क्या आपने कभी सोचा है कि नक्शे पर खिंची चंद लकीरें किसी देश की किस्मत और पूरी दुनिया का भूगोल कैसे बदल सकती हैं? फरवरी 2026। इस तारीख को नोट कर लीजिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल की जमीन पर कदम रखते हैं और यरूशलेम से एक ऐसी खबर निकलती है जो इस्लामाबाद से लेकर बीजिंग और तेहरान तक हड़कंप मचा देती है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक शब्द इस्तेमाल करते हैं, ‘हेक्सागोन एलायंस’।
एक ऐसा गठबंधन जिसके केंद्र में भारत है। लेकिन ये कोई मामूली दोस्ती नहीं है। ये जवाब है 2025 के उस खूनी मंजर का जब भारत-पाकिस्तान और इजरायल-ईरान के बीच मिसाइलों ने आसमान काला कर दिया था।
आज के इस एनालिसिस में हम उस ‘सीक्रेट ब्लूप्रिंट’ को डिकोड करेंगे जो भारत को दुनिया का ‘Net Security Provider’ बनाने जा रहा है। कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि भू-राजनीति (Geopolitics) का ये खेल अब अगले लेवल पर पहुँच चुका है।
हेक्सागन अलायंस का जन्म – क्यों और कैसे?
इजरायली कैबिनेट कीरविवार बैठक में नेतन्याहू ने रविवार (22 फरवरी 2026) भारत को महत्वपूर्ण आधार बताया। यानी एक बहुत जरूरी स्तंभ। उनके विजन में ये ‘हेक्सागन’ 6 इलाक़ों को जोड़ता है। लेकिन सवाल ये है कि इजरायल को अचानक इस सुरक्षा घेरे की जरूरत क्यों पड़ी? यहाँ नेतन्याहू ने दो बड़े खतरों का जिक्र किया है।
इन दोनों के बीच में फँसा इजरायल अब अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका के भरोसे नहीं रहना चाहता। उसे चाहिए एक ऐसी महाशक्ति जिसके पास मैनपावर भी हो, मार्केट भी और तकनीक को अडॉप्ट करने की भूख भी। और वो शक्ति है सिर्फ भारत।
2025 का वो ‘सामरिक मोड़’ जिसने सब बदल दिया
इतिहास गवाह है कि बड़े गठबंधन युद्ध की कोख से पैदा होते हैं। हेक्सागन अलायंस के पीछे 2025 की दो ऐसी घटनाएँ हैं जिन्होंने भारत और इज़रायल की रातों की नींद उड़ा दी थी।
ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025): आपको याद होगा भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक भयानक झगड़ा चला। भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के गुनहगारों को निपटने के लिए पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारा।
भारत ने अपनी संप्रभुता बचाई, दुनिया को संदेश भी दिया कि भारत आज कितना बदल गया है। लेकिन इस सबके बीच एक कड़वा सच भी सामने आया और वो था चीन की टेक्नोलॉजी। पाकिस्तान के J-10C लड़ाकू विमानों और PL-15 मिसाइलों ने हमारी वायुसेना को कड़ी टक्कर दी। हमें एहसास हुआ कि अब पारंपरिक हथियारों से काम नहीं चलेगा। हमें चाहिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच।
ऑपरेशन राइजिंग लायन (जून 2025): इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों का सीधा युद्ध। ईरान ने 500 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इजरायल का ‘आयरन डोम’ तो कामयाब रहा, लेकिन ईरान ने ये साबित कर दिया कि वो इजरायल के घर में घुसकर चोट कर सकता है।
इन दोनों देशों ने एक ही चीज सीखी – दुश्मन के पास चीनी और ईरानी तकनीक का घातक कॉम्बिनेशन है। इसका जवाब अकेले देना संभव नहीं है।
‘इस्लामिक नाटो’ का उदय – भारत की घेराबंदी?
लेकिन कहानी में एक और ट्विस्ट है। सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक ‘स्ट्रटीजिक म्यूचूअल डिफेन्स अग्रीमेंट’ (Strategic Mutual Defence Agreement) (SMDA) साइन किया। जानकारों ने इसे ‘इस्लामिक नाटो’ का नाम दिया।
परमाणु कवर: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इशारा किया कि उनके न्यूक्लियर हथियार अब सऊदी की रक्षा के लिए भी हैं।
चीनी पैठ: पाकिस्तान के जरिए चीन के खतरनाक हथियार अब खाड़ी देशों (Gulf countries) के बाजारों में पहुँच रहे हैं।
अब समझिए, एक तरफ चीन-पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की का गठजोड़ बन रहा है, तो दूसरी तरफ भारत को अपना ‘काउंटर-बैलेंस’ तैयार करना ही था। हेक्सागन अलायंस वही जवाबी हमला है।
हेक्सागन के 6 स्तंभ – कौन, कहाँ और क्यों?
ये गठबंधन कोई कागजी शेर नहीं है। इसके हर सदस्य की अपनी एक ‘Superpower’ है। आप इस चार्ट को देखिए:
Pillar
मुख्य खिलाड़ी
रणनीतिक भूमिका
दक्षिण एशिया
भारत
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व, विशाल सेना और आर्थिक गहराई।
पश्चिम एशिया
इजरायल
कटिंग-एज मिलिट्री टेक, मोसाद का खुफिया नेटवर्क।
भूमध्य सागर
ग्रीस और साइप्रस
यूरोप के लिए समुद्री दरवाज़ा और गैस पाइपलाइन का रास्ता।
अरब वर्ल्ड
UAE
भारी-भरकम निवेश और अब्राहम समझौते की ताक़त।
अफ्रीका
इथियोपिया
लाल सागर (Red Sea) की सुरक्षा और समुद्री डकैती पर लगाम।
पूर्वी एशिया
नाम गोपनीय
सप्लाई चेन और चिप मैन्युफैक्चरिंग का सपोर्ट।
इस चार्ट से यही मैसेज दिखता है कि ‘हेक्सागन अलायंस’ असल में एक ऐसी तगड़ी टीम है जहाँ हर खिलाड़ी का अपना खास रोल है। इसमें भारत अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था और रुतबे के साथ लीडर की भूमिका में है, क्योंकि भारत न केवल एक सैन्य शक्ति है, बल्कि पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच IMEC नाम के आर्थिक गलियारे के रूप में भी काम करता है। ऐसे ही इज़रायल अपनी घातक मिसाइल टेक्नोलॉजी और जासूसी नेटवर्क (Intelligence) के साथ इस टीम का ‘मास्टरमाइंड’ है।
UAE इसमें पैसा और सामान पहुँचाने के रास्ते (Logistics) संभाल रहा है, जबकि ग्रीस और साइप्रस यूरोप के लिए समुद्री रास्ता खोलते हैं। साथ ही, इथियोपिया समुद्र में जहाजों की सुरक्षा देखता है और एक सीक्रेट एशियाई देश टेक्नोलॉजी की सप्लाई चेन को मज़बूत बनाता है।
मिशन सुदर्शन चक्र – भारत बनेगा अभेद्य
प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा का सबसे बड़ा फायदा 8.6 बिलियन डॉलर (करीब 72,000 करोड़ रुपए) का रक्षा समझौता है। लेकिन इसे सिर्फ हथियारों की शॉपिंग मत समझिए, यह असल में ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ की नींव है। पीएम मोदी ने लाल किले से जिस मिशन का ऐलान किया था, उसका मकसद भारत के ऊपर आसमान में एक ऐसी अदृश्य दीवार खड़ी करना है जिसे कोई भी दुश्मन पार न कर सके।
इसमें इज़रायल हमारा सबसे बड़ा पार्टनर है, जो भारत को एक ऐसा स्मार्ट डिफेंस सिस्टम बनाने में मदद करेगा जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से चलेगा और पलक झपकते ही दुश्मन की मिसाइल या ड्रोन को हवा में ही ढेर कर देगा।
भारत अब इज़रायल से ऐसी ‘टॉप सीक्रेट’ टेक्नोलॉजी ले रहा है जो इजरायल ने आज तक अपने सबसे खास दोस्तों को भी नहीं दी। यह सिर्फ हथियारों का सौदा नहीं है, ये एक तरह से तकनीक की पूरी चाबी भारत को सौंपने जैसा है। इसका मतलब है कि ये हथियार अब भारत की अपनी फैक्ट्रियों में बनेंगे।
इसमें तीन कमाल की चीजें शामिल हैं
आयरन बीम (Iron Beam): यह एक ‘लेजर गन’ है। जहाँ दुश्मन के ड्रोन को गिराने में पहले करोड़ों की मिसाइल खर्च होती थी, अब महज़ 250-300 रुपए ($3) की बिजली खर्च करके दुश्मन का करोड़ों का ड्रोन राख हो जाएगा।
एरो और डेविड स्लिंग: ये लंबी दूरी के वो शिकारी हैं जो चीन या पाकिस्तान से आने वाली बड़ी से बड़ी मिसाइलों को रास्ते में ही खत्म कर देंगे।
AI नेटवर्क ग्रिड: यह पूरे देश के रक्षा सिस्टम के लिए एक ‘सुपर ब्रेन’ जैसा है। हज़ारों रडार और सेंसर मिलकर पलक झपकते ही बता देंगे कि खतरा कहाँ है और खुद ही एक्शन लेंगे।
आर्थिक गलियारा और ‘पैक्स सिलिका’
आज के समय में जंग सिर्फ सरहदों पर नहीं, बाज़ारों में भी लड़ी जाती है। हेक्सागन अलायंस का आर्थिक इंजन है IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor)। ये रास्ता पाकिस्तान को बाईपास करके भारत को सीधा यूरोप से जोड़ता है।
और इसके ऊपर एक नया मास्टर स्ट्रोक है- ‘पैक्स सिलिका’ । 20 फरवरी 2026 को भारत ने अमेरिका के इस टेक-गठबंधन पर साइन किए। इसका मकसद क्या है? सेमीकंडक्टर और एआई की दुनिया से चीन की दादागिरी खत्म करना।
‘पैक्स सिलिका’ असल में दुनिया की नई ‘टेक्नोलॉजी वाली शांति’ का नाम है, जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है और भारत इसमें एक मुख्य खिलाड़ी बनकर उभरा है। इसका सबसे बड़ा मकसद हाई-टेक दुनिया, खासकर सेमीकंडक्टर (चिप्स), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जरूरी खनिजों (Critical Minerals) की सप्लाई चेन से चीन के दबदबे को खत्म करना है।
आसान शब्दों में कहें तो, यह लोकतांत्रिक देशों का एक ऐसा ‘डिजिटल क्लब’ है जो यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भविष्य की सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी पर किसी एक तानाशाह देश का कब्जा न हो। भारत के लिए इसमें शामिल होने का मतलब है, देश में चिप बनाने वाली बड़ी फैक्ट्रियों का आना, AI के क्षेत्र में दुनिया का लीडर बनना और अपनी ‘डिजिटल संप्रभुता’ को सुरक्षित करना।
यानी, इजरायल की सॉफ्टवेयर पावर और भारत की इंजीनियरिंग मिलकर एक ऐसा ‘डिजिटल किला’ बना रहे हैं जिसे भेदना बीजिंग के लिए नामुमकिन होगा।
चुनौतियाँ और ‘ग्रे जोन’ – क्या सब कुछ इतना आसान है?
लेकिन थोड़ा सा रुकिए। जैसे हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, कुछ-कुछ उसी तरह से हेक्सागन अलायंस के रास्ते में कुछ कांटे भी हैं। जैसे:
ईरान फैक्टर: भारत ने इस साल चाबहार बंदरगाह के लिए बजट नहीं दिया, जिससे ईरान कुछ हद तक नाराज है। अगर हम पूरी तरह इज़रायल के पाले में जाते हैं, तो क्या हम अपना ‘नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर’ खो देंगे?
ICC का नेक्सस: ग्रीस और साइप्रस इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के सदस्य हैं। ICC ने नेतन्याहू के खिलाफ वारंट जारी किया है। ऐसे में ये देश गठबंधन की मीटिंग कैसे करेंगे? ये एक बड़ा कानूनी सिरदर्द है।
धार्मिक नैरेटिव: पाकिस्तान इसे ‘मुस्लिम उम्माह’ के खिलाफ साजिश बता रहा है। भले ही UAE भारत के साथ है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कट्टरपंथ को भड़काना पाकिस्तान का पुराना खेल है।
नया भारत, नई व्यवस्था
ये हेक्सागन अलायंस बताता है कि भारत अब स्ट्रटीजिक औटोनोमी (Strategic Autonomy) के खोल से बाहर निकलकर स्ट्रटीजिक रीलिज़म (Strategic Realism) की ओर बढ़ चुका है। हम अब सिर्फ शांति की बातें नहीं करते, हम शांति को सुरक्षित करने के लिए ताकतवर गठबंधन बनाना जानते हैं।
कुछ सवाल इस अलायंस के साथ जरूर जुड़े हैं। जैसे कि क्या भारत इस गठबंधन के जरिए चीन और पाकिस्तान के ‘इस्लामिक नाटो’ को मात दे पाएगा? या हम पश्चिम एशिया की उस आग में कूद रहे हैं जहाँ से निकलना मुश्किल होगा?
आजादी के महान नायकों में से एक वीर सावरकर की पुण्यतिथि (26 फरवरी ) पर आज के समय को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा जरूरी है। वो चर्चा है भारत और इजरायल को लेकर। हिंदुओं की पुण्यभूमि और यहूदियों की पुण्यभूमि को लेकर। वैसे भी, उनकी जिंदगी और काम देश की आजादी की लड़ाई और अपनी सभ्यता को मजबूत करने से बहुत गहरे जुड़े हैं।
चूँकि पीएम मोदी भी इजरायल के महत्वपूर्ण दौरे पर रहे। ऐसे में ये सही समय है, जब उनकी सोच के महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा की जाए। वैसे भी, भारत और इजरायल की दोस्ती मौजूदा समय में दो देशों, दो सभ्यताओं की सबसे मजबूत दोस्ती में बदल चुकी है।
दरअसल, पहले भारत की विदेश नीति में जो साफ-साफ बात नहीं दिखती थी वो अब भारत-इजरायल के रिश्ते में साफ दिख रही है। ये रिश्ता रक्षा, खुफिया जानकारी बाँटने और टेक्नोलॉजी पर आधारित है।
अक्सर लोग वीर सावरकर को सिर्फ राजनीतिक विवाद के नजरिए से याद करते हैं लेकिन वे एक विचारक थे जो राष्ट्र, सभ्यता की पहचान और दुनिया की राजनीति को अच्छे से समझते थे। 1923 की शुरुआत में ही वीर सावरकर ने यहूदियों के अपने पुराने देश को वापस पाने का खुलकर समर्थन किया था। ये इजरायल बनने से 1948 से भी 20 साल पहले की बात है।
सावरकर का ये स्टैंड दिखाता है कि वे राष्ट्रों के खुद फैसला करने के अधिकार पर कितना भरोसा रखते थे जो इतिहास और सभ्यता से जुड़ा हो। उस समय यहूदी सवाल अभी खुला था और दुनिया भर में राय बंटी हुई थी।
फिर भी वामपंथी गिरोह हमेशा सावरकर को नाजी जर्मनी का समर्थक बताता रहा है भले ही उन्होंने यहूदियों के राष्ट्र का साफ समर्थन किया हो। ये आरोप बिना पूरी जानकारी और उनके असली लेखों को देखे ही लगाए जाते हैं। असली इतिहास और राजनीतिक कहानी में फर्क समझने के लिए जरूरी है कि सावरकर के यहूदियों, जियोनिज्म और उस समय की दुनिया की स्थिति पर क्या लिखा है जब भारत इजरायल के साथ अपना रिश्ता और गहरा कर रहा है।
वीर सावरकर: क्रांतिकारी, विद्वान और सख्त राष्ट्रवादी
वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक जिले के भगुर गांव में श्रीमती राधा और श्री दामोदर सावरकर के यहाँ हुआ। बचपन से ही उन्हें पढ़ना बहुत पसंद था और कविता लिखने में भी वे माहिर थे। वे सबसे पहले और सबसे मजबूत उन लोगों में से थे जिन्होंने ब्रिटिश राज से पूरी आजादी यानी पूर्ण स्वराज की माँग की जब ये बात भारतीय राजनीति में अभी लोकप्रिय नहीं हुई थी। छोटी उम्र से ही सावरकर में जबरदस्त दिमाग था। वे इतिहास, साहित्य और राजनीति के विचारों में बहुत रुचि रखते थे। उनकी पढ़ाई की ताकत उनके देश की आजादी के लिए जुनून के बराबर थी जो जल्दी ही संगठित क्रांतिकारी काम में बदल गया।
साल 1904 में सावरकर ने अभिनव भारत सोसाइटी बनाई जो ब्रिटिश राज को हथियार से उखाड़ फेंकने के लिए गुप्त क्रांतिकारी संगठन था। जब वे लंदन पहुंचे तो भारत हाउस में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई जो भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र था। उनके लेख, भाषण और संगठन के काम से उन्होंने युवा भारतीयों को आजादी को दूर का सपना नहीं बल्कि तुरंत का काम मानने के लिए प्रेरित किया। अपनी किताब द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 में उन्होंने 1857 के विद्रोह को ब्रिटिश कहानी के खिलाफ एक पूरा राष्ट्रीय संघर्ष बताया न कि सिर्फ सिपाही बगावत।
सावरकर के क्रांतिकारी काम का उन्हें बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। साल 1910 में ब्रिटिशों ने उन्हें गिरफ्तार किया और अंडमान-निकोबार के सेल्युलर जेल में आजीवन सजा दे दी जो उस समय की सबसे बुरी जेल थी। उन्होंने सालों तक अकेले बंद कमरे, मजबूरी का काम और सख्त सजा झेली। इतनी कड़ी हालत में भी वे दिमाग और राजनीति से सक्रिय रहे। उनकी कैद उपनिवेशवाद की ज्यादती और आजादी की लड़ाई की अडिग हिम्मत का प्रतीक बन गई।
क्रांतिकारी काम के अलावा सावरकर बहुत लिखने वाले थे। उन्होंने राष्ट्र की पहचान को राजनीतिक आजादी, सांस्कृतिक एकता और सभ्यता की निरंतरता पर आधारित एक पूरा विचार बनाया। दुनिया के मामलों पर उनकी राय खासकर यहूदियों के अपने पुराने घर को वापस पाने का शुरुआती और अडिग समर्थन इसी बड़े विचार से आया।
सावरकर का यहूदियों और यहूदी घर के लिए शुरुआती और साफ समर्थन
