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आम दिनों में करो महिलाओं का अपमान, चुनावों के वक्त चिल्लाओ ‘नारीवाद’: कॉन्ग्रेसी नेताओं की दोगलई फिर उजागर, फेक वीडियो देख उड़ाया पत्रकार का मजाक

कॉन्ग्रेस पार्टी जिसका नारा रहा है-‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’, लेकिन उसने कभी लड़कियों, महिलाओं की इज्जत को समाज में उछालने में कोई शर्म नहीं की है। पार्टी के नेता कभी सोशल मीडिया पर तो कभी किसी इंटरव्यू में नारी को मजाक का केंद्र बनाते रहे हैं। अब कॉन्ग्रेस नेत्री डॉक्टर रागिनी नायक ने भी इसी नीचता में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की है।

रागिनी नायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आज तक की एंकर और पत्रकार चित्रा त्रिपाठी का एक वीडियो शेयर करते हुए ना सिर्फ उनका अपमान किया है, बल्कि सच्चाई सामने आने के बावजूद अपने पोस्ट को डिलीट नहीं किया है। आईए जानते हैं कि वीडियो में क्या है और कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी का इतिहास ही हमेशा महिलाओं के अपमान का रहा है।

इस फेक वीडियो में कथित तौर पर चित्रा कहती दिखती हैं, “बलूचिस्तान को देखिए, खैबर पख्तूनख्वा को देखिए।” इस पर पाकिस्तानी कहता है, “चित्रा जी बलूचिस्तान को देखने के लिए जनरल आसिफ मुनीर काफी हैं, मैं तो सिर्फ आपको ही देखूँगा आज, अगर मेरी नजरें आपसे हटी तो 50 किलो मेकअप, जो आप अपने चेहरे पर थोप के आई हैं उसका क्या फायदा?”

इस पर चित्रा कहती हैं, “मेकअप पर टिप्पणी मत करिए, आपके पाकिस्तान में भी खातूने करती हैं मेकअप।” तो वह कहता है, “बिल्कुल पाकिस्तानी औरतें मेकअप करती हैं, मगर अपने खर्चे से, आपके मेकअप का खर्चा तो मोदी जी का है ना।”

वीडियो के साथ रागिनी नायक ने लिखा, “चित्रा – मेरे Makeup पर टिप्पणी मत करिए..पाकिस्तानी खातूनें भी Makeup करती हैं। Pak पैनलिस्ट- बिल्कुल, पाकिस्तानी औरतें Makeup करती हैं, पर अपने खर्चे से..आपके Makeup का खर्चा मोदी जी का है ना। पाकिस्तानियों को शो पर बुला कर, उनके हाथों यूँ जलील होने की क्या मजबूरी है भला ???”

अगले ही ट्वीट में रागिनी नायक ने लिखा, “अब चित्रा कह रही हैं कि ये Video Fake है! चलिए अच्छा है! ऐसी बेइज्जती तो भगवान दुश्मन की भी ना कराए!” सोचने वाली बात है कि अगर चित्रा ने ये पुष्टि कर दी है कि वीडियो फेक है और रागिनी यह मान भी रहीं है तो भी अपना पोस्ट हटाया क्यों नहीं।

दरअसल उनका असल मुद्दा तो केवल एक महिला का मजाक उड़ाना था, बेइज्जती करना था। वो भी तब, जब बेइज्जती कर रहा व्यक्ति पाकिस्तान जैसे आतंकी देश का हो। साफ समझा जा सकता है कि नारीवाद के नाम पर चिल्लाने वाली इस पार्टी की नेताओं की मानसिकता क्या है।

इन्होंने ये बातें एक फर्जी वीडियो पर बोली हैं। यानी इन्हें प्रमाणिकता से लेना-देना नहीं होता, पाकिस्तान ही अगर इनके मतलब की बात कर देगा तो ये उसे कोट करके भारतीयों का मजाक उड़ा लेंगे।

रागिनी के साथ अलका लांबा को भी चित्रा त्रिपाठी ने दी नसीहत

कॉन्ग्रेस नत्री अलका लांबा ने भी X पर वहीं वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “चित्रा की क्या मजबूरी होगी जो पाकिस्तान के लोगों को अपने चैनल/शो में बुला कर चर्चा करवाने की? और यूँ उनके हाथों जलील होने की ??” अलका लांबा की पोस्ट पर जवाब देते हुए चित्रा ने लिखा, “अलका लांबा जी पाकिस्तान का यूट्यूबर अपने व्यूज बढ़ाने के लिये मेरे वीडियो में काँट छाँट करके फेक न्यूज तैयार करता है। आजतक कभी भी ये व्यक्ति मेरे शो का हिस्सा नहीं रहा।”

चित्रा ने आगे लिखा, “हैरानी होती हूँ जब कॉन्ग्रेस के बड़े पद पर बैठी महिला एक न्यूज एंकर के पीछे पड़ जाये, आप लगातार मेरे उपर टिप्पणी करती हैं और मैं इग्नोर करती हूँ। मगर मैडम पाकिस्तानी फेक न्यूज के एजेंडे में मत पड़ें। पाकिस्तान से आपकी मोहब्बत आपका ही नुकसान करेगी।”

मंडी में रं&… रेट सही मिलता है’: कॉन्ग्रेसियों ने कंगना रनौत पर की थी अभद्र टिप्पणी

भाजपा की ओर से हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से अभिनेत्री कंगना रनौत को टिकट मिलने के बाद उनके खिलाफ भी अभद्र टिप्पणियों की बाढ़ आ गई थी। टिप्पणी करने वालों में कॉन्ग्रेस के पदाधिकारी और इस्लामी नामों वाले अकाउंट थे।

खुद को नारीवादी और पत्रकार बताने वाली मृणाल पांडे ने एक्स पर लिखा, “शायद यूँ कि मंडी में सही रेट मिलता है?” हालाँकि चौतरफा छीछालेदर के बाद कॉन्ग्रेसी मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की संपादक मृणाल पांडे ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

कॉन्ग्रेस की ही राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के अकाउंट से लिखा गया, “क्या भाव चल रहा है मंडी में कोई बताएगा?” यह पोस्ट भी श्रीनेत के अकाउंट से हटा दिया गया है। इस पर सुप्रिया श्रीनेत ने सफाई दी है कि उनके फेसबुक और इन्स्टाग्राम अकाउंट को किसी और का भी एक्सेस था और उसने यह पोस्ट की। उन्होंने कहा है कि वह ऐसा पोस्ट कभी नहीं करती।

सबसे घटिया बात कि कंगना का विरोध करने वालों ने भाषाई स्तर की बिलकुल भी परवाह नहीं की। एक और ट्विटर यूजर ने कंगना की एक फोटो के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

‘भगवा रंग की ब्रा पहन भक्तों को जवाब दें’: पठान के बचाव में कॉन्ग्रेसी उदित राज का बयान

बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान की फिल्म पठान (Pathaan) में ‘भगवा रंग’ के गाने को लेकर काफी विवाद हुआ था। इस बीच कॉन्ग्रेस के नेता उदित राज (Udit Raj) ने नारीवादियों से भगवा रंग की बिकनी और ब्रा पहनने की सलाह दी थी। इसको लेकर वो सोशल मीडिया यूजर के निशाने पर भी आ गए थे।

अक्सर विवादों में रहने वाले भाजपा के पूर्व नेता और वर्तमान में कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल उदित राज ने अपने ट्वीट में लिखा था, “स्त्रीवादियों से मेरी सलाह है बिकनी और ब्रा आदि भगवा रंग का ही पहनकर इन भक्तों को जवाब दें।” सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा कि इसकी शुरुआत उन्हें अपने घर से करनी चाहिए।

वहीं कुछ यूजर ने उन्हें मानसिक रूप से बीमार बताया है। एक अन्य यूजर ने लिखा, “जरा अपनी पार्टी के सबसे बड़े लीडर तक यह जवाब पहुँचा तो दो। यह जानबूझकर खाली सुनवाने के लिए यह ट्वीट किया गया लगता है। कसम खा लिए हो जबतक राहुल गांँधी को कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष नहीं बना देते ऐसे ही passive mode में गाली सुनवाते रहेंगे।”

अपनी असली मानसिकता स्वीकारो: नारीवाद को लेकर ढोंग क्यों?

