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21 जून को इस्लामी आतंकियों ने अगवा कर कई दिनों तक किया रेप, फिर 25 जून को आरी से चीर कश्मीर की सड़कों पर फेंक दिया: याद हैं गिरिजा टिक्कू?

कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को तीन दशक बीत गए हैं लेकिन जिन लोगों ने उस समय अपने परिवार वालों को खोया उनके लिए वो जख्म कभी नहीं भर सकते। आज 25 जून 2024 है। आज से ठीक 34 साल पहले कश्मीर में एक सरकारी स्कूल की लैब सहायिका का काम करने वाली गिरिजा टिक्कू की निर्ममता से हत्या की गई थी।

गिरिजा के साथ जो वीभत्सता हुई थी उस घटना को 2022 में रिलीज कश्मीर फाइल्स फिल्म में भी दिखाया गया था। फिल्म देखने के बाद उनके भाई-बहन बोले थे कि इतने सालों में परिवार में किसी सदस्य ने कभी गिरिजा दीदी का नाम नहीं लिया और इस विषय पर कभी कोई बात नहीं हुई। फिल्म देखने के बाद पहली बार घर में उनकी बात हुई और सब लोग रोए।

21 जून को अपहरण के बाद जब इस्लामी कट्टरपंथियों का मन भर गया तो उन दरिंदों नें जिंदा गिरिजा को बिजली से चलने वाली मशीन के बीच डालकर दो हिस्सों में चीरा दिया था और फिर उनका शव 2 टुकड़ों में काटकर फेंक दिया था।

गौरतलब है कि गिरिजा बारामूला जिले के अरिगाम गाँव में रहती थीं। उनकी एक स्कूल में बतौर लैब असिस्टेंट की नौकरी थी। 11 जून 1990 को गिरिजा अपने पैसे लेने के लिए स्कूल गयी। उसी दिन वह अपने स्कूल के दोस्तों से मिलने उनके घर भी गई थीं। इसके बाद जब वो बस से लौट रही थीं तभी कट्टरपंथियों की नजर उनके ऊपर पड़ी। उसके बाद जो हुआ उस पर बोलते हुए गिरिजा टिक्कू की भतीजी सिद्धि रैना ने एक इंस्टा पोस्ट भी किया था।

गिरिजा टिक्कू की भतीजी ने फिल्म को लेकर इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर किया था। इस पोस्ट में उन्होंने कश्मीरी फाइल्स में दिखाई गई हकीकत पर कहा था- यह फिल्म उन भयानक रातों को दिखाती है जिनसे न केवल उनका परिवार गुजरा बल्कि हर कश्मीरी पंडित परिवार गुजरा। उनके पिता की बहन गिरिजा टिक्कू, एक यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन थीं। वह अपनी सैलरी लेने के लिए गई थीं। वापस आते वक्त वह जिस बस में सवार थी, उसे रोक दिया गया और इसके बाद जो हुआ, उसे सोचकर अभी भी उनकी रुह काँप जाती है, आँख आँसुओं से और मन घृणा से भर उठता है।

सिद्धि रैना ने बताया कि उनकी बुआ को एक टैक्सी में फेंक दिया गया था, जिसमें 5 आदमी थे (उनमें से एक उसका सहयोगी था)। उन लोगों ने उन्हें प्रताड़ित किया, उनके साथ बलात्कार किया और फिर बढ़ई की आरी से उन्हें जिंदा काटकर बेरहमी से उनकी हत्या कर दी। वह कहती हैं, “आज तक मैंने अपने परिवार के किसी व्यक्ति को इस घटना के बारे में बोलते नहीं सुना। मेरे पिता मुझसे कहते हैं कि हर भाई इतनी शर्म और गुस्से में जी रहा था कि मेरी बुआ को न्याय दिलाने के लिए कुछ नहीं किया गया।”

एयर इंडिया की जिस विमान से सुहैब को जाना था लंदन, उसमें ही बम होने की धमकी दी: कोचीन एयरपोर्ट पर चेक-इन करते हुए बीवी-बच्चे के साथ पकड़ाया

कोचीन से लंदन जाने वाली एयर इंडिया की इंटरनेशनल फ्लाइट में बम रखे होने की सूचना मिलने के बाद हड़कंप मच गया। कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर मंगलवार (25 जून 2024) को प्लेन में सभी लोग सवार हो चुके थे और वो उड़ान भरने ही वाली थी, कि तभी फ्लाइट में बम रखे होने की सूचना मिली। इसके तुरंत बाद प्लेन को अलग-अलग कर दिया गया और प्रोटोकॉल के मुताबिक जाँच की गई। जाँच में प्लेन में कुछ भी नहीं मिला, जिसके बाद प्लेन को दोबारा उड़ान भरने की अनुमति दे दी गई।

इस बीच, प्लेन में बम होने की सूचना देने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपित का नाम सुहैल है, वो खुद उसी फ्लाइट से लंदन जाने वाला था। उसे कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर चेक-इन करने के दौरान पकड़ा गया। जानकारी के मुताबिक, चेक-इन प्रक्रिया सुबह के 10:30 बजे समाप्त हो गई थी और फ्लाइट अपने निर्धारित समय 11:50 बजे उड़ान भरने वाली थी।

लेट होने की वजह से सुहैब ने दी थी सूचना?

फ्लाइट में बम रखे होने की सूचना देने वाले की पहचान सुहैब के रूप में हुई। उसने मुंबई स्थित एयर इंडिया के कॉल सेंटर में फोन करके फ्लाइट में बम रखे होने की सूचना दी थी। वो अपनी बीवी और बच्ची के साथ प्लाइट में चढ़ने वाला था, लेकिन लेट हो गया था। इस बीच, एक तरफ फ्लाइट में बम की जाँच प्रोटोकॉल के मुताबिक की जा रही थी, तो दूसरी तरफ बम की सूचना देने वालो को खोजा जा रहा था। प्लेन जब सुरक्षित घोषित कर दिया गया, तभी एयरपोर्ट में चेक-इन कर रहे सुहैब को गिरफ्तार कर लिया गया। वो काफी देरी से एयरपोर्ट पहुँचा था और उसे उसी फ्लाइट से लंदन जाना था।

