पिछले 10 सालों में उत्तर प्रदेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों की तस्वीर बदल चुकी है और यह बदलाव सबसे साफ बजट के आँकड़ों में दिखाई देता है। एक ओर 2026-27 का बजट है, जिसे योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपने कार्यकाल का 10वाँ बजट बताते हुए नए उत्तर प्रदेश की दिशा में अगला कदम बताया है, तो दूसरी ओर ठीक एक दशक पहले का वह दौर है जब अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल का आखिरी बजट पेश किया था।
एक दशक पहले का बजट घोषणाओं, योजनाओं और राजनीतिक संदेशों से भरा हुआ था। उस समय सरकार अपने विकास मॉडल को एक्सप्रेस-वे, लैपटॉप वितरण और ग्रामीण परियोजनाओं के जरिए पेश कर रही थी। आज योगी सरकार का 10वाँ बजट कानून व्यवस्था, शिक्षा-रोजगार, महिलाओं, निवेश और राजकोषीय अनुशासन जैसे मुद्दों को केंद्र में रखता दिखता है। फर्क साफ है- तब सुर्खियाँ बनाने पर ज्यादा जोर था, आज व्यवस्था को स्थायी ढाँचे में ढालने की बात की जा रही है।
इसी अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि बजट केवल आँकड़ों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि सरकार की नीयत, नीति और नजरिए का आईना होता है। अब यह जानना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव के अंतिम बजट और योगी सरकार के 10वें बजट में प्राथमिकताओं, खर्च की दिशा और परिणामों के स्तर पर कितना अंतर दिखाई देता है और क्या वाकई उत्तर प्रदेश की आर्थिक सोच ने एक नया मोड़ लिया है।
10 साल में बजट का आकार: ₹3.46 लाख करोड़ से ₹9 लाख करोड़ तक का सफर
साल 2016-17 में जब अखिलेश यादव की सरकार ने अपना अंतिम बजट पेश किया था, तब उसकी कुल राशि लगभग ₹3,46,935 करोड़ थी। उस समय इसे प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा बजट बताया गया और सरकार ने इसे विकास की रफ्तार से जोड़कर पेश किया। लेकिन आँकड़ों के पीछे देखें तो उस बजट का बड़ा हिस्सा राजस्व व्यय और योजनागत घोषणाओं में केंद्रित था। यानी खर्च ज्यादा था, पर भविष्य में निवेश की रफ्तार सीमित दिखाई दी। बजट बड़ा जरूर था, पर प्रदेश की आर्थिक ताकत उसी पुराने दायरे में घूमती दिखती थी।
अब साल 2026-27 में तस्वीर बदल चुकी है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने लगभग ₹9.13 लाख करोड़ का बजट पेश किया है, जो 10 साल पहले के मुकाबले लगभग ढाई गुना है। यह बढ़ोतरी सिर्फ महँगाई या सामान्य विस्तार की वजह से नहीं बताई जा रही, बल्कि इसे सड़कों, एक्सप्रेस-वे, औद्योगिक कॉरिडोर, ऊर्जा और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से जोड़ा जा रहा है।
यानी अब जोर सिर्फ बजट को ‘सबसे बड़ा’ बताने पर नहीं, बल्कि उसे आर्थिक मजबूती और निवेश से जोड़ने पर है। यही फर्क बताता है कि एक दौर में आँकड़ों की चमक ज्यादा थी, जबकि आज सररकार उन आँकड़ों को ठोस ढाँचे में बदलना जानती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल: ग्रामीण सड़कों से अब मेगा कैपिटल निवेश
