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एक्सपोज हुए कॉकरोच तो ‘आंदोलनजीवी’ रचने लगे ‘पंचशील’ का प्रपंच, जानिए- ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नाम पर कैसे हिंदुओं को किया जाता है गुमराह

योगेंद्र यादव के इस नए 'पंचशील' को देखें तो इसमें बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं, जैसे मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा रखना, हाथ में संविधान या गाँधी-अंबेडकर-भगत सिंह की फोटो होना, जुबान पर 'भारत माता की जय' और 'इंकलाब जिंदाबाद' जैसे नारे होना, अनुशासन बनाए रखना और किसी भी हाल में हाथ न उठाना।

जब साल 1954 में जवाहरलाल नेहरू ने भारत और चीन के बीच तिब्बत मामले को लेकर ‘पंचशील’ का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा था, ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारों के बीच उस पंचशील का जो हश्र हुआ, वो आज पूरा देश जानता है- पीठ में छुरा घोंपा गया और नतीजा 1962 की शर्मनाक हार के रूप में सामने आया।

आज ‘पंचशील’ नाम का वही जहर जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों के बीच से निकलकर आया है। इसे जारी करने वाले हैं जाने-माने ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव, जो सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मंच पर बैठने लगे हैं और इस पूरे प्रदर्शन को डायरेक्शन देने में जुट गए हैं।

CJP के मंच से योगेंद्र यादव के इस नए ‘पंचशील’ को देखें तो इसमें बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं, जैसे मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा रखना, हाथ में संविधान या गाँधी-अंबेडकर-भगत सिंह की फोटो होना, जुबान पर ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे नारे होना, अनुशासन बनाए रखना और किसी भी हाल में हाथ न उठाना।

इनमें कुछ बातें स्वाभाविक हैं, जो शायद हर देशभक्त जानता है लेकिन पता नहीं योगेंद्र यादव को बताने की क्या जरूरत आन पड़ी? यह तो उनका पास्ट रिकॉर्ड ऐसा रहा है, जो उनको लोगों का भरोसा जीतने के लिए ‘जय हिंद’ बोलने की जरूरत पड़ रही है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि योगेंद्र यादव को आंदोलन की कितनी भूख है, और अचानक से उनका इस प्रदर्शन की प्लानिंग में लगना हमें दिल्ली में CAA विरोधी प्रदर्शनों में उनकी वह तस्वीर याद दिलाता है, जिसमें वह शरजील इमाम, उमर खालिद के साथ बैठकें कर रहे थे और नतीजतन दंगे-फसाद भड़काने में आज वही लोग जेल में बंद हैं।

जब एजेंडा हुआ एक्सपोज, तो शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल का स्वाँग

खैर, पिछले करीब एक महीने से NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में भी कुछ ऐसी तस्वीरें नहीं आई हैं, जिन पर भरोसा किया जा सके। चाहे वह माता सीता का अपमान करते हिंदू विरोध का एजेंडा हो, ब्राह्मणवाद का विरोध हो और वहीं दूसरी ओर अल्लाह का नाम हो, स्वरा भास्कर जैसे पुराने चेहरे हों, या हो AISA-SFI जैसे वही लेफ्ट संगठनों से जुड़ा एजेंडा। यही नहीं, चाहे 18 जुलाई 2026 को अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल में शिफ्ट करने का विरोध करते हुए हिंसा का रवैया हो, इसमें ऑपइंडिया के पत्रकार को भी निशाना बनाया गया जब वह शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछ रहे थे।

जब प्रदर्शन का यह चाल-चरित्र सोशल मीडिया औऱ मीडिया के जरिए देश के सामने आया, तो आम जनता ने इस प्रदर्शन से दूरी बना ली। भीड़ जुटनी बंद हो गई और हर तरफ सिर्फ बदनामी होने लगी। अभिजीत दिपके पर स्याही फेंकना भी इसी बदनामी का नतीजा था। और जब योगेंद्र यादव जैसे ‘प्रदर्शन के रणनीतिकारों’ ने देखा कि उनका एजेंडा और प्रोपेगेंडा पूरी तरह एक्सपोज होने लगा है, तो उन्हें अपनी डूबती नैया को बचाने के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ की याद आई।

आसान शब्दों में समझें तो यह पंचशील कोई मन का बदलाव या अचानक जागी देशभक्ति नहीं है। ‘भारत माता की जय’ और ‘तिरंगे’ का सहारा ये लोग अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने की मजबूरी में ले रहे हैं ताकि बहुसंख्यक समाज के गुस्से को शांत किया जा सके।

दरअसल, CJP ने 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने का ऐलान किया है, यही दिन संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन भी है। इसी प्रदर्शन में भीड़ जुटाने के लिए संविधान और गाँधी की बात हो रही है। क्योंकि इस मार्च के लिए अपनी असलियत जानते हुए अभिजीत दिपके और उसकी गैंग के लिए भीड़ जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। इसीलिए योगेंद्र यादव ने पुरानी गलतियों से सीख लेकर काफी सॉफ्ट ढंग से ‘देशभक्ति’ की बात कर दी है। बाकी डैमेज कंट्रोल का हिस्सा, सोनम वांगचुक के बाद खुद को ‘हीरो’ बतलाने वाले अभिजीत का ‘रोना’ तो हम सबने देखा ही।