देखा जाए तो कॉन्ग्रेस पार्टी को किसी भी महिला की इज्जत से कोई खास फर्क पड़ता नहीं है, तो फिर सवाल ये है कि नारीवाद-नारीवाद चिल्लाने की जरुरत क्या है? ये वहीं पार्टी है, जिसने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवगंत माँ को भी नहीं छोड़ा था। पार्टी अपने फायदे के लिए किसी को भी निशाना बना सकती है, चाहे आधार ही झूठा क्यों ना निकल जाए।

जिस पार्टी में देश की आधी आबादी की भी इज्जत ना हो, वह पार्टी, ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ जैसे नारे देकर ऐसे झूठे दिखावे करती है। सब छोड़िए पार्टी की महिला नेत्री भी खुद महिला होकर जब एक महिला की सरेआम बेइज्जती कर सकती हैं, तो फिर पार्टी के अन्य नेताओं से तो महिलाओं की इज्जत की क्या ही उम्मीद करना।




TOI ने मोदी सरकार के असली बयान से की छेड़छाड़, ईरान-अमेरिका सीजफायर की खबर में जबरन घुसाया ‘पाकिस्तान’ का नाम: पढ़िए कैसे किया खेल

मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के सीजफायर का भारत ने खुले दिल से स्वागत किया है। भारत सरकार ने इसे वैश्विक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी बताया, लेकिन इस सकारात्मक खबर के बीच अंग्रेजी अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (TOI) ने एक ऐसा नैरेटिव सेट करने की कोशिश की, जिससे भारत की कूटनीति से ज्यादा पाकिस्तान की ‘महारत’ की बू आ रही है।

भारत ने क्या कहा?

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने बुधवार (8 अप्रैल 2026) को बेहद संतुलित बयान जारी किया। भारत ने कहा कि हम इस युद्धविराम (Ceasefire) का स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि इससे पश्चिम में स्थायी शांति का रास्ता साफ होगा। भारत ने शुरू से ही ‘डिएस्केलेशन, डायलॉग और डिप्लोमेसी’ (तनाव कम करना, संवाद और कूटनीति) पर जोर दिया है।

भारत की सबसे बड़ी चिंता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर थी। मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि युद्ध ने लोगों को बहुत कष्ट दिए हैं, और वैश्विक व्यापार को बाधित किया है, इसलिए व्यापारिक जहाजों की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के होनी चाहिए।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्टिंग: भारत के नाम पर पाकिस्तान की ब्रांडिंग

हैरानी की बात यह है कि जहाँ भारत ने अपने बयान में कहीं भी पाकिस्तान का जिक्र तक नहीं किया, वहीं ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ ने अपनी रिपोर्ट की हेडलाइन में ही लिख दिया, “भारत ने पाकिस्तान की मध्यस्थता वाले युद्धविराम का स्वागत किया।” TOI ने अपनी रिपोर्ट में भारत के स्वागत को सीधे तौर पर पाकिस्तान की ‘सफलता’ से जोड़ दिया।

TOI की रिपोर्ट में यह दिखाने की कोशिश की गई कि पाकिस्तान एक बहुत बड़ा ‘इंटरमीडियरी’ (बिचौलिया) बनकर उभरा है। इतना ही नहीं, TOI ने यह भी दावा कर दिया कि MEA प्रवक्ता ने उम्मीद जताई है कि पाकिस्तान की इस ‘कोशिश’ से यूक्रेन युद्ध में भी शांति का रास्ता निकलेगा। यह एक तरह से भारत के बयान के कंधे पर रखकर पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत का ढोल पीटने जैसा है।

क्या छिपाने की कोशिश की गई?

TOI की रिपोर्ट में पाकिस्तान के ‘ब्रोकर’ रोल को तो बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। लेकिन इस बात को दबा दिया गया कि भारत का रुख हमेशा से ‘थर्ड पार्टी मेडिएशन’ (तीसरे पक्ष की मध्यस्थता) के खिलाफ रहा है। भारत का स्टैंड साफ है कि पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ है और जब तक वह सरहद पार आतंकवाद नहीं रोकता, भारत उससे कोई बात नहीं करेगा। लेकिन TOI ने इसे ऐसे पेश किया जैसे भारत को इस बात का डर है कि पाकिस्तान को इस शांति प्रक्रिया से ‘अंतरराष्ट्रीय वैधता’ मिल जाएगी।

होर्मुज मार्ग और भारत की प्राथमिकता

भारत की असली प्राथमिकता होर्मुज रास्ते से अपने LPG टैंकरों को सुरक्षित निकालना और खाड़ी देशों में रहने वाले 1 करोड़ भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत ने सीजफायर का स्वागत इसी व्यावहारिक आधार पर किया है, ना कि पाकिस्तान की मेजबानी की खुशी में। लेकिन TOI की रिपोर्ट में ऐसा महसूस कराया गया कि भारत पाकिस्तान की इस नई ‘भूमिका’ से असहज है।

पत्रकारिता या पड़ोसी की वकालत?

TOI की इस पूरी रिपोर्ट को पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे खबर का फोकस भारत का बयान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की इमेज चमकाना है। भारत ने ‘शांति’ का स्वागत किया था, पाकिस्तान की ‘मध्यस्थता’ का नहीं। विदेश मंत्रालय के बयान में कहीं भी पाकिस्तान के प्रति कृतज्ञता नहीं थी, लेकिन ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने अपनी रिपोर्ट में शब्दों की बाजीगरी कर इसे ‘पाकिस्तान ब्रोकर्ड’ (पाकिस्तान द्वारा कराया गया) करार दे दिया।

यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान और भारत के संबंध तनावपूर्ण हैं और भारत द्विपक्षीय मसलों में किसी तीसरे की दखल पसंद नहीं करता, TOI ने पाकिस्तान को एक ‘ग्लोबल पीसमेकर’ के रूप में पेश करने की कोशिश की। सरल शब्दों में कहें तो, भारत ने जो कहा वो ‘डिप्लोमेसी’ थी। लेकिन उसे जिस तरह रिपोर्ट किया गया वो ‘पाकिस्तान प्रेम’ की चाशनी में डूबा हुआ नैरेटिव था। भारत की चिंता अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर थी, जिसे TOI ने पाकिस्तान की तथाकथित इंटरनेशनल सफलता के डर में बदल दिया।

गौरव गोगोई ने इंटरनेट पर मौजूद खाली घरों की तस्वीरों को ‘चुराया’, कहा- इसे मेरे दोस्त ने दुबई से भेजा: नेटीजन्स भड़के, पूछा- क्या सिर्फ Fake न्यूज फैलाते हो?

कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई फिलहाल असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर अपने बेबुनियादी और निराधार आरोपों को लेकर चर्चा में हैं। इसी बीच अब वे अपने एक और झूठे दावे को लेकर घिर गए हैं।

गौरव गोगोई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कुछ फोटोज शेयर करते हुए दावा किया है कि यह तस्वीरें उनके दोस्त ने मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच दुबई से भेजी हैं। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहे कि वहाँ के हालात सही नहीं है और लोगों के घर खाली पड़े हुए हैं।

उन्होंने फोटो शेयर करते हुए लिखा, “मिडिल ईस्ट में मेरे दोस्त मुझे टाउनहाउस एड्रेस अटलांटिस द रॉयल रेजिडेंसेस, क्रेसेंट रोड, पाम जुमेराह, दुबई की तस्वीरें भेज रहे हैं।” इन तस्वीरों की सच्चाई जानने के लिए जब हमने इन तस्वीरें को Google पर सर्च किया तो सच्चाई कुछ और निकली। दरअसल यह तस्वीरें ‘Knight Frank’ नाम की वेबसाइट से चुराई (दूसरों की तस्वीरों को अपने नाम से बताया) गई हैं।

इन तस्वीरों की पुष्टि के लिए जब हमने रिवर्स Image किया तो इस साइट पर यह फोटो अपलोड मिली, जिसके बाद सामने आया कि असल में गौरव गोगोई जो दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, असल में वह बात है ही नहीं। अब सोशल मीडिया पर भी यूजर्स के बीच भी गौरव गोगोई अपना तमाशा बनवा रहे हैं। यूजर्स स्क्रिनशॉट्स शेयर कर उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं।

किसी ने कहा ‘पाईजान’ तो कोई दोस्त का नाम बता रहा ‘हमजा’

एक यूजर ने स्क्रिनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “आप एक धोखेबाज हैं। आप इस वेबसाइट से तस्वीरें चुरा रहे हैं। क्या आप अपनी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न का पाकिस्तानी बैंक खाता साझा कर सकते हैं?”