अगर उत्तर प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को 2016-17 और 2026-27 के बजट के आईने में देखें, तो तस्वीर साफ तौर पर बदलती हुई नजर आती है। 2016-17 में अखिलेश यादव सरकार में लोक निर्माण विभाग (PWD) को सड़कों और पुलों के लिए ₹14,721 करोड़ आवंटित किए गए थे।
ग्रामीण सड़क संपर्क के लिए ₹1,923 करोड़, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत ₹1,111 करोड़, ग्रामीण पुलों के लिए ₹1,180 करोड़ का प्रावधान था। उस समय बिजनौर-मेरठ 4-लेन रोड और गंगा ब्रिज जैसे प्रोजेक्ट्स प्रमुख रहे। फोकस मुख्य रूप से ग्रामीण कनेक्टिविटी और पारंपरिक सड़क निर्माण पर था।
इसके मुकाबले 2026-27 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने केवल लोक निर्माण विभाग को ₹34,468 करोड़ का प्रावधान दिया है, जबकि सड़क और पुलों पर कुल कैपिटल आउटले ₹38,343 करोड़ रखा गया है। यह 2016-17 की तुलना में करीब 2.3 गुना वृद्धि दिखाता है।
चार नए एक्सप्रेसवे- गंगा एक्सप्रेसवे, विंध्य एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड-रीवा लिंक एक्सप्रेसवे और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे एक्सटेंशन के लिए ₹1,050 करोड़ का प्रावधान किया गया है। ब्रिज मेंटेनेंस पर ₹3,000 करोड़ और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क मरम्मत योजना के तहत ₹200 करोड़ अलग से रखे गए हैं। साथ ही ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए ₹36 लाख करोड़ के MoU निवेश का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ा आकर्षण है।
अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो 2016-17 में लखनऊ मेट्रो की शुरुआत, बुलेट ट्रेन की योजना, 40,000 सोलर स्ट्रीट लाइट्स और ग्रामीण टैंक-नहरों के निर्माण जैसे प्रोजेक्ट्स थे। वहीं 2026-27 में लखनऊ मेट्रो एक्सटेंशन के लिए ₹50 करोड़, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर अपडेट, शहरी विकास के लिए ₹25,400 करोड़ (जिसमें स्मार्ट सिटी के लिए ₹400 करोड़ और ग्रीन रोड के लिए ₹800 करोड़ शामिल हैं) का बड़ा प्रावधान किया गया है।
सबसे अहम बात यह है कि 2026-27 में कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर ₹2.52 लाख करोड़ रखा गया है, जो सीधे इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास से जुड़ा है और कुल बजट का लगभग 22% विकास कार्यों पर खर्च करने का संकेत देता है। साफ है कि जहाँ पहले ग्रामीण सड़कों तक बात सीमित थी, अब एक्सप्रेसवे और बड़े निवेश मॉडल पर जोर है।
स्वास्थ्य सेक्टर में बड़ा बदलाव
अगर स्वास्थ्य सेक्टर की तुलना करें तो 2016-17 में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को करीब ₹8,500 करोड़ का प्रावधान था, जो उस समय के कुल बजट का लगभग 2.5% बैठता था। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के लिए ₹100 करोड़ रखे गए थे ताकि दूरदराज इलाकों तक इलाज पहुँचे।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए NRHM के तहत ₹3,000 करोड़ से अधिक का प्रावधान था। जिला अस्पतालों की मरम्मत और नए उपकरणों के लिए ₹500 करोड़ दिए गए। शिशु मृत्यु दर कम करने के विशेष अभियान पर ₹200 करोड़ और कुपोषण मुक्त यूपी के लिए पोषण योजना में ₹300 करोड़ रखे गए। उस समय राज्य में 36 मेडिकल कॉलेजों का उल्लेख था, यानी मेडिकल शिक्षा का ढांचा अभी सीमित था।
