अमेरिका ने 10 जनवरी 1962 को वियतनाम में चलाया था ऐसा सैन्य अभियान, जिसमें उसने पूरी ताकत लगा दी और सारी दुनिया में उस ताकत की नुमाइश भी की, लेकिन उस लड़ाई में अमेरिका को मिली हार। ऐसी हार, जिसका असर आज तक दिखता है। अमेरिका ने इस लड़ाई को जीतने के लिए जो सबसे बड़ा अभियान चलाया था, उसने वियतनाम को ऐसे घाव दिए जिसके जख्म आज तक दिखते हैं। ये ऑपरेशन था ‘रैंच हैंड’।
यूँ तो ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’ का उद्देश्य था जंगलों को उजाड़ना, ताकि वो वियत कॉन्ग और उत्तरी वियतनामी बलों पर हावी हो सके, लेकिन इसमें न सिर्फ उसे करारी हार का मुँह देखना पड़ा, बल्कि उसने वियतनाम की जल, जंगल, जमीन… सबकुछ तबाह करके रख दिया।
क्या था ऑपरेशन रैंच हैंड?
अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि घने जंगल और फसलें वियत कॉन्ग (कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाकों ) की सबसे बड़ी ताकत हैं। इसलिए ‘एरिया-डिनायल’ के नाम पर पेड़-पौधों को खत्म कर दिया जाए।
1962 में शुरू हुआ ऑपरेशन ‘रैंच हैंड’ 1971 तक चला। इसको काफी बड़े पैमाने पर किया गया था, जिसमें दक्षिणी वियतनाम के बड़े हिस्से, मैंग्रोव वन, नदियों के किनारे और कृषि भूमि निशाने पर रहे।
🌐🇺🇲The Legacy of Agent Orange: The Toxic Footprint of the Vietnam War.
— 🌐geopolitics in the picture (@geogeolite) January 6, 2026
🇻🇳During the Vietnam War from 1961 to 1971, the US Army conducted massive herbicide spraying as part of Operation Ranch Hand to expose enemy jungle hideouts and destroy their food supplies.
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एजेंट ऑरेंज सबसे तेज असर दिखाने वाला रसायन था, इसलिए उसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा हुआ। समस्या यह भी थी कि T- 2,4,5 के निर्माण में डाइऑक्सिन मिला, जो काफी ज्यादा मात्रा मिला था, जो दीर्घजीवी और जैव-श्रृंखला में जमा होने वाला जहर है। तत्काल प्रभाव जंगलों के पत्ते झड़ना था, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव इंसानों और पर्यावरण पर पड़े, जिनकी कीमत कई पीढ़ियों ने चुकाई।
रसायनकि हथियारों ने वियतनाम की पीढ़ियाँ कर दी बर्बाद
अमेरिकी वायुसेना के C-123 विमानों से 1962 से 1971 के बीच वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के हिस्सों में लगभग 1.9 करोड़ गैलन शाकनाशी रसायनों का छिड़काव किया गया। इनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ एजेंट ऑरेंज, जो 2,4-D और 2,4,5-T का मिश्रण था और इसी के साथ आया घातक डाइऑक्सिन (TCDD)।
जंगल नष्ट हुए, खेत उजड़े, लेकिन दुश्मन नहीं रुका। बल्कि इसके विपरीत इस अभियान ने दशकों तक चलने वाली मानवीय और पर्यावरणीय त्रासदी को जन्म दिया। जन्मजात विकृतियाँ, कैंसर, त्वचा रोग, मानसिक-शारीरिक अपंगता, इन सबका असर वियतनामी नागरिकों और अमेरिकी सैनिकों ने झेला।
समय बीतने के साथ 2021 जब दुनिया ने काबुल में अमेरिकी दूतावास से हेलिकॉप्टरों द्वारा निकालने की तस्वीरें देखीं, तो 1975 के साइगोन पतन की याद ताजा हो गई। तकनीक, ताकत और दावे, सब धरे रह गए।
ऑपरेशन रैंच हैंड अमेरिका की उसी कहानी का अध्याय है, जहाँ सैन्य प्रयोग ने नैतिकता, राजनीति और मानवता, तीनों मोर्चों पर अमेरिका को निचोड़ कर रख दिया था।
पर्यावरण पर क्या पड़ा प्रभाव?
