किया। शाहनवाज 9 भाई व 1 बहन है। शहर के बुद्धिजीवियों एवं बुज़ुर्गों ने कहा कि शाहनवाज़ के कारण पूरे देश में तनाव पैदा हो गया है व इलाके का नाम भी बदनाम हो रहा है। विधायक सिन्हा ने कहा कि शाहनवाज़ की हरक़त समाज तोड़ने वाली है। मुंबई के पवई थाना क्षेत्र से गिरफ़्तार शाहनवाज़ को धनबाद लाने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। उसे धनबाद लाकर मेडिकल जाँच कराने के बाद जेल भेज दिया जाएगा।
स्थानीय अख़बार की कतरन
तनाव को देखते हुए भूली व आज़ाद नगर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। आधा दर्ज़न से भी अधिक थानेदारों व 200 से भी अधिक की संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। हर आने-जाने वाले पर नज़र रखी जा रही है। पुलिस घर-घर जा कर लोगों को समझाने-बुझाने में भी लगी है। अभी यह मामला ठंडा भी नहीं हुआ है और एक अन्य युवक मज़हर हाश्मी ने भी कुछ ऐसी ही विवादित टिप्पणी की है, जिसको लेकर लोग गुस्से में हैं।
यद्यपि आपकी व्यस्तता में अतिक्रमण करते हुए लिख रहा हूँ, पर आशा करता हूँ कि आप इसे जरूरी महत्व अवश्य देंगे। हालाँकि चलन के अनुसार मुझे इस संबोधन को ‘ओपन लैटर’ बनाकर रवीश कुमार को लिखना चाहिए था, लेकिन विडम्बना यह है कि जो आदतन ओपन लैटर लिखते रहते हैं, वह औरों का ओपन लैटर पढ़ते नहीं हैं।
इसलिए मैं यह डायरेक्ट लैटर आपको लिख रहा हूँ, क्योंकि इस दौर में, आप उस मुकाम पर हैं, जहाँ से आप लोकतंत्र पर ‘एहसान’ बन चुके लोगों तक अपनी बात न केवल पहुँचा सकते हैं, बल्कि फेंक कर भी मार सकते हैं। और ऐसे ही एक एहसान इस कालखंड में रवीश कुमार हैं, जिनके लिए दुनिया न तो गोल है, और न ही सपाट, बल्कि NDTV में उनके 20 साल के कैरियर और उनके घर से NDTV स्टूडियो की 25 किलोमीटर की दूरी में सिमटी हुई है।
इसलिए उनको लगने लगा है कि प्रनॉय रॉय का स्टूडियो ही वह लैब है, जहाँ न केवल ‘ सत्य’ का निर्माण होता है, बल्कि निर्यात भी। और यही कारण है कि NDTV के ब्रह्मांड के बाहर जो भी कहा और लिखा जाता है, वह उनके अनुसार व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का लेक्चर होता है या फिर भाजपा के आईटी सेल की साजिश।
तो उनको आप मेरे हवाले से, यह कन्फर्म कर दीजियेगा कि बीजेपी में आईटी सेल जैसा कुछ नहीं होता है। अगर उनका सौतिया डाह कभी खत्म हो जाए तो एक बार जाकर बीजेपी दफ्तर में देख आएँ कि वहाँ आईटी सेल जैसी कोई गुमटी या खोखा नहीं है, जिन मानकों पर एक राष्ट्रीय पार्टी को फंक्शन करना चाहिए, उसी तर्ज पर प्रोफेशनल वे में पार्टी रन होती है।
जिस प्रकार किसी बिजनेसमैन, खासकर हवाला का कारोबार चलाने वाले, या बिस्कुट बेचने वाले के टीवी एडवेंचर में काम करने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता, वैसे ही ट्विटर और फेसबुक पर भाजपा का समर्थक होने से कोई आईटी सेल वाला या ट्रोल नहीं हो जाता है।
बात दरअसल यह है कि रविश कुमार जैसे लोग पत्रकारिता के उस युग से वास्ता रखते हैं, जब खबरें नहीं फतवे दिए जाते थे, यानि कह दिया सो कह दिया, न खाता न बही-जो छेनू ने कह दिया वही सही।
लेकिन अब गाँव-देहात, अमीर-गरीब सबके हाथ में हथेली भर की स्लेट है, जिसे वह अपने पैसे से खरीदता है, अपने पैसे से नेट पैक चलाता है, और अपनी मर्जी से लिखता है, बस ‘क़यामत’ यह आ गई है कि यह ऐरा-गैर प्लस नत्थू खैरा न केवल जवाब देना सीख गया है, बल्कि ‘खींच कर देना’ सीख गया है, जिसकी आवाज़ गूँजती है, और लुटियन दिल्ली के क्रांतिकारियों को चुभती है।
हाँ, एक जरूरी बात जो मुझे ‘व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी’ के विषय में कहना है, जिसका जिक्र गाहे-बगाहे रवीश कुमार करते हैं, कि इस यूनिवर्सिटी का उतना ही अस्तित्व है जितना इस दौर में ‘निष्पक्ष पत्रकारिता’ का है, जितना अघोषित आपातकाल का है, जितना बागों में बहार का है, जितना रवीश कुमार की एक्स कलीग बरखा को प्राप्त होने वाले ‘कंटेंट’ में ‘नेशनलिज्म’ का है।
इसलिए छेनू कुमार बेशक अपना एजेंडा जारी रखें, लेकिन ख़ुद में से जंजीर वाले अमिताभ बच्चन को माइनस कर लें, क्योंकि हकीकत में वे खबरों की दुनिया के राजू श्रीवास्तव बन चुके हैं लेकिन ‘फ्रसट्रेटेड’। उनकी पंचलाइन पर हो सकता है एनडीटीवी के रॉय दम्पत्ति को हँसी आती हो, या उनको ही हँसी आती है, इसीलिए वे इस ढहते हुए किले में टिके हैं, वरना सिर्फ पत्रकारिता के नाम पर कोई उनका मुरीद होगा, लगता नहीं है।
