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TTI मैनुअल में हिंदुओं के धर्मांतरण में स्थानीय नेताओं को पटाने की ट्रेनिंग, इसी के जरिए मिशनरी बनाते हैं समाज में पैठ: जानें ऑपइंडिया की पड़ताल में क्या मिला

TTI के मैनुअल में लिखा है कि मिशनरियों को 'जातियों से जुड़े जटिल मुद्दों' को ध्यान में रखना चाहिए और 'हर जाति से नेताओं को चुनना ज्यादा प्रभावी' हो सकता है, क्योंकि वे अपनी ही जाति के लोगों को 'मसीह की ओर लाने में ज्यादा ताकतवर साबित' होते हैं।

द टिमोथी इनिशिएटिव (TTI) अवैध तरीके से भारत में लाए गए फंड के जरिए मिशनरी गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोपों के बाद जाँच के घेरे में है। यह खुद को एक ‘ग्लोबल चर्च प्लांटिंग ऑर्गेनाइजेशन’ बताता रहा है। संगठन खुले तौर पर कहता है कि उसका मकसद दुनिया भर में चर्चों की संख्या बढ़ाना है और इस लक्ष्य में भारत उसकी प्राथमिकता में शामिल है।

TTI ने कई ऐसी किताबें और मैनुअल तैयार किए हैं जिनमें चर्च प्लांटर्स को सिखाया जाता है कि हिंदुओं और अन्य समुदायों तक कैसे पहुँचना है, गाँवों में बिना विरोध के कैसे घुसना है और कैसे लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करना है। OpIndia को TTI की ऐसी 10 किताबें और मैनुअल मिले हैं जो पूरे नेटवर्क और उसकी कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हैं।

इस सीरीज की पिछली रिपोर्ट में बताया गया था कि Book 10 में मिशनरियों को हिंदू गाँवों में प्रवेश करने, शक से बचने, सीधे प्रचार के बजाय ‘सॉफ्ट तरीकों’ का इस्तेमाल करने और गाँवों को ‘बुरी आत्माओं’ या ‘हिंदू देवी-देवताओं की निगरानी’ वाला क्षेत्र बताकर वहाँ जाने से पहले ‘सुरक्षा की प्रार्थना’ करने तक की ट्रेनिंग दी जाती है।

रिसर्च के दौरान एक ऐसी रणनीति भी सामने आई जिसमें TTI चर्च प्लांटर्स को अलग-अलग जातियों के नेताओं का इस्तेमाल कर लोगों को ईसाई धर्म की ओर लाने की सलाह देता है। Book 1 में, जहाँ TTI ने अपने ‘कोर वैल्यूज’ लिखे हैं, वहाँ वह कहता है कि उसका उद्देश्य हर व्यक्ति तक पहुँचना है, जिसमें छोटी-बड़ी जातियाँ, जनजातियाँ, शहर, दूरदराज गाँव, अमीर और गरीब सभी शामिल हैं।

ऊपरी तौर पर यह सामान्य बात लग सकती है, लेकिन जब इसे Book 10 में दी गई रणनीतियों के साथ पढ़ा जाता है, तो साफ होता है कि TTI जाति को सिर्फ सामाजिक वास्तविकता के रूप में नहीं देखता, बल्कि हिंदुओं के बीच धर्मांतरण को आसान बनाने के एक व्यावहारिक माध्यम की तरह इस्तेमाल करता है।

मैनुअल में लिखा है कि मिशनरियों को ‘जातियों से जुड़े जटिल मुद्दों’ को ध्यान में रखना चाहिए और ‘हर जाति से नेताओं को चुनना ज्यादा प्रभावी’ हो सकता है, क्योंकि वे अपनी ही जाति के लोगों को ‘मसीह की ओर लाने में ज्यादा ताकतवर साबित’ होते हैं।

यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यहाँ जाति को किसी सामाजिक समस्या या अन्याय के रूप में नहीं दिखाया गया। इसे सीधे तौर पर मिशनरी काम को अधिक प्रभावी बनाने के साधन के रूप में पेश किया गया है।

मिशनरी रणनीति में जाति को कैसे शामिल करता है TTI

Book 10 के ‘World Religions & Cults’ नाम के अध्याय में हिंदू धर्म पर अलग से चर्चा की गई है। इसमें पहले हिंदुओं की मान्यताओं का अपना विश्लेषण दिया गया है और फिर कर्म तथा पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं को चुनौती देने के तरीके बताए गए हैं। इसके बाद मैनुअल सीधे फील्ड लेवल रणनीति पर पहुँच जाता है।

इसमें कहा गया है कि मिशनरियों को हिंदू गाँवों को ‘आध्यात्मिक रूप से विरोधी’ क्षेत्र मानकर चलना चाहिए। गाँवों में प्रवेश करने से पहले प्रार्थना करनी चाहिए, ऐसे तरीकों से बचना चाहिए जिनसे लोगों को शक हो और सीधे प्रचार की जगह नरम तरीके अपनाने चाहिए।

इन्हीं निर्देशों के बीच जाति को लेकर भी एक अहम बात कही गई है। मैनुअल में साफ लिखा है, “जातियों से जुड़े जटिल मुद्दों को ध्यान में रखें। कई बार हर जाति से नेताओं को चुनना ज्यादा प्रभावी होता है क्योंकि वे अपनी ही जाति के लोगों को मसीह की ओर लाने में अधिक सक्षम होते हैं।”

(साभार: TTI)

