आज देश 70वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। देश के अलग-अलग हिस्से से लहराते हुए तिरंगे की खूबसूरत तस्वीरे हमारे सामने आ रही हैं। लेकिन लद्दाख में ITBP जवानों के द्वारा तिरंगा फरहाने का वीडियो सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न मीडिया माध्यमों पर खूब पसंद किया जा रहा है।
हिमवीर के नाम से प्रसिद्ध आईटीबीपी के जवानों ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर 18,000 फीट की ऊँचाई पर तिरंगा फहराकर प्रत्येक भारतीय का सीना चौड़ा कर दिया है। बता दें कि 24 अक्टूबर 1962 को आईटीबीपी की स्थापना की गई थी।
युद्ध क्षेत्र में दुनिया का सबसे मुश्किल इलाक़ा माना जाता है लद्दाख
एक तरफ़ देश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, जहाँ लोग अपने घर से बाहर निकलने को भी तैयार नहीं हैं वहीं दूसरी ओर ITBP के जवानों ने उस पर्वत की चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराया, जहाँ चारो तरफ़ सिर्फ़ बर्फ की चादर है और तापमान माइनस-30 डिग्री।
इतना कम तापमान में हम बामुश्किल अनुमान कर सकते हैं की किस तरह से भारतीय जवान भारत की दुर्गम सीमाओं पर देश वासियों के रक्षार्थ खड़े हैं। लद्दाख के इस इलाके को युद्ध क्षेत्र के लिहाज से दुनिया के सबसे मुश्किल इलाकों में माना जाता है। यहाँ अक़्सर तापमान शून्य से भी काफी नीचे रहता है।
नक्सलियों के माँद में घुसकर शान से फहराया गया तिरंगा
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के पालमअड़गु इलाके में गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया। यह इलाका नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। सुरक्षा बलों ने साहस का परिचय देते हुए उन्हें चुनौती देते हुए यहाँ पहली बार तिरंगा फहराया। यहाँ नक्सली हमेशा से काला झंडा फहराते आए हैं। गणतंत्र दिवस के मौके पर सीआरपीएफ 74 वाहिनी के जवानों के साथ ही जिला बल के जवानों ने यहाँ तिरंगा फहराते हुए मिठाई बाँटी।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर 74 वाहिनी के जवान झंडारोहण करते हुए
57 साल बाद गणतंत्र दिवस पर फहराया गया तिरंगा
बिहार के 62 फीट ऊँचे ऐतिहासिक दरभंगा राज किले पर 57 साल बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया। गौरवशाली दरभंगा और मिथिला स्टूडेंट्स यूनियन संगठन ने तिरंगा फहराते हुए भारत माता की जय के नारे लागाए।
दरभंगा राज किले पर 57 साल बाद गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराया गया
गौरवशाली दरभंगा के सदस्य संतोष कुमार चौधरी ने कहा, “57 साल पहले दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने 1962 में आखिरी बार यहाँ तिरंगा फहराया था। पिछले साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ये परंपरा शुरू की गई।”
मोर, जिसका ख़्याल आते ही एक ऐसा मनमोहक दृश्य उभरकर सामने आता
है, जो बेहद सुखद एहसास कराता है। मोर को नाचते हुए देखना भला किसे रोमांचित नहीं
करता। अपने एक रंग-बिरंगे पंखों से मंत्रमुग्ध कर देना वाला पक्षी ‘मोर’ का अस्तित्व केवल एक पक्षी होने तक
ही नहीं सीमित है बल्कि यह हमारा राष्ट्रीय पक्षी भी है।
आपको बता दें कि भारत सरकार द्वारा मोर को 26 जनवरी,1963 में राष्ट्रीय पक्षी के रूप में घोषित किया गया। ‘फैसियानिडाई’ परिवार के सदस्य मोर का वैज्ञानिक नाम ‘पावो क्रिस्टेटस’ है, इंग्लिश भाषा में इसे ‘ब्ल्यू पीफॉउल’ अथवा ‘पीकॉक’ कहते हैं। संस्कृत भाषा में मोर को ‘मयूर’ कहा जाता है।
मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया
जानकारी के मुताबिक़, राष्ट्रीय पक्षी के रूप में मोर का चयन यूँ ही रातों-रात नहीं हुआ था बल्कि इस पर काफ़ी सोच-विचार किया गया था। माधवी कृष्णन द्वारा 1961 में लिखे गए उनके एक लेख के अनुसार भारतीय वन्य प्राणी बोर्ड की ऊटाकामुंड में बैठक हुई थी। इस बैठक में राष्ट्रीय पक्षी के लिए अन्य पक्षियों भी विचार किया गया था, जिनमें सारस, क्रेन, ब्राह्मिणी काइट, बस्टर्ड और हंस का नाम शामिल थे। दरअसल राष्ट्रीय पक्षी के चयन के लिए जो गाइडलाइन्स थीं उनके मुताबिक़ जिसे भी राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया जाए उसकी देश के सभी हिस्सों में मौजूदगी भी होनी चाहिए।
इसके अलावा इस बात पर भी ग़ौर
किया गया कि जिस भी पक्षी का चयन किया जाए, उसके रूप से देश का हर नागरिक वाक़िफ़ हो
यानी उसकी पहचान सरल हो। इसके अलावा राष्ट्रीय पक्षी को पूरी तरह से भारतीय
संस्कृति और परंपरा से ओत-प्रोत होना चाहिए।
बैठक में गहन चर्चा के बाद
मोर को इन सभी मानदंडों पर खरा पाया गया जिसके परिणामस्वरूप मोर को भारत का राष्ट्रीय
पक्षी घोषित कर दिया गया क्योंकि यह शिष्टता और सुंदरता का प्रतीक भी है। इसके
अलावा आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नीला मोर हमारे पड़ोसी देश म्यांमार और
श्रीलंका का भी राष्ट्रीय पक्षी है।
राजाओं-महाराजाओं व कवियों की भी पसंद था मोर
हिन्दु मान्यताओं के अनुसार मोर को कार्तिकेय के वाहन ‘मुरुगन’ के रूप से भी जाना जाता है। कई धार्मिक कथाओं में भी मोर का ज़िक्र होता है। भगवान कृष्ण ने तो अपने मुकुट में मोर पंख धारण किया हुआ है, और इसी से मोर के धार्मिक महत्व को समझा जा सकता है। महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘मेघदूत’ में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी ऊपर का दर्जा दिया है।
