देश की स्थापित संवैधानिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रधानमंत्री के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रियों और सर्वोच्च न्यायपालिका पर लगातार अमर्यादित और अनर्गल बयानबाजी करने वाले एडवोकेट महमूद प्राचा ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जल्दी ही जेल जाएँगे और उनके चक्की पीसने की लाइव स्ट्रीमिंग होगी।
‘हिंद संवाद विथ ज्योति’ नामक यूट्यूब चैनल को दिए गए अपने इंटरव्यू में महमूद प्राचा ने न केवल देश के शीर्ष नेतृत्व और कार्यपालिका पर निराधार हमले बोले, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के हर एक मजबूत स्तंभ, चाहे वह संसद हो, निर्वाचन आयोग हो, न्यायपालिका हो या फिर मीडिया सबकी निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
प्राचा का अतीत गंभीर कानूनी विवादों से भरा रहा है। देशद्रोही गतिविधियों में शामिल दंगाइयों व आतंकवादियों की कोर्ट में पैरवी करने, जाली दस्तावेजों के दम पर कोर्ट को गुमराह करने, विभिन्न न्यायिक पीठों से कड़ी फटकार व भारी जुर्माना झेलने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जाँच में अड़ंगा डालने की उसकी पुरानी और स्थापित आपराधिक कार्यशैली रही है।
केवल समाज में सनसनी फैलाने, साम्प्रदायिक कार्ड खेलकर लोगों को भड़काने और अपना विशिष्ट राजनीतिक व वैचारिक एजेंडा साधने के लिए प्राचा जिस तरह की उग्र और अमर्यादित बयानबाजी मीडिया के सामने कर रहा है, वह उसके सालों पुराने प्रोपेगंडा, कानूनी पैंतरेबाजी और सोची-समझी रणनीति का ही एक निरंतर विस्तार नजर आती है।
सारी उमर मोदी और शाह जी को जेल में रहना होगा: प्राचा ने दिए विवादित बयान
यूट्यूब वीडियो के अलावा पहले खुद को पत्रकार कहने वाली ज्योति यादव की फेसबुक रील में विपक्षियों द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की माँग पर प्राचा ने कहा, “इस्तीफा देने के तुंरत बाद तिहाड़ जेल भी जाना पड़ेगा और वहाँ फिर अपनी सारी उमर रहना पड़ेगा।”
उसने कहा कि शाह के पीछे-पीछे फिर मोदी जी भी आएँगे। इस्तीफा हो जाएगा और अगले ही पल वो गिरफ्तार भी हो जाएँगे। इतना ही नहीं प्राचा ने कहा कि फिर वो BJP और RSS के जितने लोग हैं वो उसके खिलाफ ला कर इसे सबूत भी देंगे।
उसने कहा, “सारी उमर अमित शाह जी और मोदी जी को जेल में रहना है और इसीलिए हम इनकी सौ साल की उमर की दुआ माँगते हैं और फिर इन्हें रोज कम से कम 3 से 4 घंटे चक्की पीसनी है, जो कि लाइव स्ट्रीम होगी ताकि आने वाला कोई भी प्रधानमंत्री या गृहमंत्री-संत्री ये याद रखे कि जब मोदी जी डेली चार घंटे चक्की पीस रहे हैं और देखेगी सारी दुनिया तो हमे कोई भी गलत काम नहीं करना है ये बात तय है।”
प्राचा की अनर्गल बातें यहीं नहीं रुकी, उसने आगे कहा, “इनके जेल जाने की मुख्य वजह गिनाउँगा तो एक साल लग जाएगा। एपस्टीन मानसिकता का ऐसा कोई काम नहीं जो मोदी जी ने शाह जी ने नहीं किया हो। देश को लूटा है, देश की बच्चियों को लूटा है, देश को बेच दिया।”
अंबानी, अडानी चीन, पाकिस्तान का नाम लेते बेबुनियाद आरोप लगा रहे प्राचा ने कहा कि इनलोगों ने 2 करोड़ नैकरियाँ छीन ली और भारत की आर्मी को कमजोर कर दिया।
गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बेबुनियाद बातें
‘हिंद संवाद विथ ज्योति’ को दिए इंटरव्यू में महमूद प्राचा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी कीमत पर संवैधानिक पदों पर बने रहने का कोई नैतिक या कानूनी हक नहीं है और उन्हें तुरंत उनके पदों से हटाकर सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए।
किसी भी निष्पक्ष कानूनी जाँच, पुलिस आरोप-पत्र या अदालत के सजा के आदेश के बिना ही खुद जज की भूमिका में आते हुए प्राचा ने साफ दावा किया कि देश में सत्ता परिवर्तन होते ही गृह मंत्री को उम्रकैद की सजा मिलना बिल्कुल तय और अनिवार्य है।
वीडियो की शुरूआत में एंकर कॉकरोच जनता पार्टी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की माँग को बताते हुए पूछती है, “प्राचा साहब सबसे पहले तो यही कि अमित शाह के इस्तीफे की माँग की जा रही है, सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की गई है। इस पूरी माँग को और इस पिटीशन को आप किस तरीके से देख रहे हैं?”
