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अम्मी ने कबूला इस्लाम, मैंने कलमा भी नहीं पढ़ा… कोर्ट ने नहीं मानी दलील, कहा- तुम्हें मुस्लिम ही रहना होगा: 30 साल की महिला को नहीं छोड़ने दिया मजहब

इस्लामी मुल्क मलेशिया के हाईकोर्ट ने 30 साल की एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने इस्लाम छोड़ने की इजाजत देने का आग्रह किया था। महिला का कहना है कि जब वह दो साल की थी तो उसकी माँ ने इस्लाम कबूल किया था। उसने बताया कि उसने कलमा भी नहीं पढ़ा है।

इस्लामी देश मलेशिया की एक अदालत ने एक बार फिर एक महिला को जबरन इस्लाम बने रखने से संबंधित फैसला सुनाया है। दरअसल, महिला ने हाईकोर्ट में इस्लाम छोड़ने की याचिका दाखिल की थी। याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि महिला को इस्लाम धर्म का पालन करना होगा। इससे पहले भी मलेशिया की कोर्ट ने इस तरह के फैसले सुनाए थे।

दरअसल, मलेशिया की मूलनिवासी महिला ने इस्लाम छोड़कर अपनी जनजाति जीवनशैली में लौटने से संबंधित कुआंटान उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी। जकुन जनजाति से ताल्लुक रखने वाली महिला ने दावा किया कि जब वह केवल दो साल की थी तो उसकी माँ ने उसका धर्म परिवर्तन करा दिया था।

न्यायमूर्ति ज़ैनल आज़मान अब अज़ीज़ ने कहा कि महिला का अंतिम उद्देश्य इस्लाम को त्यागना था। यह एक ऐसा मामला है, जिस पर विचार करना सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा, “मुकदमे का विषय शरिया अदालत के विशेष क्षेत्राधिकार में आता है।”

अदालत ने सुनवाई के दौरान पेश किए गए सबूतों के आधार पर माना कि महिला का पालन-पोषण उसकी धर्मांतरित माँ ने इस्लामी जीवनशैली के अनुसार किया था। ज़ैनल ने पहांग इस्लामी फैमिली लॉ का भी हवाला दिया, जिसमें यह प्रावधान है कि बच्चे उस माता-पिता का धर्म अपनाएँगे, जिनके पास उनकी देखरेख का जिम्मा है।

न्यायाधीश ने कहा कि महिला का पालन-पोषण उसकी माँ ने किया था, इसलिए वह अपनी माँ के धर्म के अधीन है। माता-पिता, दोनों की सहमति इस मामले की परिस्थितियों के लिए प्रासंगिक नहीं थी। उन्होंने कहा कि इस मामले को एम इंदिरा गाँधी से जुड़े मामले में संघीय अदालत के फैसले से अलग किया जाना चाहिए, जिनके बच्चों का उनके पति द्वारा एकतरफा धर्म परिवर्तन किया गया था।

न्यायाधीश जैनल ने कहा, “इंदिरा के मामले में उन्होंने और उनके पूर्व पति ने नागरिक कानून के तहत अपनी शादी पंजीकृत की, लेकिन उन्होंने तीन बच्चों को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया। ऐसे मामलों में जहाँ माता-पिता में से कोई एक मुस्लिम नहीं हो, सहमति की आवश्यकता है। लेकिन इस मामले में वादी (महिला) को उसकी माँ ने अकेले ही पाला था।”

अब महिला अब 30 साल की हो गई है। उन्होंने दावा किया कि जब उनकी माँ ने उनका धर्म परिवर्तन कराया था, तब उन्होंने ‘कलमा’ नहीं पढ़ा था, क्योंकि वह बच्ची थी। महिला ने ये भी कहा कि जब वह दो साल की थी, तभी उनकी माँ ने इस्लाम अपनाकर एक मुस्लिम युवक से निकाह कर लिया था।

दरअसल, 4 नवंबर 1995 को वादी की माँ ने इस्लाम अपना लिया और पहांग धार्मिक और मलय सीमा शुल्क परिषद द्वारा उन्हें इस्लामी धर्मांतरण का प्रमाण पत्र दिया गया था। हालाँकि, न्यायालय ने उनकी बात नहीं सुनीं और इस्लाम छोड़कर अपने जनजातीय धर्म में लौटने से संबंधित याचिका खारिज कर दी।

इसी तरह कुछ समय पहले मलेशिया की अदालत ने क्रिश्चियन से मुस्लिम बने एक शख्स को वापस अपने मूल धर्म में जाने पर रोक लगा दी थी। मलेशिया की हाईकोर्ट ने इस्लाम त्यागने के शख्स के आवेदन को खारिज कर दिया। ऐसा ही एक और मामला अगस्त में भी आया था।

दरअसल, 45 वर्षीय व्यक्ति ने साल 2010 में एक मुस्लिम महिला से शादी की थी। महिला से शादी करने के लिए उसने इस्लाम अपनाया था। निकाह के पाँच साल बाद ही यानी 2015 में दोनों का तलाक हो गया। इसके बाद 2016 में उस शख्स ने इस्लाम छोड़ने के लिए शरिया अदालत में एक आवेदन दायर किया, जिसकी इजाजत कोर्ट ने नहीं दी।

उससे पहले इस साल अगस्त में आया था, जब अपने शौहर से तलाक के बाद एक महिला अपने मूल धर्म ईसाई में जाने के लिए आवेदन किया तो उसे खारिज कर दिया गया। महिला ने साल 1995 में इस्लाम अपना कर एक मुस्लिम शख्स से निकाह किया था। इसके बाद साल 2013 में दोनों का सहमति से तलाक हो गया।

महिला ने सिविल हाईकोर्ट से छह आदेशों की माँग की थी, जिसमें यह घोषणा भी शामिल थी कि वह ईसाई धर्म को मानने वाली व्यक्ति है और राज्य के इस्लामी कानून उस पर लागू नहीं होते हैं। देश की शरिया अदालत ने भी उसकी माँग को खारिज कर दिया था। इसके बाद महिला ने सिविल हाईकोर्ट से शरिया अदालत के फैसले को रद्द करने की माँग की थी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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