प्रोपेगेंडा पोर्टल 'ऑल्टन्यूज़' ने दावा किया था कि विडियो में दिख रहे छात्र के हाथ में पत्थर नहीं, वॉलेट है। नए विडियो ने उसे फिर से झूठा साबित किया है। इस विडियो में अन्य छात्रों के हाथ में भी पत्थर दिख रहे हैं।
रवीश समेत कुछ लोगों का कहना है कि पुलिस डंडे क्यों मार रही है? भाई, हाथ में पत्थर ले कर घूमने वाले और बसों में आग लगाने वाले छात्र नहीं, फसादी होते हैं। उनसे अपराधियों की तरह ही निपटना चाहिए।
जैसे ही जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी ने इस वीडियो को रिलीज किया, लिबरल सेक्युलर मीडिया गैंग के कथित पत्रकारों ने इसे हाथों-हाथ लेते हुए प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर दिया। मीडिया गैंग के अनुसार इस वीडियो में साफ़ नजर आ रहा है कि पुलिस ने ही पहले छात्रों पर बर्बरता दिखाई, जिसके बाद कैंपस में हिंसा भड़की। लेकिन कहानी कुछ और ही है।
यह पहली बार नहीं है, या फिर इस प्रकार की रिपोर्टिंग करने वालों में बीबीसी ही अकेला नहीं है। बीबीसी की ही तर्ज पर दी लल्लनटॉप एक साल पहले इस तरह की रिपोर्ट शेयर कर चुका है। वैसे लल्लनटॉप एक बार हिटलर का लिंग भी नाप चुका है।
'दी प्रिंट' की इस खबर में बताया गया था कि वित्त मंत्री ने मुंबई के उद्योगपतियों का अपमान किया है। इसके बाद वित्त मंत्री के व्यवहार पर ज्ञान देते हुए दी प्रिंट ने लिखा है कि निर्मला सीतारमण लोगों की खिंचाई करने के लिए जानी जाती हैं, खासतौर पर जब वो किसी मुद्दे पर हाशिए पर हों।
मीडिया के लोग आतंकवादियों के एक 'आम आदमी' से आतंकवादी बनने की घटना का बेहद फ़िल्मी तरीके से महिमामंडन करते नजर आते हैं। आतंकवादियों से अलग यह अपना एक अलग किस्म का बौद्धिक जिहाद चला रहे होते हैं, जिनका पहला संघर्ष सामान्य विवेक और तर्क क्षमता से नजर आता है।
इंस्टाग्राम हैंडल iawaken.in और @fuckbjp नाम का ट्विटर हैंडल। इन्हीं दोनों हैंडल से गार्गी कॉलेज में छेड़छाड़ के दौरान भगवा झंडे और जय श्रीराम के नारों का प्रोपेगेंडा रचा गया। अब इन दोनों हैंडल से सब कुछ गायब है, लेकिन मीडिया ने बिना जाँच-पड़ताल किए प्रोपेगेंडा को पूरी हवा दी। अब CCTV से भी...
जो ग्राफिक एनडीटीवी ने दिखाया उसमें पॉंच पार्टियों की तुलना की गई थी। इन दलों में सबसे कम 39 फीसदी बीजेपी सांसद दागी हैं। लेकिन ग्राफ बीजेपी का सबसे बड़ा दिखाया गया ताकि उसके सबसे ज्यादा दागदार होना का भ्रम पैदा किया जा सके।
'इंडिया टुडे' लिखा कि 430 दलितों ने इस्लाम अपना लिया है और कई अन्य इसी राह पर हैं। साथ ही ये भी लिखा गया कि क्षेत्र के दलितों ने भेदभाव की बात कही है। कुछ दलितों के बयान भी प्रकाशित किए गए हैं। दिसंबर में भी 'आजतक' ने ये ख़बर चलाई थी, जिसे वहाँ के दलितों ने नकार दिया था।