ये चम्पक लेफ़्ट-लिबरल इको सिस्टम जितना चिल्ला ले कि मोदी ने तो कॉन्ग्रेस की योजनाओं का नाम बदल दिया, लेकिन सत्य यही है कि योजना का सिर्फ नाम ही नहीं बदला, उस पर काम भी किया, और करोड़ों ज़िंदगियों को उन छोटी सुविधाओं से छुआ, बेहतरी दी, जो साउथ और नॉर्थ ब्लॉक में बैठे लोगों के लिए नगण्य या इन्सिग्निफिकेंट थीं।
तथाकथित लौह-महिला इंदिरा ने वामपंथी शिक्षा नीति के उस विष-बेल को बाकायदा सींचकर इतना जड़ीभूत कर दिया कि आज हम जो रोमिला, चंद्रा, हबीब आदि की विषैली शिक्षाएँ देख रहे हैं, वही मुख्यधारा बन चुकी है, यहाँ तक कि आर्य-आक्रमण का सिद्धांत, सभी तरह से खारिज होने के बाद भी पढ़ाया जा रहा है।
साल के दो दिनों को छोड़ दिया जाए, वो भी कॉन्ग्रेस के कार्यकाल के, तो राजीव गाँधी सिख हत्याकांड से लेकर, क्वात्रोची, एंडरसन, शाहबानो, रामजन्मभूमि, बोफ़ोर्स, भोपाल गैस कांड आदि के लिए हमेशा चर्चा में बने रहते हैं।
गाय की मौत पर इकट्ठा होने वाले संवेदनशील गाँव उस बच्चे को पहली ही बार बहकने पर, इकट्ठा होकर क्यों नहीं समझाने आया कि बेटा, हथियार मत उठाओ? तब आपके गाँव की संवेदना और नैतिकता कहाँ थी! और आप एक गाय को बीच में ले आते हैं? क्या गाय ने किसी पर ग्रेनेड फेंका था
सोनिया व राहुल गाँधी के नेशनल हेराल्ड घोटाले, राहुल की बहन प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा का बीकानेर जमीन घोटाला, डीएलफ जमीन स्कैम की पड़ताल करने पर साफ होता है कि नेहरू काल के भ्रष्टाचार की इसी विरासत और इसी मॉडस ऑपरेंडी को आगे बढ़ाया।
एक पिता के तौर पर तो बच्चों को हमेशा परिवार के साथ खड़े रहना चाहिए, लेकिन वो पिता प्रधानमंत्री भी था, और दुर्भाग्य से चोर और हत्यारा भी। देश उनके पिता से बड़ा है और अगर ये दोनों देशभक्त हैं तो राहुल या प्रियंका को मोदी की बात सुन कर चुपचाप रोने के बाद, आँसू के घूँट पीकर, रैली में किसी और विषय पर भाषण देते रहना चाहिए था।
अपनी धुर विरोधी पार्टी बीजेपी के ख़िलाफ़ कोई मुद्दा ना मिलता देख केवल इसी ताक में रहना कि कब मोदी क्या कह दें और उसे एक मौक़ा समझकर ये सारे लपक लें, और फिर शुरू हो जाए अनरगल बातों का दौर।
मैं जेएनयू की खदान का ही उत्पाद हूँ। कन्हैया तो कुछ भी नहीं, इसके बौद्धिक पितृ-पुरुषों और माताओं से मैं उलझा हूँ, उनकी सोच किस हद तक भारत और हिंदू-विरोधी है, यह मुझे बेहतर पता है।
'इंडिया टुडे' ने जिस इंटरव्यू को प्रसारित नहीं किया उसके बीच से ही शायद ये तस्वीरें निकल कर आई हैं। इनमें जो भंगिमा है वो किसी खलनायक के 'आओ कभी हवेली पर' वाले रूप की ही याद दिलाती हैं।