मलप्पुरम का रहने वाला सुहैब गिरफ्तार

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बम की सूचना वाली कॉल केरल के मलप्पुरम जिले के निवासी सुहैब (29) ने की थी, जो AI 149 फ्लाइट से लंदन जाने वाला था। सुहैब को उसकी पत्नी और बेटी के साथ चेक-इन के दौरान कोचीन एयरपोर्ट के अंतरराष्ट्रीय प्रस्थान टर्मिनल पर रोका गया। प्रवक्ता ने कहा, “उसे आगे की पूछताछ और कानूनी कार्रवाई के लिए पुलिस को सौंप दिया गया है।”

लोकसभा में ‘परंपरा’ की बातें, खुद की सत्ता वाले राज्यों में दोनों हाथों में लड्डू: डिप्टी स्पीकर पद पर हल्ला कर रहा I.N.D.I. गठबंधन, जानिए तमिलनाडु-बंगाल सहित 9 प्रदेशों का हाल

लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद लोकसभा का नया सत्र शुरू हो चुका है। ओडिशा के कटक से सांसद भर्तृहरि महताब ने बतौर प्रोटेम स्पीकर लोकसभा सदस्यों को शपथ दिलाई, उनकी अनुपस्थिति में बिहार के पूर्वी चम्पारण से सांसद राधामोहन सिंह ने पीठासीन होकर ये प्रक्रिया पूरी कराई। अब लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो रहा है। भाजपा ने एक बार फिर से ओम बिड़ला को आगे किया है, जिनकी जीत लगभग तय है।

वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ से केरल के मावेलिक्करा से सांसद K सुरेश नामांकन भरेंगे। उन्हें प्रोटेम स्पीकर बनाए जाने की माँग भी कॉन्ग्रेस ने की थी। पार्टी का कहना था कि वो 8 बार के सांसद हैं, जबकि भर्तृहरि महताब 7वीं बार सांसद बने हैं। हालाँकि, कोडीकुन्नील सुरेश 2 बार चुनाव हार चुके हैं, जबकि भर्तृहरि महताब लगातार जीतते रहे हैं। अब विपक्ष की माँग है कि स्पीकर का पद अगर भाजपा के पास जाता है तो डिप्टी स्पीकर का पद उसे दिया जाए।

लोकसभा के डिप्टी स्पीकर का पद बना विवाद का केंद्र

हालाँकि, भाजपा I.N.D.I. गठबंधन की इस माँग के आगे झुकती हुई नहीं दिख रही है। कॉन्ग्रेस वाले इसके लिए ‘परंपरा’ का हवाला दे रहे हैं। हाँ, ये सत्य है कि 1991 में जब कॉन्ग्रेस की सरकार बनी थी और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे तब कर्नाटक के तुमकुर से भाजपा सांसद S मल्लिकार्जुनैया को लोकसभा का उपाध्यक्ष बनाया गया था। इसी तरह 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तो लक्षद्वीप के कॉन्ग्रेस सांसद P मोहम्मद सईद ये पद ले गए।

2004 में कॉन्ग्रेस नेता मनमोहन सिंह के नेतृत्व में UPA की सरकार बनी तब विपक्षी पार्टी ‘अकाली’ दल के चरणजीत सिंह अटवाल को ये पद मिला, जो पंजाब के फिल्लौर से सांसद थे। UPA के दूसरे कार्यकाल में झारखण्ड के खूँटी से सांसद करिया मुंडा को ये पद मिला। हालाँकि, 2014 में जब नरेंद्र मोदी PM बने तब तमिलनाडु के करूर से AIADMK सांसद M थंबीदुरई ने ये पद सँभाला। ध्यान दीजिए, उस समय AIADMK भाजपा गठबंधन का हिस्सा नहीं थी, फिर भी उसे ये पद दिया गया।

2019 में जब दोबारा मोदी सरकार बनी तब ये पद अगले 5 वर्षों के लिए खाली रहा। अब एक बार फिर से गहमागहमी इसके लिए शुरू हो चुकी है। राहुल गाँधी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परस्पर सहयोग की बातें करते हैं संसद के अंदर, लेकिन बाहर कुछ और बोलते हैं। बता दें कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पीकर पद पर आम सहमति बनाने के लिए फोन किया था, डिप्टी स्पीकर की माँग पर उन्होंने फिर फोन करने की माँग की लेकिन राहुल गाँधी का कहना है कि फोन आया नहीं।

राहुल गाँधी का कहना है कि विपक्ष की शर्त ये है कि वो स्पीकर का समर्थन तभी करेगी, तब डिप्टी स्पीकर का पद उसे मिले। अब जब विपक्ष ने स्पीकर पद के लिए नामांकन भर दिया है, जिससे साफ़ है कि डिप्टी स्पीकर का पद देने के लिए भाजपा तैयार नहीं है। K सुरेश की हार तय लग रही है क्योंकि विपक्ष के पास संख्या बल नहीं है। K सुरेश की सदस्यता 2009 में केरल हाईकोर्ट द्वारा रद्द कर दी गई थी, क्योंकि उन पर ईसाई होकर दलितों के लिए आरक्षित सीट से लड़ने के आरोप लगे थे। बचपन में ही उनका Baptisma हो चुका है।

खैर, अब फिर से बात करते हैं ताज़ा हालात की। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि डिप्टी स्पीकर विपक्ष का होना चाहिए। उन्होंने इसके लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण दिया जहाँ उनके हिसाब से आश्वासन के बावजूद उन्हें उपाध्यक्ष का पद नहीं मिला विधानसभा में। बता दें कि उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा अध्यक्ष का पद रिक्त है, अक्टूबर 2021 में सपा के बाग़ी नितिन अग्रवाल का समर्थन कर के भाजपा ने उन्हें जिता दिया था, उससे पहले भी 5 वर्षों से ये पद रिक्त था।

विपक्ष शासित राज्यों में I.N.D.I. गठबंधन वाले भूले ‘परंपरा’

खैर, अब बात करते हैं विपक्ष शासित राज्यों की। पीछे न जाते हुए मौजूदा स्थिति को ही देखते हैं। दक्षिण भारत से शुरू करते हैं। तमिलनाडु में विपक्ष सबसे अधिक मजबूत है, क्या वहाँ उसने विधानसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिया है? तमिलनाडु विधानसभा में तिरुनेलवेली के राधापुरम से सत्ताधारी दल DMK के विधायक M अप्पवु स्पीकर हैं, वहीं इसी पार्टी के K पिचांदी डिप्टी स्पीकर हैं। वो तिरुवन्नामलाई के किलपेन्नाथुर से MLA हैं। इस तरह तमिलनाडु में विपक्ष ‘परंपरा’ की बातें नहीं करेगा।

अब आते हैं जरा पश्चिम बंगाल पर। वहाँ 2012 से ही TMC का शासन है। देखते हैं, वहाँ परंपरा कैसे निभाई जा रही है। वहाँ सत्ताधारी दल के बिमान बनर्जी स्पीकर हैं, जो साउथ 24 परगना के बरुईपुर से विधायक हैं। डिप्टी स्पीकर, विपक्ष का है? एकदम नहीं। विधानसभा का उपाध्यक्ष भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी ही पार्टी के आशीष बनर्जी को बना रखा है, जो बीरभूम के रामपुरहाट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहाँ भाजपा को ये पद क्यों नहीं दे रही TMC?