वीर सावरकर ने इजरायल बनने से 1948 में पहले और भारत के इजरायल को आधिकारिक मान्यता देने से कई दशक पहले ही यहूदियों के अपने पुराने देश को वापस पाने का खुलकर समर्थन किया था। सावरकर उन पहले भारतीय नेताओं में से थे जिन्होंने जियोनिस्ट आंदोलन को सही माना जब ज्यादातर देश इसे समर्थन देने से हिचक रहे थे। उनका स्टैंड उनके बड़े विश्वास पर आधारित था कि राष्ट्र सिर्फ राजनीतिक सिस्टम से नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और सभ्यता की निरंतरता से बनते हैं।
अपनी किताब हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? जो 1923 में छपी थी उसमें उन्होंने जियोनिज्म को साफ समर्थन दिया। उन्होंने लिखा, “अगर यहूदियों का सपना कभी सच हो जाए… अगर फिलिस्तीन यहूदी राज्य बन जाए तो हमें उतनी ही खुशी होगी जितनी हमारे यहूदी दोस्तों को।” ये बात तब कही गई जब यहूदी राज्य बनना दूर की बात लग रही थी। ये सावरकर के साफ और सिद्धांत वाले समर्थन को दिखाता है। उन्होंने फिलिस्तीन को यहूदियों का इतिहास और सांस्कृतिक जन्मस्थान माना और उनके घर बसाने के प्रयास को सही और जायज बताया।
सावरकर की सहानुभूति यहूदियों के पुराने दर्द और बेघर होने से भी आई। उन्होंने यहूदियों की हिम्मत की तारीफ की कि सदियों की सताए जाने और बेघर होने के बावजूद उन्होंने अपनी राष्ट्र की पहचान और संस्कृति बचाए रखी। भारतीय संदर्भ में सावरकर ने भारतीय यहूदियों का बहुत सम्मान किया। उन्होंने कहा कि वे सदियों से भारत में रह रहे हैं बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक झगड़े के और शांतिपूर्वक भारतीय समाज में घुल-मिल गए।
आज जब भारत और इजरायल रक्षा, खुफिया, कृषि और टेक्नोलॉजी में अपनी साझेदारी और गहरी कर रहे हैं तो सावरकर का यहूदियों के राष्ट्र का शुरुआती समर्थन बहुत दूरदर्शी लगता है। पीएम मोदी की इजरायल यात्रा उस रिश्ते के पूरी तरह पकने को दिखाती है जो आपसी सम्मान और साझा रणनीतिक हितों पर टिका है।
यात्रा के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी की तारीफ की और उन्हें सिर्फ दोस्त नहीं बल्कि भाई कहा। उन्होंने भारत के लंबे दोस्ती के लिए शुक्रिया कहा और बोला कि भारत वो एकमात्र सभ्यता है जहाँ यहूदियों का स्वागत हुआ और उन्हें कभी सताया नहीं गया। ये भी दिखाता है कि वो साझेदारी जिसके नैतिक और सभ्यता वाले आधार सावरकर के लेखों में दशकों पहले ही पहचाने गए थे वो अब आधिकारिक नीति बन गई है।
नाजी मिथक: सावरकर की स्थिति को उसके सही इतिहास के संदर्भ में समझना जरूरी
यहूदियों के राष्ट्र का लिखित समर्थन और उनके प्रति सहानुभूति होने के बावजूद वामपंथी गिरोह वीर सावरकर को नाजी जर्मनी का समर्थक बताता रहा है। ये आरोप ज्यादातर उनके 1 अगस्त 1938 के पुणे में दिए गए अध्यक्षीय भाषण की कुछ पंक्तियों पर टिका है जिसमें उन्होंने कहा कि जर्मनी को नाजीवाद अपनाने का अधिकार है ठीक वैसे ही जैसे दूसरे देश अपने हिसाब से सरकार का रूप चुनते हैं। लेकिन भाषण को पूरा और गहराई से देखने पर पता चलता है कि सावरकर का स्टैंड कोई विचारधारा का समर्थन नहीं बल्कि दुनिया की राजनीति को व्यावहारिक नजरिए से देखना था।
वीर सावरकर का मुख्य मुद्दा ये था कि भारत की विदेश नीति सिर्फ अपने राष्ट्र हित पर आधारित होनी चाहिए न कि किसी दूसरे देश की विचारधारा या भावना पर। उन्होंने कहा कि हर देश अपनी खास इतिहास और स्थिति के हिसाब से अपना शासन चुनता है और भारत के लिए ये न तो व्यावहारिक है न रणनीतिक कि वो दूसरे देशों के फैसलों में टांग अड़ाए।
आइए उनके बयान को सही इतिहास के संदर्भ में समझें। साल 1938 में नाजी जर्मनी की तानाशाही और यहूदियों के खिलाफ नीतियाँ तो पता थीं लेकिन होलोकॉस्ट यानी लाखों यहूदियों का व्यवस्थित नरसंहार अभी पूरा नहीं हुआ था। वो औद्योगिक हत्याकांड जो बाद में नाजी जर्मनी की पहचान बना वो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ और पूरी दुनिया को 1945 में जब सहयोगी सेनाओं ने कंसंट्रेशन कैंप छुड़ाए तब पता चला।
खास बात ये कि सावरकर के अपने लेखों में नाजीवाद की असली कट्टर विचारधारा को साफ खारिज किया गया है। अपनी किताब हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? में उन्होंने लिखा कि ‘एक ही जाति है मानव जाति’ जो नस्ल की शुद्धता और श्रेष्ठता के नाजी विचार को पूरी तरह नकारता है। ये दर्शन हिटलर के नस्लीय अलगाववाद से बिल्कुल उलटा था।
कुल मिलाकर सावरकर के लेख, काम और बड़े विचार फ्रेमवर्क एक बहुत सूक्ष्म और जटिल तस्वीर दिखाते हैं जो नाजी समर्थक का सरल आरोप नहीं है। उनके विचार ज्यादा भू-राजनीतिक यथार्थ और सभ्यता के सोच से आए थे जैसा उनके यहूदियों के राष्ट्र का शुरुआती समर्थन, नस्ल शुद्धता को खारिज करना और राष्ट्र हित पर जोर से साफ है।
नेहरू की हिचक और भारत का इजरायल को देर से अपनाना
जबकि सावरकर 1920 के दशक से ही यहूदियों के राष्ट्र की वकालत कर रहे थे उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत की आधिकारिक रुख इजरायल के प्रति बहुत सतर्क रहा। 1947 में जब संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को बांटने का प्लान पास किया जिसमें यहूदी राज्य बनाने की बात थी तो भारत ने इसके खिलाफ वोट किया। उस समय के भारतीय नेतृत्व ने एक संघीय या एकीकृत व्यवस्था की वकालत की।
ये फैसला कई भू-राजनीतिक कारणों से था। नेहरू नए आजाद देशों का नेता बनना चाहते थे और अरब देशों से अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहते थे। घरेलू कारण भी थे जैसे देश के मुस्लिम आबादी की नाराजगी। ऐसे में भारत की विदेश नीति उन मुद्दों पर सावधानी से बनाई गई जो अंदर या आसपास तनाव बढ़ा सकते थे।
भारत ने सितंबर 1950 में इजरायल को औपचारिक मान्यता दी लेकिन पूरे राजनयिक रिश्ते दशकों बाद बने। 1992 में भारत और इजरायल ने एक-दूसरे की राजधानी में दूतावास खोले और पूरे स्तर पर रिश्ते सामान्य किए। आजादी के बाद 40 साल से ज्यादा समय तक रिश्ता सीमित और कम दिखने वाला रहा।
फर्क साफ है। सावरकर ने इजरायल के बनने से दशकों पहले ही यहूदी घर के विचार का खुलकर समर्थन किया था। फिर भी आजाद भारत ने किसी खास समुदाय को खुश रखने की लालच या नाराज होने के डर से यहूदी राज्य को अपनाने में देरी की। आज जब भारत और इजरायल रक्षा, खुफिया, कृषि और टेक्नोलॉजी में मजबूत साझेदारी साझा कर रहे हैं तो ये रिश्ता उस रणनीतिक स्पष्टता को दिखाता है जो भारत की आधिकारिक विदेश नीति में समय ले कर पकी।
भारत-इजरायल रिश्ते को सावरकर की दूरदृष्टि से देखने की जरूरत
वीर सावरकर भारतीय आजादी की लड़ाई के सबसे अहम किरदारों में से एक बने हुए हैं। उनकी जिंदगी राष्ट्र की संप्रभुता और सभ्यता को बचाए रखने के अडिग समर्पण से भरी थी जिसमें क्रांतिकारी हिम्मत और रणनीतिक सोच दोनों थे। सावरकर ने यहूदियों की राष्ट्र की आकांक्षा को वैध माना और उनके पुराने देश को वापस पाने के अधिकार का समर्थन किया था इजरायल आधुनिक राष्ट्र बनने से दशकों पहले।
उनके विचार उस बड़े दर्शन से मेल खाते थे कि राष्ट्रों को राजनीतिक खुद फैसला करने का अधिकार है क्योंकि वे साझा इतिहास और संस्कृति से जुड़े होते हैं। सावरकर के विचारों को सही इतिहास के संदर्भ में देखना भी उतना ही जरूरी है।
उनकी दुनिया की राजनीतिक व्यवस्थाओं पर टिप्पणियाँ भू-राजनीतिक यथार्थ पर आधारित थीं जिसमें राष्ट्र हित ही भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शक होना चाहिए न कि कोई विचारधारा। नस्ल शुद्धता के विचारों को खारिज करना ये और साफ करता है कि उनका फोकस मुख्य रूप से भारत की रणनीतिक ताकत पर था न कि विदेशी विचारधाराओं के प्रति वफादारी पर।
दूसरी तरफ आजादी के बाद भारत का इजरायल के साथ औपचारिक रिश्ता धीरे-धीरे बदला। भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दी लेकिन राजनयिक रिश्ते पूरे विकसित होने में दशक लग गए। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा व्यावहारिक और हित आधारित विदेश नीति की साफ दिशा दिखाती है क्योंकि इसमें सैन्य, टेक्नोलॉजी और साझा रणनीतिक हितों में सहयोग मजबूत हो रहा है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (25 फरवरी 2026) को इजराइल के तेल अवीव पहुँचे। भारत-इजराइल संबंधों में इसके साथ ही नए अध्याय की शुरुआत हुई। 9 साल के बाद दूसरी बार पीएम मोदी इजराइल गए। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देश रक्षा, व्यापार और आतंकवाद के खिलाफ एक-दूसरे के सहयोग को नई ऊँचाई देना चाह रहे हैं।
इस दौरे से भारत और इज़राइल एक अहम रक्षा समझौते पर साइन करने के करीब पहुँच सकते हैं, जो उनकी सुरक्षा साझेदारी को अगले लेवल पर ले जा सकता है। पिछली डील्स में हथियार खरीदने पर ज्यादा जोर था। लेकिन इस बार एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर पर बातचीत हुई है। ये ऐसे सिस्टम हैं, जिन्हें इजराइल ने कथित तौर पर अब तक किसी दूसरे देश के साथ शेयर नहीं किया है।
मजबूत रक्षा साझेदारी बेहद जरूरी- पीएम मोदी
इजरायल के संसद नेसेट को संबोधित करते हुए PM मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग कितने अहम हैं। उन्होंने रक्षा सहयोग को भारत-इजरायल संबंधों का एक ‘जरूरी पिलर’ बताया।
उन्होंने कहा, “आज की अनिश्चित दुनिया में, भारत और इजराइल जैसे भरोसेमंद पार्टनर्स के बीच एक मजबूत रक्षा साझेदारी बहुत जरूरी है।”
In today’s uncertain world, a strong defence partnership between trusted partners, like India and Israel, is of vital importance.#PMModiInIsraelpic.twitter.com/ayygRjUWgD
उन्होंने कहा कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत के साथ व्यापार बढ़ाने, निवेश करने और साझा इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ संकल्प हैं। पीएम के मुताबिक, पिछले साल गाजा सीजफायर ने सहयोग के नए मौके खोल दिए हैं। उनका संदेश साफ था कि भारत और इजराइल एक-दूसरे को बढ़ते सिक्योरिटी खतरों का सामना कर रही दुनिया में भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर देख रहे हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, PM मोदी इस दौरे के दौरान इजरायल में बने मिसाइल सिस्टम के लिए एक बड़े ऑर्डर को फाइनल कर सकते हैं। हालाँकि विस्तार से इसके पब्लिक डोमेन में होने की उम्मीद नहीं है। मोटे तौर पर यह समझा जा रहा है कि इस सहयोग के दो मुख्य हिस्से होंगे, डिफेंसिव सिस्टम और आक्रामक हथियार।
माना जा रहा है कि डिफेंस सिस्टम में जिस पर बातचीत हो सकती है, उसमें इजराइल के कुछ सबसे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। इनमें इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज, राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम और एल्बिट सिस्टम जैसी कंपनियों द्वारा विकसित किए गए सिस्टम हैं।
आक्रमण करने वाले हथियारों में एडवांस्ड प्रिसिजन और लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक सिस्टम शामिल होने की संभावना है। इनमें राफेल की SPICE 1000 गाइडेंस किट, एल्बिट सिस्टम्स की रैम्पेज एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, आइस ब्रेकर नेवल क्रूज मिसाइल और IAI की सुपरसोनिक एयर LORA मिसाइल शामिल हो सकती हैं।
हालाँकि भारत सरकार की दिलचस्पी इन सिस्टम को सिर्फ खरीदने में नहीं है, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में भी है। योजना है कि इस सिस्टम को ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम के तहत भारत में बनाया जाए और भविष्य में ‘सुदर्शन चक्र’ नाम के मल्टी-लेयर्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट में इस्तेमाल किया जाए। इसके 2035 तक पूरा होने की उम्मीद है।
आयरन डोम और इसका कॉम्बैट रिकॉर्ड
बातचीत में जिस सिस्टम पर सबसे ज्यादा चर्चा होने की उम्मीद है, वह है इजराइल का आयरन डोम। इसके अंतर्गत एरो मिसाइल डिफेंस सिस्टम, डेविड्स स्लिंग शामिल हैं। इसमें 300 km तक की मीडियम-रेंज मिसाइलों और ड्रोन को नष्ट करने की क्षमता है। इसमें 4 से 70 km के बीच कम दूरी के रॉकेट को नष्ट करने की क्षमता है।
हमास के साथ बार-बार होने वाली लड़ाइयों के दौरान इन सिस्टम ने अपने परफॉर्मेंस से दुनिया भर का ध्यान खींचा है। गाजा से रॉकेट हमलों के दौरान, आयरन डोम सिस्टम ने इजरायली शहरों को निशाना बनाने वाले हजारों रॉकेट को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया, जिससे आम इजरायली के जान-माल को कम नुकसान हुआ।
आयरन डोम में कम दूरी के रॉकेट का जल्दी पता लगाने और नष्ट करने की क्षमता है, जिसने इसे दुनिया के सबसे विश्वसनीय एयर डिफेंस सिस्टम में से एक बना दिया है। भारत जैसे लंबे बॉर्डर और समुद्र तट वाले देश में ऐसा सिस्टम बहुत काम का है।
आयरन डोम के अलावा, भारत ने इजरायल के नए आयरन बीम सिस्टम में भी गहरी दिलचस्पी दिखाई है। दुश्मन देशों के खिलाफ ये तेज स्पीड वाला डिफेंस सिस्टम बेहद घातक है। इजरायल की डिफेंस कंपनी राफेल एडवांस्ड सिस्टम्स एंड एल्बिट ने इसे तैयार किया है। ये लेजर हथियार हवा में दुश्मन की ओर से आ रहे मोर्टार, ड्रोन और रॉकेट को समय रहते इंटरसेप्ट कर लेता है।
इस पार्टनरशिप का मकसद भारतीय शहरों और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा को पुख्ता बनाना है। इसका मकसद 2030 तक एक ऐसा नेशनल सिक्योरिटी सिस्टम बनाना है जिसे अधिकारी ‘अभेद्य’ बताते हैं।
भारत के मिसाइल शील्ड को मज़बूत करना
भारत में एडवांस्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम की माँग पाकिस्तान के साथ हाल के तनाव से मिले सबक के बाद आया है। पिछले साल मई में पाकिस्तान ने कथित तौर पर भारतीय मिलिट्री और सिविलियन एसेट्स को निशाना बनाने की कोशिश में तुर्की के ड्रोन और चीनी PL-15 लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों का इस्तेमाल किया था।
भारत पहले से ही रूस के S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, इज़राइल द्वारा डेवलप किए गए बराक सिस्टम और स्वदेशी आकाश सिस्टम का इस्तेमाल करता है। हालाँकि अधिकारियों का मानना है कि आयरन डोम और आयरन बीम जैसी एक्स्ट्रा लेयर्स देश के एयर डिफेंस नेटवर्क को और मज़बूत बना देंगी और उन्हें भेदना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।
15,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी जमीनी सीमा और 7,500 किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा की रक्षा के लिए भारत को एक बड़े और इंटीग्रेटेड शील्ड की जरूरत महसूस होती है। आइडिया यह है कि पूरे भारत में एक मल्टी-लेयर्ड डिफेंस सिस्टम बनाया जाए जो कम दूरी के रॉकेट और ड्रोन से लेकर लंबी दूरी की मिसाइलों तक के खतरों से निपट सके।
एडवांस्ड स्ट्राइक सिस्टम पर बातचीत हो सकती है
गोल्डन होराइजन को खरीदने पर भी बातचीत हो रही है, जिसे स्पैरो टारगेट मिसाइल फ़मिली का अगला वर्जन माना जा रहा है। यह मिसाइल की एक खास क्लास है जिसे एयरक्राफ्ट से लॉन्च करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे इंडियन एयर फोर्स के सुखोई-30MKI जेट के साथ इंटीग्रेट किया जा सकता है।