इस पर प्राचा ने कहा, “अमित शाह साहब का इस्तीफा मुद्दा नहीं है, मुद्दा ये है कि अमित शाह साहब को जेल जाने का रास्ता जो है वो ईमानदारी से जनता के वोटों से सरकार जो चुन के आएगी मोदी जी और अमित शाह जी को जेल भेजेगी और वे फिर कभी वापस नहीं आने वाले तब तो वैसे ही उनकी उम्र कैद की सजा तो पक्की है।”
उसने आगे कहा, “दोनों ही सूरतों में उन्हें जेल जाना वाजिब है लाजमी है 250 लाख करोड़ जो ईमानदारी से मोदी जी के साथ मिलके कमाए उसको सेट करने में किस-किस जगह कौन सा आइलैंड खरीदना है किस कंट्री में कौन सी बैंक खोलना है यह सब में काम करें होम मिनिस्टर के पद के पास भी उन्हें आने नहीं देना चाहिए।”
प्राचा ने कहा, “हालाँकि इस्तीफे से ज्यादा कुछ होता नहीं, बहुत सारे जजेस और जो ये धर्मेंद्र प्रधान जी का भी इस्तीफा हुआ है। इनको एक प्रकार से अपने अपराधों से निकल भागने का मौका मिलता है। लेकिन अमित शाह साहब का इस्तीफा बहुत महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अगर उनका इस्तीफा होता है तो वो समझिए आप पूरी सरकार का इस्तीफा हो गया।”
PM मोदी की दिनचर्या पर अमर्यादित टिप्पणी
गृह मंत्री पर अनर्गल वित्तीय आरोप लगाने के साथ-साथ, प्राचा ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दैनिक प्रशासनिक कार्यकलापों, सुरक्षा व्यवस्था और दिनचर्या पर भी बकवास की।
प्राचा ने कहा, “मोदी जी तो 18 घंटे आप लोगों को पता ही है काम करते हैं। काम मतलब, दो-ती घंटे मेकअप, दो-ती घंटे इधर-उधर घूमना, कपड़े दो-ती घंटे, फिर कैमरा फिट करना, फिर किस-किस से मिलके इधर-उधर की बातें करना दुनिया भर की और म्यूजिक सुनना वगैरह-वगैरह 6 घंटे वो सोते हैं। तो 18 और छह मतलब पूरे हो गए।”
अपनी बकवास आगे बढ़ाते हुए प्राचा ने कहा, “उसमें कोई भी प्रधानमंत्री के कार्यालय का या किसी भी मंत्रालय का कार्य नहीं होता। उनका काम तो यही काम है जो मैंने आपको बताया अभी। हम और एसपीजी वाले परेशान रहते हैं उनसे।”
एक अधिवक्ता होने के नाते कानून, साक्ष्यों और अदालती मर्यादा से भली-भाँति परिचित होने के बावजूद, बिना किसी प्रमाण के इस तरह के मनगढ़ंत वित्तीय आँकड़े (250 लाख करोड़ रुपए) गढ़ना, काल्पनिक आइलैंड खरीदने और विदेशी बैंकों में बेनामी खाते खोलने की फर्जी कहानियाँ बुनना महमूद प्राचा की उसी पुरानी रणनीति का हिस्सा है।
वह अक्सर ऐसे भ्रामक बयान देकर अपने ऊपर चल रहे गंभीर मुकदमों और अदालती कार्रवाइयों से आम जनता और मीडिया का ध्यान भटकाने का निष्फल प्रयास करता है।
मोदी जी और इस सरकार के सभी मंत्रियों के खिलाफ इतने सबूत देंगे, सबका इस्तीफा वैसे ही हो जाएगा
इंटरव्यू में प्राचा ने आगे कहा, “मैं बार-बार बोलता हूँ अमित शाह जी और मोदी जी का जो क्रिमिनल गैंग है एपस्टीन मानसिकता का क्रिमिनल गैंग है उसके फलक्रम यानी कि केंद्र बिंदु यानी कि उसकी सारी गतिविधियाँ चलाने वाले मिस्टर अमित शाह साहब हैं। तो अगर अमित शाह साहब का इस्तीफा माँगा भी जाएगा तो यह सरकार जो है डगमगाने लगेगी।”
प्राचा ने आगे कहा, “यह सबसे महत्वपूर्ण बात है और अगर कहीं इस्तीफा हो गया तो अमित शाह साहब घंटों के अंदर दिनों के अंदर नहीं हम जैसे लोगों को मोदी जी के खिलाफ और इस सरकार के सभी मंत्री, संत्री और चीफ मिनिस्टर जितने बड़े-बड़े हैं सबके खिलाफ इतने सबूत लाके हम जैसे लोगों के हाथ में दे देंगे कि बाकी सबका इस्तीफा तो वैसे ही हो जाएगा। बाकी सब भी जेल चले जाएँगे।”