अनेकों राजाओं-महाराजाओं को भी मोर से काफ़ी लगाव था। जिसका प्रमाण उस दौर के राजाओं के शासनकाल के दौरान कुछ तथ्यों से मिलता है। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य में जिन सिक्कों का चलन था उनके एक तरफ मोर बना होता था। मुगल बादशाह शाहजहाँ जिस तख़्त पर बैठते थे, उसकी संरचना मोर जैसे आकार की थी। दो मोरों के बीच बादशाह की गद्दी हुआ करती थी और उसके पीछे पंख फैलाए मोर। हीरे-पन्नों जैसे क़ीमती रत्नों से जड़ित इस तख़्त का नाम ‘तख़्त-ए-ताऊस’ था, जिसे अरबी भाषा में ‘ताऊस’ कहा जाता था।
मोर को राष्ट्रीय पक्षी के रूप में घोषित किए जाने के पीछे केवल उसकी सुंदरता ही नहीं बल्कि उसकी लोकप्रियता भी है। एक ऐसी लोकप्रियता जिसका नाता आज से नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से है।
गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को देश में उन लोगों के नाम की घोषणा की गई है जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा।
इस सूची में 4 हस्तियों को पद्म विभूषण, 14 को पद्म भूषण, और 94 लोगों को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। इस सूची में एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं लेकिन अपने लगातार प्रयासों से वह जो काम कर रहे हैं वह किसी मिसाल से कम नहीं है।
डी प्रकाश रॉव नाम के यह शख्स ओडिशा में कटक का रहने वाले हैं। जिनका ज़िक्र प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ में भी कर चुके हैं। डी प्रकाश पिछले 67 सालों से चाय बेचने का काम करते हैं। प्रकाश को चाय बेचकर जितना भी पैसा मिलता है वो उन पैसों का एक बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगा देते हैं। उनके इस समाज सेवा की जज़्बे को समाज ने भी मान दिया। ऐसे लोग बेशक़ थोड़े हैं पर प्रेरणा के स्रोत है।
अपनी चाय की दुकान पर प्रकाश रॉव
उनके इसी कार्य से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे पिछले साल मुलाकात भी की थी। इस मुलाकात के बाद 30 मई 2018 को मन की बात कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने प्रकाश के बारे में बताते हुए कहा था कि उन्हें उड़ीसा स्थित कटक के पास एक चाय बेचने वाले डी प्रकाश राव से मुलाकात करने का मौक़ा मिला। पीएम मोदी ने ही प्रकाश के बारे में आगे बताते हुए यह कहा था कि वह पिछले 5 दशक से चाय बेच रहे हैं लेकिन वह जो काम कर रहे हैं उसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, प्रकाश रॉव के बारे में बताया कि वह चाय की आमदनी से आर्थिक रूप से कमज़ोर 70 से भी अधिक बच्चों को पढ़ाते हैं।
आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों को पढ़ाते डी प्रकाश रॉव
आपको बता दें कि प्रकाश पिछले 67 सालों से चाय बेचने का कार्य कर रहे हैं और वह अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों को पढ़ाने में लगाते हैं। रॉव अपने दम पर एक स्कूल भी चलाते हैं जहाँ जाकर वह झुग्गी के बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाते हैं। यही नहीं रॉव रोज़ अस्पताल जाते हैं, वहाँ भी मरीजों और उनके परिजनों की सेवा करते हैं और उन्हें गर्म पानी पहुँचाते हैं। ये सभी कार्य उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं। ज़रूरत पड़ने पर वह रक्तदान करने से भी पीछे नहीं हटते हैं।
प्रकाश के बारे में सबसे ख़ास बात यह है वह कभी स्कूल न जाने के बाद भी हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषा अच्छे से बोल लेते हैं। यही कारण है कि वह स्कूल के बच्चों के पसंदीदा अध्यापक हैं।
अगस्ता वेस्टलैड घोटाले में सह-आरोपी वकील गौतम खेतान को कालेधन और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ़्तार किया है। गौतम को ब्लैकमनी एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया। खेतान पर कानून का उल्लंघन करते हुए विदेशी खाते चलाने का आरोप है। कल खेतान को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया जाएगा। बता दें कि काले धन के मामले में ही खेतान के ठिकानों पर पिछले हफ़्ते भी आयकर विभाग ने छापेमारी कर कार्रवाई की थी।
Gautam Khaitan has been arrested by Enforcement Directorate (ED) in a case of black money under the Black Money Act. https://t.co/y66EcrX5Cx
बताया जा रहा है कि गौतम के नाम का खुलासा अगस्ता वेस्टलैंड मामले में बिचौलिया क्रिश्चियन मिशेल से पूछताछ के दौरान हुई। मिशेल ने ही ईडी को खेतान के कालेधन के बारे में जानकारी दी है। बता दें कि कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में हुए अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआइपी चॉपर घोटाले में भी खेतान का नाम सीबीआइ और ईडी की चार्जशीट में शामिल है।
इससे पहले भी अगस्ता मामले में सितंबर 2014, और दिसंबर 2016 में खेतान को गिरफ़्तार किया गया था। लेकिन, दोनों बार वो जमानत पर छूट गया था। खेतान की गिरफ़्तारी पर ईडी ने जानकारी दी है कि आयकर कानून का उल्लंघन करने के चलते खेतान पर ब्लैक मनी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करते हुए कालेधन के मामले में गिरफ़्तार किया गया है।
वहीं रिपोर्ट की मानें तो आयकर विभाग द्वारा कालाधन एवं कराधान अधिनियम 2015 की धारा 51 के तहत उसके ख़िलाफ़ एक मामला दर्ज किए जाने के आधार पर ईडी ने पीएमएलए के तहत एक नया आपराधिक मामला दर्ज किया है।
अगस्ता-वेस्टलैंड मामला क्या है?