यह 1,000 से 2,000 किलोमीटर के बीच स्ट्राइक रेंज और Mach 5 तक की स्पीड के साथ, यह सिस्टम अंडरग्राउंड बंकरों सहित मजबूत मिलिट्री टारगेट को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है। इतनी तेज स्पीड पर इसे इंटरसेप्ट करना बहुत मुश्किल हो जाता है। भारत की ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल लगभग Mach 3 की रफ़्तार से चलती है और इसे दुनिया की सबसे तेज़ ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक माना जाता है। ऐसे में गोल्डन होराइजन भारत की सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है।
हथियारों से इतर एक बड़ा सिक्योरिटी विजन
एक और बड़ा डेवलपमेंट एक बड़े सिक्योरिटी अलायंस की घोषणा हो सकती है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हाल ही में मिडिल ईस्ट के आसपास ‘अलायंस का हेक्सागन’ बनाने की बात कही थी। उन्होंने सुझाव दिया कि इस ग्रुप में भारत के साथ अरब देश, अफ्रीकी देश के अलावा ग्रीस, साइप्रस और दूसरे एशियाई पार्टनर शामिल हो सकते हैं।
उनके अनुसार, इसका मकसद इस इलाके में ‘रेडिकल एक्सिस’ के खिलाफ एकजुट होना है।
भारत और इजराइल के बीच यह रिश्ता दशकों में बना है। इजरायल लंबे समय से भारत के मुख्य हथियार सप्लायर में से एक रहा है। आज यह पार्टनरशिप खरीद-फरोख्त से आगे बढ़कर ड्रोन और मिसाइल सिस्टम जैसे हथियारों की जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग करती है।
PM मोदी का दौरा इस बात का संकेत है कि यह रिश्ता एक नए दौर में जा रहा है, जिसमें एडवांस्ड डिफेंस कोऑपरेशन, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और एक बड़ी स्ट्रेटेजिक सोच शामिल है, जो दुनिया में अनिश्चितताओं से भरी होती जा रही है।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
उत्तर प्रदेश की राजनीति को देखा जाए, तो इन दिनों सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का बौखलाया हुआ चेहरा। कभी वे विवादों में घिरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, तो कभी कपड़े उतारकर देश के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कॉन्ग्रेसियों की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं, तो कभी अपनी ही पार्टी के घोर विरोधी दलित समुदाय को लुभाने के लिए नए-नए जुमले गढ़ रहे हैं।
ये हरकतें सामान्य राजनीतिक रणनीति नहीं लगतीं। ये अकुलाहट के लक्षण हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश को ऐसा लग रहा है मानो जनता ने उन्हें पहले ही नकार दिया हो। उनका आत्मविश्वास हिल चुका है और वे अपनी ही लाइनों को तोड़ते जा रहे हैं। पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) का हवाई सपना जमीन पर उतरने के बजाय हवा में ही उड़ रहा है। आइए, तथ्यों के आईने में इस पूरे सिलसिले को समझें और देखें कि अखिलेश की राजनीतिक सोच, उनकी रणनीति और उनके भविष्य पर क्या असर पड़ रहा है।
पैराशूट लैंडिंग कर बने मुख्यमंत्री
पहले समझिए अखिलेश का राजनीतिक सफर। मुलायम सिंह यादव जैसे जमीनी नेता के बेटे होने के बावजूद अखिलेश की राजनीति में ‘पैराशूट लैंडिंग’ का तड़का हमेशा रहा। 2012 में जब वे मुख्यमंत्री बने, तो पिता की मेहनत से तैयार की गई यादव-मुस्लिम (एमवाई) की मजबूत दीवार पर सवार होकर सीधे सिंहासन तक पहुँच गए। मुलायम ने बरसों की मेहनत से पिछड़ों, यादवों और मुसलमानों का गठजोड़ खड़ा किया था। लेकिन अखिलेश ने उस आधार को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया।
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन को महज 54 सीटें मिलीं (सपा 47) जबकि भाजपा ने 312 सीटों का तूफान ला दिया। 2022 में सपा 111 सीटों तक पहुँची, लेकिन भाजपा 255 पर काबिज रही।
हालाँकि 2024 लोकसभा में गठबंधन की बदौलत सपा ने 37 सीटें जरूर जीतीं, लेकिन यह असली ताकत नहीं, बल्कि एंटी-इनकंबेंसी और गठबंधन का कमाल था। असली परीक्षा 2027 की है और अखिलेश समझ गए हैं कि अगर 2017 और 2022 की तरह जनता ने फिर नकारा तो उनका राजनीतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म। यही वजह है कि बेचैनी छिप नहीं रही।
पीडीए फॉर्मूला ही बन रहा सबसे बड़ी मुसीबत
अखिलेश की सबसे बड़ी मुसीबत उनका खुद का बनाया पीडीए फॉर्मूला है, जो हवाई सपना साबित हो रहा है। ‘पी’ यानी पिछड़े में यादव तो साथ हैं, लेकिन कुर्मी, काछी, कुशवाहा, जाट, लोध, गड़रिया, तेली, बिंद, निषाद, शाक्य जैसी जातियाँ या तो भाजपा के साथ जा चुकी हैं या बसपा की परंपरा में बंधी हैं। ‘डी’ यानी दलित और ‘ए’ यानी अल्पसंख्यक तो और भी बड़ी समस्या हैं।
AIMIM ने M वोटबैंक में लगाई सेंध
सबसे पहले अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम वोट बैंक की बात। यूपी की कुल जनसंख्या में मुसलमान करीब 19-20 प्रतिशत हैं। पिछले चुनावों के पैटर्न में इनमें से 80-85 प्रतिशत वोट परंपरागत रूप से सपा को जाते रहे। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने पिछले कुछ सालों में खासी जमीनी तैयारी की है। पूर्वी यूपी के आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया जैसे इलाकों में जहाँ मुस्लिम वोट सपा का गढ़ माना जाता था, वहाँ अब बँटवारे की आशंका साफ है।
पश्चिमी यूपी के शहरी-अर्धशहरी क्षेत्रों में भी एआईएमआईएम मजबूत उम्मीदवार उतारकर अच्छा वोट काट सकती है। जहाँ सपा और भाजपा की सीधी टक्कर है, वहाँ मुसलमान रणनीतिक तौर पर सपा को वोट देते हैं, लेकिन जहाँ मुस्लिम आबादी घनी है और विकल्प ज्यादा, वहाँ मुस्लिम सिर्फ ‘अपनी’ पार्टी की तरफ जाते हैं। महाराष्ट्र, बिहार से लेकर लगभग हर जगह ये तथ्य सामने आ चुका है।
कुंदरकी से सीमाँचल तक दिखी असलियत की झाँकी
इसका ज्वलंत उदाहरण है कुंदरकी विधानसभा उपचुनाव (नवंबर 2024)। यहाँ मुस्लिम वोट 60 प्रतिशत से ज्यादा थे, फिर भी सपा के हाजी मोहम्मद रिजवान को भाजपा के रामवीर सिंह ठाकुर ने भारी अंतर से हरा दिया। सपा प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाए। मुस्लिम वोटों का बंटवारा (एआईएमआईएम को 8,111 वोट) ही वजह था।
बिहार के सीमांचल में भी एआईएमआईएम ने आरजेडी के मुस्लिम वोट छीने और आरजेडी को भारी नुकसान हुआ। ओवैसी यूपी में 200 सीटों पर लड़ने की तैयारी में हैं। सपा के लिए यह घातक है।
डी-वोटबैंक की किताब से दूर है सपा
अब ‘डी’ यानी दलित। यादव और दलितों के बीच जमीनी स्तर पर सदियों पुराना संघर्ष है… जमीन-जायदाद, सामाजिक प्रतिष्ठा और गाँव के प्रभाव को लेकर। दलित बसपा के कोर वोटर हैं, जबकि यादव सपा के। दोनों समुदायों के बीच तनाव अक्सर हिंसक रूप ले लेता है। अखिलेश पिछले पाँच साल से पीडीए का नारा लगा रहे हैं, लेकिन दलित यादवों के साथ आने को तैयार नहीं। जमीनी घटनाएँ इसकी गवाही देती हैं।
अभी 21 फरवरी 2026 को कानपुर देहात के सरगाँव में सपा नेता और प्रधान निधि यादव के बेटे अभय यादव और उसके साथियों ने दलित बस्ती में घुसकर फायरिंग की, दहशत फैलाई और एक दलित का घर फूँक दिया। चार लोग घायल हुए।
ठीक एक दिन पहले 20 फरवरी 2026 को बलिया जिले में 15 वर्षीय दलित लड़की के साथ दो यादव युवकों राजू यादव (26) और रोशन यादव (25) ने सामूहिक दुष्कर्म किया।
ये घटनाएँ अकेली नहीं। यूपी के कई जिलों में यादव-दलित टकराव की ऐसी खबरें आती रहती हैं। दलित जानते हैं कि चुनाव में चाहे किसी के साथ जाएँ, लेकिन यादव जिस पार्टी को समर्थन दे, उसके साथ कदापि नहीं। जाटव बसपा से चिपके हैं, पासी-धोबी-कोरी-वाल्मीकि भाजपा में भविष्य देख रहे हैं। अखिलेश लाख कोशिश करें, लेकिन यह दीवार नहीं टूट रही।
जातिवादी अंकगणित में फेल है पीडीए की संरचना
अखिलेश की राजनीतिक सोच पूरी तरह जातिवादी अंकगणित पर टिकी है। वे विकास की बात कम, ब्राह्मणों को क्षत्रियों के खिलाफ, यादवों को ब्राह्मणों के खिलाफ और दलितों-राजपूतों के बीच संघर्ष भड़काने में ज्यादा लगे रहते हैं। लेकिन ये प्रयोग फेल हो रहे हैं। वे समझ गए हैं कि मुलायम की तरह जमीनी संपर्क उनका नहीं।
मुलायम पहलवान थे, किसान थे, जनता के बीच रहते थे। अखिलेश ने सपा की पुरानी राजनीति को तोड़ दिया। उन्हें उम्मीद थी कि पीडीए नया आधार बनेगा, लेकिन यादवों के अलावा कुछ नहीं बचा। कुर्मी-काछी जैसे पिछड़े भाजपा से जुड़ चुके।
इसी बेचैनी में अखिलेश अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं। विवादित स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (जिन पर पोक्सो केस में एफआईआर हुई) का समर्थन कर रहे हैं, कह रहे हैं कि यह राजनीतिक साजिश है। वहीं AI समिट कपड़े उतारकर देश के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कॉन्ग्रेसियों की प्रशंसा कर रहे हैं।
दलितों को लुभाने के लिए ‘पीडीए पाठशाला’ जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर विश्वास नहीं जगा पा रहे। यही नहीं, वे अब अपनी ही लाइनों तोड़ रहे हैं। कभी ब्राह्मण-क्षत्रिय विभाजन, कभी यादव-दलित गठजोड़ का ढोंग कर रहे हैं, लेकिन सफलता के नाम पर उनके पास है अभी तक एक बड़ा सा शून्य।
यूपी की लड़ाई से अभी बाहर ही दिख रहे हैं अखिलेश यादव
अखिलेश इन दिनों ज्यादातर समय यूपी के बाहर दिल्ली में बिता रहे हैं। यहाँ तक कि यूपी विधानसभा के बजट सत्र के दौरान भी वे प्रदेश के मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय नहीं दिखे। बजट सत्र में वे केंद्र पर हमला बोल रहे थे, लेकिन यूपी की सड़कों, स्कूल, अस्पताल, किसान की समस्या पर चुप्पी उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
यह रवैया साफ बताता है कि वे योगी आदित्यनाथ के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। चूँकि योगी सरकार की विकास की राजनीति, जिसमें एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश, कानून व्यवस्था का उनके पास कोई जवाब नहीं है। ऐसे में सपा अगर 2027 में तीसरी बार हारी तो अखिलेश के पास कुछ नहीं बचेगा।
जाति के घेरे से निकलो अखिलेश, वर्ना…
राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर कहूँ तो अखिलेश की सोच 90 के दशक की है। मुलायम का एमवाई फॉर्मूला तब काम किया जब सामाजिक न्याय की लहर थी। आज युग बदल गया है। आज का युवा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर माँग रहा है, जबकि अखिलेश अभी भी जाति के घेरे में फंसे हैं। भले ही पीडीए के नारे ने 2024 लोकसभा में आंशिक कामयाबी दिलाई, लेकिन विधानसभा चुनाव में हर सीट पर अलग गणित होता है। फिर बिना जमीनी काम के, बिना विकास के एजेंडे के सिर्फ नारे कभी सफलता नहीं दिला पाए हैं, ऐसा इतिहास भी कहता है।
ऐसे में उनकी अकुलाहट का राज साफ है कि 2027 के चुनाव को लेकर वो अभी से भयभीत हो चुके हैं। अगर सपा तीसरी बार बुरी तरह हारी तो अखिलेश यादव का राजनीतिक सफर समाप्ति की ओर बढ़ जाएगा। वे जानते हैं कि योगी का मॉडल जनता को पसंद आ रहा है। विकास की राजनीति जाति की राजनीति को पीछे छोड़ रही है। इसलिए वे बौखला रहे हैं। नए प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रयोग बुरी तरह से फेल हो रहे हैं।
बहरहाल, अंत में एक बिन माँगी सलाह देना चाहूँगा कि अखिलेश जी, अगर सच में भविष्य बचाना है तो पीडीए के हवाई सपने छोड़िए। जमीनी स्तर पर काम कीजिए। विकास की भाषा बोलिए। परिवारवाद से ऊपर उठिए। वरना 2027 नहीं, बल्कि 2032 तक भी इंतजार करना पड़ेगा और तब तक राजनीति और आगे निकल चुकी होगी, गंगा जी में बहुत पानी बह चुका होगा। सिर्फ अकुलाहट से कुछ नहीं होने वाला। आपको फिलहाल आत्मचिंतन कर नए सिरे से रणनीति बनाने और उस पर अमल करने की जरूरत है।
अंत में सिर्फ इतना ही… कि अखिलेश की राजनीति का भविष्य वाकई संकट में है, लेकिन लोकतंत्र में सब कुछ संभव है। अगर वे बदलें तो बदलाव आ सकता है, वरना इतिहास महज उन्हें एक और ‘पैराशूट नेता’ के रूप में ही याद रखेगा।
ऑपइंडिया भारत और दुनियाभर में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार का दिखाता रहा है। धार्मिक आधार पर हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अपराध को उजागर करने के कारण हमें व्यापक तौर पर हिन्दुओं का समर्थन भी मिलता रहा है। यही वजह है कि ऑपइंडिया सबसे मुखर हिंदू मीडिया संस्थानों में से एक बन गया है।
हिंदू विरोधी इस्लामी-वामपंथी गुट लंबे समय से ऑपइंडिया को निशाना बना रहे हैं। संस्थान के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए गए, मुकदमें चलाए गए। विज्ञापन से होने वाले राजस्व में कटौती के लिए अभियान चलाया गया। घटिया ‘शोध’ पत्रों और अन्य तरीकों से चुप कराने का प्रयास लगातार किया जा रहा है।
ऑपइंडिया को 2022 में लीसेस्टर में हुई हिंसा पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए (एक बार फिर) टारगेट किया गया है। इस बार सोरोस की फंडिंग वाली लंदन के एसओएएस विश्वविद्यालय के माध्यम से निशाना बनाया जा रहा है।
23 फरवरी 2026 को स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (SOAS) ने ‘ बेटर टुगेदर: अंडरस्टैंडिंग द 2022 वायलेंस इन लीसेस्टर’ शीर्षक से अपनी 218 पृष्ठों की रिपोर्ट जारी की । इस रिपोर्ट में लीसेस्टर में हुई हिंसा और तनाव के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराया गया है। इससे पहले शुरुआती रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘किसी एक समुदाय या समूह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता’। अब हिंदुओं और हिंदुत्व के खिलाफ एक पूरा अध्याय और सिफारिशें लिखी गई हैं।
OpIndia ने पहले बताया था कि हिंदू-विरोधी पृष्ठभूमि वाले SOAS विश्वविद्यालय के शोधकर्ता हिन्दू विरोधी बातें करेंगे। ऐसा ही हुआ है। इनलोगों ने हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को ‘अतिवादी’ बताते हुए इसे ‘राजनीतिक इस्लामवाद’ की तरह बताया है।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एसओएएस विश्वविद्यालय ने लीसेस्टर हिंसा को लेकर जो प्रोपेगेंडा रिपोर्ट तैयार किया है, उसमें ऑपइंडिया को निशाना बनाया गया है। 2022 में लीसेस्टर में हुई घटनाओं पर सोशल मीडिया के प्रभाव और इसके विपरीत विश्लेषण करने वाले रिपोर्ट ने हैशटैग #HindusUnderAttack के तहत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, विशेष रूप से लीसेस्टर में हिंदुओं पर इस्लामी हमलों के खिलाफ आवाज उठाने वाले हिंदू सोशल मीडिया यूजर्स का मजाक उड़ाया गया।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि 2022 में लीसेस्टर हिंसा के दौरान सोशल मीडिया पर तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया, जिसमें ऑपइंडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
“ट्वीटों में सबसे ज्यादा शेयर किए गए 30 यूआरएल में से 11 ऑपइंडिया के थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि प्लेटफॉर्म नरेंद्र मोदी, भाजपा और हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन करने वाला मीडिया आउटलेट है।
रिपोर्ट के मुताबिक, “हेनरी जैक्सन सोसाइटी की शोधकर्ता शार्लोट लिटिलवुड के जीबी न्यूज को दिए गए साक्षात्कार के आधार पर ऑपइंडिया ने आरोप लगाया था कि ‘इस्लामवादी’ कश्मीर की तरह ही लीसेस्टर से हिंदुओं को निकालने की माँग कर रहे थे।”
ऑपइंडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा या हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन नहीं करता है। बिना किसी राजनीति के ऑपइंडिया हिंदुओं, हिंदू धर्म और हिंदुत्व का समर्थन करता है। ‘राजनीति’ शब्द का प्रयोग करके यह जताना कि हम किसी राजनीतिक दल का हिस्सा हैं या उसकी शाखा हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। यूजीसी के नए नियम को लेकर ऑपइंडिया की कवरेज से स्पष्ट है, हमने भाजपा, मोदी सरकार और उनकी विशिष्ट नीतियों की समय-समय पर आलोचना की है।
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है कि ऑपइंडिया की लीसेस्टर हिंसा की कवरेज ने इस्लामी-वामपंथी गुट को नाराज किया हो।
जब ऑपइंडिया के लेखों ने कथित तौर पर सोशल मीडिया ट्रेंड्स में काफी लोकप्रिय हुआ, जब लीसेस्टर में हिंदुओं पर हुए हमलों को उजागर किया गया। हालाँकि इसका बीबीसी ने जमकर विरोध किया। हिंदुओं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हिंसा के बारे में फर्जी खबरें और दुष्प्रचार फैलाने के लिए कुख्यात बीबीसी ने 24 सितंबर 2022 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें उसने दावा किया कि #HindusUnderAttackinUK हैशटैग के तहत साझा किए गए शीर्ष 30 यूआरएल ऑपइंडिया के लेखों के थे।
बीबीसी ने हैशटैग को ‘गलत’ बताकर खारिज करने की कोशिश की। उसने ऑपइंडिया के एक लेख की व्यापक ‘पहुँच’ को लेकर भी बात की, जो हेनरी जैक्सन सोसाइटी की शोधकर्ता शार्लोट लिटिलवुड की इस चिंता पर आधारित था कि मुसलमानों से हिंसा की धमकियों के कारण कम से कम 9 परिवार लीसेस्टर छोड़कर चले गए थे।
उस वक्त लीसेस्टरशायर पुलिस ने कहा था कि उन्हें लीसेस्टर छोड़कर जाने वाले हिंदू परिवारों की जानकारी नहीं है, इसलिए बीबीसी ने यह सुझाव देने की कोशिश की कि ऑपइंडिया ने गलत सूचना फैलाई है। हालाँकि इस दौरान यह देखा गया कि बीबीसी ने खुद मुस्लिम पक्ष द्वारा फैलाई गई गलत सूचना और हिंसा को कम करके दिखाने की कोशिश की।
बीबीसी ने दावा किया कि#HindusUnderAttackinLeicester के तहत ट्रेंड कर रहे 30 OpIndia यूआरएल में से, ब्रिटिश मीडिया ने केवल ‘हिंदुओं द्वारा लीसेस्टर छोड़ने’ की रिपोर्ट को ही प्रमुखता से दिखाया, जो ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदुत्व-समर्थक तत्वों’ को बढ़ावा देने के लिए उपयोगी सामग्री को चुन-चुनकर इस्तेमाल करने का एक विशिष्ट उदाहरण है, जिन्होंने इस्लामवादियों की तुलना में अधिक गलत सूचना फैलाई।
बीबीसी ने इस हैशटैग का इस्तेमाल करके शेयर किए गए टॉप 30 यूआरएल की जाँच की। बीबीसी के लेख में कहा गया है कि इनमें से 11 लिंक न्यूज वेबसाइट OpIndia.com के लेखों के थे, जो खुद को ‘भारत का सही पक्ष आप तक पहुँचाने वाली वेबसाइट’ बताती है। बीबीसी के मुताबिक, लेखों को ‘फर्जी अकाउंट’ के साथ-साथ असली अकाउंट द्वारा भी बड़े पैमाने पर शेयर किया गया था, जिनमें से कुछ के लाखों फॉलोअर्स थे।
ऑप इंडिया के एक लेख में हेनरी जैक्सन सोसाइटी की ब्रिटिश शोधकर्ता शार्लोट लिटिलवुड का हवाला दिया गया था, जिन्होंने जीबी न्यूज को बताया था कि मुसलमानों से हिंसा की धमकियों के कारण कई हिंदू परिवार लीसेस्टर छोड़कर चले गए थे। इस लेख को लगभग 2,500 बार रीट्वीट किया गया था। लीसेस्टर पुलिस ने बाद में कहा कि उन्हें परिवारों के पलायन की किसी भी रिपोर्ट की जानकारी नहीं थी।
ऑप इंडिया ने 2022 में ही इस बात पर प्रकाश डाला था कि बीबीसी की लीसेस्टर हिंसा की रिपोर्टिंग में हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह साफ झलक रहा था, जिसमें हिंदुत्व और भाजपा-आरएसएस को खलनायक के रूप में पेश करने का जानबूझकर प्रयास किया गया था, जबकि हिंसा का आरएसएस, भाजपा, तथाकथित दक्षिणपंथी चरमपंथियों या फासीवादी विचारधारा से कोई संबंध नहीं था। बीबीसी की लीसेस्टर हिंसा की कवरेज ने उस समय ब्रिटिश हिंदू समुदाय में रोष भर दिया था।
“क्या लेस्टर में गलत सूचना ने आग में घी डालने का काम किया?” शीर्षक वाली अपनी रिपोर्ट में बीबीसी ने कहा, ” कुछ लोग इस अशांति और उस पर हुई प्रतिक्रिया को हिंदुत्व विचारधारा से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि भारतीय राजनीति को शहर में आयात किया जा रहा है, लेकिन बीबीसी को अब तक अशांति से पहले ऐसे समूहों से कोई सीधा संबंध नहीं मिला है।”
देखने में तो ऐसा लग रहा था कि बीबीसी लेस्टर में हुई हिंसा को सीधे तौर पर हिंदुत्व से न जोड़कर निष्पक्षता बरत रहा है, लेकिन हिंसा की ‘जाँच’ करने के बावजूद बीबीसी को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि झड़पें मुसलमानों ने शुरू की थीं, जबकि वीडियो सबूतों से इसकी पुष्टि होती दिख रही थी।
हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले लोगों में से एक माजिद फ्रीमैन का नाम लेने के बावजूद बीबीसी ने अपना संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया और गलत सूचना फैलाने का आरोप हिंदुओं पर ही लगाया। यहाँ तक कि बीबीसी ने फ्रीमैन का साक्षात्कार भी लिया ।
ऑपइंडिया ने उस समय इस बात पर जोर दिया कि शिवालय के पवित्र भगवा ध्वज का अपमान एक मुस्लिम व्यक्ति ने किया था, लेकिन बीबीसी ये बताने की कोशिश कर रहा था कि यह कृत्य संभवतः किसी हिंदू द्वारा किया गया।
बीबीसी ने इस बात पर भी अफसोस जताया था कि लीसेस्टर में हिंदुओं को भारत के हिंदुओं का समर्थन मिला। भारतीयों की सोशल मीडिया पर व्यापक उपस्थिति है, फिर भी बीबीसी ने भारत से शुरू हुई लीसेस्टर हिंसा के बारे में अंग्रेजी में किए गए 20,000 ट्वीट्स के विश्लेषण के आधार पर सुझाव दिया कि यह “हैशटैग का हेरफेर” था। इसमें ये दावा किया गया कि भारत से मिले हिंदू समर्थन ने लीसेस्टर में हिंसा को और बढ़ा दिया। इस हास्यास्पद दावे का जिक्र हाल ही में जारी एसओएएस जाँच में भी मिलता है।
न्यूज़क्लिक ने बीबीसी के हिंदू-विरोधी प्रचार को और बढ़ावा दिया
वामपंथी प्रचार माध्यम न्यूजक्लिक ने 2022 के लीसेस्टर हिंसा के संदर्भ में हिंदुओं के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने के लिए बीबीसी की रिपोर्ट को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। यहाँ तक कि माजिद फ्रीमैन एक मुस्लिम लड़की के अपहरण का हिन्दुओं पर आरोप लगाते हुए फर्जी खबर फैलाई, न्यूजक्लिक ने उसे हिंदुओं के खिलाफ हिंसा फैलाने वाला नहीं कहा, बल्कि ‘सामुदायिक कार्यकर्ता’ बताया।
न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह किसी से छिपा नहीं है। न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘धनदाता’ बताया गया। भारत-विरोधी विचारों, विशेष रूप से कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों को भड़काने के लिए धन भेजा गया था। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।
2021 में OpIndia ने NewsClick के संबंधों की विस्तृत जाँच की और खुलासा किया कि यह कई ऐसे व्यक्तियों से जुड़ा था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इनमें शहरी नक्सली, तीस्ता सीतलवाड, अभिसार शर्मा और कई अन्य शामिल हैं। OpIndia की वह जाँच यहाँ पढ़ी जा सकती है।
पाकिस्तान की समर्थक ‘द ब्रिज इनिशिएटिव’ ने ‘ब्रिटेन में हिंदुत्व’ नामक एक दुष्प्रचार रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें लीसेस्टर हिंसा के लिए हिंदुत्व को दोषी ठहराया गया और ‘ऑप इंडिया’ को मुस्लिम पीड़ित होने का ढोंग न करने के लिए निशाना बनाया गया।
नवंबर 2023 में, अमेरिका के जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के तहत द ब्रिज इनिशिएटिव ने ‘ब्रिटेन में हिंदुत्व’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में हिंदुत्व को महज एक ‘राजनीतिक विचारधारा’ कहा गया और इसे हिंदू धर्म से अलग करने का प्रयास किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया, “यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि हिंदुत्व, हिंदू धर्म नहीं है। हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा है, जिसका उपयोग व्यक्ति और समूह एक विशिष्ट पहचान बनाने और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को उचित ठहराने के लिए करते हैं। हिंदू राष्ट्रवादी एक जातीय-धार्मिक राज्य बनाना चाहते हैं, जिसे हिंदू राष्ट्र के नाम से जाना जाता है।” रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदुत्व का यह अलगाववादी दृष्टिकोण हिंदू धर्म की सोच से अलग है।
‘केस स्टडी: 2022 लीसेस्टर दंगे’ शीर्षक वाले अध्याय में , द ब्रिज इनिशिएटिव ने बार-बार मुसलमानों को पीड़ित दिखाने की कोशिश की, जबकि झड़पें मुसलमानों द्वारा ही शुरू की गई थीं। रिपोर्ट में इस्लामी जिहाद से भी बड़ा खतरा साबित करने के लिए कुख्यात हिंदू विरोधियों क्रिस एलन, द गार्जियन की आइना जे खान और हनाह-एलिस पीटरसन, हिंदुत्व वॉच के पाकिस्तानी प्रशासक रकीब हामिद नाइक और अन्य लोगों का हवाला दिया गया।
यह याद रखना जरूरी है कि लीसेस्टर के मेयर पीटर सोल्सबी ने लीसेस्टर हिंसा की ‘स्वतंत्र जाँच’ का नेतृत्व करने के लिए क्रिस एलन को नामित किया था। हालाँकि स्थानीय हिंदू संगठनों के विरोध के बाद उन्हें पद से हटना पड़ा।
इस रिपोर्ट ने शोकत आदम जैसे इस्लामवादियों द्वारा फैलाए जा रहे मुस्लिम उत्पीड़न के दुष्प्रचार को और भी बल दिया। शोकत आदम को बेलग्रेव को कथित तौर पर ‘हिंदू इलाका’ कहे जाने पर आपत्ति थी, लेकिन ग्रीन रोड इलाके को मुस्लिम इलाका कहे जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि शोकत आदम लंबे समय से ‘मुस्लिम एंगेजमेंट एंड डेवलपमेंट’ (MEND) नामक एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन से जुड़े हुए हैं और ‘लीसेस्टर चेयर’ का पद भी संभाल चुके हैं। शोकत आदम ने अपने मुस्लिमों द्वारा लीसेस्टर में की गई हिंसा को ‘उकसावे की प्रतिक्रिया’ बताकर कम आँकने की कोशिश की।
ब्रिज इनिशिएटिव- कम्युनिटी पॉलिसी फोरम की रिपोर्ट ने हिंदू बहुल क्षेत्र में मस्जिद के निर्माण के आवेदन पर आपत्ति जताने वाले हिंदुओं को ‘इस्लामोफोब’ के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया।
द ब्रिज इनिशिएटिव ने ऑपइंडिया, विशेष रूप से प्रधान संपादक नूपुर शर्मा को उनके उस ट्वीट के लिए निशाना बनाया, जिसमें उन्होंने बढ़ते तनाव के बीच लेस्टर से लगभग 200 हिंदू परिवारों के विस्थापित होने की खबरों पर चिंता जताई थी। अपने ट्वीट में शर्मा ने लेस्टरशायर पुलिस को टैग किया था। इसके बावजूद द ब्रिज इनिशिएटिव और अब एसओएएस जाँच समिति ने उसी ट्वीट का इस्तेमाल यह सुझाव देने के लिए किया है कि ऑपइंडिया गलत सूचना फैला रहा था।
ऑपइंडिया ने एसओएएस जाँच पर अपनी रिपोर्ट में सोरोस की फंडिंग रिपोर्ट को ‘दुष्प्रचार’ कहा था। एसओएएस रिपोर्ट की तरह ही द ब्रिज इनिशिएटिव ने भी हेनरी जैक्सन सोसाइटी की शार्लोट लिटिलवुड के उस दावे को झूठा बताया, जिसमें हिंसा के डर से नौ हिंदू परिवारों के लेस्टर छोड़ने की बात कही गई थी।
इसमें बीबीसी की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया, जिसमें दावा किया गया था कि हैशटैग ‘#ProtectLeicesterHindus’, ‘#StopLeicesterIslamicTerrorism’, ‘#HindusUnderAttackInLeicester’, ‘#HinduUnderAttackUK’ और ‘#HinduHateInUK’ का इस्तेमाल करने वाले शीर्ष 30 यूआरएल में से 11 ऑपइंडिया द्वारा लिखे गए लेखों के थे। जाहिर तौर पर बीबीसी की तरह ही, एसओएएस और द ब्रिज इनिशिएटिव भी ऑपइंडिया की ‘असाधारण अंतरराष्ट्रीय पहुँच’ से नाराज थे।
एसओएएस जाँच की तरह द ब्रिज ने भी इस्लामी कट्टरपंथियों के दुष्प्रचार को फैलाया और हिन्दुओं के खिलाफ माहौल बनाया। हालाँकि, इसने माजिद फ्रीमैन और मोहम्मद हिजाब जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों को ‘सामुदायिक कार्यकर्ता’ और ‘मुस्लिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ कहा गया।
रिपोर्ट में मोहम्मद हिजाब को महज एक मुस्लिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बताया गया, जबकि उनके वीडियो में कही गई बातों का हवाला भी दिया गया। इसमें हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल दिया गया था। हैरानी की बात नहीं है कि द ब्रिज इनिशिएटिव को अल्लाहू अकबर चिल्लाते हुए मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं पर हमला करना आपत्तिजनक और आतंकित करने वाला नहीं लगा, लेकिन पवित्र जय श्री राम का नारा ‘हिंदू राष्ट्रवादी युद्ध’ की घोषणा लग गया।
द ब्रिज इनिशिएटिव के पिछले कारनामे और भी दिलचस्प हैं। अक्टूबर 2022 में, इनिशिएटिव ने 40 पन्नों की एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि भारत में मुसलमान नरसंहार के आठवें चरण में हैं। इसमें कहा गया कि भारत में मुसलमानों का लगातार नरसंहार हो रहा है। इसे ग्रेगरी स्टैंटन द्वारा बनाए गए 10 चरणों में से आठवें चरण में है। आठवें चरण में संपत्ति हड़पना, जबरन विस्थापन, बस्तियाँ उजाड़ना और नजरबंदी शामिल हैं। जबकि भारत में धर्म के आधार पर निशाना बनाने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
इसने अयोध्या राम मंदिर फैसले और काशी के ज्ञानवापी विवाद को भी ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया। इसके अलावा, इसने यह झूठी खबर भी फैलाई कि सीएए मोदी सरकार की मुस्लिम विरोधी नीति का नतीजा है। सच्चाई यह है कि सीएए पड़ोसी देशों से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
ब्रिज इनिशिएटिव ‘इस्लामोफोबिया पर एक बहु-वर्षीय अनुसंधान परियोजना’ का हिस्सा है। यह वाशिंगटन डीसी में जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के प्रिंस अलवलीद बिन तलाल सेंटर फॉर मुस्लिम-क्रिश्चियन अंडरस्टैंडिंग (एसीएमसीयू) के तहत काम करता है। एसीएमसीयू की स्थापना 2005 में सऊदी अरब के अरबपति व्यवसायी अलवलीद बिन तलाल अल सऊद द्वारा 20 मिलियन डॉलर के दान से की गई थी। तलाल एक विवादास्पद व्यवसायी रहे हैं और भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार भी हो चुके हैं।
रिपोर्ट के प्रमुख शोधकर्ता मोबशरा तज़ामल हैं, जो पाकिस्तान मूल के हैं और उन्होंने इस्लामी समाज और संस्कृति में स्नातकोत्तर किया है। जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उनके प्रोफाइल में बताया गया है कि ‘उनका वर्तमान शोध वैश्विक इस्लामोफोबिया पर केंद्रित है, जिसमें विशेष रूप से उइघुर मुसलमानों को निशाना बनाने वाले चीन के अभियान और निगरानी तकनीक के उपयोग, जातीय राष्ट्रवाद के उदय और इस्लामोफोबिया ‘उद्योग’ के वित्तीय और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों पर है।’
द ब्रिज इनिशिएटिव के अन्य प्रमुख सदस्यों में पाकिस्तानी मूल के शोधकर्ता अरसलान इफ्तिखार भी शामिल हैं। अरसलान इफ्तिखार अमेरिकी राजनेता और लुसियाना के पूर्व गवर्नर बॉबी जिंदल के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों के लिए कुख्यात हैं। एमएसएनबीसी पर एक कार्यक्रम में जिंदल के बारे में इफ्तिखार ने कहा था, “ऐसा लगता है कि वह रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए दक्षिणपंथी रुख अपनाते हुए अपनी त्वचा से कुछ भूरापन मिटाने की कोशिश कर रहे हैं।” इस टिप्पणी से भारी आक्रोश फैल गया था और एमएसएनबीसी ने घोषणा की थी कि इफ्तिखार अब चैनल पर दोबारा नहीं दिखाई देंगे।