इसी तरह एक अन्य यूजर ने लिखा, “गौरव गोगोई जैसे लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं है… पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी ही एक फ्रॉड है।”

एक ने कॉन्ग्रेस पार्टी और गौरव गोगोई को टैग करते हुए लिखा, ” कॉन्ग्रेस पार्टी, गौरव गोगोई और कॉन्ग्रेस के बाकी लोगों को लगता है कि हम अभी भी इंटरनेट से पहले के जमाने में जी रहे हैं।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “गौरव गोगोई का कनेक्शन सीधा सरहद पार, लेकिन झूठ का यह नेटवर्क जल्दी डाउन हो गया।”

एक यूजर ने पवन खेड़ा को टैग करते हुए लिखा, “क्या ये पैजान भी भगौड़ा पवन खेड़ा की तरह भाग जाएगी।”

किसी ने लिखा कि ये ISI एजेंट है और फेक न्यूज फैलाता है तो किसी ने लिखा कि चुप रहो वर्ना पाकिस्तान भेज देंगे। किसी ने लिखा, “बस उसे नजरअंदाज कर दो, जैसे पूरे असम ने उसे नजरअंदाज कर दिया है (हमें कॉन्ग्रेस नहीं चाहिए)।”

इसी तरह तमाम यूजर्स ने जमकर गौरव गोगोई की बेइज्जती की है। गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से गौरव गोगोई अपने ऐसे ही झूठे दावों को लेकर सुर्खियाँ बटोरने का काम कर रहे हैं और फिर झूठे साबित हो रहे हैं।

वारंट लेकर आई गुजरात पुलिस, AAP विधायक गोपाल इटालिया ने माँ से बदसलूकी का लगा दिया आरोप: निकाय चुनावों से पहले ‘विक्टिम कार्ड’ का दाँव पड़ा उलटा

गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल भी तेजी से गरमाता जा रहा है। इसी बीच आम आदमी पार्टी के विधायक गोपाल इटालिया के एक दावे ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है।

उन्होंने गुजरात पुलिस पर आरोप लगाया कि वह उनके सूरत स्थित घर पर पहुँची और उनकी माँ के साथ दुर्व्यवहार किया। उन्होंने यह भी कहा कि यह सब राज्य के गृह मंत्री हर्ष संघवी के इशारे पर हुआ।

सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ विवाद

गोपाल इटालिया ने एक्स पर भावुक पोस्ट लिखते हुए सवाल उठाया कि क्या एक साधारण किसान परिवार से आने वाले व्यक्ति का राजनीति में आना अपराध है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनकी बुजुर्ग माँ को डराने-धमकाने की कोशिश की और सोसायटी के गार्ड से भी उनके आने-जाने के बारे में पूछताछ कर माहौल बनाने की कोशिश की गई।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार को उनसे कोई समस्या है तो उन्हें सीधे बुलाया जाए या गिरफ्तार किया जाए, लेकिन उनके परिवार को परेशान करना गलत है। इस दौरान उन्होंने खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जो राजनीति में बदलाव लाने आया है, लेकिन अब उनके परिवार को इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है।

पुराने विवाद भी आए चर्चा में

अहम बात ये भी है कि गोपाल इटालिया पहले भी विवादों में रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री और दूसरे नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। संतों और कथाकारों के बारे में भी अश्लील बयान दिए थे।

ऐसे में उनके साफ राजनीति वाले दावे पर भी सवाल उठने लगे। गोपाल के आरोपों को आम आदमी पार्टी के समर्थकों ने तेजी से वायरल किया। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी सोशल मीडिया के जरिए गुजरात पुलिस पर निशाना साधा और इसे राजनीतिक दबाव की कार्रवाई बताया। माहौल ऐसा बनाया गया कि चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं को डराने की कोशिश की जा रही है।

कुछ ही घंटों में सामने आई सच्चाई

लेकिन यह पूरा नैरेटिव ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया। कुछ ही घंटों में पुलिस ने घटना की जानकारी दी। दरअसल, गोपाल इटालिया के खिलाफ 2020 में मेहसाणा में एक FIR दर्ज हुई थी, जो अभी अदालत में लंबित है।

कोर्ट के बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद वह पेश नहीं हुए, तो अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। ऐसे में पुलिस ने कोर्ट के ऑर्डर को मानते हुए उनको गिरफ्तार करने पहुँची थी।

पुलिस क्यों पहुँची थी घर?

पुलिस के अनुसार, गोपाल घर पर नहीं मिले, इसलिए उनकी माँ से सामान्य पूछताछ की गई। इसके बाद टीम ने रिकॉर्ड के लिए घर की तस्वीर ली और बिना किसी विवाद के वापस लौट गई।

पुलिस ने साफ कहा कि किसी को न तो धमकाया गया और न ही किसी तरह का दुर्व्यवहार किया गया। यह केवल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा था।

वारंट की बात छुपाने पर सवाल

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि गोपाल इटालिया ने अपने पोस्ट में यह नहीं बताया कि पुलिस वारंट लेकर आई थी। उन्होंने पूरे मामले को भावनात्मक रूप देकर एकतरफा कहानी पेश की, जिससे लोगों में सहानुभूति पैदा हो सके।

इस बीच सोशल मीडिया पर एक ऑडियो क्लिप भी वायरल हो गई, जिसमें कथित तौर पर गोपाल इटालिया की आवाज सुनी गई। बातचीत में सामने वाला व्यक्ति जीतू कहता है कि पुलिस वारंट लेकर आ सकती है।

इस पर गोपाल जवाब देते हैं कि चिंता की बात नहीं है। वह स्थिति संभाल लेंगे। बाद में ऑडियो के सामने आने के बाद गोपाल इटालिया ने एक और वीडियो जारी किया और दावा किया कि यह AI से बनाया गया है और इसके पीछे हर्ष संघवी का हाथ है। आम आदमी पार्टी ने भी इसे फर्जी बताया।

हालाँकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि अगर ऑडियो फर्जी है, तो इसकी फॉरेंसिक जाँच (FSL) की माँग क्यों नहीं की गई? ऐसा करने से सच्चाई सामने आ सकती थी। लेकिन खबर लिखे जाने तक ऐसी कोई माँग नहीं की गई।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में लिखी हुई है। जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

बंगाल में वोटर लिस्ट से हटे ‘मुस्लिम’ नाम तो इस्लामी और वामपंथी बिलबिलाए: ‘पीड़ित’ वाली कहानी सुनाकर फैला रहे प्रोपेगेंडा, घुसपैठियों की संख्या कर रहे नजरअंदाज

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव के बाद करीब 90 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने के बाद राजनीतिक बहस छिड़ गई है। चुनाव आयोग ने मंगलवार (7 अप्रैल 2026) को ताजा डेटा शेयर किया है। उसके अनुसार, प्रक्रिया के आखिरी स्टेज में कुल 27,16,393 वोटर अयोग्य पाए गए।

शुरुआत में चुनाव ने 58.25 लाख वोटर्स के नाम हटा दिए। दिसंबर 2025 में प्रकाशित ड्राफ्ट में मरे हुए, गैर-मौजूद, शिफ्ट हुए या दो जगहों पर एंट्री वाले पाए गए थे। इनके नाम हटते ही कुल वोटरों की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ हो गया। 28 फरवरी 2026 को फाइनल सूची से और 5 लाख नाम हटा दिए गए। इसके बाद कुल हटाए गए नामों की संख्या 91 लाख से थोड़ी कम रह गई।

शुरू में जिन 60.06 लाख वोटर्स के नाम पर सवाल उठे थे, उनमें से लगभग आधे अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुर्शिदाबाद में हटाए गए। यह जिला मुस्लिम बहुल है। यहाँ 11 लाख वोटर्स में से 4.55 लाख से ज्यादा वोटर्स अयोग्य पाए गए। यह जिला बांग्लादेश की सीमा से लगा हुआ है, इसलिए यहाँ सबसे ज्यादा घुसपैठिए हैं।

दूसरी तरफ, झारग्राम में सबसे कम नाम कटे। यहाँ सिर्फ 1240 नाम हटाए गए। कोलकाता में बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटे। कोलकाता नॉर्थ में 39164, कोलकाता साउथ में 28468 नाम हटाए गए। भवानीपुर इसी जिले में आता है, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बीजेपी से सुवेंदु अधिकारी आमने-सामने हैं।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘टारगेट’ करने के आरोप

जैसे ही ये नंबर पब्लिक डोमेन में आए, तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार और अलग-अलग मीडिया संगठनों ने अपने तरीके से लिखना शुरू कर दिया। कहा गया कि चुनाव आयोग मुस्लिम वोटर्स को टारगेट कर रहा है। आरोप लगाने में सीएम ममता बनर्जी भी पीछे नहीं रही, उन्होंने EC और BJP की लीडरशिप वाली केंद्र सरकार पर ‘टारगेट करके नाम हटाने’ का आरोप लगाया।

नादिया में एक रैली के दौरान, उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी जानबूझकर मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यकों को बाहर कर रहे हैं, ताकि उनका वोटर बेस कमजोर हो सके। उन्होंने कहा कि यह ‘भेदभाव’ टीएमसी को नुकसान पहुँचाने की एक सोची-समझी चाल है।

कुछ मीडिया संगठनों ने इस खबर को हवा दी। देश भर की मीडिया में ‘लाखों मुस्लिम वोटर्स’ को हटाने को प्रमुखता से उठाया जाने लगा। पूरे एडमिनिस्ट्रेटिव काम को इस्लामोफोबिक प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया जाने लगा।

उदाहरण के लिए, हैदराबाद के एक उर्दू अखबार, द सियासत डेली ने 7 अप्रैल को एक रिपोर्ट छापी, जिसकी हेडलाइन थी: ‘पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में हटाए गए 95 प्रतिशत वोटर्स मुस्लिम हैं। “