‘जय भीम’ और ‘इंकलाब’ के नारों के पीछे का असली सच

इस नए पंचशील में जिन दो प्रमुख नारों को बहुत चालाकी से शामिल किया गया है- ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’, उसके बारे में आम जनता को जानना भी जरूरी है। क्योंकि ये नारे एक बहुत बड़े छद्म को छुपाने का जरिया बन रहे हैं।

जय भीम, भाईचारे के नाम पर हिंदुओं को ‘चारा’ बनाने का खेल

सीजेपी के प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे का इस्तेमाल दलित-मुस्लिम एकता (जिसे ‘जय भीम जय मीम’ का नारा भी कहा जाता है) के नैरेटिव को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यह प्रयोग कोई नया नहीं है। देश के विभाजन के समय जोगेंद्र नाथ मंडल इस भ्रामक भाइचारे के सबसे बड़े पैरोकार थे।

उन्होंने अनुसूचित जातियों को भरोसा दिलाया था कि मुस्लिम लीग के साथ उनका भविष्य पाकिस्तान में सुरक्षित रहेगा और जिन्ना ने उन्हें वहाँ का पहला श्रम मंत्री भी बनाया। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। लेकिन इसका हश्र क्या हुआ? पाकिस्तान में हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।

इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए।

इस नेता का नाम किसी इतिहास की किताब में शामिल नहीं किया गया। बस समस्या है कि ना आपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं! तो वो क्यों पढ़ने देते भला? अब भी यही हो रहा है। जागिए! इससे पहले देर हो जाए।

इंकलाब जिंदाबाद: भगत सिंह के नाम पर खिलाफत के इतिहास को छुपाना

आम जनमानस में आज भी यह एक गहरा भ्रम फैला हुआ है कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा मूल रूप से बलिदानी भगत सिंह ने ही दिया था। जबकि इतिहास के पन्ने खंगालें तो पता लगता है कि यह नारा 1921 में इस्लामी कट्टरपंथी और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार मौलाना हसरत मोहानी द्वारा गढ़ा गया था।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जब 1929 में असेंबली में बम फेंका, तब उन्होंने इस नारे को बुलंद किया, जिससे यह देश के कोने-कोने में फैल गया। लेकिन, इस नारे की उत्पत्ति का मूल संबंध भारत की आजादी से नहीं, बल्कि खिलाफत आंदोलन और ‘उम्माह’ (वैश्विक इस्लामी सत्ता) की भावना से जुड़ा हुआ था। बता दें कि खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा की सत्ता को बहाल करने के लिए चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जौहर (जामिया मिली इस्लामिया के संस्थापकों में से एक) ने किया था।

और इस आंदोलन को महात्मा गाँधी ने भी अंध समर्थन किया था, जिसका खामियाजा खामियाजा भी कोहाट दंगों और मोपला नरसंहार के रूप में ‘हिंदुओं’ को ही भुगतना पड़ा था।

जब आज CJP जैसे प्रदर्शनों में इस नारे को गाँधी, अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों के साथ मिलाकर लगाया जाता है, तो यह केवल एक बौद्धिक छलावा होता है। इसका उद्देश्य वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के मूल एजेंडे को देशभक्ति के रंग में रंगकर प्रस्तुत करना है।

निष्कर्ष: पंचशील सिर्फ दोगलेपन और पाखंड की पराकाष्ठा

योगेंद्र यादव का ‘पंचशील’, दरअसल उस दोगलेपन की पराकाष्ठा है, जहाँ मन में हिंसा और समाज को तोड़ने की प्लानिंग होती है, लेकिन मंच से शांति, संविधान और अनुशासन की दुहाई दी जाती है। अगर मन में वास्तव में अहिंसा का संकल्प होता, तो ऑपइंडिया के पत्रकार पर हमला करने वाले तत्वों को उसी समय मंच से बहिष्कार किया गया होता। अगर वास्तव में ‘भारत माता की जय’ पर अटूट विश्वास होता, तो इस मारने को लगाने के लिए किसी गाइडलाइन या ‘पंचशील’ नाम देने की जरूरत नहीं पड़ती।

नेहरू के पंचशील ने देश को एक बार धोखा दिया था, लेकिन देश की जनता अब इन नए ‘आंदोलनजीवियों’ और उनकी क्रोनोलॉजी को अच्छी तरह समझ चुकी है। 2020 के दिल्ली दंगों के जख्म अभी भरे नहीं हैं और यही कारण है कि जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्च तक के इस नए ड्रामे को लेकर समाज में कोई सहानुभूति नहीं है। यह आंदोलन अपने ही अंतर्विरोधों, वैचारिक पाखंड और हिंसक प्रवृत्तियों के कारण जनता की नजरों में पूरी तरह गिर चुका है। अब तिरंगे और महापुरुषों की आड़ लेकर चाहे जितना भी डैमेज कंट्रोल कर लिया जाए, इस आंदोलन का असली सच देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।

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