उसने कहा, “अमित शाह साहब का इस्तीफा माँगा जाएगा तो यह सरकार हिलेगी तब हिलेगी और यह अच्छी डिमांड है। जो लोगों ने भी प्रोटेस्ट आज किया उनको बहुत-बहुत मुबारकबाद पेश करता हूँ और वही गारंटी जो उनके लिए थी वो जनता के लिए है। पुलिस का कोई भी अधिकारी भ्रष्टाचार भ्रष्टाचारी पुलिस का अधिकारी आपको तंग करेगा पीसफुल प्रोटेस्ट में तो हम लोग पूरी ताकत से आपके साथ हैं। बिल्कुल नहीं घबराना है। यह जिम्मेदारी हमारी है।”
उसने कहा, “अगर कोई भ्रष्ट पुलिस का अधिकारी जो कि अपराधी होता है अमित शाह जी के डायरेक्ट कहने पर उनके अलावा कोई कुछ नहीं कर सकता है तो हम आप लोगों की हिफाजत के लिए आएँगे भी और अमित शाह साहब के खिलाफ FIR तो हमने करानी है वो तो सब आपको पता ही है।”
सुप्रीम कोर्ट, वकीलों और RSS की मिलीभगत का आरोप
इंटरव्यू के दौरान जब एंकर ने सुरक्षा बलों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल पूछा, तो प्राचा ने सुप्रीम कोर्ट जाने वाले वकीलों और खुद न्यायपालिका पर ही सवाल उठा दिए। उसने दावा किया कि ये याचिकाएँ जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट से ऐसा फैसला लेने के लिए डाली जाती हैं और इसमें वकीलों और RSS की मिलीभगत होती है।
प्राचा ने कहा, “फिर एक बार वही हुआ है जो मैं हमेशा बोलता हूँ पहली बात सुप्रीम कोर्ट नहीं जाना चाहिए। RSS के जितने भी स्पीकर्स हैं वो बोल रहे होंगे सुप्रीम कोर्ट ने ठप्पा लगा दिया पैलेट गन के इस्तेमाल पे। अब यह मौका देने के लिए ही यह पिटीशंस डाली जाती हैं ये लोग सब मिले हुए लोग हैं।”
उसने यह बेतुका तर्क भी दिया कि यदि कोई सच्चा वकील बहस करता तो सुप्रीम कोर्ट को याचिका खारिज करने के बजाय गृह मंत्री के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कर दुनिया भर में लाइव स्ट्रीमिंग करानी चाहिए थी। जब भी अदालतें प्राचा के मनमुताबिक आदेश नहीं देतीं, वह पूरी न्यायप्रणाली को ही पक्षपाती बताने लगता है।
मोदी को चाय बनाने भी नहीं आती वो तो किसी लायक नहीं: प्राचा
इंटरव्यू के दौरान प्राचा ने कहा, “RSS और BJP ने जो एग्जांपल सेट किया है ना मोदी जी के रूप में कि मैं नॉन बायोलॉजिकल हूँ। मतलब इस पोस्ट पे आ गया हूँ। वैसे तो उनको चाय बनानी भी नहीं आती होगी। ये मेरी गारंटी है। वो किसी लायक नहीं है। दुनिया में किसी लायक नहीं है। झूठ बोलने के अलावा वो और कपड़े अब तो बहुत सारे लोग उनके सलाहकार हैं।”
उसने कहा, “कपड़े भी कब से अच्छे हुए हैं जब से वो प्रधानमंत्री बने हैं। मेकअप भी कब से अच्छा हुआ है जब से वो प्रधानमंत्री बने। तो ये सब चीजें तो उन्हें इस चेयर पे बैठ के मिली है ना। लेकिन वो अपने आप को बड़ा आदमी दिखाने लगे। मतलब झूठी-झूठी तारीफें, बड़े-बड़े जो एक्टर्स हैं उनको प्यार मोहब्बत से बिना कुछ मारे पीटे, हम उनके मन के मुँह मुताबिक आम वाले सवाल पूछवा लिए। वाह मोदी जी करवा लिया।”
प्राचा ने देश की मुख्यधारा की मीडिया, पत्रकारों, न्यूज एंकरों और संपादकों को ‘क्रिमिनल जर्नलिस्ट’ करार देते हुए यह गंभीर आरोप लगाया कि वे केवल सरकार की झूठी तारीफें करते हैं और प्रधानमंत्री से उनके मनमुताबिक चाटुकारिता भरे सवाल पूछते हैं।
मीडिया पर सवाल उठाते हुए प्राचा ने कहा, “जितने ये क्रिमिनल जो जर्नलिस्ट अपने आप को प्रोजेक्ट करते हैं उन सब ने वाह वाह क्या गाने सुनाए, किसी ने कुछ सुनाए तो ये हर देश के नागरिकों के नौकर का दिमाग में कुछ वो ट्रेंड सा बन गया। तो हर एक कांस्टेबल भी ऐसे बिहेव कर रहा है। अब तो आप देखो किस तरीके से बच्चों को मारपीट कर रहे थे। तो एक वो माहौल सा बन गया।”