कोलकाता की संस्था सबर इंस्टीट्यूट ने दावा किया कि नंदीग्राम के लिए 7 सप्लीमेंट्री लिस्ट में, 95.5% नाम हटाए गए। इसमें बताया गया कि नंदीग्राम की आबादी में मुस्लिम सिर्फ 25% हैं, लेकिन हटाए जाने का सबसे ज्यादा असर उन पर पड़ा। जबकि 75% गैर-मुस्लिम आबादी में सिर्फ 4.5% नाम हटाए गए। ये रिपोर्ट ‘टारगेट’ करने का एक ‘पैटर्न’ साबित करने के लिए बनाई गई थीं।

द स्क्रॉल जैसे दूसरे आउटलेट्स ने भी ऐसा ही किया, और सबर इंस्टीट्यूट के उसी डेटा का इस्तेमाल करके यह बताया कि SIR प्रोसेस असल में अल्पसंख्यकों के खिलाफ था।

हजारों हिन्दू वोटरों को हटाया गया

लेकिन, डेटा को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि ‘सिर्फ मुस्लिम’ वाली बात सच्चाई से परे है। असल में हजारों हिंदू नाम हटे हैं। इनमें मतुआ-नामशूद्र समुदाय से ज्यादा हैं। इससे बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। बोंगाँव लोकसभा सीट से सांसद बीजेपी के केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने इस पर जोर दिया है।

मतुआ इलाके के पाँच विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 1.38 लाख नाम हटाए गए हैं। चांदपारा ग्राम पंचायत में एक खास मामले में, एक सप्लीमेंट्री लिस्ट से 186 में से 183 नाम हटा दिए गए। इनमें से अधिकांश मतुआ समुदाय के हैं।

सबर इंस्टीट्यूट के अपने एनालिसिस में बताया है कि मतुआ क्षेत्र में 7.8% का कोई दस्तावेज नहीं था, जो राज्य में औसत से लगभग दोगुना है।

यहाँ तक ​​कि बागदा, बनगांव उत्तर और गायघाटा जैसी बीजेपी की जीती हुई सीटों में हजारों वोटरों को हटा दिया गया। लोकल बीजेपी नेता अब अपने समर्थकों को जवाब नहीं दे पा रहे हैं। ये पूछ रहे हैं कि अगर पार्टी केंद्र में सत्ता में है, तो उनके नाम क्यों हटाए गए।

बड़ा मुद्दा: गैर-कानूनी प्रवास और नकली वोटर

इस पूरी कवायद के मूल में घुसपैठ और नकली वोटर एंट्री का मुद्दा है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4095 K.M. लंबी बॉर्डर लाइन है, पश्चिम बंगाल 2216 किमी शेयर करता है, जो 54% से ज्यादा है। दोनों जगह के लोग भाषा और वेशभूषा के हिसाब से एक जैसे हैं। इसलिए पश्चिम बंगाल बांग्लादेशी घुसपैठियों से बहुत ज्यादा प्रभावित है।

पश्चिम बंगाल के दस जिले हैं जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। ये हैं- नॉर्थ 24 परगना, नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, नॉर्थ दिनाजपुर, साउथ दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। बॉर्डर के दोनों तरफ के लोग अक्सर भाषा और नस्ल के हिसाब से एक जैसे होते हैं, जिससे बॉर्डर पार आने-जाने वालों को ट्रैक करना मुश्किल काम है।

इस वजह से बांग्लादेश से घुसपैठ के मामले में पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक बन गया है। माना जाता है कि पिछले कुछ सालों में इन 7 जिलों में रहने वाले ऐसे कई लोगों ने पहचान पत्र हासिल कर लिए और अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा दिया।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा गैर-कानूनी बांग्लादेशी प्रवासी हैं। पिछले तीन सालों में 2600 से बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़कर बांग्लादेश वापस भेजा गया।

ये समझा जा सकता है कि अगर कोई नकली दस्तावेजों के साथ भारत में गैर-कानूनी तरीके से रह रहा है और इसकी जाँच होगी, तो ज़ाहिर तौर पर हटाए गए नामों में से ज़्यादातर ऐसे लोगों के नाम होंगे।

यह किसी धर्म के खिलाफ़ कोई ‘साजिश’ नहीं है; यह एक पुरानी समस्या पर प्रशासनिक कार्रवाई है।

डर का फैक्टर: बॉर्डर से भाग रहे घुसपैठिए

SIR के काम करने का सबसे बड़ा सबूत किसी स्प्रेडशीट में नहीं, बल्कि बॉर्डर पर मिलता है। जब से चुनाव आयोग ने पिछले साल नवंबर में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न के दूसरे फेज के लिए घर-घर जाकर गिनती की घोषणा की है, तब से गैर-कानूनी बस्तियों में डर का माहौल है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोगों के ग्रुप बैग और सामान लेकर हकीमपुर (बशीरहाट) जैसे चेकपोस्ट पर बांग्लादेश बॉर्डर की ओर वापस जाते हुए दिख रहे हैं।

DD न्यूज और सोशल मीडिया क्लिप की रिपोर्ट में ऐसे लोग दिख रहे हैं जो 5, 7 या 10 साल से भारत में गैर-कानूनी तरीके से रह रहे थे, लेकिन अचानक उन्होंने जाने का फैसला कर लिया। उनमें से कुछ ने कैमरे पर खुलेआम माना कि उनके पास कोई डॉक्यूमेंट नहीं थे और वे यहाँ गैर-कानूनी तरीके से रह रहे थे। एक आदमी ने बताया कि वह कोलकाता एयरपोर्ट के पास बिराटी में रहता था, लेकिन उसके पास कोई पेपर नहीं था और वह सख्त वेरिफिकेशन प्रोसेस के डर से भाग रहा था। दूसरे लोग टैक्सी ड्राइवर या ईंट भट्टों में काम कर रहे थे, जो नकली ID की मदद से लोकल आबादी में घुल-मिल गए थे।

ऐसे ही एक वीडियो में कुछ लोग मान रहे हैं कि वे बगैर कागजात के भारत में रह रहे हैं। एक महिला ने कहा उनके पास कोई डॉक्यूमेंट नहीं हैं, लेकिन वह भारत में काम कर रही है। एक पुरुष ने कहा कि हाँ हम अवैध तरीके से रह रहे हैं।

कहा जाता है कि उनमें से कई लोग कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट और छोटे बिज़नेस में काम कर रहे थे, और सालों से लोकल लोगों के साथ घुल-मिल गए थे।

यह अचानक पलायन साबित करता है कि घर-घर वेरिफिकेशन के दौरान पकड़े जाने का डर असली है। सालों तक राजनीतिक समर्थन और ‘सेक्युलर’ शील्ड ने इन गैर-कानूनी लोगों को रहने और वोट देने दिया। लेकिन EC के कड़ा स्टैंड लेने और 2002 से जुड़े डॉक्यूमेंट्री प्रूफ माँगने के बाद कई लोगों को भागना पड़ा।

नतीजा यह है कि जहाँ मीडिया ‘टारगेटेड डिलीशन’ पर फोकस करता है और राजनीतिक पार्टियाँ एसआईआर का इस्तेमाल पीड़ित बनने के लिए करती हैं, वहीं असलियत साफ दिख रहा है। पश्चिम बंगाल के वोटरों में घुसपैठिए बड़ी संख्या में शामिल थे।

अभी 91 लाख नामों को हटाना एक जरूरी सर्जरी है, ताकि सिर्फ भारतीय नागरिक ही राज्य का भविष्य तय कर सकें। चाहे मुर्शिदाबाद में कोई मुस्लिम हो या बोंगांव में कोई मतुआ, अगर आप अपना पहचान साबित नहीं कर सकते, तो आपका नाम लिस्ट में नहीं होना चाहिए।

(यह मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया लेख है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

नमाज, जहरीला साँप, अनपढ़… प्रिय राहुल गाँधी पहले अपने ‘शीर्ष’ दलित नेता खरगे जी को बोलने की मर्यादा का ‘ट्यूशन’ तो दिलवाइए!