भारतीय वायुसेना के लिए 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों की खरीद के लिए इटली की कंपनी अगस्ता-वेस्टलैंड के साथ साल 2010 में करार किया गया था। 3,600 करोड़ रुपये के करार को जनवरी 2014 में भारत सरकार ने रद्द कर दिया। जानकारी के लिए बता दें कि इस करार में 360 करोड़ रुपये के कमीशन के भुगतान का आरोप लगा था। इटली की कंपनी और सरकार के बीच के इस करार में कमीशन की ख़बर सामने आते ही 12 एडब्ल्यू-101 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की सप्लाई पर सरकार ने फ़रवरी 2013 में रोक लगा दी थी।
जीएसएलवी एमके-II की एक बेहद निराश कर देने वाली तस्वीर नीचे है। यह अप्रैल 15, 2010 को बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। अन्य की तुलना में यह अधिक पेलोड (भार) ले जाने की क्षमता रखता था, जिससे देश को बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं।
इस घटना में प्रमुख निराशा का कारण स्वदेशी तुषारजनिक (क्रायोजेनिक) रॉकेट इंजन की विफलता थी। क्रायोजेनिक इंजन सबसे शक्तिशाली रॉकेट इंजन होता है, जो भारी उपग्रहों को कक्षा तक ले जाने का एकमात्र तरीका है।
इसी तकनीक ने ही अमेरिका को चंद्रमा तक पहुँचने में मदद की है। क्रायोजेनिक इंजन में महारत हासिल करना ही भारत के लिए वैश्विक अंतरिक्ष क्लब जैसी बड़ी संस्था में प्रवेश करने का एकमात्र रास्ता था। बेशक, दुनिया में कोई भी हमें इस तकनीक को देने के लिए तैयार नहीं होता, ऐसे में हमें स्वयं ही इस तकनीक का पता लगाना था।
आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी यदि मैं आपको बताऊँ कि दशकों पहले, हमारे पास एक ऐसा असाधारण वैज्ञानिक था, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहा था? साथ ही यह कि उन्हें नौकरी से ‘देशद्रोही’ जैसे आरोप लगाकर निकाल दिया गया और हमारी तत्कालीन ‘सेक्युलर’ सरकार द्वारा उनका जीवन बर्बाद कर दिया गया? क्या आप उन लोगों को कभी माफ़ कर पाएंगे?
मिलिए इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायण से, जिन्हें कल (जनवरी 25, 2019) पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।
विद्वान और देशभक्त वैज्ञानिक नम्बी नारायणन
पीएसएलवी (PSLV) को याद करिए, जिसने वर्ष 2014 में मंगलयान को संचालित किया था और मंगल ग्रह पर भारतीय ध्वज लहराया था। पीएसएलवी, जिसने वर्ष 2008 में चंद्रयान को संचालित किया और इस बात की पुष्टि की कि चंद्रमा पर निश्चित रूप से पानी की बर्फ है।
जनवरी 5, 2014 को भारत ने अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाकर नया इतिहास रचा था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के बूते रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने का परीक्षण 100% ख़रा उतरा था। इस लम्बी छलांग के पीछे असल में कौन था? लेकिन उस दौरान पूरी खबरों में कहीं भी उस वैज्ञानिक का उल्लेख तक नहीं था। उस वैज्ञानिक का नाम है प्रोफैसर नम्बी नारायणन।
सबसे पहले 1970 में ‘तरल ईंधन रॉकेट’ तकनीक लाने वाले वैज्ञानिक रहे नम्बी नारायणन 1994 में इसरो में क्रायोजेनिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी थे। अफ़सोस की बात है कि उन्हें सत्ता और सियासत के षड्यंत्र का शिकार बनाया गया। जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय अलंकरण देकर सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसे ही जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया गया। उन्हें देश का गद्दार करार दिया गया। हमारे देश की विडम्बना है कि जो लोग देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौंसला रखते हैं, उनको किसी न किसी तरह से हतोत्साहित कर रोक दिया जाता है।
नम्बी नारायणन और उनके साथी डी. शशिकुमार को वर्ष 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट प्रौद्योगिकी शत्रु देशों को बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। तब मीडिया ने इन ख़बरों को बहुत उछाला था। मीडिया ने बिना जाँचे-परखे पुलिस की इस ‘थ्योरी’ पर विश्वास करके उन्हें राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रस्तुत किया था। पुलिस ने इसे सैक्स जासूसी स्कैंडल की तरह पेश किया था। सीआईए ने मालदीव की 2 ऐसी महिलाओं को तैयार किया जिनके पास ऐसे रहस्य थे, जिनकी जानकारी न पुलिस को थी, न मीडिया को।
PSLV ने हमें हमेशा गौरवान्वित किया है। पीएसएलवी रॉकेट स्वदेशी “विकास इंजन” पर चलता है और नम्बी नारायणन ने इसे बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
1990 के दशक में, नम्बी नारायणन भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक थे, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहे थे। इससे पहले, भारत ने रूस से इस तकनीक को खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिकियों ने पूरी लड़ाई लड़ी और इसे रोक दिया। स्वाभाविक है कि जिन लोगों के पास यह तकनीक होगी, वे अन्य देशों से ईर्ष्या के कारण इस तकनीक की रक्षा करेंगे।
अमेरिकी दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इन्कार कर दिया था। तब नम्बी नारायणन ने ही सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएँगे। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका ने साजिश रची और केरल की वामपंथी सरकार उसका हथियार बन गई।
हैरानी की बात तो यह है कि केन्द्र में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका भी संदिग्ध रही थी, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के ख़िलाफ़ साजिश पर ख़ामोशी अख्तियार कर ली थी। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट वर्णित थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भारत में ऊपर से नीचे तक के नेताओं और अफ़सरों को मोटी रकम पहुँचाती थी।
फिर, यह सब हुआ।
वर्ष 1994 में, नम्बी नारायणन पर अचानक जासूसी और विदेशी एजेंटों को रॉकेट सम्बंधित संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगाया गया था। उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, इसके साथ ही उनका करियर ख़त्म हो गया।
वर्ष 1994 में ही नम्बी नारायणन की गिरफ़्तारी के साथ, भारत के स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण का सपना दशकों पीछे चला गया। वर्ष 2010 के अंत तक, भारत उस क्रायोजेनिक इंजन को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा था।
क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण में सफलता आखिरकार जनवरी 2014 में मिली।
वर्ष 1994 और 2014 के बीच उन 20 वर्षों के लिए भारत को हुए इस नुकसान का भुगतान कौन करेगा? यक़ीनन कह सकते हैं कि ‘भारतीय धर्मनिरपेक्षता’ तो कभी भी नहीं कर सकती है।
जैसे-जैसे नम्बी नारायणन का मामला अदालत में लाया गया, मामले ने करवट लेनी शुरू की। सीबीआई ने स्वीकार किया कि आईबी ने इस केस को तैयार किया था।
वहीं वर्ष 1998 का ‘आउटलुक’ का यह लेख भी हमें बताता है कि सीबीआई ने जून 03, 1996 को अपनी रिपोर्ट में क्या कहा था।
“6 निर्दोष व्यक्तियों की गिरफ्तारी, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक पीड़ा हुई।” यह कितना बड़ा अन्याय है!
