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भाजपा-सेना गठबंधन: उद्धव को नया ‘पोस्टर बॉय’ बनाने वालों ‘तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ’

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के गठबंधन के साथ ही मीडिया के एक गिरोह विशेष को मिर्ची लगी है। ख़ासकर उन लोगों को, जो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मोदी-विरोध का नया ‘पोस्टर बॉय’ मान बैठे थे। अतीत में शिवसेना की बात को गंभीरता से न लेने का दावा करने वाले कुछ तथाकथित पत्रकारों व विश्लेषकों ने सामना में छपने वाले लेखों का शब्दशः भावार्थ कर इसे भगवद् गीता की तरह बाँचना शुरू कर दिया था। ऐसे हथकंडा पसंद गिरोह को विशेषकर धक्का लगा है। यहाँ हम सबसे पहले बात इन्ही से शुरू करेंगे और अंत में सियासी समीकरणों की व्याख्या कर यह समझने की कोशिश करेंगे कि इस गठबंधन के पीछे किन कारकों ने अहम भूमिका निभाई।

जब शुरू हुआ उद्धव का महिमामंडन

उद्धव ठाकरे को कैसे लिबरल गैंग ने अपने ह्रदय में स्थापित कर के देवता की तरह पूजना शुरू कर दिया था, इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। बात फरवरी 2017 की है, महाराष्ट्र में नगरपालिका के चुनाव परिणाम आ रहे थे। भाजपा और शिवसेना- दोनों की ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बना यह चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण था। उस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था बृहन्मुम्बई नगरपालिका का चुनाव परिणाम। दोपहर तक शिवसेना आगे चल रही थी और लिबरल गैंग गदगद हुआ जा रहा था। आपको याद दिला दें कि उस चुनाव में शिवसेना और भाजपा ने अलग-अलग ताल ठोकी थी।

जब चुनाव परिणाम आए, तो भाजपा 2012 के मुक़ाबले भारी बढ़त में दिखी और शिवसेना का भी प्रदर्शन अच्छा रहा। चुनाव बाद दोनों दलों ने देश की सबसे अमीर नगरपालिका को चलाने के लिए गठबंधन किया और लिबरल गैंग को एक तगड़ा झटका दिया। हालाँकि, शिवसेना के ताज़ा सुर पर नाचने वाला यह गैंग फिर से शिवसेना को अपना फेवरिट मानने लगा जब पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ बाँसुरी बजानी शुरू की। उस धुन की हर एक ताल पर थिरकने वाले पत्रकारिता के समुदाय विशेष के पेंडुलम वाले व्यवहार का अध्ययन के लिए बरखा दत्त के एक ट्वीट को देखिए।

पत्रकारों का समुदाय विशेष जिस शिवसेना, बालासाहब ठाकरे और सामना को गाली देते नहीं थकता था, उसकी कुलदेवी ने उद्धव की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिए। उन्हें एक झटके में उद्धव मृदुभाषी नज़र आने लगे। उन्हें उद्धव के कैमेरा प्रेम से प्रेम हो गया और उन्हें एक ‘अनिच्छुक रूढ़ीवादी’ बताया। इतना क्यूट विश्लेषण वो आतंकियों के लिए भी लाती रहीं हैं। कभी किसी आतंकी का मानवीय पक्ष उजागर किया जाता है, तो कभी उसके परिवार की कथित ग़रीबी का प्रचार किया जाता है।

सोमवार (फरवरी 18, 2019) को शिवसेना और भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनावों में क्रमशः 23 एवं 25 सीटों पर ताल ठोकने का निर्णय लिया है। यह गिरोह विशेष के लिए और ज्यादा दुःखदायी है क्योंकि भाजपा ही बड़े भाई की भूमिका में नज़र आ रही है। यही नहीं, शिवसेना और भाजपा ने आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए भी गठबंधन की घोषणा कर दी है जिसमे सीट शेयरिंग का फॉर्मूला 50-50 रखा गया है। इस तरह से शिवसेना-भाजपा का 30 साल पुराना गठबंधन अब पूरे ज़ोर-शोर से मराठा क्षेत्र में आधिपत्य के लिए चुनावी समर में साथ-साथ उतरेगा।

गडकरी-फडणवीस: महाराष्ट्र के नए महाजन-मुंडे?

वाजपेयी-अडवाणी के दौर में एक समय था जब गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन के नेतृत्व में भाजपा ने महाराष्ट्र में अपने पाँव जमाए थे। दोनों दिग्गज नेता असमय मृत्यु के शिकार हुए, जिसके बाद महराष्ट्र भाजपा में एक ऐसे शून्य का उद्भव हुआ, जिसे भर पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। नागपुर में संघ मुख्यालय होने के कारण महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में भाजपा का पराभव पार्टी के लिए किरकिरी की वजह बन सकता था। उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें (48) महाराष्ट्र में ही है। ऐसे में, ऐन वक्त पर मोदी लहर के साथ कदमताल करते हुए देवेंद्र फडणवीस व नितिन गडकरी ने राज्य में भाजपा की मजबूती पर आँच नहीं आने दिया।

पुराने दिन: वाजपेयी के साथ मुंडे और महाजन

मुंडे व महाजन की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनके संयोजन की क्षमता। दोनों जनाधार वाले नेता तो थे ही, लेकिन मुश्किल के पलों में गठबंधन दलों के साथ मोलभाव से लेकर संकटमोचक की भूमिका तक- इन्होने मुंबई से दिल्ली तक भाजपा को कई मुश्किल परिस्थितियों से उबारा। अब यही भूमिका नितिन गडकरी निभा रहे हैं। जहाँ फडणवीस ज़मीनी स्तर पर अपनी पकड़ के लिए जाने जाते हैं, वहीं गडकरी अपनी प्रशासनिक क्षमता व संयोजनात्मक योग्यता के लिए प्रसिद्ध हैं। भाजपा-शिवसेना गठबंधन में दोनों की भूमिका क़ाफी अहम रही है।

महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में जब भाजपा ने 10 में से 8 नगरपालिकाओं पर क़ब्ज़ा जमाया था, तब गडकरी ने नागपुर में फडणवीस के साथ बैठक कर गठबंधन की रूप-रेखा तय की थी। उन्होंने शिवसेना को चेतावनी देते हुए कहा था कि गठबंधन तभी संभव है जब सामना में पीएम मोदी की आए दिन होने वाली आलोचना बंद हो जाए। ये वाकया उन लोगों को भी जानना चाहिए जो अपने विश्लेषणों में गाहे-बगाहे गडकरी को मोदी के मुक़ाबले खड़ा करने की कोशिश करते रहते हैं।

