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मैथिली ठाकुर, पवन सिंह, रितेश पांडेय, खेसारी लाल यादव… सब बनेंगे ‘माननीय’ तो क्या कार्यकर्ता घास छीलेंगे?

पवन सिंह, रितेश पांडे, अक्षरा सिंह, मैथिली ठाकुर, खेसारी लाल यादव, छैला बिहारी, भरत शर्मा व्यास, रचना झा…ऐसा लगता है कि बिहार के इस विधानसभा चुनाव में बिहार से जुड़े सभी कलाकारों में खुद को माननीय बनाने की होड़ लगी हुई है। इसे लेकर जनता के बीच भी भारी विरोध देखा जा रहा है।

खासकर जब से मैथिली ठाकुर ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। 25 साल की लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने खुद बेनीपट्टी से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं से उनकी मुलाकात, पार्टी में शामिल होने की संभावनाओं ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है।

विरोध करने वालों का पहला और सबसे बड़ा तर्क यह है कि मैथिली ठाकुर अब बिहार की जमीन से कट चुकी हैं। उनका परिवार लंबे समय से दिल्ली में रहता है, वहीं से उन्होंने अपनी शिक्षा और करियर दोनों बनाए हैं। उनका मधुबनी या दरभंगा से सीधा जुड़ाव अब सिर्फ सरकारी या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रह गया है।

कई लोगों का तर्क है कि लोकप्रियता को संस्कृति के लिए योगदान से ऊपर नहीं रखा जा सकता है। उनकी पहचान मैथिली गायिका के रूप में जरूर है, पर उन्होंने स्थानीय स्तर पर कलाकारों के लिए कोई संस्थागत काम नहीं किया है। लोगों का कहना है कि अगर अगर बात मैथिली संस्कृति को सम्मान देने की है, तो ऐसे कलाकारों को मौका देना चाहिए जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मैथिली के लिए समर्पित की है।

मैथिली क्षेत्र में ऐसे कई कलाकार हैं जिन्होंने अपना जीवन मैथिली संस्कृति को बचाने में लगा दिया। पूनम मिश्रा, माधव राय, विजय विकास, रचना झा जैसे लोग गाँव-गाँव घूमकर कार्यक्रम करते हैं। इन कलाकारों की पहचान भले ही राष्ट्रीय स्तर पर न हो लेकिन वे आज भी अपने लोगों के बीच रहते हैं, उन्हीं के दुख-दर्द में शामिल होते हैं।

मैथिली ठाकुर के नाम के साथ जो विरोध जुड़ा है, उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग इसे लोकप्रियता की राजनीति मान रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि राजनीतिक दल उनके नाम को सिर्फ वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

मैथिली ठाकुर कोई अकेला नाम नहीं है। भोजपुरी स्टार रितेश पांडेय को करगहर से अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा भोजपुरी सिनेमा के चमकते सितारे पवन सिंह, अक्षरा सिंह, रचना झा और खेसारी लाल यादव के भी इस सियासी जंग में उतरने की पूरी संभावनाएँ नजर आ रही हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन कलाकारों ने अपने क्षेत्र की भाषा और कला को पहचान दिलाई है। भोजपुरी सिनेमा में पवन सिंह, खेसारी लाल यादव जैसे कलाकारों का योगदान भी कम नहीं रहा उनकी लोकप्रियता अपार है, उनका फैनबेस जबरदस्त है। पर चुनाव जीतने के लिए फैनबेस से ज्यादा जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है।

पवन सिंह पहले बीजेपी से आसनसोल से उम्मीदवार बने लेकिन वहाँ से उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद वह बिहार के काराकाट से चुनाव लड़े, पवन सिंह खूब फेमस होने के बाद भी काराकाट से चुनाव नहीं जीत सके बल्कि उन्होंने NDA के उम्मीदवार को हराने का काम ही किया। यानी जिस राजनीतिक विचार से आज वह जुड़ना चाहते हैं उसके प्रति उनकी निष्ठा कितनी रही है या है यह भी एक सवाल है।

याद कीजिए जब मनोज तिवारी ने राजनीति में कदम रखा था, ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ के हिट होने के बाद वह भोजपुरी सिनेमा के बड़े सुपरस्टार बन गए थे। उनकी कैसेट ब्लैक में बिकने लगी थी। इस बीच जब 2009 में मनोज तिवारी सपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़े तो उनकी हार हुई

भोजपुरी सिनेमा के ही एक और बड़े सुपर स्टार हैं रवि किशन, उनकी गिनती उन अभिनेताओं में होती है जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को फिर से खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है। अपनी लोकप्रियता के वाबजूद जव वह चुनावी मैदान में उतरे तो हालता खस्ता हो गई। 2014 में उन्होंने जौनपुर से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें केवल 4.25% वोट ही मिल सके। रवि किशन फिलहाल गोरखपुर से बीजेपी के सांसद है।

ऐसे स्टार्स से लिस्ट लंबी है जो राजनीति में आए लेकिन फ्लॉप हो गए। कुछ ऐसे भी हैं जो आए चुनाव जीते और फिर क्षेत्र से गायब हो गए। हर दल में ऐसे स्टार्स आपको दिख जाएँगे। अमिताभ बच्चन से लेकर जया प्रदा और धर्मेंद्र तक राजनीति में कदम रखने वाले स्टार्स की लंबी फेहरिस्त है।

राजनीति हमेशा से जनसेवा का मंच कही जाती रही है और मंच के सितारों का राजनीति में आना कोई नई घटना भी नहीं है। इसके साथ-साथ एक सवाल जो उठता है वो ये कि क्या ऐसे समय में जो कार्यकर्ता वर्षों से दशकों से पार्टी का झंडा ढो रहा है, दरी-चादर बिछा रहा है, जो हर चुनाव में पोस्टर चिपकाता, भीड़ जुटाता और गलियों में नारे लगाता है, क्या उसका कोई हक नहीं बचा है?

राजनीति में विचार और वैचारिक प्रतिबद्धता हमेशा से एक ताकत रही है। जब कलाकारों और सेलेब्रिटीज को सिर्फ उनकी लोकप्रियता के दम पर टिकट दिए जाते हैं, तो वो विचारधारा के प्रति समर्पित नहीं होते हैं। कई बार वे खुद नहीं जानते कि जिस दल से लड़ रहे हैं, उसकी विचारधारा क्या है, उसकी नीतियाँ क्या हैं या उस क्षेत्र की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं।

अब जब ये स्टार्स चुनाव में उतरते हैं तो इन चेहरों के आने का सीधा असर पड़ता है जमीनी कार्यकर्ता पर, खासतौर पर यूपी या बिहार जैसे राज्यों में। जिन्हें राजनीतिक तौर पर ज्यादा एक्टिव माना जाता है। ऐसी जगहों पर जब कार्यकर्ता अपने खून-पसीने से पार्टी की पहचान बनाते हैं, वहाँ जब कोई स्टार अचानक टिकट लेकर आ जाता है, तो कार्यकर्ता का मन टूट जाता है।

उसे लगता है कि उसका संघर्ष, उसकी मेहनत सब बेकार गई। वह जो बरसों तक अपने इलाके में पार्टी का चेहरा रहा, जनता के सुख-दुख में साथ रहा, अब उसे कोई पूछने वाला नहीं। राजनीति की ताकत हमेशा कार्यकर्ता से आती है, सितारों से नहीं। पार्टी का ढांचा उसी नींव पर टिका होता है जो गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क करते हैं, पोस्टर लगाते हैं, बूथ संभालते हैं। अगर उस नींव को ही कमजोर कर दिया गया, तो उसके ऊपर बना महल भर-भराकर गिर ही जाएगा।

राजनेताओं और राजनीतिक दलों को यह सच्चाई भी समझनी चाहिए, भले ही ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 1-2 हो लेकिन यही लोकप्रियता इनके लिए इस मामले में मुसीबत बन जाती है। यह चर्चा लोगों तक पहुँचने लगती है कि पार्टी में हवा-हवाई उम्मीदवारों को टिकट दिया जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को समझ, जमीनी लोगों को आगे बढ़ाने की जरूरत हैं।

राजनीति का उद्देश्य हमेशा सेवा और जनहित रहा है, न कि लोकप्रियता और चमक। लेकिन जब कलाकारों और गायकों को सिर्फ इसलिए उतारा जाता है क्योंकि उनके लाखों फॉलोअर्स हैं या वे वोटों को influence कर सकते हैं, तो राजनीति विचार और मूल्यों से खाली हो जाती है।

धीरे-धीरे जनता को यह महसूस होने लगा है कि राजनीति अब जनता की आवाज नहीं बल्कि चुनावी ब्रांडिंग की मशीन बन चुकी है। जो लोग राजनीति के लिए पूरी तरह समर्पित होकर इस क्षेत्र में काम करना भी चाहते होंगे उन्हें भी लगने लगेगा कि स्टार बन जाया तो राजनेता बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।

इन्हीं, कारणों के चलते राजनीति से वही सुचिता कम हो रही है और लोगों के प्रति जवाबदेही में भी कमी आ रही है। राजनीति की सुचिता को बचाने के लिए जरूरी है कि पूर्ण कालिक लोग राजनीति में आएँ जो इसे साइड बिजनेस ना मानकर पूर्ण कालिक काम मानें।

चारों तरफ से पिट रही पाकिस्तान की फौज, TTP से BLA तक सब माँग रहे आजादी: POK भी भारत में मिलने को बेकरार, क्या जल्द बदल जाएगा PAK का भूगोल?

