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पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों ने 3 बार तोड़ी महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति, अब करतारपुर कॉरिडोर में लगेगी: कभी बालाकोट में स्ट्राइक कर 300+ जिहादियों का किया था सफाया

पाकिस्तान के पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति, स्थापना होने के बाद तीन बाद खंडित की जा चुकी है। अब आज दोबारा से करतारपुर साहिब में सिख साम्राज्य के पहले शासक महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिह की 9 फुट की कास्य की प्रतिमा पहली बार 2019 में स्थापित हुई थी। उस समय इसे उनकी समाधि के पास लाहौर किले में बनाया गया था। हालाँकि पाकिस्तान के इस्लामी कट्टरपंथियों ने महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति को दो बार तोड़ा था। एक बार 2019-20 में और दूसरी बार 2021 में।

ऐसे में पंजाब के पहले सिख मंत्री और पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष सरकार रमेश सिंह अरोड़ा ने फिर से इस मूर्ति की स्थापना की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बहाल की गई प्रतिमा को करतारपुर साहिब में रखा जा रहा है ताकि वहाँ आने वाले भारतीय सिख इसके दर्शन कर सकें। उन्होंने प्रतिमा की सुरक्षा के भी आश्वासन दिए हैं।

बता दें कि महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति की पुनर्स्थापना का काम 26 जून यानी आज 185वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में हो रहा है। इसके लिए करीबन 450 भारतीय, पाकिस्तान में है। महाराजा रणजीत सिंह ने 19वीं शताब्दी में पंजाब पर शासन किया था। वे सिख साम्राज्य के पहले महाराजा थे। उन्हें उनके शौर्य और साहस के कारण कभी नहीं भुलाया जा सकता।

आज जिस पाकिस्तान की जमीं पर महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति लगने वाली है उसी पाकिस्तान के बालाकोट में महाराज ने 300 इस्लामी आतंकियों का सफाया किया था। ऐसा उन्होंने 1831 में किया था जब सैयद अहमद शाह ने राजा रणजीत सिंह द्वारा अज़ान और गौतस्करी पर प्रतिबंध लगाने की बात सुनकर जिहाद की घोषणा कर दी थी। उस समय महाराजा ने उसे सबक सिखाने के लिए अपनी सेना के साथ एक पहाड़ी के पास डेरा डाल लिया।

शुरू में तो अहमद शाह ने हमले से बचने के लिए खेतों खेतों में पानी अधिक मात्रा में डलवा दिया ताकि जब महाराजा रणजीत सिंह की सेना हमला करने आएँ तो उनकी गति धीमी पड़ जाए। हालाँकि उसका पैंतरा काम नहीं आया। दोनों पक्ष एक दूसरे पर हमला करने के लिए कई दिनों तक इंतज़ार करते रहे और एक दिन एक अज़ीबोगरीब घटना हुई जिसने सिख सेना को मौका दे दिया कि वो इस्लामी कट्टरपंथियों को मार गिराएँ।

मौजूदा लेखों में जिक्र मिलता है कि, 6 मई 1831 के दिन एक जिहादी अपना दिमागी संतुलन खो बैठा और उसे अपने सामने हूरें दिखाई देने लगीं। वो एकदम से चिल्लाते हुए भागा कि उसे हूर बुला रही है और जाकर उन्हीं धान के खेतों में फँस गया जिसे सिख सेना के लिए जाल की तरह बिछाया गया था। मौक़े को परखते हुए सिखों की सेना ने उसे अपनी बंदूक का निशाना बनाकर मार गिराया। उन जिहादियों में हूरों के पास पहुँचने वाला चिराग अली पहला नाम था। इसके बाद सिख सेना ने सभी जिहादियों को ढेर करना शुरू कर दिया। उस दौरान भी इस युद्ध में क़रीब 300 से ज्यादा जिहादियों को सिखों की सेना ने हूरों के क़रीब पहुँचाया था जिनकी कब्रें आज भी वहाँ पर मौजूद हैं।

क्या खत्म होगी ओवैसी की लोकसभा सदस्यता? जो लड़ रहे मथुरा-काशी की लड़ाई उन्होंने ‘जय फिलिस्तीन’ पर राष्ट्रपति से की शिकायत, जानिए क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 102 और 103

AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से शिकायत की गई है। वकील हरि शंकर जैन ने दूसरे राष्ट्र के प्रति आस्था दिखाने के कारण उनकी संसद की सदस्यता रद्द करने की माँग की है। ओवैसी ने लोकसभा में शपथ लेने के बाद जय फिलिस्तीन के नारे लगाए थे, इसे बाद में कार्रवाई के रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया था ।

वकील हरि शंकर जैन ने असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ इस मामले में राष्ट्रपति से संविधान के अनुच्छेद 102 और 103 के तहत शिकायत की है। उनके बेटे विष्णु शंकर जैन ने यह जानकारी एक्स (ट्विटर) के जरिए दी है। उन्होंने बताया है कि हरि शंकर जैन ने ओवैसी की सदस्यता संसद सदस्य के रूप में खत्म करने की माँग की है। ऐसी ही एक शिकायत एक और वकील विभोर आनंद ने भी लोकसभा सचिवालय से की है।

क्या कहता है अनुच्छेद 102 और 103

संविधान के अनुच्छेद 102 में वह स्थितियाँ बताई गई हैं, जिनके अंतर्गत किसी संसद सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। अनुच्छेद 102 के भाग ‘घ’ में लिखा है कि ऐसे संसद सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है जो भारत का नागरिक नहीं है या उसने किसी दूसरे राष्ट्र की नागरिकता ले ली है। इसके अलावा उसे इस आधार पर भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि वह दूसरे राष्ट्र के प्रति श्रृद्धा रखता है।

ओवैसी जय फिलिस्तीन शिकायत
अनुच्छेद 102, जिसके तहत संसद सदस्य अयोग्य घोषित हो सकते हैं

