आज JNU में एक मार्ग का नाम सावरकर जी के नाम पर रखा जाना निसंदेह एक दूरदर्शितापूर्ण कदम है। यह कदम उस स्थान पर अत्यावश्यक हो जाता है, जहाँ बैठकर स्वतन्त्रता उपरांत एक खास इतिहासकारों के वर्ग ने भारतीय मूल्यों को धूलि-धूसरित करने का कार्य करते हुए इतिहास की मनगंढ़त व्याख्या हमारे समक्ष रखी।
वेदों में महिलाओं की स्थिति के विषय में जो मंत्र हैं, अगर आप उनको पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि महिलाओं को वहाँ बहुत अधिक सम्मानजनक दर्जा प्राप्त है। वेद महिलाओं को इतना सशक्त, उदात्त और स्वीकार्य स्थान प्रदान करते हैं कि दुनिया की कोई भी तथाकथित आधुनिक और विकसित सभ्यताएँ उसके बारे में सोच भी नहीं सकती।
गुरु नानक ने स्वयं अपनी आँखों से देखे बाबर के अत्याचारों का ऐसा दर्दनाक वर्णन किया है कि आज भी उसको पढ़ कर किसी का भी दिल पसीजे बिना नहीं रह सकता। उस अत्याचारी बादशाह की जामिया मिलिया जैसे राष्ट्रीय संस्थान में जयंती मनाई गई थी।
कुरान में हिजाब का जिक्र है, जिसमें महिला का चेहरा दिखता रहता है। बुर्का केवल कट्टरपंथी इस्लाम की सोच है जिसमें वो महिला को जबरदस्ती चेहरा ढकने के लिए बाध्य करते हैं। अरब देशों में बुर्का पहनने का चलन वहाँ पर चलने वाली आँधियों से बचने के लिए था। धीरे-धीरे उस क्षेत्र में इस्लाम धर्म के फ़ैलने के कारण बुर्का इस्लाम का अंग बन गया।
खतने के जरिए महिलाएँ पवित्र होती हैं। इससे समुदाय में उनका मान बढ़ता है और ज्यादा कामेच्छा नहीं जगती। - यही वो सोच है, जिसके कारण छोटी बच्चियों के जननांगों के साथ इतनी क्रूर प्रक्रिया अपनाई जाती है।
दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों में छोटे से लेकर बड़े तक, जवान से लेकर बूढ़े तक और महिलाओं से लेकर बच्चों तक - हर कोई शामिल था। इसे देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह लड़ाई एक दिन या CAA विरोध की नहीं बल्कि गजवा-ए-हिंद के सपने को साकार करने की थी।
कट्टरपंथियों के घर के ऊपर युद्ध लड़ने के मकसद से पेट्रोल बम, एसिड, पत्थर और आग लगाने का सामान इकट्ठा दिख रहा है, और फिर भी आपको बताया जा रहा है कि ये 'हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों के सफाए की साजिश है', 'ये मुस्लिमों का पोगरोम है', 'ये मुस्लिमों का नरसंहार है'।
पूतना और होलिका को खलनायिका से नायिका बनाने की कोशिश बाल-हत्या के महिमामंडन की कोशिश है। उसे ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर ढका नहीं जा सकता। ब्राह्मण तो वे दधीचि थे, जिन्होंने वृत्रासुर को मारने के लिए अपनी अस्थियाँ दे दीं, वज्र का निर्माण करने वास्ते।
हमें यकीन है कि ये महिलाएँ अपनी ऊर्जा बेफिजूल चिल्लाकर बर्बाद नहीं करती होंगी। इन्हें सरकारी योजना के तहत केवल दियासलाई की लालसा नहीं रहती होगी। ये पारिवारिक आय के लिए सिर्फ़ किसी पुरूष पर आश्रित नहीं रहती होंगी।
शाहीन बाग़ ने अपने चहेते मीडियाकारों के साथ मिलकर रोज थोड़ा-थोड़ा प्रयासों से दिल्ली में हिन्दुओं के खिलाफ नरसंहार की तैयारियाँ शुरू की। बीस साल के दिलबर नेगी की मौत हो, चाहे आईबी अधिकारी अंकित शर्मा का चार सौ बार चाकुओं से गोदा गया शरीर हो, इस सबकी पटकथा शाहीनबाग ने ही आधार दिया इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।