चुनाव आते ही राज्यों में योजनाओं की बाढ़ आ जाती है। तमिलनाडु सरकार ने भी 2026 शुरू होते ही कई योजनाओं का ऐलान कर जनता को ‘खुश’ करने की कोशिश की है। डीएमके सरकार ने नई पेंशन योजना से लेकर पोंगल पर 3000 रुपए नकद, छात्रों को लैपटॉप और परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपए नकद खाते में डालने की योजना का विस्तार करने का ऐलान किया है। मुफ्त की ये योजनाएँ सरकार की नाकामी को छिपाने का अच्छा तरीका है।
INDI गठबंधन ने बिहार चुनाव से ऐन पहले जब महिलाओं के खातों में 10 हजार रुपए डाले थे, तो उसका विरोध किया था, लेकिन डीएमके सरकार जब तमिलनाडु में एक के बाद एक रेवड़ियाँ बाँटती रही है, तो उन्हें ये समाज कल्याण नजर आता है। देश में सबसे ज्यादा सब्सिडी पर खर्च तमिलनाडु में है। इसके अलावा देश में सबसे ज्यादा मुफ्त रेवड़ी देने वाले राज्यों में ये अव्वल है।
यहाँ तक कि सीएम स्टालिन ने बिहार में महिलाओं को 10000 रुपए देने की आलोचना करते हुए इसे ‘वोट खरीदने’ का तरीका बताया था। उनका कहना था कि ये आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन है। लेकिन चुनाव के ऐन पहले भले ही चुनाव के तारीख का ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन ऐन पहले जनता को पोंगल के नाम पर 3000 रुपए हर परिवार को ‘गिफ्ट’ के नाम पर देना और एक अन्य योजना में परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपए देना क्या वोट खरीदने का तरीका नहीं है।
डीएमके ने तमिलनाडु में शुरू किया था मुफ्त रेवड़ी बांटना
तमिलनाडु में डीएमके के संस्थापक अन्नादुरई ने ही 1 रुपए में 1 किलो चावल देने की शुरुआत की थी। लेकिन 2006 में पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कलर टीवी देना का वादा किया। इसका फायदा चुनाव में मिला और डीएमके सत्ता पर काबिज हो गई। इसके बाद मुफ्त की रेवड़ियाँ बांटने की परंपरा चल पड़ी। 2011 में डीएमके ने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वादा किया। 2021 के बाद तो डीएमके ने जमकर रेवड़ियाँ बांटी हैं।
हाल में सीएम स्टालिन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना लागू करने का ऐलान किया। इसके अलावा पोंगल पर 22 लाख आरसी फैमिली कार्ड धारकों को पोंगल पर 3000 रुपए कैश दिए जाएँगे। इससे पहले पोंगल पर 1 किलो भूरा चावल, 1 किलो चीनी और साबुत गन्ने को बतौर गिफ्ट देने की घोषणा की गई थी।
मुख्यमंत्री स्टालिन चेन्नई में 20 लाख कॉलेज छात्रों को लैपटॉप उपलब्ध कराने की योजना भी शुरू की। पहले चरण में सरकारी इंजीनियरिंग, कला, विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, विधि, पॉलिटेक्निक और आईटीआई के 10 लाख छात्र-छात्राओं को लैपटॉप दिया जा रहा है। इस दौरान डेल, एसर, एचपी जैसी बड़ी कंपनियों के लैपटॉप भी छात्रों को दिए जाएँगे।
तमिलनाडु पर देनदारी का बोझ
मुफ्त की योजनाओं पर होने वाला खर्च राजकोषीय घाटे का अहम कारण है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु की कुल बकाया देनदारी काफी अधिक हैं। मार्च 2025 के अंत में ₹9,55,690.5 करोड़ की देनदारी का अनुमान लगाया गया था।
मुफ्त की रेवड़ियों का विरोध इसलिए होता है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था पर बोझ डालती हैं। इससे लोगों की न्यूनतम जरूरतें पूरी हो जाती हैं और लोग काम नहीं करने की ओर प्रोत्साहित होते हैं। यही वजह है कि अर्थशास्त्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने रेवड़ी कल्चर पर चिंता जताई है और इसे लंबे वक्त के लिए नुकसानदायक बताया है।
दरअसल इससे राजनीतिक लाभ तो सीधा मिलता है, लेकिन राज्य का भला नहीं हो सकता। राज्य पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ उसके आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़ी बाधा है।
सोमनाथ… ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…”सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।
शास्त्रों में ये भी कहा गया है: “सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते। लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”
अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।
दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।
वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।
सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।
1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहाँ के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय काँप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।
हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।
सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।
1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।
महमूद गजनवी लूटकर चला गया लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर साँस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।
ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।
1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।
उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएँगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे। इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”
ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।
सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’ अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।
जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया लेकिन उसकी चेतना अमर रही।
इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।
अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहाँ आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा कि वबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य। अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।
आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।
1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।
अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।
अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।
जय सोमनाथ!
(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लेख अपने ब्लॉग पर लिखा है, आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)
कई वर्षों से भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का खिताब जीत रहा मध्य प्रदेश का इंदौर 2026 की शुरुआत में गंभीर स्वास्थ्य संकट की स्थिति में पहुँच गया है। जिले के भगीरथपुरा इलाके में पानी दूषित होने के कारण कम से कम 15 लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा लोग अब भी अस्पतालों में भर्ती हैं।
लोगों ने बताया कि नगर निगम के नल से आने वाला पानी बदबू मार रहा था और दिखने में भी गंदा था। इसी पानी को पीने के बाद लोगों की तबीयत खराब होने लगी। बीमार लोगों में उल्टी, दस्त, बुखार और शरीर में पानी की कमी जैसे लक्षण देखे गए। दूषित पानी पीने की वजह से यह बीमारी तेजी से फैली और कई लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
संकट कैसे बढ़ा: जानें पूरी टाइमलाइन
दिसंबर 2025 के मध्य में सबसे पहले भगीरथपुरा इलाके के लोगों को अपने नल के पानी में गड़बड़ी महसूस हुई। करीब 15 हजार आबादी वाले इस इलाके में नल का पानी रंग बदला हुआ था, उसमें सीवर जैसी बदबू आ रही थी और स्वाद भी कड़वा था। लोगों ने नगर निगम के अधिकारियों से लगातार शिकायत की लेकिन समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 25 दिसंबर तक भी मजबूरी में कई परिवार इसी पानी का इस्तेमाल खाना बनाने और पीने के लिए करते रहे।
27 और 28 दिसंबर को हालात तेजी से बिगड़ गए। दूषित पानी पीने से लोगों को पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियाँ होने लगीं। स्थानीय क्लीनिकों में कमजोरी और डिहाइड्रेशन से जूझते मरीज पहुँचने लगे। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने घर-घर जाकर जाँच करनी शुरू की। इसके बाद 29 दिसंबर को मामलों में अचानक भारी बढ़ोतरी हुई। मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने बताया कि खराब पानी से फैले दस्त के कारण कम से कम तीन लोगों की मौत हुई जबकि बड़ी संख्या में मरीजों को बड़े अस्पतालों में भर्ती कराया गया।
30 दिसंबर तक 100 से ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और रिपोर्ट्स के अनुसार कुल मिलाकर 1,100 से ज्यादा लोग बीमार हो चुके थे। मरीजों के लक्षण साफ तौर पर पानी से फैलने वाली बीमारियों की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद घर-घर सर्वे और तेज कर दिए गए। 31 दिसंबर तक मौतों की संख्या को लेकर स्थिति साफ नहीं थी। अधिकारियों ने 4 से 7 मौतों की बात कही जबकि कुछ परिवारों ने छह महीने के एक बच्चे की मौत को भी उसी दूषित पानी से बने दूध से जोड़कर देखा।
राज्य सरकार ने मृतकों के परिजन को 2 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की। प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई हुई। एक जोनल अधिकारी और एक सहायक इंजीनियर को निलंबित किया गया जबकि एक सब-इंजीनियर को बर्खास्त कर दिया गया।
1 और 2 जनवरी को लैब की रिपोर्ट से स्थिति पूरी तरह साफ हुई। पानी की सप्लाई में ई. कोलाई, साल्मोनेला और विब्रियो कॉलरा जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए। जाँच में पता चला कि पास के पुलिस चौकी के नजदीक एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से गुजर रही करीब 30 साल पुरानी पाइपलाइन टूट गई थी, जिससे सीवर का गंदा पानी सप्लाई लाइन में मिल गया।
इसके बाद टूटी पाइपलाइन को ठीक किया गया, उस हिस्से को अलग कर सफाई का काम शुरू हुआ। इलाके में रोजाना 20 से ज्यादा टैंकरों से साफ पानी की आपूर्ति की गई। अधिकारियों ने लोगों को सलाह दी कि जाँच पूरी तरह साफ होने तक नल का पानी उबालकर ही इस्तेमाल करें या उसका उपयोग न करें। कुल मिलाकर 1,400 से 2,000 लोग इस संकट से प्रभावित हुए और लोगों को राज्यभर में पानी की व्यवस्था को ठीक करने का का भरोसा दिया गया।
NHRC ने लिया संज्ञान
1 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मीडिया में आई खबरों के आधार पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने कहा कि अगर खबरें सही हैं, तो यह पीड़ितों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। एनएचआरसी ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करते हुए दो हफ्ते के भीतर पूरी रिपोर्ट माँगी है। आयोग ने माना कि इस तरह की लापरवाही ने लोगों उनमें भी खासकर कमजोर वर्गों के ‘सुरक्षित जीवन’ के अधिकार को नुकसान पहुँचाया है।
जल जीवन मिशन की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता
इसी बीच केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन के तहत जारी एक नई रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पेयजल की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रविवार (4 जनवरी 2026) को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों से लिए गए पानी के सैंपल में से 36.7% पीने के लायक नहीं पाए गए। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब इंदौर में शहर की जल आपूर्ति से जुड़ी समस्या के कारण अब तक 15 मौतों की पुष्टि हो चुकी है।
