भारत में अब इमरजेंसी नंबरों को लेकर बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को एक सख्त आदेश दिया है। इसके तहत अगले तीन महीने में सभी पुराने हेल्पलाइन नंबर बंद कर दिए जाएँगे।
अब आपको अलग-अलग सेवाओं के लिए अलग नंबर याद नहीं रखने होंगे। पुलिस के लिए 100, फायर ब्रिगेड के लिए 101 और एम्बुलेंस के लिए 102 या 108 नंबर बंद हो जाएँगे। इसके साथ ही नेशनल हाईवे इमरजेंसी (1033) और महिला हेल्पलाइन (1091) को भी खत्म कर दिया जाएगा। इन सभी की जगह अब पूरे देश में सिर्फ एक ही सिंगल नंबर ‘112’ काम करेगा। मुसीबत के समय आपको बस इसी एक नंबर पर कॉल करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला ‘सेवलाइफ फाउंडेशन’ की याचिका पर दिया। कोर्ट ने कहा कि हादसे के बाद तुरंत इलाज मिलना हर नागरिक का अधिकार है। यह हमारे संविधान के ‘जीने के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) के तहत आता है। देश में हर साल लाखों लोग समय पर इलाज न मिलने से जान गंवा देते हैं। संकट के समय एक-एक मिनट किसी कीमती दवा की तरह होता है।
इस बड़े फैसले को लागू करने के लिए मोदी सरकार पूरी तरह तैयार है। गृह मंत्रालय ने इसके लिए ‘इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम’ (ERSS) का मास्टरप्लान बनाया। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा सिस्टम कैसे काम करेगा और इससे आम जनता को क्या बड़े फायदे होंगे।
पुराना सिस्टम क्यों हो गया फेल और नए नंबर ‘112’ की क्यों पड़ी जरूरत?
भारत में पहले हर मुसीबत के लिए अलग-अलग नंबर होते थे। बहुत साल पहले पूरे देश में सिर्फ एक ही सरकारी टेलीकॉम कंपनी थी। उसी समय पुलिस के लिए 100 और फायर ब्रिगेड के लिए 101 जैसे नंबर बनाए गए थे। उस दौर में ये नंबर सिर्फ संपर्क करने के लिए थे। तब तुरंत मदद पहुँचाने वाला कोई आधुनिक सिस्टम नहीं था।
धीरे-धीरे समय बदला और शहरों की आबादी बढ़ गई। इसके साथ ही अपराध और सड़क हादसे भी तेजी से बढ़े। इस समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग राज्यों ने कई नए नंबर चालू कर दिए। इससे आम जनता के बीच भारी भ्रम फैल गया।
मुसीबत के समय लोग घबराहट में भूल जाते थे कि कौन सा नंबर मिलाना है। इस भ्रम और देरी के कारण कई बार मरीजों की जान तक चली जाती थी। इसी बड़ी दिक्कत को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए अब पूरे देश में सिर्फ एक नंबर ‘112’ लागू किया जा रहा है।
जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिश और सरकार का बड़ा मास्टरप्लान
इस नए इमरजेंसी सिस्टम की कहानी साल 2012 के दिल्ली निर्भया कांड से जुड़ी है। उस दर्दनाक घटना के बाद सरकार ने एक हाई-लेवल कमेटी बनाई थी। इस कमेटी के अध्यक्ष देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस वर्मा थे। कमेटी ने सरकार को एक बहुत जरूरी सलाह दी थी।
कंपनी ने कहा था कि भारत में एक ऐसा इमरजेंसी सिस्टम होना चाहिए जो केवल फोन न सुने। वह फोन आते ही तुरंत मदद के लिए गाड़ी को मौके पर रवाना भी करे।
जस्टिस वर्मा कमेटी की इसी सलाह पर सरकार के गृह मंत्रालय ने काम शुरू किया। मंत्रालय ने ‘नेशनल इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम‘ नाम का एक बड़ा प्रोजेक्ट तैयार किया। इसके लिए दूरसंचार विभाग ने ‘112’ नंबर जारी किया। यह नंबर अमेरिका के ‘911’ नंबर की तरह ही काम करता है।