लेकिन अभी वाक़या और भी है।
इस नाम पर ध्यान दें: ‘आउटलुक’ के लेख के अनुसार, आर बी श्रीकुमार स्पष्ट रूप से जाँच में अपने कर्तव्य के निर्वहन मामले में निष्पक्ष रहने में असफल पाए गए थे।
लेकिन, हमने आर बी श्रीकुमार के बारे में और कहाँ सुना है?
यहाँ आप देख सकते हैं कि आर बी श्रीकुमार काफ़ी ‘प्रसिद्ध’ व्यक्ति हैं। जो अपनी ‘न्याय की ललक’ के लिए जाने जाते हैं।
कहानी यहीं पर ख़त्म नहीं होती, किस्सा अभी और भी है।
ये भी ज़रूर देखिए
अपने ‘शानदार’ करियर के दौरान, आर बी श्रीकुमार ने कई दिल जीते हैं। कई पुरस्कार और कई उपाधियाँ जीती हैं। अप्रैल 24, 2008 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित इस तस्वीर से एक लाज़वाब चीज देखने को मिली है। तस्वीर में बाईं ओर “सर्वोत्तम मलयालम पुलिस अधिकारी” का पुरस्कार प्राप्त करते हुए बी आर आर श्रीकुमार हैं। उन्हें पुरस्कार प्रदान करने वाला व्यक्ति है, CPI(M) राज्य सचिव पिनाराई विजयन, जो अब केरल राज्य के मुख्यमंत्री हैं। तस्वीर के बीच में मुस्कुरा रही हैं “मानवाधिकार कार्यकर्ता” तीस्ता सीतलवाड़।
इस पूरे तंत्र पर एक नज़र डालते हैं –
सिर्फ CPIM और पिनारई विजयन पर ही गुस्सा मत करिए। वर्ष 2011 में, कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री ओमन चांडी, जिन्होंने उस दौरान मात्र 43 दिनों के लिए कार्यालय सम्भाला, ने उन पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ सभी आरोप हटा दिए थे, जिन पर नम्बी नारायणन मामले में गलत कार्य, यानि कदाचार का आरोप लगाया गया था।
पुलिस अधिकारी सिबी मैथ्यू, जिनकी टीम उपरोक्त ‘जासूसी की कहानी’ लेकर आई थी, केरल के मुख्य सूचना आयुक्त बनने के लिए उठे और वो बने भी।
यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सबसे महत्वपूर्ण प्रकरण है।
इस बीच, नम्बी नारायणन अभी भी अपनी खोई हुई गरिमा और न्याय के लिए निरंतर लड़ रहे थे।
आखिरकार सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ₹50 लाख का मुआवजा देने की घोषणा की और साथ ही केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जाँच करने के लिए न्यायमूर्ति डी के जैन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई।
जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा था कि 76 वर्षीय नम्बी नारायणन का मामला मानसिक प्रताड़ना से जुड़ा है। इसलिए केरल सरकार 8 हफ्तों के भीतर उन्हें ₹50 लाख मुआवजा दे। अदालत ने कहा था कि केवल मुआवजा दिया जाना ही पूर्ण न्याय नहीं है। इसीलिए बेंच ने इस मामले में केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जाँच के लिए 3 सदस्यीय कमिटी का भी गठन किया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का यह दूसरा हिस्सा, जो केरल पुलिस अधिकारियों के करतबों के बारे में था, मीडिया की सुर्खियों में ज्यादा जगह नहीं बना सका। निश्चित रूप से भारतीय ‘धर्मनिरपेक्षता’ के कारणों से ही यह नहीं हो पाया।
वर्ष 2016 की शुरुआत में, मोदी सरकार ने जेएनयू में कुछ छात्र संगठनों के दुर्व्यवहारों पर नकेल कसी। उन ‘असंतुष्टों’ ने हर शहर में ‘उदारवादियों’ यानि तथाकथित ‘लिबरल’ लोगों की भीड़ को संबोधित किया और कम समय में ही एक जाना-पहचाना नाम बन गए। ये असंतुष्ट सेलिब्रिटी ‘Free Speech’ कार्यकर्ता बन गए। वास्तव में यह नालायक बेरोजगार ‘छात्रों’ का एक समूह मात्र है, जो कर अदा करने वाले लोगों के पैसे से लंबे समय तक जेएनयू में किसी ना किसी डिग्री लेने के बहाने बैठा रहता है।
देखिए कि इन नालायकों की तुलना में नम्बी नारायणन, जिस व्यक्ति के करियर और जीवन को भारतीय धर्मनिरपेक्षता के मुखौटे के तहत कुचल दिया गया, की इस कहानी को कितने लोग जानते हैं? उनका दोष यह है कि वह भारत के लिए रॉकेट इंजन बना रहे थे और ‘भारत के टुकड़े होंगे’ के नारे नहीं लगा रहे थे। जिस वजह से भारतीय ‘सेक्युलरिज़्म’ ने उन्हें समाप्त कर दिया।
लेकिन हम यह बताना तो भूल ही गए कि नम्बी नारायणन को प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अपनी डिग्री पूरी करने में मात्र 10 महीने ही लगे थे। मात्र 10 महीने? जेएनयू के ‘सेलेब्रिटी छात्रों’ ने अकेले टीवी स्टूडियो में ही 10 महीने से अधिक समय बिता दिया होगा।
