माओवादी कहीं ना कहीं अब ये बात जान और समझ गए हैं कि 'जल-जंगल-जमीन' का उनका नारा अब प्रासंगिक नहीं रहा है। इनके पोषक ये बात अच्छे से जानते है कि यदि अब यह 3 मुद्दे ही प्रासंगिक नहीं रहे, तो अब माओवंशी किस तरह से अपना अभियान आगे बढ़ाएँ? लोगों के बीच डर पैदा कर के ही ये आतंकवादी संगठन अब प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं।
कॉन्ग्रेस और एसपी, बीएसपी के बीच चुनावी मैदान में शैडो बॉक्सिंग केवल बीजेपी के वोट काटने के लिए एक छद्म मोर्चा था, क्योंकि उनमें से कोई भी वास्तव में इतना आश्वस्त नहीं था कि वो लोकसभा चुनाव में अपने दम पर कुछ कर सकते हैं। प्रियंका गाँधी वाड्रा का बयान भी इसी की पुष्टि करता है।
'वीरे दी वेडिंग' फिल्म में खुलकर अपने 'मन की बात' करने वाली स्वरा भास्कर को बहुत आसानी से नारीवाद का चेहरा बना कर पेश किया जाने लगा है। यह वर्तमान समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि महिलाओं के अधिकारों को उसके शारीरिक सुख और जबरन फूहड़पन मात्र से जोड़कर पेश कर देने से वो समाज में महिलाओं की नई पहचान दिलाने वाले ठहराए जाने लगते हैं।
ऐसे आदमी के शर्ट में एक छेद हो, तो उँगली डाल कर पूरा फाड़ कर देख ही लेना चाहिए कि भाई तुम्हारे 2009, 2014 और 2019 के चुनावी हलफ़नामे में इतने बदलाव क्यों हैं? आखिर बैकऑप्स नामक कम्पनी का डायरेक्टर प्रियंका को चुनावों के तुरंत पहले क्यों बना दिया गया था?
ऐसे मौकों पर एडिटर्स गिल्ड उसी 'गुप्त' रोग से ग्रसित हो जाता है, जिसमें नियम है कि भाजपा-विरोधी शासित राज्यों में पत्रकारों पर ज़ुल्म भी हो तो उस पर कुछ नहीं बोलना है और भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार की सीढ़ियों से गिरकर ऊँगली में चोट भी लगती है तो एक 'Condemnation Letter' जारी कर दिया जाता है।
सेक्स बहुत बुरी चीज है, इसके कारण लड़कियों का भविष्य बर्बाद हो रहा है - ऐसी बात नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि जिस उम्र में सेक्स को लीगल करने की बात हो रही है, हमारा समाज उसके लिए तैयार नहीं है और न ही उसके लिए 16 के उम्र की लड़कियाँ तैयार हैं।
एक वक्त ऐसा भी था, जब भाजपा को अपनी 'माँ' बताने वाले सिद्धू का कई साल तक भारतीय जनता पार्टी के साथ 'बेटे' जैसा जुड़ाव रहा था। लेकिन, पार्टी बदलते ही उन्होंने 'माँ' को 'गाली' देनी शुरू कर दी है।
राहुल गाँधी व्यक्तित्व नहीं, एक मानसिक अवस्था है। कभी-कभी व्यक्ति व्यक्तिवाचक संज्ञा से ऊपर उठ कर जातिवाचक संज्ञा हो जाता है, और उनमें से राहुल गाँधी जैसे महज़ चंद लोग ऐसे होते हैं जो व्यक्ति होते हुए भी विशेषण बन जाते हैं।
समुदाय विशेष वाले तब तक ‘बेचैन’ रहेंगे जब तक धर्म और संस्कृति, हिन्दू पंथ और सम्प्रदाय की हर अभिव्यक्ति बंद नहीं हो जाती। केवल सरकारी ही नहीं, निजी भी। यही हिन्दूफोबिया है। The Print वालों ने इस लेख से प्रोपेगेंडा को नई ऊंचाई दी है।
अरबी अक्षर इस्तेमाल करने के बदले 1 नवम्बर 1928 को कमाल पाशा ने तुर्की वर्णमाला भी लागू कर दी और इसके साथ ही तुर्की ज़ुबान को अरबी में लिखना बंद करवा दिया।