Tuesday, August 9, 2022
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कभी फेक न्यूज पर स्मृति ईरानी के एक्शन से चिढ़ गए थे लिबरल, अब थरूर की अगुवाई वाली समिति कह रही- मोदी सरकार बनाए कानून

"मीडिया धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता और अखंडता (इंटिग्रिटी) खो रहा है, जहाँ मूल्यों और नैतिकता से समझौता किया जा रहा है और पेड न्यूज, फेक न्यूज़, टीआरपी मैनीपुलेशन, मीडिया ट्रायल, सनसनीखेज और पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग आदि के रूप में मीडिया द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन के उदाहरण बड़े पैमाने पर सामने आ रहे हैं।"

संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि सरकार को सभी प्रकार के मीडिया – प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल में अनियमितताओं की जाँच करने के लिए वैधानिक शक्तियों के साथ एक ‘मीडिया परिषद’ का गठन करना चाहिए। कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली समिति ने बुधवार को लोकसभा में ‘मीडिया कवरेज में नैतिक मानकों’ पर अपनी रिपोर्ट पेश की। कई बातों के अलावा, समिति ने मीडिया में फेक न्यूज़ के जरिए परेशान करने वाली प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है और सरकार से इस खतरे को रोकने के लिए कदम उठाने को कहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, समिति ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मीडिया धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता और अखंडता (इंटिग्रिटी) खो रहा है, जहाँ मूल्यों और नैतिकता से समझौता किया जा रहा है और पेड न्यूज, फेक न्यूज़, टीआरपी मैनीपुलेशन, मीडिया ट्रायल, सनसनीखेज और पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग आदि के रूप में मीडिया द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन के उदाहरण बड़े पैमाने पर सामने आ रहे हैं।

गौरतलब है कि जहाँ शशि थरूर की अगुवाई वाली समिति फर्जी खबरों पर सरकार की कार्रवाई चाहती है, वहीं उनकी अपनी पार्टी कॉन्ग्रेस ने पिछली मोदी सरकार के इसी तरह के कदम का विरोध किया था। अप्रैल 2018 में, स्मृति ईरानी की अध्यक्षता में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने फर्जी खबरों के प्रसार को रोकने के लिए दिशानिर्देश लाए थे। दिशानिर्देशों में कहा गया था कि अगर पत्रकारों को फेक न्यूज़ गढ़ते या फैलाते हुए पाया जाता है तो उनकी मान्यता स्थायी रूप से रद्द की जा सकती है।

हालाँकि, तब इन दिशानिर्देशों के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिला था। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस ने भी फेक न्यूज़ को नियंत्रित करने के कदम का विरोध किया था। उल्टा कॉन्ग्रेस नेता अहमद पटेल ने आरोप लगाया था कि ईमानदार पत्रकारों को परेशान करने के लिए इन दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल किया जाएगा, और उनकी मान्यता निलंबित करने के लिए पत्रकारों के खिलाफ प्रेरित शिकायतें दर्ज की जाएँगी।

हालाँकि, तब इन दिशानिर्देशों पर उत्पन्न भारी विवाद के कारण, इसे अगले दिन कथित तौर पर पीएमओ के निर्देश पर मंत्रालय द्वारा वापस ले लिया गया था। अब कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के नेतृत्व वाली समिति चाहती है कि मोदी सरकार इन्हीं कानूनों के विरोध करने के तीन साल बाद फिर से फेक न्यूज के खिलाफ कार्रवाई करे।

समिति ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से पेड न्यूज को चुनावी अपराध बनाने के लिए विधि आयोग की कुछ सिफारिशों को जल्द लागू करने के लिए कानून मंत्रालय से संपर्क करने को भी कहा है।

संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) और समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण (एनबीएसए) जैसे मौजूदा मीडिया नियामक निकायों की प्रभावशीलता सीमित है, और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल मीडिया और इसके अलावा जहाँ भी आवश्यक हो, अपने आदेशों को लागू करने के लिए इसे वैधानिक शक्तियों से लैस करें।

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि केबल टीवी नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 को बदलते नियामक वातावरण के अनुसार इसे बदलने के लिए संशोधित किया जाना चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि समिति ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थों और डिजिटल मीडिया आचार संहिता के लिए दिशानिर्देश) नियम, 2021 की भी प्रशंसा की, जिसे डिजिटल मीडिया के लिए पेश किया गया है। यह कहते हुए कि यह डिजिटल मीडिया कंटेंट को विनियमित करने में एक मिल का पत्थर साबित होगा। इसमें कहा गया है कि I & B मंत्रालय और IT मंत्रालय मिलकर सुसंगत तरीके से काम करेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि डिजिटल मीडिया भी नैतिकता के लिए निर्धारित कोड का पालन करे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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