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क्या है नव मध्यम वर्ग, कैसे मोदी राज में हुआ उदय, कैसे इनके दम से पूरा होगा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न: जानिए India की ग्रोथ स्टोरी में इनका रोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 सितंबर 2025) को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में नियो मिडिल क्लास (Neo Middle Class) या नव मध्यम वर्ग का जिक्र किया है। पीएम मोदी ने कहा, “पिछले 11 साल में देश में 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया है। गरीबी से बाहर निकलकर 25 करोड़ का समूह ‘Neo Middle Class’ के रूप में देश के अंदर एक बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।”

क्या है Neo Middle Class?

इस वर्ग को मोटे तौर पर समझें तो Neo Middle Class ऐसा सामाजिक-आर्थिक वर्ग है, जो हाल ही में गरीबी से ऊपर उठ पाया है लेकिन अभी स्थिर और सुरक्षित मध्यमवर्ग की स्थिति तक नहीं पहुँच सका है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले पीएम मोदी ने 2012 में किया था। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 3 दिसंबर 20212 को पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए उन्होंने कहा था कि पार्टी का संकल्प पत्र इस नए वर्ग को ध्यान में रखकर ही तैयार किया गया है।

इसके बाद अगस्त 2024 में उद्योग जगत का कार्यक्रम हो या आज का संबोधन, पीएम मोदी ने लगातार इस शब्द का इस्तेमाल किया है। जो दिखाता है कि यह नया वर्ग उनके विकसित भारत के सपने के लिए कितना मायने रखता है।

नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की रिपोर्ट बताती है कि नियो मिडिल क्लास में वे लोग शामिल हैं जो गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर कमाते हैं लेकिन स्थापित मिडिल क्लास जैसी आर्थिक सुरक्षा से अभी तक वंचित हैं।

1990 में भारत में आर्थिक सुधार हुए और उसके बाद से इस क्लास में विस्तार हुआ है। मोदी सरकार आने के बाद इस वर्ग में लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। नीति आयोग के डिसक्सन पेपर ‘मल्‍टीडायमेंशनल पावर्टी इन इंडिया सिन्‍स 2005-06’ के मुताबिक, 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग विविध प्रकार की (मल्‍टीडायमेंशनल) गरीबी से बाहर निकले हैं।

भारत का लक्ष्य 2030 से बहुआयामी गरीबी को आधा करना है और आने वाले दिनों में इस लक्ष्य के चलते इस क्लास के और बढ़ने की पूरी संभावना है।

मोदी सरकार में गरीबी कम करने को लेकर चली योजनाओं पर PIB ने लिखा है, “पोषण अभियान और एनीमिया मुक्त भारत जैसी उल्लेखनीय पहलों ने स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिससे वंचित रहने में काफी कमी आई है।”

इसमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त खाद्यान्न वितरण, उज्ज्वला योजना के माध्यम से स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन वितरण, सौभाग्य के माध्यम से बिजली कवरेज में सुधार और स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे अभियानों का भी जिक्र किया गया है।

ग्रोथ स्टोरी में कितना अहम है Neo Middle Class?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक यानी आजादी के 100वें वर्ष में भारत को विकसित भारत बनाने का लक्ष्य रखा है। उनका मानना है कि यह Neo Middle Class इस सपने को पूरा करने में सबसे अहम भूमिका निभा सकता है।

ऐसा सोचना सही भी है, आसान भाषा में समझें तो, जब कोई परिवार गरीबी से निकलता है, उसकी कमाई बढ़ती है तो उसकी खपत की क्षमता भी बढ़ जाती है। यह खपत की बढ़ी हुई क्षमता बाजार को गति देने का काम करती है और नए रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

साथ ही, इस वर्ग के बढ़ने से सामाजिक स्थिरता भी बढ़ती है। गरीबी से बाहर निकले लोगों में नया आत्मविश्वास आता है और यही लोग फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करते हैं। इनकी आने वाली पीढ़ियों की भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं तक पहुँच बनती है। जिससे इस वर्ग में नया आत्मविश्वास पैदा होता है।

मोदी सरकार की योजनाएँ जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत ने गरीबों को ऊपर उठाकर इस वर्ग तक पहुँचाने में मदद की है। आने वाले समय में यही वर्ग भारत को दुनिया के बड़े देशों से मुकाबले के लिए खड़ा करेगा।

