Saturday, July 31, 2021
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अरबीना खातून की मौत पर AltNews का ‘परिश्रम’: निखिल वाग्ले का वो ट्वीट जो प्रतीक सिन्हा के मन के चोर को मोर बनाता है

ऑल्टन्यूज ने पुलिस को झूठा बताया, वजीर के विरोधाभासी बयानों के आधे हिस्से को को सही और आधे को 'मानसिक परेशानी' के नाम पर गलत कह देने जैसा दिखाया, डॉक्टर आदि की बातों के 'हो सकता है' को ही तथ्य मान लिया।

आज कोरोना महामारी से पूरा देश लड़ रहा है लेकिन ऐसे माहौल में भी ऑल्ट न्यूज के प्रतीक सिन्हा जैसे कुछ लोग हैं जो प्रपंच के सहारे मजहब की दुकान चलाना चाह रहे हैं। जबकि रेल मंत्रालय ने गरीब, प्रवासी श्रमिकों के लिए ट्रेन की व्यवस्था की, भोजन, पानी और अल्पाहार दिया, 31 बच्चों का जन्म उन्हीं ट्रेनों पर हुआ, ऐसे में ट्रेन पर हुई एक मौत पर वामपंथी प्रोपेगेंडा साइट ऑल्टन्यूज ने सात दिन खर्च करके यह जताने की कोशिश की कि सरकार ने मुज़फ़्फ़रपुर की अरबीना खातून की जान ले ली। यहाँ पर यह जानना भी जरूरी है कि कुल नौ बार मीडिया में ट्रेन पर ‘भूख से हुई मौत’ का जिक्र आया, जो कि सरकार द्वारा गलत बताई गई, लेकिन ऑल्टन्यूज ने अरबीना खातून वाले मामले में ज्यादा रुचि दिखाई।

ऑल्टन्यूज, यूँ तो यही सब करने के लिए मशहूर है जिसमें इसके संस्कारहीन कर्ताधर्ता प्रतीक सिन्हा का हाथ सबसे लम्बा है, लेकिन मौत में इस तरह का घटिया प्रोपेगेंडा लगाना एक नीच स्तर का कार्य है। प्रतीक सिन्हा को संस्कारहीन इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस निठल्ले आदमी का करियर नवजात शिशु तक की डॉक्सिंग और किशोर हिन्दुओं की जानकारियाँ ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर पब्लिक कर इस्लामी कट्टरपंथियों तक पहुँचाने से बना है। ये व्यक्ति नीचता की पराकाष्ठा है और संस्कारहीन विशेषण लगाना न्यायोचित प्रतीत होता है।

अरबीना खातून की मृत्यु कैसे हुई: क्या है मामला

श्रमिक ट्रेन पर बैठी अरबीना खातून की मौत उनके मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) पहुँचने से कुछ घंटे पहले हो जाती है। साथ में उनकी बहन कोहिनूर और बहनोई वजीर थे। वजीर ने मौत के वक्त जो बयान दिया और पुलिस के पास दर्ज बयान, वो यह था कि अपने पति द्वारा त्याग दिए जाने के बाद अरबीना की मानसिक हालत अच्छी नहीं थी, और वो बीमार भी थी। ट्रेन पर उनकी स्थिति बिगड़ गई और रास्ते में वो अल्लाह को प्यारी हो गईं।

इसके बाद मीडिया गिरोह ने, पहले के ही कुछ दिनों की तरह (जिसमें दैनिक भास्कर की भ्रामक रिपोर्ट भी शामिल है) यह कहना शुरु किया अरबीना भूख से स्टेशन पर पहुँचते ही मर गई। इसमें प्रपंच फैलाने में माहिर राणा अयूब भी शामिल थी जिसने एक भावुक, परंतु विशुद्ध झूठ, पोस्ट लिखा कि कैसे बिना खाना और पानी के महिला की मृत्यु हो गई।