लगातार तीन लोकसभा चुनाव में बुरी तरह मुँह की खाने वाली कॉन्ग्रेस अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। राज्यों की बात करें तो अब कॉन्ग्रेस की सरकार कुछ राज्यों जैसे- हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड, तमिलनाडु में रह गई है। एक के बाद एक राज्य उसकी हाथों से फिसलते रहे। इसमें नेताओं के बड़बोले बयान ने भी अहम भूमिका निभाई है।

पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इसमें कॉन्ग्रेस काफी आक्रामक दिखने का प्रयास कर रही है। खास कर असम और केरल में।

यहाँ पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयान लगातार सीमाएँ लाँघ रहे हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने पहले केरल में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाला बयान दिया, उसके बाद उन्होंने असम में इस्लामी तुष्टीकरण की कोशिश की।

असम में खरगे का मुस्लिम तुष्टिकरण वाला दाँव

असम विधानसभा चुनाव प्रचार थमने से चंद घंटे पहले मल्लिकार्जुन खरगे ने रैली के दौरान कहा कि ” यहाँ हिन्दू और मुस्लिम भाई बैठे हैं। अगर कोई जहरीला साँप आपके सामने से गुजर रहा है और नमाज भी पढ़ रहे हैं, तो नमाज छोड़कर पहले उस जहरीली साँप को मारना। ये कुरान में है और मैं यही कहूँगा। आप नमाज तोड़ने की परवाह ना करें। जहरीला साँप है बीजेपी और आरएसएस, इसको अगर आप नहीं मारेंगे, तो आप कभी नहीं बचेंगे।”
असम जैसे संवेदनशील राज्य में, जहाँ घुसपैठियों और बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी से जनता त्रस्त है। सरकारी जमीन पर बड़े पैमाने पर कब्जा कर चुके घुसपैठियों से असम के मूल निवासी परेशान हैं। इस चुनाव में घुसपैठियों को बाहर निकालने, एनआरसी, भूमि सुधार जैसे मुद्दे अहम बन गए हैं। ऐसे में मुस्लिमों की तुष्टिकरण के लिए कुरान और नमाज का नाम लेना और बीजेपी-आरएसएस को जहरीला साँप कहना, राजनीतिक के जबदस्त गिरते स्तर को दर्शाता है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस और उसके अध्यक्ष को यह इल्म भी नहीं है कि वह जिस पद पर हैं, उनकी बातें और बर्ताव देश के लोगों को रास्ता दिखाती है। इस तरह का बयान देकर देश को क्या संदेश देना चाहते हैं खरगे?

यही वजह है कि बीजेपी ने भी उन्हें चुनौती दे डाली है कि असम में चुनाव जीत कर दिखाएँ। गृहमंत्री शाह ने खरगे के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव में हार का डर सता रहा है इसलिए बीजेपी-आरएसएस पर इस तरह के बयान दे रहे हैं अध्यक्ष खरगे।

गुजरातियों को ‘अनपढ़’ कहा था खरगे ने

इससे पहले केरल के इडुक्की की एक रैली में उन्होंने गुजरातियों और उत्तर भारतीय राज्यों के लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मोदी गुजरात और दूसरे इलाकों के लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, क्योंकि वे अनपढ़ हैं, लेकिन केरल के लोग पढ़े-लिखे और समझदार हैं, वे बेवकूफ नहीं बनेंगे।

उन्होंने कहा, “केरल के लोग बहुत स्मार्ट हैं। वे बहुत पढ़े-लिखे हैं। मोदीजी… विजय (केरल के CM) आप दोनों गुजरात और दूसरी जगहों के अनपढ़ लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन आप केरल के लोगों को बेवकूफ नहीं बना सकते।”

केरल चुनाव में जाकर गुजरात और दूसरे राज्यों के लोगों को ‘बेवकूफ’ और ‘अनपढ़’ बताना क्या राज्यों में नफरत पैदा नहीं करता? क्या एक राज्य की तुलना में दूसरे राज्य को नीचा दिखाने की ये कोशिश नहीं है? गुजरात में पिछले दो दशक से ज्यादा वक्त से कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं लौटी है, तो अब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष जनता को ही ‘बेवकूफ’ समझने लगे हैं। हिन्दी राज्यों में भी पार्टी का बुरा हाल है। ऐसे में सत्ता से बेदखल होने पर जनता को ‘अनपढ़’ कहना, सिर्फ राज्यों का ही नहीं, देश का अपमान है।

हालाँकि उन्होने सोशल मीडिया पर इसके लिए खेद प्रकट कर दी और कहा कि उनके मन में गुजरातियों के लिए काफी सम्मान है। ऐसी टिप्पणियाँ रैली में कर उन्होंने जनता को ठेस पहुँचा दी और अब चुपके से खेद जता कर उसपर मरहम लगने की उम्मीद कर रहे हैं।

कर्नाटक चुनाव में पीएम मोदी को कहा था ‘साँप’

इससे पहले भी मल्लिकार्जुन खरगे ने ‘जहरीला साँप’ शब्द का इस्तेमाल किया था। वक्त था कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023। एक चुनावी रैली के दौरान उन्होने पीएम मोदी की तुलना ‘जहरीले साँप’ से की थी। उन्होंने कहा था कि मोदी जहरीला साँप की तरह हैं। आप इसे जहर समझें या न समझें, लेकिन अगर आप इसे चखेंगे, तो मर जाएँगे…आप सोच सकते हैं कि क्या ये जहर ठीक है। खरगे के खिलाफ कोर्ट में भी अर्जी दायर की गई थी।

महाकुंभ पर भी विवादित बयान

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खरगे न सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण वाले बयान देते हैं, बल्कि सनातन को अपमानित करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते। प्रयागराज महाकुंभ 2025 में जब लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाने के लिए त्रिवेदी के तट पर जुटे थे, उस वक्त खरगे ने कहा कि डुबकी लगाने से गरीबी दूर नहीं होगी और न ही किसी का पेट भरेगा।

मध्यप्रदेश के महू में रैली के दौरान उन्होंने गंगा स्नान को रोजी-रोटी से जोड़ा और तंज कसा। यह न सिर्फ उन करोड़ों लोगों का अपमान था, जो डुबकी लगाने के लिए देश के कोने-कोने से आए थे, बल्कि यह सनातन का भी अपमान था। क्या खरगे ऐसा ही बयान किसी दूसरे धर्म की परंपरा को लेकर दे सकते हैं?

इतना ही नहीं उन्होंने पीएम मोदी और गृहमंत्री शाह के लिए कहा था कि इनलोगों ने इतने पाप किए हैं कि उन्हें डुबकी लगाने से भी स्वर्ग नहीं मिलेगा। कॉन्ग्रेस का कोई नेता महाकुंभ में डुबकी लगाने तो नहीं गया था। अब शायद बगैर डुबकी लगाए ही उन्हें स्वर्ग मिलने का भान हो गया हो, तो बात अलग है।

RSS पर प्रतिबंध लगाने की खरगे ने की थी माँग

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 31 अक्टूबर 2025 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर कहा था कि आरएसएस पर फिर से प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने कहा था कि देश में कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के लिए यही संगठन जिम्मेदार है। हालाँकि उन्होंने इसे व्यक्तिगत विचार कहा, लेकिन खरगे के बयान के बाद सियासी बवाल हुआ था।

आरएसएस दुनिया की सबसे बड़ी स्वंयसेवी संस्था है। 100 साल का स्वर्णिम इतिहास वाली इस संस्था ने देश को दो सबसे सफल प्रधानमंत्री दिए हैं। एक नरेन्द्र मोदी और दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी। समाज को सही दिशा दिखाने वाली इस संस्था को जनता ने सिर आँखों पर बिठाया है। इस पर आरोप मढ़ कर खरगे जी कॉन्ग्रेस को कैसा मार्गदर्शन कर रहे हैं?

दरअसल कॉन्ग्रेस अपनी दयनीय हालत के लिए अपने कर्मों को नहीं, देश की जनता, आरएसएस, बीजेपी और पीएम मोदी को जिम्मेदार ठहराती है। 60 साल राज करने के बाद भी जनता एक के बाद एक तीन लोकसभा चुनावों और कई राज्यों में हरा चुकी है। सत्ता से बेदखल होने का दुख खरगे जी को इतना हो गया है कि अब जनता को ही बेवकूफ और अनपढ़ समझने लगे हैं।

कॉन्ग्रेस के नेताओं के विवादित बोल हमेशा चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुँचाते रहे हैं। चाहे वह सोनिया गाँधी का पीएम मोदी पर दिया गया ‘मौत का सौदागर’ वाला बयान हो या राहुल गाँधी का बिहार चुनाव के दौरान दिया गया ‘नाचने वाला’ बयान। फिलहाल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खरगे की बारी है, जिन्होंने केरल से असम तक बीजेपी-आरएसएस पर आपत्तिजनक टिप्पणी की और मुस्लिम तुष्टिकरण वाला बयान दिया।

उनका बयान विभाजनकारी, वैमनस्यपूर्ण और नफरत से भरा था। हालाँकि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि वे व्यक्तिगत बयान नहीं देते और उनके कहने का मतलब विचारधारा साँप की तरह हैं, जिसे चाटते ही मौत हो जाएगी। लेकिन राजनीति में बयान काफी मायने रखते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि कॉन्ग्रेस ने 60 साल के शासनकाल में क्या बोया, जिसे काटते वक्त उसे जहर की याद आ रही है। भ्रष्टाचार, वंशवाद, परिवारवाद से लेकर देश के विभाजन का आरोप कॉन्ग्रेस पर लगते रहे हैं। ऐसे में अपने प्रतिद्वंदी पार्टी को निचले स्तर पर आकर गालियाँ देना उनके राजनीतिक दिवालिएपन को दर्शाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब कॉन्ग्रेस ने व्यक्तिगत तौर पर पीएम मोदी, बीजेपी या आरएसएस पर आपत्तिजनक बयान दिया है, बुरी तरह हारी है।

‘मुसलमान बनो, विदेश से पैसा मिलेगा’: गुजरात में लालच देकर गिरोह ने सैकड़ों हिंदुओं से पढ़वाया कलमा, जानिए HC ने 2 मौलवियों की याचिका को खारिज कर क्या कहा?