विकसित देशों में मजबूत मिडिल क्लास ही रीढ़ बनता है। भारत में भी यह नियो मिडिल क्लास नई तकनीक को अपना रहा है, UPI का इस्तेमाल कर रहा है और स्टार्टअप इंडिया व मुद्रा लोन जैसी योजनाओं से कारोबार शुरू कर भारत को आर्थिक ताकत दे रहा है। यह वर्ग अगर आगे बढ़ता रहा तो भारत ना केवल घरेलू बाजार में बल्कि पूरी दुनिया में एक महत्वपूर्ण आर्थिक ताकत बन जाएगा।

‘BJP ने EVM हैक करने की बात स्वीकारी’: कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम ने रेखा गुप्ता का अधूरा Video वायरल कर फैलाया झूठ, जानें क्या है हकीकत

कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का अधूरा वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बीजेपी ने खुलेआम EVM हैक करने की बात को स्वीकारा है। ये अधूरा वीडियो सीएम गुप्ता का NDTV को दिए गए इंटरव्यू से लिया गया है।

इस वीडियो को एडिट कर सिर्फ सीएम गुप्ता के जवाब का क्लिप वायरल किया जाता है। इस वीडियो क्लिप को इस तरह से पेश किया जाता है कि सीएम गुप्ता ने EVM में हुए हेरफेर के आरोपों को स्वीकार कर लिया है।

अधूरे वीडियो से लिया गया स्क्रीनशॉट

कॉन्ग्रेस के इस अधूरे वीडियो में इंटरव्यू कहती हैं, “ABVP और BJP केवल इसीलिए जीत रहे हैं क्योंकि वे EVM हैक कर रहे हैं और चुनाव आयोग उनका समर्थन कर रहा है।” इस पर रेखा गुप्ता जवाब देती हैं, “हाँ, जब वे 70 साल से ऐसा कर रहे थे तो किसी को कोई समस्या नहीं थी लेकिन जब हमने ऐसा किया तो अचानक यह गलत हो गया। यह सही है।”

इसके बाद वीडियो के इस कटे हुए भाग को खूब शेयर किया गया, जिसमें कैप्शन दिया गया कि BJP ने EVM हैक करने की बात स्वीकार कर ली है।

हालाँकि, ऑपइंडिया ने असली वीडियो खोज निकाला है और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम के अधूरे वीडियो का फैक्ट-चेक कर दिया। पूरे वीडियो में इंटरव्यू ले रही एंकर सवाल पूछती हैं कि राहुल गाँधी ने दावा किया है कि BJP सिर्फ EVM हैक करने के बाद ही जीतती है।

इस सवाल क जवाब देते हुए रेखा गुप्ता ने कहा, “जब वो जीतते हैं तो ये जनता का जनादेश होता है। जब हम जीतते हैं तो ये अचानक EVM हैकिंग हो जाता है। कोई मुझे बताए कि ये फॉर्मूला किस किताब में लिखा है? राहुल गाँधी कहाँ से पढ़े हैं?” रेखा गुप्ता ने राहुल गाँधी पर गलत धारणाएँ बनाकर आम नागरिकों को गुमराह करने का आरोप लगाया।

इंटरव्यू में आगे बढ़ते हुए जब उनसे कहा गया कि GenZ भी BJP के खिलाफ उठ सकती है, इस पर रेखा गुप्ता ने जवाब दिया, “युवा और GenZ पहले ही अपनी बात कह चुके हैं। विश्वविद्यालयों में ABVP की जीत दर्शाती है कि हमें कितना समर्थन प्राप्त है।” उन्होंने अंत में कहा, “जनता का आशीर्वाद प्रधानमंत्री मोदी के साथ है और हमेशा रहेगा।”

अधूरे वीडियो और पूरे वीडियो के बीच अंतर से साफ समझ आता है कि कॉन्ग्रेस किस तरह भ्रामक कहानी फैलाने के लिए इस तरह की घिनौनी हरकत पर उतर सकती है और EVM हैकिंग से ‘वोट चोरी’ के अपने आरोपों को बढ़ावा दे सकती है।