इंदौर जिले के ग्रामीण इलाकों में केवल 33% घरों तक ही सुरक्षित पीने का पानी पहँच रहा है और यह तय मानकों से काफी कम है। कुछ जिलों जैसे अलीराजपुर में स्थिति बेहतर रही और 100% घरों में पानी मिला जबकि अनूपपुर में यह आँकड़ा शून्य रहा। ग्वालियर में 20.9%, मुरैना में 25.2% घरों को ही पीने लायक पानी मिला। भोपाल में यह आँकड़ा 56.9% और जबलपुर में 54.3% रहा।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 23.4% घरों को नियमित जल आपूर्ति नहीं मिल रही थी। जाँच के दौरान 36.7 प्रतिशत जगहों पर नल खराब पाए गए। हालाँकि सिर्फ 3.7% लोगों ने पानी के स्वाद की शिकायत की लेकिन 22% लोगों ने कहा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिलता।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चेतावनियाँ वर्षों तक रहीं अनसुनी
यह संकट अचानक नहीं आया। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने साल 2016-17 में इंदौर में 60 जगहों पर भूजल की जाँच की थी, जिनमें भगीरथपुरा भी शामिल था। जाँच में लगभग सभी जगहों पर टोटल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा 100 मिलीलीटर में 10 MPN से ज्यादा पाई गई। यह साफ संकेत था कि खराब पाइपलाइन और ड्रेनेज के जरिए मल-मूत्र से जुड़ा सीवर का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।
बोर्ड ने इंदौर नगर निगम को साफ निर्देश दिए थे कि इन हैंडपंपों और कुओं को असुरक्षित घोषित किया जाए, वहाँ चेतावनी बोर्ड लगाए जाएँ और सीवर के पानी को सप्लाई लाइन में मिलने से रोका जाए। इसके बावजूद शहर के बड़े हिस्से में लगातार दिक्कतें बनी रहीं।
इंदौर की जल व्यवस्था पर चिंता 2019 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी सामने आई थी। यह रिपोर्ट इंदौर और भोपाल के जल प्रबंधन पर थी। इसमें बताया गया कि 2004 में एशियन डेवलपमेंट बैंक से 200 मिलियन डॉलर का कर्ज मंजूर किया गया था ताकि भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में पानी और स्वच्छता ढाँचे को सुधारा जा सके और सभी को साफ व नियमित पानी मिले।
2019 की कैग रिपोर्ट ने हालात की पोल खोल दी। रिपोर्ट के मुताबिक, इंदौर में रोजाना सिर्फ 4 जोन में ही पानी की सप्लाई होती थी, जबकि भोपाल में यह संख्या 5 जोन तक सीमित थी। कुल 9.41 लाख परिवारों में से करीब 5.30 लाख परिवारों के पास ही नल कनेक्शन था।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पानी की लीकेज ठीक करने में 22 से लेकर 108 दिन तक लग जाते थे। साल 2013 से 2018 के बीच 4,481 पानी के सैंपल खराब पाए गए। इसी दौरान भोपाल में 3.62 लाख और इंदौर में 5.33 लाख परिवारों को साफ पानी नहीं मिला। इन वर्षों में पानी से फैलने वाली बीमारियों के करीब 5.45 लाख मामले दर्ज हुए।
पानी की भारी बर्बादी भी सामने आई। नगर निकायों की टैक्स वसूली भी कमजोर रही और बकाया राशि 470 करोड़ रुपए तक पहुँच गई। पानी की उपलब्धता भी बेहद कम थी। भोपाल में प्रति व्यक्ति रोजाना सिर्फ 9 से 20 लीटर और इंदौर में 36 से 62 लीटर पानी की सप्लाई हो रही थी।
कैग रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पानी की टंकियों की नियमित सफाई नहीं होती थी और न ही पानी की बर्बादी रोकने के लिए कोई ऑडिट किया गया। विशेषज्ञों ने इसे आपराधिक लापरवाही बताया। उनका कहना है कि सीवर लाइनों को पीने के पानी की पाइपलाइनों के बेहद पास और लापरवाही से बिछाया गया। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि अगर सिर्फ एक भी पाइपलाइन सही हालत में होती, तो शायद किसी की जान नहीं जाती।
सरकारी कार्रवाई और आधिकारिक प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस पूरे मामले की जिम्मेदारी लेते हुए X पर सख्त कार्रवाई की जानकारी दी। उन्होंने इंदौर नगर निगम आयुक्त और अतिरिक्त आयुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए। साथ ही अतिरिक्त आयुक्त को पद से हटा दिया गया और जल कार्य विभाग के अधीक्षण अभियंता (सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर) को भी उनके पद से हटा दिया गया। खाली हुए पदों पर तुरंत अधिकारियों की तैनाती कर व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए गए।
आज सुबह मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों के साथ इंदौर के दूषित पेयजल प्रकरण में राज्य शासन द्वारा की जा रही कार्रवाई की समीक्षा की और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। अपर मुख्य सचिव (नगरीय प्रशासन एवं विकास) द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर भी चर्चा की।
31 दिसंबर को शुरुआती स्तर पर ही मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की गई। मुख्य चिकित्सा अधिकारी माधव प्रसाद हसानी ने कहा कि मरीजों को बेहतर से बेहतर इलाज देना सरकार की प्राथमिकता है। दूषित पाइपलाइन को तुरंत ठीक किया गया और रोजाना 20 से ज्यादा टैंकरों के जरिए सुरक्षित पानी की सप्लाई शुरू की गई। घर-घर जाकर जाँच करने पर सैकड़ों नए मरीज सामने आए जबकि अस्पतालों में अब भी करीब 200 मरीज भर्ती हैं और उनका इलाज जारी है।
हसानी ने ANI से कहा, “फिलहाल वरिष्ठ डॉक्टर और जिला प्रशासन के अधिकारी लगातार अस्पतालों में हालात पर नजर रखे हुए हैं और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि मरीजों को सही इलाज मिले। अभी रिकॉर्ड के अनुसार चार मौतें हुई हैं। हालाँकि, अगर आगे कोई अतिरिक्त डेटा या सबूत मिलता है तो आँकड़ों को अपडेट किया जाएगा।”
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
आज वेनेजुएला की तस्वीरें देखकर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि यही देश कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था। जिस देश के पास पृथ्वी का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है, वहाँ लोग खाने के लिए लाइन में खड़े हैं, अस्पतालों में दवाएँ नहीं हैं और लाखों लोग जान जोखिम में डालकर देश छोड़ चुके हैं। यह तबाही किसी युद्ध, विदेशी कब्जे या प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं है। यह एक ऐसी आर्थिक और राजनीतिक विफलता है, जिसे आधुनिक इतिहास में बिना युद्ध के ‘सबसे बड़ा आर्थिक पतन’ माना जा सकता है।
वेनेजुएला की कहानी यह समझने का मौका देती है कि कैसे वामपंथी विचारधारा, लोकलुभावन राजनीति और मुफ्तखोरी पर आधारित नीतियाँ किसी भी देश को अंदर से खोखला कर सकती हैं, चाहे उसके पास कितनी ही प्राकृतिक संपदा क्यों न हो। कभी यहाँ के लोग वीकेंड पर शॉपिंग करने के लिए प्लेन से सीधे मियामी जाते थे। यहीं नहीं वेनेजुएला को दुनिया के सबसे महँगे स्कॉच व्हिस्की और शैंपेन के सबसे बड़े खरीदार में से एक माना जाता था।
जब वेनेजुएला था लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश
बीसवीं सदी के मध्य तक वेनेजुएला विकास और समृद्धि का प्रतीक था। 1950 के दशक में जब यूरोप और एशिया के कई देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोबारा खड़े होने की कोशिश कर रहे थे, तब वेनेजुएला तेल की बदौलत आर्थिक ऊँचाइयों को छू रहा था।
1952 तक यह देश दुनिया का चौथा सबसे अमीर राष्ट्र बन चुका था। कराकस की सड़कों पर अमेरिकी और यूरोपीय शहरों जैसी चमक दिखती थी। आधुनिक इमारतें, शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन जीवनशैली आम बात थी।
उस दौर में वेनेजुएला की प्रति व्यक्ति आय कई विकसित यूरोपीय देशों से ज्यादा थी। देश में यह धारणा बनने लगी थी कि तेल एक ऐसा वरदान है जो कभी खत्म नहीं होगा। यही सोच आगे चलकर सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।
तेल की दौलत और भविष्य को नजरअंदाज करने की आदत
1960 के दशक में वेनेजुएला ने वैश्विक तेल राजनीति में अपनी ताकत दिखाई और सऊदी अरब व ईरान जैसे देशों के साथ मिलकर OPEC की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। 1970 के दशक में जब दुनिया तेल संकट से जूझ रही थी और कीमतें रिकॉर्ड ऊँचाई पर थीं, तब वेनेजुएला के खजाने में डॉलर की बाढ़ आ गई।
इसी दौर में वेनेजुएला ने एक गंभीर गलती कर दी। उसने यह मान लिया कि तेल ही उसकी तकदीर है और बाकी आर्थिक क्षेत्रों पर ध्यान देना जरूरी नहीं है। खेती, मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात आधारित उद्योग धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। देश आयात पर निर्भर होता गया। पैसे की भरमार थी तो खाने से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक के लिए विदेशी सामान मँगाया जाने लगा।
तेल की आसान कमाई ने मेहनत और सुधार की जरूरत को खत्म कर दिया। यही वह स्थिति थी जिसे अर्थशास्त्र में ‘डच डिजीज’ कहा जाता है, जहाँ एक सेक्टर इतना हावी हो जाता है कि पूरी अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाती है।
1999 के बाद का मोड़: वामपंथ और लोकलुभावन राजनीति
1999 में ह्यूगो चावेज के सत्ता में आने के साथ ही वेनेजुएला की राजनीति और अर्थव्यवस्था ने एक नया मोड़ लिया। चावेज ने समाजवादी और वामपंथी मॉडल को अपनाया और खुद को गरीबों का रक्षक घोषित किया। तेल से होने वाली कमाई को उन्होंने सामाजिक योजनाओं और सब्सिडी में झोंक दिया।
पेट्रोल इतना सस्ता कर दिया गया कि वह लगभग मुफ्त हो गया। बिजली और दूसरी सेवाओं पर भारी सब्सिडी दी गई। शुरुआत में इन नीतियों से गरीबी में कमी आई और चावेज बेहद लोकप्रिय हो गए। लेकिन यह लोकप्रियता टिकाऊ विकास पर नहीं बल्कि मुफ्त सुविधाओं पर आधारित थी।
सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सरकार ने अच्छे समय में बुरे समय के लिए कोई तैयारी नहीं की। तेल की कमाई को बचाने या निवेश करने के बजाय उसे तुरंत खर्च कर दिया गया। यह रेवड़ी पॉलिटिक्स थी, जिसमें वर्तमान की लोकप्रियता के लिए भविष्य को गिरवी रख दिया गया।
निजी सेक्टर से दुश्मनी और संस्थागत तबाही
चावेज और बाद में निकोलस मादुरो की सरकारों ने निजी उद्योग और बाजार को शोषण का प्रतीक बताया। हजारों कंपनियों और लाखों हेक्टेयर जमीन का राष्ट्रीयकरण किया गया। कई बार यह सब बिना किसी मुआवजे के हुआ। इससे निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट गया।
सरकार ने कीमतों और मुनाफे पर नियंत्रण लगाया। रोजमर्रा के सामान की कीमतें सरकारी आदेश से तय होने लगीं। नतीजा यह हुआ कि कंपनियों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो गया। उत्पादन घटा, बाजार में सामान की कमी हुई और ब्लैक मार्केट फलने-फूलने लगा।
निजी सेक्टर के कमजोर होने से रोजगार खत्म हुए और देश की उत्पादन क्षमता लगभग ठप हो गई। वेनेजुएला, जो कभी कई कृषि उत्पादों का निर्यातक था, अब आयात पर पूरी तरह निर्भर हो गया।
PDVSA: जब राजनीति ने विशेषज्ञता को कुचल दिया
वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA कभी दुनिया की सबसे कुशल तेल कंपनियों में गिनी जाती थी। लेकिन वामपंथी शासन में इसे भी राजनीतिक नियंत्रण में ले लिया गया। अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को हटाकर राजनीतिक रूप से वफादार लोगों को नियुक्त किया गया।