वहीं संविधान का अनुच्छेद 103, अनुच्छेद 102 के तहत किसी संसद सदस्य को अयोग्य ठहराए जाने को लेकर फैसला सम्बन्धी शक्तियाँ देश के राष्ट्रपति को देता है। इसमें कहा गया है कि यदि अनुच्छेद 102 के तहत अयोग्यता का मामला उठता है इस मामले में इसे राष्ट्रपति को भेजा जाना चाहिए और उसका ही निर्णय अंतिम होगा। इसी अनुच्छेद में कहा गया है कि अयोग्य घोषित करने के लिए राष्ट्रपति चुनाव आयोग की सलाह लेगा और उसी के अनुसार निर्णय लेगा।

ओवैसी जय फिलिस्तीन शिकायत
संसद सदस्यों के संबंध में राष्ट्रपति की शक्तियाँ

ओवैसी ने ‘जय फिलिस्तीन’ के लगाए थे नारे

हैदराबाद से सांसद चुने गए असदुद्दीन ओवैसी ने मंगलवार (26 जून, 2024) को लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद जय फिलिस्तीन के नारे लगाए। उन्होंने अपनी शपथ उर्दू में ली। उर्दू में शपथ लेने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने अंत में ‘जय भीम, जय मीम’ कहा और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का नारा भी लगाया, लेकिन अंत में उन्होंने ‘जय फिलिस्तीन’ भी कहा। इस दौरान पूर्वी चम्पारण से भाजपा के सांसद राधामोहन सिंह पीठासीन थे और नव-निर्वाचित सांसदों को शपथ दिला रहे थे। 

जब असदुद्दीन ओवैसी से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये संविधान के खिलाफ कैसे हुआ, ये संविधान के कौन से प्रावधान के हिसाब से गलत है? G किशन रेड्डी के विरोध पर उन्होंने कहा कि उनका काम है विरोध करना, हम उन्हें खुश करने के लिए क्यों बोलेंगे। उन्होंने इस दौरान फिलिस्तीन को लेकर महात्मा गाँधी के विचार पढ़ने की सलाह भी दी।

असद्द्दीन ओवैसी के शपथ के बाद जय फिलिस्तीन का नारा लगाने के मामले में संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा, “हमारी फिलिस्तीन या अन्य किसी राष्ट्र के साथ कोई दुश्मनी नहीं है। संसद सदस्यों का शपथ लेने के बाद दूसरे देश के समर्थन में नारे लगाना सही है या नहीं, हमें इसके लिए नियमों को देखना होगा।” विरोध के बाद के ओवैसी के जय फिलिस्तीन बोलने को लोकसभा की कार्रवाई के रिकॉर्ड से निकाल दिया गया है।

वहीं दूसरी तरफ ओवैसी के खिलाफ शिकायत करने वाले और उनका विरोध करने वालों ने तर्क दिया है कि उन्होंने जय फिलिस्तीन का नारा लगाया है जो कि उनकी दूसरे देश के प्रति श्रृद्धा दिखाता है, ऐसे में उन पर कार्रवाई होनी चाहिए।

तिहाड़ जेल में अरविंद केजरीवाल से पूछताछ, ट्रायल कोर्ट में पेश करेगी CBI: जमानत पर रोक के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुँचे CM

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने मंगलवार (25 जून 2024) को तिहाड़ जेल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से पूछताछ की और दिल्ली शराब घोटाला मामले में उनका बयान दर्ज किया। सीबीआई को कथित तौर पर बुधवार (26 जून 2024) को केजरीवाल की जमानत पर रोक के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट में पेश करने की अनुमति भी मिल गई है। माना जा रहा है कि सीबीआई अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार करने वाली है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट बुधवार (26 जून 2024) को अरविंद केजरीवाल की जमानत पर रोक के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करेगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट ने जमानत दे दी थी, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी, जिसके खिलाफ अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट पहुँचे हैं। ये मामला ईडी द्वारा गिरफ्तारी से जुड़ा है, लेकिन अब सीबीआई भी उन्हें गिरफ्तार करने वाली है, तो ये साफ है कि अरविंद केजरीवाल को अभी सलाखों के पीछे ही रहना होगा।

दिल्ली हाई कोर्ट की अवकाश पीठ के जस्टिस सुधीर कुमार जैन ने आदेश पारित करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दस्तावेजों और तर्कों का उचित मूल्यांकन नहीं किया था। हाई कोर्ट के आदेश पर दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि यह बहुत ही असामान्य बात है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश पढ़े बिना ही केजरीवाल को जमानत देने के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट पहुँचे हैं।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले केजरीवाल को सीबीआई अदालत में पेश किया जाएगा। जाँच एजेंसी के अधिकारियों ने कहा कि वे आज मामले में केजरीवाल को आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर सकते हैं।

बता दें कि केजरीवाल को आबकारी नीति मामले में ईडी ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था। शीर्ष अदालत ने उन्हें चुनाव प्रचार में भाग लेने के लिए 10 मई को अंतरिम जमानत दी थी और 2 जून तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। इसके बाद 20 जून को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत दे दी थी, जिस पर जमानत आदेश जारी होने से पहले ही 21 जून को हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी।

इस मामले पर दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा का बयान आया है। उन्होंने आप नेताओं सौरभ भारद्वाज, आतिशी और संजय सिंह को बीजेपी के बजाय कॉन्ग्रेस पार्टी से सवाल पूछने का सुझाव देते हुए कहा कि जिस मामले पर सीबीआई काम कर रही है, वह कॉन्ग्रेस ने दर्ज कराया था। उन्होंने कहा, “सीबीआई इस मामले में अरविंद केजरीवाल से पहले ही पूछताछ कर चुकी है। मनीष सिसोदिया को भी सीबीआई ने इसी मामले में गिरफ्तार किया है… सौरभ भारद्वाज, आतिशी और संजय सिंह को कॉन्ग्रेस से सवाल पूछना चाहिए, क्योंकि जिस मामले पर सीबीआई काम कर रही है, वह कॉन्ग्रेस ने दर्ज कराया था। उन्हें राहुल गाँधी से पूछना चाहिए कि जब उन्होंने चुनाव के लिए गठबंधन किया था, तब उन्होंने अपनी शिकायत वापस क्यों नहीं ली थी। क्या संजय सिंह चाहते हैं कि जाँच एजेंसियाँ ​​उनके हिसाब से काम करें?”