माहाराष्ट्र भाजपा के नए संकटमोचक

गडकरी की एंट्री के बाद स्थिति सम्भली और शिवसेना-भाजपा बीएमसी चलाने के लिए साथ आने को तैयार हो गई। हाल के दिनों में जब शिवसेना ने फिर से भाजपा पर हमले शुरू कर पत्रकारों के गिरोह विशेष को आत्मसंतुष्टि देने का कार्य किया, तब फडणवीस ने इसका तोड़ निकाला। जनवरी 2019 में हुई एक कैबिनेट बैठक में शिवसेना के संस्थापक स्वर्गीय बाल ठाकरे की याद में एक मेमोरियल बनाने का निर्णय लिया गया। इतना ही नहीं, उसके लिए तुरंत ₹100 करोड़ का बजट भी ज़ारी कर दिया गया।

मुंबई के दादर स्थित शिवजी पार्क में जब मेमोरियल के लिए ‘गणेश पूजन’ और ‘भूमि पूजन’ हुआ, तब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री फडणवीस ने एक मंच से जनता का अभिवादन किया। फडणवीस के इस दाँव से चित शिवसेना के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा न बचा। फडणवीस का शिवसेना को लेकर सख्त रुख था, लेकिन अंततः दोनों दल आगामी चुनावों के लिए गठबंधन में क़ामयाब हुए।

हिन्दुत्ववादियों की भावना का ख़्याल रखा

भाजपा और शिवसेना- दोनों को जो विचारधारा जोड़ती है, उसका नाम है हिंदुत्व। शिवसेना की छवि हिंदुत्ववादी पार्टी की रही है और भाजपा की कोर नीति भी भी कमोबेश यही है। इसीलिए संघ से लेकर ग्राउंड ज़ीरो तक जितने भी संगठन या कार्यकर्ता हैं, उन सभी की इच्छा थी कि भाजपा और शिवसेना गठबंधन करे। हाल में में उद्धव ठाकरे ने अयोध्या का दौरा कर अपनी पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि को और मजबूती प्रदान किया। हालाँकि, यह दौरा भाजपा को यह बताने के लिए था कि शिवसेना राम मंदिर को लेकर उस से कहीं ज्यादा चिंतित है।

सोमवार को जब आगामी चुनावों के लिए भाजपा-शिवसेना गठबंधन का ऐलान हुआ, तब संघ व अन्य हिन्दू संगठनों से जुड़े सभी नेताओं ने इसका स्वागत किया। दोनों दलों के कई नेताओं के अंदर कहीं न कहीं यही समान भावना थी कि अगर हिंदुत्ववादी ताक़तें बँट जाएँ तो इसका फ़ायदा कॉन्ग्रेस या राकांपा को मिल सकता है।

मीडिया के गलियारों में यह भी चर्चा है कि सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी इस गठबंधन में अहम भूमिका निभाई है। उद्धव ठाकरे कभी मोहन भागवत को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित करने की माँग कर चुके हैं। शिवसेना भाजपा पर तो हमलावर रही है, लेकिन अयोध्या से लेकर अन्य हिंदुत्ववादी मुद्दों तक- दोनों के सुर लगभग सामान रहे हैं। हाल ही में जदयू के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी शिवसेना नेताओं से मिल कर उन परिस्थितियों से अवगत कराया था।

ज़मीनी सच्चाई को भाँप गई शिवसेना

अब चर्चा आँकड़ों की। अगर भाजपा और शिवसेना के हाल के चुनावी प्रदर्शनों की बात करें तो पता चलता है कि भाजपा के उद्भव से शिवसेना ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रही थी। पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद शिवसेना के तेवर और तल्ख़ हो गए और उसने नए सिरे से भाजपा पर हमले शुरू कर दिए। बिहार में गठबंधन को लेकर चल रहे मोलभाव ने भी शिवसेना को उत्साहित किया। पार्टी का यह मानना था कि वो कड़ा रुख रखने से महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका निभाने में सफल हो जाएगी।

पहले जहाँ शिवसेना राज्य स्तरीय चुनावों में बड़े भाई की भूमिका में रहती थी, वहीं भाजपा लोकसभा चुनावों में बड़े भाई की भूमिका निभाती थी। 2014 के बाद से इस समीकरण में बदलाव आया। उस साल हुए लोकसभा चुनाव में शिवसेना 20 सीटों पर लड़ी जबकि भाजपा 24 पर। उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा भारी फ़ायदे के साथ शिवसेना से लगभग दोगुनी सीटें जीतने में क़ामयाब रही। यहीं से शिवसेना अपने-आप को और ज्यादा असुरक्षित महसूस करने लगी। भाजपा की सीट संख्या 2009 में 46 से 2014 में सीधा 122 पर पहुँच गई। शिवसेना को 63 सीटें मिली जबकि पार्टी ने भाजपा से 22 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा था।

भाजपा-शिवसेना में आख़िरकार बन गई बात

अब हालिया गठबंधन से यह साफ़ है कि शिवसेना ने अंदर ही अंदर ख़ुद को जूनियर पार्टनर के रूप में स्वीकार कर लिया है। महाराष्ट्र में पहले से ही कमज़ोर नज़र आ रही कॉन्ग्रेस और राकांपा को अब इस गठबंधन का सामना करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। राफेल पर कभी नरेंद्र मोदी के पक्ष में बोलने वाले पवार के साथ न तो शिवसेना का गठबंधन मेल खाता, और न भाजपा का। भ्रष्टाचार पर पवार को घेरने वाली भाजपा ने उनके गढ़ बारामती का जिक्र कर माहौल को गरमा दिया है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व अमित शाह ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा बारामती से जीत दर्ज करेगी। उधर शरद पवार ने पार्टी को उठाने के लिए ख़ुद लोकसभा चुनाव लड़ने का इशारा किया है। शरद पवार के प्रभाव वाले पश्चिमी महाराष्ट्र में भाजपा की आक्रामक नीति से घबराए 78 वर्षीय पवार ने लोकसभा चुनाव में ताल ठोकने की बात कह पार्टी कैडर में जान फूँकने की कोशिश की है। जो भी हो, सेना-भाजपा गठबंधन के बाद महाराष्ट्र का रण अब देखने लायक होगा।


वाह उमर अब्दुल्ला! जब पिता को ख़तरा था तो गोलियाँ चलवा दीं, आज देश को खतरा है तो ‘सौहार्द’ याद आ गया

पुलवामा में सुरक्षा बलों पर हुए भयावह आतंकी हमले के बाद देश के हर नागरिक के भीतर एक बेचैनी है। हर कोई चाहता है कि जवानों के बलिदान का बदला पाकिस्तानी आतंकियों से जल्द से जल्द लिया जाए। देश का माहौल इस समय जितना संवेदनशील है उसमें लोगों की भावानाओं को आहत करने से ज्यादा खतरनाक कुछ भी नहीं है।

इस बात को अच्छे से जानने के बाद भी पुलवामा हमले से जुड़ी कुछ ऐसी घटनाएँ हमारे सामने आई, जिसमें केवल भारत को चोट पहुँचाने की मंशा निहित दिखी। सोशल मीडिया के ज़रिए ऐसे लोगों का खुलासा हुआ, जो पाकिस्तान और आतंकियों के समर्थन में खड़े दिखाई दिए। कहीं पर How’s the jaish जैसी पोस्ट देखने को मिली, तो कहीं इस हमले को वैलेंटाइन डे का तोहफा बताया गया। जवानों को श्रद्धांजलि दी जाने वाली पोस्ट पर घर के दीमकों ने ‘हाहा’ वाले रिएक्शन तक दे दिए। यह टुच्ची घटनाएँ सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रही बल्कि भारत में रहकर कई जगह पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगाए गए और विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कश्मीरी छात्राओं द्वारा पत्थरबाजी भी की गई।

