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क्रिकेट या दावत-ए-जिहाद? मैदान में इस्लामी विक्टिमहुड घुसाने की साजिश

क्रिकेट मूलतः बल्ला और गेंद का खेल है। टाइमिंग, लाइन-लेंथ और अनुशासन का अनुशासित संघर्ष। यह खेल टीमों की प्रतिस्पर्धा और खेल भावना से गढ़ा जाता है, न कि व्यक्तिगत आस्था के प्रदर्शन से।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट के इसी मैदान को मजहबी अखाड़े में बदलने के सुनियोजित प्रयास दिखाई दे रहे हैं। पिच से लेकर ड्रेसिंग रूम तक इस्लामी एजेंडा और मुस्लिम विक्टिम कार्ड की घुसपैठ कराई जा रही है। यह बदलाव संयोग नहीं, एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा का संन्यास की घोषणा करते हुए यह कहना कि ‘पाकिस्तानी मुस्लिम होने के कारण उनके साथ दोहरा बर्ताव हुआ’, या जम्मू-कश्मीर चैंपियंस लीग में फुरकान भट का हेलमेट पर फिलिस्तीन का झंडा लगाकर मैदान में उतरना- ये घटनाएँ किसी निजी ‘स्टेटमेंट’ की श्रेणी में नहीं आतीं। ये क्रिकेट के मंच का उपयोग कर इस्लामी विक्टिमहुड, राजनीतिक इस्लाम और मजहबी एजेंडे को सामान्य बनाने की कोशिशें हैं। यहाँ खेल माध्यम है, संदेश कुछ और।

जिन्हें क्रिकेट की बुनियादी समझ है, वे जानते हैं कि उस्मान ख्वाजा कोई साधारण खिलाड़ी नहीं रहे। एक दशक से अधिक का अंतरराष्ट्रीय करियर, ऑस्ट्रेलिया के लिए 87 टेस्ट, कप्तानी की चर्चाएँ- इस पूरी यात्रा में न उनका मुस्लिम होना बाधक बना, न इस्लामाबाद में जन्म लेना।

डॉन ब्रैडमैन इसलिए महान नहीं हुए कि वे चर्च में प्रार्थना करते थे। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के भगवान इसलिए नहीं बने कि वे संत ​सत्य साईं बाबा के भक्त थे। वसीम अकरम की प्रतिष्ठा नमाज से नहीं, स्विंग से बनी। विराट कोहली की पहचान प्रेमानंद महाराज के आश्रम में जाने से नहीं, कवर ड्राइव से है।

दुनिया इन सबको उनके क्रिकेटीय कौशल के लिए जानती है, उनकी निजी आस्था के लिए नहीं। इन सबकी आस्था व्यक्तिगत है, मैदान से बाहर है। लेकिन जाते-जाते उस्मान ख्वाजा ने क्रिकेट को पीछे धकेलकर पाकिस्तान और इस्लाम को आगे कर दिया। यह केवल खेल भावना का अपमान नहीं है, उस खेल की हत्या है जिसने उन्हें वह मंच दिया, जहाँ से वे यह बयान दे सके।

उस्मान ख्वाजा और फुरकान भट उस प्रवृत्ति की कड़ियाँ हैं जिसे सबसे पहले, सबसे खुलकर पाकिस्तानी क्रिकेट ने बढ़ावा दिया। मैच के दौरान नमाज, कैमरे के सामने मजहबी संकेत, जीत को ‘अल्लाह की देन’ बताने की अनिवार्यता- हर बार इसे ‘व्यक्तिगत आस्था’ कहकर बचाने की कोशिश की गई।

लेकिन जब यह बार-बार, योजनाबद्ध और कैमरा-फ्रेंडली ढंग से हो, तो वह निजी नहीं रह जाता। वह संदेश बन जाता है। वही संदेश फुरकान भट जैसे नवोदित खिलाड़ियों को प्रेरित करता है कि क्रिकेटीय पहचान से पहले मजहबी पहचान स्थापित की जाए।

हमने जर्सी पर ‘Victory belongs to Allah’ जैसे संदेश देखे हैं। यह खेल की भाषा को एक विशेष मजहब की शब्दावली में ढालने का प्रयास है। यही भाषा पाकिस्तानी खिलाड़ियों की मैच के बाद प्रस्तुतियों में सुनाई देती है, टीवी स्टूडियो में दोहराई जाती है। याद करिए क्रिकेट विश्लेषण के बीच आपने कितनी बार यूसुफ योहाना के मोहम्मद यूसुफ बनने को ‘टर्निंग पॉइंट’ के रूप में सुना है? सईद अनवर के कवर ड्राइव से अधिक उनके मौलवी बनने के बाद आए कथित ‘चमत्कारों’ पर चर्चाएँ सुनी हैं?

2014 का वह वीडियो भी याद कीजिए, जब पाकिस्तानी क्रिकेटर अहमद शहजाद श्रीलंकाई खिलाड़ी तिलकरत्ने दिलशान से यह कहते पाए गए कि अगर आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो जीवन में कुछ भी करें, अंततः जन्नत तय है। यह साथी क्रिकेटर से संवाद नहीं था। यह एक मजहबी दखल था।

ICC ने कुछ मामलों में चेतावनियाँ दीं, लेकिन वह घुसपैठ रोकने में विफल रही है। दानिश कनेरिया का प्रकरण बताता है कि यह जहर मैदान से बाहर निकलकर ड्रेसिंग रूम तक पहुँच चुका है। उन्होंने खुलकर बताया कि कैसे धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें अलग-थलग किया गया, धर्मांतरण का दबाव डाला गया। यह किसी एक खिलाड़ी की पीड़ा नहीं, उस मानसिकता का प्रमाण है जहाँ ‘टीम’ से पहले ‘मजहब’ आता है।

यहाँ प्रश्न आस्था का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या क्रिकेट टीम किसी मजहबी एजेंडे का विस्तार है? यदि नहीं, तो यह दबाव क्यों?

उस्मान ख्वाजा का बयान इसी प्रवृत्ति का अगला चरण है। जब उम्र, फिटनेस और अनुशासन पर सवाल उठें, तो मजहब को ढाल बना लो। पाकिस्तान इस कला में पारंगत है। वर्षों से वह अपनी असफलताओं को ‘साज़िश’, आलोचना को ‘ईमान-विरोध’ और अनुशासन को ‘आस्था का दमन’ बताकर टालता आया है।

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट विशुद्ध जेंटलमैन गेम है। उसने कई विवाद देखे हैं। जैसे केरी पैकर सीरीज, मैच-फिक्सिंग, मंकीगेट…। लेकिन मजहब कभी एजेंडा नहीं बना। जब मजहब एजेंडा बन जाता है, तब खेल की तटस्थता समाप्त हो जाती है। टीम-स्पिरिट टूटती है। साझा लक्ष्य की जगह साझा मजहब हावी हो जाता है। अनुशासन ढीला पड़ता है और दर्शकों का भरोसा गिरता है।

इसका समाधान स्पष्ट और कठोर होना चाहिए। मैदान पर किसी भी राजनीतिक-मजहबी प्रदर्शन को पूर्णतः अस्वीकार्य घोषित किया जाए। ड्रेसिंग रूम में मजहबी दबाव पाए जाने पर पूरी टीम को दंडित किया जाए। आवश्यकता पड़े तो उस देश को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से प्रतिबंधित किया जाए।

स्मरण रहे क्रिकेट सभ्यताओं को जोड़ने का खेल है। उन्हें विभाजित करने का मैदान नहीं। जब खिलाड़ी जर्सी से पहले एजेंडा पहनने लगें, तो खेल हारता है। दर्शक हारते हैं।

आवश्यक है कि क्रिकेट को क्रिकेट रहने दिया जाए। इस्लाम के बोझ से मुक्त। ऐसा नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं, जब मैदान पर बल्ला–गेंद नहीं, विचारधाराएँ टकराएँगी।

‘तिलक लगाने पर मुस्लिम देते हैं धमकी, बहन-बेटियों के आगे पैंट उतारते हैं’: गुजरात के साणंद में हिंदुओं ने OpIndia को सुनाई आपबीती, बताया- मस्जिद के सामने से नहीं निकल पाती बारात

अहमदाबाद के साणंद तहसील के कलाणा गाँव में हिंदुओं के साथ हो रही घटनाओं को लेकर कई बातें सामने आ रही हैं। यहाँ के पीड़ित हिंदुओं ने ऑपइंडिया के सामने अपना दर्द बयाँ किया है और आरोप लगाया है कि गाँव के ही कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी उन्हें बार-बार प्रताड़ित कर रहे हैं। स्थानीय महिलाओं ने बताया कि ये कट्टरपंथी उन्हें न तो त्योहार मनाने देते हैं और न ही मस्जिद के सामने से बारात (वरघोड़ा) निकालने देते हैं।

इस पूरी घटना में जिस पर सबसे पहला हमला हुआ, वह एक हिंदू नाबालिग लड़का है। हमले में उसके पिता भी घायल हो गए थे। अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि उनके बेटे ने बांग्लादेश में हुई दीपू दास की हत्या को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उसने न्याय की माँग की थी। आरोप है कि इस पोस्ट को देखने के बाद स्थानीय मुस्लिम भड़क गए और धमकी देने लगे कि जो बांग्लादेश में हुआ, वही हाल यहाँ भी करेंगे।

बहन-बेटियों से अश्लील हरकतें- पीड़ित महिलाएँ

पीड़ित हिंदू महिलाओं ने रोते-रोते ऑपइंडिया को अपनी आपबीती सुनाई और बताया कि किस तरह मुस्लिम कट्टरपंथी उन्हें लंबे समय से परेशान कर रहे हैं। महिलाओं का आरोप है कि पिछले 12 महीनों से गाँव के कुछ मुस्लिम युवक उन्हें तंग कर रहे हैं। हिंदू बच्चों को माथे पर तिलक लगाने को लेकर धमकियाँ दी जाती हैं और गाँव में कोई भी हिंदू त्योहार या उत्सव शांति से नहीं मनाने दिया जाता।

एक अन्य महिला ने अपना दर्द बयाँ करते हुए कहा, “जब भी हिंदू महिलाएँ या बेटियाँ वहां से गुजरती हैं, तो मुस्लिम युवक सरेआम उनके सामने अपनी पैंट खोलकर खड़े हो जाते हैं।” महिलाओं ने दावा किया कि पिछले काफी समय से कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम हिंदू बहन-बेटियों के सामने अश्लील हरकतें कर रहे हैं और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।

हिंदू बच्चों को तिलक लगाने पर धमकियाँ

महिलाओं ने आगे बताया कि स्थानीय मुस्लिम युवक छोटे बच्चों को भी निशाना बना रहे हैं और माथे पर तिलक लगाने पर उन्हें धमकियाँ देते हैं। वे हमें हिंदू त्योहार भी नहीं मनाने देते। एक महिला ने आरोप लगाया कि जब उनके पति या घर के अन्य सदस्य नौकरी से वापस लौट रहे होते हैं, तब भी उनके साथ मारपीट की जाती है। साथ ही, जब भी हिंदू बहन-बेटियाँ बाहर निकलती हैं, तो उनके साथ अश्लील इशारे किए जाते हैं।

महिलाओं ने बार-बार न्याय की माँग की है और गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी से इस घटना पर ध्यान देने की अपील की है। एक अन्य महिला ने ठाकोर समाज के नेता अल्पेश ठाकोर पर भी सवाल उठाए हैं। महिलाओं का दावा है कि हर बार हिंदुओं को ही प्रताड़ित किया जाता है और बिना किसी वजह के उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।