लेकिन भारतीय ‘धर्मनिरपेक्षता’ ने नम्बी नारायणन को समाप्त कर दिया। जिस ‘क्रायोजेनिक इंजन’ पर वह काम कर रहे थे, उसके निर्माण में भारत को 20 साल लग गए, यह चौंका देने वाला तथ्य है। अपनी दिल दहला देने वाली दास्तान को वैज्ञानिक नम्बी नारायणन ने अपनी पुस्तक ‘रेडी टू फायर’ में लिखा है। देश के इस महान वैज्ञानिक के साथ साजिश के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी को छोड़ किसी ने भी आवाज नहीं उठाई थी। भाजपा सांसद और अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कुछ वर्ष पहले मीडिया के सामने पूरी साजिश का ख़ुलासा किया था।
यह गणतंत्र दिवस है। अर्थात भारत देश के ‘सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ को मनाने का एक क्षण, जैसा कि यह संविधान प्रस्तावना में ही वर्णित है। आपातकाल के समय ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा डाला गए थे। एक प्रचलित कहावत के अनुसार, सत्य आपको मुक्त कर देगा, लेकिन पहले, यह आपको परेशान करेगा।
ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने कल कई लोगों की निजी जानकारियों को सार्वजनिक कर दिया था। ये वैसे लोग थे, जिनके विचार प्रतीक सिन्हा से नहीं मिलते। फ़ैक्ट चेकिंग की आड़ में सिन्हा ने ऐसे लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक करते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों और जान लेने की धमकी देने वाले जिहादियों के लिए एक रास्ता दे दिया।
ऐसे लोगों की जानकारी बाहर आते ही इन सारे यूज़र्स को हत्या से लेकर तमाम तरह की हिंसक धमकियाँ मिलने लगीं, जो कि इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा सुनियोजित तरीके से चलाई जाती हैं। इनमें से एक यूज़र जिसका हैंडल @squintneon है, उसे लगातार ऑनलाइन जिहादियों से धमकियाँ दी जा रही हैं कि अब वो उसे पहचान सकते हैं और वो उसे छोड़ेंगे नहीं।
स्क्विंट नियॉन के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
स्क्विंट नियॉन ने लगातार ऐसे इस्लामी जिहादियों को एक्सपोज़ किया था, जिसके कारण, अब उसकी पहचान सार्वजनिक होने पर उसे ये आंतिकी विचारों वाले लोग ढूँढ रहे हैं। मुहम्मद ज़ुबैर नाम के सहयोगी के साथ प्रतीक सिन्हा ने डॉक्सिंग करते हुए जानबूझकर स्क्विंट नियॉन को इन ऑनलाइन जिहादियों के समक्ष ला दिया। ऐसा यह यूज़र मानता है और मिल रही धमकियों से यह साबित भी हो रहा है। उसने पहले ‘लव जिहाद’ जैसे विषयों पर लिखा था।
स्क्विंट नियॉन के 25 जनवरी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (अकाउंट सस्पैंड होने के कारण इम्बेड नहीं किया जा सकता)
उनका मानना है कि प्रतीक और ज़ुबैर जैसे लोगों को उनके ऐसे पोस्टों से परेशानी होने लगी थी, जहाँ ऐसे जिहादियों और आतंकी विचारों वाले लोगों को एक्सपोज़ किया जाने लगा था। यही कारण है कि प्रतीक सिन्हा ने निजी जानकारियों को पब्लिक कर दिया ताकि वो डर जाएँ और चुप होकर रहें।
इसके बाद अजीबोग़रीब तरीक़े से ट्विटर ने पीड़ित का ही अकाउंट सस्पैंड कर दिया है! जिस पीड़ित पर हिंसक हत्या से लेकर परिवार को भद्दी गालियाँ देते हुए कई ट्विटर अकाउंट साफ़ दिख रहे हैं, उसी को ट्विटर ने सस्पैंड कर दिया है। ट्विटर की कार्यप्रणाली लोगों की समझ से बाहर है, जहाँ उस व्यक्ति को कोई कुछ नहीं कह रहा, जिसने किसी व्यक्ति की प्राइवेसी पर हमला किया, हत्या की धमकियाँ दिए जाने का कारण बना, सोशल मीडिया पर बेशर्मी से उसे परेशान किया।
कई लोगों ने इस बात पर ट्विटर और ट्विटर इंडिया को ज़लील किया कि ये पहली बार नहीं है जब ट्विटर ने कन्ज़र्वेटिव विचार रखने वालों का पक्ष लिया है। ट्विटर का ये व्यवहार कट्टरपंथियों की तरफ़ पूरी तरह बायस्ड है। ट्विटर के सीईओ तो ये कह कर पहले भी फँस चुके हैं कि उनके स्टाफ़ वामपंथ से प्रभावित हैं।
भाजपा के सांसद महेश गिरी ने भी ट्विटर के इस बर्ताव पर सवाल पूछा कि आखिर पीड़ित को ही सस्पैंड करने के पीछे उनकी क्या मंशा है?