वही सामान खरीदें जिसमें देश का पसीना हो: राष्ट्र के नाम संबोधन में बोले PM मोदी, कहा- 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 सितंबर 2025) को राष्ट्र के नाम अपना संबोधन दिया। इस दौरान उन्होंने कल से शुरू होने वाले नई पीढ़ी के GST सुधारों को लेकर चर्चा की और इसे बचत उत्सव का नाम दिया है।

‘GST बचत उत्सव होगा शुरू’

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, “कल नवरात्रि के प्रथम दिवस 22 सिंतबर को सूर्योदय के साथ ही अगली पीढ़ी की GST सुधार लागू हो जाएँगे। कल से देश में ‘GST बचत उत्सव’ शुरू होने जा रहा है।”

उन्होंने कहा, “हमारे देश के गरीब, मध्यमवर्गीय लोग, युवा, किसान, महिलाएँ, दुकानदार, व्यापारी और उद्यमी सभी को बचत उत्सव का बहुत फायदा होगा। त्योहारों के इस मौसम में सबका मुँह मीठा होगा, देश के हर परिवार की खुशियाँ बढ़ेंगी। मैं देश के कोटि-कोटि लोगों को नई पीढ़ी की GST सुधार और इस बचत उत्सव की बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ।”

पीएम मोदी ने कहा, “ये सुधार भारत की ग्रोथ स्टोरी को गति देंगे, कारोबार को और आसान बनाएँगे, निवेश को और आकर्षक बनाएँगे और हर राज्य को विकास की दौड़ में बराबरी का साथी बनाएँगे।”

‘देश दर्जनों टैक्स के जाल से मुक्त हुआ’

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, “जब 2017 में भारत ने GST सुधार की तरफ कदम बढ़ाया था तो एक पुराना इतिहास बदलने और नया इतिहास रचने की शुरुआत हुई थी। दशकों तक हमारे देश की जनता, देश के व्यापारी अलग-अलग टैक्स के जाल में उलझे हुए थे। देश में दर्जनों टैक्स थे।”

उन्होंने कहा, “जब आपने हमे 2014 में अवसर दिया तो हमने जनहित में GST को अपनी प्राथमिकता बनाया, हमने हर शेयरधारक से चर्चा की, हर राज्यों की हर शंका का निवारण किया। हर सवाल का समाधान खोजा, सभी राज्यों को साथ लेकर आजाद भारत का इतना बड़ा टैक्स रिफॉर्म संभव हो पाया। यह केंद्र और राज्यों के प्रयासों का नतीजा था कि देश दर्जनों टैक्सों के जाल से मुक्त हुआ और पूरे देश के लिए एक जैसी व्यवस्था बनी। वन नेशन, वन टैक्स का सपना साकार हुआ।”

11 साल में देश में 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया: PM मोदी

पीएम मोदी ने कहा, “GST के नए स्वरूप में मुख्य रूप से 5% और 18% के टैक्स स्लैब बनेंगे। रोजमर्रा और खाने-पीने की चीजें और सस्ती हो जाएँगी। जिन सामानों पर पहले 12% टैक्स लगता था उनमें से 99% चीजें अब 5% टैक्स के दायरे में आ गई हैं।”

उन्होंने कहा, “पिछले 11 साल में देश में 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया है। गरीबी से बाहर निकलकर 25 करोड़ का एक बहुत बड़ा समूह ‘Neo Middle Class’ के रूप में देश के अंदर एक बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। इस ‘Neo Middle Class’ के अपने सपने हैं।”

साथ ही, उन्होंने कहा, “इस साल सरकार ने 12 लाख रुपए तक की इनकम को टैक्स फ्री करके उपहार दिया। जब इनकम टैक्स में ऐसी राहत हो जाए, तो मध्यम वर्ग के जीवन में बदलाव आता है और सरलता-सुविधा हो जाती है।”

गरीबों और ‘Neo Middle Class’ और ‘Middle Class’ को Double Bonanza: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने कहा कि अब गरीबों और ‘Neo Middle Class’ और ‘Middle Class’ को Double Bonanza मिल रहा है। उन्होंने कहा, “GST कम होने से अब देश के नागरिकों के लिए अपने सपने पूरे करना और आसान हो गया है। घर बनाना, टीवी-फ्रिज खरीदने की बात हो, स्कूटर-बाइकर-कार खरीदना हो, इन सब पर अब कम खर्च करना होगा।”