पाकिस्तान जहाँ अमेरिका की आड़ में अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत दिखने की कोशिश कर रहा है, वहीं मुल्क में अंतर्कलह चरम पर है। एकतरफ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) रोज पाकिस्तानी फौजियों को मार रही है तो दूसरी तरफ POK में जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर है। उधर बलूचिस्तान तो कब से पाकिस्तान के झूठे ‘एकता’ के दावे का मजाक उड़ाता आ रहा है, जहाँ लोग खुलेआम कहते हैं कि उन्हें इस फौजी हुकूमत से आजादी चाहिए।

TTP का पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेंकने का मकसद

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने विस्फोटक हमला किया। हमलावरों ने पहले सड़क किनारे बम (IED) विस्फोट किया और फिर गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें 11 पाकिस्तानी सुरक्षाबलों की मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि TTP का ये हमला खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी एयरफोर्स द्वारा गिराए गए बम की प्रतिक्रिया है। इस हमले में 30 आम लोगों की मौत हुई थी, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

TTP लगातार पाकिस्तान की फौज को निशाना बनाकर हमले कर रहा है। इस संगठन का मकसद मौजूदा सरकार को उखाड़ फेंककर कट्टर इस्लामी शासन लागू करना है।पाकिस्तान सुरक्षा एजेंसियों के लिए TTP अब एक बड़ा खतरा बन चुका है। संगठन अफगानिस्तान की सीमा के बनाए ठिकानों से हमले करता है। हालाँकि, काबुल ने इसे खारिज करते हुए कहा है कि अफगान अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं होने देता है।

बावजूद पाकिस्तान लगातार आतंकी हमले के पीछे अफगानिस्तान की करास्तानी और TTP को संरक्षण देने के आरोप रहा है। यह आरोप अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद से चल रही तनातनी से जन्मा हैं। दरअसल, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच 2,600 किलोमीटर तक सीमा फैली हुई है।

इस सीमा विवाद का मुख्य कारण डूरंड रेखा है, जिसे पाकिस्तान एक अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है जबकि तालिबान इसे एक थोपी हुई और अवैध रेखा मानता है। पाकिस्तान लगातार सीमा पर बाड़ लगाने की कोशिश करता है लेकिन तालिबान लड़ाके इका कड़ा विरोध करते हैं, जिससे तनाव पैदा होता है।

बलोच आर्मी ने जाफर एक्सप्रेस को लगातार बनाया निशाना

हाल ही के कुछ महीनों में जाफर एक्सप्रेस को कई बार निशाना बनाया गया। दो दिन पहले ही मंगलवार (07 अक्टूबर 2025) को बलूचिस्तान में जाफर एक्सप्रेस पर बलोच लिबरेशन आर्मी ( BLA) ने हमला किया। सिंध-बलूचिस्तान सीमा पर हुए इस हमले में पटरियों पर विस्फोटक (IED) लगाया गया था, जिसमें कई लोग घायल हुए।

इससे पहले सितंबर 2025 में जाफर एक्सप्रेस का एक कोच उड़ा दिया गया, जिसमें 12 यात्री घायल हुए थे। अगस्त 2025 में भी मस्तुंग जिले में विस्फोटक के चलते ट्रेन के छह डिब्बे पटरी से उतर गए थे, जिसमें 4 लोग घायल हुए थे। उसी महीने कोलपुर के पास निकासी के लिए भेजे गए पायलट इंजन पर गोलीबारी हुई। अलगाववादी BLA ने हमले की जिम्मेदारी ली।

जून 2025 में भी सिंध प्रांत के जकोबाबाद में बम से ट्रेन के 6 कोच पटरी से उतर गए मार्च 2025 में भी BLA ने 400 यात्रियों से भरी ट्रेन को हाइजैक किया। इसमें पाकिस्तानी फौजियों ने 16 बलोच आर्मी के सदस्यों को मार गिराया था।

बलूचिस्तान वो इलाका है जो पाकिस्तान को ईरान और अफगानिस्तान से जोड़ता है। बलूचिस्तान को अलग देश बनाने की माँग होती है। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा है। जहाँ पाकिस्तानी सरकार लगातार अमानवीय व्यवहार कर रही है। पाकिस्तानी फौज की दमनकारी नीति, आर्थिक और सामाजिक शोषण की वजह से बलूचिस्तानी की आजादी की माँग को लेकर बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) का गठन किया गया। 

1948 में पाकिस्तान ने इस प्रांत को अपने में मिला लिया था। तभी से बलोच आजादी की माँग करते आ रहे हैं। बलोच लोगों का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार ने अब तक सिर्फ इस प्रांत को लूटा है और लोगों की उपेक्षा की है। मिनरल्स से भरपूर इस प्रांत में कोयला, सोना, तांबा, गैस की बहुतायत है। फिर भी पाकिस्तान जैसे भिखारी देश का ये सबसे गरीब इलाका है।

POK में प्रदर्शन पर पाकिस्तानी सरकार का ‘दमनकारी रवैया’

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) भी इन दिनों बड़े उथल-पुथल से गुजर रहा है। यहाँ सितंबर 2025 के अंत से आम नागरिक पाकिस्तानी सरकार की ‘दमनकारी नीतियों’ के खिलाफ ‘शटर डाउन’ और ‘होल्डिंग हड़ताल’ के तहत सड़क पर उतर आए हैं, जिससे क्षेत्र में इस्लामाबाद की पकड़ हिल गई है।

यहाँ प्रदर्शनकारियों की माँग सिर्फ सुविधाएँ नहीं थीं बल्कि राजनीतिक आत्म-सम्मान और न्याय की भी थी। मगर पाकिस्तानी सरकार का जवाब था बल प्रयोग। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस और सुरक्षाबल प्रदर्शनकारियों के साथ झड़प पर उतर आए, जिसका नतीजा 12 आम नागरिकों की मौत से चुकाना पड़ा। पूरे इलाके में शट डाउट लगा दिया गया।

व्यापारियों, नागरिक समाज समूहों और कार्यकर्ताओं के गठबंधन के नेतृत्व में हुए इस विरोध प्रदर्शनों ने क्षेत्रीय राजधानी मुजफ्फराबाद, रावलकोट, कोटली, ददयाल और नीलम घाटी जैसे प्रमुख शहरों को ठप कर दिया। 4 अक्टूबर 2025 तक, पाकिस्तान सरकार ने प्रदर्शनकारियों के नेताओं के साथ प्रदर्शनों को समाप्त करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए लेकिन तनाव अभी भी बना हुआ है। अक्टूबर 2025 की शुरुआत तक आधी रात को विरोध प्रदर्शन और कर्फ्यू की खबरें जारी रहीं।

ये विरोध-प्रदर्शन पिछले चार दशक में POK में हुए सबसे बड़े विद्रोहों में से एक है। ‘कश्मीर हमारा, इसका फैसला हम करेंगे’ और ‘हुक्मरान सुन लो, हम तुम्हारे विनाश हैं’ जैसे नारों ने सीधे तौर पर इस्लामाबाद की नीतियों को निशाना बनाया है।

POK में गाँव-गाँव में महिलाएँ और बच्चे आवाज उठा रहे हैं। यहाँ प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी फौज की गाड़ियों को आग लगा दी और फौजियों को कुछ समय के लिए बंधक बना लिया। यह दिखाता है कि POK में पाकिस्तानी फौज की पकड़ ढीली हो चुकी है।

पाकिस्तान में गृहयुद्ध का माहौल

पाकिस्तान में TTP की हिंसा, बलोच की आजादी की माँग और POK में प्रदर्शन को साथ रखकर देखा जाए तो मुल्क भीतर से सड़ चुका है। पाकिस्तान के पास ना स्थिर सरकार, ना एकजुट फौज और ना ही जनता का भरोसा है। ये पाकिस्तानी सरकार की ‘दमनकारी नीतियों’ का ही नतीजा है। इससे साफ कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में गृहयुद्ध के माहौल हैं।

बावजूद पाकिस्तान विदेशों में जाकर हवाबाजी से बाज नहीं आ रहा है। कभी डोनाल्ड ट्रंप से दोस्ती बढ़ाकर दुनिया में दिखावा कर रहा है। तो कभी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत पर झूठी रिपोर्टें पेश कर रहा है। लेकिन असलियत अब सबके सामने है। अंदर से पाकिस्तान की हवा निकल चुकी है।

पाकिस्तान की हालत उस सर्कस के जोकर जैसी हो गई है, जो दूसरों को हँसाने के चक्कर में खुद पर ही गिर जाता है। आज पाकिस्तान खुद अपनी ही चालों में फँस चुका है। दुनिया अब समझने लगी है कि यह देश सिर्फ दिखावे की दोस्ती और धमकी की राजनीति जानता है। पाकिस्तान को अब बाहरी दुश्मन की जरूरत नहीं है, उसका असली दुशमन अब वो खुद है।

‘अचानक बेड से उठा, मेरी ब्रेस्ट छूने लगा’: इंदिरा जयसिंह के सहयोगी पर ट्रांसजेंडर महिला वकील ने लगाए यौन शोषण के आरोप, जानें कौन है ‘समलैंगिक’ रोहिन भट्ट

आतंकियों और देशद्रोहियों के मानवाधिकारों की बात करने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह अपने सहयोगी वकील रोहिन भट्ट पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप पर खामोश हैं। ये आरोप एक ट्रांसजेंडर महिला वकील राघवी ने लगाए हैं।

रोहिन भट्ट पर यौन उत्पीड़न का आरोप

सोशल मीडिया पर राघवी ने एक के बाद एक कई पोस्ट डाले हैं। इसमें कहा गया है कि समलैंगिक मामलों के अधिकारों की माँग करने वाले एक्टिविस्ट रोहिन भट्ट ने राघवी का यौन शोषण किया।

