पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज अगर कोई चेहरा सबसे ज्यादा जनाक्रोश का प्रतीक बन चुका है, तो वह अभिषेक बनर्जी हैं। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद जिस तरह पार्टी के कार्यकर्ता, नेता और आम लोग खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, उसका सबसे बड़ा निशाना ममता बनर्जी नहीं बल्कि उनके भतीजे और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी बने हैं।
हाल ही में उनके आवास के बाहर हुआ प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन और फिर सोनारपुर में उन पर अंडे-पत्थर फेंके जाने की घटना इस बात का संकेत है कि बंगाल में जनता का गुस्सा अब सीधे अभिषेक बनर्जी की ओर मुड़ चुका है।
गौरतलब है कि 2026 विधानसभा चुनाव में TMC को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। 15 साल तक सत्ता में रहने वाली पार्टी 294 में से सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा ने 208 सीटें जीतकर सरकार बना ली। चुनावी हार के बाद पार्टी में इस्तीफों की झड़ी लग गई और कई नेता खुलकर नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे।
अंडे, पत्थर और ‘चोर-चोर’ के नारे
तृणमूल कॉन्ग्रेस की हार के बाद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ जनता के गुस्से की सबसे चर्चित तस्वीर तब सामने आई जब वह बंगाल के सोनारपुर में एक TMC कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुँचे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अभिषेक बनर्जी चुनाव बाद हुई हिंसा में घायल हुए TMC कार्यकर्ताओं और प्रभावित परिवारों से मिलने सोनारपुर पहुँचे थे।
उनके वहाँ पहुँचते ही लोगों ने उन्हें घेर लिया और चोर-चोर की जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। इस दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई और उनके साथ धक्का-मुक्की की गई। उनके ऊपर अंडे फेंके गए और उनकी शर्ट भी फट गई। हालात बिगड़ते देख सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें हेलमेट पहनाकर वहाँ से सुरक्षित निकाला।
TMC ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपा समर्थकों का हाथ बताया, लेकिन विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि यह वर्षों से जमा नाराजगी का परिणाम है।
चुनावी हार के बाद पहली बार अभिषेक बनर्जी को इस तरह के सार्वजनिक विरोध का सामना करना पड़ा, जिसने साफ संकेत दिया कि BJP के सत्ता में आने के बाद TMC के भ्रष्ट नेताओ के प्रति जनता का रवैया बदल रहा है और वो खुलकर उनका विरोध कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह भी रही कि सोशल मीडिया पर अभिषेक बनर्जी के पुराने बयान वायरल होने लगे। जब 2021 में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ था, तब अभिषेक ने इसे जनता के गुस्से से जोड़कर देखा था। अब उनके विरोधी कह रहे हैं कि जो तर्क उस समय दिया गया था, वही आज उनके खिलाफ भी लागू हो रहा है।
In Bengal, there was an attack on the then BJP president J.P. Nadda by TMC goons.
— JIGAR JOSHI (@jigarceo) May 31, 2026
At that time, 'Abhishek Banerjee' had said about it:
– This is the anger of the people.
– What can I do about it?
– The outburst of people's resentment is not my responsibility. pic.twitter.com/kDqjSFQ40H
अपने ही नेताओं ने अभिषेक पर लगाए परिवारवाद के आरोप
महज कुछ महीने पहले तक अभिषेक बनर्जी TMC में निर्विवाद रूप से नंबर दो नेता थे। राजनीति के क्षेत्र में कम अनुभव होने के बावजूद, उनकी चाची ने उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में शामिल कर दिया था। अभिषेक 2011 के बाद सक्रिय राजनीति में आए और बहुत कम समय में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और युवा संगठन के प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच गए।
हालाँकि 2026 में हालात अलग हैं। TMC की करारी हार के बाद अभिषेक को पार्टी की संगठनात्मक विफलताओं, वंशवादी अतिचार, आक्रामक चुनाव प्रचार और गुटबाजी जैसी सत्ता के स्पष्ट सूत्रधार के रूप में देखा जा रहा है, जिसके चलते उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