ज़ाहिर है राष्ट्रवाद की भावनाओं को इस कदर आहत करने वाले यह सब कार्य प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तानियों का या फिर आतंकियों के नहीं हैं। यह हमारे ही लोग है जिनकी सुरक्षा के लिए तैनात जवानों ने अपनी जीवन बलिदान कर दिया। यह कश्मीर के कुछ स्थानीय लोग हैं जिनके द्वारा ऐसी ओछी हरकतें की जा रही है। ये वही लोग हैं जो अपनी शिक्षा और रोज़गार के लिए कश्मीर के बाहर शेष भारत आश्रित हैं लेकिन नारों में पाकिस्तान जिंदाबाद बोलते हैं।

देश के ख़िलाफ़ हो रही ऐसी घटनाओं पर जब लोगों ने कानूनी रूप से कड़े कदम उठाने शुरू किए। तो, कश्मीर से शांति दूतों (महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला) द्वारा शांति संदेश भेजा गया कि पुलवामा में जो हुआ वो कश्मीर के मुस्लिमों द्वारा नहीं किया गया है बल्कि पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा किया गया है। इसलिए कश्मीर के लोगों के साथ भारत के राज्यों में बदसलूकी न की जाए। महबूबा का कहना है कि इससे घाटी के लोगों में गलत संदेश जा रहा है और अपनों के साथ होते ऐसे रवैये को देखकर कश्मीर के युवक अपने भविष्य को कभी भी घाटी के बाहर नही देख पाएँगे।

कश्मीर के अलगाववादी मानसिकता वाले नेताओं ने अपनी अपील में सौहार्द की अपेक्षा सिर्फ़ उन लोगों से की है जो कुछ कश्मीरियों की ऐसी हरकतों पर एक्शन ले रहे हैं। इनकी अपील उनसे बिलकुल नहीं है जो सोशल मीडिया पर आतंकी हमले को भारत के ऊपर जैश की सर्जिकल स्ट्राइक बताकर जवानों के बलिदान पर हँस रहे हैं और जश्न मना रहे हैं।

केंद्र सरकार को सलाह देने वाले ये वही अलगाववादी नेता हैं जो मुस्लिमों का विक्टिम कार्ड खेलकर अपनी राजनीति की ज़मीन तैयार करते हैं लेकिन सुरक्षाबलों पर होने वाली पत्थरबाजी और अराजक तत्वों पर अपनी चुप्पी साध लेते हैं। देश में सुरक्षा के लिहाज़ से उठाए कदमों पर आहत हुए यह वही लोग हैं जिनके पिता (फारूख अब्दुल्ला) के घर में एक अंजान आदमी के घुस आने से इन्हें इतना खतरा महसूस हुआ कि मौक़े पर ही उसे गोलियों से भून दिया गया था। और उस पर ट्वीट कर बाकायदा उमर अब्दुल्ला ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी।

उमर अब्दुल्ला की शांति वाली धरातल पर बात किया जाए तो हो सकता था कि वो शख्स जो उमर के पिता के घर में घुसा, कोई भटका हुआ नौजवान हो, जो न जाने उनके घर में किन वजहों से घुसा हो। तथाकथित शांति चाहने वाले कश्मीर के नेता चाहते तो उसके लिए कुछ न कुछ करते या उसे समझाते ताकि अन्य भटके नौजवानों पर भी सौहार्द का संदेश जाए लेकिन उसे गोली मारना ही क्यों बेहतर समझा गया ? शायद इसलिए क्योंकि फारूक को उस अंजान व्यक्ति से खतरा हो सकता था।

सोचने वाली बात है कि केवल एक अंजान व्यक्ति के फारूक अब्दुल्ला के घर में घुसने के कारण उन्हीं नेताओं ने हिंसा को सर्वोपरि समझा। लेकिन देश की बात आते ही सौहार्द की माँग जग गई। आज देश में उन लोगों के लिए सख्ती न करने की बात की जा रही है जो देश की भावनाओं को न केवल आहत कर रहे हैं बल्कि देश के ख़िलाफ़ खड़े होकर देशद्रोही होने का सबूत भी दे रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी होने का आशय यह तो बिलकुल नहीं है कि आप उसी देश की भावनाओं के खिलाफ़ इसका इस्तेमाल करें जहाँ पर आपको इसको प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है।

इसके अलावा रही बात कश्मीरियों की सुरक्षा की तो केंद्र सरकार वहाँ पर बैठे तथाकथित नेताओं से ज्यादा ध्यान कश्मीर के लोगों का रख रही है। वो सुरक्षा का ही ख्याल रखा जा रहा था जो CRPF ने अपने 44 जवानों को खो दिया। सुरक्षा के लिहाज से ही वहाँ पर भटके नौजवानों को सही रास्ते पर लाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। यह सुरक्षा की ही वजह है कि आतंकी हमले का शिकार होने के बावजूद भी कश्मीरियों के लिए सेना ने हेल्पलाइन नंबर जारी किया है कि वो किसी भी संकट में फँसे कश्मीरियों की मदद के लिए तत्पर हैं।

भाजपाइयों, कॉन्ग्रेसियों या दलितों-ब्राह्मणों का नहीं… यह गुस्सा राष्ट्रवादियों का है

पुलवामा से इतर फिलहाल कुछ नामचीन पत्रकारों के बीच स्क्रीनशॉट शेयर करने की प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई है। बाहर से ही सही किन्तु कुछ छुटभैये पत्रकार भी इस प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हुए झूठी खबरें फैला कर खुद को नामचीन बनाने की कोशिश में लग गए हैं।

सर्वविदित है कि सोशल मीडिया पर हैं तो आप भले नामचीन न हों, आपको आलोचना और अपशब्द सहने पड़ते ही हैं। इतिहास और वर्तमान गवाह है कि यदि मेरे-आपके जैसा कोई अदना आदमी दिलीप मंडल या रविश कुमार सरीखे किसी नामचीन के पोस्ट पर सवाल करता है तो भी गालियाँ मिलती हैं। सुअर, कुत्ता आदि भी कहा जाता है और देख लेने की धमकी भी दी जाती है। चूँकि हम अदने से आदमी हैं सो न तो हम इसका स्क्रीनशॉट लगाते हैं और न ही रोना रोते हैं। सच मगर यह है कि रक्त का दबाव हमारा भी बढ़ता है, दुःख हमें भी होता है। लेकिन हमारे स्क्रीनशॉट को न तो कोई तवज्जो मिलती है और न ही हमारे अपमान से मानवता शर्मसार होती है।

निजी अनुभव है कि एक नेताजी से सवाल करने पर मुझे पब्लिकली, इनबॉक्स में और फोन पर खूब गालियाँ दी गईं। दुःखी होकर मैंने आप जैसे कई नामचीनों के सामने गुहार लगाई। नतीजा सिफ़र रहा। माना कि आपकी तरह हमारे जानने वाले न तो कोई पुलिस ऑफिसर थे और न ही आका मगर साहब क्या हमारा खून, खून नहीं…?

इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस तरह से आप इस सबके पीछे सीधे-सीधे मोदी का हाथ घोषित कर देते हैं, वैसे ही आपके पोस्ट पर गाली खाने पर भी लोग आपको ही दोषी क्यों न मानें? यदि आपको यह लगता है कि आपको दी जाने वाली गाली खुद मोदी लिखवाते हैं तो फिर यह कहाँ से साबित होता है कि आप खुद नहीं लिखवाते ये गालियाँ जो आपके भक्त दूसरों को देते हैं?

देखिए, हम में से कोई भी भगवान नहीं है। कोई आदमी न तो पूर्ण है और न ही शत-प्रतिशत सही। ऐसे कई मौकों पर हम गलत भी होते हैं। ऐसे में हमें या तो गाली स्वीकार लेनी चाहिए या फिर अपनी गलती। हम अदना लोग तो ऐसा करते भी हैं मगर ये नामचीन लोग? कोई इनसे पूछ दे कि भई आप अफजल और कन्हैया पर तो टीवी स्क्रीन काला कर देते हैं मगर पुलवामा के दर्द पर आपको तकलीफ क्यों नहीं होता भला, तो क्या गलत है भाई? क्या पूछने का अधिकार सिर्फ आपको है? जनाब! आपको कोई आतंकी बनता इसलिए दिख जाता है क्योंकि उसको सेना ने पत्थर मारते पकड़ लिया और मारा भी था। लेकिन आए दिन जान बचाने वाली सेना के ही ख़िलाफ़ आतंकियों को प्रश्रय देने वाले पत्थरबाज गलत नहीं दिखते। आतंकियों को प्रोटेक्शन देते और सेना पर पत्थर से वार करते लोग आपको शान्ति-दूत दिखते हैं! आप ऐसा कौन सा चश्मा लगाते हैं कि आपको सेना अत्याचारी और पत्थरबाज भोले-भाले दिखते हैं? कभी सोचा है कि जैसे आपको सेना या पुलिस के टॉर्चर से कुछ लोग आतंकी बनते दिखते हैं, वैसे ही ट्विटर या फेसबुक पर आपके व आपके समर्थकों द्वारा टॉर्चर किए जाने पर भी लोगों ने हथियार उठा लिए तो क्या होगा?

बात मात्र इतनी सी है महोदय कि न तो इस तरह की वीभत्स आलोचना हरदम सही है और न ही आपके विचार। मगर आपको तो टीआरपी के लिए ऐसे ही मौकों की तलाश होती है… आपको बस ये कहने का बहाना मात्र चाहिए होता है कि देखो मोदी ने कितना इनटॉलेरेंस बढ़ा दिया।

वक़्त की मांग है। आप ध्यान से सोच लें। पब्लिक को जब आप देशद्रोही लगेंगे तो वो आपकी नामचीनता या मेरे अदनेपन को भूलकर सबको खदेड़ेगी ही… आप भले ही इस भीड़ को मोदी गैंग और फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी कहें, सच ये है कि फिलहाल इस भीड़ में कोई भाजपाई, कॉन्ग्रेसी या फिर ब्राह्मण-दलित नहीं है। यदि आपको यह समझ नहीं आ रहा तो इंशा अल्लाह आपको प्रत्यक्ष रूप से कश्मीर में आजादी का नारा बुलंद करना चाहिए।

नोट : मैं अभद्र, अश्लील जबावों का स्क्रीनशॉट नहीं लगाता, आपको देखना हो तो रविश कुमार जी के किसी भी पोस्ट पर उनके भक्तों की पुष्प वर्षा देख सकते हैं।

सरेंडर करो या गोली खाओ: कश्मीर के ‘भटके’ नौजवानों के लिए सेना की फाइनल वॉर्निंग

पुलवामा आतंकी हमले और जैश कमांडर गाजी के ख़ात्मे के बाद मंगलवार (फरवरी 19, 2019) को सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद हुए मुठभेड़ की विस्तृत जानकारी दी गई। इसके अलावा प्रेस कॉन्फ्रेंस में कश्मीर के ‘भटके’ नौजवानों (पत्थरबाज या आतंकी बन गए युवाओं) के लिए भी सख़्त शब्दों के साथ चेतावनी दी गई।

भारतीय सेना के चिनार कॉर्प्स के लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिलन्न ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद के सफाये को लेकर हम कृत-संकल्प हैं। इसके लिए बाहर से जो भी कश्मीर में आतंक मचाने आएगा, वो वापस ज़िन्दा नहीं जाएगा, इसकी गारंटी है।

लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिलन्न ने कश्मीर की माताओं से अपील करते हुए कहा कि वे अपने बच्चों को समझाएँ और गलत रास्ते पर चले गए लड़कों को सरेंडर करने का आग्रह करें। लेकिन अगले ही वाक्य में उनका यह आग्रह स्पष्ट संकेत में बदल गया जब उन्होंने कहा, “सरेंडर करने वालों के लिए सेना कई तरह के अच्छे कार्यक्रम चला रही है। लेकिन आतंकवाद में शामिल होने वालों पर कोई रहमदिली नहीं दिखाई जाएगी।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद कश्मीर पुलिस के आईजी एसपी पाणि ने बताया कि कश्मीरी युवाओं के आतंकी बनने की घटना पिछले कुछ महीनों में कम हुई है। हालाँकि उन्होंने भी सेना की तरह ही स्पष्ट संदेश दिया कि घाटी में जो भी घुसपैठ करेगा वह जिन्दा नहीं बचेगा।

सीआरपीएफ के आईजी जुल्फिकार हसन भी इस प्रेस कॉन्फ्रेस में मौजूद थे। वीरगति को प्राप्त हुए जवानों पर उन्होंने कहा, “जिन परिवार के बेटों ने बलिदान दिया है, वे खुद को अकेले न समझें। आपके लिए हर वक्त हम खड़े हैं।” जुल्फिकार हसन ने देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ने वाले कश्मीरी बच्चों और उनके परिवारों पर भी अपनी बात रखी और CRPF के द्वारा चलाए जा रहे हेल्पलाइन नंबर का भी जिक्र किया।

साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलवामा अटैक और उसके बाद हुए मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए सभी जवानों को नमन किया गया। इसमें जानकारी दी गई कि मुठभेड़ में 2 नहीं बल्कि 3 आतंकियों को मार गिराया गया था। 3 में 2 पाकिस्तान के थे जबकि एक स्थानीय आतंकी था।