अब तीसरे राज्य पर आते हैं। कर्नाटक को देखते हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस सत्ता में है। वही कॉन्ग्रेस, जिसे लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद चाहिए। कर्नाटक विधानसभा में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की सरकार ने अपनी ही पार्टी के UT खादेर फरीद को स्पीकर बना रखा है, जो दक्षिण कन्नड़ लोकसभा क्षेत्र में स्थित मंगलौर से विधायक हैं। डिप्टी स्पीकर? नहीं, उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को नहीं दिया गया है, बल्कि हावेरी से कॉन्ग्रेस के ही विधायक रुद्रप्पा लामानी को ये पद दिया गया है।

विपक्ष ‘परंपरा’ का कितना पालन कर रहा है, हुए भी उदाहरण देखते हैं। वामपंथियों की बात कर लेते हैं। केरल में सत्ताधारी CPI(M) के AN शमशीर स्पीकर हैं जो वाटकरा लोकसभा क्षेत्र के थालास्सेरी से MLA हैं, वहीं पतनमतिट्टा लोकसभा क्षेत्र के अडूर से CPI के विधायक चित्तायाम गोपकुमार को मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने डिप्टी स्पीकर बना रखा है। CPI(M) और CPI सिर्फ पार्टी अलग है, दोनों ही साथी हैं और हमेशा से साथ लड़ते रहे हैं। साथ ही दोनों घोर वामपंथी विचारधारा से भी ताल्लुक रखती हैं।

अब तेलंगाना की बात कर लेते हैं। वहाँ भी कॉन्ग्रेस की सरकार है। वहाँ सत्ताधारी कॉन्ग्रेस के गड्डम प्रसाद कुमार विधानसभा अध्यक्ष हैं। वो वो चेवेल्ला लोकसभा क्षेत्र स्थित विकाराबाद से कॉन्ग्रेस विधायक हैं। वहीं रेवंत रेड्डी की सरकार ने विधानसभा उपाध्यक्ष का पद रिक्त रखा है। झारखंड में भी ये पद रिक्त है, जबकि सत्ताधारी JMM के रवींद्रनाथ महतो स्पीकर हैं, जो दुमका जिले और जामताड़ा लोकसभा क्षेत्र में स्थित नाला से MLA हैं। वहाँ हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद चंपई सोरेन सीएम हैं।

थोड़ा पंजाब की भी बात कर लेते हैं। ‘ड्रामा कंपनी’ AAP की सरकार है वहाँ। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपने ही नेता कुलतार सिंह संधवाँ को विधानसभा का स्पीकर बना रखा है, जो फरीदकोट में स्थित कोटकपुरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं डिप्टी स्पीकर का पद किसी विपक्षी नेता को नहीं, बल्कि होशियारपुर के गढ़शंकर से अपने ही MLA जयकृष्ण सिंह रौरी को बना रखा है। AAP की दिल्ली में भी यही परिपाटी रही है। शाहदरा के MLA रामनिवास गोयल स्पीकर हैं जबकि मंगोलपुरी की MLA राखी गोयल उनकी डिप्टी हैं। दोनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पार्टी AAP से ही हैं।

अंत में थोड़ा पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की भी बात कर लें, जहाँ कॉन्ग्रेस सत्ता में है और सुखविंदर सिंह सुक्खू CM हैं। वहाँ पार्टी ने कांगड़ा के भटियात से अपने विधायक कुलदीप सिंह पठानिया को स्पीकर बना रखा है, जबकि शिमला के श्री रेणुकाजी से अपनी ही पार्टी के विनय कुमार को विधानसभा उपाध्यक्ष बना रखा है। आज यही पार्टी ‘परंपरा’ और ‘परिपाटी’ की बातें कर रही है। लोकसभा उपाध्यक्ष का पद माँग रही है। जबकि ये न संसद चलने देना चाहते हैं, न सरकार को ठीक से काम करने देते हैं।

शराब घोटाले में जेल में ही बंद रहेंगे दिल्ली के CM केजरीवाल, हाई कोर्ट ने जमानत पर लगाई रोक: निचली अदालत के फैसले पर उठाए सवाल, कहा- ED के सबूतों पर गौर नहीं किया

दिल्ली हाई कोर्ट ने CM अरविन्द केजरीवाल को निचली अदालत से दी गई जमानत पर स्थायी तौर पर रोक लगा दी है। हाई कोर्ट ने शुक्रवार (21 जून, 2024) को सुरक्षित रखा गया निर्णय सुनाते हुए कहा कि जमानत देते समय निचली अदालत ने इस मामले पर दिमाग नहीं लगाया और यह एकदम पूरी तरह अनुचित है।

मंगलवार (25 जून, 2024) को दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस सुधीर कुमार जैन ने इस मामले को सुना। कोर्ट ने इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की दलीलों को मान लिया। हाई कोर्ट ने कहा, “इस अदालत ने फैसला किया है कि निचली अदालत की अवकाश बेंच की जज ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत और ईडी की दलीलों का सही मूल्यांकन नहीं किया।”

हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने मामले के पूरे कागजों पर जोर नहीं दिया जो कि पूरी तरह से अनुचित है और दिखाता है कि अदालत ने मामले के सबूतों पर पूरा दिमाग नहीं लगाया है। कोर्ट ने ED की यह दलील भी मानी कि निचली अदालत में सुनवाई के दौरान उसे बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया था।