PIB ने सरकारी सूत्रों को हवाले इस फर्जी खबर का फैक्टचेक कर के बताया कि भोजन-पानी से वंचित होने और भूख से मरने की बातें झूठी हैं। वजीर ने स्वयं ही बयान दिया था (जिसका ज़िक्र ऑल्टन्यूज ने भी किया है) कि ट्रेन पर खाना-पानी की समस्या नहीं थी। ये सब जब हो गया, तो प्रपंची प्रतीक सिन्हा से रहा नहीं गया क्योंकि इसमें ‘मजहबी प्रपंच’ का स्कोप दिखा। फिर पूरी योजना के तहत, नासा आदि के सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल कर के पत्थर को वॉलेट बताने वाले प्रतीक सिन्हा ने, इस फैक्टचेक का फैक्टचेक करने का दावा किया।

PIB फैक्ट चेक की द्वारा पहले ही इस तथ्य को फर्जी बता चुका था

ऑल्टन्यूज के ‘फैक्टचेक के फैक्टचेक’ का फैक्टचेक: भूखी थी कि नहीं- पाँच अलग बयान

कमाल की बात यह है कि तीन लोगों द्वारा ‘सात दिन मेहनत कर के ‘सत्य’ बताने वाले इस आर्टिकल में, जो PIB के फैक्टचेक को गलत बताने का दावा करती है जहाँ लिखा गया कि ‘मौत भूख से नहीं हुई’, ऑल्टन्यूज ने पाँच अलग-अलग बयान लिखे हैं। इससे फैक्टचेक के नाम पर प्रपंच बाँटने के कूड़े के दर्शन हो जाते हैं। जब फैक्टचेक इस बात का है कि मौत भूख से हुई या नहीं, तो फिर ट्रेन पर भोजन मिला या नहीं, इस बात पर चार अलग बयान क्यों हैं?

पहला बयान वजीर का है, जो ऑल्टन्यूज ने स्वयं छापा है कि, अरबीना खातून जिस ट्रेन पर थीं, वहाँ भोजन, पानी के साथ-साथ निश्चित अंतराल पर अल्पाहार की भी व्यवस्था थी। यह बयान वजीर में बीबीसी को भी दिया है।

ऑल्ट न्यूज़ के ‘फैक्ट चेक ‘ में वजीर के बयान जिसमें उसने ट्रेन में खाना मिलने की बात कही है

दूसरा बयान भी वजीर का है, जो ऑल्टन्यूज की सात दिनों के परिश्रम का परिणाम लगता है, जहाँ वो यह कहता पाया गया है कि ट्रेन पर खाना-पानी नहीं मिल रहा था। साथ ही, वो यह भी कहता है कि उसके पिछले बयान सही नहीं थे क्योंकि वो तुरंत हुई मौत के कारण परेशान था और उसके मन में जो आया वो बोल गया।

वजीर का वह बयान जो उसने कथित तौर पर ‘ऑल्ट न्यूज़’ से साझा किए

यह सामान्य बुद्धि-विवेक की बात है कि जिसके सामने एक लाश हो, वो ‘परेशानी’ में होने पर उसी सिस्टम को ले कर सकारात्मक बात बोल दे, ऐसा उचित नहीं लगता। अमूमन, व्यक्ति अगर ऐसे मामलों में झूठ भी बोलता है तो वो सरकार पर आरोप लगाता है कि सुविधाएँ नहीं मिलीं तो व्यक्ति की मृत्यु हो गई। यहाँ, वजीर (जिसके बयान अपनी पत्नी से भी मेल नहीं खा रहे) वो अपने परिजन की मौत पर रेलवे के पक्ष में बयान दे देता है!