पुलवामा में हुए हमले की आग अभी देश के लोगों में जल ही रही थी कि कल सोमवार को (फरवरी 18, 2019) वही पिंगलिन इलाके में सेना और आतंकवादियों की मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में मेजर समेत 4 जवान देश के नाम बलिदान हो गए। इस मुठभेड़ में जान गवाने वालों में एक नाम अजय कुमार का भी है।
मेरठ के जानी ब्लॉक के बसा टीकरी गाँव के रहने वाले अजय की उम्र 27 साल थी। 7 अप्रैल 2011 में अजय सेना की 20 ग्रेनेडियर में भर्ती हुए। बाद में वह 55 राष्ट्रीय राइफल्स रैपिड फोर्स में तैनाती मिली। कुछ महीने पहले ही उन्हें जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया था।
चार साल पहले अजय ने डिंपल से शादी की थी। अजय अपने पीछे पत्नी के पास ढाई साल के बेटे (आरव) को छोड़ गए हैं। साथ ही उनकी पत्नी इस समय आठ महीने गर्भवती भी है।
पिछले महीने ही जनवरी में अजय एक महीने की छुट्टियाँ मनाकर ड्यूटी पर वापस लौटे थे। उनके बलिदान की ख़बर जब परिवार पर पहुँची तो एक तरफ परिवार में गम का माहौल पसरा तो दूसरी तरफ़ पूरे गाँव में शोक की लहर फैल गई।
अजय की माँ का कहना है कि आतंकी हमले के बाद से ही ड्यूटी पर तैनात बेटे की फिक्र उन्हें सताने लगी थी। उनकी माँ बताती हैं कि बेटे से बात होने के बाद उनके दिल को तसल्ली हो जाती थी लेकिन जब उनके बेटे ने यह बोला कि वह किसी स्पेशल ऑपरेशन पर जा रहा है तो उनकी फ़िक्र बढ़ गई। इसके बाद सीधे उन्हें रात में अपने बेटे के बलिदान की ख़बर मिली।
ऑपइंडिया ने सोमवार (18 फ़रवरी) को अपने फ़ैक्ट चेक में ‘वंदे भारत एक्सप्रेस से ख़दकुशी पर पाठकों को किया भ्रमित’ शीर्षक से ख़बर लिखी थी। इस ख़बर में ऑपइंडिया ने ‘नवभारत टाइम्स’ की उस एक ख़बर पर आपत्ति दर्ज की थी जिसमें दिल्ली और गाज़ियाबाद के एडिशन में आख़िरी पेज पर दी गई सूचना भ्रम पैदा करने जैसी थी।
पाठकों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ऑपइंडिया ने
अपने फ़ैक्ट चेक के माध्यम से यह कोशिश की थी कि नवभारत टाइम्स जैसे नामी अख़बार
अपने पाठकों को सही जानकारी से अवगत कराएँ।
हमें यह बताते हुए ख़ुशी है कि ऑपइंडिया की कोशिश रंग लाई और नवभारत टाइम्स ने आज (19 फरवरी 2019) अपने दिल्ली और गाज़ियाबाद के एडिशन में स्पष्टीकरण देते हुए पाठकों को सही जानकारी से अवगत कराया और अपनी ग़लती पर खेद प्रकट किया।
ख़बर का असर: नवभारत टाइम्स ने दिया स्पष्टीकरण
अपने स्पष्टीकरण के ज़रिए नवभारत टाइम्स ने अपनी ग़लती को स्वीकारते हुए लिखा कि वंदे भारत से जुड़ी ख़बर के साथ बॉक्स में जो ख़ुदकुशी की ख़बर प्रकाशित हुई थी जिसकी रिपोर्ट के मुताबिक यह हादसा पिछले महीने ट्रेन के ट्रायल के दौरान हुआ था। लेकिन, त्रुटिवश नवभारत टाइम्स के एनसीआर (गाज़ियाबाद) एडिशन में यह ख़बर इस तरह छपी कि जैसे यह घटना अभी की हो। इस ख़बर के खेद प्रकट करते हुए नवभारत टाइम्स ने लिखा कि यह ख़बर त्रुटिवश ग़लत छपी है, ‘वंदे भारत ट्रेन’ को लेकर किसी तरह की दुर्भावना से इसका कोई संबंध नहीं है।
आइये आपको बता दें कि नवभारत टाइम्स ने किस प्रकार की त्रुटी अपने दोनों एडिशन में की थी।
दरअसल, नवभारत टाइम्स अख़बार ने 18 फरवरी को अपने पाठकों के समक्ष दो अलग-अलग एडिशन में अलग-अलग ख़बर परोसी। नवभारत टाइम्स ने गाज़ियाबाद के एडिशन में पेज-16 यानी आख़िरी पन्ने पर ‘वंदे भारत को रास्ते भर लगे झटके’ हेडिंग के नीचे एक ख़बर लिखी – ‘ट्रेन से कटकर युवक ने दी जान।’ ख़बर के मुताबिक़ एक शख़्स ने तब ख़ुदकुशी कर ली जब ट्रेन वाराणसी से दिल्ली आ रही थी।
नवभारत टाइम्स का गाज़ियाबाद एडिशन
वहीं दूसरी तरफ नवभारत टाइम्स अपने दिल्ली एडिशन के उसी पेज-16 पर उसी हेडिंग के नीचे इसी ख़बर को लिखी – सही फ़ैक्ट के साथ। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि इस ख़बर में एक लाइन और दिखती है और वो ये कि ख़ुदकुशी का यह हादसा पिछले महीने ट्रायल के दौरान हुआ था।
नवभारत टाइम्स का दिल्ली एडिशन
ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि इन ख़बरों को पढ़ने वाला पाठक दोनों एडिशन को पढ़ें। क्योंकि दोनों क्षेत्र अलग-अलग हैं। दिल्ली वाले दिल्ली एडिशन पढ़ेंगे और गाज़ियाबाद वाले गाज़ियाबाद एडिशन। लेकिन इस ख़बर को पढ़ने वालों पर इसका असर अलग-अलग तरीके से होगा। गाज़ियाबाद वाले पाठक इस हादसे को बीते दिन (17 फरवरी) का समझेंगे, जो ग़लत संदेश के रूप में अपना प्रभाव छोड़ जाएगा।
सोशल मीडिया के ज़माने में मीडिया कुछ भी लिख दे और ग़लतफ़हमी पैदा कर दे यह अब संभव नहीं। कुछ ऐसे भी पाठक होते हैं जो ख़बरों को गंभीरता से पढ़ते हैं और उटपटांग लगने पर अपनी प्रतिक्रिया भी दर्ज करते हैं। ऐसे ही एक ट्विटर यूज़र अनुज गुप्ता की नज़र नवभारत टाइम्स की इन दोनों ख़बरों पर अटक गई और उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया ट्वीट के माध्यम से दर्ज कर दी।