सुनियोजित साजिश: मस्जिद के सामने बारात निकालने पर पाबंदी

ऑपइंडिया से बात करते हुए महिलाओं ने इस पूरी घटना के पीछे किसी गहरी साजिश का शक जताया है। उनका दावा है कि यह हमला अचानक नहीं हुआ, बल्कि एक सोची-समझी प्लानिंग थी। पत्थरबाजी का जिक्र करते हुए एक महिला ने तर्क दिया कि एक ही दिन में इतने सारे पत्थर इकट्ठा होना मुमकिन नहीं है, इसके लिए कम से कम 10 दिन पहले से तैयारी की गई होगी। उन्होंने बताया कि वे सुबह उठकर अपनी रोजाना की दिनचर्या (चाय-पानी) में लगे ही थे कि अचानक चारों तरफ से पत्थर बरसने शुरू हो गए।

इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया है कि गाँव में जब भी किसी हिंदू परिवार में शादी-ब्याह का मौका होता है, तो बार-बार हंगामा खड़ा किया जाता है और मस्जिद के सामने से बारात निकालने के लिए साफ मना कर दिया जाता है। महिलाओं ने अपना दुख जताते हुए कहा कि कट्टरपंथी शादी के समय न तो बारात निकलने देते हैं और ऊपर से धमकियाँ भी देते हैं।

इसके अलावा भी महिलाओं ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं और इंसाफ की गुहार लगाई है। फिलहाल पुलिस इस पूरे मामले की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई में जुटी है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरी घटना सोमवार (29 दिसंबर 2025) की रात को हुई थी, जिसके बाद मंगलवार (30 दिसंबर 2025) की सुबह भी जमकर पत्थरबाजी हुई। हालात बिगड़ते देख पुलिस की भारी फौज गाँव में पहुँच गई और पूरे इलाके की तलाशी (कॉम्बिंग) शुरू कर दी। दूसरी तरफ, पुलिस की कार्रवाई के डर से आरोपित अपने घर छोड़कर खेतों में भाग गए, जिन्हें पुलिस ने ड्रोन की मदद से ढूँढ-ढूँढकर गिरफ्तार किया।

एक हिंदू नाबालिग की शिकायत पर पुलिस ने शाहरुख समेत 22 मुस्लिम युवकों के खिलाफ FIR दर्ज की है। इस शिकायत के आधार पर साणंद GIDC पुलिस स्टेशन में आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब तक 42 लोगों को हिरासत में ले लिया है और आगे की जाँच जारी है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

‘भूल गए… SI संतोष को हमने ही जलाया था’: बांग्लादेश में कट्टरपंथी पुलिस के सामने फख्र से कबूल रहे हिंदुओं को मारने की बात, क्या डेढ़ साल में यही बदलाव लाई है युनूस सरकार?

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा एक बार फिर अपने सबसे भयावह और शर्मनाक चेहरे के साथ सामने आई है और इस बार वह चेहरा कैमरे के सामने है, बेखौफ है और बेशर्मी से भरा हुआ है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, यह कोई अफवाह या आरोप नहीं बल्कि खुद अपराधी का खुला इकरार है। एक युवक, बिना किसी डर या पछतावे के यह दावा करता है कि उसने एक हिंदू पुलिस अधिकारी को जिंदा जला दिया। और यह सब वह कहाँ बैठकर कह रहा है? एक पुलिस थाने के भीतर। उसकी आँखों में न डर है, न पछतावा सिर्फ घमंड है। सत्ता का घमंड और सिस्टम की सड़ांध से मिला हुआ संरक्षण।

इस वीडियो के सामने आने के बाद सिर्फ गुस्सा नहीं बल्कि कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। जब कोई व्यक्ति पुलिस स्टेशन के अंदर बैठकर हत्या का ऐलान कर सकता है, तो यह सवाल लाजमी है क्या बांग्लादेश में कानून है या युनूस के संरक्षण में कट्टरपंथियों ने हिंदुओं की तरह उसे भी जला दिया है।

वायरल वीडियो में क्या कहा गया है?

वीडियो में दिख रहा युवक खुद को बांग्लादेश के हबीगंज जिले का छात्र नेता बताता है। वह पुलिस अधिकारियों को सीधे धमकी देता हुआ नजर आता है। वह कहता है कि जरूरत पड़ी तो पुलिस स्टेशन को दोबारा जला दिया जाएगा।

सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आती है जब वह यह कहता है कि जुलाई 2024 के आंदोलन के दौरान उन्होंने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी और एक हिंदू सब-इंस्पेक्टर को जिंदा जला दिया था। वह यह बात ऐसे कहता है, जैसे किसी बहादुरी के काम का जिक्र कर रहा हो।

यह बयान बताता है कि कुछ कट्टरपंथी तत्वों में कानून का कोई डर नहीं बचा है और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को वे गर्व की बात मानते हैं।

सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू की दर्दनाक हत्या

वीडियो में जिस पुलिस अधिकारी का जिक्र किया गया है, वे थे सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू। अगस्त 2024 में उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उस समय बांग्लादेश में राजनीतिक हालात बेहद तनावपूर्ण थे और पूरे देश में अशांति फैली हुई थी।

हबीगंज जिले के बनियाचोंग थाना क्षेत्र में पहले एक हिंसक भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया। हालात बिगड़ने पर पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी, जिसमें कुछ लोगों की मौत हो गई। इसके बाद माहौल और ज्यादा खराब हो गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रात के समय भीड़ फिर से पुलिस स्टेशन पहुँची। बताया जाता है कि जब फौज मौके पर आई, तो भीड़ ने एक खौफनाक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि बाकी सभी पुलिसकर्मियों को छोड़ दिया जाएगा लेकिन संतोष भाभू को उनके हवाले किया जाए।

करीब ढाई बजे रात में संतोष भाभू को भीड़ के सामने कर दिया गया और उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया। उनकी मौत के बाद भी उनका शव लंबे समय तक सड़क पर पड़ा रहा। यह घटना पूरे देश के लिए शर्मनाक थी।

हबीगंज जिला और वहाँ के हिंदू

हबीगंज जिला बांग्लादेश का मुस्लिम बहुल इलाका है। यहाँ लगभग 84 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं जबकि हिंदू आबादी करीब 16 प्रतिशत है। संख्या में कम होने के कारण हिंदू अक्सर खुद को असुरक्षित महसूस करता है।

इस जिले में हिंदू कई पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं लेकिन हर बार जब राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले हिंसा का शिकार वही बनते हैं। मंदिरों पर हमले, घर जलाना और लोगों को पीटना जैसी घटनाएँ यहाँ पहले भी सामने आती रही हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की बात नई नहीं

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा कोई नई बात नहीं है। बीते कई वर्षों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। कभी मंदिर तोड़े जाते हैं, कभी हिंदुओं के घर जलाए जाते हैं और कभी भीड़ उन्हें पीट-पीटकर मार डालती है।

कई बार मामूली से बहाने बनाकर हिंसा भड़का दी जाती है। कभी किसी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर, कभी चुनाव के समय और कभी धार्मिक पहचान के कारण हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है। हर बार जाँच के आदेश दिए जाते हैं लेकिन हालात ज्यादा नहीं बदलते।

गौरतलब है कि इससे पहले ऑपइंडिया ने ऐसे 9 निर्दोष हिंदुओं की हत्या के मामलों की रिपोर्ट प्रस्तुत कर बताया था कि सिर्फ एक महीने में किस तरह बांग्लादेश में कुल 9 हिंदुओं को निशाना बनाया गया। कभी दीपू दास तो कभी शांतो दास और जोगेश चंद्र रॉय जैसे लोगों को कट्टरपंथी निशाना बनाते रहे हैं।

इस्लामी भीड़ इन निर्दोष हिंदुओं की हत्या कर नारे लगाती है और पेट्रोल डाल कर जलाते हुए अपनी क्रूरता का जश्न मनाती है। इनके पास ऐसी हिंसा का कोई कारण ना भी हो तो ये ईशनिंदा जैसे झूठे आरोप लगाकर अपनी कट्टरता साबित करने उतर जाते हैं।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

इस वायरल वीडियो के सामने आने के बाद मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब कोई व्यक्ति खुलेआम हत्या की बात करता है और उसे कोई डर नहीं होता, तो यह देश की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सोशल मीडिया पर लोग माँग कर रहे हैं कि वीडियो में दिख रहे युवक के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बांग्लादेश में हिंदुओं की हालत और खराब हो सकती है।

सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू की हत्या और उस पर गर्व करता वायरल वीडियो यह दिखाता है कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक कितनी कठिन स्थिति में हैं। यह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस डर और असुरक्षा की तस्वीर है, जिसमें वहाँ का हिंदू जी रहा है।

नक्सलवाद मुक्त भारत, भय मुक्त भारत: ‘लाल आतंक’ के गर्त से निकलकर शिक्षा-रोजगार-विकास से जुड़ रहा जनजातीय समाज

यह दौर भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक चेतना को वर्षों की मानसिक गुलामी और गुमनाम भय से मुक्त करने का है। विगत एक दशक में राष्ट्र की उत्तरोत्तर प्रगति को देखकर कभी–कभी मुझे लगता है कि सही मायनों में भारत 1947 में नहीं, अपितु 2014 में स्वतंत्र हुआ है। देश की महनीय जनता ने 2014 में अपनी बागडोर संघ, सनातन और संस्कृति के प्रति श्रद्धा और भारत की प्रतिष्ठा को समृद्ध करने वाली पार्टी भाजपा के हाथ में सौंपकर इस नए भारत का सूत्रपात कर दिया है।

65 वर्ष की जो आधी और तथाकथित स्वतंत्रता हमें मिली थी, उसके साथ विभाजन की त्रासदी, अखंडित भारत और बौद्धिकता के नाम पर आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद का भय भी मिला। हम स्वतंत्र हुए लेकिन हमारी आत्मा किसी बंधन में थी। वर्तमान सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने सबसे पहले ऐसे निर्णय लेने का साहस दिखाया, जिससे हम स्वतंत्रता की सोंधी महक को अनुभव कर सकें।

आजादी का अमृत महोत्सव, जी–20 में भारतीय नेतृत्व, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, नशामुक्त भारत, तीन तलाक की मुक्ति, सर्जिकल स्ट्राइक, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, CAA, ऑपरेशन सिंदूर, आत्मनिर्भर भारत, सबका साथ सबका विकास, भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा जैसे तमाम विचार इस देश की जनता को पहली बार सुनने-देखने को मिले। इसके साथ ही नई भारतीय न्याय संहिता में समाज हित के लिए कुछ सांविधिक परिवर्तन जैसे कदम उठाकर सरकार ने भारत की न्याय व्यवस्था को और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।  

इसी क्रम में, नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आरंभ हुआ। उनका यह विचार मुझे राजनीतिक समीकरण से अधिक सुरक्षा बलों के उन हजारों योद्धाओं और अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे आम जनता की आत्मा की शांति के हवन जैसा लगा, जिन्हें नक्सलवादियों द्वारा बेरहमी से मार दिया गया था। हमने वह भयानक दौर भी देखा है, जब वामपंथियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वनवासी समाज की भोली-भाली जनता को इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम पकड़ानी थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए गए, जिन्हें किताबें देनी थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के कांटे बो दिए गए।

यह कितना सुखद है कि आज भारत उसी वनवासी समाज के एक गुमनाम नायक बिरसा मुंडा की जयंती को वैश्विक आधार देते हुए उन्हें ‘भगवान बिरसा मुंडा’ की उपाधि से विभूषित कर रहा है। वर्षों तक विकास के नाम पर जिस समाज को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित करके रखा गया, आज सरकार उनके अधिकार के लिए नियम बना रही है। वर्तमान सरकार के गठन को एक दशक बीत चुका है। आतंकवाद और नक्सलवाद की जड़े हिलने लगी हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने भारत को नक्सलवाद मुक्त करने का संकल्प लेकर उपेक्षित जनता को भी विकसित भारत के विजन से जोड़ दिया है।

