विधु विनोद चोपड़ा ने कश्मीरी पंडितों का दर्द दिखाने के नाम पर 'शिकारा' बनाई। लेकिन, फिल्म में मुस्लिमों के अत्याचार को छिपा लिया और प्रेम-कहानी पर जोर दिया। इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को अब गदहा बता वे झूठे आँकड़े गिना रहे हैं।
53 साल के शहबाज खान पर 19 साल की किशोरी के आरोप लगाने के बाद, अपमान करने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल और महिला के शील भंग करने के लिए अपमानसूचक शब्द या इशारा करने (IPC की धारा 354,और 509) जैसे आपराधिक धाराओं में मामला दर्ज हुआ है।
जिस शांति का किरदार दिखाया गया, वो सरला भट्ट का है। सरला नर्स थीं और फिल्म में शांति को भी नर्स दिखाया गया है। मगर इसमें ये नहीं दिखाया कि कैसे आतंंकवादियों द्वारा सरला का सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर बढ़ई की आरी से उसके शरीर को तीन हिस्सों में चीर कर सरे बाजार घुमाया गया।
सोचिए इस पर, वरना प्रेम कहानी के चुम्मे में वन्धामा की 23 लाशों की विद्रूपता छुपा दी जाएगी। शिकारे पर बैठी नायिका की काली जुल्फों में सिगरेट से पूरे शरीर को जलाने के बाद, सर्वानंद कौल और उनके पुत्र की आँखें निकाल लेने की इस्लामी कलाकृति गायब कर दी जाएगी।
चोपड़ा ही बताएँगे कि कश्मीर के गुनाहों और गुनहगारों से ऐसा परदा क्यों किया? न तो कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा कहीं भी है, न ही नरसंहार का ख़ौफ़नाक मंजर... लगता है ‘कश्मीर की कली’ पार्ट 2 बनाना चाह रहे थे।
शिकारा फिल्म रिलीज होने के पहले ही दिन यह विवादों के घेरे में आ गई है। इस फिल्म टैग लाइन बदले जाने से लेकर इसमें कश्मीरी पंडितों की त्रासदी के नाम पर कश्मीरी पंडितों की भावनाओं का मजाक बनाने जैसे कारणों से बवाल खड़ा हो गया है।
दाऊद इब्राहिम और अनिल कपूर के तस्वीर को लेकर जब सोनम से सवाल किया गया तो उन्होंने हैरान करने वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा कि दाऊद और उनके पिता के बीच धर्म या कर्म का नहीं, बल्कि क्रिकेट का रिश्ता था।
"हम ऐसी फिल्म बनाना चाहते थे जहॉं आप देखें कि हमारे साथ क्या हुआ और उसके बावजूद हम अपने जीवन में उम्मीद के सहारे खड़े रहे। हम भिखारी नहीं हैं। हमने सरकार के सामने अपने हाथ नहीं फैलाए बल्कि हम अपने पैरों पर खड़े रहे। यह छोटी नहीं, बल्कि बड़ी बात है।"
नसीर ने कहा कि 'आज के भारत' में उन्हें हर पल मुस्लिम होने का अहसास कराया जा रहा है। इस इंटरव्यू में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कहा कि जो कभी स्कूल नहीं गया, वो शिक्षा को लेकर कैसे कुछ समझेगा? बकौल नसीर, वो डरे हुए नहीं हैं बल्कि क्रोधित हैं।
राजदान ने सज़ा-ए-मौत का विरोध करते हुए लिखा कि फाँसी की सज़ा को हल्के में नहीं लेना चाहिए। उन्होंने अफजल गुरु को 'बलि का बकरा' बनाए जाने का आरोप लगाते हुए इस मामले में उच्च-स्तरीय जाँच की माँग की। उन्होंने आतंकी अफ़ज़ल के निर्दोष होने का अंदेशा जताया।