तेल उद्योग में जरूरी निवेश और मेंटेनेंस को नजरअंदाज किया गया। इसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा। उत्पादन गिरता चला गया और इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर होता गया। जिस देश की पहचान तेल थी, वही तेल निकालने की क्षमता खोने लगा।
तेल की कीमत गिरी और ढह गई झूठी समृद्धि
2014 में जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें अचानक गिर गईं, तब वेनेजुएला पूरी तरह असुरक्षित था। जिन देशों ने अच्छे समय में बचत की थी, वे इस झटके को झेल पाए। वहीं वेनेजुएला ने सब पैसा उड़ा दिया था और ऊपर से भारी कर्ज भी ले रखा था।
इस संकट से उबरने के लिए सरकार को सुधार करने चाहिए थे लेकिन उसने इसके बजाय आसान और खतरनाक रास्ता चुना। घाटा पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक से नोट छपवाए जाने लगे। इससे मुद्रा की कीमत तेजी से गिरने लगी।
हाइपरइन्फ्लेशन: जब पैसा खो बैठा अपनी कीमत
नोट छापने का नतीजा हाइपरइन्फ्लेशन (बहुत तेजी से बढ़ती महँगाई) के रूप में सामने आया। कीमतें इतनी तेजी से बढ़ने लगीं कि लोगों की सैलरी और बचत बेकार हो गई। एक समय ऐसा आया जब लोग सामान खरीदने के लिए नोट गिनते नहीं थे, बल्कि तौलते थे। मध्यम वर्ग पूरी तरह तबाह हो गया। गरीबी इतनी बढ़ी कि लाखों लोग देश छोड़कर पड़ोसी देशों की ओर पलायन करने लगे। यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण पलायन बन गया।
अमेरिकी प्रतिबंध और पहले से टूटी अर्थव्यवस्था: दुनिया को बड़ा सबक
2019 के बाद अमेरिका ने वेनेजुएला और उसकी तेल कंपनी पर सख्त प्रतिबंध लगाए। इससे हालात और बिगड़े, जब वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को संभालने जाने की जरूरत थी तब अमेरिकी ने उसे और गर्त में पहुँचाने का काम किया। यानी पहले से गिरे वेनेजुएला को एक और लात अमेरिका ने मार दी।
वेनेजुएला आज अपनी 80 प्रतिशत से ज्यादा अर्थव्यवस्था खो चुका है। यह कहानी बताती है कि प्राकृतिक संसाधन किसी देश को अमीर नहीं बनाते, बल्कि सही नीतियाँ और मजबूत संस्थाएँ बनाती हैं। वामपंथी लोकलुभावन वाद और रेवड़ी पॉलिटिक्स अल्पकाल में लोकप्रिय हो सकती हैं लेकिन लंबी अवधि में देश को बर्बाद कर देती हैं। वेनेजुएला की त्रासदी एक चेतावनी है कि अगर नीति, अनुशासन और संस्थागत संतुलन खत्म हो जाए, तो समृद्ध से समृद्ध देश भी भूखा हो सकता है।
अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो के घर के अंदर की खबर से लेकर देश के अहम ठिकानों और लोगों की महीनों से जासूसी की गई। ऑपरेशन के दौरान सीआईए की एक सीक्रेट टीम वेश बदलकर वेनेजुएला में दाखिल हुई। मादुरों की डेली रूटीन पर नजर रखना, उनसे जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात की जानकारी ले रही थी।
ये रोजाना रूटीन को ट्रैक करते, सुबह कहाँ जाते हैं मादुरो, किससे मिलते हैं। कब क्या करते हैं। यहाँ तक कि उनके घर के कुत्ते-बिल्लियों की आदतों की भी जानकारी ली गई। घर से लेकर बाहर तक की हर जानकारी लेने के लिए अमेरिकी जासूस काराकस की गलियों में छिप कर रह रहे थे। आसमान से भी कई अमेरिकी स्टेल्थ ड्रोन उड़ते रहते, जो वीडियो और फोटो भेजते थे। 2019 में अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्तों में इतनी खटास आ गई थी कि अमेरिका ने अपना दूतावास वहाँ बंद कर दिया था। वेनेजुएला का दूतावास भी अमेरिका में बंद किया गया था। ऐसे में जासूस अगर पकड़े जाते, तो मौत निश्चित थी।
मादुरों का करीबी एक ऐसा व्यक्ति था, जो अमेरिका को पूरी खबर देता था। मादुरो को पकड़ने की जिम्मेदारी अमेरिका के सबसे खतरनाक और स्पेशल यूनिट डेल्टा फोर्स को सौंपा गया। स्पेशल टीम ने स्पेशल ट्रेनिंग की। ट्रेनिंग के दौरान हर संभव आने वाली दिक्कतों की ट्रेनिंग दी गई, जैसे- अंधेरे में हमला करना, लोहे के दरवाजे तोड़ना आदि। ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ नाम से ये ऑपरेशन चलाया गया।
डेल्टा फोर्स को बता दिया गया था कि राष्ट्रपति मादुरो अपने घर बदलते रहते हैं और 6 से 8 ठिकाने हैं, जहाँ वे परिवार के साथ रहते हैं। ऑपरेशन के दिन अमेरिका को शाम तक नहीं पता चल पाया था कि राष्ट्रपति मादुरो रात कहाँ गुजारने वाले हैं। ऑपरेशन के लिए ये जानना जरूरी था, ताकि उस परिसर में ही अमेरिकी सैनिक उतरे, जहाँ वे ठहरे हों।
विमानों और हेलीकॉप्टरों की तैनाती बढ़ाई गई
ऑपरेशन से कई दिनों पहले अमेरिका ने अपने क्षेत्र में लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों की संख्या काफी बढ़ा दी थी। इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रीपर ड्रोन, खोजी ड्रोन और दूसरे हथियार तैनात किए गए। हमले से एक हफ्ते पहले सीआईए ने वेनेजुएला के एक बंदरगाह पर ड्रोन स्ट्राइक की, जो ड्रग से भरे नौकाओं और जहाजों को नष्ट करने के लिए थी।
राष्ट्रपति ट्रंप ने इसकी जानकारी दी थी कि नौका में ड्रग्स भरे थे इसलिए इस पर हमला किया गया और इस दौरान 115 लोग मारे गए।
क्रिसमस पर होने वाला था हमला
वेनेजुएला पर छिटपुट हमले महीनों से जारी थे। अमेरिकी हमलों को रोकने के लिए राष्ट्रपति मादुरो ने अमेरिका के सामने एक प्रस्ताव रखा। हमले को रोकने के बदले में वेनेजुएला के तेल तक अमेरिका की पहुँच को स्वीकार किया जाने वाला था। हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने मादुरो को देश छोड़कर तुर्किए जाने को कहा। इसके बाद मादुरो ने प्रस्ताव वापस ले लिया। अमेरिका ने इस पर कहा कि मादुरो डील को लेकर सीरियस नहीं हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने 25 दिसंबर को ही हमले की अनुमति दे दी थी। लेकिन हमले का वक्त निश्चित करने का अधिकार सेना और डेल्टा फोर्स की अगुवाई करने वाले सेना के अधिकारी को दे दिया गया। अमेरिकी सेना ने क्रिसमस का वक्त चुना था क्योंकि उस वक्त कई वेनेजुएलाई अधिकारी छुट्टी पर थे, लेकिन मौसम खराब होने की वजह से ऑपरेशन टल गया।
3 जनवरी की रात वेनेजुएला का आसमान साफ था। इसको देखते हुए शाम 4.30 बजे उपकरणों को व्यवस्थित कर दिया गया। एयरक्राफ्ट, रीपर ड्रोन, सर्च एंड रेस्क्यू हेलीकॉप्टर और फाइटर जेट तैनात कर दिए गए।
हमले का पूरा लाइव टेलीकास्ट राष्ट्रपति ट्रंप ने देखा
राष्ट्रपति ट्रंप मार ए लागो क्लब में डिनर कर रहे थे। इस वक्त कैबिनेट के सदस्य और दूसरे नजदीकी लोग मौजूद थे। कमरे में एक बड़ा स्क्रीन लगा हुआ था, जिस पर पूरा ऑपरेशन राष्ट्रपति ट्रंप ने सेना के अधिकारियों और अहम लोगों के साथ देखा। रात 10.46 बजे ट्रंप ने डिनर करने के बाद ऑपरेशन शुरू करने की इजाजत दी।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देखा कि कैसे हाई-ट्रेंड अमेरिकन डेल्टा फ़ोर्स के सैनिक काराकस में निकोलस मादुरो के घर में घुसे। उस वक्त वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सो रहे थे। अमेरिकी सैनिक करीब 2 बजे हेलीकॉप्टर से परिसर में उतरे। राष्ट्रपति मादुरो के सिक्योरिटी को हमले का अंदाज लग गया था। इसलिए दोनों तरफ से फायरिंग हुई। इस फायरिंग में एक अमेरिकी हेलीकॉप्टर डैमेज हुआ। इस बीच विस्फोटक का इस्तेमाल कर दरवाजा तोड़ा गया।
3 मिनट के अंदर सैनिक पहुँच गए। उन्हें पहले से ही चप्पे चप्पे का पता था इसलिए तुरंत ये राष्ट्रपति मादुरो के कमरे तक पहुँच गए। राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी अपने सेफ रूम में जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अमेरिकी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया।
दरअसल स्टील-एनफ़ोर्स्ड सेफ रूम में वे दोनों चले भी गए थे, लेकिन उसे बंद नहीं कर पाए, इसलिए अमेरिकी सैनिक उन्हें पकड़ने में कामयाब रहे। यह पूरा घटनाक्रम बड़े से पर्दे पर अमेरिका में बैठे राष्ट्रपति ट्रंप और उनके साथियों ने लाइव देखा।
यह महीनों तक चले कैंपेन का नतीजा था । राष्ट्रपति ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को हटाना चाहते थे, लेकिन बड़ी लड़ाई में फँसे बिना। इसलिए महीनों की मेहनत के बाद क्रिसमस से कुछ दिन पहले ऑपरेशन को हरी झंडी दी गई।
साउथ फ्लोरिडा में अपने शानदार प्राइवेट क्लब में इकट्ठा हुए नेशनल सिक्योरिटी अधिकारियों से ट्रंप ने कहा, “गुड लक, और गॉडस्पीड।”
अमेरिकी हेलीकॉप्टर जल्द ही समुद्र के पार, पानी से 100 फीट ऊपर काराकास की ओर उड़ने लगी। शनिवार सुबह ट्रंप ने सोशल मीडिया ट्रुथ सोशल पर मादुरो की तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर में मादुरो अमेरिकी सैनिकों की कस्टडी में थे। उन्हें हथकड़ी लगाई गई थी। वे ग्रे स्वेटपैंट पहने हुए थे और ब्लैकआउट गॉगल्स लगा रखी थी।
(राष्ट्रपति मादुरो की तस्वीर ,फोटो साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)
पहले बिजली काटी, फिर एयरक्राफ्ट ने बोला धावा
ऑपरेशन की शुरुआत साइबर अटैक से की गई। सबसे पहले काराकस की बिजली काट दी गई। 150 से ज्यादा मिलिट्री एयरक्राफ्ट 20 अलग अलग बेस और नेवी शिप्स से उड़े और एक साथ कई ठिकानों पर हमला कर दिया। ये लोग समुद्र से थोड़ी ही ऊपर उड़ रहे थे। जैसे ही विमान कराकस की ओर बढा, अमेरिकी सेना ने ये सुनिश्चित किया कि सबकुछ सही से हो। किसी को ऑपरेशन की भनक न लगे।
अमेरिका ने ज्यादातर अटैक रेडियो टावर और ऐसी जगहों पर किए, जिससे जनहानि कम हो। हेलीकॉप्टर ने 160 स्पेशल ऑपरेशन एविएशन रेजिमेंट के नाइट स्टॉकर्स, जो रात में कम ऊंचाई पर उड़ने के लिए मााहिर हैं, उनका इस्तेमाल किया गया।
मादुरो को न्यूयॉर्क लाया गया
मादुरो को न्यूयॉर्क नेशनल गार्ड बेस लाया गया। फिलहाल उन्हें ब्रुकलिन जेल में रखा गया है। पूरे ऑपरेशन में अमेरिका के करीब आधा दर्जन सैनिक घायल हुए जबकि वेनेजुएला के करीब 40 लोगों की जान गई। इनमें सैनिक के साथ-साथ आम जनता भी शामिल है।
अमेरिका की नजर वेनेजुएला के तेल भंडार पर है। राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा कर दी है कि अमेरिका अब तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेगा। साथ ही कहा है कि वेनेजुएला को अमेरिका चलाएगा। हालाँकि इस तरह चलाना है इसकी जानकारी नहीं दी है। दूसरी तरफ वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को कार्यभार संभालने के लिए कहा है।
भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डिफेन्स एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने हाल ही में तीनों सेनाओं को 79,000 करोड़ रुपए के हथियार खरीदने की मंजूरी दी है। इन हथियारों में इजरायल से SPICE-1000 ग्लाइड बम किट की खरीद को मंजूरी दी है। यह निर्णय ऐसे समय पर सामने आया है जब भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अपने स्वदेशी लॉन्ग-रेंज ग्लाइड बम ‘गौरव’ के विकास पर वर्षों से काम कर रहा है और अब वो बनकर भी तैयार है।
इसी कारण यह फैसला रक्षा मामलों से जुड़े विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। इसे केवल एक एक्सपोर्ट से जुटे निर्णय के रूप में नहीं बल्कि भारत की डिफेंस नीति के बड़े दृष्टिकोण के तौर पर देखा जा रहा है। इस निर्णय में साफ तौर पर यह दिखता है कि सरकार ने तत्काल सैन्य जरूरतों, खर्च और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।
SPICE-1000 क्या है?