पीएम मोदी ने कहा, “हम नागरिक देवो भव: के जिस मंत्र के साथ आगे बढ़ रहे हैं। नए पीढ़ी के GST सुधारों में इसकी साफ झलक दिखाई पड़ती है। अगर हम आयकर में छूट और GST में छूट को जोड़ दे तो एक साल में जो निर्णय हुए हैं उससे देश के लोगों को 2.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक की बचत होगी।”

वही खरीदें जिसमें देश का पसीना हो: PM मोदी

इस दौरान पीएम मोदी ने ‘Made In India’ का आग्रह किया है। उन्होंने कहा, ”हम वो सामान खरीदें जो मेड इन इंडिया हो,जिसमें हमारे देश के नौजवानों की मेहनत लगी हो और हमारे देश के बेटे बेटियों का पसीना हो।”

जस्टिस लोया की मौत पर फैलाए जा रहे झूठ सुन पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने तोड़ी चुप्पी, जजों को घेरने वालों को दिया जवाब: पहले उमर खालिद केस में कपिल सिब्बल को कर चुके हैं एक्सपोज

पूर्व मुख्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने जज बीएच लोया की मौत पर उठ रहे सवालों को लेकर पहली बार खुलकर बात की। शनिवार (20 सितंबर 2025) को लल्लनटॉप को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि लोग किसी फैसले से असहमति रख सकते हैं। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन जजों की नीयत पर सवाल उठाना गलत है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब बहस सबूतों से हटकर सीधे जजों पर आरोप लगाने लगे, तो ये गलत है। उन्होंने कहा कि ये व्यवहार लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

जज लोया की मौत की रात को याद करते हुए दिया जवाब

अपने एक साथी जज की शादी में शामिल होने के लिए जज लोया नवंबर 2014 में नागपुर गए थे। वे नागपुर के सरकारी गेस्ट हाउस ‘रवि भवन’ में कुछ अन्य जजों के साथ ठहरे हुए थे।

कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया कि तीन जज एक ही कमरे में कैसे रह सकते हैं? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने जवाब दिया,  “हमने सुनवाई के दौरान भी कोर्ट में कहा था कि आपको (वकील को संबोधित करते हुए) न्यायपालिका, देश और समाज के बारे में जानकारी नहीं है। जब हम किसी शादी में जाते हैं, तो कई बार 10-15 या 20-25 जज एक साथ रहते हैं। यह सामान्य बात है।”

उसी रात, करीब सुबह 4 बजे, जस्टिस लोया ने अपने दो साथी जजों को उठाया और कहा कि वे ठीक महसूस नहीं कर रहे हैं। उन दो जजों ने तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला किया। जब सवाल पूछा गया कि उन्हें ऑटो में क्यों ले जाया गया, गाड़ी क्यों नहीं ली गई?

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “शायद उन्हें नहीं पता था कि गाड़ी कहाँ है। हर जज के पास अपनी गाड़ी और ड्राइवर नहीं होता। जब मैं भी सुप्रीम कोर्ट का जज था, तब भी मेरा ड्राइवर मेरे घर में नहीं रहता था। खासकर जिला न्यायपालिका में तो यह और आम बात है।”

जब जस्टिस लोया को पहली बार अस्पताल ले जाया गया, तो वह एक पास के ऑर्थोपेडिक अस्पताल था। वहाँ डॉक्टरों ने जाँच कर बताया कि यह हृदय से जुड़ी (कार्डियक) समस्या है, इसलिए उन्हें कार्डियक अस्पताल ले जाना होगा। इसके बाद दोनों जज उन्हें तुरंत कार्डियक अस्पताल ले गए। लेकिन तब तक उन्हें भारी हार्ट अटैक आ चुका था और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।

इस पर भी सवाल उठा कि अगर हार्ट की समस्या थी, तो सीधे कार्डियक अस्पताल क्यों नहीं ले गए? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “जब हमारे घर में माता-पिता को कोई समस्या होती है, तो हम तुरंत जो सूझता है, वही करते हैं। उसी तरह इन जजों ने भी जो उन्हें तुरंत समझ आया, वही किया। क्या हम कह सकते हैं कि ये दो जज, जो लोया जी के साथ थे, उन्हें मारना चाहते थे? ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।”