इसके मुकाबले 2026-27 में स्वास्थ्य विभाग को रिकॉर्ड ₹37,956 करोड़ आवंटित हुए, जो लगभग 4.5 गुना वृद्धि दिखाते हैं और कुल बजट का करीब 6% हिस्सा बनाते हैं। अब जोर सिर्फ बेसिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर मेडिकल शिक्षा और विशेष इलाज पर है। 14 नए मेडिकल कॉलेजों के लिए ₹1,023 करोड़ का प्रावधान किया गया है। लखनऊ कैंसर संस्थान के लिए ₹315 करोड़ और असाध्य रोगों के मुफ्त इलाज के लिए ₹130 करोड़ रखे गए हैं।
इसी के साथ ग्रामीण स्वास्थ्य के तहत NRHM का बजट बढ़ाकर ₹8,641 करोड़ कर दिया गया है। आयुष्मान भारत और मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान है, जिससे 49.22 लाख परिवारों को लाभ मिलने की बात कही गई है। मेडिकल शिक्षा में बड़ा उछाल दिखता है- MBBS सीटें 4,540 से बढ़कर 12,800 और PG सीटें 1,221 से बढ़कर 4,995 हो गई हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या 36 से बढ़कर 81 तक पहुँच चुकी है, जिनमें 45 सरकारी हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं के परिणामों में भी बदलाव का दिखे हैं। संस्थागत प्रसव 34.74 लाख से बढ़कर 41 लाख हो गए हैं, यानी लगभग 18% की वृद्धि हुई है। 75 जिलों में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जा रहा है और डिजीज सर्विलांस पोर्टल के जरिए बीमारियों की डिजिटल निगरानी की व्यवस्था की गई है।
साफ तौर पर देखा जाए तो 2016-17 में प्राथमिक स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी ढाँचे पर जोर था, जबकि 2026-27 में मेडिकल कॉलेजों का तेजी से विस्तार, गंभीर बीमारियों के इलाज पर निवेश, मुफ्त स्वास्थ्य योजनाओं का विस्तार और डिजिटल हेल्थ सिस्टम पर ज्यादा फोकस दिखाई देता है। मेडिकल कॉलेज दोगुने से अधिक हो गए हैं और सीटें लगभग तिगुनी।
शिक्षा में डिजिटल छलाँग और रोजगार में निवेश का बड़ा दाँव
अगर शिक्षा सेक्टर की बात करें तो 2016-17 में शिक्षा विभाग को लगभग ₹28,000 करोड़ मिले थे, जो करीब 8% के आसपास बैठता था। इसमें बेसिक शिक्षा पर ₹12,000 करोड़ से ज्यादा खर्च का प्रावधान था। नए स्कूल भवन बनाने और शिक्षक भर्ती पर जोर दिया गया। माध्यमिक शिक्षा के लिए ₹5,000 करोड़ रखे गए थे। कस्तूरबा गाँधी विद्यालय की 100 नई इकाइयों का प्रावधान इसी में शामिल था। उच्च शिक्षा के लिए ₹2,500 करोड़ दिए गए और 15 लाख छात्रों को लैपटॉप वितरण के साथ डिजिटल क्लासरूम की योजना चलाई गई।
मुख्यमंत्री मेधावी विद्यार्थी योजना के लिए ₹300 करोड़ और 25 लाख छात्रों को स्कॉलरशिप देने का लक्ष्य रखा गया। संस्कृत पाठशालाओं के विकास के लिए ₹100 करोड़ दिए गए। उस समय फोकस ज्यादा स्कूल भवन, छात्रवृत्ति और लैपटॉप जैसी योजनाओं पर था।