SPICE-1000 का पूरा नाम ‘स्मार्ट, प्रिसाइस इम्पैक्ट, कॉस्ट-इफेक्टिव’ (SPICE) है। यह एक आधुनिक स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन स्ट्राइक ग्लाइड बम किट है जो किसी सामान्य 1,000 पाउंड के एयरक्राफ्ट बम को अत्याधुनिक गाइडेड हथियार में बदल देती है। इस किट की खास बात यह है कि यह पारंपरिक बम को ऐसा हथियार बना देती है जो अपने लक्ष्य तक खुद पहुँच सकता है और उसे पहचान भी सकता है।
SPICE-1000 में एक खास तरह की ग्लाइड बॉडी होती है, जो बम को हवा में काफी दूर तक जाने में मदद करती है। इसके साथ ही इसमें INS और SATNAV आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है और अंतिम चरण में लक्ष्य को सटीक तरीके से निशाना बनाने के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सीकर भी मौजूद होता है। इन सभी तकनीकों के मेल से यह हथियार बेहद सटीक हमला करने में सक्षम बनता है।
SPICE-1000 की टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल खूबियाँ
SPICE-1000 की सबसे बड़ी ताकत इसका ऑटोनॉमस टारगेट एक्विजिशन सिस्टम है। यह सिस्टम रियल-टाइम में मिलने वाली EO तस्वीरों की तुलना पहले से मिशन के लिए सेव किए गए डेटा से करता है और बिना किसी बाहरी मदद के अपने लक्ष्य को पहचान लेता है। यानी बम को छोड़ने के बाद भी वह खुद तय कर सकता है कि उसे कहाँ वार करना है।
इसके अलावा इसमें टू-वे डेटा लिंक की सुविधा भी दी गई है, जिससे उड़ान के दौरान पायलट या वेपन सिस्टम ऑफिसर हथियार से संपर्क बनाए रख सकता है और जरूरत पड़ने पर आखिरी समय में भी जरूरी बदलाव कर सकता है।
सटीकता के मामले में SPICE-1000 को बेहद भरोसेमंद हथियार माना जाता है। इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल तीन मीटर से भी कम बताया जाता है यानी लक्ष्य से चूकने की संभावना बहुत कम होती है। यह क्षमता दिन और रात दोनों समय काम करती है और खराब मौसम में भी इसकी प्रभावशीलता बनी रहती है।
इसकी स्टैंड-ऑफ रेंज करीब 125 किलोमीटर तक है जिससे लड़ाकू विमान दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से बाहर रहते हुए ही हमला कर सकते हैं। भारतीय वायुसेना पहले ही SPICE-2000 और SPICE-250 जैसे वेरिएंट का इस्तेमाल कर चुकी है और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक में इनके सफल उपयोग ने इस हथियार प्रणाली पर वायुसेना का भरोसा और भी मजबूत कर दिया है।
DRDO का ‘गौरव’ बम
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 8 से 10 अप्रैल 2025 के बीच भारतीय वायुसेना के Su-30 MKI लड़ाकू विमान से ‘गौरव’ के रिलीज ट्रायल को सफलतापूर्वक पूरा किया था। ट्रायल्स के दौरान गौरव बम को विमान के अलग-अलग स्टेशनों पर और विभिन्न वॉरहेड कॉन्फिगरेशन के साथ लगाया गया था। इन परीक्षणों के दौरान गौरव बम ने लगभग 100 किलोमीटर के करीब की दूरी से बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता को सफलतापूर्वक साबित किया।
LRGB (Long Range Glide Bomb) ‘गौरव’ एक 1000 किलोग्राम श्रेणी का ग्लाइड बम है जिसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से डिजाइन और विकसित किया गया है। इसका विकास रिसर्च सेंटर इमारत, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज, चांदीपुर द्वारा किया गया है। इसके विकास में अदाणी डिफेंस और भारत फोर्ज जैसी निजी भारतीय कंपनियाँ भी सहयोग कर रही हैं। गौरव को खास तौर पर 1,000 किलोग्राम के हाई-स्पीड लो ड्रैग बम के लिए एक ग्लाइड और नेविगेशन किट के रूप में तैयार किया गया है, ताकि मौजूदा बमों को अपेक्षाकृत कम लागत में लंबी दूरी के सटीक हथियार में बदला जा सके।
‘गौरव’ की ताकत और उसकी सीमाएँ
गौरव बम में INS और SATNAV पर आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसकी मदद से यह तय किए गए रास्ते पर उड़ते हुए सीधे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इसके साथ ही इसमें सेमी-एक्टिव लेजर होमिंग सीकर लगाने की सुविधा भी है। इसका मतलब यह है कि जब लक्ष्य को लेजर से लाइट किया जाता है, तो गौरव बम बहुत सटीक तरीके से उस पर हमला कर सकता है। Su-30MKI लड़ाकू विमान से किए गए परीक्षणों में इस बम ने करीब 100 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता दिखाई है। सही तरीके से लेजर टारगेटिंग होने पर इसकी सटीकता काफी बेहतर मानी जाती है।
हालाँकि, गौरव बम की कुछ सीमाएँ भी हैं। अभी इसमें SPICE-1000 की तरह अपना अलग EO या IR सीकर नहीं है। इस वजह से यह अपने आप लक्ष्य को पहचान नहीं सकता। इसकी सटीकता बाहरी लेजर डिजिग्नेशन पर निर्भर करती है, जो आमतौर पर ड्रोन या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म के जरिए किया जाता है। इससे ऐसे प्लेटफॉर्म पर खतरा भी बढ़ सकता है और खराब मौसम में लेजर गाइडेंस पर असर पड़ने की संभावना रहती है।
रणनीतिक रूप से इसलिए जरूरी है SPICE-1000
SPICE-1000 और गौरव के बीच यही बुनियादी फर्क भारत की हथियार खरीद की रणनीति को समझने में मदद करता है। SPICE-1000 में मौजूद EO/IR सीकर उसे पूरी तरह आत्मनिर्भर बना देता है, जिससे बम अपने आप लक्ष्य को पहचान सकता है और हमले के तरीके में ज्यादा लचीलापन मिलता है। इसके उलट, गौरव को लक्ष्य पर सटीक हमला करने के लिए बाहर से लेजर सपोर्ट की जरूरत होती है।
इसका मतलब यह है कि लेजर से निशाना दिखाने वाले ड्रोन या दूसरे प्लेटफॉर्म को दुश्मन की एयर डिफेंस के करीब जाना पड़ता है और इससे उनका जोखिम बढ़ जाता है। इसके साथ ही, बादल, धूल, धुआँ या खराब मौसम जैसी स्थितियों में लेजर गाइडेंस ठीक से काम न करे तो पूरे मिशन की सफलता पर असर पड़ सकता है।
लागत और क्षमता के संतुलन के जरूरी SPICE-1000
रक्षा खरीद में लागत और क्षमता के बीच संतुलन बनाना हमेशा एक अहम चुनौती रहता है, खासकर तब जब देश के पास स्वदेशी विकल्प भी मौजूद हों। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक SPICE-1000 किट की कीमत करीब 4.8 लाख अमेरिकी डॉलर यानी लगभग चार करोड़ रुपए बताई जाती है। इतनी ज्यादा कीमत होने के कारण इसे पूरी वायुसेना में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना व्यावहारिक नहीं माना जाता। फिर भी भारतीय वायुसेना इसे उन खास अभियानों के लिए जरूरी समझती है, जहाँ बहुत अहम और भारी सुरक्षा वाले लक्ष्यों को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करना होता है।
वहीं, दूसरी तरफ ‘गौरव’ जैसी स्वदेशी प्रणाली कम लागत में तैयार की जा सकती है और इसे बड़ी संख्या में तैनात करना संभव है। यह खास तौर पर स्थायी बुनियादी ढाँचे जैसे ठिकानों पर हमले के लिए उपयोगी मानी जाती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस समय एक मिश्रित रणनीति अपना रहा है, जिसमें सीमित संख्या में SPICE-1000 जैसे महँगे लेकिन बेहद सक्षम हथियार रखे जाएँगे जबकि बड़ी मात्रा में गौरव जैसे स्वदेशी और किफायती सिस्टम इस्तेमाल किए जाएँगे ताकि लागत और क्षमता दोनों के बीच संतुलन बना रहे।
रणनीतिक सोच और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ते कदम
SPICE-1000 की खरीद को DRDO की अनदेखी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे तत्काल ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने, मौजूदा क्षमता के अंतर को भरने और भविष्य में स्वदेशी प्रणालियों को समय के साथ और मजबूत होने का समय देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। SPICE-1000 पहले से युद्ध में परखा हुआ भरोसेमंद हथियार है जबकि ‘गौरव’ जैसे स्वदेशी बम अभी विकास और परिपक्वता के चरण में हैं। आने वाले समय में गौरव में EO या IR सीकर और उन्नत मिशन प्रोफाइल जैसी क्षमताओं के जोड़े जाने की संभावना है। यह आने के बाद इसकी सटीकता और बढ़ जाएगी।
भारत की रक्षा नीति आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि अगर किसी हथियार को डेवलप कर उसे उन्नत बनाने में समय लग रहा है तो इसका असर सेना पर ना पड़ने पाए। DRDO द्वारा विकसित गौरव जैसे स्वदेशी सिस्टम धीरे-धीरे भारत को रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे ले जा रहे हैं।
इस तरह भारत की रणनीति साफ है कि एक ओर आवश्यक हथियारों के आयात से तत्काल सैन्य जरूरतों को पूरा किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर स्वदेशी प्रणालियों के विकास के जरिए भविष्य में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
3 जनवरी 2025 को लेफ्ट-विंग लिबरल इकोसिस्टम को मोदी सरकार के खिलाफ बोलने का एक और कारण मिल गया, जब बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (BCCI) ने कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) को बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिज़ुर रहमान को आने वाले इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) सीजन से रिलीज करने का निर्देश दिया।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में हिंदुओं को अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से टारगेटेड हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। बांग्लादेशी खिलाड़ी रहमान को शामिल किए जाने पर लोगों में काफी गुस्सा था। इस राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बेकाबू इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं के घरों, मंदिरों पर हमला किया। हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग हुई। इसके बाद बांग्लादेशी खिलाड़ियों को आईपीएल की टीम में सेलेक्शन का विरोध हुआ और बैन करने की माँग उठने लगी।
BCCI सेक्रेटरी देवजीत सैकिया ने कन्फ़र्म किया कि बोर्ड ने KKR को अपने फैसले के बारे में ऑफ़िशियली बता दिया था और अगर फ़्रैंचाइज़ी चाहे तो उसे रिप्लेसमेंट खिलाड़ी साइन करने की इजाज़त दे दी थी। KKR ने बाद में साफ़ किया कि उसने मुस्तफ़िज़ुर रहमान को अपनी टीम से रिलीज कर दिया है।
हिन्दुओं पर अत्याचारों की वजह से लोगों का गुस्सा
शेख हसीना को हटाए जाने के बाद लगातार भारत-बांग्लादेश के रिश्ते खराब होते जा रहे हैं, लेकिन हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की मॉब लिंचिंग और ‘ईशनिंदा’ का आरोप लगा कर लगातार हिंदुओं पर हो रहे हमलों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। ये घटनाएँ धार्मिक ज़ुल्म के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा थीं, जिसे बांग्लादेशी सरकार पूरी तरह से रोकने में नाकाम रही है।
NDTV की गार्गी रावत ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया: “सोचिए कि इससे हमारे पड़ोसी बांग्लादेश को कैसा मैसेज जाएगा। संगीत सोम ने अपने घरेलू दर्शकों के लिए पॉइंट्स बनाए होंगे, लेकिन इससे भारत की डिप्लोमेसी और रिश्तों को नुकसान होगा।”
Imagine what kind of message this sends to our neighbour Bangladesh .. Sangeet Som may have scored points for his domestic audience but this damages India’s diplomacy and relations. #KKR#BCCIhttps://t.co/2nbmM5pxKB
राम गुहा, जो खुद को इतिहासकार बताते हैं और जिन्हें फैक्ट्स को तोड़-मरोड़कर पेश करने और कहानी गढ़ने का हुनर है, ने बीसीसीआई के फैसले को ‘बहुत ही बेवकूफी भरा’ बताया। उन्होंने कहा कि ढाका के साथ अच्छे रिश्तों के लिए क्रिकेट के रिश्ते बहुत जरूरी हैं। इस तरह का कदम बांग्लादेश को इस्लामाबाद के और करीब ला सकता है।
This is a deeply unwise move. It is in India's national interest to have good relations with Bangladesh, and cricketing ties can vitally help in that. This short-sighted decision may only make Dhaka come closer to Islamabad. https://t.co/B0hWXT2mQa
विदेशी मामलों की एडिटर सुहासिनी हैदर ने कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर बांग्लादेश जा सकते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बांग्लादेशी नेताओं से मिल सकते हैं, लेकिन एक क्रिकेटर को भारत में खेलने का हक नहीं दिया जा रहा है।
With neighbour after neighbour, the government allows social media campaigns to overpower its diplomacy and destroy Indian soft power.
EAM Jaishankar can visit Dhaka, PM Modi can meet Bangladesh leader, but a cricketer cant play in an Indian team. https://t.co/OGo8DfF5zb
इसी बात में और जोड़ते हुए, ‘कॉलमिस्ट’ सबा नकवी ने भी BCCI के निर्देश के कुछ घंटों बाद कहा कि भारत ने दक्षिण एशिया में अपनी सारी ‘नैतिक प्रतिष्ठा’ खो दी है और एक बांग्लादेशी खिलाड़ी को कमर्शियल लीग में खेलने की इजाजत न देकर ‘मतलबी’ बन गया है।
X पर एक लंबे पोस्ट में, नकवी ने कहा कि बांग्लादेश की आजादी में भारत की ऐतिहासिक भूमिका रही है। बांग्लादेश का राष्ट्रगान रवींद्रनाथ टैगोर का लिखा हुआ है। भारत में अभी भी बांग्लादेशी की पूर्व प्रधानमंत्री की मेजबानी कर रहा है, ऐसे हालात में ये फैसला नहीं होना चाहिए था।
उन्होंने आगे दावा किया कि भारत एक ‘बड़ी ताकत की तरह नहीं, बल्कि घटिया और असभ्य स्क्रिप्ट’ चुन रहा है, जो कथित तौर पर आने वाले राज्यों के चुनावों और ‘हिंदू कट्टरपंथियों’ की वजह से हो रहा है। अंत में उन्होंने दुख जताया कि भारत एक ‘नैतिक ताकत जिसकी दुनिया तारीफ़ करती थी’ को गिरा दिया है।
We have the deposed Bangladesh prime minister on Indian soil, the national anthem of that country is a composition by Rabindranath Tagore, we have always claimed a historical role in the liberation of Bangladesh. But today we are so mean spirited that we cannot allow an athlete…
यह तर्क नैतिकता की चिंता के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को महत्वहीन बनाने के लिए दिया गया है। एक बार फिर हिन्दुओं के साथ हो रही हिंसा को एक छोटी सी परेशानी माना गया, जबकि एक विदेशी एथलीट को प्राइवेट लीग से बाहर करने को सभ्यता का संकट बना दिया गया।
नैतिकता में ‘चुनाव’ और पाखंड
नैतिकता पर ये उपदेश सिर्फ भारत की सरकार के लिए होते हैं। अगर विराट कोहली को राजनीतिक कारणों से किसी विदेशी देश में खेलने से रोक दिया जाता, तो वही वामपंथी विचारक तुरंत इसे भारत की विदेश नीति की नाकामी बता देते। कोई भी बैन लगाने वाले देश पर सवाल नहीं उठाता। इसके बजाय, नई दिल्ली से खुद को समझाने के लिए कहा जाता।
यह तरीका सिर्फ खेलों तक ही सीमित नहीं है। जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाए, तो लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम भारत की विदेश नीति पर सवाल खड़े करने लगा। कुछ लोगों ने पूछा कि अमेरिका भारत को वॉशिंगटन के फायदे वाले ट्रेड डील के लिए मजबूर क्यों कर रहा था। हमेशा की तरह, सबसे पहले भारत पर इल्जाम लगाया गया।
चाहे मुद्दा डिप्लोमेसी हो, ट्रेड हो, या क्रिकेट, स्क्रिप्ट में कोई बदलाव नहीं होता। भारत का खुद को साबित करना एक नैतिक नाकामी के तौर पर दिखाया जाता है। भारत का जनता की भावनाओं पर प्रतिक्रिया देना मेजॉरिटी की दादागिरी के तौर पर दिखाया जाता है। इसके अलावा सरकार जब अपने फैसले ‘एलीट क्लास’ की मंज़ूरी के बगैर लेती है तो इसे सभ्यता का पतन बताया जाता है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर न्यूयॉर्क ले जाए जाने के बाद वेनेजुएला में सत्ता की जिम्मेदारी डेल्सी रोड्रिगेज के हाथों में आ गई है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तत्काल अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया है ताकि प्रशासनिक कार्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा में निरंतरता बनी रहे।
हालाँकि, मादुरो ने पहले ही कहा था कि वे देश के राष्ट्रपति हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि डेल्सी रोड्रिगेज ने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली है और वे अमेरिका के निर्देशानुसार देश को चलाने में सहयोग कर रही हैं।
कौन हैं डेल्सी रोड्रिगेज?