वजीर की बात को इस आलोक में भी देखना चाहिए कि बाकी लोग भी ट्रेन पर थे, किसी एक को खाना पानी न मिला हो, ऐसा मानना तार्किक नहीं लगता। आज के दौर में फोन है सबके पास है, लोग सरकार की एक गलती पर दस वीडियो बना लेते हैं, और यहाँ किसी को भोजन-पानी से वंचित किया गया हो, और वीडियो न हो, ऐसा मानना विचित्र की श्रेणी में रखा जाएगा।

अरबीना ने खाना खाया या नहीं खाया, इस पर दो और बयान हैं, जो वजीर और उसकी पत्नी कोहिनूर के हैं। एक तरफ वजीर, ऑल्टन्यूज के अनुसार, यह कह रहा है कि ट्रेन पर चढ़ने से पहले अरबीना ने भोजन किया था, वहीं कोहिनूर का कहना है कि भोजन नहीं किया था। ये बातें, एक ही घर के दो लोग, जो अरबीना के साथ ट्रेन पर चढ़े, साथ रहते थे, वो कह रहे हैं।

मृतका की बहन कोहिनूर का बयान

ये बातें हाल में कही गई हैं। जिस परिवार की बात कहने में ऑल्टन्यूज यह बताता है कि ये लोग छोटे से जगह में साथ रहते थे, वहाँ क्या वो छोटी सी जगह इतनी बड़ी थी कि ट्रेन पर जाने की तैयारी में अरबीना ने खाना निकाला होगा और कहीं और जा कर खा रही होगी? उसे वजीर ने देख लिया, कोहिनूर ने नहीं देखा? ये बातें भी तर्क और समझ से परे है जो सिर्फ प्रतीक सिन्हा जैसों को ही सामान्य लगती होंगी।

पाँचवा बयान, भोजन को ले कर, दैनिक भास्कर के स्थानीय रिपोर्टर नूर परवेज द्वारा परिवार से लिया गया है। इस रिपोर्टर ने परिवार से बात की (परिवार में किस-किस से बात की, यह स्पष्ट नहीं है) जहाँ उन्हें, वजीर और कोहिनूर से भी एक कदम आगे, यह बताया गया कि ट्रेन में किसी भी यात्री को भोजन-पानी नहीं दिया गया। आप स्वयं आँकिए कि ये परिवार, और उसके सदस्य जिनमें से कई उस ट्रेन पर नहीं थे, वो यह बता रहे हैं कि ट्रेन पर किसी को खाना-पानी नहीं मिला।

हमने रेलवे मंत्रालय से जब भोजन के बारे में बात की कि क्या वाकई यात्रियों को खाना नहीं दिया गया, तो उन्होंने कहा कि बात झूठ है। रेलवे ने चार जगहों पर भोजन-पानी दिया जो क्रमशः अहमदाबाद, अजमेर, कानपुर और छपरा में बाँटे गए। रेलवे ने अपने बयान में बताया है कि किसी भी जगह यात्रियों ने खाने की गुणवत्ता या खाना न मिलने की शिकायत नहीं की।

रेलवे द्वारा जारी बयान

हम यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं बता रहे जो ऑल्टन्यूज ने न छापा हो। उन्हीं का लेख है, उन्हीं ने बयान लगाए हैं, उन्हीं लोगों ने सात दिन खर्च किए हैं, और एक ही लेख में पाँच अलग-अलग बयान है। ये सारे बयान भोजन-पानी को ले कर हैं, जो कि PIB द्वारा किए गए फैक्टचेक का मूल हिस्सा है कि मौत ‘भूख से नहीं हुई थी’।

पुलिस को झूठा बताने की जिद

ऑल्टन्यूज ने लेख में ‘मानसिक स्थिति’ के ठीक न होने की आड़ में पुलिस को कटघरे में डालने की कोशिश की है। यहाँ, संदेह का लाभ पीड़ित को देने के तर्क से चलते हुए प्रतीक सिन्हा ने उसी बिहार राज्य के अंतर्गत आने वाली रेलवे पुलिस को कटघरे में डाला है जिसकी बातों को दो सप्ताह पहले गोपालगंज रोहित हत्याकांड के मसले में अकाट्य सत्य के तौर पर दिखाया था।

वजीर ने जो बातें पुलिस से कही, और उसकी कही गई जो बातें पुलिस के पास दर्ज बयान में हैं, वहाँ साफ लिखा है कि मौत भूख से नहीं हुई और मृतका मानसिक रूप से बीमार चल रही थी और कई दिनों से पति द्वारा छोड़ दिए जाने के कारण उसकी स्थिति वैसे भी ठीक नहीं थी।