संगठन के अन्य सदस्य फरीद हाफेज हैं, जिनकी आतंकी फांडिंग और मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने के आरोप में ऑस्ट्रिया में जाँच की गई थी। ऑस्ट्रियाई अधिकारियों ने 2020 में उनके वियना स्थित घर पर छापा मारा और ऑपरेशन लक्सर के तहत वर्षों तक उन पर नजर रखने के बाद उनसे पूछताछ की।
साफ है कि बौद्धिक दिखावे के पीछे द ब्रिज इनिशिएटिव एक इस्लामी प्रचार तंत्र है, जो हिंदुओं और अन्य समुदायों और नेताओं को निशाना बनाता है। ये लोग इस्लामी वर्चस्व और कट्टरपंथ का विरोध करते हैं।
कॉमनवेल्थ मैगजीन, द टाइम्स, वाइस और द कारवां: नाम अलग, लक्ष्य एक
ऑपइंडिया 2022 से ही भारत और विदेशों में इस्लामी-वामपंथी मीडिया द्वारा लीसेस्टर हिंसा की कवरेज के लिए ऑपइंडिया को निशाना बनाने का एक सुनियोजित प्रयास देखा गया है। ब्रिटेन के कॉमनवेल्थ मैगजीन ने 28 सितंबर 2022 को एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें उसने न केवल लीसेस्टर हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराते हुए मुस्लिम पीड़ित होने का झूठा दावा किया, बल्कि ऑपइंडिया द्वारा लीसेस्टर में हिंदू विरोधी हिंसा को ‘इस्लामी उत्पात’ करार देने की भी जमकर आलोचना की।
द गार्जियन ने लीसेस्टर में इस्लामी हिंसा को छिपाने की कोशिश की। 2022 में ऑपइंडिया ने द गार्जियन की पत्रकार आइना जे खान द्वारा लीसेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा का दोष खुद पर लेने की रणनीति का पर्दाफाश किया था।
19 सितंबर 2022 को प्रकाशित एक बौद्धिक रूप से बेईमानी भरे लेख में , खान ने स्पष्ट रूप से धार्मिक पहचान को हिंदू प्रदर्शनकारियों के समूहों से जोड़ा था, जिसमें ‘हिंदू पुरुषों का विरोध’ और ‘हिंदू पुरुषों को मार्च करते हुए फिल्माया गया’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग किया गया था।
हालाँकि उन्होंने चतुराई से उस व्यक्ति के धार्मिक जुड़ाव का जिक्र नहीं किया जिसने एक हिंदू मंदिर का अपमान किया और भगवा झंडा उखाड़ कर फेंका था। हिंदू पूजा स्थल का अपमान करने वाले अपने सह-धर्मी को बचाने के प्रयास में, आइना जे खान ने ‘अच्छे इमाम’ का सहारा लिया।
द गार्जियन की पत्रकार ने इस तरह सार्वजनिक चर्चा को अपने ही धर्म के एक व्यक्ति द्वारा मंदिर पर किए गए क्रूर हमले से हटाकर एक ‘मूकदर्शक’ इमाम की ओर मोड़ने की कोशिश की। जब ऑपइंडिया ने उनकी रिपोर्टिंग में स्पष्ट विसंगति की ओर इशारा किया, तो आइना जे खान ने इसका कड़ा विरोध किया और आलोचना को ‘इस्लामोफोबिया’ करार दिया।
17 अक्टूबर 2022 को , यहूदी विरोधी संगठन ‘स्टॉप फंडिंग हेट (एसएफएच)’ ने ‘द गार्जियन’ का पर्दाफाश करने के लिए ऑपइंडिया पर हमला बोला ।
‘स्टॉप फंडिंग हेट’ संगठन ने ऑपइंडिया को मिलने वाले विज्ञापन को रोकने की पूरी कोशिश की। ऑप इंडिया ने लेस्टर के हिंदुओं की वास्तविक दुर्दशा को दुनिया के सामने उजागर किया था, जो इस्लामवादियों और मीडिया उद्योग में उनके समर्थकों की दया पर निर्भर थे।
ब्रिटेन के ‘अतिवाद-विरोधी’ थिंक टैंक, इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक डायलॉग (आईएसडी) ने अक्टूबर 2022 में ‘लीसेस्टर में हिंसा: ऑनलाइन हिंसा और ऑफलाइन नतीजों को समझना’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें लीसेस्टर हिंसा के लिए मुख्य रूप से हिंदुओं को दोषी ठहराया गया और माजिद फ्रीमैन और मोहम्मद हिजाब जैसे इस्लामवादियों की भूमिका को कम करके आँका गया। टॉमी रॉबिन्सन ने ऑपइंडिया के एक लेख को साझा कर ऑपइंडिया को निशाना बनाया। लेख में ऑपइंडिया ने मुसलमानों को 2022 की हिंदू-विरोधी लीसेस्टर हिंसा के लिए दोषी ठहराया था।
द टाइम्स ने भी लेस्टर में ‘हिंदुत्व’ से जुड़े तनाव की बात की और ऑपइंडिया पर सितंबर 2022 में लेस्टर की घटनाओं को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाए । ऑपइंडिया को ‘हिंदू राष्ट्रवादी तत्वों’ में से एक बताया।
भारतीय वामपंथी प्रचार पत्रिका ‘द कारवां’ ने भी ऑपइंडिया द्वारा लीसेस्टर हिंसा की कवरेज के लिए निशाना बनाया। ‘एजेंट ऑरेंज: ऑपइंडिया की पत्रकारिता-विरोधी गतिविधियों का जहरीला धंधा’ शीर्षक वाले अपने लेख में , कारवां की लेखिका अमृता सिंह ने ऑपइंडिया को लीसेस्टर हिंसा की कवरेज में नफरत फैलाने वाले के रूप में बताया। बता दें कि ‘द कारवां’ देश में इस्लामी आतंकी हमलों में भारतीय सेना के शहीदों की जातिगत संरचना का अध्ययन करने को प्राथमिकता देती है।
मोहन जे दत्ता के ‘अकादमिक शोध पत्र’ में लेस्टर कवरेज को लेकर OpIndia को ‘हिंदुत्व प्रचार तंत्र’ का हिस्सा बताया गया
मोहन जे दत्ता द्वारा लिखित एक शोध-सह-प्रचार पत्र में हिंदुत्व और हिंदुओं को विशेष रूप से 2022 के लीसेस्टर हिंसा के संदर्भ में बदनाम किया गया और ऑपइंडिया पर भी हमला किया गया। इसमें ऑपइंडिया के X हैंडल और इसकी प्रधान संपादक नूपुर शर्मा को ‘हिंदुत्व प्रचार तंत्र का हिस्सा बताया गया, जो नफरत फैला रहा है।’
जब ऑपइंडिया ने लीसेस्टर हिंसा रिपोर्ट में ‘द गार्जियन’ की पत्रकार आइना जे खान के हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह को उजागर किया, तो उसे ‘इस्लामोफोबिया’ पीड़ित बताया गया
इसके अलावा श्री सनातन हिंदू मंदिर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे इस्लामवादियों की आलोचना करने वाले ऑपइंडिया के लेख को निशाना बनाया गया और लेस्टर में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में मंदिर की संलिप्तता का झूठा आरोप लगाया गया।
ब्रिटेन की संसद द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर ऑपइंडिया पर हमला
ब्रिटेन की संसद में एक प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें भारत में ‘लोकतंत्र के पतन’ की काल्पनिक और मनगढ़ंत कहानी को सनसनीखेज तरीके से पेश किया गया था। याचिका में हिंदुत्व और हिंदू अधिकार समूहों की निंदा करते हुए इसे ‘अतिवादी’ विचारधारा बताया गया था। इसके बाद, इसमें ऑपइंडिया को निशाना बनाते हुए दावा किया गया कि हिंदुत्व समर्थक मीडिया संगठन की सामग्री ‘नफरत और धार्मिक ध्रुवीकरण’ को बढ़ावा देता है।
सीआईए के सहयोगी बेलिंगकैट ने ऑप इंडिया को उसकी बेबाक हिंदू समर्थक रिपोर्टिंग के लिए निशाना बनाया
सीआईए का मुखपत्र कहा जाने वाला बेलिंगकैट ने पहले भी ऑपइंडिया पर हमले किए थे। पूजा चौधरी द्वारा लिखित एक रिपोर्ट में बेलिंगकैट ने ऑपइंडिया की इस्लामी अपराधों की आलोचना करने वाली हिंदू-समर्थक रिपोर्टिंग को ‘मुस्लिम-विरोधी’ बताया । इसने अलीशान जाफरी जैसे इस्लामी फर्जी समाचार फैलाने वालों के हवाले दिए, जिन्होंने ऑपइंडिया की तुलना डेर स्टर्मर जैसे नाजी प्रचारक समाचार पत्रों से की थी। ऑपइंडिया की संपादकीय शैली और लहजे पर सामान्य हमलों के अलावा, बेलिंगकैट के इस घटिया लेख ने लीसेस्टर हिंसा के दौरान तनाव बढ़ने के लिए ऑपइंडिया के लेखों को भी जिम्मेदार ठहराया।
बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (एनईडी) से दान मिलता है। इस संगठन को विशेष रूप से विदेशों में अमेरिकी हितों को बढ़ावा देने वाले संगठनों की सहायता के लिए स्थापित किया गया है। इसे पश्चिमी सरकारी संस्थानों, खास कर यूरोपीय और ब्रिटिश स्रोतों से भी धन प्राप्त होता है। रूसी सरकार और दूसरे लोगों ने बेलिंगकैट पर पश्चिमी खुफिया एजेंसियों का एजेंट होने का सीधा आरोप लगाया है। बेलिंगकैट के भारत विरोधी संगठन रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) से भी संबंध हैं।
दरअसल, बेलिंगकैट के सह-संस्थापक एलन वेनस्टीन ने एक बार सार्वजनिक रूप से खुलासा किया था कि आज हम जो कुछ भी करते हैं, उसका बहुत सारा काम 25 साल पहले सीआईए द्वारा गुप्त रूप से किया जाता था।
मिडिल ईस्ट की वामपंथी मीडिया लीसेस्टर हिंसा की हिंदू-विरोधी एसओएएस जाँच को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है, जबकि हिंदू इसकी निंदा कर रहे हैं।
हमने यहाँ जिन लेखों और शोध पत्रों पर चर्चा की, जो OpIndia को निशाना बना रहे थे, उन सभी ने एक-दूसरे को ‘विश्वसनीय’ स्रोत के रूप में उद्धृत किया गया था। इससे उद्धरणों का एक ऐसा चक्र बन गया, जो हिंदुत्व को धार्मिक चरमपंथ का सबसे बड़ा खतरा, यहाँ तक कि इस्लामी जिहाद से भी बड़ा, साबित करने का प्रयास किया गया। इस्लामी-वामपंथी मीडिया भी हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार को प्रभावी ढंग से बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभा रहा है।
23 फरवरी 2026 को सोरोस द्वारा फंडिंग एसओएएस विश्वविद्यालय की 2022 की हिंदू विरोधी लीसेस्टर हिंसा की जाँच रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से, वैश्विक स्तर पर इस्लामी-वामपंथी मीडिया ने इसे ‘हिंदुत्व से ओतप्रोत लीसेस्टर हिंसा’ जैसी सुर्खियों के साथ खूब उछाला है।
भारतीय समाचार आउटलेट मध्यमाम ने अपनी रिपोर्ट को इस शीर्षक से प्रकाशित किया , “लीसेस्टर में हुए प्रदर्शनों में हिंदुत्व वाले नारे गूँजे, जिससे अशांति की स्थिति उत्पन्न हुई- जाँच”
इसी बीच मिडिल ईस्ट आई ने ‘लीसेस्टर दंगे: जाँच में पाया गया कि हिंदू राष्ट्रवादी विचारों और गलत सूचनाओं से फैली अशांति में भूमिका निभाई’ शीर्षक से अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की।
इस्लामी-वामपंथी प्रचार पोर्टल द वायर ने एसओएएस विश्वविद्यालय द्वारा निर्मित हिंदू-विरोधी बकवास को बढ़ावा दिया है और अपनी रिपोर्ट को “हिंदुत्व के नारों के कारण 2022 में लीसेस्टर हिंसा में वृद्धि हुई: रिपोर्ट” शीर्षक दिया।
इससे साफ है कि सुनियोजित रूप से एक समूह ने इस्लामी चरमपंथ और हिंसा को सही ठहराने के लिए निराधार हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार को बढ़ावा दिया। 2022 से उन्हीं घिसे-पिटे विचारों को दोहरा कर लेस्टर में हिंदू-विरोधी हिंसा के OpIndia के खुलासे को गलत करार देने की कोशिश OpIndia को उसके मिशन से विचलित नहीं कर सकते।
चाहे लेस्टर की हिंसा हो, बांग्लादेश और पाकिस्तान में या भारत में हिंदुओं का उत्पीड़न हो, या दुनिया के किसी भी कोने में, OpIndia ने वह सब कुछ रिपोर्ट किया है और करता रहेगा जिसे वामपंथी और मेनस्ट्रीम मीडिया ने अनदेखा किया। हम हिंदू-विरोधी हिंसक इस्लामवादियों को सही ठहराने और उन्हें मानवीय दिखाने के इस्लामी-वामपंथी प्रयासों के लिए हिंदुओं और हिंदुत्व को बलि का बकरा नहीं बनने देंगे, चाहे कितने ही ‘शोध पत्र’, विरोधी खबरें और बदनाम करने की साजिश हमारे खिलाफ की जाए।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
बीते कुछ समय में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई जघन्य आपराधिक घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्होंने ये साबित कर दिया कि मजहबी कट्टरपंथियों को हितैषी समझना खतरनाक कैसे है। ये घटनाएँ हत्या तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि इनमें विश्वासघात, क्रूरता, बदले की भावना, आर्थिक विवाद, मानसिक असंतुलन और कट्टर सोच जैसे कई खतरनाक पहलू उजागर हुए हैं।
इन सभी मामलों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि समाज को इस्लामी कट्टरपंथियों से पहले से कहीं अधिक सतर्कता, सावधानी की आवश्यकता है। नीचे वो सभी मामले बताए गए हैं, जिसे पढ़कर आप स्वयं समझ पाएँ कि इनसे दूरी ही भली है, क्योंकि ये असल में हिंदुओं की दोस्ती के काबिल ही नहीं है। नीचे की घटनाएँ आपको स्वयं इसका प्रमाण देंगी।
दिल्ली के अमन विहार में कर्ज न चुकाना पड़े, इसलिए हिंदू दोस्त की हत्या
दिल्ली के रोहिणी स्थित अमन विहार इलाके में पुलिस ने एक सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा किया, जिसमें महज 4 लाख रुपए का कर्ज न चुका पाने के कारण दो सगे भाइयों सोनू और महबूब अली ने 50 वर्षीय अजय कुमार की बेरहमी से हत्या कर दी।
पुलिस के अनुसार, अजय कुमार सेक्टर-20 रोहिणी के निवासी थे और 19 फरवरी 2026 से लापता चल रहे थे। आखिरी बार उन्हें प्रेम नगर इलाके में एक घर से अपनी मोटरसाइकिल पर निकलते हुए देखा गया था। 20 फरवरी को अमन विहार थाने में उनके भाई द्वारा गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।
कई दिनों तक खोजबीन के बावजूद जब कोई सुराग नहीं मिला, तो 23-24 फरवरी की रात मामला अपहरण और हत्या की आशंका में दर्ज कर जाँच को तेज किया गया।
CCTV और टेक्निकल सर्विलांस से खुली साजिश
जाँच के दौरान पुलिस ने इलाके के CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली और तकनीकी निगरानी शुरू की। एक फुटेज में एक संदिग्ध युवक अजय कुमार की मोटरसाइकिल को सुनसान जगह पर खड़ा करता हुआ दिखाई दिया। इसी अहम सुराग के आधार पर पुलिस प्रेम नगर निवासी दो सगे भाइयों सोनू और महबूब अली तक पहुँची और उन्हें हिरासत में लिया।
कड़ाई से पूछताछ करने पर दोनों ने हत्या की बात कबूल कर ली। आरोपितों ने बताया कि उन्होंने अजय कुमार से 10 प्रतिशत मासिक ब्याज पर 4 लाख रुपए का कर्ज लिया था, जिसे वे लंबे समय से चुका नहीं पा रहे थे। 19 फरवरी 2026 को जब अजय किश्त के पैसे माँगने उनके घर पहुँचे, तो दोनों पक्षों में तीखी बहस हो गई।
विवाद इतना बढ़ गया कि महबूब ने मीट काटने वाले चाकू और आरी से अजय पर ताबड़तोड़ वार कर दिए, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। हत्या के बाद दोनों भाइयों ने शव को ठिकाने लगाने के लिए नजफगढ़ ड्रेन के पास चंदन विहार इलाके में फेंक दिया।
पुलिस ने आरोपितों की निशानदेही पर शव बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा है। इस मामले में हत्या, साजिश और सबूत मिटाने की गंभीर धाराएँ लगाई गई हैं।
चित्रकूट में हिंदू व्यापारी के बेटे की अपहरण के बाद हत्या, मुठभेड़ में इरफान ढेर
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के बरगढ़ कस्बे में एक व्यापारी के 13 वर्षीय बेटे की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस जघन्य वारदात से पूरे इलाके में भारी आक्रोश फैल गया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
पुलिस जाँच में सामने आया कि आरोपित इरफान पहले मृतक बच्चे के पिता अशोक केसरवानी के घर किराए पर रहता था। 10 दिसंबर 2025 को किसी विवाद के बाद उसने कमरा खाली कर दिया था। इसके बाद बदले की भावना से उसने अपने साथी कल्लू के साथ मिलकर इस अपराध की साजिश रची।
बाइक सिखाने के बहाने बुलाया, बंद बक्से से बरामद हुआ मासूम का शव
22 जनवरी 2026 की शाम आरोपित ने बच्चे को बाइक चलाना सिखाने के बहाने घर से बुलाया और उसका अपहरण कर लिया। CCTV फुटेज और मुखबिरों की मदद से पुलिस ने तेजी से घेराबंदी की। इसके बाद हुई मुठभेड़ में मुख्य आरोपित कल्लू मारा गया, जबकि उसका साथी इरफान गोली लगने से घायल हो गया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस को बच्चे का शव एक बंद बक्से से बरामद हुआ। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया और व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। हालात की गंभीरता को देखते हुए जिले के आला अधिकारी मौके पर डटे रहे और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की गई।