यहाँ कोई धार्मिक चर्चा नहीं है। यह सीधा ऑपरेशनल निर्देश है। यानी TTI चर्च प्लांटर्स को बता रहा है कि अगर स्थानीय जाति आधारित नेताओं को माध्यम बनाया जाए, तो धर्मांतरण का काम ज्यादा आसान हो सकता है। सरल शब्दों में कहें तो अगर ऐसे प्रभावशाली लोगों का धर्मांतरण हो जाए, तो वे अपनी जाति के बाकी लोगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

सामाजिक मुद्दा नहीं, धर्मांतरण का माध्यम बन गई जाति

इस मॉडल को अपनाने वाले मिशनरियों के लिए जाति अब सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि धर्मांतरण का साधन बन जाती है। आम तौर पर जाति पर चर्चा समानता, सम्मान, अधिकार और सामाजिक न्याय के संदर्भ में होती है, लेकिन TTI का मैनुअल इन पहलुओं पर बात ही नहीं करता।

मैनुअल का फोकस सिर्फ ‘प्रभावशीलता’ पर है। यहाँ चिंता जातिगत अन्याय की नहीं, बल्कि धर्मांतरण को ज्यादा सफल बनाने की दिखाई देती है। हिंदू समाज की सामाजिक संरचना को समझने के बाद यह देखा जा रहा है कि किसके जरिए किस तक पहुँचा जा सकता है और कौन किसे ज्यादा आसानी से प्रभावित कर सकता है।

मैनुअल में जाति आधारित नेता को समाज सुधारक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है जो ‘स्थानीय लोगों को मसीह तक पहुँचाने में ज्यादा ताकतवर’ हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो TTI का यह मॉडल जातीय पहचान और सामाजिक भरोसे को मिशनरी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने की बात करता है।

भारतीय संदर्भ में यह मामला क्यों महत्वपूर्ण?

भारत में जाति सिर्फ एक सामाजिक श्रेणी नहीं है। यह स्थानीय पहचान, भरोसे और सामाजिक व्यवहार से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में अगर कोई संगठन जाति को खत्म करने या सुधारने के बजाय उसे धार्मिक प्रभाव के लिए इस्तेमाल करने की रणनीति बनाए, तो मामला सिर्फ सामान्य प्रचार तक सीमित नहीं रह जाता।

TTI की भाषा से साफ संकेत मिलता है कि उसका उद्देश्य जाति चेतना को खत्म करना नहीं, बल्कि उसी का इस्तेमाल कर धर्मांतरण को आसान बनाना है। संगठन यह नहीं कहता कि मिशनरियों को जाति से ऊपर उठना चाहिए। वह कहता है कि जाति आधारित स्थानीय नेतृत्व का उपयोग करना ज्यादा असरदार होता है।

यह रणनीति स्थानीय विरोध को कम करने के लिए भी बनाई गई लगती है। कई जगहों पर गाँवों या समुदायों के प्रभावशाली लोग धर्मांतरण का विरोध करते हैं। लेकिन अगर वही लोग ईसाई धर्म अपना लें, तो वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल बाकी समुदाय को प्रभावित करने में कर सकते हैं।

यही वजह है कि इस मुद्दे को सामान्य प्रचार गतिविधि कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मैनुअल साफ दिखाता है कि हिंदू समाज की सामाजिक संरचना के भीतर रहते हुए किस तरह विरोध कम करने और धर्मांतरण की संभावना बढ़ाने की रणनीति बनाई गई है।

सामान्य प्रचार से जाति आधारित टारगेटिंग तक

TTI की पूरी कार्यप्रणाली में एक बड़ा पैटर्न दिखाई देता है, जो सामान्य प्रचार से अलग है। संगठन ने मिशनरी काम करने के तरीके को बदल दिया है। शुरुआत में जाति को सिर्फ उन समुदायों के रूप में दिखाया जाता है जिन तक पहुँचना है, लेकिन फील्ड लेवल पर वही जाति धर्मांतरण का व्यावहारिक माध्यम बन जाती है।

इससे यह संकेत मिलता है कि TTI सिर्फ हिंदू समाज को समझ नहीं रहा, बल्कि उसकी सामाजिक संरचनाओं का रणनीतिक इस्तेमाल भी कर रहा है। लंबे समय तक मिशनरियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाति को सामाजिक समस्या के रूप में पेश किया जाता रहा है, लेकिन इस नए मॉडल में वही जाति धर्मांतरण को आसान बनाने का जरिया बनती दिखाई देती है।

कई मामलों में यह भी देखा गया है कि धर्मांतरण के बाद भी लोग अपनी जातिगत पहचान नहीं छोड़ते। ईसाई बनने के बाद भी कुछ समूहों ने जाति आधारित आरक्षण और सुविधाओं की माँग जारी रखी है।

ऐसी संभावना जताई जा रही है कि TTI जैसे संगठन उन प्रयासों के पीछे हो सकते हैं जो धर्मांतरण के बाद भी पूर्व SC/ST समुदायों को जाति आधारित लाभ दिलाने के लिए कानून बनाने की माँग कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो धर्मांतरण की प्रक्रिया और आसान हो सकती है।

(आने वाली रिपोर्टों में OpIndia भारत में TTI की मौजूदगी और दूसरे चर्च समूहों से उसके संबंधों की पड़ताल करेगा। इस सीरीज के पहले हिस्से को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें और दूसरे हिस्से की रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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