पुलिस पर आरोप यह लगाया जा रहा है कि पुलिस ने बिना उसे बताए, (जिसका कोई सबूत नहीं है सिवाय इसके कि वजीर ऐसा कह रहा है) बयान पर अँगूठा लगवा लिया। क्या हम वजीर की बातों को सच मान लें जिसने तीन जगह भूख को ले कर तीन बातें की हैं? जिसकी पत्नी ने अरबीना के खाने को ले कर एक बात कही, और वो कुछ और कह रहा है? हम उस वजीर की बात मान लें जो भरी ट्रेन में सिर्फ अरबीना के खाना-पानी न मिलने की बात कह रहा है, जबकि पहले कहा था कि रेलवे उन्हें खाना-पानी दे रही थी?

‘गरीब व्यक्ति’, जो ‘पढ़ लिख नहीं सकता’ के नाम पर ऑल्ट न्यूज ने पुलिस को झूठा ही नहीं, गैरकानूनी काम करने वाला बताने की कोशिश की है जहाँ उन्होंने वस्तुतः यह लिखा है कि पुलिस ने वजीर के बयान पर अंगूठा लगवा लिया लेकिन पढ़ कर सुनाया नहीं। यहाँ, इसी ऑल्ट न्यूज ने पुलिस का पक्ष नहीं रखा है कि क्या कथित अधिकारी ने वाकई अपने मन से कुछ भी लिख कर उसका अंगूठा ले लिया?

गोपालगंज वाले कांड में प्रतीक सिन्हा ने गरीब और असहाय पिता के बयानों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि वो बातें FIR में नहीं थीं। क्या वहाँ प्रतीक सिन्हा ने यह पता किया था पुलिस ने प्राथमिकी स्वयं लिखी थी, उसे पढ़ कर सुनाया था या नहीं? जो ‘नासा रोवर’ वाली तकनीक संस्कारहीन सिन्हा यहाँ लगा रहा है और पुलिस को झूठा और गैरकानूनी काम करने वाला बता रहा है, वही तकनीक दो सप्ताह पहले क्या मंगल ग्रह पर चली गई थी?

आखिर ‘मेरी बात बनाम पुलिस की बात’ के मामले में पुलिस का पक्ष गायब क्यों है? यह तो वही बात है कि पीड़ित के प्रति संवेदना की चादर डाल कर जो भी बुलवाना हो, बुलवा लो, उस पर कोई प्रश्न उठा कर संवेदनहीन होने का आरोप क्यों लेगा! जिस लेख को लिखने में तीन लोग लगे हों, और सात दिन का ‘परिश्रम’ किया गया हो, उसमें उक्त पुलिस अधिकारी का बयान कहाँ है जिस पर गैरकानूनी कार्य करने का आरोप लगाया जा रहा है?

यहाँ पर, सिर्फ एक नाम, एक मजहब के होने के कारण, प्रतीक सिन्हा और ऑल्टन्यूज ने परिवार के वीडियो बयानों को अखंड सत्य बताते हुए, पुलिस को अपराधी बताया है। साथ ही, बाकी समय पुलिस अफसर के नानी की भतीजे के भाई के बेटी के दोस्त के क्लास मॉनिटर के चाचा आदि तक की कड़ियाँ तलाश लेने वाले प्रतीक सिन्हा ने पुलिस का कोई पक्ष जानने की कोशिश भी नहीं की। यह न करना बताता है कि प्रतीक सिन्हा पहले परिणाम तय करता है, उसके बाद गोटियाँ सजाता है।

परिवार ने जो कहा वही अखंड सत्य?