राघवी ने लिखा है कि दो साल पहले उनके साथ शर्मनाक हरकत की गई थी। उस वक्त वह कानून की पढ़ाई कर रही थी और हार्मोन थरेपी ले रही थी। दिल्ली में रोहिन भट्ट का कोई स्थायी घर नहीं था। इसलिए भट्ट दोस्तों के घर लाजपत नगर में रह रहा था। दरअसल ये दोस्त राघवी के भी दोस्त थे। उन्होंने राघवी को मिलने के लिए बुलाया था। वह जब मिलने पहुँची, तो उसने अपने दोस्तों से हार्मोन थरेपी से होने वाले शारीरिक बदलाव के बारे में बतलाया। उसने बताया कि उसके ब्रेस्ट अब बड़े होने लगे हैं। बेड पर लेटा भट्ट अचानक उठ गया और उसके ब्रेस्ट को छूने लगे। उसने पूरे शरीर को गलत तरीके से छूआ।

राघवी के मुताबिक, “वह काफी सकते में आ गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसके साथ क्या हुआ। मेरे दोनों दोस्त भी काफी शॉक्ड थे। उन दोनों ने कुछ देर चुप रहने के बाद मुझे नॉर्मल किया और भट्ट से कहा कि आज के बाद कभी ऐसी हरकत किसी महिला के साथ नहीं करना। भट्ट खुद को सही साबित करने के लिए कहता रहा कि वह मजाक कर रहा है।”

राघवी के मुताबिक, उस वक्त समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। इस तरह की हरकत के लिए कानून में क्या सजा है, ये समझ नहीं आ रहा था। उसने दोस्तों से बात की, लेकिन इसका कोई हल नहीं निकला।

इसी तरह समय बीता। लेकिन पीड़िता के अंदर दहशत बैठ गया। कुछ दूसरे दोस्तों से बात हुई, जो भट्ट के भी दोस्त थे। दोस्तों ने भट्ट को लोगों को न छूने की सलाह दी। भट्ट ने इसे नजरअंदाज किया। पीड़िता के मुताबिक, “उसके पास माफी माँगने का मौका था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। मैंने उसे हर जगह नजरअंदाज करने की कोशिश की। वर्क प्लेस से लेकर दोस्तों के बीच भी। काफी वक्त तक मैं खुद से लड़ती रही। एक दिन मैंने उसका इंटरव्यू देखा। मुझे उसका अमानवीय चेहरा याद आ गया। वह उस वक्त रेप और उत्पीड़न पर बात कर रहा था।”

हाल ही में जब राघवी का रोहिन भट्ट से आमना-सामना हुआ, तो पुराने घाव याद आ गए। राघवी के मुताबिक, “उसने सोचा कि अब वह आवाज बुलंद करेगी। कुछ दिन इसमें बीत गया कि कैसे एक पुरुष ‘क्लास प्रिविलेज’ मिलने के बाद दूसरों को कुछ नहीं समझता है। उसे ट्रांसजेंडर और महिलाओं के अधिकारों का कोई ख्याल नहीं रहता है।”

राघवी का कहना है कि भट्ट ने एक महिला के इमोशन की परवाह नहीं की। न ही कभी माफी माँगी।

कौन है रोहिन भट्ट

रोहिन भट्ट समलैंगिकों के अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट में लड़ने वाला वकील और एक्टविस्ट है। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर का सहयोगी रहा रोहिन भट्ट की पहचान LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के रिश्ते और शादी को कानूनी मान्यता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने से बनी। रोहिन भट्ट जुलाई 2022 से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर के चैंबर में काम करता है। वह कानूनी और रिसर्च सहायता देता है।

उसने दो मामले, समीर समुद्र द्वारा दायर याचिका और नितिन करणी द्वारा दायर याचिका का मसौदा तैयार किया था। वह सेम सेक्स मैरिज केस में वादियों का पक्ष सुप्रीम कोर्ट में रखता रहा है। बोस्टन के हार्वर्ड लॉ स्कूल में बायोएथिक्स में मास्टर्स करने वाले भट्ट को इंदिरा जयसिंह ने भारत में पहली नौकरी दी।

रोहिन खुद भी समलैंगिक है। रोहिन का जन्म गुजरात के भावनगर में हुआ। उसके पिता एक सिविल सेवक थे और माँ एक कॉलेज लेक्चरर थीं। रोहिन ने अपनी स्कूली शिक्षा सेंट जेवियर्स गांधीनगर और उदगाम स्कूल अहमदाबाद से पूरी की।

उसका कहना है कि स्कूल में उसे धमकाया गया था। उसके समलैंगिक दोस्त थे, जो उसे डेटिंग ऐप्स के माध्यम से मिले थे। हालाँकि वह समलैंगिकों के आयोजनों से दूर रहता था। 2021 में हार्वर्ड में प्रवेश मिलने के बाद वह दहशत से बाहर आ पाया।

समलैंगिकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले समलैंगिक रोहिन भट्ट पर एक समलैंगिक महिला ने ही यौन उत्पीड़न का आरोप लगा कर बताया है कि कैसे ‘उच्चवर्ग वाले’ वकील महिलाओं और ट्रांसजेंडर को अपने पैर की जूती समझते हैं।

तालिबान को मान्यता से लेकर चाबहार पोर्ट तक: भारत-अफगानिस्तान के रिश्तों के लिए कितना अहम है विदेश मंत्री मुत्ताकी का 7 दिवसीय दौरा?

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी आज दिल्ली पहुँचे हैं। अमीर खान मुत्ताकी विदेश मंत्री एस जयशंकर और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे। यह 7 दिवसीय दौरा भारत और तालिबान-प्रशासित अफगान सरकार के बीच रिश्ते सुधारने की एक बड़ी पहल मानी जा रही है। मुत्ताकी तालिबान के पहले वरिष्ठ अधिकारी हैं जो भारत आए हैं। हालाँकि, भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन 2021 से ही मानवीय सहायता और व्यापार के जरिए व्यावहारिक संबंध बनाए हुए है।

मुत्ताकी पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रतिबंध लागू हैं, इसलिए उन्हें इस दौरे के लिए UN सुरक्षा परिषद (UNSC) से विशेष यात्रा छूट मिली है। इस यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच कई बैठकें हो चुकी हैं। जनवरी 2025 में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मुत्ताकी से दुबई में मुलाकात की थी। इसके बाद मई 2025 में विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने भी मुत्ताकी से बात की थी। पहलगाम आतंकी हमले के बाद हुई इस बातचीत में काबुल ने हमले की कड़ी निंदा की थी। तालिबान सरकार भारत को ‘महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और आर्थिक साझेदार’ बता चुकी है।

दौरा: देवबंद, ताज महल और व्यापार पर फोकस

अमीर खान मुत्ताकी तालिबान के पहले ऐसे वरिष्ठ अधिकारी हैं जो भारत की यात्रा कर रहे हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान वह राजनीतिक मुलाकातों के अलावा कई महत्वपूर्ण जगहों का दौरा करेंगे। शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को मुत्ताकी देवबंद के प्रसिद्ध दारुल उलूम मदरसे का दौरा करेंगे। यह मदरसा तालिबान के कई नेताओं के लिए सम्मान का केंद्र रहा है। यहाँ कुछ अफगान छात्र भी पढ़ाई कर रहे हैं।

इसके बाद, रविवार (12 अक्टूबर 2025) को वह आगरा जाकर ताजमहल देखेंगे। फिर सोमवार (13 अक्टूबर 2025) को मुत्ताकी नई दिल्ली में एक प्रमुख उद्योग मंडल के कार्यक्रम में शामिल होंगे। वह भारतीय व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। तालिबान सरकार भारत के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करना चाहती है। इसी दिन (13 अक्टूबर) को मुत्ताकी नई दिल्ली में अफगान समुदाय के लोगों से भी मिलेंगे। बुधवार (15 अक्टूबर 2025) को मुत्ताकी भारत का दौरा खत्म कर काबुल लौट जाएँगे।

राजदूत शाहीन ने क्या कहा?

मुत्ताकी की भारत यात्रा से पहले कतर में अफगानिस्तान के राजदूत मुहम्मद सुहैल शाहीन ने इस दौरे को बहुत अहम बताया। उन्होंने कहा कि भारत और अफगानिस्तान के लोगों के बीच ऐतिहासिक और गहरे संबंध हमेशा रहे हैं, चाहे सरकार कोई भी रही हो। यह दौरा आपसी विश्वास को बढ़ाने और पुराने मतभेदों को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।

सुहैल शाहीन ने अंतर्राष्ट्रीय मान्यता न मिलने को राजनीतिक कारण बताया। सुहैल शाहीन ने तर्क दिया, “हमने विदेशी कब्जे से आजादी अपनी जनता के समर्थन से हासिल की है। ठीक वैसे ही, जैसे भारत ने ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाई थी।” सुहैल शाहीन ने ज़ोर दिया कि तालिबान का पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण है और वे उसकी सुरक्षा करने में सक्षम हैं, इसलिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलनी चाहिए।

व्यापार और कनेक्टिविटी के विकल्प

राजदूत शाहीन ने द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव दिया। यह समिति शिक्षा, व्यापार और बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में नियमित बैठकें कर सकती है। जब भारत-अफगानिस्तान व्यापार के लिए पाकिस्तान द्वारा रास्ता न दिए जाने की बात आई, तो उन्होंने दो विकल्प बताए।

पहला, चूंकि पाकिस्तान मध्य एशिया के रास्ते अपने व्यापार के लिए अफगानिस्तान से गुजरता है, इसलिए उसे भारत के साथ व्यापार के लिए भी अफगानिस्तान को रास्ता देना चाहिए। राजदूत शाहीन ने चाबहार पोर्ट को एक अच्छा विकल्प बताया। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि दोनों देशों को व्यापारिक सुविधाएँ बेहतर बनाने और व्यापार बढ़ाने के लिए चाबहार पोर्ट पर मिलकर काम करना चाहिए।