गुजरात हाईकोर्ट ने 2021 में सामने आए धर्मांतरण मामले में दो मौलवियों की याचिका खारिज कर दी है। यह मामला भरूच जिले के आमोद तालुका से जुड़ा है। जस्टिस गीता गोपी की एकल पीठ ने 30 मार्च 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान और रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से पहली नजर में धर्मांतरण की गतिविधियों के संकेत मिलते हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है।

यह मामला नवंबर 2021 का है, जब आमोद पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंकड़िया गाँव और आसपास के आदिवासी इलाकों में करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। इस मामले में पुलिस अब तक कई आरोपियों के खिलाफ तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर चुकी है।

आरोपित मौलवी सरफराज उर्फ जावेद और रमिज राजा उर्फ औवेश अब्दुल गनी ने पहले सेशन कोर्ट में खुद को केस से हटाने की माँग की थी लेकिन वहाँ से उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों के खिलाफ गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट और आईपीसी के तहत मामले दर्ज हैं।

कोर्ट में क्या दलील दी गई?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील उमर फारूक एम. खराड़ी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गलत फैसला दिया है और आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों मौलवियों को झूठा फँसाया गया है और उन्हें काफी लंबे समय बाद तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में आरोपित बनाया गया है।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि दोनों लोग पेशे से मौलवी हैं और मजहब का प्रचार करना उनका काम है। वकील ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत धर्म का प्रचार करना एक मौलिक अधिकार है और इसलिए केवल धार्मिक गतिविधियाँ करने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनता।

सरकार ने किया साजिश का पर्दाफाश

सरकारी वकील भार्गव पंड्या ने बचाव पक्ष की दलीलों का विरोध करते हुए कोर्ट में कहा कि यह मामला सिर्फ धर्म प्रचार का नहीं बल्कि गरीब लोगों को लालच देकर धर्मांतरण कराने की एक सोची-समझी साजिश है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि आरोपित जावेद मुफ्ती पहले भी कई भोले-भाले ग्रामीणों के धर्मांतरण में सक्रिय रहा है।

जाँच में सामने आया है कि आरोपित लोगों को नकद पैसे, नए कपड़े और दवाइयाँ देते थे। इसके अलावा, आदिवासी परिवारों को एयर कूलर, वाटर कूलर, ठेले (हैंडकार्ट) और नमाज के लिए चटाई या चादर जैसी सुविधाओं का लालच देकर इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता था।

मुख्य शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसावा ने आरोप लगाया कि साल 2018 में उन्हें और अन्य परिवारों को लालच देकर धर्मांतरण कराया गया था और उनके आधार कार्ड तक बदल दिए गए थे। वहीं, अन्य गवाहों ने भी पुलिस को बयान देकर बताया कि आरोपित रमिज राजा लोगों को सुविधाएँ देने का वादा करके धर्मांतरण करवाता था।

पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने 2019 की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी अक्सर लग्जरी कारों में कंकड़िया गाँव आते थे। गाँव का एक व्यक्ति वहाँ नियमित बैठकें आयोजित करता था, जहाँ नमाज पढ़ी जाती थी और इस्लाम की जानकारी देने के नाम पर भाषण होते थे। पुलिस ने कोर्ट को यह भी बताया कि इन बैठकों के वीडियो सबूत के तौर पर उनके पास मौजूद हैं।

सरकारी वकील ने कहा कि गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2003 की धारा 5 और 2008 के नियम 3, 4 और 5 के तहत धर्मांतरण के लिए जो कानूनी अनुमति जरूरी है, उसका इस मामले में कहीं पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पालन न होना ही इस गतिविधि को अवैध और आपराधिक साबित करने के लिए पर्याप्त है और इसलिए आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आखिरकार, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को मान लिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में सबूतों और गवाहों के बयानों की जाँच करने के बाद ऐसा लगता है कि मामला बनता है। इसके अलावा, इस बात के भी सबूत हैं कि ये मौलवी सिर्फ धर्मांतरण करवाने के इरादे से ही बैठकें कर रहे थे। कोर्ट ने साफ किया कि ट्रायल कोर्ट ने सही फैसला लिया था और हाईकोर्ट इसमें कोई दखल नहीं देगा। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।

इसी मामले में गुजरात HC पहले भी अन्य आरोपितों की याचिकाएँ खारिज कर चुका है जिनमें FIR रद्द करने की माँग की गई थी। अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने ऐसी कुल सात याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस दौरान कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी भी की थी। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति खुद धर्म परिवर्तन करने के बाद दूसरों को भी धर्म बदलने के लिए उकसाता या लालच देता है, तो उसे सिर्फ ‘पीड़ित’ नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति को आरोपित भी माना जा सकता है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

क्या था पूरा मामला?

भरूच जिले के आमोद तालुका में जनजातीय हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किया गया यह सामूहिक धर्मांतरण कोई एक-दो साल की घटना नहीं थी बल्कि 2006 से 2021 तक चलने वाली एक सुनियोजित साजिश थी।

पुलिस जाँच के मुताबिक, कंकड़िया गाँव के करीब 37 जनजातीय हिंदू परिवारों के 100 से ज्यादा लोगों को लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था जिसमें विदेश से फंडिंग और स्थानीय स्तर पर सक्रिय गिरोह शामिल था। इनका मुख्य मकसद गरीब जनजातीय लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तन कराना था।

इस मामले की शुरुआत शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसंतभाई वसावा से हुई। उन्होंने बताया कि 2018 में उन पर दबाव डालकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया और उनका नाम बदलकर ‘सलमान पटेल’ कर दिया गया। बाद में उन्होंने पुलिस को बताया कि इलाके के लोग बेहद गरीब थे और आरोपितों ने इसी का फायदा उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआत में उन्हें शरिया कानून के मुताबिक जीवन जीने के लिए कहा गया लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि यह सब लालच और धोखे का खेल था।

जाँच में सामने आया कि आरोपितों ने धर्मांतरण के लिए ‘इनाम, लालच और दबाव’ की नीति अपनाई थी। गरीब आदिवासियों को पैसे, अनाज, नौकरी, पक्के मकान और शादी जैसी झूठी उम्मीदें दी जाती थीं। उन्हें लगातार यह बताया जाता था कि हिंदू धर्म में कुछ नहीं है और इस्लाम ही बेहतर है। इस पूरे खेल में कानूनी धोखाधड़ी भी की गई। गाँव वालों को बहलाकर सूरत ले जाया जाता था और वहाँ उनसे गाड़ी में बैठाकर दस्तावेजों पर साइन करवाए जाते थे ताकि उनके आधार कार्ड और अन्य सरकारी पहचान पत्रों में नाम और धर्म बदल दिया जाए।

नवंबर 2021 में आमोद पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में कई स्थानीय और विदेशी लोगों को आरोपी बनाया गया। इसमें शब्बीर और समद बेकरीवाला जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, लंदन में रहने वाले हाजी अब्दुल्ला फेफड़ावाला का नाम मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर सामने आया जो विदेश में धर्मांतरण की संख्या दिखाकर फंडिंग जुटाता था।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, आरोपित इस पूरी गतिविधि को एक ‘व्यवसाय की तरह चलाते थे जिसमें हर धर्मांतरण पर विदेश से पैसा मिलता था और उसी पैसे से आगे और लोगों को लालच दिया जाता था। धर्मांतरण के बाद जनजातीय बच्चों को जंबूसर और हजीरा के मदरसों में भेजा जाता था, जहाँ उनका ब्रेनवॉश किया जाता था।

इसके अलावा, उन्हें तबलीगी जमात के जरिए मालेगाँव और मुंबई जैसे शहरों में धार्मिक कार्यक्रमों में ले जाया जाता था ताकि उन्हें उनकी मूल संस्कृति से पूरी तरह अलग किया जा सके। गुजरात पुलिस ने इस मामले को सिर्फ एक स्थानीय अपराध नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की रची गई एक साजिश के रूप में पेश किया है।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

अहमद शाह ने कर्णावती में भद्रकाली के मंदिर को ध्वस्त कर बनवाई जामा मस्जिद, आज भी दिखते हैं हिंदू संस्कृति के सबूत: पढ़ें- अहमदाबाद की वो गाथा जो छिपाई गई

गुजरात की आर्थिक राजधानी माने जाने वाला अहमदाबाद आज सिर्फ अपने विकास के लिए ही नहीं बल्कि अपने इतिहास को लेकर भी चर्चा में है। विश्व हिंदू परिषद द्वारा शहर का पुराना नाम ‘कर्णावती’ वापस करने की माँग के बाद अब इसकी प्राचीन पहचान, संस्कृति और इतिहास को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