ऑल्टन्यूज की अंतर्निहित समस्या यह है कि उसे हमेशा यह लगता है कि एक हिन्दू समुदाय का व्यक्ति अगर अपने पुत्र की मौत पर कुछ बोल रहा है तो वो झूठ ही बोल रहा होगा। वह उसे ‘एक शोकाकुल पिता का बयान’ कह कर, अपनी संवेदनहीनता को ‘हम तो पिता की मानसिक स्थिति को समझ रहे हैं’ की ‘संवेदनशीलता’ के नकाब में ढक लेते हैं।

यही बात पलट दीजिए और मजहब अलग कर दीजिए तो ऑल्टन्यूज की पूरी साइट पर ताहिर हुसैन जैसे दंगाइयों से ले कर फल-सब्जी पर थूकते समुदाय विशेष के लोगों, तबलीगी जमात के थूकने, पेशाब करने और मल त्यागने वाले जमातियों का बचाव पूरी शिद्दत के साथ किया जाता रहा है। सत्य उसके बिलकुल अलग तरफ खड़ा होता है लेकिन प्रतीक सिन्हा जैसे संस्कारहीन अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता बनाए रखते हैं।

दंगाई ताहिर हुसैन को लेकर जो ‘फैक्ट चेक’ ऑल्ट न्यूज़ ने किए थे

अरबीना खातून के मामले में पुलिस और प्रशासन को झूठा बताने से ले कर, परिवार के उन सदस्यों के भी बयान ले लिए गए, जो न तो अरबीना के साथ रहते थे, न ट्रेन पर थे। ‘साक्ष्य’ के नाम पर परिवार के लोगों के वीडियो लगा कर ऑल्टन्यूज क्या जताना चाहता है? कि मृतका के परिवार के व्यक्ति पहले झूठ बोल रहे थे, अब उन्हें याद आया तो सच बोलने लगे हैं? और सच भी ऐसे बोल रहे हैं कि पाँच जगह पाँच बातें हैं?

पूरे लेख में, जो एक तय प्रोपेगेंडा को ढकेलने के लिए लिखी गई है, यह बताने की कोशिश है कि ‘वो बीमार नहीं थी’। चूँकि (शायद ‘समझाने’ आदि में कमी रहने के कारण) पीड़ित परिवार अभी भी ‘भूख’ वाली बात पर क्लियर बयान नहीं दे पा रहा, तो इन्होंने चर्चा को उधर मोड़ दिया कि अरबीना बीमार नहीं थी।

वजीर ने स्वीकारा और पुलिस द्वारा दर्ज बयान में कहा है कि अरबीना के पति ने उसे छोड़ दिया था और वो पिछले कुछ समय से बीमार थी। साथ ही यह भी कहा कि इसी कारण से वो मानसिक रूप से भी ‘अस्थिर’ अवस्था में थी। जहाँ तक बात प्लेटफॉर्म पर शव के होने की थी, तो स्वयं वजीर का बयान है कि उसने ही लाश को प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर रखा, और बाद में पुलिस को सूचना दी। यहाँ भी रेलवे पर आरोप लगाना अनुचित ही है।

वजीर का स्टेटमेंट

लेकिन, क्या ऑल्टन्यूज ने कोर्ट में दाखिल पुलिस द्वारा दर्ज किए गए बयान पर कोई चर्चा की? बिलकुल नहीं। करते भी तो यही लिखते कि परिजन की मृत्यु के बाद वो उस अवस्था में नहीं था कि वो सही बयान दे पाए।

साथ ही, हर जगह ‘ही मेन्टेन्ड दैट अरबीना डिडन्ट हैव अ मेडिकल कन्डीशन’ (हालाँकि, वह इस बात पर डटे रहे कि अरबीना को पहले से कोई बीमारी नहीं थी), लिख कर ऑल्टन्यूज अपनी ही मूर्खता प्रदर्शित कर रहा है। जब तुम एक व्यक्ति (वजीर) की मानसिक स्थिति का हवाला दे कर डेढ़ बीघा में फर्जी लेख छाप देते हो कि बीबीसी से बात करते हुए खाना-पानी न मिलने की बात उसने गलत बोली थी, तो उसी समय उसके द्वारा बोली गई दूसरी बात सही कैसे मान ली जाए?

मतलब, मानसिक स्थिति उसकी ऐसी थी कि बाद में ऑल्टन्यूज आधी बात को पकड़ ले और डटा रहे, बार-बार लिखे: ‘हालाँकि अरबीना को कोई बीमारी नहीं थी, इस पर वो कायम रहे’। वो ‘कायम’ हैं या अभी भी तुम्हारे सात दिन के ‘परिश्रम’ के बाद झूठ बोल रहे हैं क्योंकि अब लाश दफ्न हो चुकी है, ये कैसे पता चलेगा?