Hello @TwitterIndia, Why has @squintneon been suspended? Just yesterday Congress trolls targeted one of their alleged admins & today the handle is suspended. Are you too playing from their side? @misskaul@PayalKamat
और तो और, एक ट्विटर यूज़र ने (जो प्रतीक सिन्हा की डॉक्सिंग का शिकार बन चुके हैं) बताया कि उनके द्वारा कई बार ज़ुबैर, ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक, को रिपोर्ट किया जा चुका है, और ट्विटर ने ये बात भी मानी की उनके ट्वीट ट्विटर के नियमों का उल्लंघन करते हैं, फिर भी कोई एक्शन नहीं लिया गया।
I have more than 10 such replies from twitter saying Zubair was found violating rules of twitter but they never took any action. pic.twitter.com/Mp4d9KhEVL
प्रतीक सिन्हा ने जो किया है, वो निम्न स्तर का घटिया व्यवहार है जहाँ निजी खुन्नस के कारण उसने एक नवयुवक को जिहादियों की हिंसक विचारों के सामने ला खड़ा किया है। प्रतीक सिन्हा वामपंथी गिरोह के आँख का तारा है, जिसने तमाम लोगों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों पर हमला किया है। ट्वीटर ने इस नवयुवक का अकाउंट सस्पैंड करके बता दिया है कि वैचारिक स्वतंत्रता सिर्फ़ उन्हीं के लिए है, जो उनकी भाषा में, उनके विचारों को सहमति देते हैं।
बात लगभग 1995 के दौर की है, सत्ता की कुर्सी को लेकर केरल की कॉन्ग्रेस में भीतरी घमासान चल रहा था। उस दौर में मुख्यमंत्री के करुणाकरण के सुपुत्र ने अपने पिता के गुट के कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं का अपमान कर दिया था और विरोधी गुट के ए के एंटनी, इसका फ़ायदा उठाते हुए ख़ुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। एंटनी के क़रीबी थे ओमन चंडी जो उस समय करुणाकरण के मंत्रालय में वित्त मंत्री थे।
करुणाकरण की ख़ास बात ये थी कि उनकी पुलिस विभाग में ख़ासी पहुँच और बड़ा रसूख था। रमन श्रीवास्तव (आईजी) जैसे अफ़सर उनके क़रीबी हुआ करते थे। पर अफ़सोस, अच्छे से अच्छे लोगों के भी विरोधी तो होते ही हैं और उस समय के एक डीआईजी सीबी मैथ्यूज (जो ओमन चंडी के करीबी थे) की रमन श्रीवास्तव से पटती नहीं थी।
मैथ्यूज को पता था कि रमन श्रीवास्तव के रहते वो डीजीपी नहीं बन सकते। तो करुणाकरण को सिंहासन से उखाड़ फेंकने की योजना बनी। इसी दौर में वहाँ आईबी के एडिशनल डायरेक्टर रतन सहगल थे जिन्हें बाद में सीआईए का एजेंट पाए जाने पर और इसरो के क्रायोजेनिक इंजन प्रोग्राम को बर्बाद करने कि उनकी साज़िशों का भंडाफोड़ होने पर उन्हें आईबी से निकाल बाहर किया गया था। रतन सहगल के सहयोगी थे आर बी श्रीकुमार, जो पहले से एंटनी गुट के क़रीबी थे और करुणाकरण सरकार को गिराने की साज़िश में शामिल भी थे।
मालदीव की मरियम रशीदा इसी वक़्त अपना वीज़ा बढ़वाने सीनियर इंस्पेक्टर विजयन के पास पहुँची। मौक़े का फ़ायदा उठाकर विजयन ने बदले में उनके सामने कुछ अनुचित ‘माँगें’ रखी। फ़लस्वरूप, रशीदा ने विजयन को झिड़का ही नहीं बल्कि आईजी से उनकी शिक़ायत करने की बात भी कह दी।
इतने ढेर सारे नाम सुनने पर शायद आपको आर बी श्रीकुमार का नाम जाना पहचाना-सा लगा होगा? ये वही हैं जिन्होंने बाद में मोदी पर 2002 के दंगों का फ़र्ज़ी आरोप लगाया था। आजकल ये आपको आम आदमी पार्टी की टोपी लगाए दिख जाएँगे। इतने लोगों के साथ आ जाने पर ये तय हो गया था कि मालदीव की कुछ औरतों, एक आईपीएस अफ़सर और कुछ इसरो के वैज्ञानिकों की कीमत पर जाल बुना जा सकता है।
अमेरिका भारत को क्रायोजेनिक तकनीक देने से मना कर चुका था और रूस से भी अब कोई उम्मीद नहीं थी। फिर भी, नाम्बी नारायणन और शशि कुमार इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। जालसाज़ों को इतना पता था कि इनके ना होने से ये क्रायोजेनिक इंजन का प्रोग्राम डूबेगा और भारत का अन्तरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रम कई साल पीछे चला जाएगा।
एक दिन सुबह अचानक ख़बर आनी शुरू हुई कि मालदीव की दो सुंदरियों मरियम रशीदा और फव्जिया हसन ने भारत के दो वैज्ञानिकों को हनी ट्रैप में फँसा लिया है। ज़िस्म और कुछ लाख डॉलर के बदले में इन वैज्ञानिकों ने भारत के क्रायोजेनिक इंजन का प्रोग्राम बेच डाला था!
मलयालम मीडिया से शुरू हुई इस ख़बर को राष्ट्रीय मीडिया में भी जगह मिली। फिर बी ग्रेड की फिल्मों जैसा कथानक लिखने वालों की ख़ोज हुई और मालदीव की औरतों, वैज्ञानिकों और मुख्यमंत्री के क़रीबी कहे जाने वाले बड़े पुलिस अधिकारियों की मसालेदार कहानियाँ गढ़ी गयीं। थोड़े ही दिन में लोगों को भी लगने लगा कि इसरो के इस जासूसी काण्ड में मुख्यमंत्री की भी मिली भगत है। आईजी रमन श्रीवास्तव और करुणाकरण पर शिकंजा कसने लगा।
लगातार अख़बारों में आती ख़बरों के मद्देनजर हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और ओमन चंडी ने इसी वक़्त इस्तीफ़ा दे दिया। आख़िरकार करुणाकरण को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा और एंटनी मुख्यमंत्री बने। उन्हें पता था कि मामला तो कुछ है ही नहीं इसलिए केस सीबीआई को सौंप दिया गया।
नारायणन और शशि कुमार की घनघोर भर्त्सना हुई। ऑटो रिक्शा वाले तक नारायणन की पत्नी को पहचानकर बिठाने से इनकार करने लगे। यहाँ तक कि उनके बच्चों को भी जासूस-गद्दार का बच्चा बताया गया। सीबीआई ने जाँच शुरू की तो पहले ही हफ़्ते में पता चल गया कि शुरूआती सबूत ही फ़र्ज़ी हैं और इसमें कोई मुक़दमा नहीं बनता। फिर भी, मीडिया में वैज्ञानिकों के घर से काफ़ी नगद मिलने की ख़बरें उड़ाई गयी जो कि सीबीआई को कभी मिली ही नहीं थी।
सीबीआई ने अदालत में कहा कि ये केरल पुलिस की काफ़ी सोची समझी साज़िश थी। केरल पुलिस के सीबी मैथ्यूज, विजयन और के के जोशुआ के अलावा आईबी के आर बी श्रीकुमार पर मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश सीबीआई ने कर दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को रिहा किया और केरल सरकार को पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई करने कहा।
सीबी मैथ्यूज को ओमन चंडी ने मुख्यमंत्री बनने पर चीफ़ इनफार्मेशन कमिश्नर बनाया। रतन सहगल भारत के परमाणु कार्यक्रम सम्बन्धी राज सीआईए को बेचते पकड़े गए और वो यूएसए भाग गए। आपको आर बी श्रीकुमार तीस्ता शीतलवाड के बगल में बैठे नजर आ जाएँगे। एंथनी तो भारत के रक्षा मंत्री ही हो गए और उनके बाद इस सरकार की शुरुआत में सेना के पास बीस दिन का गोला-बारूद था। हाँ, दोनों वैज्ञानिक फिर से शोध में नहीं गए और उन्हें क्लर्क वाला काम थमा दिया गया।
आप समझ सकते हैं कि इससे भारत के अन्तरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रम का क्या हुआ होगा? शायद वो अंदाज़ा लगाना अब मुश्किल नहीं है।
हाल ही में, 2017 में जब कॉन्ग्रेस अन्तरिक्ष में जाने वाले क्रायोजेनिक इंजन का श्रेय लूट रही थी तो उन्होंने भारत को ये नहीं बताया था कि एक मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए उन्होंने भारत के इस सपने का क्या किया था?