विकसित भारत की जो संकल्पना इस देश ने की है, गृहमंत्री ने उससे भी सुंदर, सशक्त और समर्थ भारत देने का प्रण लिया है। नक्सलमुक्त भारत का भाव इतना पावन है कि उसकी सिद्धि होनी निश्चित है। आप सोचिए कि कैसा देश बनाया जा रहा था, जहाँ सत्ता में बने रहने के लिए अपने ही राष्ट्र के कुछ हिस्से को संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर नक्सलवादी बना दिया गया। जिस समाज को बराबर की हिस्सेदारी मिलनी थी, उसे उपेक्षा मिली। यह पहली बार हुआ, जब देश के प्रथम नागारिक और राष्ट्र के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर एक वनवासी महिला को बैठने का अवसर मिला।

यह भी पहली बार हुआ जब प्रधान मंत्री और गृह मंत्री ने नक्सलवाद प्रभावित लोगों को उस गर्त से निकाल कर उन्हें शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ा और उनसे निरंतर सार्थक संवाद किया। गृह मंत्री ने स्वयं उनके बीच जाकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हुए, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की। 

भाजपा और संघ की मूल भावना में सेवा, समर्पण और त्याग है। इसी के माध्यम से भारत सुशासन की बुनियाद तैयार करने में सफल हुआ है। प्रधानमंत्री ने वामपंथ के वैचारिक उग्रवाद से देश को मुक्त करने के लिए नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान आरंभ कर दिया है जिसे गृह मंत्री द्वारा विस्तार कर दिया जा रहा है। यह समझना बहुत आवश्यक है कि नक्सलवाद से मुक्ति का अभियान किसी विचारधारा का एजेंडा नहीं, बल्कि सुशासन द्वारा समाज में हिंसा, निरंकुशता को समाप्त करने का प्रण है।  एक दशक पूर्व नक्सलवाद, आतंकवाद की जो घटनाएँ प्रतिदिन हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी थी, वो पिछले एक दशक में लगभग 60 प्रतिशत कम हुईं हैं।

वामपंथियों द्वारा संरक्षित और पोषित उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका था, जो नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़े जमाए हुए था। भारत के वनवासी क्षेत्रों में, मुख्यत: छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में इनकी गतिविधियाँ निरंतर भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं। गृह मंत्रालय के एक आँकड़े के अनुसार, 2013 में जहाँ लगभग 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वह वर्तमान में 10 के आस-पास रह गई है। गृह मंत्री के द्वारा इन्हें भी 31 मार्च 2026 तक समूल खत्म करने का लक्ष्य तय कर दिया गया है। 

बीते छह महीनों के आँकड़ों को ही यदि देखा जाय, तो नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में सबसे निर्णायक बात यह रही कि सुरक्षा बलों ने सीधे नक्सली नेतृत्व को निशाना बनाया है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के घने जंगलों में चले अभियानों में मोदम बालकृष्ण उर्फ बाला कृष्णा, दंडकारण्य और आंध्र-ओडिशा क्षेत्र में आतंक का पर्याय रहे कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ उसेंडी विकल्प, शीर्ष सैन्य रणनीतिकार माने जाने वाले कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा और लंबे समय से वांछित नक्सली कमांडर गणेश उइके को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ों में मार गिराया।

इनके अलावा बीजापुर, नारायणपुर और अबूझमाड़ जैसे इलाकों में हुए बड़े ऑपरेशनों में कई सशस्त्र नक्सली ढेर किए गए, जिससे नक्सलियों के संगठन की फील्ड कमांड, हथियार नेटवर्क और मनोवैज्ञानिक बढ़त पूरी तरह टूट गई। इन्हें निष्क्रिय करके गृह मंत्री ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि अब नक्सलवाद के लिए भारत की धरती पर न तो सुरक्षित ठिकाने हैं और न ही नेतृत्व का संरक्षण है।

गृह मंत्री ने एक तरफ जहाँ नक्सलवाद ग्रस्त समाज के लोगों को उससे मुक्त होकर जीने का अवसर दिया, वहीं दूसरी तरफ उनके वैचारिक समर्थकों को चुनौती भी। एक नागरिक के रूप में हम सभी गृह मंत्री के दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति की भावना को जानते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अमित शाह के नेतृत्व में यह देश नक्सलवाद से मुक्त होकर भयमुक्त भारत बनेगा।

संगम तीरे फिर से ‘आस्था का महाकुंभ’, जानिए क्या है प्रयागराज माघ मेला का माहात्म्य, कल्पवास रहस्य क्या है: योगी सरकार ने दी दिव्यता-भव्यता-नव्यता

नए साल की शुरुआत के साथ ही संगम नगरी प्रयागराज एक बार फिर आस्था के महासागर में डूबने को तैयार है। 3 जनवरी 2026 से शुरू होकर 15 फरवरी 2026 तक चलने वाला माघ मेला 2026 लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहा है। महाकुंभ 2025 की भव्य सफलता के बाद यह माघ मेला उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए एक और बड़ी परीक्षा है।

योगी सरकार ने इसे महाकुंभ मॉडल पर आयोजित करने का फैसला किया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और दिव्य अनुभव मिल सके। अनुमान है कि इस बार 12 से 15 करोड़ श्रद्धालु संगम में पवित्र डुबकी लगाने आएँगे।

माघ मेला कुंभ का छोटा रूप माना जाता है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व किसी से कम नहीं। त्रिवेणी संगम पर माघ मास में स्नान करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। यह मेला न केवल स्नान का पर्व है, बल्कि तप, संयम और आत्मशुद्धि का भी महोत्सव है।

माघ मेला का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में माघ मास को विशेष स्थान प्राप्त है। शास्त्रों के अनुसार, माघ में गंगा स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम दुनिया का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। यहाँ स्नान करने से व्यक्ति के सभी जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

माघ मेला हर साल आयोजित होता है, जबकि कुंभ हर 12 साल में और अर्धकुंभ हर 6 साल में। लेकिन महाकुंभ 2025 की सफलता के बाद यह माघ मेला विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। श्रद्धालु मानते हैं कि संगम पर माघ स्नान से आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में सुख-शांति आती है। यह पर्व संयम, दान और भक्ति का प्रतीक है।

कल्पवास: तपस्या की अनुपम परंपरा

माघ मेले का सबसे खास हिस्सा है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है कल्प (लंबे समय) तक वास करना। श्रद्धालु पौष पूर्णिमा (3 जनवरी 2026) से महाशिवरात्रि (15 फरवरी 2026) तक संगम तट पर टेंट में रहते हैं और कठोर तपस्या करते हैं।

कल्पवास के मुख्य नियम हैं

  • जमीन पर सोना, कुश के आसन पर।
  • दिन में एक बार सादा भोजन (फल, दूध, सात्विक आहार)।
  • ब्रह्मचर्य का पालन।
  • रोजाना संगम स्नान।
  • भजन-कीर्तन, रामायण-महाभारत पाठ और ध्यान।

शास्त्रों में कहा गया है कि कल्पवास करने से व्यक्ति को 12 साल की तपस्या का फल एक साथ मिल जाता है। यह मोक्ष प्राप्ति का सीधा मार्ग माना जाता है। लाखों कल्पवासी संगम तट पर छोटे-छोटे टेंट लगाकर रहते हैं और पूरी अवधि सादगी से बिताते हैं।

2026 में प्रमुख स्नान तिथियाँ

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर आयोजित माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं, जिनमें तीन अमृत स्नान (शाही स्नान) शामिल हैं। ये तिथियाँ हिंदू पंचांग के अनुसार निर्धारित हैं और प्रत्येक का विशेष धार्मिक महत्व है। शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में संगम स्नान से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा पूर्वजन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं (पद्म पुराण, प्रयाग माहात्म्य)।

इन दिनों लाखों-करोड़ों श्रद्धालु संगम तट पर एकत्र होते हैं, जहाँ पवित्र डुबकी के साथ भजन-कीर्तन, दान-पुण्य और तपस्या का वातावरण बनता है। अमृत स्नान के अवसर पर साधु-संतों के अखाड़ों की भव्य पेशवाई निकलती है, जिसमें हाथी-घोड़ों पर सवार नागा साधु, ध्वज-पताकाएँ और ढोल-नगाड़ों की गूँज देखते ही बनती है। यह दृश्य सनातन परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।

माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं। इनमें तीन अमृत स्नान सबसे महत्वपूर्ण हैं-

3 जनवरी 2026 (पौष पूर्णिमा): यह माघ मेले और कल्पवास की औपचारिक शुरुआत की तिथि है। पहला प्रमुख स्नान इसी दिन होता है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूर्ण कला में स्नान करने से मन की शुद्धि और आत्मिक शांति मिलती है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि पौष पूर्णिमा पर संगम स्नान से व्यक्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन कल्पवासी टेंट लगाकर तपस्या शुरू करते हैं और मेला क्षेत्र पूरी तरह जीवंत हो उठता है।

14 जनवरी 2026 (मकर संक्रांति): पहला अमृत स्नान इसी दिन होता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर यह पर्व मनाया जाता है, जिसे उत्तरायण का आरंभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन स्नान, दान और तिल गुड़ का सेवन विशेष पुण्यदायी है (महाभारत, अनुशासन पर्व)। अमृत स्नान में अखाड़ों की पेशवाई सबसे आकर्षक होती है- जूना अखाड़ा, निरंजनी, महानिर्वाणी आदि अखाड़े भव्य जुलूस के साथ संगम की ओर बढ़ते हैं। श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देकर स्नान करते हैं।

29 जनवरी 2026 (मौनी अमावस्या): माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व। इस दिन मौन व्रत रखकर स्नान करने की परंपरा है, जिससे इंद्रियों पर संयम और आत्मचिंतन होता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि मौनी अमावस्या पर प्रयाग स्नान से मोक्ष प्राप्ति का द्वार खुलता है और सभी पाप धुल जाते हैं। यह दिन मेले में सबसे अधिक भीड़ वाला होता है, क्योंकि इसे मुख्य स्नान माना जाता है। कल्पवासी विशेष रूप से इस तिथि का इंतजार करते हैं।

2 फरवरी 2026 (बसंत पंचमी): दूसरा अमृत स्नान। यह विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा का पर्व है। पीले वस्त्र धारण कर, सरस्वती पूजन और स्नान से बुद्धि-विवेक की प्राप्ति होती है। भागवत पुराण में वसंत पंचमी का महत्व वर्णित है। पेशवाई फिर से निकलती है और संगम तट पीले फूलों व वस्त्रों से सज जाता है।

12 फरवरी 2026 (माघ पूर्णिमा): तीसरा अमृत स्नान। माघ पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूर्ण शक्ति से स्नान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। विष्णु पुराण के अनुसार, इस दिन संगम स्नान से हजारों गोदान का फल मिलता है। अखाड़ों की अंतिम भव्य पेशवाई इस दिन होती है।

15 फरवरी 2026 (महाशिवरात्रि): अंतिम स्नान और मेले का समापन। भगवान शिव की आराधना के साथ स्नान से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिव पुराण में महाशिवरात्रि पर प्रयाग स्नान को परम पुण्यकारी बताया गया है।

योगी सरकार ने की है भव्य तैयारियाँ

महाकुंभ 2025 की ऐतिहासिक सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने माघ मेला 2026 को भी उसी स्तर पर आयोजित करने का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री योगी ने कई बार तैयारियों की समीक्षा की और सख्त निर्देश दिए थे कि 31 दिसंबर 2025 तक सभी व्यवस्थाएँ पूरी हो जाएँ, जोकि पूरी हो चुकी है।

