Monday, July 15, 2024
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गुजरात में जमीन से गायब कॉन्ग्रेस, AAP की जमीन का पता नहीं: क्या मोदी के रहते जो नहीं हुआ, वह इस बार कर दिखाएगी BJP

जैसे भारतीय राजनीति में मोदी के उभार के बाद हर चुनाव से पहले आयोग, ईवीएम, वीवीपैट को लेकर कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का रोना शुरू हो जाता है, वैसे ही गुजरात में विधानसभा चुनाव आते ही KHAM की चर्चा शुरू हो जाती है। पूछा जा रहा है कि क्या बीजेपी इस बार खाम वाले नंबर से आगे निकलेगी?

182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा चुनाव (Gujarat Assembly Election 2022) का आधिकारिक बिगुल गुरुवार (3 नवंबर 2022) को बज गया। चुनाव आयोग ने राज्य में दो चरणों में 1 और 5 दिसंबर को मतदान की घोषणा की है। नतीजे हिमाचल प्रदेश के साथ 8 दिसंबर को आएँगे।

चुनावी तारीखों के ऐलान से कुछ घंटे पहले ही कॉन्ग्रेस का वह विलाप शुरू हो गया जो वह 2014 के बाद से हर चुनावों से पहले करती रही है। उसने एक एक ट्वीट में तंज कसते हुए कहा है, “भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संस्थान है। ये निष्पक्ष चुनाव कराता है।” साथ ही गाँधी जी के तीन बंदर (बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो) वाली इमोजी भी लगाई है।

जैसे भारतीय राजनीति में मोदी के उभार के बाद हर चुनाव से पहले आयोग, ईवीएम, वीवीपैट को लेकर कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का रोना शुरू हो जाता है, वैसे ही गुजरात में विधानसभा चुनाव आते ही KHAM की चर्चा शुरू हो जाती है। खाम ने कॉन्ग्रेस को जिस नंबर तक 1985 में पहुँचाया था, उस नंबर तक नरेंद्र मोदी के रहते हुए भी गुजरात में बीजेपी कभी पहुँच नहीं पाई। लेकिन इस बार माना जा रहा है कि बीजेपी उस इतिहास को दोहरा सकती है।

बीजेपी की इन उम्मीदों के पीछे के कारण को समझने से पहले कॉन्ग्रेस के विलाप पर लौटते हैं। 2014 के बाद कुछेक अपवादों को छोड़ दे तो कॉन्ग्रेस और चुनावी पराजय एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। गुजरात में तो खैर इसका इतिहास और भी पुराना है। इसलिए हर चुनाव से पहले चुनाव आयोग और ईवीएम पर सवाल उठाने की कॉन्ग्रेस ने परिपाटी बना ली है। ताकि नतीजों के बाद वह अपनी पराजय को लोकतंत्र की पराजय के तौर पर प्रस्तुत कर सके। संवैधानिक संस्थाओं पर मोदी के काबिज होने की जीत बता सके। जबकि यही कॉन्ग्रेस सत्ता में रहते हुए चुनाव आयोग जैसी संस्था पर नवीन चावला जैसे मुख्य निर्वाचन आयुक्त थोप चुकी है।

चुनाव भले 5 साल पर आते हैं, लेकिन बीजेपी वह पार्टी है जो एक चुनाव जीतते ही दूसरे की तैयारी में लग जाती है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक चुनावी जीत जश्न मनाने को नहीं ठहरते। वे दूसरे चुनावी मोर्चे पर मुस्तैद हो जाते हैं। इसके ठीक उलट अन्य दल तब सक्रिय होते हैं जब अपना अस्तित्व बचाने के लिए चुनाव लड़ना उनकी मजबूरी हो जाती है। यही कारण है कि वे चुनाव आयोग या ईवीएम के बीजेपी का पिट्ठू होने का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश करते हैं ताकि उनकी कमजोरियों पर चर्चा नहीं हो। यह भी उल्लेखनीय है कि यदि किसी चुनाव में बीजेपी विरोधी दलों को सफलता मिल जाती है तो नतीजे आते ही वे चुनाव आयोग से लेकर ईवीएम तक पर चुप्पी साध जाते हैं। लेकिन यदि नतीजे बीजेपी के पक्ष में आते हैं तो उनका विलाप और तेज हो जाता है।

गुजरात में गायब कॉन्ग्रेस

गुजरात में कॉन्ग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। 2017 के विधानसभा चुनावों में वह बीजेपी को टक्कर देने में भी कामयाब रही थी। लेकिन इस बार वह जमीन से गायब है। पिछले चुनावों में उसकी उम्मीदें तीन लोगों (हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी) के बीजेपी विरोध पर टिकी थी। इनमें से दो पटेल और ठाकोर अब बीजेपी के साथ हैं। कॉन्ग्रेस प्रभारी अशोक गहलोत चुनावी रणनीति बनाने की जगह राजस्थान में अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुए हैं। चुनावी गतिविधियों से पार्टी के बड़े नेता अब तक दूर हैं।

AAP का खाता खुलेगा?