अंत में चंद्रचूड़ ने यह भी कहा,  “मैं खुद भी CJI रहते हुए ड्राइवर या निजी गाड़ी लेकर नहीं चलता था। हर परिस्थिति में फैसले पर संदेह करना सही नहीं है। हाल ही में एक और जज की ट्रांजिट के दौरान हार्ट अटैक से मौत हुई, हालाँकि उन्हें तुरंत इलाज मिला। इससे साफ होता है कि मेडिकल इमरजेंसी में कुछ भी हो सकता है, भले ही तुरंत मदद मिले।”

जजों की मंशा पर सवाल उठाना गलत- पूर्व CJI

डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी जज के फैसले पर असहमति जताना बिल्कुल ठीक है, लेकिन जज की नीयत पर शक करना या उन पर गलत इरादे का आरोप लगाना खतरनाक होता है। उन्होंने लोहिया केस का उदाहरण देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को तथ्यों के आधार पर पूरी तरह से जाँचा और सभी सवालों के जवाब दिए। लोग फैसले से सहमत हों, यह उनका अधिकार है, लेकिन जजों की व्यक्तिगत नीयत पर सवाल उठाना सही नहीं है।

चंद्रचूड़ ने यह भी चेतावनी दी कि अगर इस मामले में कोई नई जाँच होती है, तो उससे विवाद खत्म नहीं होगा। अगर जाँच में कुछ नहीं निकलता, तो लोग कहेंगे कि साजिश छिपाई जा रही है और अगर कुछ निकलता है, तो लोग कहेंगे कि पहले छुपाया गया था। उन्होंने कहा कि बार-बार जाँच की माँग करना, सिर्फ एक राजनीतिक कहानी को जिंदा रखने का तरीका बन गया है, जिससे लोगों का संस्थाओं पर भरोसा टूटता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब न्यायपालिका को बार-बार राजनीतिक लड़ाइयों में घसीटा जाता है, तो यह एक खतरनाक चलन बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि फैसलों की आलोचना हो सकती है, लेकिन उस आलोचना को इस हद तक ले जाना कि जजों की ईमानदारी पर सवाल उठाया जाए, यह समाज के न्याय तंत्र में भरोसे को नुकसान पहुँचाता है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की, “लोगों को कोर्ट की जवाबदेही तय करने का अधिकार है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया को राजनीतिक लड़ाई का मंच नहीं बनाना चाहिए। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जजों को व्यक्तिगत रूप से बदनाम करना सही नहीं। जनता और वकीलों को न्यायपालिका की विश्वसनीयता की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अगर लोगों का भरोसा टूटता है, तो कानून का पूरा ढाँचा खतरे में पड़ जाता है।”

उमर खालिद मामले पर डीवाई चंद्रचूड़

CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने एक इंटरव्यू में उमर खालिद की जमानत पर बड़ा बयान दिया। जब उनसे यह पूछा गया कि उमर खालिद को पाँच साल बाद भी जमानत क्यों नहीं मिली, तो उन्होंने कहा कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की मानसिकता से है।

उन्होंने कहा, “आज हमारे सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनके मामले सिर्फ उन्हीं जजों के सामने सुने जाएँ, जो उनके लिए अनुकूल हों। अगर ऐसा होने लगा तो पूरी न्याय व्यवस्था ढह जाएगी।” उन्होंने इस प्रवृत्ति की तुलना उस सोच से की जिसमें लोग ‘प्रो-इंडस्ट्री’ या ‘प्रो-लेबर’ जजों को चुनने की कोशिश करते हैं, जो काफी खतरनाक है।

फरवरी 2025 में बरखा दत्त को दिए गए एक इंटरव्यू में चंद्रचूड़ ने उमर खालिद की जमानत याचिका और उसमें वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की भूमिका पर भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि केस की मेरिट पर तो कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन बार-बार की गई तारीखों की माँग (adjournments) जमानत में देरी की बड़ी वजह बनी।

कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, खालिद की लीगल टीम (जिसका नेतृत्व सिब्बल कर रहे थे) ने कम से कम सात बार तारीख माँगी और आखिरकार फरवरी 2024 में जमानत याचिका वापस ले ली। तब उनकी ओर से कहा गया था, “जमानत याचिका वापस ले रहे हैं। परिस्थितियाँ बदल गई हैं, अब ट्रायल कोर्ट में कोशिश करेंगे।”