TMC के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यही परिवारवाद पार्टी में असंतोष की सबसे बड़ी वजह बना। कई पुराने नेताओं को किनारे कर दिया गया और संगठन पर अभिषेक समर्थक नए चेहरे हावी होते गए। TMC के एक विधायक ने डेक्कन क्रॉनिकल को बताया कि अभिषेक के ‘सत्ता के अहंकार’ और ‘खुलेआम भाई-भतीजावाद’ ने पार्टी को बर्बाद कर दिया है।
पुराने नेताओं से टकराव ने बढ़ाया विरोध
TMC के भीतर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नाराजगी नई नहीं है। पार्टी के कई पुराने नेताओं का मानना है कि उनके उभार ने संगठन को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक तरफ पुराने जमीनी नेता और दूसरी तरफ अभिषेक का नया समूह। मुकुल रॉय जैसे संगठन के मजबूत रणनीतिकार धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए।
मुकुल रॉय को कभी ममता बनर्जी के साथ पार्टी का प्रमुख संगठनात्मक रणनीतिकार माना जाता था। रॉय को दरकिनार किए जाने से पुराने नेताओं में असंतोष पैदा हुआ। बाद में वे भाजपा में चले गए। नवंबर 2020 में सुवेंदु अधिकारी ने परिवहन मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके अगले महीने उन्होंने विधायक पद भी छोड़ दिया और भाजपा में शामिल हो गए।
फालता में ढहा अभिषेक का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’
हर बड़े नेता का एक राजनीतिक गढ़ होता है और अभिषेक बनर्जी के लिए यह गढ़ डायमंड हार्बर रहा है। अभिषेक के करीबी सहयोगी जहाँगीर खान को इस इलाके में उनकी राजनीतिक ताकत का अहम आधार माना जाता था। अभिषेक समर्थक जिस व्यवस्था को ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ बताते थे, उसे विकास और कल्याणकारी योजनाओं का सफल मॉडल कहा जाता रहा।
हालाँकि विरोधियों का आरोप था कि यह मॉडल राजनीतिक दबाव और विरोधियों को नियंत्रित रखने की रणनीति पर टिका हुआ था। विधानसभा चुनाव से पहले अभिषेक को भरोसा था कि फालता सीट पर TMC अपनी पकड़ बनाए रखेगी, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट निकले।
मतदान के दौरान मतदाताओं को डराने और EVM से छेड़छाड़ के आरोपों के बाद चुनाव आयोग ने सभी 285 बूथों पर दोबारा मतदान कराने का फैसला किया। इसके बाद TMC उम्मीदवार जाहांगीर खान चुनावी मुकाबले से पीछे हट गए। पुनर्मतदान के नतीजों में भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने बड़ी जीत दर्ज की।
राजनीतिक हलकों में इस हार को केवल एक सीट की हार नहीं बल्कि अभिषेक बनर्जी के बहुचर्चित ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की असफलता के रूप में देखा गया। इस हार का असर तुरंत दिखाई दिया। फलता के नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर डायमंड हार्बर नगरपालिका के नौ पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया।
रिपोर्टों के अनुसार, इस्तीफा देने वाले पार्षदों ने आरोप लगाया कि जिस मॉडल को सफलता की मिसाल बताया जाता था, उसने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और असहमति की आवाजों को दबाने का काम किया। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि अभिषेक ने 26 लाख नौकरियाँ चुरा ली हैं।
"Abhishek Banerjee has stolen 26 lakh jobs. He has hidden everything" – LOCALS pic.twitter.com/dNTM1epNlg
— News Algebra (@NewsAlgebraIND) June 1, 2026
I-PAC और चुनावी रणनीति पर सबसे ज्यादा सवाल
2019 के लोकसभा चुनाव में TMC के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी में राजनीतिक सलाहकार संस्था I-PAC को लाया गया था। लेकिन समय के साथ यह फैसला पार्टी के भीतर नाराजगी का बड़ा कारण बन गया। कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अभिषेक बनर्जी ने I-PAC पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया, जिससे संगठन को नुकसान हुआ।
नेताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान I-PAC ने पार्टी के पुराने और अनुभवी नेताओं को किनारे कर दिया और जमीनी राजनीति की जगह कॉरपोरेट शैली की रणनीति लागू की, जिससे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच की दूरी बढ़ गई। TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि I-PAC ने पार्टी संगठन को अपने कब्जे में लेकर उसे कमजोर कर दिया।
उनके मुताबिक, टिकट के दावेदारों के बीच जानबूझकर विवाद पैदा किए गए, जिससे कई नेता नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि जिन्हें टिकट नहीं मिला, उनमें से कई लोगों ने गुस्से में भाजपा की मदद की। कल्याण बनर्जी का यह भी कहना था कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कभी I-PAC को स्वीकार नहीं किया।