अब 2026-27 के बजट में शिक्षा को रिकॉर्ड 12.4% हिस्सा मिला है, जो करीब ₹1.13 लाख करोड़ बैठता है। यह 2016-17 के मुकाबले लगभग चार गुना ज्यादा है। 57 नए मुख्यमंत्री मॉडल कम्पोजिट विद्यालय बनाए जा रहे हैं। हर विद्यालय के निर्माण पर ₹25 करोड़ और उपकरणों पर ₹5 करोड़ का प्रावधान है।
बेसिक शिक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹2,000 करोड़ रखे गए हैं। समग्र शिक्षा अभियान पर ₹666 करोड़ और राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भवनों के लिए ₹479 करोड़ दिए गए हैं। गाँवों में डिजिटल पुस्तकालय खोलने के लिए ₹454 करोड़ का प्रावधान है। पीएम श्री योजना के लिए ₹300 करोड़ और पॉलिटेक्निक में स्मार्ट क्लास के लिए ₹10 करोड़ रखे गए हैं।
उच्च शिक्षा में प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान के लिए ₹600 करोड़ दिए गए हैं। छात्राओं के लिए स्कूटी योजना चलाई जा रही है। सैनिक स्कूल गोरखपुर और लखनऊ के लिए ₹25 करोड़ प्रत्येक का प्रावधान है। संस्कृत छात्रवृत्ति के लिए ₹20 करोड़ रखे गए हैं। साथ ही MBBS और PG सीटें बढ़ाने पर भी जोर है।
रोजगार की बात करें तो 2016-17 में मनरेगा के तहत ₹4,500 करोड़ का प्रावधान था। स्किल ट्रेनिंग और लैपटॉप योजनाओं के जरिए 5 लाख युवाओं को नौकरी देने का लक्ष्य रखा गया। MSME सेक्टर के लिए ₹1,000 करोड़ की लोन गारंटी की व्यवस्था थी।
2026-27 में टेक युवा समर्थ युवा योजना के तहत 10 लाख नौकरियाँ देने की बात कही गई है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के ₹36 लाख करोड़ के MoU निवेश से 20 लाख रोजगार सृजन का लक्ष्य है। स्टार्टअप फंड के लिए ₹1,000 करोड़ और कौशल विकास पर ₹2,500 करोड़ रखे गए हैं, जिससे 1 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने की योजना है। आईटी पार्क और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब पर भी जोर है। बेरोजगारी भत्ता जैसी योजनाओं का भी जिक्र है।
तुलना साफ है। 2016-17 में शिक्षा और रोजगार का फोकस बुनियादी ढाँचे और सीमित स्तर की योजनाओं तक था। 2026-27 में शिक्षा का हिस्सा 8% से बढ़कर 12.4% हो गया है और बजट चार गुना तक बढ़ा है। रोजगार में 5 लाख से बढ़कर 30 लाख से ज्यादा संभावित नौकरियों दी जा रही हैं। अब जोर बड़े निवेश, डिजिटल शिक्षा और टेक्नोलॉजी आधारित रोजगार पर साफ दिखता है।
कृषि क्षेत्र मे मदद से मॉडल बदलाव तक
अखिलेश यादव सरकार के 2016-17 बजट में कृषि एवं कृषि विपणन विभाग को लगभग ₹12,500 करोड़ दिए गए थे, जो करीब 3.6% हिस्सा था। उस समय जोर पारंपरिक मदद और सीधी सब्सिडी पर ज्यादा था। किसान दुर्घटना बीमा योजना के लिए ₹100 करोड़ रखे गए थे। सिंचाई पंप सेट पर सब्सिडी के लिए ₹1,200 करोड़ और बीज व खाद पर ₹800 करोड़ का प्रावधान था। रबी और खरीफ फसलों की MSP खरीद के लिए ₹2,500 करोड़ दिए गए थे ताकि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके।
ग्रामीण गौशालाओं के लिए ₹200 करोड़ और मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के लिए ₹150 करोड़ रखे गए थे। फल और सब्जी क्लस्टर विकसित करने के लिए ₹300 करोड़ का प्रावधान था। ODOP जैसी शुरुआती पहलों का भी जिक्र था। करीब 2.5 करोड़ किसानों को लाभ देने का लक्ष्य रखा गया था। कुल मिलाकर फोकस राहत, सब्सिडी और बुनियादी समर्थन पर था।