48 घंटे के भीतर जिला छोड़ दें Pak नागरिक, होटलों में भी नहीं मिलेगी पनाह: DM

पुलवामा हमले के बाद भारत में जगह-जगह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। इसी दिशा में बीकानेर के डीएम ने पाकिस्तानियों के लिए एक आदेश जारी किया है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान नागरिकों को 48 घंटे के भीतर जिला छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है।

सोमवार (फरवरी 18, 2019) को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के पिंगलिना क्षेत्र में सुरक्षाबलों और आतंकियों के साथ मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में मेजर समेत देश के 4 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। एक नागरिक की भी मौत इस मुठभेड़ में हुई है। वीरगति को प्राप्त हुए जवानों में एक एस राम भी थे। वे राजस्थान से थे।

एक तरफ जहाँ सोमवार को एस राम का पार्थिव शरीर देर रात राजस्थान पहुँचा, वहीं बीकानेर के डीएम (जिलाधिकारी) कुमार पाल गौतम ने सीआरपीसी धारा 144 के तहत आदेशों की एक लिस्ट जारी की। इस लिस्ट में पाकिस्तानी नागरिकों को आदेश दिया गया कि वह 48 घंटे के भीतर जिला छोड़ दें।

इतना ही नहीं डीएम ने बीकानेर की सीमाक्षेत्र में बने सभी होटलों में पाकिस्तानी नागरिकों को जगह देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। इस आदेश को पूरे जिले में 2 महीने के लिए लागू किया गया है।

बता दें कि पुलवामा अटैक के बाद जिले के पिंगलिना क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में सेना, राष्ट्रीय राइफल्स और पैरा फोर्सेज की टीम ने 3 आतंकियों को मार गिराया। इन आतंकियों में जैश-ए-मोहम्मद के दो टॉप कमांडर और पुलवामा का मास्टरमाइंड कामरान गाजी भी शामिल था।

कुलभूषण जाधव केस: भारत ने ICJ में पाक की उधेड़ी बखिया; पाकिस्तानी जज को आया हार्ट अटैक

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चल रहे कुलभूषण जाधव केस में जहाँ भारत ने काफ़ी मजबूती से अपना पक्ष रखा, वहीं पाकिस्तान अलग-थलग नज़र आया। भारत की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने एक-एक कर पाकिस्तान के सारे झूठ बेनक़ाब किए और अपनी उम्दा दलीलों से भारत का पक्ष मजबूत किया। इस दौरान भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव दीपक मित्तल ने पाकिस्तानी अटॉर्नी जनरल से हाथ मिलाने से मना कर दिया। मित्तल ने मई 2017 में सुनवाई के दौरान भी पाकिस्तान के वकील से हाथ मिलाने से मना कर दिया था।

सुनवाई के दौरान भारत ने पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। एक निर्दोष की जान को ख़तरे में बताते हुए भारत ने इस पूरे मामले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। चार दिन तक चलने वाली इस सुनवाई के पहले दिन सोमवार (फरवरी 18, 2019) को भारत ने काउंसलर एक्सेस का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पाकिस्तान वियना समझौते का उल्लंघन कर रहा है। हरीश साल्वे ने अदालत में कहा:

“भारतीय नागरिक जाधव को लेकर पाकिस्तान की कहानी पूरी तरह कल्पना पर आधारित है, जिसमें सच्चाई नहीं। काउंसलर एक्सेस के बिना जाधव को लगातार हिरासत में रखा गया जिसे ग़ैर क़ानूनी घोषित किया जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान जाधव मामले को एक प्रचार उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।”

साल्वे ने कहा कि पाकिस्तान अब तक इस मामले में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं दे पाया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस मामले को प्रोपोगैंडा के लिए कर रहा है। उन्होंने कोर्ट से जाधव को राहत देने की अपील की। पाकिस्तान के अमानवीय रवैये को दुनिया के सामने लाते हुए हरीश साल्वे ने आगे कहा:

“बिना देरी पाकिस्तान को जाधव को काउंसलर एक्सेस देने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। काउंसलर एक्सेस के लिए भारत ने 13 बार रिमाइंडर भेजा, लेकिन पाकिस्तान ने इस पर अब तक ध्यान नहीं दिया। मार्च 2016 में जाधव को पकड़ा गया, जबकि केस क़रीब एक महीने बाद दर्ज किया गया। इस दौरान भारत ने कई बार काउंसलर एक्सेस की मांग की, जिसे ठुकरा दिया गया।”

पाकिस्तान के एड-हॉक जज तसद्दुक हुसैन गिलानी को दिल का दौरा पड़ा है, जिसके बाद उन्हें इस्लामाबाद के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। 69 वर्षीय गिलानी की हालत अभी स्थिर है। आपको बता दें कि आईसीजे के अनुच्छेद 31 के तहत व्यवस्था की गई है कि अगर किसी केस में पैरवी कर रहे देश की राष्ट्रीयता का कोई जज कोर्ट की बेंच में नहीं है तो वह किसी व्यक्ति का चुनाव एड-हॅक जज के तौर पर कर सकता है।

कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान के सैनिकों ने मार्च 2016 में बलूचिस्तान से पकड़ने का दावा किया था। जाधव पर अफ़ग़ानिस्तान में जासूसी का झूठा आरोप मढ़ कर पाकिस्तानी मिलिट्री कोर्ट ने अप्रैल 2017 में उन्हें मौत की सज़ा सुनाई थी। भारत ने इस सज़ा को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायलय का दरवाजा खटखटाया था। इतना ही नहीं, पाकिस्तान ने जाधव के परिवार को भी प्रताड़ित किया था। जब जाधव के परिजन उनसे मिलने गए थे, तब पाकिस्तान ने उनसे दुर्व्यवहार किया था।

पुलवामा जाँच: Pak का था हाथ, कोयले में छिपा कर लाया गया था RDX

पुलवामा हमले को लेकर चल रही शुरुआती जाँच में पाकिस्तान का हाथ सामने आया है। वैसे यह कोई आश्चर्यजनक या चौंकाने वाली बात नहीं है क्योंकि सभी को पता था कि इस त्रासद हमले के पीछे पाकिस्तान ही है। लेकिन, अब जाँच भी इसी ओर इंगित कर रहे हैं। 40 भारतीय जवानों की जान लेने वाले इस हमले में हाई इंटेंसिटी वाले ‘मिलिट्री ग्रेड एक्सप्लोसिव (RDX)’ का प्रयोग किया गया था। इस विस्फोटक को पाकिस्तानी सेना द्वारा आतंकियों को सप्लाई किया जाता है।

फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स के इस ख़ुलासे के बाद पाकिस्तान की सच्चाई एक बार फिर से बेनक़ाब हो गई है। इसके अलावा यह भी पता चला है कि विस्फोटक रखने के लिए जिस गाड़ी का इस्तेमाल किया गया था, वह मारुती ईको वैन थी। घटनास्थल पर पहुँच कर प्रथम दृष्टया जाँच के बाद विशेषज्ञों ने बताया कि आरडीएक्स एक स्थिर विस्फोटक है लेकिन इसे घटना से महीनों पहले लाया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि इन विस्फोटकों को घटनास्थल से 5-7 किमी की दूरी पर तैयार किया गया था।