Two editions of Navbharat times – One published a month old news as today’s news to show delay in Vande Bharat express. A new low in journalism. pic.twitter.com/taJzvbLPz1
इतने बड़े मीडिया हाउस ने अपने स्पष्टीकरण के साथ खेद व्यक्त किया अब यह उसके पाठकों के साथ कहीं न कहीं कुछ हद तक न्यायसंगत लगता है। लेकिन एक सवाल फिर भी घर करता दिखता कि क्या ये ज़रूरी है कि हर ख़बर पर लोग ख़ुद ग़ौर फ़रमाएँ और उसकी सही जानकारी के लिए भी ख़ुद ही कोशिश करें? ऐसे में यही कहना और लिखना निहायत ही ज़रूरी है कि किसी भी तरह की जानकारी देने वाले को हमेशा सजग और सतर्क रहना चाहिए जिससे वो समाज में रह रहे लोगों का सही दिशा में मार्गदर्शन कर सकें।
महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के गठबंधन के साथ ही मीडिया के एक गिरोह विशेष को मिर्ची लगी है। ख़ासकर उन लोगों को, जो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मोदी-विरोध का नया ‘पोस्टर बॉय’ मान बैठे थे। अतीत में शिवसेना की बात को गंभीरता से न लेने का दावा करने वाले कुछ तथाकथित पत्रकारों व विश्लेषकों ने सामना में छपने वाले लेखों का शब्दशः भावार्थ कर इसे भगवद् गीता की तरह बाँचना शुरू कर दिया था। ऐसे हथकंडा पसंद गिरोह को विशेषकर धक्का लगा है। यहाँ हम सबसे पहले बात इन्ही से शुरू करेंगे और अंत में सियासी समीकरणों की व्याख्या कर यह समझने की कोशिश करेंगे कि इस गठबंधन के पीछे किन कारकों ने अहम भूमिका निभाई।
जब शुरू हुआ उद्धव का महिमामंडन
उद्धव ठाकरे को कैसे लिबरल गैंग ने अपने ह्रदय में स्थापित कर के देवता की तरह पूजना शुरू कर दिया था, इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। बात फरवरी 2017 की है, महाराष्ट्र में नगरपालिका के चुनाव परिणाम आ रहे थे। भाजपा और शिवसेना- दोनों की ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बना यह चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण था। उस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था बृहन्मुम्बई नगरपालिका का चुनाव परिणाम। दोपहर तक शिवसेना आगे चल रही थी और लिबरल गैंग गदगद हुआ जा रहा था। आपको याद दिला दें कि उस चुनाव में शिवसेना और भाजपा ने अलग-अलग ताल ठोकी थी।
जब चुनाव परिणाम आए, तो भाजपा 2012 के मुक़ाबले भारी बढ़त में दिखी और शिवसेना का भी प्रदर्शन अच्छा रहा। चुनाव बाद दोनों दलों ने देश की सबसे अमीर नगरपालिका को चलाने के लिए गठबंधन किया और लिबरल गैंग को एक तगड़ा झटका दिया। हालाँकि, शिवसेना के ताज़ा सुर पर नाचने वाला यह गैंग फिर से शिवसेना को अपना फेवरिट मानने लगा जब पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ बाँसुरी बजानी शुरू की। उस धुन की हर एक ताल पर थिरकने वाले पत्रकारिता के समुदाय विशेष के पेंडुलम वाले व्यवहार का अध्ययन के लिए बरखा दत्त के एक ट्वीट को देखिए।
I used to call Udhav Thackeray ‘The Reluctant Fundamentalist’- soft spoken, photography lover; the #BMCPolls2017 herald his coming into own
पत्रकारों का समुदाय विशेष जिस शिवसेना, बालासाहब ठाकरे और सामना को गाली देते नहीं थकता था, उसकी कुलदेवी ने उद्धव की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिए। उन्हें एक झटके में उद्धव मृदुभाषी नज़र आने लगे। उन्हें उद्धव के कैमेरा प्रेम से प्रेम हो गया और उन्हें एक ‘अनिच्छुक रूढ़ीवादी’ बताया। इतना क्यूट विश्लेषण वो आतंकियों के लिए भी लाती रहीं हैं। कभी किसी आतंकी का मानवीय पक्ष उजागर किया जाता है, तो कभी उसके परिवार की कथित ग़रीबी का प्रचार किया जाता है।
सोमवार (फरवरी 18, 2019) को शिवसेना और भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनावों में क्रमशः 23 एवं 25 सीटों पर ताल ठोकने का निर्णय लिया है। यह गिरोह विशेष के लिए और ज्यादा दुःखदायी है क्योंकि भाजपा ही बड़े भाई की भूमिका में नज़र आ रही है। यही नहीं, शिवसेना और भाजपा ने आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए भी गठबंधन की घोषणा कर दी है जिसमे सीट शेयरिंग का फॉर्मूला 50-50 रखा गया है। इस तरह से शिवसेना-भाजपा का 30 साल पुराना गठबंधन अब पूरे ज़ोर-शोर से मराठा क्षेत्र में आधिपत्य के लिए चुनावी समर में साथ-साथ उतरेगा।
गडकरी-फडणवीस: महाराष्ट्र के नए महाजन-मुंडे?