मैं इस ‘गिल्ट ट्रिप’ पर नहीं जाने वाला कि ‘उसके घर में एक व्यक्ति की मौत हो गई है, और आप परिजनों पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं’। मेरा काम इस प्रपंच में हर बात को तार्किक तरीके से देखना है कि इनके लेख में किस तरह की विसंगतियाँ हैं। उसके अलावा मैं भावनात्मक तौर पर किसी भी पीड़ित से जुड़ाव महसूस नहीं कर सकता क्योंकि फिर मेरी रिपोर्टिंग पक्षपाती हो जाएगी।

हर जगह ‘हालाँकि उन्होंने पहले से बीमार थी इस बात पर…’ इतनी बार लिखा गया है कि लोगों का ध्यान इस बात से हट जाए कि PIB का फैक्टचेक इस संदर्भ में था कि उसकी मृत्यु भूख से हो गई है। ‘भूख-प्यास’ को खूब केन्द्र में रख कर कविता पाठ हुआ और गिरोह ने खूब उछाला। जब यह साबित नहीं हो सका कि ट्रेन पर लोगों को भोजन-पानी नहीं दिया जा रहा था, तो अब आरोप यह लगाया जा रहा है कि पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, वरना पता चल जाता।

अगर परिवार को लगता है कि इसमें सरकार की गलती है, तो परिवार ने क्या सरकार को पोस्टमार्टम के लिए आवेदन किया? पूरे लेख में पोस्टमार्टम और ऑटोप्सी से क्या-क्या कारण ‘हो सकते थे’ की कल्पनाशीलता दिखाई गई है। पूरे लेख का आधार ही यही है कि अगर ऑटोप्सी हो जाती तो ये साबित हो जाता…

ऑल्टन्यूज ने पुलिस को झूठा बताया, वजीर के विरोधाभासी बयानों के आधे हिस्से को को सही और आधे को ‘मानसिक परेशानी’ के नाम पर गलत कह देने जैसा दिखाया, डॉक्टर आदि की बातों के ‘हो सकता है’ को ही तथ्य मान लिया। इस कारण ये पूरा लेख सरकार को निशाना बनाने के इरादे से लिखा हुआ प्रतीत होता है।

ऑल्टन्यूज की कश्मकश इस बात को ले कर भी है कि सरकार ने PIB फैक्टचेक शुरु कर के ‘पत्रकारों को निशाना’ बनाना शुरु किया है। ये बातें मूर्खतापूर्ण ही हैं कि एक सरकारी संस्था किसी फेकन्यूज (जो कि ऑल्टन्यूज के जीवन का मुख्य आधार है) फैलाने वाली मीडिया की खबरों का खंडन कर के सही जानकारी दे, तो उसे उन ‘पत्रकारों को निशाना’ बनाने की बात से कह दिया जाए जो फेकन्यूज फैला रहे थे।

ऑल्ट न्यूज़ के ‘फैक्ट चेक’ का निचोड़

पीड़ितों को कोचिंग देने की निंजा तकनीक

जुलाई 2017 में स्वघोषित पत्रकार निखिल वाग्ले ने एक ट्वीट में लिखा था कि ‘साम्प्रदायिक अजेंडे को ठेलने के लिए पीड़ितों को एक खास तरह के बयान देने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है’। वामपंथी आदमी स्वयं यह बात बोले तो पता चलता है कि हो न हो, ये लोग इस तरीके का इस्तेमाल तो करते ही होंगे। साथ ही, इनकी करतूतों से सीखते हुए कई बार खास मजहब के लोगों ने स्वयं ही पुलिस को झूठे बयान सिर्फ इसलिए दिए हैं ताकि वो चर्चा में आ जाएँ।