हालाँकि, अभी आधिकारिक तौर पर फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं आई है। रिपोर्ट आने के बाद ही इस हमले से जुड़े अन्य राज़ खुलेंगे। बारिश की वजह से कई साक्ष्य मिटने के कारण विशेषज्ञों को जाँच में ख़ासी परेशानी हुई। एक सीनियर विशेषज्ञ के अनुसार, इस हमले में 50-70 किलोग्राम आरडीएक्स का प्रयोग किया गया था ताकि 300 किलोग्राम की चीज को पूरी तरह नष्ट किया जा सके। इसे तैयार करने के लिए पाकिस्तान से बम बनाने वाले भारत आए थे।

जम्मू-कश्मीर पुलिस, एनआईए व अन्य एजेंसियों द्वारा की जा रही जाँच से यह भी पता चला है कि आरडीएक्स को अंगीठी के कोयले में छिपा कर कई चरणों में लाया गया था। आरडीएक्स में राख मिला कर इसे कोयले के साथ कवर बना कर रखा जाता था ताकि किसी को शक न हो। आरडीएक्स के अलावा इस हमले में अमोनियम नाइट्रेट व अन्य केमिकल भी प्रयोग किए गए थे।

मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार, अगर पुलवामा हमले में उतनी भारी मात्रा में आरडीएक्स इस्तेमाल किया गया होता, जितने के क़यास लगाए जा रहे थे, तो सिर्फ़ एक बस ही नहीं बल्कि एक बड़े दायरे में आने वाले सारे वाहन उड़ जाते। इस स्थिति में जान-माल की और ज्यादा क्षति होती। बता दें कि दक्षिण कश्मीर में बड़े पैमाने पर अंगीठी का उपयोग होता है व स्थानीय लोग प्लास्टिक के थैलों या बोरियों में कोयला ले जाते हैं। आतंकियों ने इसी का फ़ायदा उठाया।

पत्रकारिता है या दोमुँहापन? स्टॉकिंग का दावा और दूसरों के नंबर पब्लिक कर अपनी ट्रोल आर्मी से ट्रोल करवाना

अक्सर विवादों में रहने वाली पत्रकार बरखा दत्त ने सोमवार (फ़रवरी 18, 2019) को ट्वीट किया कि उन्हें अज्ञात नंबरों से फोन आ रहे हैं, लोग उन्हें परेशान कर रहे हैं और गालियाँ दे रहे हैं। अपने ट्वीट में, उन्होंने गृह मंत्री राजनाथ सिंह से इस मामले में स्वयं हस्तक्षेप करने की माँग की, जबकि आमतौर ऐसे मामले स्थानीय पुलिस द्वारा निपटाए जाते हैं।

बरखा दत्त ने दावा किया कि उनका नंबर सार्वजनिक होने से उन्हें जो मैसेज प्राप्त हुए हैं। उसमें पुरुष जननांग की अनचाही तस्वीर भी शामिल है। अगर ऐसा है तो यह वास्तव में यौन उत्पीड़न का मामला है और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर कार्रवाई किया जाना चाहिए। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि विशेष रूप से महिलाएँ, सोशल मीडिया पर अक्सर उत्पीड़न का सामना करती हैं और जो ऐसा करते हैं उन पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। जिससे समाज में एक उदाहरण सेट हो कि लोग इस तरह से महिलाओं को परेशान नहीं कर सकते हैं।

OpIndia.com ने, विशेष रूप से, बरखा के ट्वीट में सार्वजनिक किए गए सुनील सक्सेना और अभिषेक नाम के दो लोगों से संपर्क किया।

OpIndia.com से बात करते हुए, अभिषेक ने बरखा को गाली देने से इनकार किया और दावा किया कि उसने केवल इस बात की पुष्टि करने के लिए फोन किया था कि क्या वह नंबर जो सोशल मीडिया पर बरखा दत्त के नाम से घूम रहा था, क्या वास्तव में उनका है। अभिषेक ने बताया, “मैंने उन्हें बिल्कुल भी गाली नहीं दी। दरअसल, उनका नंबर फेसबुक पर सर्कुलेट हो रहा था, और मैं जाँचना चाहता था कि क्या सच में ये उनका नंबर है या नहीं। इसलिए, मैंने फोन किया और महसूस किया कि यह वास्तव में उन्हीं का है। मैंने नंबर का बिल्कुल भी दुरुपयोग नहीं किया। हमने शायद 15 या 20 सेकंड के लिए भी बात की।”

सुनील सक्सेना की कहानी भी ऐसी ही है, उनका भी कहना है कि बरखा का नंबर फेसबुक पर प्रसारित हो रहा था। उन्होंने भी यह दावा किया कि केवल यह पुष्टि करने के लिए उन्होंने कॉल किया था कि क्या यह बरखा दत्त का नंबर है। ऑपइंडिया डॉट कॉम से बात करते समय उनकी आवाज काँप रही थी वो डरे हुए थे। सुनील ने बताया, “उनका नंबर सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहा था, इसलिए मैंने उन्हें फोन किया। मैंने उन्हें अपना नाम और अपना पता भी बताया। और बरखा ने मेरे साथ आराम से बात भी की। फिर, अचानक से कहा, “मैं आपको रिपोर्ट कर रही हूँ, आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला और आपने मुझे कॉल क्यों किया?” यहाँ तक कि मुझ पर स्टॉक करने का आरोप भी लगाया, लेकिन मैंने ऐसा कुछ बिल्कुल भी नहीं किया।

यह पूछे जाने पर कि क्या उनके पास कॉल की रिकॉर्डिंग है, सक्सेना ने कहा कि ‘उन्होंने ऐसा नहीं किया, यह वह गलती है, जो मैंने की क्योंकि मेरे मन ऐसा कुछ था ही नहीं।’

सक्सेना ने कहा, “फिर भी बरखा दत्त ने उनका (सुनील) नंबर पब्लिक कर दिया है। सार्वजनिक होने के बाद उन्हें खुद फोन आ रहे हैं और धमकी दी जा रही है। यहाँ तक कि लोग मुझे गाली दे रहे हैं, मुझे कई नंबरों से कॉल आ रहे हैं। यहाँ तक कि पुलिस ने भी मुझसे संपर्क किया है। इसके अलावा, दूसरों ने भी मुझे गंदी गालियाँ देते हुए, धमकी दी है। मैंने अब उन कॉल को रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया है।”

सुनील सक्सेना का कहना है कि उन्होंने बरखा दत्त से बात करते हुए कोई अपशब्द नहीं इस्तेमाल किया, कोई गाली गलौच नहीं की, वो इस कॉल कि बात को भूल भी गए थे। लेकिन थोड़ी ही देर में किसी के द्वारा बरखा दत्त का ट्वीट शेयर किया गया, जिसमें सुनील सक्सेना का नाम और मोबाइल नंबर दिया हुआ था, और उन पर स्टाकिंग करने का आरोप भी लगाया गया था।