वाजपेयी-अडवाणी के दौर में एक समय था जब गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन के नेतृत्व में भाजपा ने महाराष्ट्र में अपने पाँव जमाए थे। दोनों दिग्गज नेता असमय मृत्यु के शिकार हुए, जिसके बाद महराष्ट्र भाजपा में एक ऐसे शून्य का उद्भव हुआ, जिसे भर पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। नागपुर में संघ मुख्यालय होने के कारण महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में भाजपा का पराभव पार्टी के लिए किरकिरी की वजह बन सकता था। उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें (48) महाराष्ट्र में ही है। ऐसे में, ऐन वक्त पर मोदी लहर के साथ कदमताल करते हुए देवेंद्र फडणवीस व नितिन गडकरी ने राज्य में भाजपा की मजबूती पर आँच नहीं आने दिया।
पुराने दिन: वाजपेयी के साथ मुंडे और महाजन
मुंडे व महाजन की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनके संयोजन की क्षमता। दोनों जनाधार वाले नेता तो थे ही, लेकिन मुश्किल के पलों में गठबंधन दलों के साथ मोलभाव से लेकर संकटमोचक की भूमिका तक- इन्होने मुंबई से दिल्ली तक भाजपा को कई मुश्किल परिस्थितियों से उबारा। अब यही भूमिका नितिन गडकरी निभा रहे हैं। जहाँ फडणवीस ज़मीनी स्तर पर अपनी पकड़ के लिए जाने जाते हैं, वहीं गडकरी अपनी प्रशासनिक क्षमता व संयोजनात्मक योग्यता के लिए प्रसिद्ध हैं। भाजपा-शिवसेना गठबंधन में दोनों की भूमिका क़ाफी अहम रही है।
महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में जब भाजपा ने 10 में से 8 नगरपालिकाओं पर क़ब्ज़ा जमाया था, तब गडकरी ने नागपुर में फडणवीस के साथ बैठक कर गठबंधन की रूप-रेखा तय की थी। उन्होंने शिवसेना को चेतावनी देते हुए कहा था कि गठबंधन तभी संभव है जब सामना में पीएम मोदी की आए दिन होने वाली आलोचना बंद हो जाए। ये वाकया उन लोगों को भी जानना चाहिए जो अपने विश्लेषणों में गाहे-बगाहे गडकरी को मोदी के मुक़ाबले खड़ा करने की कोशिश करते रहते हैं।
माहाराष्ट्र भाजपा के नए संकटमोचक
गडकरी की एंट्री के बाद स्थिति सम्भली और शिवसेना-भाजपा बीएमसी चलाने के लिए साथ आने को तैयार हो गई। हाल के दिनों में जब शिवसेना ने फिर से भाजपा पर हमले शुरू कर पत्रकारों के गिरोह विशेष को आत्मसंतुष्टि देने का कार्य किया, तब फडणवीस ने इसका तोड़ निकाला। जनवरी 2019 में हुई एक कैबिनेट बैठक में शिवसेना के संस्थापक स्वर्गीय बाल ठाकरे की याद में एक मेमोरियल बनाने का निर्णय लिया गया। इतना ही नहीं, उसके लिए तुरंत ₹100 करोड़ का बजट भी ज़ारी कर दिया गया।
मुंबई के दादर स्थित शिवजी पार्क में जब मेमोरियल के लिए ‘गणेश पूजन’ और ‘भूमि पूजन’ हुआ, तब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री फडणवीस ने एक मंच से जनता का अभिवादन किया। फडणवीस के इस दाँव से चित शिवसेना के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा न बचा। फडणवीस का शिवसेना को लेकर सख्त रुख था, लेकिन अंततः दोनों दल आगामी चुनावों के लिए गठबंधन में क़ामयाब हुए।
हिन्दुत्ववादियों की भावना का ख़्याल रखा
भाजपा और शिवसेना- दोनों को जो विचारधारा जोड़ती है, उसका नाम है हिंदुत्व। शिवसेना की छवि हिंदुत्ववादी पार्टी की रही है और भाजपा की कोर नीति भी भी कमोबेश यही है। इसीलिए संघ से लेकर ग्राउंड ज़ीरो तक जितने भी संगठन या कार्यकर्ता हैं, उन सभी की इच्छा थी कि भाजपा और शिवसेना गठबंधन करे। हाल में में उद्धव ठाकरे ने अयोध्या का दौरा कर अपनी पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि को और मजबूती प्रदान किया। हालाँकि, यह दौरा भाजपा को यह बताने के लिए था कि शिवसेना राम मंदिर को लेकर उस से कहीं ज्यादा चिंतित है।
सोमवार को जब आगामी चुनावों के लिए भाजपा-शिवसेना गठबंधन का ऐलान हुआ, तब संघ व अन्य हिन्दू संगठनों से जुड़े सभी नेताओं ने इसका स्वागत किया। दोनों दलों के कई नेताओं के अंदर कहीं न कहीं यही समान भावना थी कि अगर हिंदुत्ववादी ताक़तें बँट जाएँ तो इसका फ़ायदा कॉन्ग्रेस या राकांपा को मिल सकता है।
Inspired by the vision of Atal Ji and Balasaheb Thackeray Ji, BJP-Shiv Sena alliance will continue working for the well-being of Maharashtra and ensuring the state once again elects representatives who are development oriented, non corrupt and proud of India’s cultural ethos.