वैसे चुनाव से पहले हवा-हवाई दावे करना आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए नई बात नहीं है। गुजरात को लेकर भी वह ऐसा ही उत्साह दिखा रही है। सूरत नगर निगम के चुनावों में कॉन्ग्रेस को पीछे छोड़ने का हवाला दे वह खुद को बीजेपी के मुकाबिल भी बता रही है। उसने उम्मीद पाल रखी है कि दिल्ली की तरह बीजेपी विरोधी वोट गुजरात में उसके पास एकमुश्त आएँगे और वह कॉन्ग्रेस से विपक्षी दल का दर्जा छीनने में कामयाब रहेगी।

लेकिन ऑपइंडिया गुजराती के संपादक सिद्धार्थ छाया के अनुसार इन चुनावों में AAP की भूमिका वोटकटवा से अधिक की नहीं दिखती। पूरे राज्य में उसका सांगठनिक विस्तार नहीं होने के कारण वह कॉन्ग्रेस के परंपरागत वोटरों को आकर्षित करने में विफल रही है। साथ ही गुजरात के उसे अपने प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया के हिंदू विरोधी बयान भी भारी पड़ रहे हैं। हालाँकि छाया का मानना है कि आप को बीजेपी विरोधी वोटों में से कुछ हिस्सा मिल सकता है, लेकिन यह सीटों में शायद ही बदले।

क्या है KHAM

KHAM थ्योरी और इंदिरा गाँधी की हत्या से पैदा सहानुभूति के सहारे कॉन्ग्रेस ने 1985 के गुजरात विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 55.55 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। उसे 149 सीटें मिली थी। खाम का मतलब वह जातीय समीकरण है जो क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिमों को मिलाकर बनता है। सरदार पटेल के बाद गुजरात के सबसे लोकप्रिय नेता होने के बावजूद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी बीजेपी कभी इस नंबर तक नहीं पहुँच सकी।

बीजेपी का मिशन 150

सिद्धार्थ छाया के अनुसार सवाल यह नहीं है कि गुजरात का चुनाव कौन जीतेगा। वे कहते हैं, “बीजेपी की जीत तय है। कॉन्ग्रेस का दूसरे नंबर पर रहना भी तय है। सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस को आप कितना नुकसान पहुँचाएगी। इससे ही यह तय होगा कि क्या बीजेपी इस बार सीटों का रिकॉर्ड बना पाएगी।” वे कहते हैं, “अब तक गुजरात में सीधा मुकाबला बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच होता रहा है। लेकिन इस बार जमीन से कॉन्ग्रेस के गायब रहने और आप की अति सक्रियता की वजह से बीजेपी सीटों का रिकॉर्ड बना सकती है। यह इससे तय होगा कि आप और ओवैसी बीजेपी विरोधी वोटों में कितनी सेंधमारी करने में कामयाब रहते हैं।”

हालिया सर्वे भी इस बार सत्ता विरोधी वोटों में बँटवारे का इशारा कर रहे हैं। अक्टूबर की शुरुआत में ABP-CVoter ने एक सर्वे किया था। इस सर्वे की माने तो आप को 2 से अधिक सीट नहीं मिलेगी, लेकिन वह कॉन्ग्रेस के वोट शेयर में सेंध लगा सकती है। टाइम्स नाउ नवभारत-ईटीजी के ओपिनियन पोल में बीजेपी को 48 फीसदी तक वोट मिलने का अनुमान लगाया गया है। इसी तरह लोकनीति-CSDS के सर्वे में शामिल दो तिहाई लोगों ने गुजरात सरकार के कामकाज को लेकर संतुष्टि जताई है। 2017 के मुकाबले यह 11 फीसदी अधिक है। यही कारण है कि बीजेपी ने इस बार अपने लिए ‘मिशन 150’ का लक्ष्य तय किया है।

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अजीत झा
अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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