पति को छोड़ कर हिन्दू महिला ने शाह आलम को पकड़ा, 7-8 साल तक रेप-अप्राकृतिक सेक्स: ब्राह्मण बन कर मिला था, पोल खुलने पर करता था घर-वापसी का वादा

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक हिन्दू महिला से रेप और अप्राकृतिक दुष्कर्म का मामला सामने आया है। बाल-बच्चेदार पीड़िता की कुछ मामलों को ले कर अपने पति से अनबन चल रही थी। इस बीच उसका परिचय शाह आलम नाम के व्यक्ति से हुआ। शाह आलम ने अपना परिचय साहिल के तौर पर बताया था। बाद में उसने शादी का झाँसा दे कर पीड़िता से 7-8 वर्षों तक रेप और कुकर्म किया। बाद में वह अपने वादे से मुकरने लगा। उसने पीड़िता की हत्या की भी धमकी दी। पुलिस ने सोमवार (24 जून 2024) को FIR दर्ज कर ली। शाह आलम को हिरासत में ले लिया गया है।

यह घटना मोदीनगर थानाक्षेत्र की है। 24 जून (सोमवार) को यहाँ पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में महिला ने बताया कि 7-8 साल पहले उनका अपने पति से कुछ कारणों से संबंध विच्छेद हो गया था। इसी दौरान मोदीनगर थाना क्षेत्र का ही रहने वाला हासम अली का बेटा शाह आलम पीड़िता के सम्पर्क में आया। शाह आलम ने महिला को भरोसा दिया कि वह इस्लाम त्याग कर हिन्दू धर्म अपनाएगा। साथ ही उसने पीड़िता से शादी का भी वादा किया।

महिला को झाँसे में ले कर शाह आलम ने उस से कई बार रेप किया। इस दौरान उसने पीड़िता से अप्राकृतिक सेक्स भी किया। 13 जून को पीड़िता ने शाह आलम से शादी का अपना वादा पूरा करने के लिए कहा। इस पर शाह आलम नाराज हो गया। उसने महिला को धमकी दी और बोला, “आइंदा मुझसे शादी की बात मत करना। अगर तू मेरे खिलाफ रिपोर्ट करेगी तो मैं तुम्हारा कत्ल कर दूँगा।” शाह आलम ने इस्लाम छोड़ने से भी मना कर दिया। इस पर पीड़िता बहुत आहत हुई।

आखिरकार महिला ने सोमवार (24 जून) को पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने शाह आलम के खिलाफ IPC की धारा 376, 377 और 506 के तहत FIR दर्ज कर ली। मोदीनगर क्षेत्र के ACP ने बताया कि शाह आलम को हिरासत में ले लिया गया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। इस बीच में पीड़िता ने मीडिया के आगे अपनी बात रखी। पीड़िता का आरोप है कि शाह आलम उस से साहिल नाम से मिला था। तब उसने खुद को हिन्दुओं में ब्राह्मण जाति का बताया था।

इसी वीडियो में पीड़िता ने आगे शाह आलम की करतूत बताई। उसने कहा, “मैं मोहम्मडन हूँ। मैं तुझ से शादी नहीं करूँगा। अगर तुझे मुझ से शादी करनी है तो गाँव की मस्जिद में जा कर कलमा पढ़।” शाह आलम ने पीड़िता के साथ उसके बच्चों को भी मार डालने की धमकी दी है।

‘अपनी आईडी से दूसरों के लिए टिकट बुक किया तो ₹10000 का जुर्माना, IRCTC का नया नियम’: सोशल मीडिया पर फैली खबर, जानिए क्या है सच

भारतीय रेलवे हिंदुस्तान की जीवन रेखा मानी जाती है, जिससे हर दिन करोड़ों लोग यात्रा करते हैं। आज कल के समय में ऑनलाइन टिकट बुकिंग एक आम बात है। इस बीच, सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें तेजी से फैलीं कि IRCTC के पर्सनल अकाउंट के जरिए किसी और का ट्रेन टिकट बुक करने पर जेल भी जाना पड़ सकता है और यात्री को 10 हजार रुपए का फाइन भी देना पड़ सकता है। क्या ऐसी खबर आपके सामने से भी गुजरी?

सोशल मीडिया पर बीते दिनों ऐसी खबरें चल रही थीं, जिसमें ये दावा किया गया है कि अगर अपने पर्सनल अकाउंट से किसी और का ट्रेन टिकट बुक किया तो आपको जेल की सजा तक हो सकती है। क्या ये बात वाकई में सच है? आइए जानते हैं ट्रेन टिकट बुकिंग से जुड़ा ये जरूरी नियम….

दरअसल, IRCTC की साइट से टिकट की बुकिंग रेलवे बोर्ड की गाइडलाइंस के मुताबिक होती है। इन नियमों के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपने पर्सनल यूजर आईडी से दोस्तों, फैमिली या रिलेटिव के लिए टिकट की बुकिंग कर सकता है। ऐसे में सोशल मीडिया पर चल रही ये खबर कि दोस्तों का ट्रेन टिकट बुक करने पर आपको जेल हो सकती है, पूरी तरह से निराधार और गलत है।

खुद IRCTC ने एक नोट जारी कर ऐसी अफवाहों का खंडन किया है। IRCTC द्वारा जारी नोट में बताया गया है कि कोई भी यूजर, जिसका खाता आधार लिंक्ड है, वो 24 टिकट तक बुक कर सकता है। अगर आधार से लिंक नहीं है, तब भी वो महीने के 12 टिकट बुक करा सकता है हालाँकि, रेलवे ने इसी के साथ ये भी साफ कर दिया कि किसी व्यक्ति द्वारा पर्सनल अकाउंट से ली गई ट्रेन टिकट को कॉमर्शियली नहीं बेचा जा सकता है। रेलवे एक्ट, 1989 के सेक्शन 143 के मुताबिक, पर्सनल अकाउंट से बुक किए गए टिकट को बेचा नहीं जा सकता है, इसके लिए सख्त सजा का प्रावधान है।