कोर्ट अब इस मामले में जुलाई में अगली सुनवाई करेगा। इस सुनवाई में ED की उस याचिका पर बहस होगी जिसमें उसने निचली अदालत के CM केजरीवाल को नियमित जमानत देने के फैसले को चुनौती दी है।

गौरतलब है कि दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को गुरुवार (20 जून, 2024) को दिल्ली शराब घोटाला मामले में राउज अवेन्यु कोर्ट की एक विशेष अदालत ने जमानत दे दी थी। उन्हें यह जमानत नियमित दी गई थी। इस दौरान ED ने माँग की थी इस फैसले पर 48 घंटे तक रोक लगाई जाए। हालाँकि, उसकी यह माँग नहीं मानी गई थी।

ED ने इस निर्णय के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दी थी। ED ने केजरीवाल को जमानत देने का विरोध किया था। इसी याचिका के आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत पर रोक लगाई। CM केजरीवाल हाई कोर्ट की इस रोक विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट चले गए थे और यह रोक हटाने की माँग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी सोमवार (24 जून, 2024) को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने से मना कर दिया था।

इससे पहले निचली अदालत में ED ने साफ़ किया था कि उसके पास अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ पक्के सबूत हैं। एजेंसी ने कहा था कि उसके पास इस मामले में पैसे के लेनदेन तक की फोटो हैं। एजेंसी ने यह भी कहा कि CM केजरीवाल ने अपने फ़ोन का पिन बताने से भी मना किया, जो इस मामले में शंका पैदा करता है।

गौरतलब है कि दिल्ली शराब घोटाला मामले में CM केजरीवाल को ED ने 21 मार्च, 2024 को गिरफ्तार कर लिया था। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल ही इस पूरे मामले के सरगना हैं। एजेंसी का आरोप है कि दिल्ली में शराब नीति बदल कर निजी विक्रेताओं को फायदा पहुँचाया और उनसे बदले में लाभ प्राप्त किए।

शादी जहीर इकबाल और सोनाक्षी सिन्हा की, बवाल UP के कुशीनगर में: आजाद आलम की पोस्ट से बिगड़ा माहौल, FIR के बाद पुलिस ने पकड़ा

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में सोनाक्षी सिन्हा की शादी पर डाली गई एक पोस्ट को लेकर साम्प्रदायिक तनाव फ़ैल गया। अपनी पोस्ट में आज़ाद आलम नाम के युवक ने सोनाक्षी के शौहर को अंधभक्तों का जीजा बताया था। आज़ाद आलम की पोस्ट वायरल होने के बाद सोमवार (24 जून 2024) को हिन्दू समाज के लोग सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे। पुलिस ने हालात को शांत करवाया और मामले में FIR दर्ज कर ली। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।

यह मामला कुशीनगर के विशुनपुरा का है। यहाँ के गाँव ठाढ़ीभार निवासी रविवार (23 जून) को आज़ाद आलम ने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली। पोस्ट में उसने जहीर इक़बाल और सोनाक्षी सिन्हा की एकसाथ खींची गईं 3 तस्वीरों को अटैच किया था। कैप्शन के तौर पर उसने लिखा, “सोनाक्षी सिन्हा जी आपको शादी मुबारक, और अंधभक्तों को उसका जीजा मुबारक।” इसी पोस्ट के साथ आलम ने सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इक़बाल का इंग्लिश में हैशटैग भी लगाया।

अगले दिन सोमवार को यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। हिन्दू पक्ष के लोग सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने आज़ाद आलम पर कड़ी कार्रवाई की माँग शुरू कर दी। मामले की सूचना मिलते ही पुलिस फ़ौरन मौके पर पहुँची। लोग कार्रवाई की माँग को लेकर अड़े हुए थे। पुलिस ने नाराज लोगों को समझा कर शांत करवाया। लगभग 2 घंटे तक माहौल अस्त-व्यस्त रहा। पुलिस ने आज़ाद आलम के खिलाफ FIR दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया है।

मोहम्मद अतिउल्लाह का बेटा आज़ाद आलम गाँव में BDC का चुनाव लड़ चुका है। अपने चुनाव प्रचार में उसका नारा था, “उनका जो फर्ज है वो अहल ए सियासत जानें, मेरा पैगाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे।” आज़ाद आलम खुद को शेख और डॉक्टर भी बताता है। वह जिस ठाढ़ीभार के जिस इलाके में रहता है उसे शेखपट्टी बुलाया जाता है। आरोपित के खिलाफ आईटी एक्ट सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई हुई है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

NEET-UG विवाद: क्या है NTA, क्यों किया गया इसका गठन, किस तरह से कराता है परीक्षाओं का आयोजन… जानिए सब कुछ

नीट-यूजी ( NEET-UG ) परीक्षा को लेकर विवादों में घिरे राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी ( NTA ) सुधार की जरूरत को दखते हुए एक पैनल का गठन किया गया है। केंद्र सरकार ने शनिवार (22 जून 2024) को परीक्षाओं के पारदर्शी और निष्पक्ष संचालन को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों की एक हाई लेवल कमेटी बनाने की घोषणा की है। ये कमेटी एनटीए की संरचना, कार्यप्रणाली, परीक्षा प्रक्रिया, पारदर्शिया और डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल को बेहतर बनाने की सिफारिश करेगा।

इस कमेटी की अध्यक्षता भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष और आईआईटी कानपुर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष डॉ. के राधाकृष्णन करेंगे। पैनल के अन्य सदस्यों में शामिल हैं –

डॉ. रणदीप गुलेरिया, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पूर्व निदेशक
प्रोफेसर बी.जे. राव, कुलपति, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय
प्रो. राममूर्ति के, प्रोफेसर एमेरिटस, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास
पंकज बंसल, पीपल स्ट्रॉन्ग के सह-संस्थापक और कर्मयोगी भारत के बोर्ड सदस्य
प्रो. आदित्य मित्तल, आईआईटी दिल्ली में छात्र मामलों के डीन
गोविंद जायसवाल, संयुक्त सचिव, शिक्षा मंत्रालय (सदस्य सचिव)

शिक्षा मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, उच्च स्तरीय पैनल पूरी परीक्षा प्रक्रिया का विश्लेषण करेगा और सिस्टम की दक्षता बढ़ाने के तरीके सुझाएगा। पैनल राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी की मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) की व्यापक समीक्षा करेगा और उन्हें मजबूत बनाने के उपाय सुझाएगा। इसके अतिरिक्त, सदस्य हर चरण में अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र की सिफारिश करेंगे।

कैसे बना था एनटीए?