मुख्य तैयारियाँ इस प्रकार हैं-

क्षेत्र विस्तार: मेला क्षेत्र को 800 हेक्टेयर तक बढ़ाया गया है। टेंट सिटी, सेक्टर और घाटों का निर्माण तेजी से हुआ।
सुरक्षा व्यवस्था: हजारों पुलिसकर्मी, सीसीटीवी, ड्रोन और एआई आधारित निगरानी। मुख्य स्नान पर VIP प्रोटोकॉल पूरी तरह समाप्त।
स्वच्छता और स्वास्थ्य: संगम तट पर गहरी सफाई, अस्थाई अस्पताल, एम्बुलेंस और डॉक्टरों की टीम।
यातायात और पार्किंग: विशेष ट्रेनें, बसें और पार्किंग व्यवस्था। ट्रैफिक डायवर्जन प्लान तैयार।
बिजली और पानी: पूरे क्षेत्र में 24 घंटे बिजली और स्वच्छ पेयजल।
पर्यटन सुविधाएँ: पहली बार 4 अस्थाई पर्यटन सूचना केंद्र, जहाँ गाइड और होटल की जानकारी मिलेगी।
बजट: शुरुआत में ही ₹42 करोड़ की स्वीकृत, साथ ही महाकुंभ के बचे बजट से अतिरिक्त व्यवस्थाएँ की गई हैं।

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि माघ मेला सनातन परंपरा का जीवंत रूप है। सरकार का लक्ष्य है कि हर श्रद्धालु को सुरक्षित और दिव्य अनुभव मिले।

माघ मेला के लिए भदोही की ज्ञानपुर जेल में बनाए गए खास कालीन (फोटो साभार: X_DM_Bhadohi)

योगी सरकार में हिंदू त्योहारों की भव्य परंपरा

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2017 से उत्तर प्रदेश में हिंदू त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को नई ऊँचाई मिली है। पहले ये पर्व साधारण और स्थानीय स्तर पर मनाए जाते थे, लेकिन अब वे विश्व स्तरीय, रिकॉर्ड बनाने वाले और करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाले हो गए हैं। सरकार का फोकस सनातन संस्कृति के सम्मान, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और स्वच्छता पर रहा है। इससे न केवल आस्था मजबूत हुई, बल्कि पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बढ़ावा मिला। यह परंपरा अब उत्तर प्रदेश की पहचान बन चुकी है।

आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों से समझते हैं कि कैसे ये आयोजन भव्य और दिव्य बने-

अयोध्या में दीपोत्सव की अनुपम छटा

दीपावली पर अयोध्या का दीपोत्सव अब विश्व प्रसिद्ध है। योगी सरकार ने इसे राम नगरी की आध्यात्मिक गरिमा से जोड़ा। हर साल सरयू तट पर लाखों दीये जलाए जाते हैं। 2025 में 26 लाख 17 हजार से अधिक दीयों से शहर रोशन हुआ, जिसने दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए- सबसे अधिक दीये जलाने और 2,128 वेदाचार्यों द्वारा सामूहिक सरयू आरती का।

यह आयोजन लेजर शो, रामलीला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा होता है। पहले जहाँ कुछ हजार दीये जलते थे, अब लाखों की संख्या और विश्व रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि सरकार ने सनातन परंपरा को कितनी भव्यता दी है।

महाकुंभ 2025: विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम

प्रयागराज में महाकुंभ 2025 ऐतिहासिक रहा। 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई, जो विश्व रिकॉर्ड है। योगी सरकार ने इसे सबसे सुरक्षित, स्वच्छ और व्यवस्थित बनाया। इस आयोजन से राज्य की अर्थव्यवस्था को 3.5 लाख करोड़ रुपए का अनुमानित लाभ मिला। पहले कुंभ मेले में व्यवस्थाएं सीमित होती थीं, लेकिन अब यह वैश्विक स्तर का दिव्य आयोजन बन चुका है।

महाकुंभ 2025 के दौरान श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से बरसाए गए थे फूल (फोटो साभार: X_SwachhKumbh)

काँवड़ यात्रा: आस्था में पुष्पवर्षा की बौछार

सावन में कांवड़ यात्रा को भव्य बनाया गया। मुख्यमंत्री योगी खुद हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा करते दिखे हैं और रूट का हवाई निरीक्षण करते हैं। 2025 में भी मेरठ-मुजफ्फरनगर मार्ग पर यह नजारा देखा गया। हजारों सीसीटीवी, प्रकाश व्यवस्था, पानी और सुरक्षा के इंतजाम से यात्रा सुगम हुई। पहले असुविधाओं की शिकायतें आती थीं, अब यह आस्था का सुरक्षित और दिव्य पर्व बन चुका है।

वाराणसी में देव दीपावली की रोशनी

कार्तिक पूर्णिमा पर काशी के घाट 25 लाख दीयों से जगमगाते हैं। 2025 में लेजर शो, ग्रीन आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसे और भव्य बनाया। मुख्यमंत्री योगी खुद भी क्रूज से देव दीपावली का भव्य नजारा देख चुके हैं। यह देवताओं की दिवाली के रूप में विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो रही है।

यह परंपरा सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक है। माघ मेला 2026 भी इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो महाकुंभ मॉडल पर आयोजित हो रहा है। प्रयागराज एक बार फिर विश्व को संदेश देगा कि भारत की आस्था और संस्कृति अमर है।

‘स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल) की मूर्ति लग सकती है तो नायकों की क्यों नहीं?’: 1000+ अंग्रेजों को धूल चटाने वाले कल्लर योद्धाओं के बनेंगे स्मारक, जानिए मद्रास HC ने फैसले में क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने शुक्रवार (26 दिसंबर 2025) को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1755 के नथम कनवै युद्ध (Natham Kanvai Battle) की याद में स्मारक बनाने का रास्ता साफ कर दिया। जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने वकील शिवा कलैमणि अंबलम की याचिका पर यह फैसला दिया।

याचिकाकर्ता थन्नारसु कल्लर नाडु चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी भी हैं। उन्होंने डिंडीगुल जिले के नथम तालुक के पुथुर गाँव में अपनी निजी पट्टा भूमि पर स्तूप बनाने की अनुमति माँगी थी, जिसे तहसीलदार ने पहले खारिज कर दिया था।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अगर स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल, जिसकी जेल में ही मौत हुई) का स्मारक बनाया जा सकता है, तो आजादी के नायकों का क्यों नहीं? हाई कोर्ट ने साफ कहा कि आजादी के नायकों का स्मारक बनाने के लिए किसी अनुमति की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए।

18वीं सदी के युद्ध से लेकर शतरंज चैंपियनशिप तक: सफलता से और सफलता मिलती है

कोर्ट ने फैसले में कहा, “सफलता के कई पिता होते हैं, जबकि असफलता अनाथ होती है। सफलता आगे और अधिक सफलताओं को जन्म देती है, यह प्रेरणा और उत्साह पैदा करती है तथा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती है। इसी कारण सफलता का उत्सव मनाना आवश्यक है।”

कोर्ट ने भारत की शतरंज में अभूतपूर्व उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए एक रोचक तुलना पेश की और चेन्नई को देश की शतरंज राजधानी के रूप में स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु से निकलने वाले असाधारण शतरंज खिलाड़ी आज वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु अब इस खेल के कई सुपरस्टार खिलाड़ियों का घर बन चुका है। वर्तमान विश्व चैंपियन गुकेश डोम्माराजू चेन्नई के रहने वाले हैं। इसके अलावा आर प्रज्ञानानंदा, वैशाली रमेशबाबू, प्रणेश, इलमपार्थी, अरविंद चितंबरम जैसे उच्च एलो रेटिंग वाले कई ग्रैंडमास्टर भी इसी राज्य से आते हैं। कोर्ट ने प्रसिद्ध शतरंज ग्रैंडमास्टर आर बी रमेश का भी उल्लेख किया, जिन्होंने चेन्नई में चेस गुरुकुल की स्थापना की और प्रज्ञानानंदा तथा भारत सुब्रमणियम सहित भारत के कई अंतरराष्ट्रीय शतरंज चैंपियनों को तैयार किया।

कोर्ट ने इस सफलता का श्रेय शतरंज की महान हस्ती विश्वनाथन आनंद को देते हुए कहा कि यह सब एक व्यक्ति की जीतों के कारण संभव हो सका। जज ने स्पष्ट किया कि सफलता आगे और अधिक सफलताओं को जन्म देती है, यह प्रेरणा और उत्साह पैदा करती है तथा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती है। इसी कारण सफलता का उत्सव मनाना आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि इसी भावना के तहत भारत सरकार हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाती है, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की जीत का प्रतीक है। कोर्ट के अनुसार, भारत के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ जीत या शत्रु से टकराने के प्रयासों ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

स्वतंत्रता में तमिलनाडु की भूमिका

इसके बाद कोर्ट ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तमिलनाडु की अहम भूमिका की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह 1857 से भी बहुत पहले इसी धरती से शुरू हुआ था।

कोर्ट ने कहा, “तमिलनाडु का स्वतंत्रता आंदोलन में अद्वितीय योगदान रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में नहीं, बल्कि उससे कहीं पहले तमिल भूमि से शुरू हुआ था। इसके कई उदाहरण दिए जाते हैं। यह कोर्ट इन ऐतिहासिक विवादों में जाने में सक्षम नहीं है, लेकिन यह न्यायिक संज्ञान ले सकती है कि मदुरै क्षेत्र में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर मिली थी।”

कोर्ट ने कहा कि इस संदर्भ में कई नाम याद आते हैं, जिनमें मरुदु बंधु, वेलुनाचियार, पुली थेवर, कट्टाबोम्मन, ऊमैथुरै, वलुक्कुवेली अंबलम सहित अनेक वीर योद्धा शामिल हैं और यह सूची और भी लंबी है। जज ने जोर देकर कहा कि जिन युद्धों में देशी लोगों ने औपनिवेशिक सेना को पराजित किया, उनका उत्सव मनाना उतना ही आवश्यक है, जितना उन वीर सैनिकों के नामों को याद रखना। उन्होंने कहा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों और भारी कीमत चुकाकर प्राप्त की गई हर जीत को संजोकर रखा जाना चाहिए और शहीदों की स्मृति का सम्मान किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता, जो एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं, उसने ऐसे दस्तावेज और सामग्री प्रस्तुत की है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि साल 1755 में नथम दर्रे (नथम कनवै) में मेलूर कल्लरों और अंग्रेजी सेना के बीच एक भीषण संघर्ष हुआ था, जिसमें कल्लर समुदाय की जीत हुई थी।

नाथम कनवई युद्ध और कल्लार समुदाय

इसके बाद कोर्ट ने नथम कनवै युद्ध के इतिहास को सामने रखते हुए बताया कि थिरुमोगुर (कोइलकुडी) मंदिर की पीतल की मूर्तियाँ अंग्रेज सैनिकों द्वारा लूट ली गई थीं। इन मूर्तियों को कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में ले जाया जा रहा था और यह दल नथम कनवै दर्रे को पार करने वाला था। इसी दौरान कल्लर समुदाय के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए और पवित्र मूर्तियों को वापस हासिल करने के लिए हेरॉन तथा उसकी सेना पर हमला कर दिया।

कोर्ट के अनुसार इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, लेकिन इसके बावजूद कल्लर समुदाय सभी मूर्तियों को सुरक्षित रूप से वापस लेने में सफल रहा। बताया गया कि इस लड़ाई के बाद केवल करीब 30 सिपाही ही जीवित बचे, जो कर्नल हेरॉन के साथ त्रिचिरापल्ली लौट पाए।

जज ने कल्लर समुदाय की योद्धा परंपरा पर भी प्रकाश डाला और उनकी तुलना राजपूतों तथा गोरखाओं से की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंग्रेजों ने जानबूझकर इस समुदाय को अपराधी जनजाति के रूप में चिन्हित किया और उनके खिलाफ अत्याचार किए।

कोर्ट ने कहा, “कल्लर समुदाय की पृष्ठभूमि एक युद्धक समुदाय की रही है। उनकी तुलना गोरखाओं और राजपूतों से की जा सकती है। इसी कारण अंग्रेजों ने उन्हें ‘अपराधी जनजाति’ करार दिया। इस समुदाय ने दशकों तक दमन और असहनीय कठिनाइयों को झेला, जब तक कि महान नेता पासुम्पोन मुथुरामलिंगा थेवर ने उन्हें इस कलंक से मुक्त नहीं कराया।”