मीडिया के गलियारों में यह भी चर्चा है कि सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी इस गठबंधन में अहम भूमिका निभाई है। उद्धव ठाकरे कभी मोहन भागवत को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित करने की माँग कर चुके हैं। शिवसेना भाजपा पर तो हमलावर रही है, लेकिन अयोध्या से लेकर अन्य हिंदुत्ववादी मुद्दों तक- दोनों के सुर लगभग सामान रहे हैं। हाल ही में जदयू के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी शिवसेना नेताओं से मिल कर उन परिस्थितियों से अवगत कराया था।
ज़मीनी सच्चाई को भाँप गई शिवसेना
अब चर्चा आँकड़ों की। अगर भाजपा और शिवसेना के हाल के चुनावी प्रदर्शनों की बात करें तो पता चलता है कि भाजपा के उद्भव से शिवसेना ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रही थी। पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद शिवसेना के तेवर और तल्ख़ हो गए और उसने नए सिरे से भाजपा पर हमले शुरू कर दिए। बिहार में गठबंधन को लेकर चल रहे मोलभाव ने भी शिवसेना को उत्साहित किया। पार्टी का यह मानना था कि वो कड़ा रुख रखने से महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका निभाने में सफल हो जाएगी।
पहले जहाँ शिवसेना राज्य स्तरीय चुनावों में बड़े भाई की भूमिका में रहती थी, वहीं भाजपा लोकसभा चुनावों में बड़े भाई की भूमिका निभाती थी। 2014 के बाद से इस समीकरण में बदलाव आया। उस साल हुए लोकसभा चुनाव में शिवसेना 20 सीटों पर लड़ी जबकि भाजपा 24 पर। उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा भारी फ़ायदे के साथ शिवसेना से लगभग दोगुनी सीटें जीतने में क़ामयाब रही। यहीं से शिवसेना अपने-आप को और ज्यादा असुरक्षित महसूस करने लगी। भाजपा की सीट संख्या 2009 में 46 से 2014 में सीधा 122 पर पहुँच गई। शिवसेना को 63 सीटें मिली जबकि पार्टी ने भाजपा से 22 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा था।
भाजपा-शिवसेना में आख़िरकार बन गई बात
अब हालिया गठबंधन से यह साफ़ है कि शिवसेना ने अंदर ही अंदर ख़ुद को जूनियर पार्टनर के रूप में स्वीकार कर लिया है। महाराष्ट्र में पहले से ही कमज़ोर नज़र आ रही कॉन्ग्रेस और राकांपा को अब इस गठबंधन का सामना करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। राफेल पर कभी नरेंद्र मोदी के पक्ष में बोलने वाले पवार के साथ न तो शिवसेना का गठबंधन मेल खाता, और न भाजपा का। भ्रष्टाचार पर पवार को घेरने वाली भाजपा ने उनके गढ़ बारामती का जिक्र कर माहौल को गरमा दिया है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व अमित शाह ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा बारामती से जीत दर्ज करेगी। उधर शरद पवार ने पार्टी को उठाने के लिए ख़ुद लोकसभा चुनाव लड़ने का इशारा किया है। शरद पवार के प्रभाव वाले पश्चिमी महाराष्ट्र में भाजपा की आक्रामक नीति से घबराए 78 वर्षीय पवार ने लोकसभा चुनाव में ताल ठोकने की बात कह पार्टी कैडर में जान फूँकने की कोशिश की है। जो भी हो, सेना-भाजपा गठबंधन के बाद महाराष्ट्र का रण अब देखने लायक होगा।
पुलवामा में सुरक्षा बलों पर हुए भयावह आतंकी हमले के बाद देश के हर नागरिक के भीतर एक बेचैनी है। हर कोई चाहता है कि जवानों के बलिदान का बदला पाकिस्तानी आतंकियों से जल्द से जल्द लिया जाए। देश का माहौल इस समय जितना संवेदनशील है उसमें लोगों की भावानाओं को आहत करने से ज्यादा खतरनाक कुछ भी नहीं है।