संकट में भारत की सहायता

भारत ने अफगान जनता को मानवीय मदद देने में हमेशा तत्परता दिखाई है। सितंबर 2025 में आए भूकंप के बाद, भारत सबसे पहले राहत सामग्री भेजने वाले देशों में था। उस समय 1,000 परिवारों के लिए टेंट और 15 टन खाद्य सामग्री भेजी गई थी। इसके अलावा, दवाइयाँ, हाइजीन किट, कंबल और जनरेटर सहित 21 टन अतिरिक्त राहत सामग्री भी अफगानिस्तान पहुँची।

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री और अमीर खान मुत्ताकी (फोटो साभार: इंडिया टूडे)

अगस्त 2021 से अब तक भारत 50,000 टन गेहूँ, 330 टन से अधिक दवाइयाँ और टीके, और 40,000 लीटर कीटनाशक जैसी जरूरी राहत सामग्री दे चुका है। इन प्रयासों से भारत ने यह साबित किया है कि वह अफगान जनता के साथ एक मानवीय और विकास साझेदार के रूप में खड़ा है, भले ही उसने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता न दी हो।

भारत के करीब आने का मौका

मुत्ताकी का यह दौरा तब हो रहा है जब अफगानिस्तान-पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को समर्थन देने के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में, मुत्ताकी के पास भारत के करीब आकर क्षेत्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने का यह सही मौका है। अफगान राजदूत मुहम्मद सुहैल शाहीन ने भी कहा है कि यह दौरा ‘आपसी विश्वास बढ़ाने’ की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे साफ है कि काबुल, नई दिल्ली को एक मजबूत विकल्प के तौर पर देख रहा है।

‘मृतकों को जिंदा करने’ का दावा करने वाला स्टीवन सोशल मीडिया से भी चला रहा था धर्मांतरण का रैकेट, गुजरात के कई शहरों में सेमिनार में कहा- मूर्ति पूजा केवल ‘पत्थरों की पूजा’

गुजरात के नाडियाड शहर में बड़े धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। रैकेट के मास्टरमाइंड स्टीवन मैकवान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। फिलहाल स्टीवन न्यायिक हिरासत में है। उधर खेड़ा पुलिस धर्मांतरण रैकेट की गहराई से जाँच में जुटी हुई है।

पुलिस की जाँच में सामने आया कि मैकवान ‘रेस्टोरेशन रिवाइवल’ नाम का एक ट्रस्ट चला रहा था और इसके जरिए वह दूसरे राज्यों से लोगों को लाकर उनका ब्रेनवॉश करके धर्मांतरण करवा रहा था। पुलिस ने बताया कि ये गैरकानूनी है क्योंकि इसके लिए कोई कागजी कार्रवाई नहीं की जाती थी। इस धर्मांतरण रैकेट का केंद्र नाडियाड में बनाया गया था। लेकिन पुलिस को शक है कि इसके तार बाकी राज्यों से भी जुड़े हो सकते हैं।

पुलिस की जाँच में यह भी सामने आया कि स्टीवन को धर्मांतरण के लिए विदेश से फंडिंग की जा रही थी। पुलिस विदेश से जुड़े ₹1.33 करोड़ के लेन-देन की जाँच भी कर रही है। शुरुआती जाँच के मुताबिक, मैकवान इसी पैसे से यह रैकेट चलाता था।

पुलिस ने धर्मांतरण के मास्टरमाइंड मैकवान को पाँच दिन की रिमांड पर लेकर पूछताछ की, जिसके बाद दोबारा कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

मास्टरमाइंड स्टीवन मैकवान सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय था। मैकवान ने अपने ट्रस्ट के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया था और यूट्यूब चैनल भी चलाता था। दोनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म साल 2020 के आसपास शुरू किए गए थे, जिनमें लगभग तीन महीने पहले आखिरी पोस्ट डाली गई थी।

सोशल मीडिया पर चमत्कार से बीमारी ठीक करने की वीडियो

स्टीवन मैकवान के यूट्यूब चैनल पर ऐसे कई वीडियो हैं, जिनमे वह ईश्वर के चमत्कारों के जरिए किसी की बीमारी ठीक करने या किसी को दूसरी समस्याओं से बाहर निकालने का दावा करता है।

इतना ही नहीं, स्टीवन ने ईश्वर के कथित चमत्कारों के जरिए मरे हुए लोगों को जिंदा करने का भी दावा किया है और इसके वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हैं। बाद में इन वीडियो का इस्तेमाल लोगों का ब्रेनवॉश करने और उनका धर्मांतरण करने के लिए किया गया।

स्टीवम माइकैवन ने यूट्यूब पर डाले वीडियो का स्क्रीनशॉट

यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो में किसी को कोरोना से ठीक करने, किसी को कैंसर से ठीक करने और यहाँ तक कि किसी को ‘मृत्यु जैसी स्थिति’ से भी ठीक करने का दावा करते हैं।

इन सभी वीडियो में स्टीवन या उसका कोई साथी दिखाई देता है। सभी वीडियो की स्क्रिप्ट भी एक जैसी है, जिसमें बीमारी और समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए ईसा मसीह का आभार व्यक्ति किया जा रहा है।

ऐसे ही मैकवान्स ट्रस्ट नाम से फेसबुक पेज पर 24 अग्सत 2018 को एक पोस्ट डाली गई, जिसमें दावा किया गया कि एक हिंदू परिवार की बेटी की बीमारी यीशु की प्रार्थना से ठीक हो गई।

स्टीवन मैकवान ने फेसबुक पर की पोस्ट का स्क्रीनशॉट (गोपनीयता बनाए रखने के लिए कुछ विवरण हटाए गए हैं)

पोस्ट में लड़की का नाम और उम्र बताते हुए कहा गया है कि वह एक हिंदू परिवार से है और जन्म से ही बोल-सुन नहीं सकती। उसके पिता ने कई जगह इलाज कराया लेकिन अस्पताल ने कहा कि उसका ऑपरेशन करवाना होगा, जिसमें लाखों खर्च होंगे।

पोस्ट में आगे दावा किया गया है कि लड़की के पिता ने उसे रिस्टोरेशन मूवमेंट में शामिल करना शुरू किया और जब ईसा मसीह की प्रार्थना शुरू की तो लड़की बिना किसी ऑपरेशन के बोलने और सुनने लग गई।

सेमिनार में लोगों का करता था ब्रेनवॉश

इसके अलावा मैकवान के यूट्यूब चैनल पर उसके सेमिनारों में भाषण की कई वीडियो भी अपलोड की गई हैं। वह अक्सर लोगों के सामने ईसाई का इतिहास बताते हुए भाषण देता था। लोगों को ईसाई धर्म से जुड़ी एक किताब से समझाता और फिर वही किताब लोगों को पढ़ने के लिए दे देता था।

इन भाषणों में मैकवान ने यीशु में विश्वास, आत्मा की कथित शुद्धि और कई अन्य बातों पर बात की है। उनका कहना है कि सभी समस्याओं का समाधान यही है कि लोग यीशु में विश्वास करें, ईश्वर पर भरोसा करें। अगर ईश्वर या यीशु उनके साथ है तो जीवन में कभी कोई समस्या नहीं आएगी। शैतान उनके पीछे नहीं आएगा।

वह अपने कुछ वीडियो में बच्चों का इस्तेमाल भी करते नजर आता है। इसके अलावा उसके कई सेमिनारों में भी बच्चे और युवा हिस्सा लेते नजर आए हैं।

कई वीडियो ऐसे भी हैं, जिनमें मैकवान ने बाहर से कुछ पादरियों को बुलाकर भाषण दिलवाए थे। इन पादरियों के भाषणों में वही सब बातें कही गईं, जो मैकवान अपने सेमिनारों में कहा करता थे। कुछ घटनाओं का जिक्र करके ईसाई धर्मग्रंथों में लिखी बातों का हवाला देकर वह लोगों को यह यकीन दिलाता था कि अगर वे ईसा मसीह पर विश्वास करने लगें तो उनके जीवन की परेशानियाँ अपने आप कम हो जाएँगी।

उसके ट्रस्ट के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर कई पोस्ट औऱ वीडियो देखे गए हैं, जिनमें ऐसे दावे किए गए हैं।

मूर्ति पूजा के बारे में प्रचार

स्टीवन मैकवान अपने एक भाषण में मूर्ति पूजा के बारे में भी बात करता सुना गया है। अपने भाषण में वह मूर्ति पूजा को पूरी तरह से नकारता है और इसे अनावश्यक बताता हैं। वह ‘पत्थर’ शब्द का इस्तेमाल कर कहता है कि मूर्ति पूजा सिर्फ पत्थरों की पूजा करना है।

वह कहता है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को ईसा मसीह से ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है या अपने बच्चों या माता-पिता को ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है तो यह भी अनुचित है। वह कहता है कि ईसा मसीह सबसे पहले है फिर बाकी सब।

यहाँ साफतौर से मूर्ति पूजा का संबंध हिंदू देवी-देवताओं से है। मैकवान ने सेमिनार में आए हिंदुओं को ब्रेनवॉश करने के लिए मूर्ति पूजा पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी की। यह बात वीडियो में 27 मिनटट के बाद सुनी जा सकती है।

बाकी शहरों में भी धर्मांतरण की गतिविधियाँ सक्रिय

स्टीवन मैकवान ने नाडियाड के अलावा अहमदाबाद और बाकी शहरों में भी धर्मांतरण गतिविधियाँ फैलाई थीं। कई कार्यक्रमों में वह बीमारों और जरूरतमंदों को बुलाकर उन्हें पवित्र आत्मा की उपस्थिति का एहसास दिलाने के नाम पर भाषण देता था। इसके बाद वह लोगों पर हाथ रखने और प्रार्थना करने की भी बात करता था।

मैकवान ने वडोदरा में भी ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित किए थे, जिनकी जानकारी उसके सोशल मीडिया पर उपलब्ध है।

ट्रस्ट के पेज पर कई तस्वीरें हैं, जिनमें लोगों को अनाज और राशन से मदद करते हुए और भूखों को भोजन देने के लिए अभियान चलाते हुए दिखाया गया है। हालाँकि, सामाजिक ट्रस्टों द्ववारा ऐसे काम करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन मैकवान का काम लोगों का धर्मांतरण कराना था।