अब 2026-27 में तस्वीर काफी बदली हुई दिखती है। कृषि को करीब 11% हिस्सा मिला है, जो लगभग ₹1 लाख करोड़ बैठता है। यह 2016-17 की तुलना में लगभग आठ गुना ज्यादा है। अब बात सिर्फ सब्सिडी की नहीं बल्कि खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाने की हो रही है।
पीएम किसान सम्मान निधि के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान है, जिससे 2.5 करोड़ किसानों को लाभ मिलने की बात कही गई है। मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना पर ₹5,000 करोड़ रखे गए हैं, जिसका लक्ष्य 1 करोड़ किसानों को कवर करना है। फसल विविधीकरण और बागवानी के लिए ₹3,200 करोड़ दिए गए हैं। ड्रोन दीदी योजना के तहत ₹500 करोड़ का प्रावधान है और 10,000 ड्रोन उपलब्ध कराने की योजना है। 50 जिलों में जैविक खेती क्लस्टर विकसित करने के लिए ₹1,000 करोड़ रखे गए हैं।
कोल्ड चेन और गोदाम निर्माण के लिए ₹2,500 करोड़ का प्रावधान है। MSP खरीद के लिए ₹10,000 करोड़ रखे गए हैं, जिससे गेहूं और धान के करीब 50 लाख किसानों को फायदा मिलने की बात कही गई है। पशुपालन के लिए ₹4,000 करोड़ दिए गए हैं और दूध उत्पादन 5 करोड़ लीटर प्रतिदिन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। मत्स्य पालन के लिए ₹800 करोड़ का प्रावधान है। साथ ही ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए ₹10 लाख करोड़ के कृषि निवेश का जिक्र है।
तुलना साफ है। 2016-17 में कृषि का जोर सब्सिडी, सिंचाई और MSP समर्थन तक सीमित था और बजट का हिस्सा 3.6% था। 2026-27 में हिस्सा बढ़कर 11% हो गया है और फोकस विविधीकरण, ड्रोन और टेक्नोलॉजी, कोल्ड चेन और बड़े निवेश पर है। लक्ष्य किसान की औसत आय को ₹1 लाख सालाना से बढ़ाकर ₹2.5 लाख तक ले जाने का रखा गया है।
पर्यटन में सीमित विकास से धार्मिक और वैश्विक ब्रांडिंग तक का सफर
अखिलेश यादव सरकार के 2016-17 बजट में पर्यटन विभाग को लगभग ₹800 से ₹1,000 करोड़ के बीच आवंटन मिला था, जो करीब 0.3% के आसपास बैठता था। उस समय पर्यटन में फोकस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के विकास तक सीमित था। इन स्थलों के विकास के लिए ₹307 करोड़ का प्रावधान किया गया था।
लखनऊ आगरा एक्सप्रेसवे का निर्माण भले ही कुल ₹4,003 करोड़ का था, लेकिन इसे पर्यटन से भी जोड़ा गया क्योंकि इससे आगरा और आसपास के पर्यटन स्थलों तक पहुँच आसान हुई। कुंभ मेला और संगम क्षेत्र के विकास पर भी ध्यान था। इलाहाबाद में एलिवेटेड रोड के लिए ₹250 करोड़ का प्रावधान किया गया था।
लखनऊ मेट्रो के लिए ₹814 करोड़ और कानपुर व वाराणसी मेट्रो के लिए ₹50-50 करोड़ दिए गए थे, जिससे पर्यटकों की आवाजाही बेहतर हो सके। ODOP जैसी शुरुआती ब्रांडिंग योजनाओं का जिक्र भी इसी समय हुआ। उस दौर में राज्य में सालाना करीब 23 करोड़ पर्यटक आने का आँकड़ा बताया जाता था।