I-PAC को लेकर एक और बड़ा विवाद टिकट वितरण को लेकर सामने आया। आलोचकों का दावा है कि उसके सुझाव पर पार्टी ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे। बाद में इनमें से 51 सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद यह मुद्दा TMC के भीतर और ज्यादा विवाद का कारण बन गया।
घोटालों और जाँचों ने बढ़ाई मुश्किलें
15 साल के शासन के दौरान भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के आरोपों ने पार्टी की साख को गंभीर नुकसान पहुँचाया। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर भी इस बात पर खुलकर चर्चा होने लगी कि जनता का भरोसा कमजोर पड़ने के पीछे भ्रष्टाचार से जुड़े विवाद बड़ी वजह रहे।
इसी दौरान अभिषेक बनर्जी का नाम भी कई चर्चित मामलों में राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग भर्ती घोटाले की जाँच के दौरान केंद्रीय एजेंसियों ने उनसे कई बार पूछताछ की। जाँच के दौरान उनकी एक पुरानी कंपनी से जुड़े पहलुओं की भी पड़ताल की गई।
इसके अलावा 2025 में दाखिल एक पूरक आरोपपत्र में 2017 की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का भी जिक्र हुआ, जिसमें ‘अभिषेक बनर्जी’ नाम के व्यक्ति का उल्लेख था। कोयला तस्करी मामले में भी अभिषेक बनर्जी और उनके परिवार का नाम राजनीतिक विवादों में घिरा रहा।
जाँच एजेंसियों का आरोप था कि अवैध कोयला कारोबार से बड़ी रकम पैदा हुई और उसके वित्तीय लेनदेन की जाँच की गई। इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी रुजिरा बनर्जी से भी पूछताछ की थी।
कट मनी, सिंडिकेट राज और ‘भाइपो टैक्स’ की छवि
पश्चिम बंगाल में TMC के दौरान ‘कट मनी’ और सिंडिकेट राज के आरोप लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बने रहे। विपक्ष का आरोप था कि आम लोगों और कारोबारियों को विभिन्न कामों के लिए अतिरिक्त रकम देनी पड़ती थी और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों का एक नेटवर्क इससे फायदा उठाता था।
हाल ही में बीजेपी नेता अमित मालवीय ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि काकद्वीप के बाद अब साउथ 24 परगना जिले के नमखाना क्षेत्र का मामला चर्चा में है। यहाँ एक स्थानीय TMC नेता को लोगों को नकद पैसे लौटाते हुए देखा गया। आरोप है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर दिलाने के नाम पर 45 लोगों से प्रति व्यक्ति 5,000 रुपए लिए गए थे।
In an extraordinary spectacle from West Bengal, money collected as Cut Money by those associated with TMC is being returned to villagers in open fields.
— Amit Malviya (@amitmalviya) June 1, 2026
Why in the open? Because public anger is boiling over and the fear of arrest is real.
This was the true state of governance… pic.twitter.com/0i6apTKd5z
स्थानीय लोगों के अनुसार, योजना का लाभ दिलाने के बदले पैसे वसूले गए थे। अब जाँच की आशंका और बढ़ती कार्रवाई के बीच संबंधित नेता लोगों को रकम वापस करते नजर आए।
निर्माण कार्यों से लेकर स्थानीय कारोबार तक, कई क्षेत्रों में ऐसे आरोप सामने आते रहे। अभिषेक बनर्जी को विपक्ष लंबे समय से तथाकथित ‘भाइपो टैक्स’ से जोड़ता रहा है। भाजपा नेताओं ने कई मौकों पर इस शब्द का इस्तेमाल करते हुए आरोप लगाया कि राज्य के कुछ इलाकों में अवैध वसूली का एक समानांतर तंत्र काम करता था।
आलोचकों का दावा था कि हाईवे और सीमा क्षेत्रों में चलने वाले वाहनों से भी अवैध वसूली की जाती थी और स्थानीय दबंगों के जरिए इस व्यवस्था को संचालित किया जाता था।
पार्टी के पुराने नेताओं का एक वर्ग मानता है कि संगठन का कमजोर होना, राजनीतिक सलाहकारों पर अत्यधिक निर्भरता, विवादों का बढ़ता बोझ और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों ने मिलकर TMC को नुकसान पहुँचाया। इन सबके बीच अभिषेक बनर्जी पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं।
कभी पार्टी का सबसे शक्तिशाली और अछूता माना जाने वाला चेहरा आज आलोचनाओं के घेरे में है और यही वजह है कि चुनावी हार के बाद जनता और पार्टी, दोनों के भीतर सबसे ज्यादा नाराजगी उन्हीं के खिलाफ दिखाई दे रही है।