‘जय श्री राम’ न कहने पर पीटा, मारा, टोपी फेंक दी… ये नौटंकी तो पिछले साल जून-जुलाई महीने में खूब हुई है। पुलिस को इन पीड़ितों ने ‘जय श्री राम’ का झूठ बस इसलिए बोला क्योंकि वो चर्चा में था और खबरों में आ रहा था। उसी तरह कई घटनाएँ हैं जहाँ ‘अलग एंगल’ तलाशता पत्रकार, घटना के बीतने के बाद उनसे बात करने जाता है और उन्हें बताता है कि क्या बोलना है, कैसे बोलना है।

बुलंदशहर में जो दंगे हुए वहाँ भी इसी तरह की बातें दिखीं जहाँ हरे दरवाजे की भीतर कुछ महिलाओं को एक पत्रकार कुछ समझा रहा था, हम पास पहुँचे तो दरवाजा बंद किया गया। वहाँ खड़े लोगों ने कहा कि उन महिलाओं ने अपनी आँखों से ‘देखा’ है कि लाउडस्पीकर पर बजरंग दल के लोगों ने 2 दिसंबर की रात को इकट्ठा होने की बात कही। पूरी जानकारी आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।

गुड़गाँव के बरकत आलम का मामला याद आता है जहाँ पुलिस ने कहा कि उसने ‘टोपी’ फेंकने वाली बात और ‘जय श्री राम’ की बात मीडिया द्वारा कोचिंग देने के बाद कही हो, ऐसा प्रतीत होता है। इसी तरह, अगस्त 2019 में एक खबर आई कि बेगूसराय के एक नाबालिग दलित पीड़ित को जब कट्टरपंथियों ने मारा-पीटा, उसकी माँ पर गलत निगाह डाली तब ‘द वायर’ के एक पत्रकार ने उस नाबालिग को फोन पर निर्लज्जता से यह पूछा कि क्या उन्होंने पीटते वक्त यह कहा था कि तुम हिन्दू हो इसलिए हम मार रहे हैं?

इसी तरह शाहीन बाग मामले में कुख्यात ‘एक्टिविस्ट’ तीस्ता सेतलवाड़ ने ‘विरोध प्रदर्शन’ पर बैठी महिलाओं को कोचिंग दी कि जब सुप्रीम कोर्ट के लोग उनसे बातचीत करने आएँ तो उन्हें क्या-क्या कहना है।

टीवी पत्रकारों को ऐसा करते हुए कई बार देखा गया है जहाँ किसी खास मौके पर कैसे रोना है, किधर देखना है, कैसे नारे लगाने हैं, सब बता कर तैयार किया जाता है। ऑल्टन्यूज ने इस लेख में सात दिनों की मेहनत की है। उन्होंने वामपंथी छात्र संगठन AISA के बिहार अध्यक्ष काजिम इरफानी और दैनिक भास्कर के स्थानीय पत्रकार नूर परवेज को परिवार से बात करने भेजा। कमाल की बात यह है कि इन दोनों ही लोगों को प्रतीक सिन्हा पुलिस स्टेशन नहीं भेज पाए कि उनका भी ‘वीडियो स्टेटमेंट’ ले लिया जाता।

कुल मिला कर, यह लेख ऑल्टन्यूज के कई बेकार कारनामों की शृंखला में एक नया पन्ना भर है। ऐसे लोग तब तक नहीं रुकेंगे जब तक समाज में साम्प्रदायिकता और अराजकता पूरी तरह से व्याप्त न हो जाए। इनके नियम तय हैं कि पीड़ित अगर एक खास मजहब का है तो उसकी ट्रीटमेंट खास तरीके से होगी, उसी तरह अपराधी अगर खास मजहब का है, तो उस मामले में बचाव के सारे प्रयास किए जाएँगे।

पत्रकारिता छोड़ कर ऑल्टन्यूज को कोचिंग संस्थान चलाने के धंधे में भी आने के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि सात दिनों के परिश्रम से जब इस तरह के परिणाम मिल सकते हैं तो ये लोग न्यूज एजेंसी की तर्ज पर ‘समुदाय विशेष पीड़ित कोचिंग संस्थान’ शुरु कर सकते हैं।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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