उसने कहा, उस माहौल की रॉ में बहुत सारे लोगों ने बहुत सारी बातें ऐसी कही है जो नॉर्मल हालात होते अगर मोदी जी प्रधानमंत्री ना होते, अमित शाह साहब यह होम मिनिस्टर ना होते तो किसी के मन में ऐसे विचार ही नहीं आते थे। अब तो एक माहौल सा बना हुआ है तो किसी के मुंह से भी बहुत सारी ऐसी बातें निकल जाती हैं जो कि वो आमतौर पे नहीं बोलता। लेकिन वो नफरत और गुस्सा था ना वो तो एक एक सुराग ढूँढ रहा था। वो सुराग फूटा है कॉकरोच जनता पार्टी के रूप में जो उसे मिल गया, लेकिन गलती RSS और BJP की, मोदी जी और अमित शाह साहब की है।”
चुनावी प्रणाली और EVM पर सवाल उठाकर लोकतंत्र का अपमान
देश की विभिन्न कोर्ट में लगातार कानूनी झटके खाने, अपनी जनहित याचिकाओं को खारिज होते देखने और कानूनी दलीलों के ध्वस्त होने के बाद, महमूद प्राचा का मुख्य निशाना भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया पर भी रहा है।
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग मशीन (EVM) को पूरी तरह हटाने और पुरानी पेपर बैलेट (कागजी मतपत्र) व्यवस्था को वापस लाने का अपना पुराना और घिसा-पिटा राग अलापते हुए चुनावी सुधारों के नाम पर जनता के बीच भारी भ्रम और अविश्वास फैलाने की पूरी कोशिश की।
प्राचा ने कहा, “पार्लियामेंट में जो असली मुद्दा है ना EVM हटाओ बैलेट पेपर वापस लाओ तो EVM का आंदोलन जब तक नहीं होगा पेपर बैलेट वापस आएँगे नहीं तो वो इलेक्ट्रोरल रिफॉर्म्स की शुरुआत ही नहीं होगी।”
भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा बार-बार EVM की तकनीकी निष्पक्षता और हैक-प्रूफ होने को सिद्ध किए जाने, सर्वदलीय हैकाथॉन में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा EVM में कोई भी गड़बड़ी साबित न कर पाने और देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा VVPAT तथा EVM की विश्वसनीयता पर बार-बार ऐतिहासिक मुहर लगाए जाने के बावजूद, प्राचा जैसे लोग लगातार भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर हमला करने और देश के जनमत को नीचा दिखाने की अपनी सनक का ही प्रदर्शन करते रहते हैं।
कौन है महमूद प्राचा: दंगाइयों और आतंकियों के मुकदमों का इतिहास
महमूद प्राचा का अतीत हमेशा से ही असामाजिक तत्वों, देशविरोधी गतिविधियों के आरोपितों, खूंखार आतंकवादियों और दंगाइयों को कानूनी ढाल और वैचारिक कवर प्रदान करने का रहा है। प्राचा वही व्यक्ति है जिसने साल 2012 में नई दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास की कार में हुए भयंकर बम विस्फोट मामले के मुख्य आरोपित सैयद मोहम्मद अहमद काजमी का अदालत में कानूनी बचाव किया था।
इसके अलावा प्राचा ने पाकिस्तान समर्थित कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के खूंखार आतंकी अब्दुल करीम टुंडा का मुकदमा भी अदालत में वकील के रूप में संभाला था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी हिंसक प्रदर्शनों और फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सुनियोजित हिंदू विरोधी दंगों के दौरान भी प्राचा की भूमिका बेहद संदिग्ध और विवादित रही थी।
उसने दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं, उपद्रवियों और हिंसा के आरोपितों को जेल जाने और कानूनी सजा से बचाने के लिए अदालती दाँव-पेच का जमकर इस्तेमाल किया।
प्राचा का मुख्य काम केवल अदालत के भीतर तकनीकी अड़ंगे पैदा करना ही नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और प्रेस बाइट्स के माध्यम से इस्लामी प्रोपेगंडा को हवा देना और दंगों के मुख्य मास्टरमाइंड्स के बचाव में पूरी तरह से काल्पनिक, झूठी और विक्टिम-कार्ड वाली कहानियाँ गढ़ना रहा है।