इस बात को अच्छे से जानने के बाद भी पुलवामा हमले से जुड़ी कुछ ऐसी घटनाएँ हमारे सामने आई, जिसमें केवल भारत को चोट पहुँचाने की मंशा निहित दिखी। सोशल मीडिया के ज़रिए ऐसे लोगों का खुलासा हुआ, जो पाकिस्तान और आतंकियों के समर्थन में खड़े दिखाई दिए। कहीं पर How’s the jaish जैसी पोस्ट देखने को मिली, तो कहीं इस हमले को वैलेंटाइन डे का तोहफा बताया गया। जवानों को श्रद्धांजलि दी जाने वाली पोस्ट पर घर के दीमकों ने ‘हाहा’ वाले रिएक्शन तक दे दिए। यह टुच्ची घटनाएँ सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रही बल्कि भारत में रहकर कई जगह पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगाए गए और विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कश्मीरी छात्राओं द्वारा पत्थरबाजी भी की गई।
ज़ाहिर है राष्ट्रवाद की भावनाओं को इस कदर आहत करने वाले यह सब कार्य प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तानियों का या फिर आतंकियों के नहीं हैं। यह हमारे ही लोग है जिनकी सुरक्षा के लिए तैनात जवानों ने अपनी जीवन बलिदान कर दिया। यह कश्मीर के कुछ स्थानीय लोग हैं जिनके द्वारा ऐसी ओछी हरकतें की जा रही है। ये वही लोग हैं जो अपनी शिक्षा और रोज़गार के लिए कश्मीर के बाहर शेष भारत आश्रित हैं लेकिन नारों में पाकिस्तान जिंदाबाद बोलते हैं।
देश के ख़िलाफ़ हो रही ऐसी घटनाओं पर जब लोगों ने कानूनी रूप से कड़े कदम उठाने शुरू किए। तो, कश्मीर से शांति दूतों (महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला) द्वारा शांति संदेश भेजा गया कि पुलवामा में जो हुआ वो कश्मीर के मुस्लिमों द्वारा नहीं किया गया है बल्कि पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा किया गया है। इसलिए कश्मीर के लोगों के साथ भारत के राज्यों में बदसलूकी न की जाए। महबूबा का कहना है कि इससे घाटी के लोगों में गलत संदेश जा रहा है और अपनों के साथ होते ऐसे रवैये को देखकर कश्मीर के युवक अपने भविष्य को कभी भी घाटी के बाहर नही देख पाएँगे।
कश्मीर के अलगाववादी मानसिकता वाले नेताओं ने अपनी अपील में सौहार्द की अपेक्षा सिर्फ़ उन लोगों से की है जो कुछ कश्मीरियों की ऐसी हरकतों पर एक्शन ले रहे हैं। इनकी अपील उनसे बिलकुल नहीं है जो सोशल मीडिया पर आतंकी हमले को भारत के ऊपर जैश की सर्जिकल स्ट्राइक बताकर जवानों के बलिदान पर हँस रहे हैं और जश्न मना रहे हैं।
केंद्र सरकार को सलाह देने वाले ये वही अलगाववादी नेता हैं जो मुस्लिमों का विक्टिम कार्ड खेलकर अपनी राजनीति की ज़मीन तैयार करते हैं लेकिन सुरक्षाबलों पर होने वाली पत्थरबाजी और अराजक तत्वों पर अपनी चुप्पी साध लेते हैं। देश में सुरक्षा के लिहाज़ से उठाए कदमों पर आहत हुए यह वही लोग हैं जिनके पिता (फारूख अब्दुल्ला) के घर में एक अंजान आदमी के घुस आने से इन्हें इतना खतरा महसूस हुआ कि मौक़े पर ही उसे गोलियों से भून दिया गया था। और उस पर ट्वीट कर बाकायदा उमर अब्दुल्ला ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी।
I am aware of the incident that took place at the residence my father & I share in Bhatindi, Jammu. Details are sketchy at the moment. Initial reports suggest an intruder was able to gain entry through the front door & in to the upper lobby of the house.
उमर अब्दुल्ला की शांति वाली धरातल पर बात किया जाए तो हो सकता था कि वो शख्स जो उमर के पिता के घर में घुसा, कोई भटका हुआ नौजवान हो, जो न जाने उनके घर में किन वजहों से घुसा हो। तथाकथित शांति चाहने वाले कश्मीर के नेता चाहते तो उसके लिए कुछ न कुछ करते या उसे समझाते ताकि अन्य भटके नौजवानों पर भी सौहार्द का संदेश जाए लेकिन उसे गोली मारना ही क्यों बेहतर समझा गया ? शायद इसलिए क्योंकि फारूक को उस अंजान व्यक्ति से खतरा हो सकता था।
सोचने वाली बात है कि केवल एक अंजान व्यक्ति के फारूक अब्दुल्ला के घर में घुसने के कारण उन्हीं नेताओं ने हिंसा को सर्वोपरि समझा। लेकिन देश की बात आते ही सौहार्द की माँग जग गई। आज देश में उन लोगों के लिए सख्ती न करने की बात की जा रही है जो देश की भावनाओं को न केवल आहत कर रहे हैं बल्कि देश के ख़िलाफ़ खड़े होकर देशद्रोही होने का सबूत भी दे रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी होने का आशय यह तो बिलकुल नहीं है कि आप उसी देश की भावनाओं के खिलाफ़ इसका इस्तेमाल करें जहाँ पर आपको इसको प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है।