बरखा दत्त ने जब से सुनील का नंबर पब्लिक किया, उसके बाद से ही सुनील के पास तमाम ट्रोल्स के बहुत ज़्यादा कॉल्स आने लगी, अलग-अलग जगहों से कॉल कर, इन्हे जान से मार देने की, सबक सिखाने की धमकियाँ दी जाने लगी। सुनील घबरा गए क्योंकि लोग इनके परिवार को भी नुक्सान पहुँचाने की धमकी देने लगे। इन्होने बरखा दत्त को पर्सनल मैसेज करके, ट्वीट से इनका नंबर हटाने की रिक्वेस्ट की और कहा की अगर उन्हें लगता है और इन्होने उनसे कोई बदतमीजी की है तो बेशक पुलिस से शिकायत करें, लेकिन नंबर हटा लें। लेकिन बरखा दत्त ने अभी तक वो ट्वीट नहीं हटाया है।

OpIndia.com को सक्सेना ने उन रिकॉर्डिंग्स में से एक भेजा। कॉल रिकॉर्डिंग में, एक व्यक्ति को गंदी भाषा में सुनील को गाली देते हुए साफ सुना जा सकता है और उसे धमकी देता हुआ भी।

इसके बाद भी बरखा दत्त ने खुद ट्वीट किया कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर उनका नंबर सर्कुलेट कर रहे हैं और बरखा दत्त ने माँग कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए।

यहाँ असली सवाल ये है कि क्या सिर्फ़ किसी व्यक्ति को कॉल कर ये पता करना कि क्या वास्तव में उस व्यक्ति का नंबर है कि नहीं। यह अपराध है? क्या इसे स्टाकिंग के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है? अगर हाँ तो इसे कानून का पालन कराने वाली एजेंसियों को तय करना होगा। न कि बरखा दत्त स्वयं तय कर उसके नंबर सार्वजनिक कर उसे अपने ट्रोल्स द्वारा ट्रोलिंग के लिए छोड़ दें।

बरखा दत्त की ट्रोल आर्मी सुनील पर जिस तरह से टूट पड़ी है वह भी आपकी भाषा में क्या स्टॉकिंग नहीं? अगर सुनील ने कुछ गलत किया है तो पुलिस को रिपोर्ट करतीं, ना कि ट्विटर पर नंबर सार्वजनिक कर ट्रोल करवातीं। कल को कोई बरखा दत्त का ट्रोल सुनील या उनके परिवार को नुक्सान पहुँचाता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या बरखा दत्त ये भूल गई हैं कि उन्होंने स्वयं एक कानून का उल्लंघन कर दिया है, लोगो के नंबर ट्विटर पर शेयर करके?

यहाँ ये सवाल भी जरूरी है कि सुनील की क्या गलती थी? क्या बरखा दत्त को कॉल कर देना ही उसकी गलती थी? क्या बरखा दत्त किसी मार्केटिंग कंपनी के कॉल आने पर भी उनके नंबर शेयर करती है? और सबसे बड़ी बात, किसी का पर्सनल नंबर क्यों ट्विटर पर शेयर किया? क्या एक की गलती, गलती है! अपराध है! आपकी नहीं?


बरखा जी… जो हुआ वो गलत है लेकिन आप राष्ट्रवाद और यौन शोषण में पहले फर्क समझिए

डियर बरखा जी,

मुझे नहीं मालूम जाने-अनजाने में किसने आपका फोन नंबर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। लेकिन मुझे यह जानकर बहुत दुख हुआ कि इस नंबर का गलत इस्तेमाल करके आपको उत्पीड़ित किया गया। मैं आपकी तकलीफ को अच्छे से समझ सकती हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ कि किसी महिला का नंबर मिलने के बाद समाज में मौजूद अराजक तत्व उसका किस तरह से गलत इस्तेमाल करते हैं।

खैर, एक तो आप महिला और दूसरा आप पत्रकारिता जगत की सेलेब्रिटी हैं। आपका नंबर जब सोशल मीडिया पर किसी के द्वारा पोस्ट किया गया होगा, तो निश्चित ही कुछ लोगों ने आपको उत्सुकता में फोन किया होगा कि क्या आप वही बरखा हैं जिनको अब तक सिर्फ़ टेलीविजन पर बड़ी-बड़ी रिपोर्टिंग करते देखा गया… तो कुछ ने केवल ‘उसी’ लिहाज़ से आपके नंबर का इस्तेमाल किया, जिसका प्रमाण आपने ट्विटर पर उन स्क्रीनशॉट्स को डालकर दिया।

ट्विटर पर आपके द्वारा किए गए पोस्ट वाकई हमारे समाज की उस घटिया समुदाय की हकीकत है… जो छोटी बच्ची से लेकर महिलाओं तक का पर्याय केवल योनि के रूप में ही आँकता है। ऐसे घटिया, नीच, ओछी हरकतों को सोशल मीडिया तक लाया जाना ही चाहिए। ताकि बाक़ी के लोग भी सतर्क रहें। आपके द्वारा ट्विटर पर डाले गए स्क्रीनशॉट की मैं जितनी प्रशंसा करूँ उतना ही कम है। इनकी न केवल सोशल लिंचिंग होनी चाहिए, बल्कि कानूनी रूप से भी इनके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन इस स्क्रीनशॉट के साथ आपके ट्वीट न केवल मुझे बेमेल लगे बल्कि सवाल उठाने वाले भी लगे। यह घटना जितनी निंदनीय और शर्मनाक है, उससे भी कहीं शर्मनाक आपका यह ट्वीट है…

मैं निराधार होकर यह बात बिलकुल भी नहीं कह रही हूँ। आप खुद सोचिए! कुंठित समाज के घटिया समुदाय के किसी एक शख्स ने आपको अपने लिंग की तस्वीर भेजी और अपनी अति-बेहयायी का प्रमाण दिया। इस पर एक्शन लिया जा सके, इसके लिए आप वर्चुअल स्पेस पर हुए यौन शोषण को अपने सोशल मीडिया पर लेकर आईं। क़ाबिले-तारीफ़ है यह तरीका ताकि लोग सतर्क हो सकें।

लेकिन, आपके इस ट्वीट में राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग क्यों किया गया, वो मेरी समझ से बाहर है…? क्या आपके लिए इस बेहयायी का पर्याय राष्ट्रवादी हो जाना है? हैरानी है मुझे कि आपको जिस जगह पर यौन शोषण शब्द का इस्तेमाल करना था, आप वहाँ पर राष्ट्रवादी शब्द प्रयोग कर रही हैं।

एक अंजान व्यक्ति आपके निजी नंबर पर अश्लील तस्वीर साझा करता है। लेकिन इससे आपको कैसे पता चलता है कि उसकी यह घटिया हरकत राष्ट्रवाद के नाम पर है? या मैं ये समझ लूँ कि आप देश के राजनैतिक माहौल में इतनी डूब चुकी हैं कि अब सिर्फ़ आपको आपके साथ हुए हर वाकये के पीछे राष्ट्रवाद ही जिम्मेदार लगता है।