बदायूँ में दो मासूम बच्चों की निर्मम हत्या: रमजान से पहले से खरीद रखा था चाकू
उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले में 19 मार्च 2024 को हुई घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। नाई की दुकान चलाने वाले साजिद ने दो मासूम बच्चों आयुष (13 वर्ष) और अहान (6 वर्ष) की बेरहमी से गला रेतकर हत्या कर दी। पुलिस जाँच में सामने आया कि साजिद ने हत्या से कुछ घंटे पहले एक नया चाकू खरीदा था।
जब उसके भाई जावेद ने पूछा तो उसने बहाना बनाया कि रमजान के दौरान गोश्त काटने के लिए चाकू चाहिए। दोनों भाई दुकान पर सामान्य रूप से काम कर रहे थे। इसके बाद साजिद ने तबीयत खराब होने का बहाना बनाया और दुकान बंद कर गाँव लौट गया। कुछ समय बाद दोनों वापस बदायूँ आए और फिर साजिद पीड़ित बच्चों के घर जाने की बात कहने लगा।
साजिद पिछले 4-5 वर्षों से पीड़ित परिवार के सामने दुकान करता था और परिवार से अच्छी पहचान थी। इसी भरोसे का फायदा उठाकर वह बच्चों के घर में दाखिल हुआ और अंदर जाकर दोनों बच्चों की गला रेतकर हत्या कर दी।
खून से सने कपड़ों में आया बाहर, पोस्टमार्टम में 23 वार
जावेद ने पुलिस को बताया कि साजिद खून से सने कपड़ों में बाहर आया और इसके बाद दोनों फरार हो गए। पुलिस मुठभेड़ में उसी दिन साजिद मारा गया, जबकि उसका भाई जावेद दो दिन बाद गिरफ्तार किया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दोनों बच्चों के शरीर पर कुल 23 धारदार हथियार से किए गए वार पाए गए, जो इस अपराध की क्रूरता को दर्शाते हैं।
पुलिस जाँच में सामने आया कि साजिद बचपन से बीमार रहता था, उसे कई बार दरगाहों पर ले जाया गया था, वह हिंसक प्रवृत्ति का था और उसे अचानक तेज गुस्सा आ जाता था। उसने पहले चूहे मारने की दवा भी खाई थी। पुलिस ने बताया कि वह हत्या करने का मन पहले से बनाकर गया था।
अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या: दोस्ती, कर्ज, भरोसा और फिर खौफनाक विश्वासघात
महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की हत्या के मामले में उनके छोटे भाई महेश कोल्हे ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। मुख्य आरोपित यूसुफ उमेश का बेहद करीबी दोस्त था। दोनों का एक-दूसरे के घर आना-जाना था और वे लंबे समय तक साथ में समय बिताते थे।
यूसुफ वेटरनरी अस्पताल में काम करता था और उमेश वेटरनरी दवाओं का कारोबार करते थे, जिससे दोनों के व्यावसायिक संबंध भी थे।
आर्थिक तंगी देख उमेश ने कई बार की थी मदद
समय के साथ यह कर्ज एक लाख रुपये से अधिक हो गया। यूसुफ को अपनी बहन की शादी के लिए पैसों की जरूरत थी, जिसके लिए उसने उमेश से सहायता माँगी और रकम ली, लेकिन कभी लौटाई नहीं। यूसुफ ने अपने बच्चों को मुस्लिम स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए उमेश से संपर्कों का इस्तेमाल करने को कहा।
उमेश की सिफारिश पर स्कूल में बच्चों को एडमिशन मिला। दोनों एक व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन थे। उमेश से गलती से एक पोस्ट फॉरवर्ड हो गया, जिसके बाद कट्टर मानसिकता और उग्रता ने इस पूरे मामले को हत्या तक पहुँचा दिया। आरोपित यूसुफ उस व्हाट्सएप ग्रुप का एडमिन था, जिसमें उमेश ने में नूपुर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट को फॉरवर्ड कर दिया था।
असावधानी ले सकती है आपकी जान
यह सभी मामले अपने आप में एक चेतावनी हैं, जो कह रहे हैं कि इस्लामी कट्टरपंथियों पर भरोसा, उनसे दोस्ती न सिर्फ आपकी बल्कि आपके मासूम बच्चों की जिंदगी भी खतरे में डाल सकती है। इन सभी मामलों में किसी भी मृतक का कोई बहुत बड़ा दोष नहीं था, लेकिन अगर कट्टरपंथियों को दोस्त बनाना, उनके साथ तालमेल बढ़ाना आपकी हत्या भी करा सकता है, तो ये बड़ा दोष ही साबित होता है, ऐसे में जरूरी है कि सतर्क रहें और ये समझने की भूल ना करें कि हर मुस्लिम एक जैसा नहीं और इनसे आपको कोई खतरा नहीं।
आज के दौर में जहाँ दुनिया गुटों में बँटी हुई है, वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति और व्यक्तिगत करिश्मे से अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परिभाषा बदल दी है। यह पीएम मोदी के व्यक्तित्व का ही जादू है कि रूस-यूक्रेन युद्ध हो या मध्य-पूर्व का तनाव, हर जगह शांति के लिए दुनिया भारत की ओर देखती है।
हाल ही में इजरायल की संसद में मिला सर्वोच्च सम्मान और इंस्टाग्राम पर 100 मिलियन फॉलोअर्स का आँकड़ा पार करना यह साबित करता है कि मोदी केवल भारत के प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि एक वैश्विक ‘ब्रैंड’ बन चुके हैं।
इजरायल और फिलिस्तीन: संतुलन साधने की अद्भुत कला
दुनिया के नक्शे पर इजरायल और फलस्तीन दो ऐसे नाम हैं जिनकी कट्टर दुश्मनी जगजाहिर है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी संतुलित और दूरदर्शी विदेश नीति से वह कर दिखाया जो वैश्विक कूटनीति में लगभग नामुमकिन माना जाता था।
2026 – Speaker of the Knesset Medal ( Israel )
2018 -Grand Collar of the State of Palestine
A rare world leader who have received top honours from both Israel and Palestine. pic.twitter.com/UzmIJIYdw5
पीएम मोदी की इस सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उन्हें इन दोनों ही धुर विरोधी देशों से सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ है। एक ओर जहाँ साल 2018 में फिलिस्तीन ने उन्हें अपने सबसे बड़े पुरस्कार ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ से नवाजा था, वहीं दूसरी ओर फरवरी 2026 में अपनी ऐतिहासिक इजरायल यात्रा के दौरान उन्हें वहाँ की संसद ‘केसेट’ के सर्वोच्च सम्मान ‘स्पीकर ऑफ द नेसेट मेडल’ से सम्मानित किया गया।
विशेष बात यह है कि पीएम मोदी इस प्रतिष्ठित पदक को पाने वाले दुनिया के पहले नेता बने हैं। एक ही राजनेता का इन दो परस्पर विरोधी राष्ट्रों द्वारा पलक-पाँवड़े बिछाकर स्वागत करना और उन्हें अपने उच्चतम नागरिक व संसदीय सम्मानों से विभूषित करना, निस्संदेह पीएम मोदी की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक जीत का सबसे सशक्त उदाहरण है।
डिजिटल किंग: 100 मिलियन फॉलोअर्स वाले पहले राजनेता
सोशल मीडिया की डिजिटल दुनिया में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई सानी नहीं है, जहाँ उन्होंने अपनी लोकप्रियता के झंडे गाड़ते हुए एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इंस्टाग्राम पर 100 मिलियन (10 करोड़) फॉलोअर्स का जादुई आँकड़ा पार करने वाले वे दुनिया के पहले राजनेता और विश्व नेता बन गए हैं।
इंस्टाग्राम पर पीएम मोदी के 100 मिलियन फॉलोअर्स
पीएम मोदी की इस वैश्विक स्वीकार्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी तुलना में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फॉलोअर्स की संख्या मात्र 43.2 मिलियन के करीब है, यानी मोदी को चाहने वालों की तादाद ट्रंप से दोगुनी से भी कहीं अधिक है।
यही नहीं, दुनिया के अन्य दिग्गज नेता जैसे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो (15 मिलियन) और ब्राजील के राष्ट्रपति लूला (14.4 मिलियन) भी प्रधानमंत्री मोदी की इस विराट डिजिटल लोकप्रियता के आसपास कहीं नहीं टिकते। यह उपलब्धि दर्शाती है कि पीएम मोदी न केवल नीतिगत रूप से बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय जननायक बन चुके हैं।
दुनिया भर की संसदों में गूंजी भारत की आवाज
पीएम मोदी ने अब तक दुनिया की 18 संसदों को संबोधित किया है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। हाल ही में पीएम मोदी ने घाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, नामीबिया और इथियोपिया की संसदों में भारत के विजन को रखा। हर जगह उन्हें ‘स्टैंडिंग ओवेशन’ मिला, जो बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत के बढ़ते कद को दर्शाता है।
सम्मानों की झड़ी: 33 देशों से मिला सर्वोच्च नागरिक सम्मान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत का मान बढ़ाते हुए एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जो भारतीय इतिहास में अब तक किसी अन्य नेता के नाम नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक सम्मान पाने का सिलसिला साल 2016 से शुरू हुआ और आज 2026 तक यह संख्या 33 के ऐतिहासिक आँकड़े पर पहुँच गई है।
शुरुआती दौर (2016-2019)
सऊदी अरब: ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुलअजीज (3 अप्रैल 2016) – पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मान
अफगानिस्तान: ऑर्डर ऑफ अमानुल्लाह खान (4 जून 2016)
फिलिस्तीन: ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन (10 फरवरी 2018)
संयुक्त अरब अमीरात (UAE): ऑर्डर ऑफ जायद (24 अगस्त 2019)
रूस: ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू (घोषणा 2019, प्राप्त 2024 में किया)
मालदीव: ऑर्डर ऑफ इज्जुद्दीन (8 जून 2019)
बहरीन: किंग हमद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां (24 अगस्त 2019)
वैश्विक विस्तार (2020-2024)
अमेरिका: लीजन ऑफ मेरिट (21 दिसंबर 2020) – डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रदान किया गया।
भूटान: ऑर्डर ऑफ द ड्रैगन किंग (दिसंबर 2021)
फिजी: कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ फिजी (मई 2023)
पापुआ न्यू गिनी: ग्रैंड कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ लोगोहू (मई 2023)
मिस्र: ऑर्डर ऑफ द नाइल (जून 2023)
फ्रांस: ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर (जुलाई 2023)
ग्रीस: ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ ऑनर (अगस्त 2023)
नाइजीरिया: ग्रैंड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द नाइजर (17 नवंबर 2024)
डोमिनिका: डोमिनिका अवार्ड ऑफ ऑनर (20 नवंबर 2024)
गुयाना: ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस ऑफ गुयाना (20 नवंबर 2024)।कुवैत: ऑर्डर ऑफ मुबारक द ग्रेट (22 दिसंबर 2024)
ऐतिहासिक वर्ष 2025 (सबसे सफल साल)
बीते वर्ष पीएम मोदी ने अपनी सक्रिय कूटनीति से 10 से अधिक नए देशों को इस सूची में जोड़ा।
बारबाडोस: ऑर्डर ऑफ फ्रीडम ऑफ बारबाडोस (5 मार्च 2025)
मॉरीशस: ऑर्डर ऑफ द स्टार एंड की ऑफ द इंडियन ओशन (11 मार्च 2025)
श्रीलंका: श्रीलंका मित्र विभूषण (5 अप्रैल 2025)
साइप्रस: ऑर्डर ऑफ मकारियोस III (16 जून 2025)
घाना: ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना (2 जुलाई 2025)
त्रिनिदाद और टोबैगो: ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद और टोबैगो (4 जुलाई 2025)
ब्राजील: ऑर्डर ऑफ द साउदर्न क्रॉस (8 जुलाई 2025)
नामीबिया: ऑर्डर ऑफ द वेलवित्सचिया (9 जुलाई 2025)
इथियोपिया: ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया (16 दिसंबर 2025)
ओमान: ऑर्डर ऑफ ओमान (18 दिसंबर 2025)
नया कीर्तिमान 2026
इजरायल: मेडल ऑफ द नेसेट (25 फरवरी 2026)- पीएम मोदी यह सम्मान पाने वाले पहले विश्व नेता बने।
इसके अलावा, अन्य मित्र राष्ट्रों और महत्वपूर्ण वैश्विक संगठनों द्वारा समय-समय पर दिए गए विशेष राजकीय सम्मानों को मिलाकर यह कुल संख्या 33 हो जाती है। इनमें दक्षिण कोरिया (सियोल शांति पुरस्कार) और संयुक्त राष्ट्र (चैंपियंस ऑफ द अर्थ) जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक निकायों के सम्मान भी शामिल हैं, जिन्होंने पीएम मोदी के नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च मान्यता दी है।
मजबूत अर्थव्यवस्था और निडर नेतृत्व
वैश्विक मंदी और व्यापार युद्ध के बीच भी पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की GDP वृद्धि दर 7.3% के करीब बनी हुई है। डोनाल्ड ट्रंप के ‘टैरिफ वॉर’ के सामने जहाँ दुनिया के कई देश झुक गए, वहीं मोदी ने भारतीय किसानों और छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा करते हुए कड़ा रुख अपनाया। आतंकवाद पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति के तहत ऑपरेशन सिंदूर और सिंधु जल संधि पर कड़ा फैसला लेकर उन्होंने साफ कर दिया कि भारत अब अपनी शर्तों पर चलता है।
चाहे भूटान के राजा का सड़क पर खड़े होकर स्वागत करना हो या रूस के राष्ट्रपति पुतिन का भारत को ‘भाग्यशाली’ बताना, ये केवल औपचारिकताएँ नहीं हैं। ये उस नए भारत की तस्वीर है जिसे पीएम मोदी ने पिछले 12 वर्षों में गढ़ा है। आज भारत सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि दुनिया का एक ऐसा स्तंभ है जिसके बिना वैश्विक शांति और प्रगति की कल्पना करना मुश्किल है।
आगे बढ़ने से पहले, जिन्हें नहीं पता, उन्हें मैं संक्षेप में बता दूँ कि कौन किस जेनरेशन से है:
Gen X – 1965-1980 के बीच पैदा हुए लोग Gen Y (मिलेनियल्स) – 1981-96 के बीच पैदा हुए लोग Gen Z (ज़ूमर्स) – 1997-2012 के बीच पैदा हुए लोग
जो लोग 2013 या उसके बाद पैदा हुए हैं, उन्हें Gen Alpha कहा जाता है, जबकि जो इनमें से किसी में नहीं आते, वे Baby Boomers या पुरानी जेनरेशन के लोग होंगे, अगर जिंदा हैं।
1980 में पैदा हुए किसी व्यक्ति के लिए, टेक्निकली अब मेरे बाद एक तीसरी जेनरेशन है (मेरे परिवार में नहीं, लेकिन आम तौर पर एक जेनरेशन को 15 साल माना जाता है) और मैं पहले से ही 2024 के किसी भी AI प्रोडक्ट की तरह आउटडेटेड महसूस करता हूँ।
लेकिन इस एहसास का मतलब यह भी है कि मैं युवा पीढ़ी को ज्यादा सुनने और अलग-अलग नजरियों को समझने की कोशिश करता हूँ। जिन चीजों में मेरी दिलचस्पी रही है, उनमें से एक है जाति की पहचान को लेकर युवाओं का नजरिया, खासकर अनारक्षित जाति के या यूँ कहें कि ‘ऊँची जाति’ के युवाओं का। मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि कई लोग मेरे मुकाबले ज्यादा रूढ़िवादी थे।
नौजवानों को समझने की मेरी कोशिशें UGC नियमों को लेकर हुए गुस्से के बाद शुरू नहीं हुईं हैं, ये पहले से चल रही थी।
इसमें कोई शक नहीं कि UGC नियमों को लेकर आए गुस्से में कई पुरानी पीढ़ी के लोग भी कूद पड़े हैं और कुछ तो इस गुस्से/आंदोलन का चेहरा भी बन गए हैं, लेकिन यह विरोध मुख्य रूप से Gen Z लोगों की तरफ से आया, जिन्हें यकीन दिलाया जा सकता था (और वे सही थे) कि कॉलेज जाने वाले युवाओं के सबसे अच्छे साल सिर्फ उनकी जाति के कारण इन नियमों की वजह से बर्बाद हो सकते हैं।
यह अजीब बात है कि कॉन्ग्रेस ने Gen Z के जरिए अशांति फैलाने की कोशिश में सचमुच करोड़ों रुपए खर्च किए, लेकिन उनमें से कोई भी हथकंडा काम नहीं आया। अरे, उन्होंने राहुल गाँधी को ऐसे दिखाने के लिए भी पैसे खर्च किए, जिसे Gen Z ‘सेक्स सिंबल’ मानता है, जो उन्हें अपनी मर्जी से कुछ भी करने के लिए मना सकता है, लेकिन कॉन्ग्रेस Gen Z को सड़कों पर नहीं ला सकी। आखिरकार उन्हें बाहर लाने वाली बात कुछ ऐसी थी, जो किसी कॉन्ग्रेसी ppt से नहीं, बल्कि एक सरकारी pdf से शुरू हुई थी।