अब 2026-27 में पर्यटन को ₹3,500 करोड़ का प्रावधान मिला है, जो लगभग 0.4% हिस्सा है और 2016-17 के मुकाबले करीब 3.5 गुना ज्यादा है। सबसे बड़ा फोकस अयोध्या और राम मंदिर विकास पर है, जिसके लिए ₹1,500 करोड़ रखे गए हैं।
प्रयागराज में कुंभ और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹800 करोड़ का प्रावधान है। इको टूरिज्म, हेरिटेज आर्क और एडवेंचर जैसी 5 नई पर्यटन नीतियाँ लागू की गई हैं। हेलिकॉप्टर टूर और क्रूज पर्यटन के लिए ₹200 करोड़ रखे गए हैं। ODOP 2.0 के तहत 75 जिलों में ब्रांडिंग के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए ₹5 लाख करोड़ के पर्यटन निवेश का जिक्र किया गया है।
पर्यटकों की संख्या में भी बड़ा अंतर दिखाया जा रहा है। जहाँ 2017 के आसपास यह आँकड़ा करीब 23 करोड़ था, वहीं अब 137 करोड़ पर्यटकों के आने का दावा है, यानी लगभग छह गुना वृद्धि।
तुलना साफ है। 2016-17 में पर्यटन का फोकस बुनियादी विकास और सीमित धार्मिक स्थलों तक था और बजट हिस्सा करीब 0.3% था। 2026-27 में हिस्सा बढ़कर 0.4% हुआ है, लेकिन रणनीति बदल गई है। अब राम मंदिर, कुंभ, ब्रांडिंग, हेलिटूरिज्म और बड़े निवेश के जरिए पर्यटन को सीधे आर्थिक इंजन बनाने की कोशिश दिखाई देती है, जिसमें राजस्व को दस गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
महिलाओं के लिए सहायता से व्यापक सशक्तिकरण तक का बदलाव
अखिलेश यादव सरकार के 2016-17 बजट में महिला कल्याण और युवतियों के लिए करीब ₹2,000 करोड़ का प्रावधान था, जो लगभग 0.6% हिस्सा बैठता था। योजनाएँ थीं, लेकिन दायरा सीमित था और लाभार्थियों की संख्या भी कम थी।
कन्या विवाह सहायता योजना के लिए ₹200 करोड़ रखे गए थे। प्रति बालिका ₹30,000 से ₹51,000 तक की मदद का प्रावधान था, खासकर अंतर्जातीय विवाह में। पोषण और कुपोषण मुक्त यूपी के लिए ₹300 करोड़ दिए गए, जिसमें आंगनबाड़ी सेवाएँ शामिल थीं।
लड़कियों की शिक्षा के लिए कस्तूरबा गांधी विद्यालय की 100 नई इकाइयों का प्रावधान था, जो माध्यमिक शिक्षा के करीब ₹500 करोड़ के हिस्से में शामिल था। उच्च शिक्षा के ₹2,500 करोड़ में 15 लाख छात्राओं को लैपटॉप वितरण भी शामिल था।
ग्रामीण महिला सशक्तिकरण के तहत स्वयं सहायता समूहों के लिए ₹400 करोड़ रखे गए। सुरक्षा के लिए मिशन शक्ति जैसी शुरुआती पहल का जिक्र था। कुल मिलाकर लगभग 10 लाख लड़कियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने का लक्ष्य था।
अब 2026-27 में तस्वीर काफी विस्तृत दिखती है। महिलाओं और युवतियों के लिए ₹15,000 करोड़ से ज्यादा का प्रावधान है, जो करीब 1.6% हिस्सा है और पहले के मुकाबले लगभग 2.7 गुना वृद्धि दर्शाता है।
मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के लिए ₹700 करोड़ रखे गए हैं। इसमें प्रति बालिका ₹15,000 छह चरणों में देने का प्रावधान है और करीब 25 लाख लाभार्थियों को कवर करने का लक्ष्य है। मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के लिए ₹550 करोड़ का प्रावधान है, जिसमें सभी वर्गों के लिए प्रति विवाह ₹1 लाख सहायता दी जा रही है। एससी, एसटी और सामान्य वर्ग की निर्धन पुत्रियों के विवाह अनुदान के लिए ₹150 करोड़ रखे गए हैं, जिसमें ₹51,000 से ₹61,000 तक की सहायता है।