डेल्सी रोड्रिगेज का जन्म 18 मई 1969 को वेनेजुएला की राजधानी काराकास में हुआ। उनके पिता, जॉर्ज एंटोनियो रोड्रिगेज, 1970 के दशक में लेफ्ट-विंग गेरिल्ला फाइटर और लीगा सोशलिस्टा पार्टी के संस्थापक थे। डेल्सी ने कैराकास स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ वेनेजुएला से लॉ की पढ़ाई की और बाद में विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में भी काम किया।
56 साल की डेल्सी रोड्रिगेज दो दशक से अधिक समय से वेनेजुएला की राजनीति में सक्रिय हैं और चैविज्म (Hugo Chavez द्वारा स्थापित राजनीतिक आंदोलन) की प्रमुख समर्थक हैं। मादुरो भी चैविज्म के अनुयायी हैं और उन्होंने 2013 में ह्यूगो चावेज की मृत्यु के बाद इसे आगे बढ़ाया है।
उनकी राजनीतिक यात्रा उनके भाई जॉर्ज रोड्रिगेज के साथ करीबी सहयोग पर आधारित रही है, जो वर्तमान में नेशनल असेंबली के अध्यक्ष हैं। डेल्सी ने देश में कई अहम पदों पर काम किया है। 2014 से 2017 तक उन्होंने वेनेजुएला की कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन मिनिस्ट्री संभाली।
इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली, जहाँ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर मादुरो सरकार का समर्थन किया और मानवाधिकार उल्लंघनों और चुनावी विवादों की आलोचना का जवाब दिया।
राजनीतिक करियर और अहम पद
डेल्सी रोड्रिगेज 2017 में प्रॉ-गवर्नमेंट कांस्टीट्यूएंट असेंबली की अध्यक्ष बनीं थी, इससे पहले 2015 में उन्होंने चुनावों में मादुरो का समर्थन किया था। 2018 में मादुरो ने उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में उप-राष्ट्रपति बनाया। मादुरो ने उन्हें ‘एक युवा, बहादुर, अनुभवी, क्रांतिकारी और हजारों संघर्षों में जाँची परखी महिला’ बताया है।
मादुरो के जुलाई 2024 में हुए चुनावों के विवाद के बाद 2025 में डेल्सी ने तीसरे कार्यकाल में भी उप-राष्ट्रपति पद संभाला। विपक्ष ने इन चुनावों को धोखाधड़ी करार दिया और दावा किया कि देश के वास्तविक राष्ट्रपति एम्बेसडर एडमुंडो गोंजालेज उरूतिया हैं। इसके बावजूद डेल्सी रोड्रिगेज मादुरो के शासन में लगातार बनी रहीं।
वे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था और तेल मंत्रालय की प्रमुख भी रही हैं। अगस्त 2024 में मादुरो ने तेल मंत्रालय का काम उन्हें सौंपा ताकि वे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद देश की सबसे महत्वपूर्ण उद्योग शाखा को संभाल सकें। उन्होंने बढ़ती महँगाई को काबू करने के लिए परंपरागत आर्थिक नीतियों को अपनाया।
राजनीतिक विशेषज्ञ जोस मैनुअल रोमानो के अनुसार, डेल्सी को मादुरो का पूर्ण विश्वास प्राप्त है। उनके पास पूरे सरकारी तंत्र और रक्षा मंत्रालय पर भी काफी प्रभाव है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया और आदेश दिया कि वे राष्ट्रपति के सभी अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन करें। कोर्ट ने मादुरो को स्थायी रूप से अनुपस्थित घोषित नहीं किया, जिसके लिए 30 दिनों के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।
मादुरो के पकड़े जाने के तुरंत बाद डेल्सी ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में कई वरिष्ठ अधिकारी और मंत्री शामिल हुए। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रथम महिला की तुरंत रिहाई की माँग की और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आलोचना की।
Venezuela Supreme Court names Delcy Rodriguez acting president after Maduro's removal
वेनेजुएला के संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 के अनुसार, राष्ट्रपति की अस्थायी या स्थायी अनुपस्थिति में उप-राष्ट्रपति को सभी कार्यकारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना होता है। डेल्सी ने देश के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर नियंत्रण रखने के कारण इस समय सत्ता के केंद्र में हैं।
डेल्सी रोड्रिगेज का प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय पहचान
डेल्सी रोड्रिगेज को कई देशों ने प्रतिबंधित किया है और पड़ोसी कोलंबिया में प्रवेश पर रोक है। वे वेनेजुएला की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय और प्रभावशाली रही हैं। मादुरो ने उन्हें उनके साहस के चलते ‘टाइगर’ का नाम दिया था।
डेल्सी ने सरकार में अपने करियर की शुरुआत 2003 में की। उन्होंने वेनेजुएला के उप-राष्ट्रपति कार्यालय के जनरल कॉर्डिनेशन विभाग में काम करना शुरू किया। 2006 में उन्होंने राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज के कार्यकाल में मिनिस्टर फॉर प्रेसीडेंशियल अफेयर्स के रूप में काम किया। 2013 में मादुरो ने उन्हें कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन मिनिस्ट्री का जिम्मा दिया। 2014 में वे विदेश मंत्री बनीं और वेनेजुएला में यह पद संभालने वाली पहली महिला बनीं।
उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और तेल मंत्रालय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2017 में उन्होंने कांस्टीट्यूएंट नेशनल असेंबली में प्रवेश किया, जिसने मादुरो के शक्तियों को और बढ़ाया। 2018 में उन्हें उप-राष्ट्रपति बनाया गया।
वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिगेज का प्रभाव
निकोलस मादुरो को अचानक अमेरिका द्वारा पकड़े जाने के बाद वेनेजुएला की कमान अब डेल्सी रोड्रिगेज को सौंप दी गई है। वह लंबे समय से मादुरो की करीबी रही हैं और सरकार में अहम जिम्मेदारियाँ संभाल चुकी हैं। राजनीति और प्रशासन का उन्हें अच्छा अनुभव है, इसलिए मौजूदा संकट के समय में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।
कानून, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का पक्ष रखने में वह काफी माहिर मानी जाती हैं। अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और देश में बने सत्ता के खालीपन के बीच अब डेल्सी रोड्रिगेज के हर फैसले पर न सिर्फ वेनेजुएला बल्कि पूरी दुनिया की नजर टिकी रहेगी।
अमेरिका ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को वेनेजुएला पर कई हवाई हमले किए। राजधानी कराकस में रात करीब 2 बजे लड़ाकू विमानों से कई ठिकानों पर बमबारी की गई जिसके बाद अफरा-तफरी मच गई। इन हमलों की पुष्टि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर की। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका पहुँचा दिया है।
अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने बताया कि मादुरो और उनकी पत्नी पर न्यूयॉर्क के साउदर्न डिस्ट्रिक्ट में नार्को-टेररिज्म साजिश, कोकीन तस्करी, मशीनगन और घातक हथियार रखने व उसकी साजिश जैसे गंभीर आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है।
यह हमला अचानक नहीं माना जा रहा बल्कि अमेरिका से टकराव के बाद वेनेजुएला में लंबे समय से चल रहे सत्ता परिवर्तन के प्रयासों का हिस्सा बताया जा रहा है। खास बात यह है कि यह कार्रवाई उस समय हुई है, जब कुछ महीने पहले विपक्षी नेता मारिया मचाडो ने नोबेल शांति पुरस्कार जीतने के बाद इसे अमेरिकी राष्ट्रपति को समर्पित किया था और वेनेजुएला में ‘आजादी और लोकतंत्र’ के लिए अमेरिकी हस्तक्षेप की खुलकर माँग की थी।
मारिया मचाडो के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि उन्होंने उनसे फोन पर बात की थी। ट्रंप के मुताबिक, मचाडो ने उनसे कहा कि उन्होंने यह नोबेल पुरस्कार उनके सम्मान में स्वीकार किया है और उनका मानना है कि इसके असली हकदार ट्रंप ही हैं। दोनों नेताओं के बीच दिखी यह आपसी सराहना वेनेजुएला में बीते और आने वाले घटनाक्रम की दिशा को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं छोड़ती।
दिसंबर 2025 में मारिया मचाडो ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर अमेरिकी दबाव का समर्थन किया था। उन्होंने दुनियाभर से अपील की थी कि वेनेजुएला में तानाशाही शासन से जुड़े ड्रग्स, हथियारों और मानव तस्करी के पैसों की सप्लाई रोकी जाए। मचाडो ने कहा था कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि वेनेजुएला जल्द आजाद होगा और यह बहुत जल्दी होने वाला है।
ट्रंप ने मादुरो सरकार पर नारकोटिक आतंकवाद का आरोप लगाया
अमेरिका और वेनेजुएला के बीच टकराव की मुख्य वजह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो सरकार पर लगाए गए अमेरिकी आरोप हैं। अमेरिका का दावा है कि मादुरो शासन ने हजारों प्रवासियों को जबरन अमेरिका की दक्षिणी सीमा की ओर धकेला और अमेरिकी क्षेत्र में नशीले पदार्थों की तस्करी करवाई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया कि मादुरो ने जेलों और मानसिक अस्पतालों से कैदियों को निकालकर अमेरिका भेजा।
ट्रंप ने मादुरो पर ड्रग तस्करी में शामिल होने और आतंकी संगठनों से जुड़े होने के भी आरोप लगाए। उनका कहना है कि वेनेजुएला कोकीन तस्करी का बड़ा ट्रांजिट रूट बन गया है, जिससे अमेरिका में ड्रग संकट गहराया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला की नावें कैरेबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी कर रही थीं।
ड्रग कार्टेल से निपटने के पारंपरिक अमेरिकी तरीकों से हटकर, ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में वेनेजुएला के ड्रग कार्टेल्स के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। बीते महीनों में अमेरिका ने संदिग्ध ड्रग तस्करी वाली नावों पर हमले किए, जिसे ट्रंप ने ‘ड्रग्स के खिलाफ जंग’ बताया।
आजादी का समय आ गया है: अमेरिकी हमले के बाद मारिया
वेनेजुएला में अमेरिकी हवाई हमलों के बाद मारिया ने X पर बयान जारी किया है। मारिया ने लिखा, “वेनेजुएला के लोगों आजादी का समय आ गया है। अमेरिका की सरकार ने कानून बनाए रखने का अपना वादा पूरा किया है। हम व्यवस्था बहाल करेंगे, राजनीतिक कैदियों को रिहा करेंगे, एक शानदार देश बनाएँगे और अपने बच्चों को घर वापस लाएँगे।”
उन्होंने आगे कहा, “आज हम अपना जनादेश लागू करने और सत्ता संभालने के लिए तैयार हैं। जब तक लोकतांत्रिक परिवर्तन पूरा नहीं हो जाता, तब तक हम सतर्क, सक्रिय और संगठित रहें। एक ऐसा परिवर्तन जिसमें हम सभी की जरूरत है।”
साल 2020 में न्यूयॉर्क के साउदर्न डिस्ट्रिक्ट में निकोलस मादुरो पर ‘नार्को-टेररिज्म साजिश’ के आरोपों में मामला दर्ज किया गया था। अमेरिका का कहना है कि वह ड्रग कार्टेल्स के साथ सशस्त्र संघर्ष में है और इन्हीं कार्टेल्स को मादुरो संरक्षण देते हैं या उनका नेतृत्व करते हैं।
हालाँकि, वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे हैं। उनका कहना है कि यह अमेरिका की साजिश है, जिसका मकसद उन्हें सत्ता से हटाकर वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जा करना है।
गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिकी हमलों से कुछ दिन पहले ही मादुरो ने ड्रग तस्करी और अवैध प्रवासन के मुद्दों पर अमेरिका के साथ सहयोग की पेशकश की थी। 2020 में दर्ज मामले को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मादुरो को अमेरिका में उन आरोपों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी देश के भीतर सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि वेनेजुएला पर हमला कॉन्ग्रेस की मंजूरी के बिना किया गया।
वेनेजुएला में जो कुछ हो रहा है, वह दुनिया के लिए नया नहीं है। इससे पहले वियतनाम, इराक,अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों में भी इसी तरह की रणनीति देखी जा चुकी है, जहाँ अमेरिका ने अपने विरोधी शासन को गिराकर मनपसंद सत्ता स्थापित करने की कोशिश की है।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
इस्लामो-वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग अपने समर्थकों का खुलकर बचाव करते हैं। अब चाहे उन पर आतंकवाद से सहानुभूति, देश विरोधी गतिविधियों या दंगों की साजिश जैसे गंभीर आरोप ही क्यों न हों। ऐसा ही एक नाम है उमर खालिद, जो 2020 के दिल्ली दंगों का आरोपित है और पिछले पाँच साल से अधिक समय से जेल में बंद है।
उमर खालिद को लेकर देश और विदेश के वामपंथी और तथाकथित उदारवादी मीडिया से लेकर तमाम नेता तक लगातार उसके समर्थन में आवाज उठाते रहे हैं। इसी कड़ी में अब अमेरिका से उमर खालिद प्रेम नया मामला सामने आया है, जिसे ‘फ्री उमर खालिद’ अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को अमेरिका के डेमोक्रेट पार्टी के 8 सांसदों ने भारत सरकार को एक पत्र लिखकर उमर खालिद को जमानत देने और निष्पक्ष सुनवाई की माँग की है।
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में इल्हान उमर, राशिदा तलीब, प्रमिला जयपाल, जिम मैकगवर्न, जैमी रस्किन, क्रिस वैन हॉलन, पीटर वेल्च, जैन शाकोव्स्की और लॉयड डॉगेट शामिल हैं।
यह पत्र भारत में अमेरिका के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के नाम लिखा गया है। इसमें अमेरिकी सांसदों ने लिखा कि वे फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपितों की लंबे समय से चल रही हिरासत को लेकर परेशान हैं, जिनमें छात्र नेता और शोधकर्ता बताया गया उमर खालिद भी शामिल हैं।