सरकार ने एनटीए में सुधार के लिए एक पैनल की घोषणा की है। सवाल ये खड़ा होता है कि एनटीए आखिर है क्या और क्यों इसका गठन किया गया था? दरअसल, एनटीए जैसी संस्था के गठन की माँग काफी पुरानी थी, लेकिन इसका गठन 7 साल पहले किया गया था। एनटीए का गठन परीक्षा प्रक्रिया को सुधारने और राज्य स्तरीय परीक्षा एजेंसियों और कई अन्य एजेंसियों की कमियों को दूर करने के लिए की गई थी।

वैसे, एनटीए की स्थापना के पीछे साल 1992 की कार्ययोजना कार्यक्रम से जुड़ी सिफारिशें हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य एंट्रेंस टेस्ट की बात कही गई थी। ये बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में भी थी, जिसमें ऐसी एजेंसी की जरूरत पर जोर दिया गया था।

साल 2010 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) के निदेशकों की एक समिति ने स्वायत्तता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कानून के माध्यम से एजेंसी की स्थापना की सिफारिश की थी। अमेरिका में शैक्षिक परीक्षण सेवा (ETS) की तर्ज पर एजेंसी के विकास को 2013 में आगे बढ़ाया गया, जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) ने योजना तैयार करने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया। NTA की स्थापना की आधिकारिक घोषणा 2017 में की गई, जिसके बाद कैबिनेट ने इसे मंजूरी दे दी।

एनटीए की माँग राज्य स्तरीय परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं में कमियों तथा उन छात्रों के लिए प्रक्रिया को सरल बनाने की आवश्यकता से उत्पन्न हुई, जिन्हें स्वतंत्र रूप से कई प्रवेश परीक्षाएँ उत्तीर्ण करनी होती हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “एनटीए की स्थापना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कई सारे एंट्रेंस टेस्ट की वजह से छात्रों पर काफी दबाव पड़ता है, जिसे बदलने की जरूरत है।”

राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी

साल 2017 में केंद्र सरकार ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत उच्च शिक्षा विभाग के तहत एक स्वायत्त निकाय के रूप में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की स्थापना की। यह उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और फेलोशिप के लिए परीक्षा आयोजित करता है। वर्तमान में, यह JEE Main, NEET-UG, NET, CMAT और GPAT सहित इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रबंधन और फार्मेसी जैसे क्षेत्रों में प्रवेश और भर्ती के लिए विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ आयोजित करने के लिए जिम्मेदार है। कुल मिलाकर एनटीए उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए 15 अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाएँ आयोजित करता है।

एनटीए को पहले साल 25 करोड़ का बजट मिला और इसने 5 सितंबर 2018 को अपना कामकाज चालू किया। पहले साल में एनटीए ने सिर्फ UGC-NET परीक्षा आयोजित की। साल 2019 के बाद से इसने धीरे-धीरे अन्य परीक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी शुरू कर दी। मौजूदा समय में एनटीए के पास 2546 से अधिक परीक्षा सेंटर हैं।

एनटीए आधिकारिक तौर पर सोसायटी (पंजीकरण) अधिनियम, 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत है। शुरुआत में यह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाओं के साथ-साथ अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) द्वारा नामित सीएमएटी और जीपीएटी परीक्षाओं का संचालन करता था।

मौजूदा समय में यूपीएससी के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार जोशी एनटीए की अगुवाई कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में 14 सदस्यीय टीम एनटीए का काम देख रही है, जिसमें तीन आईआईटी, दो एनआईटी और दो आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के निदेशकों के साथ-साथ अन्य शैक्षिक और चिकित्सा विशेषज्ञ और नौकरशाह शामिल हैं। एनटीए परीक्षा की तैयारी से लेकर सेंटर निर्धारण और परीक्षा के पेपर बनाने से लेकर परीक्षा कराने संबंधी हरेक काम को “वैज्ञानिक तरीके” से संभालता है, और पूरी प्रक्रिया के दौरान विषय विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों से परामर्श करता है।

एनटीए से कई विवाद भी जुड़े

साल 20221 में जेईई-मेन्स परीक्षा के दौरान रूसी हैकर मिखाइल शार्गेन ने एनटीए के सॉफ्टवेयर को ही हैक कर लिया और 800 से अधिक उम्मीदवारों को इसका फायदा पहुँचा। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस हैकिंग के चलते छात्रों के पेपर दूसरे लोगों ने दिए। इसके अलावा एनटीए द्वारा आयोजिक कई परीक्षाओं में परीक्षार्थियों की संख्या कम-ज्यादा होने के भी मामले सामने आए थे, हालाँकि ये इतने बड़े विवाद नहीं थे कि इससे कोई बड़ा हंगामा मचता। बावजूद इसके कि काफी छात्र इन गड़बड़ियों से प्रभावित हुए।

बीते कुछ सालों में एनटीए द्वारा आयोजित परीक्षाओं में ग्रेस मार्क्स देने में पारदर्शिता की कमी, परीक्षा केंद्रों पर टेक्निकल दिक्कतें, हैकिंग/फिक्सिंग के कई आरोप भी लगे हैं। हालाँकि ऐसी समस्याओं की वजह से परीक्षा केंद्रों की चयन प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया था।

परीक्षा केंद्रों का चयन कैसे करता है एनटीए?