पूर्व CJI ने यह भी कहा कि मीडिया अक्सर इन पहलुओं को नजरअंदाज कर देता है और लोगों को लगता है कि गलती कोर्ट की है, जबकि हकीकत में बार-बार की देरी से बचाव पक्ष (defence) ही प्रक्रिया को कमजोर करता है।

जो उमर खालिद दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का ‘मास्टरमाइंड’, उसे ‘राजनीतिक कैदी’ बता माहौल बना रहा The Guardian: सुप्रीम कोर्ट की कही बातों पर भी नहीं किया गौर

विदेशी मीडिया जब भी भारत की खबर लिखते हैं तो लगता है कि मानो यहाँ लोकतंत्र बचा ही नहीं है। भारत के विरोध में रहने वाले लोगों में पश्चिमी मीडिया का एक बड़ा वर्ग अपने ‘नायक’ खोजने की कोशिश करता है। ताजा उदाहरण द गार्जियन का है, जिसने दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के ‘मास्टमाइंड’ उमर खालिद को ‘नायक’ के तौर पर दिखाया है।

वही उमर खालिद, जो JNU के दिनों से ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ गैंग का चमकता सितारा रहा है। वही उमर खालिद, जो साल 2020 में दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड है और UAPA में जेल में बंद है। लेकिन द गार्जियन के आर्टिकल से लगता है कि उमर खालिद कोई अपराधी नहीं बल्कि ‘राजनीतिक कैदी’ है।

ये द गार्जियन भारत में खुलकर उन लोगों का समर्थन करता है, जो देशद्रोह के मामले में जेल में बंद हैं।

पाँच साल से जेल में क्यों है ?

द गार्जियन का रोना यह है कि उमर खालिद ‘बिना दोषी’ करार जेल में बंद है, जिसकी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ सरकार है, जो विरोध की आवाजों को कुचल रही है। तो यहाँ गार्जियन को यह जानने की जरूरत है कि नरेंद्र मोदी जेल में नहीं डालते हैं बल्कि कोर्ट भेजता है।

बात रही ‘बिना दोषी’ करार जेल में होने की तो उमर खालिद की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि खालिद के वकील ही जानबूझकर देरी कर रहे हैं। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023 से 2024 के बीच कुल 14 तारीखों में से 7 बार सुनवाई खालिद के वकीलों ने ही टलवाई

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में भी साफ लिखा है कि कैसे दंगों से पहले बैठकों की योजना बनी, कौन-कौन शामिल हुआ और किसने कब-कब उकसाने वाले भाषण दिए। इसके आधार पर उमर खालिद और उनके सहयोगी जेल में बंद हैं।

गार्जियन ने लिखा- ‘खालिद तो दिल्ली में थे ही नहीं।’ लेकिन सच ये है कि उसकी साजिश सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थी। महाराष्ट्र से लेकर शाहीन बाग तक, सब जगह उनका नेटवर्क काम कर रहा था। पुलिस की रिपोर्ट में भी सामने आया कि महाराष्ट्र के अमरावली में 17 फरवरी 2020 को भड़काऊ भाषण दिया था, जिसे पुलिस ने दंगा भड़ाकने की योजना के रूप में मामले की जाँच में इस्तेमाल किया था।

‘राजनीतिक कैदी’ है उमर खालिद?

उमर खालिद को द गार्जियन लिखता है कि वो ‘राजनीतिक कैदी’ है। लेकिन यह शब्द असल में उन देशों के लिए इस्तेमाल होता है, जहाँ तानाशाही है और लोग सिर्फ सरकार की आलोचना करने पर जेल में डाल दिए जाते हैं।

अगर सचमुच ऐसा होता तो देश का पूरा विपक्ष आज सलाखों के पीछे होता और मीडिया, जो सरकार की नीतियों पर सवाल खड़ा करता है, वो भी अपना काम निष्पक्ष रूप से नहीं कर पाता। तो क्या आज सारा विपक्ष जेल में है या सारे पत्रकार जेल में है? तो फिर उमर खालिद को केस अलग क्यों है?