इस पूरे सिस्टम को भारतीय और हाईटेक बनाने के लिए सरकार की खास संस्था सी-डैक (C-DAC) की मदद ली गई। सी-डैक ने इसके लिए एक बेहद आधुनिक सॉफ्टवेयर तैयार किया है। अब यह सॉफ्टवेयर देश के सभी राज्यों को दिया जा रहा है।
कैसे काम करेगा ‘112’ का डिजिटल चक्र? कदम-दर-कदम समझें पूरी प्रक्रिया
मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यह नया सिस्टम तैयार हो रहा है। यह पूरी तरह से एक केंद्रीयकृत यानी सेंट्रलाइज्ड सिस्टम होगा। इसके तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में एक हाईटेक कॉल सेंटर बनाया जाएगा। इस कॉल सेंटर को ‘पब्लिक सेफ्टी आंसरिंग पॉइंट’ (PSAP) नाम दिया गया है।
यह कॉल सेंटर साल के 365 दिन और 24 घंटे लगातार काम करेगा। यहाँ पर खास तौर पर ट्रेनिंग पाए हुए एक्सपर्ट एजेंट्स तैनात रहेंगे। मुसीबत में फँसा कोई भी नागरिक सिर्फ एक कॉल करके इनसे मदद पा सकेगा।
इस सिस्टम से संपर्क करने के लिए सिर्फ फोन कॉल ही एकमात्र जरिया नहीं है। नागरिक कई अन्य डिजिटल माध्यमों से भी मदद माँग सकते हैं। इसके लिए फिक्स लैंडलाइन, मोबाइल फोन, साधारण SMS और ईमेल की सुविधा मिलेगी।
इसके अलावा चैट, सरकारी बसों या गाड़ियों में लगे पैनिक बटन और इंटरनेट कॉलिंग का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार ने इसके लिए विशेष तौर पर ‘112 इंडिया’ मोबाइल ऐप भी बनाया है। आने वाले समय में इसे स्मार्ट डिवाइस (IoT) से भी जोड़ दिया जाएगा।
कॉल सेंटर में आपकी शिकायत आते ही कंप्यूटर कैसे करेगा काम?
जैसे ही आप 112 नंबर पर कॉल या मैसेज करेंगे, यह सिस्टम तुरंत काम शुरू कर देगा। आपका कॉल ऑटोमैटिक तरीके से सीधे किसी खाली कॉल एजेंट के पास पहुँच जाएगा। आधुनिक तकनीक की मदद से उस एजेंट के कंप्यूटर स्क्रीन पर आपकी जरूरी जानकारियाँ दिखने लगेंगी। स्क्रीन पर तुरंत आपका नाम और आपकी सटीक लोकेशन आ जाएगी। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि आपको अपनी लोकेशन समझाने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा।
कॉल उठाने वाला एजेंट आपकी बात सुनकर तुरंत मामले की गंभीरता को समझेगा। वह कंप्यूटर पर आपकी शिकायत की एक डिजिटल केस फाइल तैयार करेगा। इसके बाद तय नियमों के हिसाब से आपकी इमरजेंसी को अलग कैटेगरी में बांटा जाएगा। केस फाइल बनते ही यह सारी जानकारी कुछ ही सेकंड में ‘डिस्पैचर’ के पास पहुँच जाएगी। डिस्पैचर उसी कॉल सेंटर में बैठने वाला वह अधिकारी होता है जो मदद के लिए तुरंत गाड़ी रवाना करता है।
GIS मैप और डिस्पैच सिस्टम: घटनास्थल पर तुरंत पहुंचेगी एम्बुलेंस
डिस्पैचर अधिकारी के पास तीन बड़ी कंप्यूटर स्क्रीन वाला डेस्क होता है। इन स्क्रीन पर एक डिजिटल नक्शा चलता रहता है। इस तकनीक को जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS) कहते हैं। इस नक्शे पर राज्य की सभी पुलिस गाड़ियाँ, फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस दिखाई देती हैं। अधिकारी को तुरंत पता चल जाता है कि कौन सी गाड़ी इस समय कहाँ पर है। वह बिना समय गंवाए घटनास्थल के सबसे पास वाली गाड़ी को तुरंत मौके पर रवाना कर देता है।