कई जगहों और मामलों में गरीबों को मदद का लालच देकर और उन्हें बरगलाकर धर्मांतरण करने की खबरें आई हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि ऐसी पोस्टों को भी संदेह की नजर से देखा जाए।

स्टीवन मैकवान फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। पुलिस ने उसके मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों से बड़ी संख्या में वीडियो, फोटो और अन्य सामग्री बरामद की है, जिनकी फोरेंसिक जाँच की जा रही है। आगे की जाँच के दौरान और भी खुलाने होने की संभावना है।

(मूलरूप से ये खबर गुजराती भाषा में मेघल सिंह परमान ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

अमेरिका ने अफगानिस्तान को बगराम एयरबेस के लिए धमकाया तो अटकी पाकिस्तान की साँसें, ट्रंप की दोस्ती और देश की दुर्दशा के बीच फँसा ‘आतंकिस्तान’

जब से डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति का पद संभाला है वो बैचेन हैं। कभी टैरिफ को लेकर हाथ-पैर मार रहे हैं तो कभी पनामा नहर और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात करते हैं। अब ट्रंप ने एक नई जिद पकड़ ली है। वो अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस वापस लेना चाहते हैं।

इसके लिए वो धमकी तक पर उतर आए हैं। ट्रंप का कहना है कि अगर उन्हें यह एयरबेस वापस नहीं मिला तो इसका अंजाम बुरा होगा। ट्रंप ने इसके लिए सैन्य कार्रवाई के विकल्प को भी नहीं नकारा है।

ट्रंप ने बगराम पर फिर से नियंत्रण पाने की इच्छा के पीछे चीन को एक प्रमुख कारण बताया है। बगराम चीनी सीमा से लगभग 800 किमी दूर है और शिनजियांग में निकटतम चीनी मिसाइल कारखाने से लगभग 2,400 किमी दूर है। ट्रंप ने पिछले महीने कहा था कि यह अड्डा ‘उस जगह से एक घंटे की दूरी पर है जहाँ (चीन) अपने परमाणु हथियार बनाता है’।

यह एयरबेस कभी अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में सैन्य प्रभुत्व का प्रतीक था जो अब तालिबान शासन के अधीन है। ट्रंप के इस बयान पर तालिबान ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है। तालिबान का कहना है कि वह इसे वापस नहीं लौटाएगा चाहे इसके लिए युद्ध ही क्यों ना लड़ना पड़े।

भारत भी इस मुद्दे पर तालिबान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। मॉस्को में आयोजित ‘सातवें मॉस्को फॉर्मेट’ सम्मेलन में भारत ने तालिबानी विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी का औपचारिक स्वागत कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका के इस रुख से सहमत नहीं है। हालाँकि, भारत ने सीधे तौर पर बगराम का नाम नहीं लिया है लेकिन उसका इशारा साफ है।

सिर्फ भारत ही नहीं ट्रंप की इस धमकी के बाद रूस से लेकर चीन और ईरान तक सबके कान खड़े हो गए हैं। ट्रंप का दोस्त पाकिस्तान भी उसकी इस चाल से भीतर ही भीतर घबराया हुआ है।

बगराम एयरबेस का इतिहास और अमेरिका की फिर कब्जे की कोशिश

अफगानिस्तान के राजा जहीर शाह के दौर में 1950 के दशक में इस एयरबेस का निर्माण हुआ था। इसका शुरुआती डिजाइन सोवियत इंजीनियरों ने बनाया था। 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के बाद यह उनका मुख्य सैन्य ठिकाना रहा था। 1989 में सोवियत सेना की वापसी के बाद यह खंडहर बन गया।

2001 में अमेरिका पर हमले के बाद जब उसने बदले की कार्रवाई शुरू की तो अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ सबसे बड़ा अमेरिकी ऑपरेशन यहीं से चला। इस एयरबेस को अमेरिका ने दुनिया का सबसे आधुनिक सैन्य ठिकाना बना दिया। यहाँ 10,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक और भारी मात्रा में सैन्य साजो-सामान तैनात थे।

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद अमेरिका भी यहाँ से निकल गया था। अब अफगानिस्तान में एक बार फिर आतंकियों की सक्रियता बढ़ने लगी है। अफगानिस्तान का सेंटर प्वाइंट कहा जाने वाले इस एयरबेस से अमेरिका आसानी से ईरान, पाकिस्तान, चीन, रूस के मध्य एशियाई इलाकों तक नजर रख सकता है।

ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक इसके दायरे में आते हैं। यही वजह है की अमेरिका इसे वापस लेना चाहता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावे किए गए हैं कि अमेरिका ने इसे वापस किराए पर लेने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। वो किसी तीसरे देश के जरिए भी यहाँ की लॉजिस्टिक एक्सेस हासिल करने की कोशिश में है।

अमेरिका के आने से घबराहट में पाकिस्तान

बीते कुछ समय में अमेरिका और पाकिस्तान की दोस्ती गहरी हुई है। पाकिस्तान की फौज का मुखिया आसिम मुनीर से ट्रंप ने मुलाकात की है। ब्लूचिस्तान के रेयर अर्थ मिनरल देने के नाम पर पाकिस्तान अमेरिका को अपना मुल्क गिरवी रखने पर तुला है। अब अफगानिस्तान में अमेरिका की आने की खबर सुनकर उसके भी हाथ-पाँव फूलने लगे हैं। ‘मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशंस’ की जिस बैठक में ट्रंप की योजना का विरोध किया गया है पाकिस्तान भी उसका हिस्सा था।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठन तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (TTP) इन दिनों पाकिस्तान फौज के पीछे पड़ा है। बीते दिन (7 अक्टूबर 2025) भी TTP के 7 फौजी मार गिराए हैं। दरअसल, पाकिस्तान की अफगानिस्तान से सीमा को लेकर लंबी लड़ाई है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद से दोनों देशों के बीच तनातनी है और दर्जनों हमले किए जा चुके हैं। दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की आड़ में एक अघोषित युद्ध लड़ रहे हैं।

इसके अलावा अमेरिका की अफगानिस्तान में वापसी के बाद पाकिस्तान पर इसका सीधा असर होने की संभावना है। दोनों के बीच करीब 2,600 किलोमीटर तक फैली हुई सीमा है और किसी भी सैन्य अभियान से सीमा पर दबाव तुरंत बढ़ जाएगा।

सीमावर्ती इलाकों में पहले भी बड़े युद्धों के दौरान लोग भागकर पाकिस्तान में आए थे या वहाँ हिंसा फैल गई थी। अगर फिर से अमेरिकी अपना अभियान शुरू करता है तो बड़े पैमाने पर विस्थापन, शरणार्थी संकट और प्रशासन पर दबाव पैदा हो सकता है। पाकिस्तान खुद भूखमरी की कगार पर है और ऐसे में लोगों के आने से अर्थव्यवस्था पर और बोझ आ पड़ेगा।

एक्सपर्ट मानते हैं कि अफगान युद्धों के ऐतिहासिक प्रभावों ने पाकिस्तान को आर्थिक और सामाजिक रूप से लंबा और गहरा नुकसान पहुँचाया है। सुरक्षा का बड़ा पहलू यह है कि जब बाहरी ताकतें किसी देश में सक्रिय हों तो आतंकी या चरमपंथी समूह अपने मौके की तलाश में रहते हैं। अफगानिस्तान अगर ऐसे समूहों की सक्रियता बढ़ी तो इसका असर भी पाकिस्तान पर दिखाई देगा।

पाकिस्तानी पत्रकार जाहिद हुसैन ने सितंबर 2025 में ‘डॉन’ में लिखे एक लेख में इसे लेकर अपनी चिंता भी जताई थी। जाहिद हुसैन ने लिखा, “अफगानिस्तान में किसी भी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का पाकिस्तान पर सीधा असर पड़ेगा। अफगानिस्तान में महाशक्तियों के बीच हुए पिछले दो युद्धों में अग्रणी देश होने के नाते पाकिस्तान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और अब भी मुल्क इसके प्रभावों से जूझ रहा है।”

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियानों से पाकिस्तान पर आर्थिक असर पड़ने की भी संभावना है। विवाद के कारण अगर व्यापार रुकता है तो स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा इससे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा।

पाकिस्तान के सामने अब ‘इधर कुआँ, उधर खाई’ वाली स्थिति है। पाकिस्तान अभी दबे-दबे ही अमेरिका का विरोध कर रहा है क्योंकि अगर वो खुलकर ट्रंप के खिलाफ जाता है तो उसकी US से पैसा कमाने की रणनीति फेल हो जाएगी। वहीं अगर वो अमेरिका का साथ देता है तो उसके घर में ही दिक्कतें खड़ी हो जाएगी।

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश से इनकार पर ईसाई अधिकारी को हटाया, सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा मामला: धर्म देखकर नहीं, कमांड से चलती है भारतीय सेना

भारत में अक्सर कहा जाता है कि लोगों का गुस्सा जल्दी शांत हो जाता है और उनकी ध्यान देने की क्षमता बहुत कम होती है। लेकिन जब मुख्य न्यायाधीश बी आर गवाई पर किसी ने जूता फेंका, संभवतः उनके उस बयान को लेकर जो उन्होंने भगवान विष्णु की मूर्ति की बहाली के मामले में दिया था, तब सोशल मीडिया और मीडिया हंगामा मच गया। विपक्षी पार्टियाँ और भारत के ‘सिक्युलर’ दलों के समर्थक इसे ‘जातिवाद’ से जोड़ने लगे, जबकि कुछ पत्रकार ‘संस्थाओं का सम्मान’ जैसी बातें करने लगे।