रैंच हैंड ने वियतनाम की प्रकृति और जीवों को गहरी चोट पहुँचाई। लाखों एकड़ जंगल और खेती योग्य जमीन बंजर हो गई। तटीय इलाकों के मैंग्रोव वन, जो तूफानों से रक्षा करते थे, बड़े पैमाने पर नष्ट हो गए। मिट्टी से पोषक तत्व खत्म हो गए, जैव-विविधता घटी और कई क्षेत्रों में आज भी खेती कठिन है।
डाइऑक्सिन मिट्टी और तलछट (नदी के अंदर) दशकों तक बना रहता है। यह पानी और भोजन के जरिये इंसानी शरीर में पहुँचता है, खासकर पशुओं के माध्यम से। नतीजा ये रहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी जहर खत्म नहीं हुआ।
वियतनाम और अमेरिकी सैनिक के स्वास्थ्य पर प्रभाव
वियतनामी आँकलनों के मुताबिक लाखों लोग एजेंट ऑरेंज के संपर्क में आए और लाखों आज भी इसके स्वास्थ्य प्रभाव झेल रहे हैं। जन्मजात विकृतियाँ, अतिरिक्त उँगलियाँ, स्पाइना बिफिडा, कैंसर, हृदय दोष, विकासात्मक विकार आदि ये सब देखने को मिले। रेड क्रॉस और अन्य अध्ययनों ने गंभीर मामलों की संख्या बहुत बड़ी बताई।
वहीं 26 से 38 लाख अमेरिकी सैनिकों के संपर्क में आने का अनुमान है। वियतनाम में तैनात रहे सैनिकों में कई प्रकार के कैंसर, पार्किंसन, इस्केमिक हृदय रोग जैसे जोखिम बढ़े पाए गए।
अमेरिका में वेटरन्स अफेयर्स विभाग ने कई बीमारियों को एजेंट ऑरेंज से जोड़कर इलाज और लाभ मान्य किए, लेकिन सैनिकों के बच्चों में जन्मजात विकारों के मामले में मान्यता सीमित रही, जिससे पीड़ित परिवारों में असंतुष्ट रहा।
डाइऑक्सिन का रहा पीढ़ियों तक असर
डाइऑक्सिन ऐसा जहरीला रसायन है जो चर्बी में घुल जाता है और शरीर में 11 से 15 सालों तक बना रह सकता है, पर्यावरण में यह 100 साल से भी ज्यादा टिक सकता है।
यह DNA की अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, यानी बिना DNA को नुकसान पहुँचाए भी अगली पीढ़ियों में इसका असर दिख सकता है। यही कारण है कि युद्ध के दशकों बाद भी नवजात शिशुओं में विकृतियाँ दिखीं। स्तन-दूध और रक्त में डाइऑक्सिन के निशान मिले। यह केवल एक समय की दुर्घटना नहीं, बल्कि पीढ़ीगत त्रासदी बन गई।
अमेरिका की जिम्मेदारी
युद्ध के बाद अमेरिका ने लंबे समय तक जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखी। 1970 के दशक के अंत में सैनिकों ने कंपनियों पर मुकदमे किए। 1984 में रसायन बनाने वाली कंपनियों ने समझौता किया पर मुआवज़ा सीमित रहा और अपनी गलती को स्वीकार नहीं किया गया।
राजनयिक रिश्ते 1995 में बहाल हुए। 2006 के बाद एजेंट ऑरेंज पर औपचारिक सहयोग शुरू हुआ। अमेरिका ने सफाई और विकलांग सहायता के लिए धन दिया लेकिन यह नुकसान की तुलना में कम था।
वियतनाम में कई हॉटस्पॉट जैसे दा नांग और बिएन होआ एयरबेस आज भी चुनौती हैं। दा नांग में बड़ा प्रोजेक्ट पूरा हुआ पर बिएन होआ में लंबी सफाई अभी भी जारी है।
इस बीच विदेशी सहायता में कटौती की आशंकाओं ने चिंता बढ़ाई, क्योंकि आधा-अधूरा काम जहर को और फैलने का मौका देता है।
साइगोन का पतन और अमेरिका की बदनामी
30 अप्रैल 1975 को साइगोन का पतन हुआ और वियतनाम युद्ध खत्म हो गया। अमेरिकी दूतावास की छत से हेलीकॉप्टरों की मदद से लोगों को निकालने की तस्वीरें पूरी दुनिया में छा गईं। यह अमेरिका की सैन्य और नैतिक हार का प्रतीक बन गया।
ऑपरेशन रैंच हैंड अपने घोषित लक्ष्य में पूरी तरह विफल रहा। जंगल तो उजड़ गए, लेकिन वियत कॉन्ग नहीं रुका। ऑपरेशन रैंच हैंड उस युद्ध का प्रतीक बन गया जहाँ लक्ष्य पाने की कोशिश में नैतिकता को भूला दिया गया और अंतरराष्ट्रीय आलोचना, घरेलू विरोध और नैतिक पतन का शिकार हो गया।
ऑपरेशन रैंच हैंड ने दिखाया कि रासायनिक युद्ध केवल तत्काल रणनीति नहीं, बल्कि लंबे समय तक असर डालने वाला अपराध है। जंगल उखड़ गए लेकिन विरोध नहीं खत्म हुआ। बल्कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को हुआ और उसकी नैतिकता पर सवाल उठने लगे।
आज वियतनाम और अमेरिका के संबंध बेहतर हैं। पर्यटन बढ़ा, रणनीतिक साझेदारी बनी। लेकिन जमीन के नीचे दबा जहर आज भी मौजूद है। पीड़ित परिवार न्याय, इलाज और साफ-सफाई की माँग आज भी कर रहा हैं।