भारत सरकार ने नारायणन को उनके वैज्ञानिक शोध के लिए पद्म सम्मान देने का फ़ैसला किया है। उनके शोध को छोड़ भी दें, तो राजनैतिक षड्यंत्रों से इतनी लम्बी लड़ाई लड़कर जीतने वाले के सम्मान में तालियाँ तो बनती ही हैं!
स्मृति ईरानी की शिक्षा पर सवाल खड़े करने वाले लोगों के लिए टि्वटर पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। यह वीडियो कॉन्ग्रेस पार्टी की नेता और मंत्री इमरती देवी की है। इस वीडियो के बारे में बताने से पहले हम आपको बता दें कि इमरती देवी कॉन्ग्रेस पार्टी की नेता हैं और मध्य प्रदेश में महिला एवं बाल विकास मंत्री के पद पर आसित हैं।
एएनआई द्वारा जारी की गई इस वीडियो में इमरती देवी गणतंत्र दिवस पर बोली जाने वाली स्पीच पढ़ते हुए हकलाती हुई नजर आईं। उन्हें अपनी स्पीच को पढ़ने के दौरान जब ‘करती और करता’ में फर्क नहीं पता चला तो उन्होंने अपने आगे के भाषण को कलेक्टर साहब को बोलने को कह दिया।
इस मामले को भले ही कॉन्ग्रेस सरकार हल्के में ले ले लेकिन यह बेहद शर्मनाक बात है कि जिस पार्टी के नेता दूसरी पार्टी के नेता और मंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते रहे हैं, उसी की सरकार में मंत्री पद पर आसित एक मंत्री इस तरह का बर्ताव करती सार्वजनिक स्थल पर दिखाई दे।
हाँलाकि, इस वीडियो के बाद एएनआई ने एक और ट्वीट किया है जिसमें इमरती देवी ने अपने इस बर्ताव के पीछे का कारण बताया है। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों बीमार होने की वजह से वो बोल नहीं पाईं और उनकी जगह कलेक्टर साहब बोलेंगे।
Madhya Pradesh Minister Imarti Devi: I was sick for the past two days, you can ask the doctor. But it is okay. the collector read it (the speech) properly. pic.twitter.com/JDQGI9WDuR
अभी कुछ समय पहले इमरती देवी का एक बयान आया था जिसमें वह अपने मंत्रालय को लेकर कितनी संतुष्ट हैं, उसका जवाब दे रही थी। संवाददाताओं से बातचीत में प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी का कहना था कि उन्हें उन्हें ये पद और विभाग पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिलवाया है, यदि वह उन्हें झाड़ू भी पकड़ा देंगे तो इमरती देवी बेहद खुश होंगी।
भारत आज अपना 70वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। गणतंत्र दिवस के इस ख़ास मौक़े पर आज हम इतिहास के पन्नों से कुछ जानकारी आपसे साझा करेंगे जिसका सीधा संबंध हमसे और हमारे देश से है।
उत्तर प्रदेश के सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ के सिंहों को 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता मिली थी। ये दहाड़ते हुए सिंह धर्म चक्र प्रवर्तन के रूप में दृष्टिमान हैं। बुद्ध ने वर्षावास समाप्ति पर भिक्षुओं को चारों दिशाओं में जाकर लोक कल्याण हेतु ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ का आदेश दिया था, जो आज सारनाथ के नाम से विश्विविख्यात है। इसलिए यहाँ पर मौर्य साम्राज्य के तीसरे सम्राट व सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने चारों दिशाओं में गर्जना करते हुए शेरों को बनवाया था।
सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए स्तम्भों में सारनाथ के स्तम्भ को सबसे बेहतर माना जाता है। इसमें सबसे ऊपर चारों दिशाओं में चार सिंह बने हुए हैं। यह चुनार के बलुआ पत्थर के लगभग 45 फुट लंबे प्रस्तरखंड का बना हुआ है। सिंहों की आकृति बेहद सौम्य प्रतीत नज़र आती है, इसमें उनकी माँसपेशियों, उनके बालों और शारीरिक बारीकियों को बेहद कुशलता के साथ पत्थर पर उकेरा गया है। इन सिंहों के नीचे एक पट्टी पर चारों दिशाओं में चक्र बने हुए हैं, इन चक्रों में 32 तीलियाँ हैं। इन्हीं तीलियों को धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रतीक माना जाता है।
बता दें कि हमारे राष्ट्रीय झंडे के बीच में जो अशोक चक्र का चिह्न विद्यमान है वो अशोक के स्तम्भ से ही लिया गया है। नीचे वाली पट्टी में चार पशु जिनमें हाथी, घोड़ा, बैल और सिंह बने हुए हैं वो देखने में संजीवता का आभास कराते हैं। अशोक द्वारा बनाए गए स्तम्भ सम्राट अशोक की शक्ति का प्रतीक भी माने जाते हैं। इन सभी स्तम्भों की ख़ासियत यह है कि इन्हें एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इसलिए इन्हें एकाश्म (Monolithic) स्तम्भ भी कहा जाता है।
सारनाथ के सिंह स्तम्भ का ऊपरी हिस्सा या शीर्ष सारनाथ में पुरात्तव विभाग के संग्राहलय में रखा हुआ है और उसका बाक़ी हिस्सा या स्तम्भ संग्रहालय के पास ही में सारनाथ स्तूप के पास रखा गया है। सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए सभी स्तम्भ भारतीय कला का अद्भुत नमूना हैं। प्राचीन भारतीय विज्ञान और कला का बेजोड़ उदाहरण हैं।
इन स्तम्भों की ख़ासियतों में
एक और ख़ास बात यह है कि इनकी चमकदार पॉलिश आज भी वर्षों बाद जस की तस बरक़रार है।
सारनाथ के क़रीब 70 किलोमीटर दूर चुनार की खदानों में मिलने वाले बलुआ पत्थर से
बनाए गए इस स्तम्भ में पत्थर की काली चित्तियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं बावजूद इसके