पत्र में इन सांसदों ने लोकतंत्र, आजादी, कानून का शासन, मानवाधिकार और बहुलतावाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भारतीय सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की है। उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि उमर खालिद निर्दोष है और उसे रिहा किया जाना चाहिए।
इन सांसदों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण बताया और 2020 के दिल्ली दंगों में मुसलमानों को पीड़ित के रूप में दिखाया गया है।
अमेरिकी सांसद जिम मैकगवर्न ने CAA को मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण बताया और कहा कि यह कानून मुसलमानों को बाहर रखता है। हालाँकि, इन सांसदों ने यह नहीं बताया कि इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों में मुस्लिमों को उनके मजहब होने के कारण कैसे प्रताड़ित किया जा सकता है, जबकि CAA उन्हीं अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करता है जो वहाँ सताए जाते हैं।
आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी डेमोक्रेट नेताओं ने इस पूरे मामले में भारत की संप्रभुता, न्यायिक प्रक्रिया और जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज करते हुए एकतरफा रुख अपनाया है और सामान्य तर्क को भी भेदभाव बताने की कोशिश की है।
Earlier this month, I met with the parents of Umar Khalid, who has been jailed in India for over 5 years without trial. @RepRaskin & I are leading our colleagues to urge that he be granted bail & a fair, timely trial in accordance with international law. pic.twitter.com/tBIbG1aOwc
अमेरिका के डेमोक्रेट सांसदों ने उमर खालिद के लंबे समय से जेल में रहने को सरकार की नाइंसाफी और सही कानूनी प्रक्रिया न होने का नतीजा बताने की कोशिश की। उन्होंने इशारों-इशारों में उसे बेगुनाह भी दिखाने का प्रयास किया। लेकिन हकीकत यह है कि यह बात जमीनी तथ्यों से मेल नहीं खाती है।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 और 2024 में उमर खालिद के मामले में कुल 14 बार सुनवाई टली जिनमें से कम से कम 7 बार तारीख टालने की माँग खुद उमर खालिद की ओर से की गई थी। इससे साफ है कि जमानत याचिका वापस लेने की वजह कोर्ट की देरी नहीं बल्कि बचाव पक्ष द्वारा बार-बार माँगी गई तारीखें थीं।
इसके बावजूद इस्लामो-वामपंथी समूह लगातार नाइंसाफी का शोर मचाते रहे। हकीकत यह है कि उमर खालिद की लंबे समय तक जेल में रहने की एक बड़ी वजह उसके वकीलों द्वारा मनचाहे जज से सुनवाई कराने की कोशिश यानी ‘फोरम शॉपिंग’ रही। इस पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था कि समस्या अदालतों में नहीं बल्कि कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की उस सोच में है जो चाहते हैं कि उनके मामले केवल कुछ खास जज ही सुनें। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के नेतृत्व में उमर खालिद की कानूनी टीम ने कम से कम 7 बार सुनवाई टलवाई और आखिरकार फरवरी 2024 में परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देकर जमानत याचिका वापस ले ली।
अमेरिकी सांसदों और अमेरिका की संस्था USCIRF (United States Commission on International Religious Freedom) ने दिल्ली दंगों के अन्य आरोपितों शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और खालिद सैफी को भी मजहबी स्वतंत्रता के उल्लंघन का शिकार बताने की कोशिश की। जबकि इन पर गंभीर आरोप हैं।
शरजील इमाम ने भारत के चिकन नेक कॉरिडोर को अलग करने की बात कही थी, जो भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। गुलफिशा फातिमा पर आरोप है कि उसने 2020 में मुस्लिम महिलाओं को हिंसक प्रदर्शनों के लिए उकसाया और पुलिस पर डंडों और लाल मिर्च पाउडर से हमला करवाया। वहीं, अब्दुल खालिद सैफी पर हथियारों की व्यवस्था के लिए फंड जुटाने और प्रदर्शन स्थलों को चलाने का आरोप है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि USCIRF पर पहले से ही भारत विरोधी एजेंडा चलाने के आरोप लगते रहे हैं। इस संस्था पर इस्लामी चरमपंथियों को कार्यकर्ता बताने, हिंदुओं को बदनाम करने और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई मोदी सरकार को निशाना बनाने के आरोप हैं। यह सब भारत में मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर किया जाता है।
डेमोक्रेट सांसदों के पत्र में 2020 के दिल्ली दंगों को भड़काने वालों को और मुस्लिम समुदाय को पीड़ित के तौर पर दिखाया गया, साथ ही इशारों में यह भी कहा गया कि दंगों के लिए हिंदू जिम्मेदार थे। लेकिन इस पत्र में यह उल्लेख नहीं किया गया कि उन्हीं दंगों में दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कर्मचारी की मौत हुई थी।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी, जो अपने हिंदू और भारत विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं, उसने उमर खालिद के समर्थन में एक पत्र लिखा। इन सभी तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों का यह पत्र पक्षपाती है, मुस्लिम पीड़ित होने की राजनीति से प्रेरित है और दिल्ली दंगों व भारत की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े अहम तथ्यों को नजरअंदाज करता है।
जिम मैकगवर्न: CAA और धर्मांतरण विरोधी कानूनों का विरोध, भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चिंता बताने की वकालत और अब उमर खालिद के लिए रोना
जेम्स पैट्रिक मैकगवर्न, जिन्हें आमतौर पर जिम मैकगवर्न कहा जाता है, साल 2013 से अमेरिका के मैसाचुसेट्स के दूसरे संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लगातार आलोचक रहे हैं। मैकगवर्न कई बार यह दावा कर चुके हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत में मानवाधिकार, मजहबी स्वतंत्रता और लोकतंत्र कमजोर हो रहे हैं।
जनवरी 2022 में जिम मैकगवर्न ने भारत के 73वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष अमेरिकी संसदीय ब्रीफिंग को संबोधित किया था। इस ब्रीफिंग में उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार हिंदू राष्ट्रवादी नीतियों को बढ़ावा दे रही है और देश में मजहबी स्वतंत्रता व मानवाधिकार पीछे जा रहे हैं।
उन्होंने भारतीय इस्लामो-वामपंथी समूहों द्वारा फैलाए जा रहे इस दावे को भी दोहराया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) मिलकर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को संस्थागत रूप देंगे। इस कार्यक्रम में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी शामिल थे।
यह ब्रीफिंग अमेरिका की 17 तथाकथित अधिकार संगठनों के गठबंधन द्वारा आयोजित की गई थी, जिनमें इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC), हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) और सिख कोएलिशन जैसी संस्थाएँ शामिल थीं। इन संगठनों पर लंबे समय से भारत और हिंदुओं के खिलाफ दुष्प्रचार करने और अमेरिका में हिंदू समुदाय के खिलाफ लॉबिंग करने के आरोप लगते रहे हैं।
मैकगवर्न ने दावा किया था कि 2019 में पहली बार भारत में ऐसा कानून पास हुआ जिसने नागरिकता को धर्म से जोड़ा और CAA को NRC के साथ जोड़ते हुए यह डर फैलाया कि इससे मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव होगा।
जबकि हकीकत यह है कि CAA का NRC से कोई संबंध नहीं है और यह कानून भारतीय मुसलमानों से जुड़ा ही नहीं है। CAA को 2024 में लागू किया गया और इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश व अन्य मुस्लिम-बहुल देशों से आए प्रताड़ित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जा रही है। अब तक किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनी गई है।
2019 में यह सवाल जरूर उठा था कि CAA में मुसलमानों को क्यों नहीं जोड़ा गया, खासकर जब पाकिस्तान में शिया और अहमदिया समुदाय पर अत्याचार होते हैं। लेकिन इसकी वजह भेदभाव नहीं है। असल में शिया और अहमदिया खुद को मुसलमान मानते हैं, इसलिए उनके साथ होने वाली हिंसा को धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर की सांप्रदायिक हिंसा माना जाता है। इसके बावजूद जिम मैकगवर्न आज भी CAA को भेदभाव वाला कानून बताते हैं।
हाल ही में उमर खालिद को जमानत और निष्पक्ष सुनवाई की माँग वाले पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए भी उन्होंने इसी झूठे नैरेटिव को दोहराया। उन्होंने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का विदेशी फंडिंग लाइसेंस (FCRA) नवीनीकरण न होने को ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव बताया जबकि असल वजह यह थी कि संस्था ने जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए थे। दस्तावेज पूरे होते ही कुछ ही दिनों में लाइसेंस बहाल कर दिया गया।
मैकगवर्न ने यह भी कहा कि मजहबी पहचान के आधार पर भेदभाव की चिंता इतनी गंभीर है कि USCIRF ने भारत को कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न घोषित करने की सिफारिश की है। उन्होंने मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए UAPA और अन्य सख्त आतंकवाद विरोधी कानूनों पर भी आरोप लगाया कि इनका इस्तेमाल पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और असहमति रखने वालों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
हालाँकि, उन्होंने यह नजरअंदाज कर दिया कि इन कानूनों के तहत कार्रवाई पत्रकारिता या एक्टिविज्म के कारण नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों के आरोपों के आधार पर की जाती है।
जिम मैकगवर्न का झुकाव इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसी खुलकर हिंदू-विरोधी संस्थाओं की ओर भी रहा है। साल 2016 में IAMC ने वॉशिंगटन डीसी में टॉम लैंटोस ह्यूमन राइट्स कमीशन के सामने गवाही दी थी, जिसमें भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव का आरोप लगाया गया। मैकगवर्न ने IAMC के इन दावों को दोहराया। IAMC पर प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़े होने के आरोप भी लग चुके हैं।
दिलचस्प बात यह है कि उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास SIMI के पूर्व सदस्य रह चुके हैं और वह वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के प्रमुख नेता हैं। नवंबर 2025 में इस पार्टी के छात्र संगठन ने दिल्ली में तथाकथित ‘एंटी एयर पॉल्यूशन’ प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसे कई लोग अर्बन नक्सलियों का विरोध प्रदर्शन मानते हैं।
IAMC के संस्थापक शेख उबैद के जरिए इस संगठन के लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जमात-ए-इस्लामी (JeI) से संबंधों के भी आरोप हैं। IAMC पर USCIRF के जरिए भारत को बदनाम करने, फर्जी खबरें फैलाने और इस्लामी एजेंडा आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं। 2021 में इस पर UAPA भी लगाया गया था। यह संगठन अक्सर हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर भारत और अमेरिका के हिंदुओं को बदनाम करने वाली रिपोर्टें जारी करता है और जोहरान ममदानी जैसे भारत-विरोधी नेताओं का समर्थन करता रहा है।
2019 में जब मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A हटाकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया, तब भी मैकगवर्न ने भारत पर बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया कि नेताओं को हिरासत में लिया गया, पत्रकारों पर पाबंदी लगाई गई और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग हुआ। इसी मुद्दे पर मैकगवर्न ने जेमी रस्किन, जैन शाकोव्स्की और लॉयड डॉगेट के साथ मिलकर एक प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसमें भारत से जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंध और हिरासत खत्म करने की माँग की गई थी। इस प्रस्ताव को प्रमिला जयपाल ने पेश किया था, जो उमर खालिद के समर्थन वाले इस पत्र की भी हस्ताक्षरकर्ता हैं।
जून 2025 में मैकगवर्न ने IAMC से जुड़ी संस्था हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (H4HR) की सदस्य रिया चक्रवर्ती के साथ मिलकर भारत को मजहबी स्वतंत्रता के मामले में कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न घोषित करने की माँग की। उन्होंने खालिस्तानी अलगाववादी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का भी समर्थन किया और भारत पर ट्रांसनेशनल दमन का आरोप लगाया। मैकगवर्न लगातार खालिस्तानी गतिविधियों को भारत द्वारा सिखों पर अत्याचार के रूप में पेश करते रहे हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो जिम मैकगवर्न लंबे समय से मुस्लिम पीड़ित होने की कहानी, भारत के खिलाफ प्रचार और हिंदुओं को असहिष्णु व दमनकारी बताने वाले इस्लामो-वामपंथी नजरिये को बढ़ावा देते रहे हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने उमर खालिद के समर्थन में लिखे गए पत्र पर भी हस्ताक्षर किए।
जैन शाकोव्स्की: भारत में इस्लामोफोबिया का रोना रोया, राहुल गाँधी से मिलीं और उमर खालिद के लिए माँगी बेल
