Sunday, July 5, 2020
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पत्रकारिता की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर महिलाओं का संघर्ष कैसा: बिहार के एक छोटे से शहर की लड़की की आपबीती

महिला पत्रकार को लैंगिक भेदभाव से भी गुजरना पड़ता है। उनका ज्ञान स्तर भी इसी आधार पर आँका जाता है। ऐसा अनुभव मैंने स्वयं भी किया है और अपनी महिला पत्रकार मित्रों के मुँह से भी कई बार सुना है।

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बदलते वक्त के साथ समाज भी करवटें ले रहा है। हर क्षेत्र में बदलाव हो रहा है। बदलाव से पत्रकारिता का क्षेत्र भी अछूता नहीं है। यकीनन, मीडिया में पहले की तुलना में अब महिलाओं के लिए ज्यादा अवसर हैं। लेकिन जो चीज बदलती नहीं दिख रही वह है मीडिया हाउस की पुरुषवादी सोच। लिहाजा जगह बनाने का महिला पत्रकारों का संघर्ष भी लंबा होता है।

मैं बिहार के दरभंगा में पली-बढ़ी। यहीं से 2011 में बारहवीं की परीक्षा पास की। इसी दौरान टीवी स्क्रीन पर महिला पत्रकारों को बड़े-बड़े मुद्दों पर बेबाकी से पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी बात रखते देख मैंने भी इस क्षेत्र में अपना करियर बनाने की सोची।

राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी के बोध से भी मेरा इस पेशे की तरफ झुकाव हुआ। आज भी मेरा पक्का यकीन है कि पत्रकारिता तभी तक जीवित है जब तक उसमें अंश मात्र भी ‘देशहित’ मौजूद है। यह भाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन बाजार के बोझ तले दब जरूर गया है।

मेरे लिए अपने करियर के रूप में पत्रकारिता का चुनाव करना और फिर उस मार्ग पर चलना इतना आसान नहीं था। मेरे सामने कई चुनौतियाँ थीं। मैं बिहार के एक छोटे से शहर दरभंगा की रहने वाली हूँ और मैंने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई वहीं से किया। उन दिनों विद्याथियों को क्या करना है, कौन से क्षेत्र में करियर बनाना है, ये सब पहले से ही तय होता था। पहली से दसवीं तक स्कूल में और फिर 11-12वीं कॉलेज में। अगर बच्चे ने साइंस लिया है, तो फिर बारहवीं पास करने के बाद इंजीनियरिंग या मेडिकल करना है। यह सब पहले से ही तय होता है।

प्राय: हर घर में यही होता था और अगर घर के बड़े बच्चे ने ऐसा किया तो छोटों पर ऐसा करने का दबाव और ज्यादा हो जाता है। मेरे घर में भी यही हुआ था। हमारे बड़े भैया ने 12वीं के बाद इंजीनियरिंग की और छोटे भाई का भी यही प्लान था। ऐसे में मैंने पत्रकारिता को चुना। हालाँकि मेरे घरवालों को इससे कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन समस्या यह थी कि मेरे शहर में पत्रकारिता की पढ़ाई नहीं होती थी और मुझे घर से बाहर भेजते उनका मन नहीं मान नहीं रहा था। बेटियों को लेकर जो डर हर माँ-बाप के मन में होता था, उनके मन में भी था और शायद यह स्वाभाविक भी था।

खैर, अपने मन को मनाते हुए और मेरे मन को रखते हुए वो इसके लिए तैयार हुए और मेरा एडमिशन मुजफ्फरपुर के बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार यूनिवर्सिटी (BRABU) के लंगट सिंह कॉलेज (LS College) में हुआ। यहाँ पर घर से दूर हॉस्टल में रहकर मैंने पत्रकारिता के बैचलर की पढ़ाई की। इसके बाद मैंने हरियाणा के गुरु जंभलेश्वर यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता के मास्टर की पढ़ाई की। 

अब बारी आती है नौकरी की। मैंने दिल्ली में नौकरी की तलाश शुरू की। नौकरी तलाशने के दौरान इंटरव्यू में मुझे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कभी अनुभव न होने की दलील दी गई तो कभी छोटे शहर से पढ़ाई करने की। मैंने देखा कि कई जगहों पर योग्यता की जगह पर ब्रांड को वरीयता दी जाती है। कई मीडिया संस्थान तो विज्ञापन में भी सीधा लिख देती हैं कि उन्हें IIMC पास आउट ही चाहिए, फिर चाहे उसमें योग्यता हो या न हो। 

मैं ऐसा कतई नहीं कह रही कि IIMC में पढ़े लोगों में योग्यता नहीं होती। मेरे कहने का सीधा सा मतलब ये है कि नौकरी के लिए ब्रांड की बजाय योग्यता को तरजीह दी जाए। ये बात मैं ऐसे ही नहीं कह रही। जिस दौरान मैं नौकरी तलाश रही थी, मेरी एक दोस्त IIMC से पास आउट होकर एक बड़े और नामी मीडिया हाउस में काम कर रही थी। उसने मुझे सलाह दी कि मैं भी IIMC से एक साल का डिप्लोमा कोर्स कर लूँ तो एक अच्छी तनख्वाह के साथ नौकरी रखी हुई है। 

जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि हर जगह अनुभव की माँग की जाती थी। अनुभव तो काम करने से ही आएगा और चूँकि मैंने कहीं काम नहीं किया था तो ये भी एक मुद्दा था। मेरी दोस्त ने बताया कि IIMC से पढ़ाई करने के बाद कोई अनुभव के बारे में भी नहीं पूछा जाता। खैर, उसी दौरान मेरी बात एक और पत्रकार दोस्त से हुई, वह भी काम की तलाश में थी। वो पहले काम कर रही थी, मगर उस समय उसने काम छोड़ रखा था, जब मैंने उससे इसका कारण पूछा तो मैं अंदर से थोड़ी सी डर गई।

मैं यहाँ पर उसके बारे में ज्यादा डिटेल में तो नहीं लिख सकती हूँ, मगर उस तरफ इशारा जरूर कर सकती हूँ। उसने मुझे अपने ऑफिस के माहौल के पुरुषवादी सोच और उनकी गंदी नजरों के बारे बताया। उसने बताया कि उसे वक्त-बेवक्त बुला लिया जाता था। काम करने की कोई टाइमिंग नहीं होती थी। कंधे पर, पीठ पर हाथ रखना आम बात हो गई थी, जिससे तंग आकर उसने एक दिन बिना आगे-पीछे सोचे इस्तीफा दे दिया। 

इन बातों ने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था। मगर फिर भी मैंने नौकरी की तलाश जारी रखी। हाँ, मैं सचेत जरूर हो गई थी। फिर एक दिन एक छोटी सी कंपनी में नौकरी लगी। सैलरी कुछ खास नहीं थी, और परेशानी काफी ज्यादा। मुझे घर से ऑफिस जाने में तकरीबन 2:30 से 3:00 घंटे लग जाते थे और फिर वापस आते हुए भी उतना ही। ऑफिस जाने से पहले और आने के बाद खाना बनाने का काम अलग से। खैर, जैसे-तैसे चल रहा था। मगर मैं भी खुद को उस माहौल में फिट नहीं कर पाई, क्योंकि यहाँ पर मेरी लड़ाई, पुरुषों से नहीं, बल्कि महिलाओं से ही थी।

कुछ महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन होती हैं। कुछ महिलाएँ एक ऐसी सोच की शिकार होती हैं कि खुद एक दूसरे को आगे बढ़ने से रोकती हैं। मानसिकता ऐसी बना लेती हैं पुरुष की तरक्की देख लेंगी, लेकिन अपनी महिला साथी की तरक्की नहीं देख पाती। अगर कोई महिला बड़ी पोस्ट पर बैठ जाए तो शॉर्टकट अपनाने का लांछन लग जाता है। 

आज भी पत्रकारिता में महिलाओं का प्रतिशत भले ही बढ़ गया है, लेकिन महिला मुद्दों के प्रति संवेदना की कमी है। अधिकांश महिलाएँ पुरुष मानसिकता से भरी हुई हैं और ऐसी महिलाओं के संवेदना का स्तर अधिक जागरूक नहीं है। मेरे ख्याल से तो महिला मुद्दों को व्यक्तिगत तौर पर न लेकर सामाजिक नजरिए से देखने की जरूरत है, क्योंकि यह केवल उनका नहीं, पूरे समाज का मुद्दा है।

आज भी पत्रकारिता का क्षेत्र महिलाओं के लिए दाँव-पेंच से भरा हुआ है। हालाँकि महिला पत्रकारों ने उस वक्त को काफी पीछे छोड़ दिया है, जब उन्हें अमूमन फैशन शो या प्रदर्शनी कवर करने की जिम्मेदारी दी जाती थी। आज जब वे युद्ध, नागरिक संघर्ष, राजनीति, वित्त, खेल, विज्ञान और अन्य अनेक विषयों की रिपोर्टिंग कर रही हैं, तब भी उन्हें आम तौर पर पुरुष सहयोगियों की अपेक्षा कम वेतन मिलता है और उनके यह तय करने के अवसर कम मिलते हैं कि वह क्या करना चाहती है।

महिला पत्रकार को लैंगिक भेदभाव से भी गुजरना पड़ता है। कुछ जगहों पर आज भी उन्हें लड़का होने की दुहाई दी जाती है। उनका ज्ञान स्तर भी इसी आधार पर आँका जाता है। ऐसा अनुभव मैंने स्वयं भी किया है और अपनी महिला पत्रकार मित्रों के मुँह से भी कई बार सुना है। मीडिया में काफी सारी महिला रिपोर्टर हैं। लेकिन जब शीर्ष प्रबंधन की बात आती है, तो उसमें गिनी-चुनी ही पहुँच पाती हैं। हमें इस धारणा के खिलाफ भी लड़ना होता है कि एक महिला पत्रकार को ही महिला से जुड़े विषयों की रिपोर्टिंग करनी चाहिए- यह एक महिला का काम है। लेकिन यह एक महिला का काम नहीं, यह पत्रकारिता है।

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