इस स्तम्भ पर लाई गई चमक का आख़िर क्या राज़ है वो आज भी किसी को नहीं मालूम।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस बलुआ पत्थर को चमकाने की कला ईरान से भारत आई है जबकि कुछ का मानना है कि यह कला भारत में पहले से ही विद्यमान थी। इतिहासकारों के अनुसार मौर्यकाल में चुनार पत्थर की कला को काफी प्रोत्साहन मिला था और मौर्य दरबार द्वारा इसे पूर्णत: संरक्षण भी प्राप्त था। अशोक सम्राट ने प्रमुख राजपथों व मार्गों पर भी धर्म लेख आदि स्थापित करवाए थे। ऐसा करने के पीछे देश की प्रजा को धार्मिक आचरण से अवगत कराने का उद्देश्य था। बता दें कि अशोक संसार के उन सम्राटों में से एक थे जिन्होंने धर्म-विजय के द्वारा संपूर्ण देश और पड़ोसी देशों में अहिंसा, शांति, मानव कल्याण और आपसी प्रेम का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया।
सम्राट अशोक के समय में धार्मिक प्रचार से कला को काफ़ी बढ़ावा मिला था। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए, नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए धर्म लेखों का सहारा लिया था। इन धर्म लेखों को पर्वत शिखाओं, पत्थर के खंभों और गुफ़ाओं में अंकित किया जाता था। अशोक ने अपने धर्म लेखों के अंकन के लिए ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उपयोग किया और पूरे देश में बड़े स्तर पर लेखनकला का प्रचार-प्रसार हुआ।
धार्मिक स्थापत्य और मूर्तिकला का अभूतपूर्व विकास भी अशोक के राज में ही हुआ। परंपरा के अनुसार सम्राट अशोक ने अपने तीन वर्ष के अंतर्गत लगभग 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया। सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में लगभग 30 स्तम्भों का निर्माण करवाया जो भारत के अलग-अलग हिस्सों में आज भी मौजूद हैं। इनमें वैशाली, प्रयागराज, दिल्ली, चेन्नई, सारनाथ और लुम्बिनी जैसे स्थान शामिल हैं।
केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, समाजसेवी नाना जी देशमुख (मरणोपरांत) और साथ ही असम के गायक भुपेन हजारिका (मरणोपरांत) को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की घोषणा की है। जिसके बाद से कई दिग्गजों की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली। प्रतिक्रियाओं की इस सूची में एक नाम प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी का भी है।
पिता को भारत रत्न मिलने की घोषण पर अभिजीत मुखर्जी ने अपनी प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि देश ने उनके पिता को ये सम्मान उनके काम के लिए दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा उनके पिता को दिए जाने वाला ये सम्मान राजनैतिक विचारधाराओं से ऊपर उठकर दिया गया है।
अभिजीत ने अपने पिता के बारे में कहा कि उनके पिता (प्रणब मुखर्जी) ने अपने 50 साल के सार्वजनिक जीवन में कई काम किए। उन्होंने इस बात को भी स्वीकारा कि राजनीति में आलोचनाएँ तो होती ही हैं, लेकिन कुछ फ़ैसले कभी भी राजनीति से प्रेरित नहीं होते हैं।
अभिजीत ने कहा कि वो अपने पिता को मिलने वाले सम्मान पर प्रतिक्रिया बतौर बेटे के रूप में दे रहे हैं न कि कॉन्ग्रेसी नेता के रूप में। इस सम्मान के लिए अभिजीत ने अधिक खुशी इसलिए भी ज़ाहिर की क्योंकि ये एक कॉन्ग्रेसी का सम्मान है।
आजतक से हो रही अपनी इस पूरी बातचीत में अभिजीत ने बताया कि वो और उनका परिवार कॉन्ग्रेसी है। अपनी ओर इशारा करते हुए उन्होंने बताया कि प्रणब मुखर्जी की तीसरी पीढ़ी इस वक्त कॉन्ग्रेसी है।
प्रणव मुखर्जी के बेटे के बाद उनकी बेटी शर्मिष्ठा ने भी अपने पिता को मिलने वाले सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर खुशी को जताते हुए कहा कि यह समय उनके और उनके परिवार के लिए बेहद आनंद और गर्व का क्षण है।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विनम्रता से देश की जनता के प्रति आभार प्रकट करते हुए ट्वीट किया और कहा कि वो हमेशा ऐसा मानते रहे हैं कि देश की जनता ने उन्हें, उनके द्वारा जनता की सेवा से कहीं ज़्यादा सम्मान और प्यार दिया है:
It is with a deep sense of humility and gratitude to the people of India that I accept this great honour #BharatRatna bestowed upon me. I have always said and I repeat, that I have got more from the people of our great country than I have given to them.#CitizenMukherjee
इसके साथ ही पीएम मोदी ने भी इन तीनो शख्सियतों को मिलने वाले सम्मान पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रणब दा अपने समय के बेहतरीन व्यक्तित्व हैं। पीएम ने कहा कि प्रणब मुखर्जी ने दशकों तक देश की निस्वार्थ बिना थके सेवा की है। हमारे देश के विकास पथ में उनका गहरा योगदान है। पूर्व राष्ट्रपति की तारीफ करते हुए पीएम ने कहा कि उनके ज्ञान और मेधा की बराबरी कुछ ही लोग कर पाते हैं।
Pranab Da is an outstanding statesman of our times.
He has served the nation selflessly and tirelessly for decades, leaving a strong imprint on the nation’s growth trajectory.
His wisdom and intellect have few parallels. Delighted that he has been conferred the Bharat Ratna.