जैनिस या जैन शाकोव्स्की अमेरिका के इलिनॉय राज्य के 9वें संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह सार्वजनिक रूप से भारत–अमेरिका के अच्छे संबंधों की बात करती रही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ वह भारत के संदर्भ में मुस्लिम पीड़ित होने का नैरेटिव आगे बढ़ाने वाली गतिविधियों में भी शामिल रही हैं। 2021 में जैन शाकोव्स्की ने कॉम्बैटिंग इंटरनेशनल इस्लामोफोबिया एक्ट नामक बिल को को-स्पॉन्सर किया था।
जैसा कि इस बिल के नाम से ही स्पष्ट है, इसका उद्देश्य दुनिया भर में तथाकथित इस्लामोफोबिया के खिलाफ कार्रवाई करना बताया गया था। इस बिल को अमेरिका की सांसद इल्हान उमर ने पेश किया था, जिन्हें कट्टर इस्लामी एजेंडा और भारत-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इस तरह, जैन शाकोव्स्की का यह कदम भी भारत के खिलाफ मुस्लिम पीड़ित होने की राजनीति को समर्थन देने के रूप में देखा जाता है।
वर्ष 2023 में अमेरिका की सांसद जैन शाकोव्स्की ने तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन से यह माँग की थी कि वे भारत के साथ बातचीत के दौरान भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाएँ। इस कदम के जरिए जैन शाकोव्स्की ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों पर सवाल खड़े करते हुए मानवाधिकार के नाम पर भारत की आलोचना करने वाला रुख अपनाया।
I join my colleagues in urging @POTUS to raise human rights concerns during Indian Prime Minister Modi’s state visit this week. Respect for human rights is essential to the functioning of true democracy and to the maintenance of a strong relationship between India and the US. https://t.co/LciEN9RCGF
सितंबर 2024 में अमेरिका की सांसद जैन शाकोव्स्की और इल्हान उमर ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात की थी। यह मुलाकात राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा के दौरान हुई, जिसे लेकर उस समय काफी विवाद और चर्चा हुई थी।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात के बाद अमेरिकी सांसद जैन शाकोव्स्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुशी जताई। उन्होंने लिखा कि उन्हें भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी से मिलकर अच्छा लगा। शाकोव्स्की ने कहा कि समावेशी विकास, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा और मोदी सरकार को जवाबदेह ठहराने की राहुल गाँधी की सोच भारत के भविष्य के लिए बेहद अहम है।
It was great to meet with India's Opposition Leader, @RahulGandhi!
His push for inclusive growth, protection of minority rights, and holding the Modi government accountable is crucial for India's future. pic.twitter.com/lIELxA5WSw
इसके कुछ महीने बाद, जनवरी 2025 में जैन शाकोव्स्की ने एक बार फिर कॉम्बैटिंग इंटरनेशनल इस्लामोफोबिया एक्ट को दोबारा पेश किया। इस बिल में भारत का नाम साफ तौर पर लिया गया और दावा किया गया कि भारत में मुस्लिमों को उनकी मजहबी पहचान के कारण भेदभाव और सरकारी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। इस बिल को इल्हान ओमार ने पेश किया था और जैन शाकोव्स्की व राशिदा तलीब सहित कई अन्य सांसद इसके को स्पॉन्सर थे।
अब इसी कड़ी में जैन शाकोव्स्की ने उमर खालिद को जमानत देने की माँग करते हुए भारत सरकार को पत्र लिखा है, मानो मोदी सरकार उसकी जमानत या निष्पक्ष सुनवाई में बाधा डाल रही हो जबकि मामला भारत की न्यायपालिका के अधीन है।
प्रमिला जयपाल: अमेरिका की एक हिंदू और भारत-विरोधी आवाज
सूची में अगला नाम प्रमिला जयपाल का है, जो अपने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख के लिए जानी जाती हैं। दिसंबर 2019 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें भारत से जम्मू-कश्मीर में लगाए गए संचार प्रतिबंध हटाने की माँग की गई थी।
इसके साथ ही उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने के भारत सरकार के फैसले का खुलकर विरोध किया। उनके इस रुख से भारतीय-अमेरिकी समुदाय खुद को ठगा हुआ, आहत और निराश महसूस करने लगा, क्योंकि यह भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप माना गया।
प्रमिला जयपाल के इसी प्रस्ताव के बाद एक अहम कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल से होने वाली बैठक रद्द कर दी क्योंकि उस प्रतिनिधिमंडल से प्रमिला जयपाल को बाहर करने से इनकार कर दिया गया था।
इस पर विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ कहा था कि उन्हें प्रमिला जयपाल की रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर कोई निष्पक्ष समझ या भारत सरकार के कदमों का सही आकलन नहीं दिखता और इसलिए उन्हें उनसे मिलने में कोई रुचि नहीं है।
जेमी रस्किन: मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को लगातार आगे बढ़ाने वाले नेता
‘फ्री उमर खालिद’ पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में एक और नाम जेमी रस्किन का है। साल 2023 में जेमी रस्किन ने जैन शाकोव्स्की के साथ मिलकर एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर चिंता जताने की माँग की गई थी।
इससे पहले 2020 में रस्किन ने यह फर्जी दावा किया था कि भारतीय सरकार ने सत्तावादी तरीके से एमनेस्टी इंटरनेशनल की गतिविधियों को भारत में रोक दिया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा था कि भारत द्वारा एमनेस्टी को मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण करने से रोकना लोकतंत्र के खिलाफ एक शर्मनाक कदम है और उन्होंने उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से अपील की थी कि वे भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस मुद्दे को उठाएँ।
India’s decision to halt @amnesty's work documenting human rights violations is a scandalous and self-incriminating offense against democracy. @SecPompeo, will you denounce this authoritarian move with @narendramodi during your visit? https://t.co/JohyeVI1XR
हालाँकि, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को लेकर यह दावा गलत है कि मोदी सरकार ने उसके खिलाफ कोई राजनीतिक बदले या विच हंट चलाया। साल 2020 में उसके बैंक खाते फ्रीज किए गए थे, लेकिन यह पहली बार नहीं था। इससे पहले 2018 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने FCRA कानून के उल्लंघन के मामले में एमनेस्टी के ठिकानों पर छापे मारे थे और उसके बैंक खाते फ्रीज किए थे। यह भी स्पष्ट है कि एमनेस्टी की वित्तीय गतिविधियाँ साल 2010 से जाँच के दायरे में थीं, न कि केवल दिल्ली दंगों पर रिपोर्ट के बाद।
जाँच एजेंसियों का आरोप था कि एमनेस्टी ने FCRA कानून से बचने के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (AIIPL) नाम से एक व्यावसायिक इकाई बनाई। आरोप के अनुसार, एमनेस्टी ने अपने एक भारतीय संस्थान के जरिए 10 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) को गिरवी रखकर 14.25 करोड़ रुपए की ओवरड्राफ्ट सुविधा बनाई, जिससे ट्रस्ट को विदेशी निवेश (FDI) के रूप में धन प्राप्त हुआ। यह व्यवस्था कानून के दायरे से बाहर बताई गई।
ED ने यह भी आरोप लगाया कि एमनेस्टी ने FEMA (विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम) के उधार और लेन-देन से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया और करीब 51.72 करोड़ रुपए की अनियमितताएँ कीं। आरोप है कि एमनेस्टी ने अपनी मूल संस्था Amnesty International UK से धनराशि को सेवाओं के निर्यात के नाम पर भारत में मंगवाया और उसका इस्तेमाल देश में तथाकथित नागरिक समाज गतिविधियों के लिए किया।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल का भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का पुराना इतिहास रहा है। संगठन लगातार भारत को झूठे तरीके से मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता और मुसलमानों का दमनकर्ता दिखाने की कोशिश करता रहा है। एमनेस्टी और उसके पूर्व प्रमुख आकार पटेल ने भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में गिरफ्तार अर्बन नक्सलियों के समर्थन में भी अभियान चलाया था।
दिलचस्प बात यह है कि जेमी रस्किन स्वयं भी विवादों में रहे हैं। उन पर अपनी पत्नी से जुड़ी बड़ी शेयर होल्डिंग और भुगतान की जानकारी सार्वजनिक न करने के आरोप लगे थे। इसके बावजूद, जनवरी 2022 में रस्किन ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में मानवाधिकारों की स्थिति खराब हो रही है और इसका असर न सिर्फ मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों पर पड़ रहा है बल्कि उन हिंदुओं पर भी जो तथाकथित हिंदू वर्चस्ववादी आंदोलन का विरोध करते हैं। यह बयान उन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल USA, जेनोसाइड वॉच, IAMC और अन्य संगठनों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिया था।
लॉयड डॉगेट: ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की आलोचना करते हुए ‘भारतीय मुसलमानों पर खतरे’ के नैरेटिव को हवा देने वाले नेता
लॉयड डॉगेट अमेरिका के टेक्सास का प्रतिनिधित्व करते हैं और लंबे समय से कॉन्ग्रेसनल कॉकस ऑन इंडिया के सदस्य रहे हैं। इसके बावजूद उनका रिकॉर्ड भारत के प्रति आलोचनात्मक रहा है।
साल 2008 में उन्होंने भारत के साथ परमाणु शक्ति के रूप में सहयोग के खिलाफ वोट दिया था। फिर साल 2020 में भारत के गणतंत्र दिवस पर दिए गए अपने बयान में डॉगेट ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार राष्ट्रीय ध्वज, देशभक्ति के प्रतीकों और धर्म का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने के लिए करती है और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रही है। उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (CAA), NRC और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा हटाने के फैसले को लेकर भी कड़ी आलोचना की। इसी दौरान उन्होंने JNU छात्र संघ की तत्कालीन अध्यक्ष आइशी घोष की खुले तौर पर सराहना की और उन्हें महिमामंडित किया।
डॉगेट ने कहा था कि नया नागरिकता कानून, NRC के विस्तार की आशंका, जम्मू-कश्मीर का एकतरफा तरीके से राज्य का दर्जा खत्म करना और कश्मीरी डी-रेडिकलाइजेशन कैंप जैसी बातें भारत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पर्याप्त कारण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूरे भारत में विरोध की आवाजें उठ रही हैं और विशेष रूप से नई दिल्ली की छात्रा आइशी घोष को सम्मान दिया जाना चाहिए, जिन्होंने कथित तौर पर हिंसक हिंदू राष्ट्रवादी हमले के सामने चुप रहने से इनकार किया।
आइशी घोष, जिन्हें लॉयड डॉगेट ने बहादुर छात्रा बताया था, 2020 के JNU दंगों के मामले में आरोपित हैं। आइशी घोष को पहचान 2020 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई हिंसा के दौरान मिली, जब वामपंथी छात्र समूहों ने बाहरी लोगों के साथ मिलकर विश्वविद्यालय परिसर में व्यापक हिंसा की थी।
इस दौरान अन्य छात्रों को फीस वृद्धि के विरोध में कक्षाओं का बहिष्कार करने के लिए मजबूर किया गया था। आरोप है कि जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) की अध्यक्ष के रूप में आइशी घोष ने उस भीड़ का नेतृत्व किया, जिसने छात्रों पर शारीरिक हमला किया और उन्हें शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण करने से रोका, ताकि बहिष्कार को लागू कराया जा सके।
इसके अलावा, आइशी घोष के नेतृत्व में वामपंथी समूहों पर विश्वविद्यालय के सर्वर रूम में तोड़फोड़ करने और कैंपस में वाई-फाई बंद करने का भी आरोप है, जिससे छात्र ऑनलाइन पंजीकरण नहीं कर पाए। इस हिंसा में कई छात्र और ABVP के नेता घायल हुए थे।
क्रिस वैन होलेन
विनय क्वात्रा को लिखे गए उस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में अगला नाम क्रिस वैन हॉलन का है, जिन्होंने उमर खालिद के जमानत और निष्पक्ष सुनवाई की माँग की है। क्रिस वैन हॉलन का जन्म पाकिस्तान में हुआ था।
2020 में उन्होंने तीन अन्य अमेरिकी सांसदों के साथ मिलकर अमेरिकी विदेश मंत्री को एक पत्र लिखा था, जिसमें कश्मीर में मानवाधिकार स्थिति और भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों का आकलन करने की माँग की गई थी। उस पत्र में उन्होंने खुद को भारत का पुराना मित्र बताते हुए कहा था कि मोदी सरकार के कुछ कदम चिंताजनक हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के छह महीने बाद भी वहाँ इंटरनेट सेवाएँ बड़े पैमाने पर बंद थीं, जिसे उन्होंने किसी लोकतंत्र द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे लंबा इंटरनेट शटडाउन बताया। हॉलन और अन्य सांसदों ने दावा किया कि इससे स्वास्थ्य सेवाएँ, कारोबार और शिक्षा प्रभावित हुई और करीब 70 लाख लोग प्रभावित हुए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सैकड़ों कश्मीरी, जिनमें प्रमुख राजनीतिक नेता भी शामिल हैं, निवारक हिरासत में रखे गए और इसी आधार पर भारत सरकार की आलोचना की।
We can & should build on our strong relationship w/ India.