वैसे, कॉन्ग्रेस में कोई तो इस ‘Gen Z अशांति’ को कराने का क्रेडिट ले रहा होगा और राहुल गाँधी से अपनी टीम का बजट बढ़ाने के लिए कह रहा होगा। हालाँकि, यह गुस्सा असल में ज़्यादातर ऑर्गेनिक रीच से आया है, न कि पेड कोशिशों से (जो कुछ मामलों में सोशल मीडिया के नेचर को देखते हुए हो भी सकता है।)
अब ऊँची जाति के युवा लोगों के बीच जातिगत पहचान के नजरिए पर वापस आते हैं। मैंने जो पहले कोशिशें की थीं, उनमें से एक 2024 के आम चुनावों से पहले की थी। उस वक्त कुछ राजपूत ग्रुप दो बातों पर नाराज थे। पहला राजा मिहिर भोज को लेकर विवाद, जिन्हें राजपूत राजा के बजाय गुर्जर राजा के तौर पर मना जाता था (यह राजपूत ग्रुप की शिकायत थी) और फिर BJP नेता पुरुषोत्तम रूपाला का बयान, जिन्होंने यह तर्क देते हुए राजपूतों को नाराज कर दिया था कि दलित राजपूत राजाओं की तुलना में अपनी राष्ट्रीय और हिंदू पहचान के प्रति ‘ज्यादा समर्पित’ थे (रूपाला ने बाद में माफी भी माँग ली।)
मुझे लगा कि ये दोनों ही इतने बड़े मुद्दे नहीं थे। मेरा मानना है कि अगर दलितों या OBC समुदायों को हिंदू धर्म की पहचान और विरासत से गर्व के साथ (और थोड़े गुस्से के साथ भी) जुड़ने की वजह दी जाती है, तो ऊँची जातियों को ‘समझौता’ करना चाहिए, क्योंकि यह अंबेडकरवादी कहानी से बेहतर है, जिसमें ऐसे समूहों के इतिहास को हिंदू पहचान से पूरी तरह अलग कर दिया जाता है।
जिन युवा राजपूत लोगों से मैंने बात करने की कोशिश की, उन्हें इस बात पर यकीन नहीं था या यूँ कहें कि उम्मीद नहीं थी। उनका कहना था कि यह कोई सामाजिक मेलजोल की कोशिश नहीं थी, बल्कि यह चोरी थी, बल्कि डकैती थी। उन लोगों ने तर्क दिया, “वे आज हमारे वंश और बहादुरी पर दावा करेंगे, कल वे हमारी पुरखों की संपत्ति और सम्मान पर दावा करेंगे।” उन्होंने आगे कहा कि “हम बिना लड़े हार नहीं मानेंगे।”
स्लिपरी स्लोप आर्गुमेंट हमेशा मुश्किल होते हैं, लेकिन मैंने आगे बहस नहीं की, क्योंकि मेरा मकसद बहस करना नहीं था, बल्कि समझना था। मुझे इस बात पर हैरानी हुई कि इस नौजवान में जाति की सोच काफी ज्यादा थी, जबकि मुझे लगा था कि यह नई पीढ़ियों में खत्म हो गई होगी या काफी कम हो गई होगी।
खैर, वह आदमी आज वापस आकर मुझसे कह सकता है कि ‘देखो, मैं सही था। पहले, उन्होंने हमसे हमारे इतिहास और विरासत को खत्म करने के लिए कहा, और अब हर ऊँची जाति के व्यक्ति को ज़ुल्म करने वाला बताकर सम्मान पर हमला किया जा रहा है’ उसने ऐसा नहीं किया, हालाँकि मैं उसे X पर UGC पर गुस्सा करते हुए देख सकता हूँ।
यह आर्टिकल असल में UGC नियम पर नहीं है, इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है, और कोर्ट ने उन पर रोक भी लगा दी है, लेकिन यह एक छोटी सी कोशिश है कि शहरी ऊँची जाति के Gen Z पिछली पीढ़ियों की तुलना में जाति को लेकर ज्यादा जागरूक क्यों दिखते हैं। जाहिर है, मैं आम लोगों की बात कहने का दोषी हूँ, क्योंकि Gen Z में हर कोई ऐसा नहीं होगा। लेकिन, सुनी-सुनाई बातों के ‘सबूत’ और UGC को लेकर गुस्सा दिखाता है कि मैं शायद बहुत गलत नहीं हूँ।
मुझे लगता है कि इसका मुख्य कारण ‘अनुभव’ है (वैसे यह शब्द लेफ्टिस्ट लोगों का पसंदीदा है)। मैं फिर से आम बात कहने का दोषी हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि शहरी ‘ऊँची जातियों’ की अलग-अलग पीढ़ियों के ‘अनुभव’ नीचे दिए गए तरीके से बताए जा सकते हैं:
बूमर्स से Gen Z तक: जाति की समझ कैसे बदली है
बेबी बूमर्स ने न सिर्फ यह देखा कि कुछ सेक्टर में ऊँची जाति का दबदबा था, बल्कि हो सकता है कि वे अपनी जिंदगी में किसी न किसी समय किसी न किसी रूप में कुछ श्रेष्ठतावादी सोच रखते हों। इसलिए इस पीढ़ी के बहुत से लोगों अपराधबोध हो सकता है, क्योंकि उन्होंने कुछ ‘ज़ुल्म’ खुद देखे हैं। उनमें से एलीट क्लास, जो औपनिवेशिक कहानी से भी प्रभावित थे, ने इन ऐतिहासिक गलतियों को ठीक करने के लिए पॉजिटिव एक्शन का सपोर्ट किया। याद रखें कि बंटवारे के बाद भारत की संविधान सभा में ऊँची जाति के हिंदुओं का दबदबा था।
हालाँकि सच में ‘ज़ुल्म की कहानी’ और उन ज़ुल्मों की वजह को लेकर कई मनगढ़ंत बातें होती रही हैं, लेकिन यह दावा करना बहुत बेईमानी होगी कि कोई भेदभाव कभी हुआ ही नहीं, खासकर 20वीं सदी में। आम तौर पर, बूमर्स, और उससे भी पहले की पीढ़ी, इस बात पर सहमत थी कि कुछ तबकों को ऐतिहासिक रूप से नुकसान हुआ है और उनके साथ भेदभाव हुआ है। इसलिए संविधान ने आरक्षण और दूसरी पॉलिसी की इजाज़त दी, जो ‘सकारात्मक भेदभाव’ की तरह हैं।
जनरेशन X और मंडल कमीशन
हालाँकि जनरेशन X ने कम भेदभाव देखे, लेकिन वे बूमर्स की कहानी से कमोबेश प्रभावित थे। मुझे लगता है कि उस अपराधबोध का एक बड़ा हिस्सा उन तक पहुँचा था, क्योंकि उन्होंने खुद ‘अत्याचार’ नहीं देखा लेकिन श्रेष्ठतावादी सोच जरूर देखी थी। अगर अपराधबोध न भी हो, तो भी एक हमदर्दी वाली सोच तो जरूर थी, खासकर SC/ST समुदाय के साथ, जिनके साथ गैर बराबरी वाला व्यवहार होता था।
वैसे Gen X वह पीढ़ी थी जिसने OBC आरक्षण की वकालत करने वाली मंडल कमीशन की सिफारिशों के खिलाफ सड़कों पर धरना-प्रदर्शन किया था। उनके पास यह अनुभव था कि आत्मदाह जैसे कदम उठाने के बावजूद इस आंदोलन का कोई फायदा नहीं हुआ।
उन्हें असल में यह महसूस कराया गया कि उनकी जिंदगी ‘सोशल जस्टिस’ से ज्यादा जरूरी नहीं है। पूरी संभावना है कि इस पीढ़ी ने बस ‘किस्मत का लिखा मान लेने’ और जो कुछ बचा है उसे बचाने की कोशिश की। कुछ ने तो बस देश छोड़कर विदेश में बसने का फैसला कर लिया।
मिलेनियल्स और जाति की पहचान
फिर मिलेनियल्स यानी Gen Y आए। उनमें से कई लोगों ने जातिगत भेदभाव से ज्यादा ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ के बारे में देखा या सुना था। ऐसा नहीं है कि इस समय तक भारत ‘निचली जातियों’ के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव से मुक्त हो गया था, लेकिन यह वही पीढ़ी थी जिसने इंटरनेट का इस्तेमाल करना शुरू किया था। नतीजतन, यह अब बूमर्स या जेन एक्स युग की मानी हुई मुख्यधारा की कहानियों की गुलाम नहीं थी। हालाँकि, मैं कहूँगा कि कई लोगों में अभी भी सकारात्मक सोच या आरक्षण के मुद्दे पर थोड़ी हमदर्दी बची हुई थी। इस पीढ़ी के समय में मंडल कमीशन जैसा कुछ नहीं हुआ था, जो उनकी जाति की चेतना को जगा सके।
साल 2006 में UPA सरकार का IITs, IIMs और AIIMs जैसे बड़े शैक्षणिक संस्थानों तक में OBC आरक्षण बढ़ाने का फैसला एक छोटी सी बात थी, इसका असर मंडल कमीशन जैसा व्यापक नहीं था। इसके दो कारण थे- एक, प्रभावित इलाका सीमित था और दो, कोर्ट ने यह पक्का किया कि आरक्षण की वजह से ऊँची जातियों के लिए उपलब्ध सीटें कम न हों। इंस्टिट्यूट से कहा गया कि वे अपनी क्षमता बढ़ाएँ ताकि अनारक्षित सीटों की संख्या पर कोई असर न पड़े। यह Gen X जैसा कड़वा अनुभव नहीं था, जहाँ किसी को परवाह नहीं थी, यहाँ तक कि जब उन्होंने खुद को आग लगा ली थी। कम से कम इस बार एक समाधान तो दिया गया।
मैं कहूँगा कि ऊँची जाति के शहरी मिलेनियल्स शायद अपनी जाति की पहचान को लेकर सबसे कम जागरूक थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि सबसे बुरा समय बीत चुका है और ब्रॉडबैंड और स्मार्टफोन के बाद की दुनिया एक अलग जगह है। इसीलिए जब PM मोदी ने अपनी मर्जी से सब्सिडी छोड़ने को कहा (जैसे LPG सिलेंडर सब्सिडी), तो मुझे याद नहीं कि मैंने कोई मजाक सुना हो जैसे “ ऊँची जातियों को कुछ क्यों छोड़ना चाहिए जब इस तरह इकट्ठा किया गया पैसा सिर्फ़ शोषित-वंचित की भलाई के लिए इस्तेमाल किया जाएगा?” मुझे यकीन है कि अगर सरकार की तरफ ऐसा ही आह्वान आज किया जाता है, तो एक्स पर मेरे कई फॉलोवर मुझे चौंका देंगे।
उस वक्त सभी सब्सिडी छोड़ रहे थे, यहाँ तक कि मुझे एसएमएस भी भेज रहे थे। अंबेडकर की लगातार तारीफ से भी कोई रेड फ्लैग नहीं उठा, क्योंकि मेरा मानना है कि मिलेनियल्स ने सिर्फ यह नहीं सोचा कि सबसे बुरा समय बीत चुका है, बल्कि उन्होंने जातिगत भेदभाव और असमानता के मुद्दे पर थोड़ी हमदर्दी बनाए रखी। जाहिर है ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ बाकी सब चीजों पर हावी हो गया।
अब हमारे पास Gen Z है
Gen Z के जाति-चेतन होने की संभावना ज़्यादा क्यों है? नहीं, वे बिना हमदर्दी वाले लोग नहीं हैं, लेकिन ये वो पीढ़ी हैं, जिसने ‘अत्याचार’ को खुद नहीं देखा है और शायद अपने माता-पिता (Gen X के बच्चे होने के नाते) में भी उस मानसिकता को महसूस नहीं किया। उनमें से शहरी लोगों के पास यह मानने के ज्यादा कारण हैं कि ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ होते हैं।
उन्होंने यह भी देखा है कि कैसे निचली जातियों के खिलाफ भेदभाव की कुछ न्यूज रिपोर्ट्स को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है (कई बार अपराधी ‘ऊँची जातियों’ के बजाय OBC होते हैं) और SC/ST एक्ट के गलत इस्तेमाल के बारे में भी सुनते आए हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से वे कट्टर अंबेडकरवादी कहानियों के भी भद्दे रूप में सामने आए हैं (उनके पास मिलेनियल्स के मुकाबले कहीं ज़्यादा फ्री और बिना सेंसर वाली एक्सेस हैं)।
आप इस पीढ़ी से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उन्हें बुरा लगे, क्योंकि उनका अनुभव बहुत अलग है। इस पीढ़ी में जो भी हमदर्दी पैदा हो सकती थी, वह नए अंबेडकरवादियों ने उनकी जाति की पहचान को टारगेट करके घटिया और भद्दी रील बनाकर खत्म कर दी है। सेलिब्रिटीज और मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने भी असहमति और ‘एंटी-कास्ट’ एक्टिविज्म के नाम पर ऐसे कई गाली-गलौज करने वाले ‘कंटेंट क्रिएटर्स’ को सपोर्ट किया है। ऐसे अनुभवों से इस पीढ़ी में जाति की समझ बढ़ी है, जिसे कुछ साल पहले जानकर मुझे थोड़ी हैरानी हुई थी।
इस पीढ़ी में गलती का एहसास तभी हो सकता है जब एजुकेशन सिस्टम पर पूरी तरह से कल्चरल मार्क्सिस्ट कब्जा कर लें, जो एथनिक आइडेंटिटी के आस-पास ‘ज़ुल्म करने वाले-ज़ुल्म वाले फ्रेमवर्क’ को असलियत की तरह दिखाते हैं। आह, अब आप समझे कि अलग-अलग यूनिवर्सिटी में ह्यूमैनिटीज डिपार्टमेंट (हालाँकि सिर्फ ह्यूमैनिटीज में ही नहीं) में वे पागल प्रोफेसर क्यों हैं? आपको लेफ्टिस्टों की तारीफ करनी होगी कि वे चुनौतियों को जानते हैं और सॉल्यूशन के लिए काम करते हैं। शायद उन्हें लगा कि उनके ब्रेनवॉश करने से Gen Z तैयार हो जाएँगे, लेकिन वे कामयाब नहीं हुए।
UGC नियम का एक हिस्सा, खासकर जाति-आधारित भेदभाव को ऐसा तैयार किया गया था कि विरोध पनपे। Gen Z ने ‘सोशल जस्टिस’ नैरेटिव के आगे सरेंडर करने के बजाय इसका विरोध करने का फैसला किया। यह दिखाता है कि लड़ाई पूरी तरह से हारी नहीं है।
‘सकारात्मक कार्रवाई’ बनाम Gen Z का अनुभव
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को अब किसी सकारात्मक कार्रवाई की जरूरत नहीं है, लेकिन सरकार और पॉलिसी बनाने वालों को ऊँची जाति के शहरी Gen Z को भी ध्यान में रखना होगा, जिनके अनुभव उनके अनुभव से बहुत अलग हैं।
मन में अचानक से यह ख्याल आ सकता है कि Gen Z को वही ‘ट्रीटमेंट’ क्यों न दिया जाए जो Gen X को मंडल कमीशन के दौरान दिया गया था? लेकिन यह उल्टा असर करेगा, क्योंकि Gen Z, Gen X नहीं है।
दूसरी ओर, कल्चरल मार्क्सवाद या अंबेडकरवादी कहानी के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों को भी यह समझने की जरूरत है कि Gen Z में जाति की समझ बढ़ी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे आपकी तरफ आने और आपके पसंदीदा प्रोजेक्ट, पारंपरिक हिंदू धर्म का फिर से उभरना, कल्चरल नेशनलिज़्म, ‘राइट विंग’ या कुछ भी, के झंडाबरदार बनने के लिए तैयार हैं। Gen Z घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे तलवार उठाने के लिए तैयार हैं।
UGC तो बस एक लक्षण है, मुद्दा जाति की समझ का है जो कई वजहों से वापस आ गई है, जिनमें से कुछ को मैंने संक्षेप में बताने की कोशिश की, इस जोखिम के साथ कि पूरे मुद्दे को और बढ़ा दिया जाए।
और जब मैं यह सब लिख रहा हूँ, तब जेनरेशन अल्फा स्कूलों में खेल रही है। इंतजार करें कि वे अपनी जाति का पता लगाएँ और AI से इसका मतलब पूछें।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
सत्ता की भूख में डूबी भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की राजनीति ने उसकी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रति दुश्मनी और राष्ट्रहित के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। नई दिल्ली की सत्ता में वापसी की बेचैनी के चलते पार्टी लगातार तथ्यों से दूर होती गई और जनता को अपने भ्रामक नैरेटिव के समर्थन में खड़ा करने के लिए अजीबोगरीब दावे और असत्य आरोपों का सहारा लेती रही, जबकि उसके राजनीतिक इतिहास में कई बार बड़ी विफलताएँ दर्ज हैं।
इसी क्रम में अब कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया है। इस बार मुद्दा भारत-अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते से जुड़ा है। यह हमला उस समय किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ को अवैध करार दिया है। कॉन्ग्रेस इस फैसले के बाद व्यापार समझौते को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर सवाल उठाने की कोशिश कर रही है।
राहुल गाँधी की चुनौती दी- PM मोदी रद्द करें भारत-US ट्रेड डील, जो है ही नहीं
राहुल गाँधी ने मंगलवार (24 फरवरी 2026) को भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को ‘भारतीय किसानों के दिल में धंसा तीर’ बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझौता कर चुके नेता के रूप में चित्रित करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया और कहा, ‘उन्हें फँसाया गया और समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया।’
राहुल गाँधी ने इस समझौते की मंजूरी के पीछे केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति गौतम अडानी की भूमिका होने का भी आरोप लगाया। भोपाल में आयोजित किसान महाचौपाल रैली में उन्होंने कहा, “अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया। इसके बाद उन देशों ने तुरंत अपने व्यापार समझौते समाप्त कर दिए। लेकिन नरेंद्र मोदी ने एक शब्द तक नहीं कहा। मैं इसी मंच से उन्हें खुली चुनौती देता हूँ कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता रद्द करें। अगर हिम्मत है तो करके दिखाएँ।”
उन्होंने आगे आरोप लगाया, “मैं भाजपा कार्यकर्ताओं से कह रहा हूँ कि वह कुछ नहीं करेंगे, क्योंकि उन पर अमेरिका और ट्रंप का दबाव है। वह इसलिए भी कार्रवाई नहीं करेंगे क्योंकि एपस्टीन फाइल्स का खतरा मंडरा रहा है और अडानी के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। भारत के साथ विश्वासघात हुआ है, यही सच्चाई है।”
मोदी जी, खुली चुनौती है – India-US Trade deal रद्द कर के दिखाइए।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के टैरिफ़ रद्द कर दिए, दुनिया भर के देशों ने अपने समझौते renegotiate कर दिए – आप क्यों खामोश हैं?