इसके अलावा रही बात कश्मीरियों की सुरक्षा की तो केंद्र सरकार वहाँ पर बैठे तथाकथित नेताओं से ज्यादा ध्यान कश्मीर के लोगों का रख रही है। वो सुरक्षा का ही ख्याल रखा जा रहा था जो CRPF ने अपने 44 जवानों को खो दिया। सुरक्षा के लिहाज से ही वहाँ पर भटके नौजवानों को सही रास्ते पर लाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। यह सुरक्षा की ही वजह है कि आतंकी हमले का शिकार होने के बावजूद भी कश्मीरियों के लिए सेना ने हेल्पलाइन नंबर जारी किया है कि वो किसी भी संकट में फँसे कश्मीरियों की मदद के लिए तत्पर हैं।
पुलवामा से इतर फिलहाल कुछ नामचीन पत्रकारों के बीच स्क्रीनशॉट शेयर करने की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई है। बाहर से ही सही किन्तु कुछ छुटभैये पत्रकार भी इस प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हुए झूठी खबरें फैला कर खुद को नामचीन बनाने की कोशिश में लग गए हैं।
सर्वविदित है कि सोशल मीडिया पर हैं तो आप भले नामचीन न हों, आपको आलोचना और अपशब्द सहने पड़ते ही हैं। इतिहास और वर्तमान गवाह है कि यदि मेरे-आपके जैसा कोई अदना आदमी दिलीप मंडल या रविश कुमार सरीखे किसी नामचीन के पोस्ट पर सवाल करता है तो भी गालियाँ मिलती हैं। सुअर, कुत्ता आदि भी कहा जाता है और देख लेने की धमकी भी दी जाती है। चूँकि हम अदने से आदमी हैं सो न तो हम इसका स्क्रीनशॉट लगाते हैं और न ही रोना रोते हैं। सच मगर यह है कि रक्त का दबाव हमारा भी बढ़ता है, दुःख हमें भी होता है। लेकिन हमारे स्क्रीनशॉट को न तो कोई तवज्जो मिलती है और न ही हमारे अपमान से मानवता शर्मसार होती है।
निजी अनुभव है कि एक नेताजी से सवाल करने पर मुझे पब्लिकली, इनबॉक्स में और फोन पर खूब गालियाँ दी गईं। दुःखी होकर मैंने आप जैसे कई नामचीनों के सामने गुहार लगाई। नतीजा सिफ़र रहा। माना कि आपकी तरह हमारे जानने वाले न तो कोई पुलिस ऑफिसर थे और न ही आका मगर साहब क्या हमारा खून, खून नहीं…?
इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस तरह से आप इस सबके पीछे सीधे-सीधे मोदी का हाथ घोषित कर देते हैं, वैसे ही आपके पोस्ट पर गाली खाने पर भी लोग आपको ही दोषी क्यों न मानें? यदि आपको यह लगता है कि आपको दी जाने वाली गाली खुद मोदी लिखवाते हैं तो फिर यह कहाँ से साबित होता है कि आप खुद नहीं लिखवाते ये गालियाँ जो आपके भक्त दूसरों को देते हैं?
देखिए, हम में से कोई भी भगवान नहीं है। कोई आदमी न तो पूर्ण है और न ही शत-प्रतिशत सही। ऐसे कई मौकों पर हम गलत भी होते हैं। ऐसे में हमें या तो गाली स्वीकार लेनी चाहिए या फिर अपनी गलती। हम अदना लोग तो ऐसा करते भी हैं मगर ये नामचीन लोग? कोई इनसे पूछ दे कि भई आप अफजल और कन्हैया पर तो टीवी स्क्रीन काला कर देते हैं मगर पुलवामा के दर्द पर आपको तकलीफ क्यों नहीं होता भला, तो क्या गलत है भाई? क्या पूछने का अधिकार सिर्फ आपको है? जनाब! आपको कोई आतंकी बनता इसलिए दिख जाता है क्योंकि उसको सेना ने पत्थर मारते पकड़ लिया और मारा भी था। लेकिन आए दिन जान बचाने वाली सेना के ही ख़िलाफ़ आतंकियों को प्रश्रय देने वाले पत्थरबाज गलत नहीं दिखते। आतंकियों को प्रोटेक्शन देते और सेना पर पत्थर से वार करते लोग आपको शान्ति-दूत दिखते हैं! आप ऐसा कौन सा चश्मा लगाते हैं कि आपको सेना अत्याचारी और पत्थरबाज भोले-भाले दिखते हैं? कभी सोचा है कि जैसे आपको सेना या पुलिस के टॉर्चर से कुछ लोग आतंकी बनते दिखते हैं, वैसे ही ट्विटर या फेसबुक पर आपके व आपके समर्थकों द्वारा टॉर्चर किए जाने पर भी लोगों ने हथियार उठा लिए तो क्या होगा?