ऐतिहासिक घटनाओं को याद करने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है

कोर्ट ने कहा कि यह याचिका निस्संदेह विलंब से दायर की गई है, लेकिन इस मामले में लेचेस (यानी अनुचित देरी के कारण दावा खारिज किए जाने का सिद्धांत) को लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “जब तक विवादित मेमो प्रभावी है, तब तक याचिकाकर्ता याचिका में उल्लेखित स्थल पर स्तूप स्थापित नहीं कर सकता। इसलिए केवल देरी के आधार पर याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।”

अधिकारियों की ओर से यह दलील दी गई कि अनुमति न दिए जाने के पीछे एकमात्र कारण आसन्न संसदीय चुनाव थे। इस पर जज ने कहा, “अब प्रतिवादी यह कह रहे हैं कि क्षेत्राधिकार वाली पुलिस से रिपोर्ट मंगाई गई है और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है,” लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

जज ने टिप्पणी की, “याचिकाकर्ता आखिरकार देशी सेनाओं की औपनिवेशिक शक्तियों पर जीत की स्मृति में एक स्तूप स्थापित करना चाहता है। ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों का उत्सव मनाया जाना चाहिए और उन्हें स्मृति के रूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए। मैं पहले ही यह राय व्यक्त कर चुका हूँ कि किसी स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए, वह भी केवल अपनी पट्टा भूमि पर, किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती,” उन्होंने पूर्व में दिए गए एक फैसले का हवाला देते हुए कहा।

उन्होंने आगे कहा, “जैसे किसी व्यक्ति का घर उसका किला होता है, वैसे ही उसकी भूमि उसका अधिकार क्षेत्र होती है। राज्य केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही हस्तक्षेप कर सकता है। किसी वैधानिक या कॉमन लॉ अधिकार को किसी कार्यकारी आदेश या सरकारी निर्देश के माध्यम से सीमित या समाप्त नहीं किया जा सकता। केवल ऐसा कानून, जो संविधान के विपरीत न हो, ही इन अधिकारों पर प्रभाव डाल सकता है।”

कोर्ट ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक पूजा के लिए किसी धार्मिक भवन के निर्माण हेतु जिला कलेक्टर से पूर्व अनुमति आवश्यक हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा अपने आदर्श या श्रद्धेय व्यक्ति के सम्मान में प्रतिमा स्थापित करने के अधिकार को सीमित या बाधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रतिमा स्थापना से संबंधित ऐसा कोई वैधानिक कानून या नियम अस्तित्व में नहीं है।

यूएपीए-आरोपी कैथोलिक जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी का स्मारक

जज ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के आरोपित रहे कैथोलिक जेसुइट पादरी दिवंगत स्टैनिस्लॉस लौर्दुस्वामी उर्फ स्टैन स्वामी की प्रतिमा स्थापना से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि उस मामले में तहसीलदार ने पहले अनुमति देने से इनकार कर दिया था, लेकिन बाद में इसी कोर्ट ने प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति दी थी। जज ने स्टैन स्वामी के विवादास्पद जीवन का भी जिक्र किया, जो कथित रूप से राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़ा रहा।

कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे विवादित और बदनाम व्यक्ति की प्रतिमा लगाने के लिए किसी प्रकार की अनुमति आवश्यक नहीं है, तो देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को सम्मान देने के लिए अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह सही है कि समाज के कुछ वर्ग स्टैन स्वामी को आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाला मानते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वह UAPA के तहत दर्ज एक मामले में आरोपित थे। उनकी मृत्यु जेल में हुई। यदि स्टैन स्वामी की स्मृति में एक पत्थर का स्तंभ स्थापित करने के लिए अनुमति आवश्यक नहीं है, तो निश्चित रूप से नथम कनवै युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने के लिए भी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि स्टैन स्वामी को 2018 के भीमा कोरेगाँव एल्गार परिषद मामले में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में नामजद किया गया था। उन पर माओवादियों के साथ मिलकर लोकतंत्र को कमजोर करने और देश को नुकसान पहुँचाने के लिए जीवन समर्पित करने के आरोप थे।

इसके अलावा, जब वह जेसुइट संचालित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट (ISI) के निदेशक थे, उस दौरान बाद में केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को वहाँ कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने विडंबना की ओर इशारा करते हुए कहा कि जिस भूमि को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसे व्यक्ति ने काम किया, उसी भूमि पर उसकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जबकि देश के लिए बलिदान देने वाले अनेक वीर आज भी गुमनाम हैं, उन्हें उनका उचित सम्मान नहीं मिला है या फिर उन्हें अपने महान बलिदानों की मान्यता के लिए मृत्यु के बाद भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

फैसले की घोषणा कर दी गई है

जज ने सरकार के एक पूर्व आदेश से संबंधित अपने पुराने फैसले का हवाला दिया और साफ किया कि वह निर्देश केवल सार्वजनिक स्थलों पर लागू होता है, न कि पट्टा (निजी) भूमि पर।

उन्होंने फैसले को और स्पष्ट करते हुए कहा, “बेशक सरकार को यह अधिकार है कि वह निजी स्थानों पर भी प्रतिमाओं की स्थापना को नियंत्रित करने के लिए कोई कानून बनाए। लेकिन जब तक ऐसा कोई कानून अस्तित्व में नहीं आता, तब तक केवल परिपत्रों या सरकारी आदेशों के जरिए किसी व्यक्ति के अपनी पट्टा भूमि पर प्रतिमा स्थापित करने के अधिकार को छीना नहीं जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित सरकारी आदेश केवल प्रतिमाओं की स्थापना से जुड़ा है, जबकि वर्तमान मामला एक स्तूप स्थापित करने का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई विवाद नहीं है और न ही किसी प्रकार की कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की आशंका है, इसलिए सरकार को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि उपरोक्त पूर्व निर्णय इस मामले में भी समान रूप से लागू होगा, चाहे सरकार का आदेश मौजूद क्यों न हो। फिर कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “इन परिस्थितियों को देखते हुए विवादित मेमो को निरस्त किया जाता है। याचिकाकर्ता को याचिका में उल्लिखित भूमि पर नथम कनवै युद्ध की स्मृति में स्मारक स्तूप स्थापित करने की पूरी स्वतंत्रता है। यह रिट याचिका स्वीकार की जाती है। किसी प्रकार की लागत नहीं लगाई जाती।”

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘बांग्लादेश में तो बस एक हिंदू जला है, हम तुम सबको फूँक देंगे’: गुजरात के सानंद में इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं पर की पत्थरबाजी; OpIndia से महिलाएँ बोलीं- मुस्लिमों के कारण घर से बाहर निकलना मुश्किल

गुजरात के अहमदाबाद के कलाना गाँव में एक हिंदू परिवार पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया। पुलिस घटना की जाँच कर रही है, लेकिन मामले में बांग्लादेश से जुड़ा पहलू भी सामने आया है। पीड़ितों का कहना है कि बांग्लादेश में एक हिंदू युवक की हत्या के बाद, गाँव के एक हिंदू युवक द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक पोस्ट से मुस्लिम हमलावर भड़क उठे।

यह बात तब सामने आई जब ऑपइंडिया ने पीड़ितों से मुलाकात की और उनसे बातचीत की। इस घटना में सबसे पहले जिस व्यक्ति पर हमला हुआ, वह एक हिंदू नाबालिग था। हमले में उसके पिता भी घायल हो गए। उन्होंने अस्पताल में इलाज के दौरान ऑपइंडिया से बात की।

पीड़ित के पिता ने बताया कि उनके बेटे ने बांग्लादेश में दीपू दास की हत्या के बारे में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उसने न्याय की माँग की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पोस्ट को देखने के बाद स्थानीय मुस्लिमों ने उसे धमकी दी कि बांग्लादेश में एक हिंदू को जला दिया गया है और अगर उसने ऐसी पोस्ट डाली तो पूरे ठाकुरवास को जला दिया जाएगा।

स्थानीय हिंदू महिलाओं का आरोप: बेटियों और बहनों को लंबे समय से किया जा रहा परेशान

इसके अलावा स्थानीय महिलाओं ने आरोप लगाया है कि कुछ स्थानीय मुस्लिम पुरुष पिछले 12 महीनों से उन्हें परेशान कर रहे हैं। हिंदू महिलाओं और बेटियों को घर से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है, उनके प्रति अश्लील इशारे किए जाते हैं। हिंदुओं का आरोप है कि तिलक लगाने पर उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं और गाँव में कोई भी हिंदू त्योहार या उत्सव शांतिपूर्वक नहीं मनाने दिया जा रहा है।

एक अन्य महिला ने आरोप लगाया कि काम से लौटने पर उसके पति या परिवार के अन्य सदस्यों की पिटाई की जाती है। हिंदू बहनों और बेटियों के घर से बाहर निकलने पर उनसे अश्लील इशारे करवाए जाते हैं। उसने माँग की कि आरोपितों को सजा दी जाए और हिंदुओं को न्याय मिले।

अन्य महिलाएँ रोते हुए और अपनी आपबीती सुनाते हुए उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी से न्याय की माँग कर रही थीं। महिलाओं ने बताया कि वे तीन दिनों से बिना भोजन-पानी के ये सब सहन कर रही हैं और अब उन्हें न्याय चाहिए। एक अन्य महिला ने ठाकुर समाज के नेता अल्पेश ठाकुर से भी सवाल किए।

गाँव की एक हिंदू महिला ने पत्थरबाजी के बारे में बताते हुए कहा कि एक ही दिन में इतने सारे पत्थर आना संभव नहीं है और इसके लिए पहले से योजना बनाई गई होगी। उन्होंने बताया कि सुबह उठकर जब वह चाय-पानी कर रही थीं, तभी पत्थरबाजी शुरू हो गई। ऑपइंडिया ने उनके घर के दृश्य भी दिखाए हैं।

फुटेज में दिख रहा है कि पाइपों समेत घर की छत गिर गई है। घर में मौजूद महिला ने बताया कि जब वह कपड़े धो रही थी, तभी छत से पत्थर गिरने लगे। इसके अलावा जहाँ उसका बच्चा सो रहा था, वहाँ भी पत्थर गिरे। उसने बताया कि इतने ज्यादा पत्थर गिर रहे थे कि उसके घर की छत गिर गई।

पूरी घटना क्या थी?

यह पूरी घटना सोमवार (29 दिसंबर 2025) की रात को घटी। इसके बाद मंगलवार (30 दिसंबर 2025) की सुबह भी पथराव हुआ। बाद में पुलिस बल गाँव पहुँचा और तलाशी अभियान चलाया। वहीं दूसरी ओर, कार्रवाई के डर से आरोपित अपने घरों से भागकर गाँव के खेतों में छिप गए, जहाँ ड्रोन की मदद से तलाशी के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

एक नाबालिग हिंदू व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस ने शाहरुख समेत 22 मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने सानंद जीआईडीसी पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 115(2), 352, 351(3), 189(2), 191(2), 190, 194(2), 324(2) और 125(ए) के तहत आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर आगे की जाँच शुरू की और बाद में 42 लोगों को हिरासत में लिया।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

हाथ में कुरान, उमर खालिद को चिट्ठी और मोदी से घृणा: साधारण नहीं है जोहरान ममदानी का न्यूयॉर्क में मेयर बनना, समझिए इस्लामी कट्टरपंथी क्यों हैं खुश

लोकतंत्र में हर चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होता, कई बार वह भविष्य की चेतावनी भी होता है। न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर बनना केवल एक नगर निगम पद नहीं है, यह वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला में प्रवेश का टिकट होता है। यही वजह है कि जोहरान ममदानी का सत्ता में आना केवल अमेरिका की आंतरिक घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है।

अमेरिका के सबसे बड़े और प्रभावशाली शहर न्यूयॉर्क की मेयर की कुर्सी पर बैठते ही जोहरान क्वामे ममदानी ने ऐसा कदम उठाया है, जो न केवल विवादास्पद है, बल्कि भारत के लिए सीधी चुनौती जैसा लगता है। 1 जनवरी को शपथ लेने के ठीक अगले दिन उनका एक हैंडरिटन पत्र सामने आया, जो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद विवादित कार्यकर्ता उमर खालिद के नाम लिखा गया था। इस पत्र ने भारत में आग की तरह फैलते गुस्से को और भड़का दिया है। कई लोग इसे ममदानी की भारत विरोधी मानसिकता का खुला प्रमाण बता रहे हैं।

जोहरान ममदानी खुद को प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहता है, लेकिन उसके पहले ही कदम से साफ लगता है कि उसकी प्राथमिकता में सेलेक्टेड चीजे हैं। यानी उसके मुद्दे बहुत सोच-विचार के चुने हुए हैं, खासकर जो मुस्लिम पहचान और कथित इस्लामी पीड़ितों से जुड़े हों।

ममदानी के मेयर बनने के बाद ही क्यों सामने आया उमर खालिद को लिखा पत्र?