कुछ दिन बाद, जब यह मामला खुद ही शांत हो जाना चाहिए था, तब भी कुछ लोग जैसे अरफा ख़ानुम शेरवानी और अन्य वामपंथी इसे जातिवादी नजरिए से दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे हिंदू समाज में दरार डाल सकें, जो मोदी को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

लेकिन जब देश इस मामले में उलझा हुआ था, उसी समय एक और महत्वपूर्ण न्यायिक मामला चुपचाप सामने आया। यह मामला न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की नहीं बल्कि भारतीय सेना के अनुशासन, पदानुक्रम और कर्तव्य की सच्चाई को सामने लाता है।

यह मामला एक ईसाई सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसान का है। उन्होंने अपनी रेजिमेंट के मंदिर में एक छोटा धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। इस कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और 5 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सुना गया। सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति का धार्मिक अधिकार (अनुच्छेद 25) सेना के कठोर अनुशासन और यूनिट की एकता से ऊपर हो सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले ही उनके बर्खास्तगी के फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि किसी के कारण कानून द्वारा दिए गए आदेश का पालन न करना अनुशासनहीनता है। कोर्ट का तर्क साफ था: सेना में धर्म व्यक्तिगत होता है लेकिन अनुशासन संस्थागत।

यह मामला किसी व्यक्ति के धर्म का उल्लंघन नहीं है। यह समझने का मामला है कि सेना कोई मंदिर, मस्जिद या चर्च नहीं है बल्कि सेवा का पवित्र स्थान है। यहाँ हर सैनिक केवल तिरंगे के सामने झुकता है।

मामला: जहाँ एक ईसाई सैनिक ने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से इनकार कर दिया

लेफ्टिनेंट कमलेसान का सेवा रिकॉर्ड बताता है कि वह 3rd Cavalry Regiment से जुड़े थे, जिसमें सिख, जाट और राजपूत सैनिक थे। इस रेजिमेंट में एक मंदिर और एक गुरुद्वारा था, कोई ‘सर्व धर्म स्थल’ नहीं। वह अपने सैनिकों के साथ दीवाली, गुरुपरब और होली जैसे त्योहारों में हिस्सा लेते थे। सभी के अनुसार वह एक ईमानदार और सम्मानजनक अधिकारी थे।

लेकिन जब उन्हें रेजिमेंटल अनुष्ठान के तहत मंदिर के भीतर जाकर आरती करने का आदेश मिला, तो उन्होंने इससे विनम्रता से मना कर दिया। उनका कहना था कि यह उनके ईसाई धर्म के एक ईश्वर में विश्वास के खिलाफ होगा।

यहाँ पर नागरिक दृष्टिकोण असफल होता है। सेना व्यक्तिगत पसंद पर नहीं चलती। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी आदेश देता है, तो इसमें ‘अगर’ या ‘लेकिन’ नहीं होता। कोई संकोच, इंकार या अपवाद कमांड की दीवार में दरार डालता है और युद्ध के मैदान में ये दरारें घातक हो सकती हैं।

सेना ने हाईकोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया कि किसी देवता के प्रति अनुष्ठान रेजिमेंट की पहचान, एकता और मनोबल का हिस्सा हैं। जब कोई अधिकारी इस प्रथा से दूरी बनाता है, तो वह अपने सैनिकों से अलग हो जाता है, जिनकी आस्था अक्सर उनके युद्ध के नारे और साहस से जुड़ी होती है।

यह मामला हिंदू बनाम ईसाई का नहीं है। रेजिमेंट के धार्मिक अनुष्ठान पूजा के लिए नहीं, बल्कि सैनिकों के बीच एकता और तालमेल बनाए रखने के लिए होते हैं। यह वैसा ही है जैसे युद्ध से पहले की अरदास या ‘बजरंग बली की जय’ का युद्ध नारा, जो धार्मिक बयान नहीं बल्कि सैनिकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का साधन है।

क्यों सेना लोकतंत्र दिखाने की जगह नहीं होती?

नागरिक अक्सर यह समझते हैं कि सेना भी व्यक्तिगत पसंद या लोकतांत्रिक बहस पर चलती है, लेकिन यह गलत है। सेना कोई लोकतंत्र नहीं है। यह आदेश और आज्ञाकारिता पर चलती है।

हर आदेश, चाहे वह कितना भी छोटा हो, जूते चमकाने, राइफलें साफ करने या कोई प्रतीकात्मक अनुष्ठान करने का पवित्र माना जाता है। यदि कोई सैनिक अपने धर्म या व्यक्तिगत आस्था के आधार पर तय करे कि किस आदेश का पालन करना है और किसे अनदेखा करना है, तो सेना का ढाँचा ही कमजोर पड़ जाता है।

सोचिए अगर कोई सैनिक कहे कि वह दुश्मन पर गोली नहीं चलाएगा क्योंकि उसका धर्म हत्या की मनाही करता है, या कोई झंडा फहराने से मना कर दे क्योंकि उसका धर्म राष्ट्रीय प्रतीकों को मान्यता नहीं देता। ऐसे निर्णय सेना की एकता और युद्ध क्षमता के लिए खतरा हैं।

सेना की शपथ किसी ईश्वर के प्रति नहीं होती बल्कि भारत के संविधान, गणतंत्र और सेनापति के प्रति होती है, जो जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्दी पहनते ही धर्म, जाति और पंथ पीछे छोड़ दिए जाते हैं। इसलिए सेना गर्व से कहती है: ‘सैनिकों का धर्म उनकी यूनिट है।’

व्यक्तिगत अपवादों का खतरा

लेफ्टिनेंट कमलेसान के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने सम्मान दिखाया। उन्होंने मंदिर के बाहर सम्मानपूर्वक खड़े होकर जूते उतारे, अनुष्ठान का पालन देखा और भाईचारे को बनाए रखा। यह सही है। लेकिन अनुशासन का सवाल इरादे का नहीं बल्कि पालन का होता है। उन्हें असम्मान के लिए नहीं बल्कि आज्ञा न मानने के लिए दंडित किया गया।

जिस पल कोई सैनिक किसी आदेश की सीमाओं पर सवाल उठाने या बातचीत करने लगता है, चाहे वह बहुत विनम्रता से ही क्यों न करे तो वह उस व्यवस्था में ‘व्यक्तिगत सोच’ (subjectivity) को शामिल कर देता है, जिसे बिल्कुल स्पष्ट और पूर्ण (absolute) रहना चाहिए। और आदेशों में यह पूर्ण अनुशासन तानाशाही नहीं है।

कश्मीर में नक्सल-उन्मूलन अभियान या मणिपुर में घात लगने जैसी स्थितियों में कोई कमांडिंग ऑफिसर यह समझाने का समय नहीं पा सकता कि आदेश क्यों पालन करना चाहिए। सैनिकों को सहमति देने का विकल्प नहीं होता, उन्हें आदेश का पालन करना पड़ता है।

इसी वजह से एक प्रतीकात्मक आदेश को भी सिद्धांत का मामला माना जाता है। इसलिए आज्ञा का पालन ना करने पर सख्त दंड जरूरी होता है, ताकि अन्य सैनिकों के लिए उदाहरण बने। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसी बात को सही ठहराया। शांति के समय में किसी सैनिक की इनकार की कार्रवाई, युद्ध में किसी अन्य सैनिक की हिचकिचाहट बन सकती है। सेना ऐसे कदमों को अहंकार से नहीं बल्कि समझदारी और अनुशासन बनाए रखने के लिए दंडित करती है।

फॉक्सहॉल के बिल में विश्वास

कोई यह नहीं कह सकता कि सैनिक धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं। वास्तव में, धर्म अक्सर उन्हें लड़ने, सहने और बलिदान देने की ताकत देता है। गोरखा सैनिक खुकुरी लेकर देवी काली का स्मरण करते हैं, सिख सैनिक ‘बोले सो निहाल’ का नारा लगाते हैं और राजपूताना राइफल्स ‘राजा रामचंद्र की जय’ कहते हैं। धर्म सेना की सांस्कृतिक पहचान में गहराई से बुना हुआ है।

लेकिन एक सीमा है। सेना धर्म को ताकत के स्रोत के रूप में मानती है, विभाजन के कारण नहीं। हर रेजिमेंट अपने दूसरे धर्म के त्योहारों को भी मनाता है, हिंदू ईद मनाते हैं, मुस्लिम दिवाली मनाते हैं और ईसाई होली का आनंद लेते हैं। फिर भी कोई भी व्यक्तिगत धर्मिक विश्वास सामूहिक पहचान से ऊपर नहीं होता।

सैनिक निजी जीवन में धार्मिक हो सकता है, लेकिन वर्दी में वह एक अरब भारतीयों की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय सेना में सेवा करना स्वयं एक पवित्र कार्य है, एक प्रकार की पूजा, जहाँ देवता राष्ट्र है और प्रार्थना सेवा है।

सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई में, सही तरीके से यह सवाल उठा रही है: क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सेना के अनुशासन के अधीन होता है? यदि भारत को सुरक्षित रहना है, तो इसका उत्तर केवल ‘हाँ’ हो सकता है।

सेना व्यक्तिगत आस्था के लिए नहीं बनी है। यह सामूहिक विश्वास की रक्षा के लिए है, 1.4 अरब भारतीयों के देश की सुरक्षा में भरोसे के लिए। कोर्ट का काम किसी एक व्यक्ति के धर्म को तौलना नहीं है, बल्कि उस शक्ति की नैतिक और संचालन क्षमता को बनाए रखना है, जो व्यवस्था और अराजकता के बीच अंतिम रक्षा की रेखा है।

जब हाईकोर्ट ने कहा कि सेना में चीजें नागरिक दुनिया से अलग होती हैं, इसका मतलब धर्म की अवहेलना नहीं बल्कि सेवा की पवित्रता की रक्षा से था। उसी तरह जैसे डॉक्टर को सर्जरी करते समय भावना को अलग रखना पड़ता है  या न्यायाधीश को फैसला देते समय पूर्वाग्रह को अलग रखना पड़ता है, सैनिक को आदेश का पालन करते समय व्यक्तिगत विश्वास को अलग रखना पड़ता है।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय अनुशासन