फैक्ट चेक : सोशल मीडिया पर टिकट बुकिंग से जुड़ा दावा पूरी तरह से बेबुनियाद है। आप अपने लिए, घर वालों के लिए, दोस्तों के लिए आधार लिंक्ड अकाउंड से महीने में 24 टिकट तक बुक सकते हैं। हाँ, ये जरूर है कि अगर ये टिकट बेचा गया है, तब ये दंडनीय अपराध है। अत: निजी इस्तेमाल के लिए आईआरसीटीसी के अकाउंट से बुकिंग आप खुलकर कर सकते हैं और अपनी यात्रा का आनंद उठा सकते हैं।

गाँव में मस्जिद और मदरसे, फिर भी भीड़ ने सरकारी जमीन पर ही चटाई बिछा कर पढ़ी बकरीद की नमाज: हड़प कर बनाना चाहते थे ईदगाह, 11 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में सरकारी जमीन पर जबरन नमाज़ पढ़ने का मामला सामने आया है। नमाज बकरीद (17 जून, 2024) के दिन पढ़ी गई। आरोप है कि यहाँ ग्राम प्रधान के पति की साजिश से बरात घर की आड़ में मस्जिद निर्माण की साजिश रची जा रही थी। गाँव के एक हिन्दू पंच ने मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई है। पुलिस ने FIR दर्ज कर के 11 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। कार्रवाई में ढिलाई बरतने के आरोप में 3 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर भी किया गया है।

यह मामला कुशीनगर जिले के थाना क्षेत्र खड्डा का है। यहाँ के गाँव तुर्कहा के निवासी रामाश्रय ने गुरुवार (20 जून, 2024) को थाने में तहरीर दी है। तहरीर में उन्होंने बताया कि उनके गाँव तुर्कहा में एक सरकारी जमीन परती (खाली) पड़ी है। तहरीर के मुताबिक, इस जमीन को गाँव के ही नूरुद्दीन, जमालुद्दीन, मुस्तफा और अशरफ सहित कई अन्य लोग अवैध तौर पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। इस साजिश में ग्राम प्रधान रीता यादव के पति केदार व प्रमोद यादव नाम के एक अन्य व्यक्ति को भी शामिल बताया गया है।

शिकायतकर्ता ने आगे बताया है कि खाली पड़ी सरकारी जमीन पर ईदगाह और मदरसा आदि बनाने के लिए पक्के निर्माण की तैयारी चल रही है। इस तैयारी की वजह से 2 समुदायों के बीच शांति भंग होने की आशंका जताई गई है। आरोप है कि बीती ईद के दिन भी इस जमीन पर नमाज़ पढ़ने की तैयारी कर ली गई थी। तब उठे विरोध के बाद 9 अप्रैल, 2024 को दोनों पक्षों में नमाज़ न पढ़ने का सुलहनामा हुआ था। इस बकरीद को सुलहनामे में लिखी गई बातें ठुकरा कर एक बार फिर से नमाज़ पढ़ने की कोशिश की गई।

रामश्रय की शिकायत में आगे बताया गया है कि 17 जून को बकरीद के मौके पर सरकारी जमीन पर नमाज़ पढ़ी गई। नमाज़ पढ़ने के लिए मुस्लिम समुदाय के कई लोग वहाँ एकजुट हुए थे। आरोप है कि गाँव में ईदगाह भी मौजूद है लेकिन भीड़ ने नमाज़ पढ़ने के लिए सरकारी जमीन को ही चुना। आरोपितों की इस हरकत को शिकायतकर्ता ने 2 समुदायों के बीच भेद पैदा करने वाला लिखा है। साथ ही बताया गया कि इस करतूत से क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त हो गया। पंच रामाश्रय ने आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

पुलिस ने रामाश्रय की शिकायत पर नूरुद्दीन, जमालुद्दीन, मुस्तफा, अशरफ सहित अन्य अज्ञात नमाज़ियों पर FIR दर्ज कर ली है। जमीन पर कब्ज़े की साजिश में साथ देने के आरोप में महिला ग्राम प्रधान के पति केदार यादव व सरकारी स्कूल में कर्मचारी प्रमोद यादव को भी नामजद किया गया है। इन सभी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153- A, 295- A और 447 के तहत कार्रवाई की गई है। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

11 आरोपित गिरफ्तार, 3 पुलिसकर्मियों पर गिरी गाज

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक कुल 11 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। वीडियो व अन्य सबूतों के आधार पर अन्य आरोपितों को चिन्हित करने की कोशिश के साथ जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है। वहीं कार्रवाई में ढिलाई के आरोप में कुल 3 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया गया है। लाइन हाजिर होने वाले स्टाफ में थाना प्रभारी नीरज कुमार राय, सब इंस्पेक्टर ओम प्रकाश यादव व मोहन सिंह हैं। इन सभी के खिलाफ जाँच भी करवाई जा रही है।

ठुकराया जा चुका था ईदगाह का प्रपोजल

कुशीनगर जिले के एडिशनल एसपी अभिनव त्यागी ने मीडिया से बताया कि जिस जमीन पर अवैध तौर पर नमाज़ पढ़ने का प्रयास किया गया था, कुछ समय पहले उस जगह ईदगाह बनाने का प्रपोजल भेजा गया था। हालाँकि प्रशसन ने अपने फैसले में इस प्रपोजल को ठुकरा दिया था। इस इंकार के बावजूद उसी सरकारी जमीन पर बकरीद में नमाज़ पढ़ने का प्रयास किया गया था जिस पर पुलिस ने कार्रवाई की है। नमाज़ियों में लगभग सभी उम्र वर्ग के लोग बताए जा रहे हैं।