कोई भी नया निर्वाचित नेता आम तौर पर शहर की समस्याओं से शुरुआत करता है। अपने शहर की आवास, ट्रांसपोर्ट, अपराध, शिक्षा से जुड़ी समस्या। लेकिन ममदानी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ममदानी ने सत्ता संभालते ही भारत से जुड़े एक अत्यंत विवादित मुद्दे या यूँ समझें कि आतंकवादी को चुना। वो है दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद।

यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत था। जोहरान ममदानी जानता था कि उमर खालिद का नाम भारत में किस तरह ध्रुवीकरण पैदा करता है। UAPA जैसे कानून, देशद्रोह के आरोप, दंगे, हिंसाये सब ऐसे विषय हैं जिन पर भारत की न्यायिक प्रक्रिया बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद एक अमेरिकी मेयर का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना साफ बताता है कि उसका मकसद ‘मानवाधिकारट से ज्यादा ‘वैश्विक पहचान’ बनाना था।

यह कहानी सिर्फ वामपंथ की नहीं, बल्कि उस वैचारिक इस्लामी राजनीति की है, जो अब लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर घुसपैठ कर रही है।

वामपंथी या इस्लामी… ममदानी की असली पहचान क्या?

जोहरान ममदानी खुद को वामपंथी कहता है। लेकिन दुनिया जानती है कि आधुनिक वामपंथ अब केवल आर्थिक असमानता की लड़ाई नहीं रह गया। यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो चुका है, जहाँ धर्म, जाति और नस्ल को हथियार बनाया जाता है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि अगर ममदानी सिर्फ वामपंथी है, तो उसकी संवेदनशीलता बार-बार केवल इस्लामी मुद्दों पर ही क्यों दिखती है? अगर वो मानवाधिकारों का पैरोकार है, तो चीन के उइगर, पाकिस्तान के बलूच, बांग्लादेश के हिंदुओं पर उसकी आवाज़ क्यों खामोश रहती है? यही सेलेक्टिव नैतिकता ही असली समस्या है।

कुरान हाथ में लेकर शपथ को मानें उसका राजनीतिक संदेश

अमेरिका में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर शपथ लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है। लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी मासूम नहीं होते। ममदानी द्वारा कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना सिर्फ निजी आस्था नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संदेश था। यह संदेश न्यूयॉर्क के मतदाताओं से ज्यादा वैश्विक इस्लामी राजनीति के लिए था कि सत्ता के केंद्रों में ‘हमारा आदमी’ पहुँच चुका है।

यही वह बिंदु है जहाँ मजहब निजी नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक हथियार बन जाता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममदानी ने हाल ही में एक पत्र लिखकर खालिद के अम्मी-अब्बू को सौंपा। पत्र में लिखा है, “प्रिय उमर, मैं अक्सर तुम्हारे कड़वाहट न अपनाने वाले शब्दों के बारे में सोचता हूँ। तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई। हम सभी तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”

यह छोटा पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारतीय मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहा है। सवाल यह है कि न्यूयॉर्क के मेयर को भारत के आंतरिक मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों? पद संभालते ही शहर की समस्याओं क्राइम, हाउसिंग, ट्रैफिक की बजाय दिल्ली जेल के एक कैदी को पत्र लिखना क्या संयोग है या सोचा-समझा प्रोपेगेंडा?

UAPA केस में मुख्य साजिशकर्ता है उमर खालिद

उमर खालिद का मामला कोई साधारण नहीं है। पूर्व जेएनयू छात्र खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया। उन पर यूएपीए जैसे सख्त कानून लगे, जिसमें देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों के आरोप हैं। सरकार के पास सबूत हैं कि दंगे भड़काने में उनकी भूमिका थी। पाँच साल से ज्यादा जेल में हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उनके समर्थक इसे राजनीतिक बदला बताते हैं। हालाँकि वो ऐसे व्यक्ति सैयद कासिम रसूल इलियास का बेटा है,जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़ा हुआ था।

भारत पर क्यों साध रहा निशाना?

भारत आज उभरती वैश्विक शक्ति है। भारत का लोकतंत्र, उसकी न्यायपालिका और उसके कानून अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नैरेटिव के लिए असहज हैं। फिर UAPA जैसे कानून इसीलिए भी निशाने पर रहते हैं क्योंकि वे ‘पीड़ित’ और ‘अल्पसंख्यक’ की उस कहानी को तोड़ते हैं, जिसे वैश्विक मंच पर बेचा जाता है।

ऐसे में ममदानी का भारत पर फोकस इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत को ‘असहिष्णु’ दिखाओ, उसकी संस्थाओं पर सवाल उठाओ और फिर खुद को नैतिक ऊँचाई पर खड़ा करो।

भारत और हिंदुओं को पहले भी बनाता रहा है निशाना

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उसके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। वो न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधता रहा है। उसने पीएम मोदी को युद्ध अपराधी तक कहा था, वो भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही। वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बता चुका है।

न्यूयॉर्क से आगे की तैयारी?

यह मानना भोलापन होगा कि ममदानी सिर्फ मेयर बनकर संतुष्ट हो जाएगा। न्यूयॉर्क अमेरिकी राजनीति की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं। इतिहास गवाह है कि जो न्यूयॉर्क जीतता है, वह राष्ट्रीय राजनीति की दहलीज़ पर पहुँच जाता है। आज वो भारत पर बोल रहे हैं, कल वो अमेरिका की विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहेगा। भले ही आज वो ‘मानवाधिकार’ की बात कर रहा है, लेकिन कल उसकी बोली इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव से अलग ही जहरीली हो चुकी होगी।

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोट बैंक को मजबूत करके। अमेरिका में मुस्लिम नेता जैसे इल्हान उमर, रशीदा तलीब पहले से हैं और ममदानी उन कट्टरपंथियों का नेक्स्ट जेन वर्जन लगते हैं।

मेयर बनते ही पत्र का सामने आना कोई साधारण बात नहीं

जोहरान ममदानी का पत्र अकेला नहीं। ठीक इसी समय आठ अमेरिकी सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर खालिद को बेल और निष्पक्ष ट्रायल की माँग की। ये सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव विंग से हैं, जो अक्सर भारत पर मानवाधिकार के नाम पर दबाव बनाते हैं। खालिद के पैरेंट्स की इनसे मुलाकात भी हुई थी।

ममदानी और इन सांसदों के पत्र की टाइमिंग संदेह पैदा करता है। क्या यह संयोग है कि मेयर बनते ही ममदानी ने यह कदम उठाया? विश्लेषक इसे खुद को मुस्लिम दुनिया में हीरो बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

क्या ममदानी वाकई भारत के लिए बन सकता है खतरा?

भारत के लिए तो जरूर चिंता की बात है। एक विदेशी मेयर का भारत के कानूनी मामलों में दखल खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो गंभीर आरोपों में जेल में है, विदेशी हस्तक्षेप जैसा लगता है। न्यूयॉर्क के बदलते डेमोग्राफिक्स, बढ़ते मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोटर ने उसे जिताया, लेकिन इससे अमेरिका में इस्लामी राजनीतिक ताकतें मजबूत हो रही हैं। अगर ममदानी आगे बढ़े, तो भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ सकता है।

भारत को, अमेरिका को और दुनिया को यह समझना होगा कि आज की राजनीति में सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं, बल्कि नैरेटिव है। और जो नेता सत्ता में आते ही नैरेटिव युद्ध शुरू कर देता है, वह सिर्फ एक शहर का मेयर नहीं रह जाता, वह एक वैश्विक एजेंडा बन जाता है।

ऑपरेशन कगार, नक्सलवाद पर प्रहार और 50 साल का संघर्ष: जानिए 2025 में कैसे मजबूत हुई आतंरिक सुरक्षा, शाह ने लिखी लाल आतंक के खात्मे की पटकथा

जब अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा तय की, तो यह कोई नारा या राजनीतिक दावा नहीं था। यह एक स्पष्ट डेडलाइन थी। डेडलाइन तभी तय की जाती है जब जमीन पर नतीजे साफ दिखने लगते हैं और लड़ाई जीत की ओर अंतिम चरण में पहुँच जाती है।

नक्सलवाद भारत की सबसे लंबी आंतरिक सुरक्षा चुनौती रही है, जो करीब 50 साल तक चली। कई सरकारें बदलीं, बड़े वन क्षेत्र नक्सलियों के गलियारे के नाम से जाने गए और लंबे समय तक सरकार का लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करने से ज्यादा उसे नियंत्रित करना रहा। पहले मुठभेड़, बातचीत और हिंसा कम करने पर जोर दिया जाता था। जीत की बात बहुत संभलकर की जाती थी। लेकिन 2025 में यह सोच पूरी तरह बदल गई।

साल 2025 सिर्फ लाल आतंकियों के साथ मुठभेड़ों की संख्या बढ़ने का साल नहीं था, बल्कि यह नक्सलवाद को व्यवस्थित तरीके से तोड़ने का साल बना। नक्सल संगठन की वरिष्ठ नेतृत्व संरचना टूट गई, उनके सुरक्षित इलाके खत्म हो गए, भर्ती तंत्र कमजोर पड़ गया और लड़ाकों का मनोबल पूरी तरह गिर गया। कई जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आ गए। सैकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और उनके ठिकाने एक-एक कर खत्म होते चले गए।

यह सिर्फ प्रगति नहीं थी, बल्कि एक ऐसे आंदोलन का अंतिम चरण था जो कभी खुद को शोषितों की आवाज बताता था, लेकिन अब केवल डर और हिंसा के सहारे टिका हुआ था। नक्सलवाद के खात्मे का दावा कोई राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि जमीनी आँकड़ों और घटनाओं पर आधारित निष्कर्ष है, जो सभी एक ही दिशा में इशारा करते हैं।

औपचारिक घोषणा भले ही 2026 में हो, लेकिन हकीकत यह है कि 2025 में ही नक्सलवाद की हार तय हो चुकी थी। यह लड़ाई अब पलटने वाली नहीं है। नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है।

2025 ने सब कुछ क्यों बदल दिया

दशकों तक भारत की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई एक ही चक्र में घूमती रही। किसी बड़े हमले या घात के बाद सुरक्षा बलों का अभियान चलता, फिर उसके बाद बातचीत, संघर्षविराम या राजनीतिक ठहराव आ जाता। लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करना नहीं, बल्कि काबू में रखना था। सड़कें सुरक्षित रहें, चुनाव शांतिपूर्ण हों, जानमाल का नुकसान कम हो और हिंसा शहरों तक न पहुँचे। नक्सलवाद को एक स्थायी बीमारी की तरह देखा गया, जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। यह सोच 2025 में निर्णायक रूप से टूट गई।