But friends should also share honest concerns. That's why @RepJayapal & I & over 70 colleagues are asking Pres. Biden to raise concerns about the erosion of religious, press & political freedoms when he meets w/ PM Modi. pic.twitter.com/nln59KCJrl
— Senator Chris Van Hollen (@ChrisVanHollen) June 21, 2023
क्रिस वैन हॉलन और उनके साथियों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भी भारत को निशाना बनाया। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि भारतीय सरकार ने ऐसे कदम उठाए हैं जो कुछ मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और देश के पंतनिरपेक्ष चरित्र को खतरे में डालते हैं। इसमें उन्होंने CAA का खास तौर पर उल्लेख किया और कहा कि यह कानून विवादास्पद है और भारत के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है।
इसके बाद जून 2023 में क्रिस वैन हॉलन ने कई अन्य अमेरिकी सांसदों के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से अपील की कि वे भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाएँ। इन सांसदों में उमर खालिद के समर्थन वाले पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकतर सांसद शामिल थे।
इससे पहले मार्च 2023 में क्रिस वैन हॉलन ने दावा किया था कि मोदी सरकार जानबूझकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को चुप करा रही है, जब कोर्ट ने मोदी सरनेम मानहानि मामले में राहुल गाँधी के खिलाफ फैसला सुनाया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत के मित्र के रूप में यह खबर चिंताजनक है, क्योंकि एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष को चुप नहीं कराया जाता बल्कि उससे बहस की जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र के लिए जरूरी है और भारत वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 150वें स्थान पर पहुँच गया है। हालाँकि, हॉलन ने इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि राहुल गाँधी की संसद सदस्यता जाना अदालत के फैसले का नतीजा था, न कि मोदी सरकार का कोई सीधा कदम।
इल्हान उमर: हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव और भारत विरोधी विचारों के लिए कुख्यात
इल्हान उमर अमेरिका की एक सोमालिया में जन्मी नेता हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर मिनेसोटा से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सदस्य चुनी गई हैं। उन्हें एक कट्टर इस्लामवादी रुझान वाली नेता के रूप में जाना जाता है। वैश्विक मुस्लिम ब्रदरहुड या उम्माह से बाहर, इल्हान उमर को ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो ताकतवर इस्लामी लॉबी समूहों के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं, जिनका उद्देश्य आधुनिक समाजों में कट्टर इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देना माना जाता है।
मिनेसोटा की प्रतिनिधि इल्हान उमर ने बीते सालों में कई बार कट्टर इस्लामी संगठनों और पाकिस्तान द्वारा फैलाए गए झूठे दावों को दोहराया है। वह लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाती रही हैं और खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को निशाना बनाती रही हैं। इतना ही नहीं, इल्हान उमर ने अपनी इस प्रचार मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कई बार बाइडन प्रशासन से आधिकारिक समर्थन की भी माँग की है।
अमेरिकी सांसद इल्हान उमर/ इमेज सोर्स: NPR
भारत और पश्चिम के कुछ वाम-उदारवादी (लेफ्ट-लिबरल) समूहों के समर्थन के साथ इल्हान उमर ने अमेरिकी संसद में कश्मीर मुद्दे को बार-बार उठाया और पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाते हुए अमेरिकी एजेंसियों से इसमें दखल देने की माँग की।
उन्होंने भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कथित तौर पर झूठे आरोप लगाए और दावा किया कि देश में हिंदुओं द्वारा मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहे हैं। 2024 में दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों पर हुई अमेरिकी हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी की सुनवाई में इल्हान उमर ने भारतीय पत्रकार आरती टिकू सिंह पर भी हमला बोला, जिन्होंने 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सामने गवाही दी थी।
इल्हान उमर पर कट्टर इस्लामी संगठनों से नजदीकी संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं। यह भी दावा किया जाता है कि वे मुस्लिम ब्रदरहुड और कतर के शासकों के प्रभाव में रही हैं। उनका नाम इस्लामिक रिलीफ और हेल्पिंग हैंड फॉर रिलीफ एंड डेवलपमेंट (HHRD) जैसे संगठनों से जोड़ा जाता है। HHRD को ICNA की सहयोगी संस्था बताया जाता है, जिसका संबंध जमात-ए-इस्लामी से होने का दावा है। एक संगठन जिसे भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन माना जाता है। इसके अलावा HHRD के पाकिस्तानी आतंकी समूहों से कथित संबंधों की बात भी सामने आती रही है जिनमें लश्कर-ए-तैयबा भी शामिल है।
इल्हान उमर को यहूदी-विरोधी माना जाता है और उन्होंने हमास जैसे आतंकी संगठन का खुला समर्थन किया है, 2021 के इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में भी वह जिहादी समूहों के पक्ष में दिखीं। 2019 में उन्होंने 9/11 आतंकियों को ‘कुछ लोग कुछ कर गए’ कहकर विवाद खड़ा किया था। इसके अलावा, वह फिलिस्तीन-फिलिस्तीन विवाद में वन-नेशन समाधान की समर्थक हैं, जिसका अर्थ फिलिस्तीन के अस्तित्व को नकारना माना जाता है।
रशीदा तलीब: हिंदू विरोधी, इस्लामवादी और इस्लामी आतंक की हिमायती
अमेरिका के मिशिगन की 12वीं कॉन्ग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनी गई सांसद रशीदा तलीब को अमेरिका में इस्लामी आतंकवाद का बचाव करने वाली और यहूदी-विरोधी नेता के रूप में जाना जाता है।
2021 में रशीदा तलीब ने कश्मीर मुद्दे पर भारत-विरोधी प्रचार करने के लिए ऐसे पैनल में हिस्सा लिया, जिसमें कट्टर इस्लामी आतंक समर्थक और जिहादी विचारधारा से जुड़े लोग शामिल थे। यह पैनल शिकागो स्थित ‘साउंड विजन’ नामक संगठन से जुड़ा था, जिसे इस्लामिक सर्कल ऑफ नॉर्थ अमेरिका (ICNA) की एक शाखा बताया जाता है।
उल्लेखनीय है कि ICNA उत्तरी अमेरिका का एक कुख्यात इस्लामी संगठन है, जिसके हमास, मुस्लिम ब्रदरहुड, जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी आतंकी संगठनों से गहरे संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं।
ICNA ने अपनी पत्रिका द मैसेज में अमेरिका द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित किए गए सैयद सलाहुद्दीन का महिमामंडन किया था। संगठन ने सैयद सलाहुद्दीन को कश्मीर को कथित तौर पर भारतीय कब्जे से मुक्त कराने के लिए लड़ने वाला मुजाहिदीन का निर्विवाद नेता बताया। सैयद सलाहुद्दीन एक कुख्यात इस्लामी आतंकवादी है, जिस पर भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोप हैं।
इसी पृष्ठभूमि में, जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे और अमेरिकी कॉन्ग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से पहले, रशीदा त्लैब ने इल्हान ओमार के साथ मिलकर पीएम मोदी के भाषण का बहिष्कार करने की घोषणा की थी। रशीदा तलीब ने पीएम मोदी की यात्रा को शर्मनाक बताया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि मोदी को अमेरिका की राजधानी में मंच देना गलत है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी पर मानवाधिकार उल्लंघन, अलोकतांत्रिक कदम, मुसलमानों और मजहबी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और पत्रकारों की आवाज दबाने के आरोप हैं, इसलिए वह कॉन्ग्रेस में उनके संबोधन का बहिष्कार करेंगी।
It’s shameful that Modi has been given a platform at our nation’s capital—his long history of human rights abuses, anti-democratic actions, targeting Muslims & religious minorities, and censoring journalists is unacceptable.
I will be boycotting Modi’s joint address to Congress.
— Congresswoman Rashida Tlaib (@RepRashida) June 20, 2023
तलीब ने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 और 35A को हटाने का विरोध किया था। वह CAA के भी खिलाफ रही हैं।
While I have deep respect for India and its important relationship with the US, I condemn the revocation of #Article370 & #Article35A, the imposed comms blockade, suppression of life-saving medical care, and reports of widespread human rights violations in #Jammu and #Kashmir.
रशीदा तलीब को यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिक) विचारधारा फैलाने वाली नेता के रूप में भी जाना जाता है और वह बार-बार यह धारणा आगे बढ़ाती रही हैं कि इजरायल को एक देश के रूप में अस्तित्व का अधिकार नहीं है। पहले वह अमेरिकी संसद भवन (यूएस कैपिटल) में एक कार्यक्रम आयोजित करना चाहती थीं, जिसमें इजरायल की स्थापना को ‘नकबा’ यानी ‘तबाही’ कहा गया था।
इस कार्यक्रम को ऐसे कट्टर इजरायल-विरोधी संगठनों का समर्थन प्राप्त था, जो इजरायल के खिलाफ पूरे सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की माँग करते हैं। हालाँकि, जब मीडिया में इन कट्टर संगठनों की भूमिका सामने आई, तो हाउस स्पीकर केविन मैकार्थी ने इस कार्यक्रम को रोक दिया और रशीदा तलीब द्वारा फैलाए जा रहे खुले यहूदी-विरोधी रवैये की कड़ी निंदा की। माना जाता है कि रशीदा तलीब का पूरा राजनीतिक करियर इजरायल के खिलाफ नफरत और यहूदी-विरोधी भावनाएँ भड़काने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा है।
निष्कर्ष
उमर खालिद की रिहाई की माग को लेकर पत्र लिखने वाले अमेरिकी सांसदों का खुद का रिकॉर्ड भारत-विरोधी प्रचार करने और भारतीय इस्लामो-लेफ्टिस्ट नैरेटिव को आगे बढ़ाने का रहा है, जिसमें हिंदुओं और मोदी सरकार को गलत तरीके से खलनायक बताया जाता है।
यह हैरानी की बात नहीं है कि अमेरिकी वामपंथी मीडिया के बाद अब कुछ नेता भी ऐसे पत्र लिखकर उमर खालिद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है। डेमोक्रेट नेता जिस अंदाज़ में खुद ही फैसले सुना रहे हैं और उमर खालिद की मासूमियत की मुहर लगा रहे हैं, उससे ऐसा लगता है मानो वे मुस्लिम पीड़ित होने का एक ऐसा नैरेटिव गढ़ रहे हों कि भारतीय इस्लामवादी भी पीछे रह जाएँ जबकि हकीकत यह है कि उमर ख़ालिद खुद को नास्तिक बताता है।
गंभीर बात यह है कि भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी सांसदों की दखलअंदाजी स्वीकार्य नहीं है और इसे दूसरे देश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर देखा जाता है। विचारधारा से अलग हटकर भी डेमोक्रेट नेताओं को भारत के अंदरूनी मुद्दों में दखल नहीं देना चाहिए। अगर यही काम भारतीय सांसद करें और अमेरिका के आंतरिक मामलों पर सवाल उठाएँ जैसे जो बाइडेन द्वारा अपने बेटे हंटर बाइडेन को दी गई माफी या ओसामा बिन लादेन को बिना मुकदमे के मारे जाने का मुद्दा तो यह अमेरिका को भी मंजूर नहीं होगा।
उमर खालिद एक भारतीय नागरिक है और वह भारतीय कानून के तहत मुकदमे का सामना कर रहा है। उसे जमानत मिलेगी या नहीं, वह बरी होगा या दोषी ठहराया जाएगा। इसका फैसला केवल भारतीय कानून और भारतीय अदालतें करेंगी, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव या अमेरिकी सांसदों की इच्छा से ऐसा होगा।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)