क्योंकि यह केस सिर्फ सरकार की आलोचना का नहीं है। यह मामला देश में साजिश रचने और दंगा भड़काने को लेकर है। ऐसे में द गार्जियन उमर खालिद जैसे लोग को राजनीतिक कैदी बताकर आतंकवादियों का गुणगान करने जैसा है।

अमनेस्टी इंटरनेशनल का उमर खालिद को सपोर्ट

द गार्जियन ने अमनेस्टी इंटरनेशनल और कुछ अन्य विदेशी संगठन के बयान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि ‘उमर खालिद को तुरंत रिहा करो।’

ये वही अमनेस्टी है, जिसके भारत में फंडिंग पर ही सवाल उठे और भारत सरकार ने दुकान बंद कर दी क्योंकि इसका इस्तेमाल भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने में किया जा रहा था। तो साबित तो यही हो जाता है कि एक भारत-विरोधी संगठन तो एक देशद्रोही को नायक बनाएगा ही।

मोदी सरकार मुस्लिम-बुद्धिजीवी की आवाज दबा रहे हैं?

द गार्जियन ने उमर खालिद की पार्टनर बानोज्योत्सना लाहिरी के बयान भी छापे, जिसमें वो कह रही हैं कि मोदी सरकार मुस्लिम, बुद्धिजीवी और निर्भीक आवाजों से नफरत करती है।

यहाँ मोदी सरकार को मुस्लिम-विरोधी दर्शाया गया है फिर खुद ढींगरा फोड़ने आ जाते हैं कि सरकार मुस्लिम-विरोधी है। असल में सच यह है कि सरकार का मुद्दा न तो मुस्लिम है, न बुद्धिजीवी बल्कि असल परेशानी देश-विरोधी गतिविधियों से है।

यहाँ द गार्जियन देश तोड़ने की बात करने वाले उमर खालिद को बुद्धिजीवी बता रही है। और यह भी चाहती है कि सरकार उस पर कोई कार्रवाई भी न करे।

यहाँ उसकी पार्टनर लाहिरी ने बताया, जिसे द गार्जियन ने बड़े भावुक अंदाज में लिखा कि उमर खालिद हफ्ते में 30 मिनट परिवार से वीडियो कॉल करते हैं और वो जेल में अब तक 300 से ज्यादा किताबें पढ़ चुका है।

अब सवाल यह है कि आतंकियों को कहीं भी ये सारी सुविधाएँ दी जाती हैं। अगर भारत में लोकतंत्र न होता तो क्या खालिद जेल में किताबें पढ़ सकता और क्या हर हफ्तें अपने परिवार से वीडियो कॉल पर बात हो पाती। असलियत यह है कि भारत की जेलें अब भी उसके ‘मानवाधिकार’ का सम्मान कर रही हैं, बावजूद इसके कि उस पर देश को दंगों में झोंकने का आरोप है।

विदेशी मीडिया का दोगलापन

जब भी भारत में किसी मुस्लिम कानून के शिकंजे में आता है तो विदेशी मीडिया तुरंत एक्टिव हो जाता है और अपराधी को नायक के रूप में पेश करना चालू कर देता है।

यही वजह है कि द गार्जियन भी उमर खालिद की दंगे भड़काने की साजिश को शांतिप्रिय प्रदर्शन बता रही है और भारत में उसके खिलाफ मोदी सरकार का अत्याचार के रूप में पेश कर रही है।

द गार्जियन यह नहीं लिखता कि खालिद के भाषणों और गतिविधियों से पूरे देश में CAA-NRC विरोध के नाम पर हिंसा फैली थी। उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बंगाल में पुलिसकर्मियों तक पर हमला हुआ। लेकिन गार्जियन की कलम से ये सब गायब हो जाता है। गार्जियन कभी यह नहीं लिखता कि दंगों में मारे गए ज्यादातर निर्दोष हिंदू थे और खालिद जैसे चेहरे इस षड्यंत्र को हवा दे रहे थे।

सच यह है कि द गार्जियन और एमनेस्टी जैसे विदेशी संगठन भारत की छवि खराब करने का एजेंडा चला रहे हैं। इन्हें लोकतंत्र, मानवाधिकार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं है। इनका असली मकसद मोदी सरकार को बदनाम करना है और भारत को दमनकारी राष्ट्र के रूप में दिखाना है।

भारत की छवि खराब करने वाली Homebound को ऑस्कर में क्यों भेजा? फिल्म के चयन पर उठ रहे सवाल, जानिए कौन लेता है इस संबंध में फैसला