इसके साथ ही घटना की पूरी जानकारी स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी डिजिटल तरीके से भेज दी जाती है। इससे पुलिस वहाँ की कानून व्यवस्था को तुरंत संभाल लेती है। मदद के लिए भेजी गई गाड़ी मौके पर पहुँचकर कार्रवाई शुरू करती है। गाड़ी में एक खास डिवाइस लगी होती है, जिसे मोबाइल डेटा टर्मिनल (MDT) कहते हैं। इस डिवाइस के जरिए मौके की सारी रिपोर्ट सीधे मुख्य कॉल सेंटर को मिलती रहती है। जब पुलिस स्टेशन को पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट मिल जाती है, तभी सिस्टम में उस केस को बंद किया जाता है।
केंद्रीय बजट में सरकार की बड़ी घोषणा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
मोदी सरकार ने सड़क हादसों में होने वाली मौतों को रोकने के लिए बजट में एक बहुत बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने देश के सभी जिला अस्पतालों में इमरजेंसी और ट्रॉमा केयर की क्षमता को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की घोषणा की है। इसके तहत अब देश के हर बड़े जिला अस्पताल में आधुनिक सुविधाओं से लैस ‘इमरजेंसी एंड ट्रॉमा केयर सेंटर’ बनाए जा रहे हैं।
सरकार का सबसे ज्यादा ध्यान डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को विशेष इमरजेंसी ट्रेनिंग देने पर है। इस नए मेडिकल सिस्टम को सीधे ‘नेशनल ट्रॉमा रजिस्ट्री’ से जोड़ा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जब भी एम्बुलेंस किसी घायल मरीज को लेकर अस्पताल के लिए निकलेगी, तो ‘112’ सिस्टम के जरिए अस्पताल को मरीज की हालत की पूरी जानकारी पहले ही मिल जाएगी। इससे डॉक्टर मरीज के आने से पहले ही जरूरी वेंटिलेटर या ऑपरेशन थिएटर तैयार रख सकेंगे और इलाज में एक सेकंड की भी देरी नहीं होगी।
एम्बुलेंस के लिए कड़े नियम: GPS ट्रैकिंग और राष्ट्रीय कोड अनिवार्य
अभी देश में चल रही कई सरकारी और प्राइवेट एम्बुलेंस में लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी जीवन रक्षक उपकरणों की बहुत कमी है। इस बड़ी कमी को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत सख्त नियम बनाया है। अब देश की हर एक रजिस्टर्ड एम्बुलेंस को राष्ट्रीय एम्बुलेंस कोड ‘AIS-125’ के नियमों का पालन करना ही होगा। इस कोड के तहत एम्बुलेंस गाड़ी का डिजाइन और उसमें जरूरी मेडिकल मशीनों का होना तय किया जाता है।
इसके साथ ही अदालत ने सभी सरकारी और प्राइवेट एम्बुलेंस में जीपीएस (GPS) और गाड़ी ट्रैक करने वाली डिवाइस (VLTD) लगाना अनिवार्य कर दिया है। इन सभी एम्बुलेंस गाड़ियों को सीधे ‘112’ के केंद्रीय नेटवर्क से लाइव जोड़ा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को आदेश दिया है कि वे हर महीने इन एम्बुलेंस की जाँच करें। इस जाँच में देखा जाएगा कि एम्बुलेंस कितनी देर में पहुँचती है, गाड़ी की हालत कैसी है और कितने मरीजों की जान बचाई गई। राज्यों को इसकी पूरी रिपोर्ट हर महीने केंद्र सरकार को सौंपनी होगी।
‘PM-RAHAT’ योजना से मुफ्त इलाज: पैसे की कमी से नहीं जाएगी किसी की जान