खास तौर पर सुल्तान अहमद शाह के समय हुए बदलावों और शहर की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में आए परिवर्तन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी संदर्भ में कर्णावती की नगरदेवी माता भद्रकाली से जुड़ा इतिहास एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कई ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि अहमदाबाद में कभी नगरदेवी माता भद्रकाली का एक भव्य मंदिर हुआ करता था लेकिन अब इसे मस्जिद में बदल दिया गया है।

बताया जाता है कि अहमद शाह ने इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद का निर्माण करवाया और इसे अपनी इस्लामी जीत का प्रतीक बनाया। इसे केवल एक मंदिर का टूटना नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान, संस्कृति और नगरदेवी के सम्मान पर हमला माना जाता है। आज भी जामा मस्जिद के 100 से ज्यादा खंभों पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ देखी जा सकती है। वहीं, भद्र किला का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर रखा गया बताया जाता है। यह इतिहास केवल अहमदाबाद का ही नहीं बल्कि हिंदू विरासत पर हुए हमलों का इतिहास है।

भद्रकाली: अहमदाबाद की नगरदेवी और हिंदू विरासत का जीवंत प्रतीक

प्राचीन समय से हर गाँव और नगर में उस स्थान की रक्षा करने वाली देवी-देवता का मंदिर बनाने की परंपरा रही है। यह वैदिक काल से चली आ रही है। वैदिक संस्कृति में कई तरह के देवता बताए गए हैं जैसे इष्टदेवता, देवता, फिर नगरदेवता-नगरदेवी, ग्रामदेवता और लोकदेवता। यह परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि समाज की संस्कृति और सामूहिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी थी।

जैसे आज भी काशी में कालभैरव को रक्षक देवता माना जाता है, वैसे ही कर्णावती में माता भद्रकाली को नगरदेवी का विशेष स्थान प्राप्त रहा है। आज के आधुनिक अहमदाबाद में भी माता भद्रकाली को नगरदेवी के रूप में माना जाता है।

सोलंकी-परमार काल में कर्णावती का माता भद्रकाली मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था बल्कि पूरे नगर की पहचान और आस्था का केंद्र था। माना जाता है कि यह भव्य मंदिर 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच परमार वंश के समय बना था।

माता भद्रकाली को शक्ति स्वरूप में पूजा जाता था और स्थानीय हिंदुओं के लिए यह मंदिर आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक बन गया था। यहाँ सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन के कई सांस्कृतिक पहलू भी फले-फूले। माता भद्रकाली का मंदिर कर्णावती की हिंदू पहचान और परंपरा का एक जीवंत प्रतीक था।

अहमद शाह का आक्रमण और मंदिर का विध्वंस

1411 में अहमद शाह ने कर्णावती पर हमला किया और उस पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने शहर का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद’ कर दिया। इसी के साथ उसने पूरे शहर का इस्लामीकरण करने पर जोर दिया। कई मंदिरों और हिंदू इमारतों को या तो तोड़ा गया या उन्हें इस्लामी ढाँचे में बदल दिया गया।

इसी दौरान अहमद शाह ने माता भद्रकाली के मंदिर को भी निशाना बनाया। माना जाता है कि उसने हिंदू नगरदेवी के इस मंदिर को गिराकर अपनी जीत का प्रतीक स्थापित करने के लिए उसकी जगह नया इस्लामी ढाँचा खड़ा किया। इस कदम को इस रूप में देखा जाता है कि शहर की पहचान बदलने का स्पष्ट संदेश दिया गया।

कहा जाता है कि 1411 से 1442 के अपने शासनकाल में अहमद शाह ने 1424 के आसपास भद्रकाली माता के मंदिर को तुड़वाकर उसी स्थान पर जामा मस्जिद का निर्माण कराया और मंदिर के अवशेषों पत्थरों और खंभों का इस्तेमाल किया। ‘मीरात-ए-अहमदी’ में अहमदाबाद और भद्र किले के निर्माण के वर्णन में आसपास के हिंदू स्थलों का भी उल्लेख मिलता है।

यह भी कहा जाता है कि भद्र किले का नाम इसी मंदिर से पड़ा और आज भी यह इलाका ‘भद्र’ के नाम से जाना जाता है जो उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है। इस घटना को केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान को खत्म करने की एक सुनियोजित कोशिश के रूप में देखा जाता है।

वास्तुकला और साफ नजर आती हिंदू छाप

जामा मस्जिद की बनावट को ध्यान से देखने पर सबसे पहले उसके खंभे और उनकी संरचना ध्यान खींचती है। इन खंभों पर बनी नक्काशी, कमल की आकृतियाँ और अन्य चिह्न हिंदू और जैन मंदिरों की शैली से मिलते-जुलते हैं। यह समानता इतनी गहरी है कि इनके मूल स्रोत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मस्जिद के हॉल में 100 से ज्यादा खंभे हैं जिन पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ दिखाई देती है। इनमें कमल, बेल-बूटे, मंडल, हाथी, कुंडलिनी सर्प, नृत्य करती अप्सराएँ, घंटियाँ और फूल जैसे कई पारंपरिक चिह्न बने हुए हैं। इस्लामी वास्तुकला में इन नक्काशियों को हराम माना जाता है और ये स्पष्ट रूप से यह साबित करती हैं कि यह मस्जिद कोई नई इमारत नहीं है बल्कि इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों और खंभों से बनाया गया है।

ये खंभे मस्जिद के हॉल के बीच में स्थित हैं जो नमाज के लिहाज से भी सामान्य नहीं माने जाते। इसे पुराने ढाँचे के पुन: उपयोग का एक अहम संकेत माना जाता है। इन खंभों की तस्वीरें और दस्तावेज ‘Reclaim Temples’ और ‘Booksfact’ जैसे स्रोतों पर भी हैं जो इस दावे को और मजबूती देते हैं।

ब्रिटिश गैजेटियर और अन्य ऐतिहासिक संदर्भ

19वीं सदी के ब्रिटिश सर्वे में भी इस स्थान के हिंदू मूल का उल्लेख मिलता है। ‘गैजेटियर ऑफ बॉम्बे प्रेसिडेंसी: अहमदाबाद (1879)’ में साफ लिखा है कि यहाँ पहले माता भद्रकाली का मंदिर था जिसे अहमद शाह ने तुड़वाकर जामा मस्जिद बनवाई। ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने जाँच के दौरान हिंदू प्रतीकों को देखा और उन्हें दर्ज भी किया। ये विवरण बॉम्बे गैजेटियर के वॉल्यूम IV में दिए गए हैं।

ऐसा कहा जाता है कि यह देवी भद्रकाली का मंदिर था। अहमद शाह ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इसके अलावा, ‘मिरात-ए-अहमदी’ में भी जामा मस्जिद का जिक्र मिलता है जिसमें कहा गया है कि यह मस्जिद अहमद शाह और इस्लाम की विजय का प्रतीक है यानी इसे हिंदुओं की रक्षक देवी, माता भद्रकाली के मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। ये सभी स्रोत इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यह विध्वंस कोई आकस्मिक घटना नहीं थी बल्कि एक सुनियोजित हमला था।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अहमदाबाद के बीचों-बीच आज भी भद्र किला मौजूद है, जिसका नाम सीधे भद्रकाली मंदिर से जुड़ा माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में यह भी लिखा है कि इस किले का नाम पाटन (अन्हिलवाड़) के प्राचीन भद्र किला और भद्रकाली मंदिर से प्रेरित है। कहा जाता है कि अहमद शाह ने इस किले का नाम नहीं बदला जबकि कई जगह यह भी उल्लेख मिलता है कि इस किले का निर्माण भी उसी के समय हुआ।

कुछ वामपंथी इतिहासकार सीधे यह नहीं कहते कि जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई बल्कि यह कहते हैं कि अहमद शाह ने किसी पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल किया। लेकिन सवाल वही रहता है कि ये अवशेष आए कहाँ से? इसका सीधा जवाब यही माना जाता है कि मंदिर को तोड़कर ही ये सामग्री ली गई होगी।

आज भी भद्र इलाके में माता भद्रकाली का मंदिर मौजूद है और ‘भद्र’ नाम लगातार चला आ रहा है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि इस जगह की पुरानी पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। स्थानीय मान्यताएँ और सांस्कृतिक यादें बताती हैं कि भले ही इमारतें बदल गई हों लेकिन पहचान पूरी तरह मिटती नहीं है।

इतिहास में यह एक आम प्रक्रिया मानी जाती है कि नई इस्लामी सत्ता पुराने हिंदू प्रतीकों की जगह ले लेती थी लेकिन वे किसी न किसी रूप में समाज की यादों में बने रहते हैं। भद्रकाली का संदर्भ भी ऐसी ही एक स्मृति का हिस्सा माना जाता है जो समय के साथ बदली जरूर है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

ईरान-US के बीच सीजफायर: समझें- क्यों खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’

ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

तो आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

डेडलाइन से पहले थमा ईरान-US का ‘महायुद्ध’, ट्रंप बोले- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलेगा तो तेहरान ने भी रखीं 10 शर्तें: जानें- अब तक क्या हुआ और सीजफायर का क्या होगा असर?

ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन से जारी युद्ध के बाद अब दोनों देशों ने सीजफायर की घोषणा कर दी है। ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए राजी हो गया है। इससे सहमत होते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों तक हमला रोकने का ऐलान किया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहाँ के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने अनुरोध किया कि आज रात ईरान पर होने वाले हमले को रोक दिया जाए। इस शर्त कि ईऱान तुरंत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए तैयार हो गया है, इसीलिए मैं दो हफ्तों के लिए हमले और बमबारी को रोकने के लिए सहमत हूँ। यह दोनों तरफ से युद्धविराम (सीजफायर) होगा।”

बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खुलवाने की डेडलाइन मंगलवार (07 अप्रैल 2026) को खत्म हो गई, जिसके बाद उम्मीद थी कि अमेरिका कोई बड़ा हमला करेगा। लेकिन डेडलाइन खत्म होने से कुछ घंटों पहले ही दोनों देशों के बीच सीजफायर पर बात बन गई। लेकिन इस सीजफायर की भी कुछ शर्ते हैं। ईरान ने 10 प्रस्ताव दिए, जिसे अमेरिका मानने को तैयार हुआ। तब जाकर यह युद्ध खत्म हुआ।

क्या हैं ईरान के वो 10 प्रस्ताव?

ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, अमेरिका ने इन 10 प्रस्तावों को स्वीकार किया है:

  • अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता होगा कि दोनों एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे
  • स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान का नियंत्रण बना रहेगा
  • ईरान को परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को मान्यता
  • अमेरिका द्वारा लगाए गए सभी मुख्य प्रतिबंध हटा दिए जाएँगे
  • दूसरे देशों पर असर डालने वाले सभी प्रतिबंध भी खत्म किए जाएँगे
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
  • ईरान को हुए नुकसान के लिए उसे मुआवजा दिया जाएगा
  • अमेरिका अपने सैनिकों को इस क्षेत्र से वापस बुलाएगा
  • हर जगह चल रही लड़ाई बंद होगी, जिसमें ईरान से जुड़े समूह जैसे लेबनान का हिज्बुल्लाह भी शामिल है
  • सीजफायर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खोलने से जुड़ा होगा

इन प्रस्तावों को मानते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते तक अस्थायी तनाव कम करने के लिए समझौता किया है। इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, क्योंकि दुनिया का 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। इसीलिए इस रास्ते को खोलना दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद जरूरी रहा। ईरान ने माना कि वह दो हफ्ते तक जहाजों को सीमित और नियंत्रित तरीके से गुजरने देगा।

जंग अभी खत्म नहीं हुई

अमेरिका के साथ सीजफायर पर बनी सहमति के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने अपनी मिलिट्री को गोलीबारी रोकने का आदेश दिया है। मोजतबा खामेनेई का यह निर्देश ईरान के सरकारी चैनल IRIB पर सीजफायर के ऐलान के दो घंटे बाद पढ़ा गया।

मोजतबा खामेनेई के बयान में कहा गया, “यह युद्ध का अंत नहीं है, लेकिन सभी सेना के हिस्सों को सुप्रीम लीडर के आदेश का पालन करते हुए गोलीबारी रोकनी चाहिए।” बयान में यह भी कहा गया कि लड़ाई रोकना पूरी तरह स्थायी नहीं है, बल्कि यह शर्तों पर आधारित है और आगे चल रही बातचीत से जुड़ा हुआ है।

जंग में जीत का ईरान-अमेरिका का दावा

बेशक युद्ध सिर्फ दो हफ्तों के लिए ही टाला गया हो, लेकिन ईरान और अमेरिका दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ईरान ने कहा कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। वहीं अमेरिका ने कहा कि यह उनकी जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी सेना ने संभव बनाया है।

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के बयान के अनुसार, तेहरान इस मौजूदा संघर्ष को एक बड़ी रणनीतिक सफलता मान रहा है और उनका कहना है कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि यह संघर्ष करीब 40 दिनों तक चला, जिसका मकसद जरूरी राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को पूरा करना था, जिनमें उनके बड़े क्षेत्रीय माँगों को मनवाना भी शामिल था।

इतना ही नहीं ईरान ने युद्ध आगे जारी रखने के भी संकेत दिए। काउंसिल ने यह भी कहा कि ईरान ने पहले अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा तय की गई समय-सीमा को मानने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वह दुश्मनों द्वारा तय किए गए समय के अनुसार चलने को तैयार नहीं था। उनका कहना था कि जब तक सभी लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते, तब तक सैन्य कार्रवाई जारी रखी जाएगी।

वहीं दूसरी तरफ व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह अमेरिका की जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और हमारी अविश्वसनीय सेना ने संभव बनाया है।” उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति ने हॉर्मुज को फिर से खुलवा दिया है। लीविट ने बताया कि राष्ट्रपति ने शुरू से ही कहा था कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 4 से 6 हफ्ते का अभियान होगा और अमेरिका ने 38 दिनों में अपने प्रमुख सैन्य उद्देश्यों को हासिल कर लिया और उनसे कहीं आगे निकल गया।

सीजफायर के बाद तेल की कीमतों में राहत, शेयर बाजार में उछाल

ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर की घोषणा का सीधा असर तेल और शेयर बाजार दोनों पर देखने को मिला है। युद्ध के दौरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई प्रभावित हुई थी, जिससे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं और वैश्विक बाजारों में डर और अस्थिरता फैल गई थी। लेकिन जैसे ही सीजफायर की घोषणा हुई और हॉर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमित बनी, कच्चे तेल की कीमतों में अचानक गिरावट आई। रिपोर्ट्स के अनुसार, कीमतें 13 प्रतिशथ से 16 प्रतिशत तक नीचे आ गईं।

तेल सस्ता होने और तनाव कम होने की वजह से शेयर बाजार में तेजी देखने को मिली। भारत में सेंसेक्स 2600 प्वाइंट के ऊपर रहा और 23,800 के साथ निफ्टी में भी जोरदार उछाल आया, जबकि अमेरिका और अन्य देशों के बाजार भी सकारात्मक संकेत दिखाने लगे। खासकर तेल पर निर्भर कंपनियों और रिफाइनरी सेक्टर को इससे फायदा होने की उम्मीद है, क्योंकि उनका खर्च कम होगा।

हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अभी अस्थायी है, क्योंकि जमीन पर तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और जहाजों की आवाजाही अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही। इसलिए आने वाले समय में बाजार का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि यह सीजफायर स्थायी शांति में बदलता है या नहीं।

ईरान-अमेरिका युद्ध में अब तक क्या-क्या हुआ?

ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन का संघर्ष चला। यह संघर्ष अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान रहा। इसकी शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका के हमले से हुई, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने का दावा किया गया, हालाँकि ईरान ने भी इसकी पुष्टि की, तभी ईरान का नया सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह के बड़े बेटे मोजतबा खामेनेई को चुना गया।

अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान युद्ध के रण में उतरा और सबसे पहले खाड़ी देशों को निशाना बनाना शुरू किया। ईरान ने कुवैत, बहराइन से लेकर UAE को निशाना बनाया। इन खाड़ी देशों को अमेरिका का साथ देने की सजा दी गई। इस बीच ईरान के क्षेत्र में तेल का सबसे बड़ा मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने की कगार पर आ गया, जिसके चलते दुनिया में तेल का संकट आ गया। इस दौरान भारत की रणनीतिक साझेदारी दुनियाभर में तारीफ के काबिल रही, हॉर्मुज बंद होने के बावजूद भारत के कई जहाजों की आवाजाही चालू रही।

इसके बाद अमेरिका और इजरायल ने एक के बाद एक ईरान के टॉप सैन्य कमांडर को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 38 दिन के युद्ध में ईरान के सभी टॉप कमांडर को ढेर कर दिया गया। इसके बावजूद ईरान सीजफायर समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ, जिससे दुनियाभर के देशों का तेल संकट बढ़ता गया। तब जाकर ट्रंप ने ईरान को 07 अप्रैल 2026 तक की डेडलाइन दी कि अगर ईरान हॉर्मुज नहीं खोलता, तो इसका बहुत बुरा अंजाम खोलना होगा।

हालाँकि, डेडलाइन से दो घंटे पहले दोनों देशों के बीच सीजफायर समझौते पर सहमति बनी और युद्ध विराम की घोषण की गई। लेकिन यह सीजफायर केवल 2 हफ्तों के लिए ही है। ईरान का दावा है कि इन दो हफ्तों में दोनों देशों के बीच बातचीत होगी और युद्ध को स्थायी तौर पर रोकने पर भी सहमित बनेगी।