एनटीए का दावा है कि वह परीक्षा केंद्रों के चयन के लिए कठोर प्रक्रिया का पालन करता है। शुरुआत में, यह एक सूची से संभावित केंद्रों की पहचान करता है जिसमें सीबीएसई और एनटीए द्वारा पहले इस्तेमाल किए गए सरकारी स्कूल शामिल हैं। इनकी लिस्ट बनाने के बाद इन परीक्षा केंद्रों की बैकग्राउंड जाँच की जाती है कि कहीं अतीत में कोई सेंटर अवैध गतिविधियों में तो शामिल नहीं रहा था। एक बार अंतिर सूची तैयार होती है, तो नए सेंटर्स की भी जाँच की जाती है कि कहीं इन सेंटर्स के पीछे दागी यानी गलत लोगों का हाथ तो नहीं है। इसके लिए थर्ड पार्टी एजेंसियों की भी मदद ली जाती है।

एनटीए जिन परीक्षा केंद्रों को चुनता है, वहाँ मौजूद बुनियादी ढाँचे की भी जाँच करता है। सेंटर पर लोगों के बैठने, परीक्षा देने की व्यवस्था है या नहीं, या कहीं इनका किसी कोचिंग सेंटर से तो कोई जुड़ाव नहीं है। यही नहीं, एनटीए परीक्षा केंद्रों को चुनते समय यह भी ध्यान रखता है कि उन सेंटर्स पर दिव्याँग लोगों को कोई परेशानीं तो नहीं होने वाली। इसके साथ ही अगर किसी सेंटर से जुड़ी कोई अवैध गतिविधि पाई जाती है, तो सेंटर को तुरंत ब्लैक लिस्ट भी कर दिया जाता है। इस दौरान सेंटर के एंट्री और एग्जिट वाली जगहों की भी जाँच की जाती है।

अब केंद्र सरकार ने एनटीए में सुधार के लिए जिस कमेटी का गठन किया है, उसके सुझावों को ध्यान में रखते हुए एनटीए परीक्षाओं में सुधार की कोशिशें करेगा। एनटीए ने पहले भी मिले सुझावों को लागू किया था और आगे भी ऐसा किए जाने की उम्मीद है। ताकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में होने वाली संभावित गड़बड़ी को रोका जा सके।

अंग्रेज कोच ने किया इशारा और बीच मैच में भुइयाँ पर लोटने लगा अफगान क्रिकेटर, बांग्लादेश की हार से अधिक गुलबदीन नायब की ‘नौटंकी’ की चर्चा: ऑस्ट्रेलिया T20 वर्ल्ड कप से बाहर

T20 वर्ल्ड कप में मंगलवार (25 जून, 2024) को अफगानिस्तान और बांग्लादेश के बीच महत्वपूर्ण मुकाबला खेला गया, जिसमें अफगानिस्तान ने बांग्लादेश को 8 रनों से मात दे दी। बारिश के कारण मैच में DLS मेथड से जीत-हार तय हुई। इस तरह अफगानिस्तान पहली बार T20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल तक पहुँच गया, वहीं ऑस्ट्रेलिया बाहर हो गई। अफगानिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 115 रन जड़े थे, DLS के हिसाब से बांग्लादेश को 19 ओवर में 113 रन बनाने थे लेकिन वो 105 पर ऑलआउट हो गई।

इस मैच को बारिश के आने-जाने और नवीन-उल-हक़ के अलावा राशिद खान की गेंदबाजी के लिए भी जाना जाएगा। अफगानिस्तान ने अच्छी बल्लेबाजी की, वरना लिटन दास 49 गेंदों पर 54 रन बना कर नॉटआउट रहे। वहीं एक छोर से विकेट गिरते रहे। नवीन-उल-हक और राशिद खान, दोनों ने किफायती गेंदबाजी भी की और 4-4 विकेट भी झटके। अफगानिस्तान की तरफ से रहमतुल्लाह गुरबाज ने सर्वाधिक 43 रनों की पारी खेली थी, वो धीमी थी लेकिन काम आ गई।

इस मैच को एक और चीज के लिए याद किया जाएगा – गुलबदीन नायब के ‘ड्रामे’ के लिए। अफगानिस्तान के बॉलिंग ऑलराउंडर गुलबदीन नायब ने तगड़ी गेंदबाजी करते हुए 2 ओवर में मात्र 5 रन दिए हुए एक विकेट भी झटका। वहीं अफगानिस्तान की गेंदबाजी के दौरान अचानक एक ऐसा मौका भी आया जब वो खड़े-खड़े मैदान में गिर पड़े। उन्होंने हैमस्ट्रिंग इंजरी का नाटक किया, लेकिन इसके बाद उन्होंने गेंदबाजी भी कराई। अफगानिस्तान की जीत के बाद सबसे तेज़ वही दौड़े।

ये आश्चर्य की बात है क्योंकि हैमस्ट्रिंग इंजरी के बाद खिलाड़ी को मैदान छोड़ना पड़ जाता है, लेकिन गुलबदीन नायब इसके बाद तेज़ गेंदबाजी भी करते दिखे और तेज़ी से दौड़ते हुए भी। बताया जा रहा है कि कोच जोनाथ ट्रॉट ने खिलाड़ियों को मैच को धीमा रखने का इशारा दिया था, क्योंकि DLS से अफगानिस्तान उस समय आगे था। इसीलिए, गुलबदीन नायब ने ये ड्रामा किया। एक समय ऐसा आया जब 105 रन पर बांग्लादेश था और 3 रन से पीछे था, अचानक बारिश आ गई।

हालाँकि, फिर विकेट गिरा और बांग्लादेश आगे हो गई। अब गुरुवार (27 जून, 2024) की सुबह अफगानिस्तान का मुकाबला दक्षिण अफ्रीका से होगा। जो जीतेगा, वो फाइनल में जाएगा। वहीं दूसरी तरफ भारत का मुकाबला इंग्लैंड से है। इस तरह राशिद खान ने 9 बार T20 इंटरनेशनल में 4 विकेट लिया है, उन्होंने बांग्लादेश के शाकिब-अल-हसन का रिकॉर्ड तोड़ा जो ये कारनामा 8 बार कर चुके हैं। राशिद खान ने अंत में कहा कि गुलबदीन नायब को चोट आई थीं और सोशल मीडिया पर क्या चल रहा इससे फर्क नहीं पड़ता।

हिंदुओं का गला रेता, महिलाओं को नंगा कर रेप: जो ‘मालाबर स्टेट’ माँग रहे मुस्लिम संगठन वहीं हुआ मोपला नरसंहार, हमें ‘किसान विद्रोह’ पढ़ाकर करते रहे गुमराह

केरल का मालाबार क्षेत्र एक बार फिर चर्चा में है। इस्लामी संगठन इसे एक अलग राज्य बनाने की माँग करने में लगे हैं। इन संगठनों की नजर इस क्षेत्र पर इसलिए इतनी है क्योंकि यहाँ मुस्लिमों की संख्या अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक है और संगठन जानते हैं कि उन्हें यहाँ पैठ बनाने में मुश्किल नहीं आएगी। उनकी इस तरह की मानसिकता भले ही मुस्लिमों को एक बार को जायज लगे, लेकिन हिंदुओं के लिए ये कितना बड़ा खतरा हो सकता है इसे जानने के लिए एक सदी पहले हुए मोपला हिंदू नरसंहार को याद करने की जरूरत है।