गाँव में पहले से मस्जिदें और मदरसे, लेकिन जिद सरकारी जमीन की

ऑपइंडिया ने शिकायतकर्ता रामाश्रय से बात की। उन्होंने बताया कि गाँव तुर्कहा में पहले से ही मस्जिदें और मदरसे हैं लेकिन फिर भी नमाज़ियों की जिद सरकारी जमीन को ही घेर कर नमाज़ पढ़ने की थी। रामाश्रय ने आरोप लगाया कि बकरीद के दिन अचानक ही सैकड़ों नमाज़ी सरकारी जमीन पर जुट गए। इन सभी के पास एक लम्बी चटाई थी जिसे आनन-फानन में बिछा कर उसी पर नमाज़ शुरू हो गई। कुछ ही दूर पर पुलिस बल की मौजूदगी का भी दावा किया गया जो इस भीड़ को नहीं रोक पाया।

बारात घर की आड़ में बनने लगी इस्लामी इबादतगाह

शिकायतकर्ता ने सरकारी जमीन को हड़पने वाली इस पूरी में महिला ग्राम प्रधान के पति केदार यादव को खासतौर पर सक्रिय बताया। उन्होंने हमें बताया कि प्रधान पति लम्बे समय तक पूरे गाँव को धोखे में रखे थे। वो सरकारी जमीन पर बारात घर बनाने का भरोसा दिलाते रहे। आरोप है कि बारात घर की आड़ में ग्राम समाज की भूमि पर इस्लामी इबादतगाह बनाने की तैयारी हो चुकी थी। रामाश्रय ने इस साजिश में सरकारी स्कूल में कर्मचारी प्रमोद यादव व राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों की भी मिलीभगत का दावा किया है।

कड़ी कार्रवाई न हुई तो मंसूबे हो जाएँगे सफल

शिकायतकर्ता ने हमें आगे बताया कि भले ही आरोपितों को जेल भेजा जा चुका है लेकिन सरकारी जमीन पर कब्ज़े की साजिश कहीं न कहीं अभी भी जारी है। उन्होंने कब्जेदारी के इस पूरे प्लान में शामिल अधिकारियों की भी जाँच करवा कर उन पर कार्रवाई की माँग की। रामाश्रय का मानना है कि अगर उच्चाधिकारियों ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई न की तो साजिशकर्ता आज नहीं तो कल अपने मंसूबों में सफल हो जाएँगे। फ़िलहाल हालात शाँतिपूर्ण हैं। घटना का वीडियो भी सामने आया है। वीडियो में सैकड़ों लोगों की भीड़ एक खाली जगह पर बैठ कर नमाज़ पढ़ती दिख रही है।

जिस हल्द्वानी में इस्लामी कट्टरपंथियों ने किया था दंगा-आगजनी, वहाँ से गायब 2 हिन्दू लड़कियाँ यूपी से बरामद: निशा हुसैन और जीजा उजैर समेत 5 गिरफ्तार

हल्द्वानी के बनभूलपुरा से लापता हुई दोनों हिंदू लड़कियों को मुजफ्फरनगर से बरामद कर लिया है। उनके साथ उन्हें भगाने वाले मुस्लिम किशोर को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। इस मामले में आरोपित किशोर की बहन नुरीन उर्फ निशा, बहनोई उजैर उर्फ आसिफ, मामा अब्दुल शमी समेत कुल 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें आमिल हसन भी शामिल है। उसी ने दो दिन तक किशोर और दोनों लड़कियों को अपने घर मुजफ्फरनगर में छिपाकर रखा।

बता दें कि दोनों किशोरियाँ 20 मई को हल्द्वानी के बनभूलपुरा से गायब हो गईं थी। आरोप पड़ोस में रही रहने वाले नाबालिग मुस्लिम युवक पर था। सीसीटीवी फुटेज में सभी लोग बदायूँ की ओर जाते दिखे थे। इस मामले में पुलिस ने किशोर की बहन

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने निशा उर्फ नूरीन, उसके शौहर उजैर उर्फ आसिफ को गिरफ्तार किया। आरोपित किशोर पहले दोनों लड़कियों को लेकर उन्हीं के बदायूँ के सहसवान में मृदाटोला लेकर पहुँचा था। दोनों ने पुलिस की तलाश को देखते हुए उन्हें पैसे देकर मुजफ्फरनगर की ओर रवाना कर दिया, जहाँ आमिल ने उसे अपने घर में शरण दी थी। आमिल बनभूलपुरा के ही रहने वाले अब्दुल समी उर्फ भोला के लगातार संपर्क में था और उसे मालूम था कि तीनों मुजफ्फरनगर में हैं।

पुलिस ने इस मामले में अब आरोपित किशोर, निशा, उजैर, अब्दुल समी उर्फ भोला और मुजफ्फरनगर निवासी आमिल को गिरफ्तार किया है। इस मामले में रविवार को हिंदू संगठनों ने पुलिस को चेतावनी भी दी थी, तो सोमवार को सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन करते हुए एसएसपी पीएन मीणा से मुलाकात की थी, जिसके बाद एसएसपी ने 24 घंटे के अंदर लड़कियों की बरामदगी का आश्वासन दिया था।

एसएसपी पीएन मीणा ने दोनों किशोरियों की बरामदगी के लिए पुलिस की 4 टीमें लगाई थी, साथ ही साइबर ट्रेसिंग भी लगातार कर रही थी। इसके साथ ही पुलिस लगातार किशोर के संपर्क में रहने वालों से भी पूछताछ कर रही थी। पुलिस को सूचना मिली थी कि आरोपित किशोर दोनों लड़कियों को लेकर बरेली होकर दिल्ली के लिए निकला था, लेकिन पहुँचा नहीं। इसके बाद से सभी मुजफ्फरनगर में थे और अब पुलिस ने दोनों किशोरियों को बरामद करते हुए 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। किशोरियों की बरामदगी से पुलिस ने भी राहत की साँस ही है।