एक उदार लोकतंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन सेना में अनुशासन सबसे पवित्र होता है। संविधान खुद इस अंतर को मान्यता देता है। अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों के कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों को सीमित कर सके, ताकि वे अपने कर्तव्यों का सही तरीके से पालन कर सकें और अनुशासन बनाए रख सकें।

क्योंकि वर्दी में मिली स्वतंत्रता पूर्ण नहीं होती, वह देश की सुरक्षा पर निर्भर करती है। लेफ्टिनेंट कमलेसान की धार्मिक चिंता सच्ची हो सकती है, लेकिन उनका इनकार उस व्यवस्था को चुनौती देता है जो व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर संस्थागत अनुशासन पर टिकी है और यही वर्दी का सबसे बड़ा विरोधाभास है। स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए, सैनिक को अपनी कुछ स्वतंत्रता त्यागनी पड़ती है।

बड़ा संदेश

यह मामला किसी ईसाई अधिकारी को सजा देने का नहीं है। यह भारत को यह याद दिलाने का है कि जब कोई सैनिक सैन्य वर्दी पहनता है, तब उसका एकमात्र धर्म कर्तव्य होता है।

रेजिमेंट का मंदिर कोई धार्मिक स्थल नहीं बल्कि परंपरा और निरंतरता का प्रतीक है, वह स्थान जहाँ पीढ़ियों से सैनिक युद्ध पर जाने से पहले प्रार्थना करते हैं, जहाँ शहीदों के नाम दर्ज हैं और जहाँ भाईचारे की भावना जीवित रहती है।

जब कोई युवा अधिकारी उस अनुष्ठान को करने से मना करता है जो उसके साथियों को इस विरासत से जोड़ता है, तो वह अनजाने में ही उस पवित्र भावना को तोड़ देता है, यह किसी देवता की नहीं, बल्कि रेजिमेंट की आत्मा की अवमानना होती है। क्योंकि रेजिमेंट केवल सैन्य इकाई नहीं होती, वह भाईचारे और बलिदान की जीवंत परंपरा होती है।

एक सैनिक का एकमात्र धर्म: राष्ट्र सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट को यह याद रखना होगा कि जहाँ पुजारी, मौलवी और पादरी अपनी आस्था में अपना सर्वोच्च धर्म पाते हैं, वहीं एक सैनिक का मंदिर उसका रणक्षेत्र होता है और उसका ईश्वर भारत माता।

पुजारी का धर्म उसे ईश्वर की पूजा सिखाता है, जबकि सैनिक का धर्म उसे उन लोगों की रक्षा करना सिखाता है जो स्वतंत्र रूप से पूजा करते हैं। अगर धर्म आज्ञा पालन में बाधा बनने लगे, तो कल वर्दी सिर्फ कपड़ा बनकर रह जाएगी।

भारत की सेनाएँ न हिंदू हैं, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई, वे उस सभ्यतागत राष्ट्र की फौलादी रीढ़ हैं जिसने कई युद्ध लड़े और जीते हैं। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में मिली शानदार जीत इसका उदाहरण है, क्योंकि उन सैनिकों ने कभी यह नहीं पूछा कि युद्ध से पहले किस ईश्वर का नाम लिया जा रहा है।

लेफ्टिनेंट कमलेसान की आस्था का सम्मान है लेकिन उनके इनकार का नहीं। क्योंकि जब धर्म और कर्तव्य आमने-सामने आते हैं, तो भारतीय सैनिक के लिए हमेशा कर्तव्य ही सर्वोपरि होता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

टेक से टेक्नोलॉजी और रोजगार से शिक्षा तक, भारत-ब्रिटेन अगले 10 वर्षों में बनेंगे एक-दूसरे की तरक्की के साथी: जानें क्या है ‘विजन 2035’

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर बुधवार (8 अक्टूबर 2025) को 2 दिवसीय भारत दौरे पर मुंबई पहुँचे। उनके साथ मंत्रियों, उद्योगपतियों समेत 125 लोगों का बड़ा समूह भी आया है। भारत- यूके के बीच रणनीतिक साझेदारी और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विजन 2025 को मजबूत किया जा रहा है। दरअसल भारत और यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्रियों ने 24 जुलाई 2025 को लंदन में ‘भारत-यूके विजन 2035’ की शुरुआत की थी।

ऐतिहासिक व्यापार समझौते ने स्टारमर की यात्रा को दिशा दी

इस वर्ष जुलाई में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्टारमर की उपस्थिति में लंदन में ऐतिहासिक भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किए गए। ब्रिटिश सरकार के अनुसार, यह समझौता ‘भारत के साथ अब तक का सबसे अच्छा समझौता’ है, और यह ब्रिटिश उत्पादों पर भारत के औसत टैरिफ को 15 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत कर देता है।

भारत को ब्रिटिश निर्यात में लगभग 60% की वृद्धि का अनुमान है, और द्विपक्षीय व्यापार में सालाना 25.5 अरब पाउंड यानी ₹3,041.69 करोड़ की वृद्धि होने की उम्मीद है। इस समझौते से ब्रिटेन के सकल घरेलू उत्पाद में प्रति वर्ष 4.8 अरब पाउंड यानी 5,950 करोड़ रुपये की वृद्धि, मजदूरी में 2.2 अरब पाउंड यानी 22,000 करोड़ रुपए से अधिक की वृद्धि होगी और पूरे ब्रिटेन में रोजगार सृजन होगा।

इस समझौते के सबसे बड़े लाभार्थियों में व्हिस्की उत्पादक शामिल हैं। टैरिफ को तुरंत 150% से घटाकर 75% कर दिया गया है। इसके अलावा, अगले दशक में यह घटकर 40% रह जाएगा, जिससे ब्रिटेन को भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी।

क्या है भारत-यूके विजन 2035

विजन 2035 का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाना और रोजगार के नए अवसर तलाशना है। दोनों देशों ने मिलकर संयुक्त आर्थिक और व्यापार समिति का गठन किया है, जो इस पर नजर रखेगी और द्विपक्षीय निवेश संधि को आगे बढ़ाएगी। भारत और ब्रिटेन के बीच जुलाई 2025 में हुए समझौते के तहत ब्रिटेन और भारत के करीब 99 फीसदी सामानों को आयात शुक्ल फ्री कर दिया है। जिसका असर भारत के 45 फीसदी निर्यात पर पड़ेगा। इसमें टेक्सटाइल, जूते, समुद्री खाद्य पदार्थ और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

दूसरी ओर भारत ब्रिटेन के 92 फीसदी वस्तुओं पर टैरिफ या तो खत्म कर देगा या न्यूनतम करेगा। इसका सबसे ज्यादा असर ब्रिटिश कार, शराब उद्योग और तकनीक पर पड़ेगा। भारत में स्कॉच व्हिस्की पर शुल्क 150 फीसदी से घटाकर 75 फीसदी कर दिया गया है और अगले दस वर्षों में इसे 40 फीसदी तक कम किया जाएगा। ब्रिटिश इलेक्ट्रिक वाहनों पर भारत टैरिफ खत्म कर देगा।

दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2023–24 में 21.34 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 1894.59 करोड़ रुपए तक पहुँच गया। वहीं वर्ष 2024–25 में भारत का ब्रिटेन के बीच निर्यात 12.6% बढ़कर 14.5 बिलियन डॉलर यानी 1,287.41 करोड़ रुपए हो गया। वहीं ब्रिटेन से आयात 2.3% बढ़कर 8.6 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है।

तकनीक और इनोवेशन के क्षेत्र में दोनों देश आपस में साझेदारी करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगे। भारतीय आईटी कंपनियों को इससे काफी फायदा होगा। उन्हें नया बाजार मिलेगा। इंजीनियरिंग, वास्तुकला और हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों में वीजा प्रक्रिया सरल बनाया जाएगा।

भारत-ब्रिटेन टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी इनिशिएटिव यानी टीएसआई की शुरुआत 2024 में कर दी गई है। एआई, सेमीकंडक्टर्स और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग भी शुरू हो गया है।

डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन के तहत भारतीय प्रोफेशनल्स और निवेशकों को ब्रिटेन में सामाजिक योगदान को देखते हुए 3 साल की छूट दी जाएगी।इससे भारतीयों को काफी फायदा होगा।

रक्षा क्षेत्र में सहयोग– भारत और ब्रिटेन 2035 तक रक्षा औद्योगिक रोडमैप तैयार कर लेंगे। इनमें जेट इंजन तकनीक, ऊर्जा और समुद्र में सुरक्षा के लिए आधुनिकतम हथियारों के निर्माण में साझेदारी और शोध अहम है।
हिन्द महासागर में ब्रिटेन के जहाज रसद के लिए भी भारत पर निर्भर रहेगा। समुद्री सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा उत्कृष्टता केन्द्र बनाया जाएगा।

जलवायु परिवर्तन पर मिलकर करेंगे काम– जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत-ब्रिटेन मिल कर काम करेंगे। जलवायु साझेदारी जो स्वच्छ ऊर्जा में तेजी लाने, बड़े पैमाने पर जलवायु वित्त जुटाने और लचीलेपन को मजबूत करने पर केंद्रित है। आपदा रोकने के लिए सिस्टम तैयार करेंगे। सौर ऊर्जा के अधिकतम इस्तेमाल पर काम करेंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए विश्वस्तर पर काम करेंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में काम– ब्रिटेन के नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों के कैंपस भारत में खुलेंगे ताकि भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा मिल सके। योग्यता को मान्यता देंगे