पिछड़े वर्ग की बेटियों के विवाह अनुदान के लिए ₹200 करोड़ अलग से हैं। आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त मानदेय के लिए ₹971 करोड़ दिए गए हैं। सुपोषण योजना के लिए ₹100 करोड़ रखे गए हैं। श्रमजीवी महिला छात्रावास 7 शहरों में बनाने के लिए ₹170 करोड़ का प्रावधान है।
छात्रवृत्ति योजनाओं में भी बड़ा विस्तार दिखता है। एससी छात्रवृत्ति के लिए ₹968 करोड़, सामान्य वर्ग के लिए ₹900 करोड़, अल्पसंख्यक के लिए ₹365 करोड़ और पिछड़े वर्ग के लिए ₹2,825 करोड़ का प्रावधान है। बेरोजगार युवतियों के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग पर ₹35 करोड़ और उच्च शिक्षा की छात्राओं के लिए ‘मुफ्त स्कूटी’ योजना भी शामिल है। मिशन शक्ति का विस्तार किया गया है, जिसमें सुरक्षा ऐप और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। अब 1 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
तुलना साफ है। 2016-17 में फोकस विवाह सहायता, शिक्षा और बेसिक सशक्तिकरण तक सीमित था और हिस्सा करीब 0.6% था। 2026-27 में हिस्सा बढ़कर 1.6% हो गया है और योजनाओं का दायरा भी काफी बढ़ गया है। लाभार्थियों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 1 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है, जिससे महिला सशक्तिकरण को ज्यादा प्राथमिकता मिलती दिख रही है।
सीमित योजनाओं से ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के विजन तक का सफर
आखिर में अगर इस पूरी तुलना को देखें तो फर्क सिर्फ आँकड़ों का नहीं, सोच और पैमाने का भी दिखाई देता है। अखिलेश सरकार के साल 2016-17 में बजट का फोकस सीमित दायरे में योजनाओं और सब्सिडी तक ज्यादा केंद्रित था, जबकि योगी सरकार के साल 2026-27 के बजट में लगभग हर बड़े क्षेत्र में कई गुना बढ़ा हुआ प्रावधान, भारी पूंजीगत व्यय और आने वाले कल को देखते हुए आर्थिक ढाँचे पर जोर साफ नजर आता है।
योगी सरकार ने ₹2.52 लाख करोड़ का कैपिटल एक्सपेंडिचर रखकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब फोकस सिर्फ खर्च पर नहीं, बल्कि स्थायी संपत्तियाँ खड़ी करने पर है। ₹36 लाख करोड़ के निवेश MoU, एक्सप्रेसवे नेटवर्क, मेडिकल कॉलेजों की संख्या 36 से बढ़ाकर 81 तक पहुँचाना, शिक्षा का हिस्सा 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.4 प्रतिशत करना और स्वास्थ्य बजट को ₹8,500 करोड़ से बढ़ाकर ₹37,956 करोड़ तक ले जाना जैसे आँकड़े सीधे तौर पर पैमाने में आए बदलाव को दिखाते हैं।
तुलना का निष्कर्ष यही है कि अखिलेश सरकार का मॉडल सीमित विस्तार और सब्सिडी आधारित समर्थन पर ज्यादा टिका था, जबकि योगी सरकार का मौजूदा बजट बड़े निवेश, तेज आर्थिक वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और व्यापक सामाजिक कवरेज के जरिए उत्तर प्रदेश को बड़े आर्थिक ढाँचे में स्थापित करने की कोशिश करता दिखता है। आखिर में बजट केवल कागज पर लिखे आँकड़े नहीं होते, बल्कि यह तय करते हैं कि प्रदेश किस दिशा में आगे बढ़ेगा।