कायदे से मुझे आज आपकी इस हिम्मत के लिए सराहना चाहिए था, क्योंकि अक्सर लड़कियाँ इस तरह के यौन शोषण को समझ ही नहीं पाती हैं और घबरा के सोशल मीडिया से दूरी बनाना शुरू कर देती हैं। लेकिन, आपके इस पोस्ट पर राष्ट्रवाद शब्द का इस्तेमाल करने से आपको सराहने की मेरी सारी इच्छाएँ ही खत्म हो गईं या यह कहूँ कि वो इच्छा ही मर गई।

आप अपना अजेंडा क्लियर करिए आपको सामाजिक बुराईयों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए सामने आना है, या सोशल मीडिया के प्लैटफॉर्म पर अपने पाठकों और फॉलोवर्स को हर बुराई में सिर्फ़ राष्ट्रवादियों का चेहरा ही दिखाना है।

आप शायद खुद इस बात को नहीं समझ पा रही हैं कि आपके एक पोस्ट का असर आपके पाठकों की मानसिकता पर कितने बड़े रूप में पड़ेगा। आप इस पूरे मामले को यौन शोषण न कहकर राष्ट्रवाद का रूप बता रही हैं। जरा सोचिए, आप वर्चुअल दुनिया में किन चीजों का निर्माण कर रही हैं, और किन शब्दों के पर्यायों से लोगों को वंचित रख रही हैं।

जिसने भी आपको यह तस्वीर भेजी है, वो शख्स निःसंदेह ही सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए लेकिन शोषण के आरोप में… राष्ट्रवाद का इन घटिया चीज़ों से कोई लेना-देना नहीं है।

बतौर नारी होने के साथ-साथ आप इस देश की जागरूक और बेहद समझदार नागरिक भी हैं। आपकी भाषा और चुने हुए शब्दों से बहुत बड़ी आबादी के लोग अपनी सोच का निर्माण करते हैं। यौन शोषण में और राष्ट्रवाद में फर्क समझिए। अपने पाठकों के लिए राष्ट्र की भावनाओं को तहस-नहस मत करिए। जो उस गलीच आदमी ने आपके साथ किया, वो राष्ट्रवादी होने के नाम पर नहीं किया, उसने अपनी तथाकथित मर्दानगी को दिखाने के लिए ऐसा किया।

आपका इस तरह का पोस्ट दो शब्दों के मायनों को समाज में गलत ढंग से प्रेषित कर रहा है। संप्रेषण की गलती के कारण इन दो शब्दों के घाल-मेल से न जाने कितने लड़के-लड़कियाँ गलतफहमी का शिकार हो जाएँगे। मैं आपसे यही कहना चाहती हूँ कि आप कुछ लोगों के लिए खबरों का पर्याय बन चुकी हैं, उनको अपनी विचारधारा और राजनैतिक समझ के चलते बरगलाने का काम न करें। जो है उसे वही कहकर, बताकर, लिखकर सबके बीच भेजिए। ताकि आप द्वारा भेजे संदेश में और वास्तविकता में लोगों को सवाल उठाने का मौका न मिले।

बांग्ला फ़िल्म ‘भोबिश्योतिर भूत’ की स्क्रीनिंग रद्द, ममता के ख़िलाफ़ धरना प्रदर्शन

पश्चिम बंगाल में निर्देशक अनिक दत्ता की फिल्म “भोबिश्योतिर भूत” (भूत का भविष्य) की स्क्रीनिंग को लगभग सभी मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों से हटा दिया गया है। इसके विरोध में रविवार (18 फ़रवरी) को कई फ़िल्म कलाकारों और कार्यकर्ताओं ने धरना प्रदर्शन किया।

ख़बरों के अनुसार, अनिक दत्ता द्वारा निर्देशित एक सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य, पर आधारित फ़िल्म भोबिश्योतिर भूत, 15 फ़रवरी को रिलीज़ हुई थी और एक दिन बाद ही कोलकाता के सभी सिनेमाघरों से इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। जानकारी के अनुसार फ़िल्म कथित तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर व्यंग्य थी इसलिए उसे सिनेमाघरों से हटा दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर यह दावा किया कि ममता बनर्जी ने बदले की भावना से फ़िल्म पर रोक लगवाई है।

इस बीच, मीडिया से बात करते हुए निर्देशक ने आरोप लगाया है कि सिंगल-स्क्रीन थिएटर मालिकों और मल्टीप्लेक्स को राज्य भर में 40 से अधिक स्क्रीन पर स्क्रीनिंग को रोकने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने कहा, “हाँ, मैंने सुना है कि स्क्रीनिंग रोक दी गई है लेकिन मैं जो समझ पा कर रहा हूँ, वह यह है कि स्थानीय पुलिस स्टेशनों ने हॉल को निर्देश दिया है। पुलिस ने मेरे निर्माताओं को पहले भी चेतावनी दी थी कि फिल्म की सामग्री विवाद उत्पन्न कर सकती है।”

इसके बाद फ़िल्म निर्देशक ने कहा कि सिनेमाघरों से फ़िल्म हटाने के संबंध में उन्हें किसी भी तरह की कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी गई, सभी (हॉल मालिकों) ने उनसे कहा कि फ़िल्म की स्क्रीनिंग को रोकने के निर्देश उच्च अधिकारियों के द्वारा दिए गए थे। इसके बाद उन्होंने कहा कि फ़िल्म की स्क्रीनिंग पर रोक के मामले में उन्हें लोगों का काफी समर्थन मिल रहा है और फ़िल्म बिरादरी भी उनके समर्थन में एकजुट है।

वयोवृद्ध कलाकार सौमित्र चटर्जी ने एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा कि फ़िल्म पर रोक लगाने का फ़ैसला अलोकतांत्रिक और फ़ासीवादी नीति से ताल्लुक़ रखता है। चटर्जी ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि स्क्रीनिंग पर रोक का फ़ैसला प्रशासन का एक ‘प्रतिशोधात्मक कृत्य’ है।

रविवार को कोलकाता में विरोध प्रदर्शन में, कई कलाकारों और कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर सेंसरशिप की कार्रवाई की आलोचना करते हुए बैनर और तख़्तियाँ धारण कीं। कोलकाता में मेट्रो चैनल पुलिस स्टेशन के सामने एक बैनर पर ‘अमर दीदी शिल्पी दीदी, आमार दीदी कोबी, पुलिस दी बंधो कोरो नॉटन बंगला चोबी’ लिखा गया था। इसके अलावा, मेरी बहन एक कलाकार है, मेरी बहन एक कवि है, और वह एक नई बंगाली फ़िल्म को सेंसर करने के लिए पुलिस का उपयोग करती है जैसे वाक्य भी लिखे गए।

बता दें कि फ़िल्म भोबिश्योतिर भूत शुरुआत से ही विवादों का सामना कर रही है। फ़िल्म के निर्देशक अनिक दत्ता और सह-निर्माता इंदिरा उन्नीनार ने हाल ही में धमकी मिलने का दावा भी किया था।