बता दें कि फरवरी 2024 में नगर निगम द्वारा सरकारी जमीन से कब्जा हटाए जाने के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों ने जमकर हिंसा की थी। हिंसा की इन वारदातों में 6 लोगों की मौत हो गई थी। इस दौरान कट्टरपंथी इस्लामिक भीड़ ने पत्थरबाजी-आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया था और दर्जनों गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया था।

‘हलाला से डर लगता था’: सनातन में घर-वापसी कर समरीन बनीं ‘सुमन यादव’, मित्रपाल को चुना जीवनसाथी: गायत्री मंत्र के जाप और हवन से हुआ शुद्धिकरण

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक मुस्लिम लड़की ने सनातन धर्म में घर वापसी की है। लड़की का नाम समरीन है जो अब सुमन यादव नाम से जानी जाएँगी। सुमन ने मित्रपाल नाम के हिन्दू युवक को अपना जीवन साथी चुना है। दोनों ने बरेली के ही अगत्स्य मुनि आश्रम में अग्नि को साक्षी मान कर 7 फेरे लिए और सदा एक दूसरे का साथ निभाने की कसम खाई। समरीन ने गायत्री मंत्र के जाप के साथ वैदिक विधि-विधान से हवन किया। मंगलवार (25 जून, 2024) को अपनी घर वापसी के बाद समरीन ने बुर्का नापसंद बताते हुए कहा कि उनको तीन तलाक और हलाला से डर लगता था।

कपड़ों का काम करने वाले जमील अहमद की 22 वर्षीया बेटी समरीन मूलतः बरेली के सेंथल इलाके की रहने वाली हैं। समरीन के अब्बा ने उन्हें महज कक्षा 5 तक पढ़ाया था। लगभग 2 साल पहले वह इज्जतनगर इलाके में अपने एक रिश्तेदार के घर किसी फंक्शन में गईं थीं। यहाँ रिश्तेदारी के पड़ोस में मित्रपाल का घर था। दोनों की यहीं पहली बार मुलाकात हुई थी। मित्रपाल इंटर पास हैं और 12 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर एक प्राइवेट नौकरी करते हैं।

थोड़े दिनों की बातचीत के बाद समरीन और मित्रपाल दोस्ती हो गई जो अंत में प्यार में बदल गई। दोनों ने शादी करने का भी निर्णय ले लिया। इस रिश्ते की भनक जब समरीन के परिजनों को लगी तो उन्होंने तमाम पाबंदियाँ कायम कर दीं। समरीन का घर से निकलना भी पहरे में होने लगा। उससे फोन भी छीन लिया गया। समरीन के निकाह के लिए भी कोई मुस्लिम लड़का खोजा जाने लगा। इधर समरीन के साथ उनके प्रेमी मित्रपाल भी जल्द से जल्द वैवाहिक बंधन में बंधने की कोशिश में जुटे थे।

मित्रपाल ने अपने दोस्तों के जरिए अगत्स्य मुनि आश्रम और कई घर वापसी करवा चुके पंडित के के शंखधर के बारे में पता लगाया। 25 मई (मंगलवार) को समरीन जैसे-तैसे अपने घर से निकल कर मित्रपाल के पास पहुँची। यहाँ से दोनों अगत्स्य मुनि आश्रम गए। पंडित के के शंखधर ने दोनों के कागजात चेक किए। समरीन ने अपनी घर वापसी व मित्रपाल से विवाह की इच्छा बिना किसी जोर-जबरदस्ती के अपनी मर्जी से करना बताया। इसका उन्होंने बाकायदा लिखित सबूत भी जमा किया।

आखिरकार दोनों का विवाह अग्नि को साक्षी मान कर हो गया। समरीन ने अपनी घर वापसी के बाद गायत्री मंत्र का जाप किया और विधि-विधान से हवन किया। पंडित के के शंखधर के अलावा मंदिर में मौजूद हिन्दू संगठन के सदस्यों ने समरीन को आशीर्वाद दिया। मित्रपाल के परिजनों ने समरीन से सुमन यादव बनी अपनी बहू का ख़ुशी से स्वागत किया। समरीन ने बताया कि उनको इस्लमी तौर-तरीकों के साथ मज़हबी किताबों में लिखी गई बातों की ज्यादा जानकारी नहीं है।

मीडिया से बात करते हुए समरीन ने यह भी बताया कि अपने प्रेमी के घर वालों के तौर तरीके देख कर उन्हें हिन्दू धर्म पसंद आने लगा था। बकौल समरीन उन्हें बुर्का पसंद नहीं है। साथ ही वो तीन तलाक और हलाला से भी डरती हैं। शादी बाद समरीन पति के साथ अपने ससुराल चली गईं।

‘बड़ी संख्या में OBC ने दलितों से किया भेदभाव’: जिस वकील के दिमाग की उपज है राहुल गाँधी वाला ‘छोटा संविधान’, वो SC-ST आरक्षण से समृद्ध लोगों को करना चाहते हैं बाहर

आजकल राहुल गाँधी को आपने हाथ में भारत का संविधान लिए हुए देखा होगा। लाल रंग की डायरी की तरह दिखने वाला ये भारत के संविधान का पॉकेट वर्जन है, जो 20 सेंटीमीटर लंबा और 9 सेंटीमीटर चौड़ा है। इस पर चमड़े का जिल्द चढ़ा हुआ है। राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान अपनी रैलियों में भी मंच से संविधान की इस पुस्तक को दिखाया और लोगों को डराया कि भाजपा संविधान बदल देना चाहती है।

संविधान का कोट पॉकेट वर्जन, जिसे रखते हैं राहुल गाँधी

इसी तरह जब लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शपथ ले रहे थे तब भी राहुल गाँधी ने उनकी तरफ संविधान की ये प्रति दिखाई। असल में ‘ईस्टर्न बुक कंपनी’ ने इस संविधान को 2009 में पहली बार प्रिंट किया था। ये संविधान का कोट पॉकेट संस्करण है। कंपनी के निदेशकों में से एक सुमित मलिक ने जानकारी दी कि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने की तरफ से इसका आईडिया आया था। उन्होंने कंपनी से कहा था कि वो संविधान की ऐसी पुस्तक प्रिंट करे, जो वकीलों के पॉकेट में आराम से समा जाए।