अक्सर सड़क हादसों के बाद गरीब मरीजों को बहुत परेशानी होती है। उन्हें प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के लिए भटकना पड़ता है। इसी बड़ी दिक्कत को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार अपनी ‘PM-RAHAT’ योजना को सीधे ‘112’ इमरजेंसी सिस्टम से जोड़ने जा रही है। इस योजना का सबसे बड़ा मकसद दुर्घटना के शिकार लोगों को तुरंत राहत देना है। हादसे के बाद के पहले एक घंटे को ‘गोल्डन आवर’ कहा जाता है। इस दौरान मरीज को पूरी तरह कैशलेस यानी बिल्कुल मुफ्त इलाज दिया जाएगा।
इस नए सिस्टम के लागू होने से अस्पताल अपनी मनमानी नहीं कर सकेंगे। यदि कोई घायल मरीज अस्पताल पहुँचता है, तो डॉक्टर तुरंत उसका इलाज शुरू करेंगे। अस्पताल प्रशासन शुरुआत में पैसों की माँग करके इलाज में देरी नहीं कर सकता है। पुलिस वेरिफिकेशन का काम भी डिजिटल तरीके से कंप्यूटर पर अपने आप पीछे चलता रहेगा। केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि कुछ राज्यों ने अभी तक इस योजना को चालू नहीं किया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सभी राज्यों को आठ हफ्ते का समय देते हुए इसे अनिवार्य रूप से लागू करने का आखिरी अल्टीमेटम दिया है।
‘नेक इंसानों’ (Good Samaritans) के लिए नया कानून और शिकायत निवारण तंत्र
भारत की सड़कों पर अक्सर लोग हादसों के समय पीड़ितों की मदद नहीं करते हैं। वे पुलिस की पूछताछ और कोर्ट-कचहरी के चक्करों से डरते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनता के इस डर को ‘रिएक्टिव पैरालिसिस’ यानी डर की वजह से पैदा हुई लाचारी कहा है। वैसे कानूनन मददगारों की सुरक्षा के लिए मोटर व्हीकल एक्ट में धारा 134A पहले से मौजूद है। इसके बावजूद जमीन पर लोगों का डर कम नहीं हो रहा था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के इस डर को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला किया है। कोर्ट ने सभी राज्यों को एक बड़ा और नया निर्देश जारी किया है। इसके तहत अगले तीन महीने के भीतर जिला और राज्य स्तर पर एक विशेष शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) बनाई जाएगी। इसके लिए हर जगह विशेष नोडल अधिकारियों की तैनाती होगी।
अगर कोई भी पुलिसकर्मी या अस्पताल का कर्मचारी घायल की जान बचाने वाले किसी मददगार को परेशान करेगा, तो उसकी खैर नहीं होगी। गवाही देने के लिए दबाव बनाने या पैसों की माँग करने पर उस कर्मचारी के खिलाफ तुरंत कड़ा एक्शन लिया जाएगा।
बहुभाषी प्रचार और फीडबैक सिस्टम: आम जनता तक पहुँचाई जाएगी जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि इस पूरे ऐतिहासिक बदलाव की जानकारी देश के हर एक नागरिक तक पहुँचनी चाहिए। इसके लिए सरकार को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर मास-मीडिया कैंपेन (विज्ञापनों) की शुरुआत करनी होगी। TV, रेडियो, अखबारों और Social Media के जरिए लोगों को बताया जाएगा कि अब मुसीबत में सिर्फ 112 डायल करना है।
इस सिस्टम को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए एक विशेष Feedback मैकेनिज्म भी तैयार किया गया है। आपातकालीन सेवा का लाभ लेने के बाद कॉल सेंटर के एजेंट या कंप्यूटर सिस्टम के जरिए यूजर से फीडबैक (राय) लिया जाएगा। अगर किसी गाड़ी को पहुँचने में देरी हुई या सेवा अच्छी नहीं थी, तो उस फीडबैक के आधार पर पूरे सिस्टम को सुधारा जाएगा। अदालत अब से चार महीने बाद इस पूरे मामले पर राज्यों की अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा करेगी।