2025 में बदलाव सिर्फ कार्रवाई की तीव्रता का नहीं था, बल्कि इरादे का था। सरकार ने नक्सलवाद को अब इलाके संभालने की समस्या नहीं माना, बल्कि एक ऐसे संगठन के रूप में देखा जिसे जड़ से खत्म करना है। प्रतीकात्मक मौजूदगी की जगह लगातार और स्थायी नियंत्रण पर जोर दिया गया। कुछ दिनों या हफ्तों के लिए नहीं, बल्कि महीनों तक। जो जंगल पहले माओवादी ठिकाने माने जाते थे, वहाँ अब सिर्फ छापे नहीं पड़े, बल्कि उन्हें घेरा गया, नक्शे बनाए गए और स्थायी रूप से कब्जे में लिया गया।

इस दौर में दुविधा की कोई जगह नहीं छोड़ी गई। न संघर्षविराम का दिखावा किया गया और न ही अभियानों के साथ-साथ समानांतर बातचीत चलाई गई। सुरक्षा तंत्र का संदेश साफ था। अब यह दौर जगह देने या बातचीत करने का नहीं, बल्कि पूरी जगह छीन लेने का है।

इस स्पष्टता का सीधा असर जमीन पर दिखा। स्थानीय लोगों को लगा कि सुरक्षा बल अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी रूप से आए हैं, जिससे खुफिया जानकारी की गुणवत्ता बेहतर हुई। नक्सली लड़ाकों को समझ आने लगा कि पहले की तरह भाग निकलने के रास्ते अब बंद हो चुके हैं।

शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कैडर के बीच दूरी बढ़ती गई। नक्सल आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत समय का इंतजार करने की क्षमता अब उसके खिलाफ काम करने लगी। पहले नक्सलवाद सरकारों के बदलने का इंतजार कर के बचा रहता था। लेकिन 2025 में उसे एक ऐसी ताकत से टकराना पड़ा जो न रुक रही थी, न इंतजार कर रही थी, बस लगातार दबाव बनाकर उसे तोड़ती जा रही थी।

ऑपरेशन कगार और नया सुरक्षा सिद्धांत

अगर 2025 में नक्सलवाद के खिलाफ नीति बदली, तो ऑपरेशन कगार उस नीति को जमीन पर लागू करने का सबसे साफ उदाहरण बना। यह कोई एक दिन की कार्रवाई या सुर्खियाँ बटोरने वाला अभियान नहीं था। यह एक नई रणनीति का नाम बन गया लंबे समय तक चलने वाला, खुफिया जानकारी पर आधारित और बिना किसी समझौते के चलने वाला अभियान है।

ऑपरेशन कगार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसका मकसद सिर्फ नक्सली इलाकों में घुसकर कार्रवाई करना नहीं था, बल्कि इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना था। पहले सुरक्षा बल मुठभेड़ के बाद वापस लौट जाते थे, लेकिन अब वे गहरे जंगलों में टिककर बैठते है, जहाँ पहले पहुँचना भी मुश्किल था।

नक्सलियों के संचार तंत्र को बाधित किया गया, हथियारों के भंडार बरामद हुए, उनके आने-जाने के रास्ते बंद किए गए और ठिकानों को पूरी तरह नष्ट किया गया। जंगल, जो पहले नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने थे, अब उनके लिए बंद क्षेत्र बन गए।

इस अभियान में एक बड़ा बदलाव यह भी था कि लक्ष्य किसे बनाया गया। पहले हमलों के बाद छोटे-छोटे नक्सली दस्तों के पीछे दौड़ा जाता था, लेकिन अब ध्यान इलाका कमांडरों, ज़ोनल नेताओं और वरिष्ठ नक्सली अधिकारियों को खत्म करने पर रहा, जो पूरे संगठन को जोड़े रखते थे।

छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में नक्सलियों की ताकत सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि अनुशासन और नेतृत्व संरचना में थी। जैसे ही यह रीढ़ टूटने लगी, पूरा आंदोलन बिखरने लगा।

तालमेल इस रणनीति की एक और अहम कड़ी थी। केंद्रीय बल, राज्य पुलिस और विशेष जंगल युद्ध इकाइयाँ आपस में रीयल टाइम खुफिया जानकारी साझा करते हुए एक साथ काम कर रही थीं।

अब अभियान न तो संसाधनों की कमी से रुके और न ही राजनीतिक हिचकिचाहट से। जब तक नतीजा नहीं निकला, दबाव लगातार बनाए रखा गया। ऑपरेशन कगार इस नई हकीकत का प्रतीक बन गया कि सरकार अब नक्सली इलाकों में सिर्फ जाती नहीं है, बल्कि उन्हें वापस लेती है और वहाँ टिककर रहती है।

लीडरशिप का सिर कलम करना: माओवादियों की पूरी टॉप कमांड को तोड़ना

नक्सलवाद को निर्णायक गिरावट की ओर ले जाने वाली सबसे बड़ी वजह सिर्फ इलाकों का नुकसान नहीं था, बल्कि उसके नेतृत्व ढाँचे का व्यवस्थित सफाया था। दशकों तक माओवादी आंदोलन झटके सहता रहा, क्योंकि उसकी कमांड चेन सुरक्षित रहती थी। लड़ाके बदले जा सकते थे, लेकिन कमांडर नहीं। 2025 में यही समीकरण पलट गया।

लगातार चले अभियानों में एरिया कमेटी के सदस्य, ज़ोनल कमांडर और वरिष्ठ रणनीतिकार एक-एक कर खत्म किए जाने लगे। ये कोई नाम मात्र के चेहरे नहीं थे, बल्कि वही लोग थे जो हमलों की योजना बनाते थे, भर्ती चलाते थे, पैसों का प्रबंधन करते थे और अलग-अलग नक्सली दस्तों को जोड़कर रखते थे। जब इन दिमागों को हटाया गया, तो आंदोलन सिर्फ कमजोर नहीं हुआ, बल्कि लकवाग्रस्त हो गया। इसका असर तुरंत दिखा।

नेतृत्व या तो मारा गया या लगातार भागता रहा। नतीजा यह हुआ कि स्थानीय दस्तों के पास न दिशा बची, न आदेश। आपूर्ति की कड़ियाँ टूट गईं, खुफिया जानकारियाँ लीक होने लगीं और संगठन के भीतर अविश्वास बढ़ गया। कई इलाकों में नक्सली लड़ाके लड़ने के बजाय बिखर गए।

सबसे अहम बात यह रही कि संगठन के पास कोई भरोसेमंद दूसरी पंक्ति तैयार नहीं थी। पुराना नेतृत्व उम्रदराज़ हो चुका था और नए भर्ती न तो वैचारिक रूप से मज़बूत थे, न ही उनके पास जमीनी लड़ाई का अधिकार या अनुभव था। नतीजतन, जो बचा वह हथियारों से लैस लेकिन नेतृत्वहीन संगठन था।

भीड़ के बजाय कमांड ढाँचे को निशाना बनाकर, सरकार ने वह कर दिखाया जो दशकों की मुठभेड़ें नहीं कर पाईं। उसने माओवादियों की एक संगठित आंदोलन के रूप में काम करने की क्षमता ही तोड़ दी। यही वजह है कि 2025 के बाद नक्सलवाद सिर्फ पीछे नहीं हटा, बल्कि अपने आप बिखरने लगा।

सैकड़ों की संख्या में सरेंडर, सरकार का संदेश: हथियार डालो या मरो

मुठभेड़ें दबाव दिखाती हैं, लेकिन आत्मसमर्पण टूटन का संकेत होता है। 2025 में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की संख्या किसी भी गोलीबारी से ज्यादा बोलती दिखी। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में सैकड़ों नक्सली कैडरों ने हथियार डाल दिए, जिनमें इनामी कमांडर और वरिष्ठ नक्सली नेता भी शामिल थे, जो वर्षों से संगठन के भीतर सक्रिय थे।

ये लोग कोई बाहरी समर्थक नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित लड़ाके और संगठनकर्ता थे, जो आत्मसमर्पण के जोखिमों को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने एक मुठभेड़ के डर से नहीं, बल्कि इसलिए हथियार डाले क्योंकि नेतृत्व खत्म हो चुका था, जंगलों के सुरक्षित ठिकाने टूट चुके थे और भागने के रास्ते बंद हो गए थे। आत्मसमर्पण अब एक वास्तविक और सुरक्षित रास्ता बन चुका था।

सरकार की पुनर्वास नीतियों और सुरक्षा की गारंटी ने यह साफ कर दिया कि हथियार डालना अब कोई जाल नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत है। सच्चाई यह है कि कोई विद्रोह सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होता कि वह हथियारों में कमजोर पड़ गया हो। वह तब खत्म होता है, जब उसके अपने लड़ाके लड़ाई को बेकार मानने लगते हैं। 2025 में नक्सलवाद का यही मोड़ सामने आया, जब उसके अपने कैडर ही इस लड़ाई से मुंह मोड़ने लगे।

सीजफायर का शोर और सरकार ने इसे नजरअंदाज क्यों किया

जैसे-जैसे दबाव बढ़ा और माओवादी ढाँचा टूटने लगा, वैसे-वैसे संघर्षविराम की माँगें तेज होने लगीं। इन अपीलों को वामपंथी सोच वाले कुछ कार्यकर्ताओं और सिविल सोसायटी के हिस्सों ने आगे बढ़ाया, जो लंबे समय से बातचीत की वकालत करते रहे हैं। लेकिन यह कोई वास्तविक शांति पहल नहीं थी, बल्कि कमजोर पड़ चुके नक्सल आंदोलन की दबाव बनाने की रणनीति थी।

इतिहास गवाह है कि संघर्षविराम का फायदा माओवादी संगठन अक्सर फिर से संगठित होने, हथियार जुटाने और अपनी पकड़ लौटाने के लिए करते रहे हैं। इस बार सरकार ने किसी भी तरह के रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो उसके आत्मविश्वास को दिखाता है।

बातचीत समस्या के समाधान का साधन हो सकती है, लेकिन टूटते हुए आंदोलनों को बचाने का जरिया नहीं। संघर्षविराम की माँग ठुकराकर सरकार ने साफ संदेश दिया कि यह दौर नक्सलवाद के पतन को संभालने का नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने का है।

2026 में औपचारिक घोषणा होगी, युद्ध खत्म हो जाएगा

मार्च 2026 में जब सरकार आधिकारिक रूप से नक्सलवाद के अंत की घोषणा करेगी, तो वह असल जीत का नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक औपचारिकता होगी। निर्णायक बदलाव पहले ही हो चुका है। 2025 तक नक्सल आंदोलन अपना नेतृत्व, इलाकाई पकड़, भर्ती क्षमता और वैचारिक ताकत, ये चारों स्तंभ खो चुका था, जिनके सहारे ऐसे आंदोलन टिके रहते हैं।

अब जो बचा है, वह कोई संगठित ताकत नहीं, बल्कि बिखरे हुए अवशेष हैं। कभी एक सतत नक्सली क्षेत्र माने जाने वाला रेड कॉरिडोर अब अस्तित्व में नहीं है। जो जंगल पहले नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने थे, वहाँ अब लगातार सुरक्षा बलों की मौजूदगी है। क्रांति की अनिवार्यता का माओवादी दावा अपनी ही अप्रासंगिकता के बोझ तले ढह चुका है।

इसका मतलब यह नहीं कि बंदूकों के शांत होते ही काम खत्म हो जाता है। हिंसा से बाहर आए इलाकों में सुशासन, विकास और लंबे समय तक राजनीतिक जुड़ाव जरूरी होता है। हिंसा से पैदा हुआ खालीपन अगर स्थायी रूप से और साफ तौर पर राज्य द्वारा नहीं भरा गया, तो हालात दोबारा बिगड़ सकते हैं।