अब तक इसके 16 संस्करण छापे जा चुके हैं। राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ये गिफ्ट में दिया जा चुका है। वकील और जज इसे खरीदते हैं। इसके लिए बाइबिल पेपर का इस्तेमाल किया गया जो काफी पतला होता है, सभी अनुच्छेदों को लाल रंग में रखा गया और टेक्स्ट को काले रंग में। पहले संस्करण में इसकी 500-600 प्रतियाँ बिकी थीं, 16वाँ संस्करण आते-आते इसकी 5000-6000 प्रतियाँ बिक रही हैं।

2022 में इसका 14वाँ संस्करण जारी किया गया था, जिसका मूल्य 745 रुपए था। भारत के अटॉर्नी जनरल रहे KK वेणुगोपाल ने इसकी प्रस्तावना लिखी थी। उन्होंने इसमें संविधान को भारत का भाग्य बताया है। दो भाइयों CL मलिक और PL मिल्क ने 1940 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बस कर बुक पब्लिशिंग का फैसला लिया था। कॉन्ग्रेस के कई नेता-कार्यकर्ता अब इसे खरीद रहे हैं। कॉन्ग्रेस की ताज़ा रणनीति को देखें तो वो ‘संविधान संरक्षक’ के रूप में खुद को दिखाना चाहती है, ऐसे में इसकी बिक्री और बढ़नी तय है।

आइए, अब बात करते हैं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन की। वही, जिनके आईडिया पर ये छपा था और आज राहुल गाँधी का फेवरिट बना हुआ है। 2 दशक से भी अधिक समय से वो कानून की प्रैक्टिस कर रहे हैं और पिछले 25 वर्षों में मान्यता प्राप्त करने वाले सबसे युवा वरिष्ठ अधिवक्ता है। प्रदूषण के खिलाफ भी वो सक्रिय रहे हैं, EWS को लेकर भी न्यायपालिका में साक़िया रहे हैं। 2015 में भारत में क्रिकेट प्रशासन और BCCI में बदलाव लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जिस लोढ़ा समिति का गठन किया था, उसके सचिव के रूप में उन्होंने काम किया था।

OBC आरक्षण के लाफ हैं वकील गोपाल शंकरनारायणन

आरक्षण को लेकर गोपाल शंकरनारायणन की क्या सोच है, ये जानना ज़रूरी है। साथ ही ये सवाल भी, कि क्या राहुल गाँधी इससे इत्तिफ़ाक़ रखते हैं? उन्होंने EWS आरक्षण को चुनौती दी थी। इस पर उनके विचार हैं कि किसी भी चीज का सिर्फ समर्थन या विरोध नहीं होता, बीच में भी कुछ होता है। उनका मानना है कि SC-ST के अलावा जाति आधारित आरक्षण का प्रावधान संविधान में कहीं नहीं है। वो कहते हैं कि संविधान के पहले संशोधन के बाद OBC आरक्षण जैसी चीजें आईं।

बकौल गोपाल शंकरनारायणन, ST और OBC समाज में भी एक छोटा सा अभिजात्य वर्ग है जो उन्हें मिले 98-99% आरक्षण का लाभ उठा रहा है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति द्वारा मान्यता प्राप्त SC जातियों में 1200 ऐसी हैं जिन्हें कभी आरक्षण का लाभ मिला ही नहीं। असं में उन्हें दिक्कत इस बात से है कि EWS के कारण आरक्षण की सीमा 50% के पार चली जाती है। उन्होंने बताया कि EWS पर फैसला सुनाने वाले 5 जजों में सबकी अलग-अलग राय थी।

‘Law School Policy Review’ नामक वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि संविधान की बहस से पहले भी महात्मा गाँधी और भीमराव आंबेडकर जैसे नेता दलितों के खिलाफ वर्षों से हो रहे भेदभाव की बात करते थे और सुझाया गया कि जिन्हें ‘अछूत’ कहा जाता था उनके लिए संविधान में विशेष उपाय करने की ज़रूरत है। उनका मानना है कि जैसे ही आरक्षण SC-ST के अलावा अन्य समुदायों के लिए आगे बढ़ाया गया, वैसे ही इसका उद्देश्य खत्म होने लगा।

अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा था, “सामाजिक रूप से मजबूत कई समुदायों को आरक्षण का लाभ मिलने लगा, जो उन्हें मिलना चाहिए था जिनके साथ इतिहास में भेदभाव हुआ। OBC समुदाय में बड़ी संख्या में ऐसे हैं, जिन्होंने दलितों के साथ भेदभाव किया। अब आप दोनों को लाभार्थियों की समान श्रेणी में डाल रहे हैं। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्ता में यही समुदाय हैं और सरकार में उनकी बड़ी भूमिका है। कई ऐसे समुदाय हैं जो OBC बनना चाहते हैं, जैसे कई OBC सब SC का दर्जा चाहते हैं।”

गोपाल शंकरनारायणन समझाते हैं कि प्रावधान होने के बावजूद राष्ट्रपति द्वारा मान्यता प्राप्त पिछड़ों की सूची में से अब तक एक भी जाति को हटाया नहीं गया है, जो बताता है कि आरक्षण के लाभार्थियों की संख्या बढ़ती ही गई है अब तक। उनका पूछना है कि आरक्षण का क्या यही उद्देश्य था कि अधिक से अधिक लोग पिछड़े हो जाएँ? वो जाती जनगणना या सरकारी दस्तावेजों में जाति के जिक्र के भी विरोधी हैं और कहते हैं कि लोगों से ये पूछा जाना चाहिए कि उनके पास घर है या नहीं, उसकी आर्थिक स्थिति क्या है।