लोगों को रोजगार मिलेगा

भारत- ब्रिटेन के बीच व्यापारिक समझौते का फायदा एमएसएमई और कृषि क्षेत्र का भी मिलेगा। इससे भारत में रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा। खासकर महिलाओं, नौजवानों को इससे फायदा होगा। कृषि उत्पादों जैसे अन्न,खाद्य तेल, समुद्री खाद्य पदार्थ के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

भारत- ब्रिटेन के बीच सीईटीए समझौते का लक्ष्य 2030 तक भारत-ब्रिटेन द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 112 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। इस समझौते के तहत साल 2040 तक ब्रिटेन में भारत का निर्यात 60 फीसदी तक बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने मिलकर काम किया है। खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान एस्ट्राज़ेनेका–सीरम इंस्टीट्यूट के वैक्सीन के निर्माण में दोनों देश सामने आए। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) में 60,000 से अधिक भारतीय अभी भी काम कर रहे हैं। ब्रिटेन में 1.86 मिलियन भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो विज्ञान, कला, व्यापार और राजनीति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, आईएफएफ और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में सुधार का समर्थन करेंगे। ताकि दुनिया में इनकी विश्वसनीयता को बढ़ावा मिले।

सुनो कंचना यादव! जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, इसलिए आज भी डरता है बिहार: TV पर गों-गों मत करो, हाई कोर्ट ने लालू-राबड़ी राज को ‘नरक’ भी कहा था

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। एक बार फिर बिहार में नीतीश राज के विकास और लालू राज के ‘जंगलराज’ को लेकर जमीनी स्तर पर चर्चा होने लगी है। RJD के नेता और प्रवक्ता किसी भी तरह खुद को अपनी ‘जंगलराज’ की छवि से बचाने में लगे हैं। इसी बीच, RJD प्रवक्ता कंचन यादव ‘जंगलराज’ शब्द कहाँ से जन्मा है इसका सबूत आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से लाइव डिबेट में माँगा।

कहाँ से आया जंगलराज शब्द?- RJD प्रवक्ता

हाल ही में एक टीवी डिबेट में RJD प्रवक्ता कंचन यादव ने जब आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से यह सवाल किया गया कि ‘जंगलराज’ शब्द का जन्म कहाँ से हुआ?, तो अंजना ओम कश्यप ने जवाब दिया, “पटना हाई कोर्ट ने यह शब्द मौखिक रूप से इस्तेमाल किया था।”

आरजेडी प्रवक्ता कंचन यादव ने इस पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया और चुनौती दी कि अगर कोर्ट ने ऐसा कहा हो तो आदेश निकालकर दिखाएँ। आरजेडी की प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह शब्द बीजेपी और मीडिया ने मिलकर फैलाया है, कोर्ट ने कभी ‘जंगलराज’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।

जब हाईकोर्ट ने कहा था ‘बिहार में कोई सरकार नहीं, जंगलराज है’

सच्चाई यह है कि 1997 में पटना हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा था कि ‘बिहार में नाम के लायक कोई सरकार नहीं है, और यहाँ जंगलराज चल रहा है’। यह टिप्पणी जस्टिस बीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की बेंच ने की थी। टिप्पणी किसी राजनीतिक केस में नहीं, बल्कि पटना की बदहाल नगर व्यवस्था और जलजमाव को लेकर थी। जजों ने पटना को ‘Veritable Hell’ यानी ‘वास्तविक नरक’ कहा था।

यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और शहर की गंदगी पर थी, न कि किसी आपराधिक मामले पर। कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया था कि पटना भारत की सबसे गंदी राजधानी होने का दावा कर सकता है। कोर्ट ने भ्रष्ट नौकरशाहों को प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

जंगलराज 2.0: अब भी डर कायम है?

आज तेजस्वी यादव खुद को ‘नई सोच का नेता’ कहकर पेश करते हैं। लेकिन सच यही है कि लालू यादव की RJD का नाम आते ही अब भी बिहार के कई हिस्सों में लोग डरने लगते हैं। पटना से गया तक कई जगहों पर युवाओं, व्यापारियों, महिलाओं में अब भी यह चिंता बनी रहती है कि अगर राजद सत्ता में लौटी तो क्या फिर वही 90 के दशक जैसा डर लौट आएगा?

जंगलराज कोई अखबार की हेडलाइन नहीं, वह बच्चा है जो स्कूल जाने से पहले माँ की आँखों में डर देखता है। वह व्यापारी है जो दुकान की गल्ले पर बैठा हर आहट पर चौंकता है। वह बेटी है जो कॉलेज जाते वक्त हर मोड़ पर डरती है कि कहीं पीछे कोई बाइक न आ जाए।

और इसीलिए, जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, बिहार के उस दौर की बदनसीबी का नाम है… एक ऐसा नाम, जिसे आज भी सुनते ही लोग सिहर उठते हैं।

‘मैं खुद दलित, उन्हें पता नहीं है तो मैं क्या करूँ’: ऑपइंडिया से बोले ‘जूता कांड’ वाले वकील राकेश किशोर, कहा- CJI गवई के दिल में है हिंदुओं के लिए नफरत

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश बीआर गवई पर सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को कोर्ट की कार्यवाही के बीच वकील राकेश किशोर ने जूता फेंकने की कोशिश की। इस घटना के बाद से ही वामपंथियों का गैंग लगातार राकेश किशोर को दलित विरोधी साबित करने पर लगा हुआ है।

यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग आरोपित वकील को ब्राह्मणवादी सोच से ग्रसित भी बता रहें हैं लेकिन अब ऑपइंडिया से विशेष बातचीत में वकील राकेश ने खुद के दलित होने का दावा किया है। राकेश का कहना है कि वह भगवान बुद्ध के विचारों से भी प्रभावित है।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बरेली के रहने वाले राकेश इन दिनों दिल्ली के मयूर विहार एक्सटेंशन में रहते हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से खास बातचीत में कहा, “लोग मुझे नहीं जानते हैं लेकिन मैं स्वयं एक दलित हूँ। मेरा नाम राकेश किशोर है, न पांडेय है, न तिवारी है, न गुप्ता है और न जायसवाल है। इसे साबित करने के लिए मैं अपने जाति प्रमाण पत्र के साथ अन्य कागजात भी दिखाने के लिए तैयार हूँ।”

राकेश किशोर ने कहा, “मुझे दु:ख होता है कि एक वर्ग है जो हिंदुओं से कटकर अलग तैयार हो रहा है। उन्होंने कल मेरे घर का घेराव किया वो भी आताताई लोग हैं। बौद्ध धर्म का जितना मुझे ज्ञान है उतना ज्ञान मिलना किसी और को मुश्किल है।” आगे राकेश भगवान बुद्ध के बारे में बताते हुए कहते हैं कि गौतम बुद्ध ने कभी हिंदू धर्म को गाली नहीं दी, उन्हें कभी भी बुरा-भला नहीं कहा।

उन्होंने कहा, “बौद्ध धर्म हमारा ही है हमसे ही निकला है। हमारे एक बड़े पेड़ के ही तने जैसा निकला हुआ है। मैं भगवान बुद्ध की बहुत इज्जत करता हूँ मैं उन्हें बहुत पढ़ता हूँ। मैं उनकी बातों पर चलता भी हूँ।”

CJI गवई द्वारा भगवान विष्णु पर की गई टिप्पणी पर वकील राकेश किशोर कहते हैं कि उन्होंने जानबूझकर सनातन का अपमान किया है। उन्होंने कहा, “जो उनके दिल की जो भावनाएँ थीं वो सामने निकलकर आईं। उनके दिल में हिंदुओं के लिए, सनातन के लिए जो क्षोभ है, जो क्रोध है वो अपने आप से निकलकर सामने आया है।”

राकेश किशोर CJI गवाई द्वारा खुद को माफ करने किए जाने पर कहते हैं, “CJI को पता है कि ये आदमी सत्य बोलेगा और हमारी (CJI) छीछालेदर हो जाएगी।”

इस घटना के बाद बार काउंसिल ने उनका वकालत का लाइसेंस रद्द कर दिया है। ‘करियर को दाँव पर’ लगाने के सवाल पर राकेश कहते हैं कि उन्होंने अपना कोई जीवन दाँव पर नहीं लगाया जो भगवान का आदेश हुआ वही मैंने किया। उन्होंने, “मैंने खुद से कुछ नहीं किया। मुझे इस पर कोई पछतावा नहीं है। मैं उस समय कोई नशे में नहीं था पूरे होश में ही था। मैंने हिंदुओं को जगाने की कोशिश की है भगवान की कृपा होगी तो ऐसा हो जाएगा।”

कोर्ट परिसर में वकीलों के समर्थन को लेकर राकेश किशोर ने कहा कि उनके विरोध में कोर्ट परिसर में प्रदर्शन में शामिल होने के लिए केवल 5-6 ही वकील आए थे। उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि हमारे साथ कितने लोग हैं।”

वहीं, सोशल मीडिया पर मिल रहे लाखों लोगों के समर्थन पर वकील राकेश किशोर कहते हैं, “सनातन के लिए चुप न बैठें अपने बच्चों को बताएँ कि देश में जितनी खंडित मूर्तियाँ हैं उनके लिए मुहिम चलाएँ और उनका जीर्णोद्धार कराएँ। इसके लिए सरकार से पैसा न ले और अपना (सनातनियों) पैसा लगाएँ। हो सके तो आंदोलन छेड़ें, एएसआई से अनुमति लें।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं हिंसा करने के लिए नहीं कहूंगा, रोड़ जाम, तोड़फोड़, आगजनी, प्रदर्शन आदि करने के लिए नहीं कहता। अपना काम शांति से करें कानून के दायरे में रहकर करें। 70 वर्षों से आज तक नहीं किया इसके लिए हम सबको शर्मिंदा होना चाहिए। मैंने तय कर लिया है कि अब मुझे मरने से पहले हिंदू धर्म अपने सनातन के लिए कुछ करना है।”