लेकिन एक निष्कर्ष अब साफ है और उस पर सवाल उठाना मुश्किल है, भारत नक्सलवाद के सिर्फ पतन को नहीं, बल्कि उसके पूर्ण समापन को देख चुका है। घोषणा भले 2026 में हो, लेकिन हर मायने में नक्सलवाद का अंत 2025 में ही हो गया था।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी टीम के ध्रुव मिश्रा की है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

GROK इस लड़की को बिन कपड़े के दिखाओ… X पर खुलेआम एलन मस्क के ‘स्पाइसी AI’ से की जा रही ऐसी डिमांड: महिलाओं की निजता और सुरक्षा को लेकर उठे कई सवाल

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बेहद परेशान करने वाला ट्रेंड सामने आया है। लोग महिलाओं की सामान्य तस्वीरों पर xAI द्वारा बनाए गए एलन मस्क के AI चैटबॉट Grok को टैग करके उनसे महिलाओं के कपड़े बदलने, उन्हें बिकिनी पहनाने या और ज्यादा बोल्ड और अश्लील दिखाने को कह रहे हैं।

मई 2025 से Grok के लिए जानबूझकर नियम काफी ढीले रखे गए हैं। अब जब ऐसे अनुरोध बड़ी संख्या में आ रहे हैं, तो यह चैटबॉट बिना झिझक तस्वीरें एडिट करके महिलाओं को सेक्सुअल तरीके से प्रस्तुत कर रहा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये AI से बदली गई तस्वीरें बिल्कुल असली जैसी दिखती हैं।

सीधे तौर पर कहें तो अजनबी लोग महिलाओं की तस्वीरें, जो अक्सर बिल्कुल सामान्य और गैर-यौन संदर्भ (non-sexual context) में शेयर की गई होती हैं, उसे उठा रहे हैं और सबके सामने एक AI से उन्हें ‘नंगा’ करने को कह रहे हैं।

Grok ऐसी तस्वीरें बनाकर जवाब दे रहा है, जिनमें महिलाएँ बिकिनी या इसी तरह के कपड़ों में दिखाई देती हैं। हैरानी की बात यह है कि अगर कोई यूजर महिला की पोज को भी वासना से भरा हुआ बनाने को कहता है, तो Grok वह भी कर देता है।

इसका असर तुरंत और साफ दिख रहा है। X पर Grok के रिप्लाई सेक्शन में ऐसे गैर-सहमति से बदले गए फोटो की भरमार हो गई है, जिससे भारी नाराजगी फैल रही है। दिलचस्प बात यह है कि Grok के X अकाउंट का मीडिया टैब बंद कर दिया गया है, लेकिन अगर कोई रिप्लाई सेक्शन में जाए, तो वहाँ अब भी ऐसी तस्वीरें भरी पड़ी हैं।

आमतौर पर AI चैटबॉट निजी माहौल में काम करते हैं। OpenAI का ChatGPT भी कुछ हद तक ऐसी इमेज बनाने की क्षमता रखता है, लेकिन वह सब निजी चैट तक सीमित रहता है। Grok यह सब खुलेआम, सबके सामने कर रहा है।

जो कंटेंट बाकी जगहों पर ब्लॉक हो जाता है या निजी चैट तक सीमित रहता है, वह यहाँ सार्वजनिक रूप से दिख रहा है। इससे अपमान, शर्मिंदगी और नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। जब OpIndia ने खुद Grok से पूछा कि यह सब क्यों हो रहा है, तो Grok ने जवाब दिया कि एलन मस्क ने उसे जानबूझकर ‘स्पाइसी’ AI के रूप में पेश किया है, जिसमें बाकी AI की तुलना में कम पाबंदियाँ हैं।

ग्रोक का ऑपइंडिया को दिया गया जवाब

मस्क खुद कह चुके हैं कि Grok उन सवालों के जवाब देगा, जिनसे दूसरे AI बचते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि Grok हर सीमा को धकेल रहा है और लापरवाह बन गया है। भले ही वह पूरी नग्नता से इनकार करता हो, लेकिन गैर-सहमति वाले सेक्सुअल कंटेंट की बिल्कुल सीमा तक पहुँच जाता है। कुछ यूजर्स का तो यह भी दावा है कि थोड़ी चालाकी से नग्नता की रोक भी पार की जा सकती है।

Grok का यह रवैया Google के Gemini या OpenAI के ChatGPT से बिल्कुल अलग है। ये दोनों बेहद लोकप्रिय AI हैं और निजी आउटपुट में भी सख्त फिल्टर लगाते हैं। कहीं अगर गलती हो भी जाए, तो उसका दायरा सीमित रहता है। Grok के मामले में नुकसान इसलिए ज्यादा है क्योंकि इसका आउटपुट सार्वजनिक होता है।

यह भी देखा गया है कि Grok की टाइमलाइन लगभग पूरी तरह महिलाओं को डिजिटल तरीके से ज्यादा बोल्ड बनाने वाली तस्वीरों से भरी रहती है। जो एक सामान्य AI टूल होना चाहिए था, वह voyeurism (ताक-झाँक) की सार्वजनिक गैलरी बन गया है।

नैतिक प्रभाव, महिलाओं की सहमति और गरिमा

यह ट्रेंड सहमति, स्वायत्तता और गरिमा जैसे बुनियादी नैतिक मूल्यों पर सीधा हमला है। महिलाओं की तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना बदली जा रही हैं और उन्हें बिकिनी में दिखाया जा रहा है। यह AI का कोई अच्छा प्रयोग नहीं है, बल्कि निजता का खुला उल्लंघन है।

इस तरह की हरकतें महिलाओं की डिजिटल स्वायत्तता छीन लेती हैं और उन्हें मनोरंजन, ट्रोलिंग या उत्पीड़न का सामान बना देती हैं। यह image-based sexual abuse है, जिसे आज गंभीर मानसिक आघात देने वाला उत्पीड़न माना जाता है।

एक कानूनी विशेषज्ञ के शब्दों में, यह गलती से हुआ महिला-विरोध नहीं है, बल्कि डिजाइन से किया गया है। Grok की ढीली और उकसाने वाली सोच इस तरह के दुरुपयोग को आसान बनाती है और उसे सार्वजनिक मंच देकर और बढ़ावा देती है।

डिजिटल सहमति को भी असली दुनिया की सहमति जितना ही गंभीर माना जाना चाहिए। ऑनलाइन शेयर की गई तस्वीर किसी को उसे सेक्सुअल रूप से बदलने की इजाजत नहीं देती। बिना अनुमति किसी सामान्य फोटो को सेक्सुअल फोटो में बदलना डीपफेक पोर्न और मॉर्फिंग जैसे अपराधों जैसा ही है।

इसका नुकसान केवल सैद्धांतिक नहीं है। पीड़ित महिलाओं को शर्मिंदगी, बदनामी, डर और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई महिलाएँ यह सब देखकर ऑनलाइन फोटो डालना ही बंद कर रही हैं, जो महिलाओं की डिजिटल मौजूदगी पर डर का साया डाल देता है।

इसका सांस्कृतिक नुकसान भी है। अगर इसे रोका नहीं गया, तो यह और खतरनाक डीपफेक, ब्लैकमेल और रिवेंज पोर्न तक पहुँच सकता है। Grok द्वारा इस व्यवहार को ‘मजेदार’ बताना इसकी असलियत को छिपाता है। यह बड़े पैमाने पर गैर-सहमति से किया गया यौन शोषण है, जो डिजाइन संबंधी विकल्पों के कारण संभव हुआ है और सार्वजनिक वितरण द्वारा और भी बढ़ गया है।

भारत में कानूनी पहलू और डिजिटल अधिकार

भारत में कानून के लिहाज से देखें तो किसी महिला की फोटो को बिना अनुमति सेक्सुअल इमेज में बदलना केवल अनैतिक ही नहीं, बल्कि गैरकानूनी भी हो सकता है। भले ही कानून में डीपफेक शब्द साफ तौर पर न लिखा हो, लेकिन कई धाराएँ ऐसे कृत्यों को कवर करती हैं।

आईटी एक्ट की धारा 66E निजता के उल्लंघन को दंडित करती है। भले ही बिकिनी को नग्नता न माना जाए, लेकिन AI से बनाई गई ऐसी तस्वीरें महिला की निजता और गरिमा पर हमला करती हैं। IPC की धारा 354D साइबर स्टॉकिंग से जुड़ी है। अगर किसी महिला को बार-बार इस तरह टारगेट किया जाए या उसकी बदली हुई तस्वीरें फैलायी जाएँ, तो यह ऑनलाइन उत्पीड़न माना जा सकता है।

IT एक्ट की धारा 67 और 67A अश्लील कंटेंट फैलाने पर रोक लगाती हैं। अगर AI आउटपुट ज्यादा अश्लील हो जाता है, तो उसे शेयर करने वाले जिम्मेदार हो सकते हैं। धारा 509, मानहानि के कानून और महिलाओं का अशोभनीय चित्रण निषेध अधिनियम भी लागू हो सकते हैं।

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत फोटो व्यक्तिगत डेटा है और बिना सहमति उसका इस्तेमाल कानून के खिलाफ है। IT रूल्स 2021 के अनुसार, प्लेटफॉर्म को ऐसे कंटेंट पर तुरंत कार्रवाई करनी होती है।

भारतीय अदालतें भी अब डीपफेक जैसे मामलों को गंभीरता से ले रही हैं। कई हस्तियों को AI से बने फर्जी कंटेंट के खिलाफ राहत मिली है। अदालतें साफ कह चुकी हैं कि बिना अनुमति किसी की तस्वीर या पहचान का इस्तेमाल उसकी गरिमा और निजता का उल्लंघन है।

पीड़ित महिलाओं के पास क्या हैं विकल्प

अगर किसी भारतीय महिला की तस्वीर का इस तरह दुरुपयोग होता है, तो उसके पास रास्ते मौजूद हैं। सबसे पहले सबूत इकट्ठा करें, जैसे स्क्रीनशॉट, लिंक, यूजरनेम और समय। X पर रिपोर्ट करें और साफ लिखें कि तस्वीर बिना सहमति बदली गई है।

स्थानीय साइबर क्राइम सेल या पुलिस में शिकायत दर्ज कराएँ। राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल और राष्ट्रीय महिला आयोग से भी संपर्क किया जा सकता है। साइबर सुरक्षा एनजीओ या कानूनी सहायता संस्थाओं से मदद लें। दोष खुद पर न लें, गलती तकनीक का दुरुपयोग करने वालों की है। जरूरत पड़े तो कोर्ट से आदेश लेकर कंटेंट हटवाया जा सकता है।

यह पूरा मामला जवाबदेही, सख्त मॉडरेशन और सोच में बदलाव की माँग करता है। Reddit जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही गैर-सहमति वाले पोर्न और डीपफेक पर रोक लगा चुके हैं। पुराने ट्विटर में भी ऐसी नीतियाँ थीं। आज का X, इसके उलट, ऐसा AI होस्ट कर रहा है जो यही सब पैदा कर रहा है।

xAI और X को तुरंत सख्त नियम लागू करने होंगे। ‘एजि’ या ‘बोल्ड’ होने के नाम पर सहमति तोड़ने की कोई नैतिक या तकनीकी वजह नहीं हो सकती। अगर बाकी AI किसी की तस्वीर बिना अनुमति बदलने से इनकार कर सकते हैं, तो Grok भी कर सकता है। प्लेटफॉर्म स्तर पर भी साफ रिपोर्टिंग, तेज कार्रवाई और बार-बार गलती करने वालों पर बैन जरूरी है।

इसके साथ-साथ सोच में बदलाव भी जरूरी है। महिलाओं को डिजिटल तरीके से उतारने की उत्सुकता समाज की गहरी समस्या दिखाती है। डिजिटल सहमति पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि AI कुछ कर सकता है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे बिना जिम्मेदारी इस्तेमाल किया जाए। xAI को तो कदम उठाने ही होंगे, लेकिन यूजर्स को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।