मोपला हिंदू नरंसहार के बारे में इतिहास की किताबों में कम जिक्र है। कारण वामपंथी लेखक हैं। उनके द्वारा लिखे गए इतिहास में इसे ‘किसान विद्रोह और मोपला दंगे’ जैसे शीर्षक के साथ समेटा गया है जबकि हकीकत यह है कि यह एक हिंदू नरसंहार था जहाँ मोपला के मुस्लिमों ने हिंदुओं को पकड़-पकड़कर निर्मम ढंग से मारा था। पुरानी रिपोर्ट्स बताती हैं कि 1921 में दक्षिण मालाबार में कई जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या सबसे ज्यादा थी। कुल जनसंख्या का वो 60% थे।

आज जिस तरीके से मुस्लिम बहुलता के कारण मालाबार को लेकर इस्लामी संगठन अपनी अलग राज्य की माँग उठाते हैं, उस समय भी इस्लामी कट्टरपंथियों की कुछ की यही मानसिकता थी। 1921 में जब असहयोग आंदोलन के बदले कॉन्ग्रेस खिलाफत आंदोलन को समर्थन कर रही थी और हिंदुओं को उनके साथ मिलकर रहने को कहा जा रहा था उस वक्त मालाबार के मोपला मुस्लिमों को लगा था कि वो लोग खुद से अंग्रेजों को भगा देंगे और मालाबार क्षेत्र में अपना इस्लामी राज्य स्थापित कर लेंगे, लेकिन उससे पहले उनका मकसद था कि वो जमीन से हिंदुओं को भगाकर उसे पवित्र करें।

वैसे तो क्षेत्र में मोपला मुस्लिमों ने 1896 से मालाबार क्षेत्र में ‘काफिरों’ की हत्या की तमाम घटनाओं को अंजाम दिया था। मगर, 1921 में हालात ये कर दिए गए थे कि उस साल बताया जाता है कि इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा 10,000 से अधिक हिंदू उस इलाके में मौत के घाट उतारा जा चुका था। उस समय मुस्लिमों ने अपने जिहाद की शुरुआत ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाहु अकबर’ के साथ की थी और उसके बाद हिंदुओं को पकड़कर कहीं गोली मारी गई थी। कहीं जल्लाद से हिंदुओं की गर्दन कटवाकर उनकी खोपड़ियों को एक-एक करके कुएँ में फेंका गया था।

कुछ कहानियाँ तो ऐसी हैं जिन्हें सुन आत्मा सिहर जाए। जैसे मोपला में इस्लामी दंगाइयों ने एक 7 महीने गर्भवती महिला को मारने के लिए पहले उसका पेट फाड़ा था, फिर उसके से बच्चा निकालकर दोनों को मौत के घाट उतारा था। इसके अलावा इन मोपला दंगाई जिन्हें विद्रोही कहकर सम्मान देने का प्रयास होता है इन्होंने एक हिंदू महिला को उसके पति और भाई के आगे नंगा करके उसका रेप किया था। एक महिला मारकर फेंक दी गई थी जिसकी भूखी बच्ची उसके शव के आगे बैठ उसके स्तन से एक दो बूंद दूध के लिए तरस रही थी।

आरएसएस विचारक जे नंदकुमार ने साल 2021 में इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया था कि टीपू सुल्तान की हार के बाद मालाबार में हिंदुओं की वापसी हुई थी। वहाँ वो आकर बसने लगे थे, अपनी जमीनें वापस लेने लगे थे। इसी के बाद वहाँ नरसंहार होने शुरू हुए थे। 1792 से लेकर 1921 कर वहाँ कई बड़े नरसंहार हुए जिनमें मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर हमले किए गए मगर इतिहास में इसे सिर्फ किसान आंदोलन आदि कहा जाता रहा और हिंदुओं की हत्या करने वालों को स्वतंत्रता संग्रामी।

जे नंनदकुमार ने ऑपइंडिया से बातचीच में हैरान करने वाला खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि मोपला हिन्दू नरसंहार में जिन मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदुओं के साथ रक्तपात किया, बर्बरता की, हत्याएँ कीं… उन्हीं के परिवार वालों (वंशजों) को अभी भी पेंशन इस नाम पर दी जा रही है कि वो तो स्वतंत्रता सेनानी थे।

आरएसएस विचारक ने इतिहास में दिए गए गरीब-कुचले मुस्लिमों वाले एंगल को खारिज कर बताते हैं कि मोपला हिंदू नरसंहार में जिन हिंदुओं को मारा गया, उनमें एक भी जमींदार ऐसे नहीं थे, जो बड़े जमींदार थे। कत्लेआम में सामान्य मजदूरों को मारा गया। पिछड़े जाति के लोगों को मारा गया। सही में जो उस वक्त जमींदार थे, वो मुस्लिम जमींदार थे और उन लोगों ने ही मोपला हिंदू नरसंहार का प्लान किया था।

आज उसी मालाबार इलाके में फिर से मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला जा रहा है जहाँ एक सदी पहले खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने के चक्कर में महात्मा गाँधी तक ने हिंदुओं के मोपला में हो रहे कत्लेआम पर अपनी आँख बंद कर ली थी। कोई इस मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं था क्योंकि खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने के बाद ये डर था कि मुस्लिम नाराज हो जाएँगे। एक सदी पहले जो डर कॉन्ग्रेस के नेताओं में था। आज वही डर वामपंथी नेताओं में देखने को मिल रहा है। केरल को तोड़ने की माँग सरेआम हो रही है मगर फिर भी कोई इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। भाजपा प्रमुख ने तो इस रवैये को देखते हुए ये भी कहा है कि केरल में कॉन्ग्रेस हो या वामपंथियों की सरकार, हर कोई अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के लिए इस समुदाय के आगे घुटनों में आ जाता है।