सारा देश जानता है आप ये नहीं कर सकते – क्योंकि आप अमेरिकी Grip में Choke कर पूरा… pic.twitter.com/DWODIeF9z7
राहुल गाँधी जो रायबरेली से सांसद हैं, उन्होंने दावा किया कि डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वयं ट्वीट कर बताया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे बातचीत कर आश्वासन दिया था कि चार महीने से लंबित पड़े इस समझौते पर वह हस्ताक्षर करेंगे।
उन्होंने आरोप लगाया, “प्रधानमंत्री लोकसभा से भाग गए और अगले दिन झूठा बहाना बनाया कि कॉन्ग्रेस की महिला सांसद उन पर हमला करने की योजना बना रही थीं। सच्चाई यह है कि वे संसद में खड़े नहीं हो पाए और उन्होंने ट्रंप को फोन किया।”
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने आगे कहा कि लोक सभा में इस मुद्दे पर जवाब देने से बचने के बाद प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल से भी कोई परामर्श नहीं किया। उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों शिवराज सिंह चौहान, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी का नाम लेते हुए कहा कि ट्रंप से बातचीत से पहले कैबिनेट को विश्वास में नहीं लिया गया था।
राहुल गाँधी ने आगे आरोप लगाया, “अमेरिका में एपस्टीन फाइल्स की लाखों दस्तावेजें अटकी हुई हैं। करीब 30 लाख दस्तावेज, जिनमें वीडियो, ईमेल और संदेश शामिल हैं, अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। हरदीप सिंह पुरी का नाम जारी कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की गई कि समझौते का पालन करो, नहीं तो और खुलासे किए जाएँगे।” उन्होंने इसे इस व्यापार समझौते के पीछे कथित पहला कारण बताया।
चार महीने से अमेरिका के साथ ट्रेड डील रुकी हुई थी।
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ दो कारणों की वजह से इसे साइन कर दिया।
⦿ पहला कारण-
अमेरिका में लाखों Epstein फाइलें बंद पड़ी हैं। लाखों फाइलों के ईमेल, मैसेज, वीडियो अभी तक रिलीज नहीं किए गए हैं।
राहुल गाँधी ने आगे उद्योगपति अनिल अंबानी का भी उल्लेख किया, जिनका नाम उन विवादित फाइलों में सामने आया था। उन्होंने कहा, “अनिल अंबानी मेरे मित्र नहीं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को उनके साथ अपने संबंध स्पष्ट करने चाहिए। ऐसे और भी कई नाम हैं जो अभी सामने आने बाकी हैं।”
इसके बाद उन्होंने गौतम अडानी का जिक्र करते हुए उन्हें दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण बताया। राहुल गाँधी ने आरोप लगाया, “अडानी ने देश पर कब्जा कर लिया है, एयरपोर्ट से लेकर सीमेंट तक हर जगह उनका नाम है। यह कोई छोटी कंपनी नहीं है, बल्कि यह नरेंद्र मोदी और भाजपा की वित्तीय संरचना है। अडानी पर अमेरिका में आपराधिक आरोप लगे हैं। वह अमेरिका या यूरोप नहीं जा सकते और जेल जाने के डर में हैं। इस मामले का असली निशाना अडानी नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी हैं। यही दो कारण हैं कि मोदी संसद से भागे और ट्रंप से कहा कि वह सभी शर्तें मानने को तैयार हैं और समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे।”
भारत-अमेरिका समझौता और कॉन्ग्रेस के लगाए आरोपों की सच्चाई
वास्तविकता राहुल गाँधी के बयानों से बिल्कुल अलग है। भारत और अमेरिका के बीच अभी तक कोई अंतिम व्यापार समझौता लागू नहीं हुआ है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने केवल एक रूपरेखा (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) को मंजूरी दी है और फिलहाल विस्तृत बातचीत जारी हैं, जैसा कि सामान्यतः FTA के मामलों में होता है।
ऐसी बातचीत कई महीनों से लेकर कई सालों तक चल सकती हैं, जब तक दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य शर्तें तय न हो जाएँ। दरअसल, अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भारत का एक प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन जाने वाला था, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह दौरा स्थगित कर दिया गया।
केंद्र सरकार ने द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में रणनीतिक धैर्य और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। इससे भारत को अन्य देशों की तरह जल्दबाजी में समझौता करने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पास शर्तों पर पुनर्विचार करने और बेहतर सौदेबाजी की अधिक गुंजाइश है।
इसी प्रकार यह भी स्पष्ट है कि नई दिल्ली ने मोदी सरकार के तहत स्वतंत्र और संप्रभु विदेश नीति को बनाए रखा है। व्हाइट हाउस द्वारा 50% टैरिफ लगाए जाने, रूसी तेल के आयात को रोकने की धमकियों और भारत-पाकिस्तान युद्धविराम वार्ता को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प के दावों के बावजूद भारत अपने रुख से नहीं हिला।
दूसरी ओर, विपक्ष और उससे जुड़े समूहों ने हर बड़े समझौते के बाद किसानों को भड़काने की कोशिश की है, ताकि असंतोष पैदा हो और प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुँचे। हालाँकि सरकार लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि सभी समझौते किसानों के हितों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अमेरिका के साथ प्रस्तावित समझौता भारत के कृषि हितों, विशेषकर खेती और डेयरी क्षेत्र की पूरी तरह रक्षा करता है। उनके अनुसार, “किसी भी बाजार खंड को इस तरह नहीं खोला गया है जिससे भारतीय किसानों को नुकसान हो।”
पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्पष्ट कहा था, “हमारे लिए किसानों का हित सर्वोपरि है। भारत कभी भी किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगा। व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़े तो भी मैं तैयार हूँ।”
जहाँ तक संसद से अनुपस्थित रहने का सवाल है, प्रधानमंत्री विपक्ष का सामना करने से नहीं भागे थे। लोक सभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें संभावित अप्रिय स्थिति से बचने के लिए आने से मना किया था। बिरला ने कहा, “मुझे विश्वसनीय जानकारी मिली थी कि कॉन्ग्रेस के कुछ सदस्य प्रधानमंत्री की सीट तक पहुँचकर अप्रत्याशित घटना को अंजाम दे सकते थे।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी कोई घटना होती, तो इससे राष्ट्र की गरिमा को गंभीर क्षति पहुँचती। इसी कारण प्रधानमंत्री से संसद न आने का अनुरोध किया गया था।
अडानी की बार-बार की बयानबाजी
इंडियन नैशनल कॉन्ग्रेस (INC) ने चुनावी मैदान में साफ़्रन पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी को हारने में असफल रहने के बाद अडानी और अंबानी पर तंज कसने की रणनीति अपनाई है।
राहुल गाँधी ने एक बार फिर पुराने आरोप दोहराते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी, गौतम अडानी के साथ मिलीभगत में हैं और अमेरिका में उन्हें बचाने के लिए राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचाया गया।
इससे पहले वे यहाँ तक कह चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प को अडानी के मुद्दे पर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहिए। हालाँकि इन कथित सांठगांठ के आरोपों को स्वयं उद्योगपति ने खारिज किया है और इनके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य भी सामने नहीं आया है।
वहीं, कॉन्ग्रेस पर दोहरे मापदंड और स्पष्ट पाखंड के आरोप भी लगते रहे हैं, क्योंकि जिन राज्यों में उसकी या विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहाँ अडानी समूह के साथ व्यावसायिक गतिविधियाँ जारी हैं, जबकि सार्वजनिक मंचों से बिना प्रमाण आरोप लगाए जाते हैं।
2023 में ‘आप की अदालत’ कार्यक्रम में पत्रकार राजत शर्मा से बातचीत में गौतम अडानी ने कहा था, “आप प्रधानमंत्री मोदी से कभी व्यक्तिगत लाभ नहीं ले सकते। आप राष्ट्रीय हित की नीतियों पर चर्चा कर सकते हैं, लेकिन जब नीति बनती है तो वह सबके लिए होती है, सिर्फ अडानी समूह के लिए नहीं।”
उन्होंने यह भी बताया, “हम हर राज्य में अधिकतम निवेश करना चाहते हैं। अडानी समूह 22 राज्यों में काम कर रहा है और ये सभी भाजपा-शासित नहीं हैं। हम वामपंथी सरकार वाले केरल में भी काम कर रहे हैं, ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में नवीन पटनायक के ओडिशा में जगनमोहन रेड्डी के आंध्र प्रदेश में और के चंद्रशेखर राव के तेलंगाना में भी।” इस तरह उन्होंने यह संकेत दिया कि विभिन्न दलों द्वारा शासित राज्यों में भी उनके साथ कारोबार हो रहा है।
गौरतलब है कि अडानी और मुकेश अंबानी की संपत्ति में तेज वृद्धि संयुक्त प्रगतशील गठबंधन (UPA) सरकार के कार्यकाल के दौरान भी हुई थी, जबकि अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि केवल मोदी सरकार ने कथित क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा दिया। 2011 में अडानी समूह के प्रमुख की संपत्ति बढ़कर 33211 करोड़ रुपए हो गई थी, जिससे वे देश के बड़े संपत्ति सृजनकर्ताओं में शामिल हुए।
इसके अलावा न तो अडानी समूह और न ही रिलायंस समूह उन कंपनियों की सूची में शामिल थे जिन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे थे। इससे भाजपा के साथ उनके कथित वित्तीय संबंधों के आरोपों को और कमजोर माना गया। बावजूद इसके, कॉन्ग्रेस द्वारा इन मुद्दों पर लगातार हमले जारी रखे गए, यहाँ तक कि देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ दावों को खारिज किए जाने के बाद भी।
हरदीप पुरी का प्रोपेगैंडा में शामिल होना
हरदीप सिंह पुरी का नाम एपस्टीन फाइल्स में सामने आने के बाद INC ने इसे मोदी सरकार को घेरने के लिए एक गोटचा मोमेंट की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की। हालाँकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित ईमेल्स पेशेवर प्रकृति के थे और उनका दिवंगत बदनाम फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन से जुड़े किसी भी आपराधिक या संदिग्ध आचरण से कोई संबंध नहीं था।
इस बात की ओर अमित मालवीय ने भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रवक्ता की एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि जिन संवादों का हवाला दिया जा रहा है, वे आधिकारिक और पेशेवर प्रकृति के थे, न कि किसी अवैध या अनैतिक गतिविधि से जुड़े।
Sit down.
Read the entire email thread and you’ll see there is no reference whatsoever to anyone being supplied with girls — nothing in the conversation even points in that direction.
Epstein is writing to Kathryn Ruemmler, then White House Counsel in the Obama Administration,… https://t.co/ZNZ8lI4SK9
हरदीप सिंह पुरी ने NDTV को दिए एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा, “तीन मिलियन ईमेल्स में से सिर्फ तीन-चार संदर्भ हैं। मैं एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में एपस्टीन से कुछ मौकों पर मिला और केवल एक ईमेल का आदान-प्रदान हुआ। हमारी बातचीत का उसके अपराधों से कोई लेना-देना नहीं था। हमने ‘मेक इन इंडिया’ पर चर्चा की थी।”
उन्होंने आगे कहा, “मुझे एपस्टीन की गतिविधियों में कोई रुचि नहीं थी। उनके लिए मैं सही व्यक्ति नहीं था।”
पुरी ने यह भी जोड़ा, “मैं इस मुद्दे पर रक्षात्मक नहीं होना चाहता। मैं अपने जीवन में बहुत से लोगों से मिलता हूँ। जिन राजनीतिक स्तर के लोगों से मैं मिलता हूँ, उनमें से कई किसी न किसी मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं। कल ही कोई मुझसे ऐसे व्यक्ति के बारे में बात कर रहा था जो अंग तस्करी के मामले में दोषी था।” उनका कहना था कि केवल संक्षिप्त पेशेवर संपर्क के आधार पर उन्हें जेफरी एपस्टीन के कृत्यों के लिए जिम्मेदार ठहराना निरर्थक है।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दोहराया कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत पद से इस्तीफा देने के बाद उन्हें कुछ महीनों पश्चात अंतर्राष्ट्रीय शांति संस्थान (IPI) से जुड़ने का निमंत्रण मिला।
उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं IPI का स्थायी हिस्सा नहीं था। मैं IPI के तहत स्थापित ‘इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन मल्टीलेटरलिज्म’ (ICM) का महासचिव था। IPI में मेरे वरिष्ठ टेरजे रोड-लार्सन थे, जो जेफ्री एपस्टीन को जानते थे। IPI या ICM के प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में ही मैं उनसे तीन या अधिकतम चार बार मिला।”
‘चौकीदार चोर है’ से ‘पीएम समझौतावादी हैं’: कॉन्ग्रेस की एक और बड़ी गलती जारी है
INC और पूरे विपक्ष ने 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले राफेल लड़ाकू विमानों से जुड़े कथित घोटाले का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के नाम का भी हवाला दिया, ताकि भाजपा के चुनावी अभियान को रोक सकें।
हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अवसर में बदलते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने देश के चौकीदारों का अपमान किया है। इसके जवाब में उन्होंने ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू किया, जिसने व्यापक जनसमर्थन हासिल किया और विपक्षी नैरेटिव को कमजोर कर दिया।
चुनाव परिणामों में NDA ने 353 से अधिक सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया। बीजेपी ने अकेले 300 से अधिक सीटें जीतीं, जबकि कॉन्ग्रेस 55 से भी कम सीटों पर सिमट गई।
राहुल गाँधी स्वयं अपने पारंपरिक गढ़ अमेठी से चुनाव हार गए और संसद में बने रहने के लिए उन्हें वायनाड से चुनाव लड़ना पड़ा। इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट के नाम का राजनीतिक रूप से उपयोग करने पर उन्हें कोर्ट में माफी भी माँगनी पड़ी।
इसी प्रकार ‘प्रधानमंत्री समझौता कर चुके हैं’ वाली टिप्पणी को लेकर भी एक समान राजनीतिक रणनीति देखने को मिल रही है। भारत मंडपम में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट के दौरान इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने ‘गंदी और शर्मनाक राजनीति’ करार दिया। इसके बाद राहुल गाँधी ने एक वीडियो जारी कर कहा, “मैं और कॉन्ग्रेस के शेरदिल योद्धा देश की रक्षा करते रहेंगे, एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।”
उन्होंने वर्तमान में प्रसारित हो रहे गंभीर आरोपों को दोहराया, जो 2019 के नारे की तरह ही पुराने राजनीतिक फॉर्मूले की पुनरावृत्ति माने जा रहे हैं। परिणामस्वरूप, नकारात्मक और व्यक्तिगत हमलों की राजनीति को आमतौर पर व्यापक जनसमर्थन नहीं मिलता, जिससे विपक्ष की नाराजगी और कटुता बढ़ती है।
प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणी या उपहास पहले भी इन दलों के लिए लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस अपने पुराने राजनीतिक तौर-तरीकों पर कायम दिखाई देती है, भले ही इससे उसके चुनावी भविष्य या देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 2013 के सांप्रदायिक दंगों के एक बड़े मामले में आखिरकार हिंदू परिवारों को न्याय मिल गया है। कोर्ट ने कुटबा गाँव के मामले में 37 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। ये वे हिंदू युवक और परिवार थे जो 13 साल से जेल-कोर्ट का चक्कर काट रहे थे।
अखिलेश यादव की सरकार के समय इन बेगुनाहों पर झूठे मुकदमे ठोप दिए गए थे, जबकि केवल मुस्लिम पीड़ितों को मुआवजा देने का फैसला लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट तक इस पक्षपात पर भड़क गया था। आज योगी सरकार में इन हिंदू परिवारों की सांस में सांस आई है।
मुजफ्फरनगर के कुटबा में गई थी 8 मुस्लिमों की जान
बता दें कि 8 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर के शाहपुर थाना क्षेत्र के कुटबा गाँव में दंगे की आग भड़की थी। एक मुस्लिम परिवार के सदस्य इमरान ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि सैकड़ों लोगों की भीड़ ने सांप्रदायिक नारे लगाते हुए मुस्लिम घरों पर हमला कर दिया। राइफल, तमंचे, तलवार और धारदार हथियारों से फायरिंग हुई, घरों में आग लगाई गई, लूटपाट हुई और 8 मुस्लिमों की मौत हो गई।
मरने वालों में वहीद, शमशाद, इरशाद, तराबूद्दीन, कय्यूम, फैय्याज, मौमीन और एक महिला खातून शामिल थीं। इमरान ने कुल 110 लोगों पर FIR दर्ज कराई थी। बाद में विशेष जाँच दल (SIT) ने 36 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।
अब 13 साल बाद मिला हिंदुओं को न्याय, 8 की पहले ही हो चुकी है मौत
उस घटना के 13 साल बाद अब मंगलवार (24 फरवरी 2026) को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (POCSO कोर्ट नंबर 1) मंजुला भालोटिया की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यानी पुलिस और सरकार आरोपितों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकी। गवाहों के बयान बदल गए, साक्ष्य कमजोर थे। इसलिए 37 आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया गया। इनमें से 8 आरोपितों की पहले ही मौत हो चुकी थी।
बरी होने वालों के नाम हैं- कुंवरपाल, योगेंद्र उर्फ जोगेंद्र, मनोज, गुल्लू, सोनू, भालू, नीरज, लव कुमार, शौकी, बुरेश, प्रदीप, कालू, पप्पू, नीटू, पप्पू पुत्र ब्रह्मपाल, गुड्डू, नरेन्द्र, जितेन्द्र, भीम, राम सिंह, देस्सा, छोटू, जूली, दीपक, कल्लू उर्फ मदन, सोमपाल, नरेन्द्र, खजान, विकास, टुल्ली उर्फ कल्लू, धीरज, पिंटू उर्फ बिंदू, मनोज, राहुल, बिजेन्द्र और अन्य। ये सभी कुटबा गाँव के निवासी हैं।
इस फैसले के बाद हिंदू परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई। आरोपितों के परिजनों ने कहा कि 13 साल तक ये बेगुनाह जेल में सड़े, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहे। खेती-किसानी बर्बाद हो गई, बच्चे पढ़ाई छोड़ बैठे, परिवार टूट गए।
एक आरोपित के भाई ने बताया, “हमारे भाई-भतीजे निर्दोष थे। दंगे में दोनों तरफ से नुकसान हुआ, लेकिन अखिलेश सरकार ने केवल एक तरफ को पीड़ित मानकर मुआवजा दिया। हिंदुओं का सब कुछ लुट गया, लेकिन कोई सहायता नहीं मिली।”
अखिलेश राज में कैसे सुलगा था पूरा मुजफ्फर नगर?
साल 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिला गए थे। 27 अगस्त को कवाल गाँव में एक छोटी सी घटना से आग भड़की। जाट परिवार की एक लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगने के बाद दो जाट भाइयों सच्चिन और गौरव की हत्या हो गई। फिर बदले में मुस्लिम युवक शाहनवाज की हत्या हुई। इसके बाद 7 सितंबर को महापंचायत हुई, जिसमें भावुक भाषण दिए गए। 8 सितंबर को हिंसा पूरे जिले में फैल गई। कुल 62 लोग मारे गए, जिनमें 42 मुस्लिम और 20 हिंदू थे। 50 हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए, ज्यादातर मुस्लिम परिवार राहत शिविरों में पहुंचे।
बुरी तरह विफल साबित हुई थी अखिलेश सरकार
अखिलेश यादव की सरकार पर दंगों को रोकने में लापरवाही का आरोप लगा। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2014 में सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अखिलेश सरकार ने दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। सभी आरोपितों की गिरफ्तारी हो, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। कोर्ट ने मुआवजे पर भी फटकार लगाई। अक्टूबर 2013 में अखिलेश सरकार ने सिर्फ मुस्लिम परिवारों को 5 लाख रुपए मुआवजा देने का नोटिफिकेशन जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “सबको मुआवजा मिलना चाहिए, किसी एक समुदाय को नहीं।” बाद में सरकार ने मृतकों के परिजनों को 15 लाख रुपये देने का फैसला किया, लेकिन हिंदू परिवारों का कहना था कि उन्हें देर से और कम मदद मिली। कई हिंदू परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके घर लूटे गए, फसलें बर्बाद हुईं, लेकिन मुआवजा नहीं मिला।
योगी आदित्यनाथ सरकार आने के बाद कानून-व्यवस्था मजबूत हुई। पुराने दंगों के कई मुकदमों की सुनवाई तेज हुई। इस कुटबा मामले में भी कोर्ट ने सबूतों की कमी देखते हुए फैसला सुनाया। बचाव पक्ष के वकील अजय सहरावत ने कहा, “13 साल बाद सच्चाई सामने आई। अभियोजन पक्ष कुछ नहीं साबित कर सका। आरोपित निर्दोष थे।” सरकार के वकील नरेंद्र शर्मा ने भी कोर्ट में माना कि सबूत कमजोर थे।
इस फैसले का असर पूरे मुजफ्फरनगर पर पड़ा है। दंगे के समय के कई अन्य मामले भी इसी तरह बरी हो रहे हैं। 2026 में ही मोहम्मदपुर रायसिंह गाँव के 23 आरोपितों को भी बरी किया गया था। कुल मिलाकर 2013 के दंगों में 1100 से ज्यादा आरोपित बरी हो चुके हैं, सिर्फ मुट्ठी भर को सजा हुई है। हिंदू संगठनों का कहना है कि अखिलेश सरकार ने दंगों को राजनीतिक फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया। महापंचायत में शामिल नेताओं पर भी बाद में मुकदमे हुए, लेकिन कई वापस ले लिए गए।
अब विकास पर ध्यान दे रही योगी सरकार, जख्म भर रहे हैं
कुटबा गाँव आज भी शांत है, लेकिन पुराने घाव अभी भी ताजे हैं। हिंदू परिवार कहते हैं कि 13 साल की लड़ाई के बाद न्याय मिला। अब वे खेती पर ध्यान देंगे, बच्चों की पढ़ाई पूरी करेंगे। मुस्लिम परिवारों ने भी कहा कि दंगे दोनों तरफ के लिए अभिशाप थे। अब शांति बनाए रखनी चाहिए।
योगी सरकार ने दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास पर जोर दिया। नए सड़क, स्कूल, अस्पताल बने। कानून का राज कायम हुआ, जिससे ऐसे पुराने मामले जल्दी निपट रहे हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि कोर्ट का फैसला मान्य है। दोनों समुदायों को शांति बनाए रखनी चाहिए।
लोग बोले- योगी सरकार में मिला न्याय
यह फैसला सिर्फ कुटबा का नहीं, पूरे हिंदू समाज के लिए राहत है। जो परिवार बेगुनाह साबित हुए, वे अब सिर ऊँचा करके जी सकेंगे। अखिलेश के समय जो अन्याय हुआ, योगी के समय उसका सुधार हो रहा है। मुजफ्फरनगर के इतिहास में यह एक नया अध्याय है, जहां सच्चाई आखिरकार जीत गई।
दंगों के बाद कई परिवार बिखर गए थे। हिंदू युवक जेल में बंद थे, उनकी माँएँ-बहनें कोर्ट के बाहर रोती रहीं। कुछ आरोपितों की उम्र निकल गई, शादी-ब्याह रुक गए। अब वे कहते हैं, “भगवान का शुक्र है, योगी जी की सरकार में न्याय मिला।” पीड़ित मुस्लिम परिवारों को भी सहानुभूति है, लेकिन दोनों तरफ के निर्दोषों को न्याय चाहिए।
कुल मिलाकर यह फैसला दिखाता है कि न्याय की राह चाहे कितनी लंबी हो, सही समय पर पहुँच ही जाती है। योगी सरकार में उत्तर प्रदेश में ऐसा माहौल बना है जहाँ कोई भी बेगुनाह नहीं सताया जाता। मुजफ्फरनगर के इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि साक्ष्यों के बिना कोई सजा नहीं हो सकती। हिंदू परिवार अब राहत की सांस ले रहे हैं।