बात मात्र इतनी सी है महोदय कि न तो इस तरह की वीभत्स आलोचना हरदम सही है और न ही आपके विचार। मगर आपको तो टीआरपी के लिए ऐसे ही मौकों की तलाश होती है… आपको बस ये कहने का बहाना मात्र चाहिए होता है कि देखो मोदी ने कितना इनटॉलेरेंस बढ़ा दिया।
वक़्त की मांग है। आप ध्यान से सोच लें। पब्लिक को जब आप देशद्रोही लगेंगे तो वो आपकी नामचीनता या मेरे अदनेपन को भूलकर सबको खदेड़ेगी ही… आप भले ही इस भीड़ को मोदी गैंग और फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी कहें, सच ये है कि फिलहाल इस भीड़ में कोई भाजपाई, कॉन्ग्रेसी या फिर ब्राह्मण-दलित नहीं है। यदि आपको यह समझ नहीं आ रहा तो इंशा अल्लाह आपको प्रत्यक्ष रूप से कश्मीर में आजादी का नारा बुलंद करना चाहिए।
नोट : मैं अभद्र, अश्लील जबावों का स्क्रीनशॉट नहीं लगाता, आपको देखना हो तो रविश कुमार जी के किसी भी पोस्ट पर उनके भक्तों की पुष्प वर्षा देख सकते हैं।
पुलवामा आतंकी हमले और जैश कमांडर गाजी के ख़ात्मे के बाद मंगलवार (फरवरी 19, 2019) को सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद हुए मुठभेड़ की विस्तृत जानकारी दी गई। इसके अलावा प्रेस कॉन्फ्रेंस में कश्मीर के ‘भटके’ नौजवानों (पत्थरबाज या आतंकी बन गए युवाओं) के लिए भी सख़्त शब्दों के साथ चेतावनी दी गई।
KJS Dhillon, Corps Commander of Chinar Corps, Indian Army: Our focus is clear on counter-terrorism operations. We are very clear that anyone who enters Kashmir Valley will not go back alive. pic.twitter.com/hSXmPoPmwb
भारतीय सेना के चिनार कॉर्प्स के लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिलन्न ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद के सफाये को लेकर हम कृत-संकल्प हैं। इसके लिए बाहर से जो भी कश्मीर में आतंक मचाने आएगा, वो वापस ज़िन्दा नहीं जाएगा, इसकी गारंटी है।
लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिलन्न ने कश्मीर की माताओं से अपील करते हुए कहा कि वे अपने बच्चों को समझाएँ और गलत रास्ते पर चले गए लड़कों को सरेंडर करने का आग्रह करें। लेकिन अगले ही वाक्य में उनका यह आग्रह स्पष्ट संकेत में बदल गया जब उन्होंने कहा, “सरेंडर करने वालों के लिए सेना कई तरह के अच्छे कार्यक्रम चला रही है। लेकिन आतंकवाद में शामिल होने वालों पर कोई रहमदिली नहीं दिखाई जाएगी।”
Army: In a Kashmiri society,mother has great role to play. Through you, I would request the mothers of Kashmir to please request their sons who've joined terrorism to surrender&get back to mainstream. Anyone who has picked up gun will be killed and eliminated,unless he surrenders https://t.co/bUatb4VOWK
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद कश्मीर पुलिस के आईजी एसपी पाणि ने बताया कि कश्मीरी युवाओं के आतंकी बनने की घटना पिछले कुछ महीनों में कम हुई है। हालाँकि उन्होंने भी सेना की तरह ही स्पष्ट संदेश दिया कि घाटी में जो भी घुसपैठ करेगा वह जिन्दा नहीं बचेगा।
सीआरपीएफ के आईजी जुल्फिकार हसन भी इस प्रेस कॉन्फ्रेस में मौजूद थे। वीरगति को प्राप्त हुए जवानों पर उन्होंने कहा, “जिन परिवार के बेटों ने बलिदान दिया है, वे खुद को अकेले न समझें। आपके लिए हर वक्त हम खड़े हैं।” जुल्फिकार हसन ने देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ने वाले कश्मीरी बच्चों और उनके परिवारों पर भी अपनी बात रखी और CRPF के द्वारा चलाए जा रहे हेल्पलाइन नंबर का भी जिक्र किया।
Zulfiquar Hasan, CRPF: Our helpline-14411 has been helping Kashmiris across the country in wake of this attack.Lot of Kashmiri students have approached this helpline for help all over the country. All Kashmiri children studying outside have been taken care of by security forces. pic.twitter.com/YVfeziJiG9
साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलवामा अटैक और उसके बाद हुए मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए सभी जवानों को नमन किया गया। इसमें जानकारी दी गई कि मुठभेड़ में 2 नहीं बल्कि 3 आतंकियों को मार गिराया गया था। 3 में 2 पाकिस्तान के थे जबकि एक स्थानीय आतंकी था।
पुलवामा हमले के बाद भारत में जगह-जगह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। इसी दिशा में बीकानेर के डीएम ने पाकिस्तानियों के लिए एक आदेश जारी किया है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान नागरिकों को 48 घंटे के भीतर जिला छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है।
सोमवार (फरवरी 18, 2019) को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के पिंगलिना क्षेत्र में सुरक्षाबलों और आतंकियों के साथ मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में मेजर समेत देश के 4 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। एक नागरिक की भी मौत इस मुठभेड़ में हुई है। वीरगति को प्राप्त हुए जवानों में एक एस राम भी थे। वे राजस्थान से थे।
Rajasthan: Bikaner DM issues a list of orders, effective immediately, u/s 144 CrPc in light of #PulwamaTerrorAttack. He order Pakistani citizens to leave the dist within 48 hrs, also prohibits hotels in Bikaner border area from allowing Pak citizens. Order applicable for 2 months pic.twitter.com/YsEnrv2X7a
एक तरफ जहाँ सोमवार को एस राम का पार्थिव शरीर देर रात राजस्थान पहुँचा, वहीं बीकानेर के डीएम (जिलाधिकारी) कुमार पाल गौतम ने सीआरपीसी धारा 144 के तहत आदेशों की एक लिस्ट जारी की। इस लिस्ट में पाकिस्तानी नागरिकों को आदेश दिया गया कि वह 48 घंटे के भीतर जिला छोड़ दें।
इतना ही नहीं डीएम ने बीकानेर की सीमाक्षेत्र में बने सभी होटलों में पाकिस्तानी नागरिकों को जगह देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। इस आदेश को पूरे जिले में 2 महीने के लिए लागू किया गया है।
बता दें कि पुलवामा अटैक के बाद जिले के पिंगलिना क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में सेना, राष्ट्रीय राइफल्स और पैरा फोर्सेज की टीम ने 3 आतंकियों को मार गिराया। इन आतंकियों में जैश-ए-मोहम्मद के दो टॉप कमांडर और पुलवामा का मास्टरमाइंड कामरान गाजी भी शामिल था।