बता दें कि केरल के ‘मालाबार’ को अलग राज्य बनाने की माँग को हवा देने का काम हाल में सुन्नी युवाजन संगम के नेता मुस्तफा मुंडुपारा ने किया है। उनका कहना है कि मालाबार के लोग अन्य लोगों के बराबर टैक्स देते हैं, लेकिन उन्हें सुविधाएँ सबके बराबर नहीं मिलतीं। मालाबार को केरल से निकालकर अलग राज्य बनाने की माँग पहली दफा नहीं है। साल 2021 में यही माँग अन्य मुस्लिम संगठन ‘सुन्नी स्टूडेंट फेडरेशन’ के मुखपत्र सत्यधारा के संपादक अनवर सादिक फैसी ने उठाई थी। उस संगठन का कहना था कि मालाबार क्षेत्रों में मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग करके एक अलग राज्य बनाना चाहिए। मालूम हो कि इस्लामी संगठन समय समय पर केरल के मालाबार को अलग करने की माँग सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि वहाँ मुस्लिमों की आबादी अच्छी-खासी है और ये संगठन जानते हैं कि अगर इस क्षेत्र पर कब्जा हो गया तो वो अपनी मनमानियाँ कर पाएँगे।

नोट: साल 2021 में मोपला नरसंहार के 100 साल पूरे होने पर ऑपइंडिया ने ‘मोपला दंगा नहीं हिंदू नरसंहार’ पर विस्तृत रिपोर्टें की थी। आप इन्हें लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

लोकसभा स्पीकर के लिए आम सहमति नहीं, होगा चुनाव: भाजपा की तरफ से ओम बिरला उम्मीदवार, कॉन्ग्रेस ने K सुरेश को उतारा

भारत के संसदीय इतिहास में फिर एक बार लोकसभा स्पीकर के पद के लिए चुनाव होंगे। 18 वीं लोकसभा के स्पीकर पद के लिए भाजपा ने 17वीं लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला जबकि कॉन्ग्रेस ने आठ बार के सांसद कोडिकुन्निल सुरेश को चुनाव में उतारा है।

सोमवार (24 जून, 2024) से चालू हुए 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में सबसे पहले नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाई गई। सोमवार को 262 लोकसभा सांसदों ने शपथ ली। मंगलवार (25 जून, 2024) को लोकसभा के बाकी 281 सांसद शपथ लेंगे। उन्हें प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब सांसद पद की शपथ दिलाएँगे।

लोकसभा में अब स्पीकर पद का चुनाव होना है। सामान्यतः यह परम्परा रही है कि लोकसभा स्पीकर पद का चुनाव नहीं होता, उसे पक्ष और विपक्ष आपस में सहमति से चुन लेते हैं। अभी तक यही परम्परा रही है। हालाँकि, इस बार कॉन्ग्रेस के अड़ियल रवैये के चलते स्पीकर पद के लिए चुनाव होगा।

भाजपा ने स्पीकर पद के लिए 17 वीं लोकसभा के स्पीकर रहे कोटा सांसद ओम बिरला को फिर से उतारा है जबकि कॉन्ग्रेस ने मवेलीकारा से सांसद के सुरेश को मौक़ा दिया है। ओम बिरला और के सुरेश ने स्पीकर पद के लिए नामांकन भी कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ओम बिरला के प्रस्तावक बने हैं। वहीं सुरेश के प्रस्तावक कॉन्ग्रेस समेत अन्य कई पार्टियों के नेता भी बने हैं।

स्पीकर के पद के लिए चुनाव 26 जून, 2024 को होने हैं। इस दिन सभी सांसद नए स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव करेंगे। संसद के भीतर NDA का पलड़ा भारी लग रहा है, ऐसे में ओम बिरला के स्पीकर निर्वाचित होने के ही कयास हैं। लोकसभा के भीतर NDA के पास 290 से अधिक सांसदों का समर्थन है जबकि कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले INDI गठबंधन के पास 240 से कम सांसद हैं। कॉन्ग्रेस के स्पीकर पद कि जिद को लेकर ही चुनाव की नौबत आ रही है।

बुलडोजर देख मस्जिद के ऊपर चढ़ गई मुस्लिम औरतें भी, MCD ने अवैध निर्माण ढहाया: दिल्ली के मंगोलपुरी में कार्रवाई रोकने को पहले बनाई ‘मानव दीवार’, फिर पथराव

दिल्ली के मंगोलपुरी में MCD ने मस्जिद ने अवैध निर्माण पर एक्शन लिया है। यहाँ MCD ने एक मस्जिद के अवैध हिस्से को भी गिरा दिया। मस्जिद के अवैध निर्माण को हटाने के दौरान काफी हंगामा हुआ। हंगामे के बीच मस्जिद के अवैध हिस्से को गिरा दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगोलपुरी के वाई ब्लॉक में में मंगलवार (25 जून, 2024) सुबह पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ MCD की टीम पहुँची। यहाँ टीम कुछ अवैध निर्माणों को गिराने पहुँची थी। इन अवैध निर्माण की शिकायत की गई थी। इन अवैध निर्माण में एक मस्जिद का हिस्सा भी शामिल था।

जब MCD और सुरक्षाबल यहाँ पहुँचे तो बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएँ और पुरुष मस्जिद के ऊपर चढ़ गए और इस कार्रवाई का विरोध करने लगे। इसके बाद उन्होंने टीम को घेर भी लिया। इसके बाद हँगामा करने वाली भीड़ ने पुलिस और MCD पर पथराव भी किया, ऐसी सूचना भी सामने आई है।

बताया गया कि मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों ने मस्जिद के अवैध हिस्से को बचाने के लिए एक मानव दीवाल बना दी। यह भी सूचना सामने आई कि कुछ हिस्सा तोड़ने के बाद MCD की टीम ने यहाँ काम रोक दिया। MCD के अधिकारियों ने बताया कि निर्माण ज्यादा मजबूत है और उसको तोड़ने के लिए बड़ी मशीनें लानी पड़ेंगी।

मंगोलपुरी से कुछ लोगों को हिरासत में लिए जाने की सूचना है। गौरतलब है कि दिल्ली में MCD लगातार पिछले कुछ समय से अतिक्रमण पर कार्रवाई कर रहा है। मंगोलपुरी का अतिक्रमण भी एक शिकायत के बाद हटाया जा रहा था।

इससे पहले यह भी सामने आया था कि दिल्ली की जामा मस्जिद ने भी एक सार्वजनिक पार्क पर कब्जा किया हुआ है, इसे लेकर मोहम्मद अर्सलान नाम के व्यक्ति ने याचिका दायर की थी। इस मामले में पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने ये कब्जा वापस न ले पाने के लिए MCD को फटकारा है।