सुप्रीम कोर्ट में भी आरक्षण में बदलाव पर लड़ाई

गोपाल शंकरनारायणन द्वारा दायर की गई याचिका के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में SC-ST में जो क्रीमीलेयर हैं, अर्थात जो संपन्न और शिक्षित हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ न दिया जाए? मार्च 2028 में ‘समता आंदोलन समिति’ व अन्य की याचिका पर ये सवाल किया गया था, याचिकाकर्ताओं के वकील गोपाल शंकरनारायणन ही थे। उनका मानना है कि आरक्षण में क्रीमीलेयर को हटा दिए जाने से गरीबों और पिछड़ों को इसका वास्तविक लाभ मिलेगा।

उन्होंने उस दौरान दलील दी थी कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति में जो सचमुच में पिछड़े एवं वंचित हैं, उन्हें ये पीड़ा हो रही है कि उनके ही समुदाय के उन्नत व समृद्ध वर्ग उन लाभों को उनसे छीन रहा है, जो वास्तव में उन तक पहुँचने चाहिए थे। गोपाल शंकरनारायणन मराठा आरक्षण के भी खिलाफ हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले एक्टिविस्ट जारांगे पाटिल मराठों और मुस्लिमों के लिए आरक्षण की माँग कर रहे हैं, इसके लिए धरना-प्रदर्शन और अनशन किए जा रहे हैं।

इसी साल अप्रैल में मराठा आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर गोपाल शंकरनारायणन ने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही निर्णय दे चुका है कि आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं जा सकती। गोपाल शंकरनारायणन के बारे में एक और बात बता दें कि राजीव गाँधी के हत्यारे AG पेरारिवलन की रिहाई सुनिश्चित करवाने के लिए भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा के साथ उनकी झड़प भी हो चुकी है, जज ने उन पर अवमानना का मामला चलाने की चेतावनी दी थी, जिसका वकीलों के संघ ने विरोध किया था।

OBC-OBC का रट्टा मारते रहते हैं राहुल गाँधी

ये आश्चर्य की बात है कि OBC-OBC का रट्टा लगाने वाले राहुल गाँधी संविधान की वही पुस्तक लेकर घूम रहे हैं, जो एक ऐसे अधिवक्ता की संकल्पना है जो OBC आरक्षण के विरोधी हैं। राहुल गाँधी कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार से पूछते हैं कि उनके प्रशासन में कितने OBC सचिव हैं। जबकि वो भूल जाते हैं कि पीएम मोदी खुद OBC समुदाय से आते हैं। मोदी मंत्रिमंडल में सबसे अधिक ओबीसी मंत्रियों की संख्या है। ओबीसी समाज के लिए कई योजनाएँ चल रही हैं।

राहुल गाँधी ये तक कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी OBC नहीं हैं, उन्होंने खुद गुजरात का CM बनने के बाद अपनी जाति को ओबीसी में शामिल किया। हालाँकि, सच ये है कि 1994 में ही इस संबंध में अधिसूचना जारी हुई थी जब कॉन्ग्रेस की ही सरकार थी। वहीं अप्रैल 2000 में भारत सरकार ने मोढ़ घांची समुदाय को OBC का दर्जा दिया। उस समय भी मोदी सीएम तक नहीं बने थे। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस लगातार झूठ फैलाती रहती है।

मुस्लिम महिला ने BJP को दिया वोट तो शौहर अब्दुल आशिफ मंसूरी ने बताया हराम, तीन-तलाक देकर घर से निकाला: MP के छिंदवाड़ा का मामला

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक मुस्लिम महिला ने बीजेपी की सदस्यता की और बीजेपी के लिए प्रचार किया, तो उसके शौहर ने बीजेपी को वोट देने को हराम बताते हुए उसे तीन-तलाक दे दिया। यही नहीं, शौहर की माँ और बहन से भी उसकी जमकर पिटाई की। उन लोगों ने महिला को घर से निकाल दिया है और महिला किराए के घर में रहने को विवश है। महिला का निकाह 8 साल पहले हुआ था, लेकिन अब तीन तलाक दिए जाने के बाद वो बेघर हो चुकी है। महिला ने शौहर और ससुराल के पक्ष के सदस्यों पर 5 लाख के दहेज के लिए प्रताड़ित करने के भी आरोप लगाए हैं।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, पीड़ित मुस्लिम महिला ने कहा, “8 साल पहले उसका निकाह अब्दुल आशिफ मंसूरी से हुआ। निकाह के बाद से पति, सास व चार ननद मायके से दहेज में 5 लाख रुपए लाने का दबाव बनाकर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने लगे। उसे घर से निकाल दिया गया। वह बेटे के साथ किराए के मकान में रह रही है। इस दौरान शौहर अब्दुल आशिफ मंसूरी ने उसके साथ मारपीट कर तीन तलाक बोलकर रिश्ता तोड़ लिया।” महिला ने कहा कि शौहर और परिजनों ने बीजेपी को वोट देने को हराम कहते हुए तीन तलाक दिया है।

महिला ने छिंदवाड़ा कोतवाली में दी शिकायत में कहा है कि उसके शौहर ने उसे पहले 30 मार्च, 2022 को तलाक दिया और बाद में अक्टूबर और नवंबर 2023 में दो बार तलाक दिया। वहीं, महिला के शौहर ने कहा कि उसके परिवार में किसी ने भी उसे परेशान नहीं किया क्योंकि वह पिछले तीन साल से अलग रह रही थी। तलाक का मुद्दा पहले ही अदालत में दायर किया जा चुका था।

इस मामले में कोतवाली के टीआई उमेश गोल्हानी ने बताया, “पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया कि प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री से प्रभावित होकर उसने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को अपना वोट दिया। उसने बीजेपी के लिए प्रचार भी किया था। इससे महिला का पति, सास व ननद नाराज हो गए। इसके बाद पति ने मारपीट करने के साथ तीन तलाक कहकर उससे रिश्ता तोड़ लिया।”