जाली दस्तावेजों और मृत वकील के फर्जी दस्तखत का गंभीर आपराधिक आरोप
महमूद प्राचा पर केवल विवादित तत्वों या दंगाइयों का केस लड़ने का ही नैतिक आरोप नहीं है, बल्कि दिल्ली दंगों के मुकदमों में फर्जी सबूत गढ़ने और जाली हलफनामे (Affidavits) तैयार कराने का बेहद गंभीर आपराधिक आरोप भी दर्ज है।
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के सख्त आदेश पर जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इन संगीन आरोपों की जाँच शुरू की, तो एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाला सच सामने आया। प्राचा ने कोर्ट में एक ऐसा कानूनी शपथ पत्र दाखिल किया था, जिस पर एक ऐसे अधिवक्ता के साइन किए गए थे जिनकी मृत्यु उस घटना से करीब तीन साल पहले ही हो चुकी थी।
एक मृत व्यक्ति के नाम पर जाली दस्तखत बनाकर कोर्ट की आँखों में धूल झोंकने, झूठे साक्ष्य गढ़ने और पूरी कानूनी व न्यायिक प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी करने के इसी गंभीर आपराधिक मामले में दिल्ली पुलिस की टीम ने प्राचा के निजामुद्दीन स्थित कार्यालय पर अदालत द्वारा जारी सर्च वारंट के तहत छापेमारी की कार्रवाई की थी।
विक्टिम कार्ड खेलकर जाँच भटकाने की सुनियोजित रणनीति
कार्यालय पर छापेमारी के दौरान जब पुलिस टीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशानुसार फोरेंसिक साक्ष्य, कंप्यूटर की हार्ड डिस्क और संबंधित दस्तावेज जब्त करने पहुँची, तो प्राचा ने कानून का पालन करने वाले अधिवक्ता की तरह जाँच में सहयोग करने के बजाय तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।
उसने इस गंभीर आपराधिक जाँच को पूरे वकील समुदाय, न्यायशास्त्र और बार एसोसिएशन पर हमला बताकर इसे राजनीतिक रंग देने की भरसक कोशिश की। उसने प्रशांत भूषण जैसे अन्य विवादित वकीलों को अपने साथ जोड़कर आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और खुद को राज्यसत्ता द्वारा संस्थागत उत्पीड़न का शिकार दिखाने का पूरा ड्रामा रचा।
हालाँकि पुलिस ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि यह कार्रवाई किसी वकील के स्वतंत्र पेशे, स्वायत्तता या अधिकारों पर हमला नहीं थी, बल्कि जाली दस्तावेज तैयार करने और मृत व्यक्ति के फर्जी दस्तखत बनाने जैसे संगीन अपराधों में अदालत के वैधानिक आदेश पर की गई एक निष्पक्ष फोरेंसिक जाँच थी।
मस्जिदों में बंदूकें चलाने और हथियार ट्रेनिंग की विवादित पैरवी
महमूद प्राचा का सबसे खतरनाक, उग्र और समाज में साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाला रुख तब सामने आया था जब उसने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) और मुस्लिम समुदाय के लोगों को बड़े पैमाने पर लाइसेंसी हथियार (बंदूकें) बाँटने और उन्हें चलाने की ट्रेनिंग देने का सार्वजनिक ऐलान किया था।
प्राचा ने खुलेआम मीडिया के सामने यह विवादित पैरवी की थी कि इस तरह के हथियार प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने और बंदूक के लाइसेंस के आवेदन पत्र भरने के लिए मस्जिदों और मदरसों के परिसरों का आधिकारिक रूप से इस्तेमाल किया जाएगा।
उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।
अदालतों की भारी फटकार और ₹1 लाख का जुर्माना
अपनी आदतन और निरर्थक याचिकाओं (Frivolous Petitions) के माध्यम से देश की न्यायप्रणाली का कीमती समय बर्बाद करने के कारण महमूद प्राचा को कोर्ट से कई बार भारी अपमान और फटकार झेलनी पड़ी है।
दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की सुनवाई के दौरान कड़कड़डूमा कोर्ट समेत विभिन्न निचली व उच्च अदालतों ने प्राचा की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए थे और दंगों के आरोपितों को बचाने के लिए अदालत का समय नष्ट करने पर उसे सख्त चेतावनी दी थी।
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी महमूद प्राचा की याचिकाओं के पीछे की मंशा पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए उस पर ₹1 लाख का भारी जुर्माना ठोका था। प्राचा ने एक ही विषय और समान तथ्यों पर बार-बार बेतुकी और निरर्थक जनहित याचिकाएँ दाखिल कर अदालत का वक्त खराब करने का प्रयास किया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की पीठ ने सख्त लहजे में सवाल उठाया था कि जब याचिका के मुख्य विषय का समाधान पहले ही हो चुका है, तो बार-बार एक ही तरह की याचिकाएँ लाकर अदालत को गुमराह करने और सुर्खियाँ बटोड़ने की कोशिश क्यों की जा रही है?
हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस ₹1 लाख के जुर्माने के भुगतान पर अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी प्राचा की कानूनी पैंतरेबाजी, अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग और न्यायिक व्यवस्था को अटकाने की उनकी नीयत को पूरी तरह उजागर करती है।
कानूनी पेशे का राजनीतिक व वैचारिक इस्तेमाल
एक अधिवक्ता का प्राथमिक कर्तव्य अपने मुवक्किल को निष्पक्ष कानूनी सहायता प्रदान करना और संविधान की मर्यादा का पालन करना होता है। लेकिन महमूद प्राचा के पूरे करियर का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उसने वकालत के पेशे को अपने निजी, वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक माध्यम बना लिया है।
दालतों के भीतर प्रक्रियात्मक अड़ंगे लगाना और अदालतों के बाहर मीडिया व सोशल मीडिया पर आकर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ नफरती बयान देना प्राचा की कार्यशैली का मुख्य हिस्सा बन चुका है।
जब भी पुलिस या जाँच एजेंसियाँ उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करती हैं, तो वह तुरंत इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ और वकीलों की आजादी पर हमला बताकर शोर मचाने लगता है। उसका यह दोहरा मापदंड न केवल वकालत के पेशे की गरिमा को गिराता है, बल्कि समाज में कानून के शासन (Rule of Law) के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।
महमूद प्राचा का पूरा राजनीतिक व कानूनी घटनाक्रम और साक्षात्कारों में उसके लगातार आक्रामक होते बयान यह स्पष्ट करते हैं कि वह कानून के दायरे में रहकर अपने मुवक्किलों को न्याय दिलाने के बजाय, कानूनी व्यवस्था की आड़ लेकर अपने राजनीतिक, साम्प्रदायिक और वैचारिक एजेंडे को साधने का प्रयास करता रहा है।
एक तरफ जहाँ वह यूट्यूब साक्षात्कारों में देश के संवैधानिक प्रमुखों, चुनाव प्रणाली, मीडिया और सुप्रीम कोर्ट पर बिना किसी साक्ष्य के संगीन और नफरती आरोप लगाता है, वहीं दूसरी तरफ उसका अपना रिकॉर्ड जाली दस्तावेजों, मृत व्यक्ति के फर्जी दस्तखत, अदालतों की भारी फटकार और समाज में साम्प्रदायिक तनाव भड़काने वाले बयानों से भरा हुआ है।
अधिकारों और संविधान की आड़ लेने वाला यह चेहरा खुद देश के कानून, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियाँ उड़ाने में सबसे आगे रहा है।