ऑस्कर अवार्ड्स 2026 में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए डायरेक्टर नीरज घायवान की ‘होमबाउंड’ का नाम भारत से जाने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

दरअसल फिल्म में ये दिखाया गया है कि हमारे देश में दलितों-मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता है और उन्हें आसानी से कुछ नहीं मिलता। ऐसे में लोगों का यही पूछना है कि ऐसी फिल्म जो देश की छवि को धूमिल करे उसे नॉमिनेशन के लिए क्यों भेजा जा रहा है।

कुछ लोग इसे लेकर सरकार पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं लेकिन हकीकत तो ये है भारत से ऑस्कर अवार्ड्स में फिल्मों के नाम भेजने का काम फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया करती है, सरकार नहीं।

ऑस्कर के लिए FFI करता है चयन

फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI), जो कि एक स्वतंत्र संस्था है, हर साल यह जिम्मेदारी निभाती है। यह संस्था देशभर के 15-20 फिल्म समीक्षकों और जानकारों का पैनल बनाती है। यही पैनल तय करता है कि किस भारतीय फिल्म को उस साल ऑस्कर में आधिकारिक एंट्री दी जाएगी। इस प्रक्रिया में सरकार का कोई दखल नहीं होता। यह चयन संस्था स्वतंत्र रूप से करती है।

इस साल भी, पैनल ने कई भाषाओं और विधाओं की फिल्मों को देखने के बाद ‘होमबाउंड’ को चुना। उनके अनुसार उनका मकसद भारत की सबसे अच्छी सिनेमाई प्रस्तुति आगे बढ़ाना था। मगर, लोग इस फिल्म के प्लॉट पर नाराज हो गए। एक्स पर सक्रिय हैंडल्स का कहना है कि फिल्म से ऐसा लगता है कि भारत नागरिक अधिकारों का दमन करने वाला देश है।

चयन की प्रक्रिया कैसे होती है?

  1. फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) हर साल एक पैनल बनाता है।
  2. इस पैनल में देशभर के फिल्म समीक्षक, लेखक, तकनीकी विशेषज्ञ और फिल्म उद्योग से जुड़े अनुभवी लोग शामिल होते हैं।
  3. अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों की स्क्रीनिंग की जाती है।
  4. फिर बहुमत से तय होता है कि कौन सी फिल्म बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए भारत की ओर से जाएगी।
  5. यह फिल्म फिर आधिकारिक तौर पर अमेरिका की एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज (AMPAS) को भेजी जाती है।

जाति और समुदाय पर आधारित कहानी

होमबाउंड’ की कहानी में दो ग्रामीण लड़के हैं, जिनके किरदार ईशान खट्टर और विशाल जेठवा ने निभाए हैं। सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं ताकि समाज में सम्मान पा सकें, लेकिन रास्ते में उन्हें दलित और मुस्लिम होने की वजह से भेद भाव का सामना करना पड़ता है।

फिल्म यह दिखाती है कि जाति और धर्म के आधार पर मिलने वाले भेदभाव आज भी युवाओं के सपनों को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिल्म में जाह्नवी कपूर उनकी दोस्त की भूमिका में नजर आएंगी, जो उनकी संघर्ष यात्रा में साथ देती है।

कहानी को लेखक बशारत पीर की 2020 में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित सच्ची घटना से प्रेरणा मिली है। उस लेख का शीर्षक था “A Friendship, a Pandemic and a Death Beside the Highway”।

भारत और ऑस्कर का रिश्ता

अब तक केवल तीन भारतीय फिल्मों को ऑस्कर में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए नामांकन मिला है। ये फिल्में हैं – मदर इंडिया (1957), सलाम बॉम्बे (1988) और लगान (2001)। पिछले साल यानि 2025 में लापता लेडिज भी ऑस्कर में सिलेक्शन हुआ था। हालांकि, कोई भी फिल्म यह अवॉर्ड जीत नहीं पाई।

भारत के हिस्से अब तक जो ऑस्कर आए हैं, वे सभी ओपन कैटेगरी में मिले हैं। हाल ही में 2023 में एस एस राजामौली की फिल्म ‘RRR’ ने दो ऑस्कर जीतकर भारत का नाम रोशन किया था।

तिरुपति मंदिर की दानपेटी से ₹100 करोड़ की चोरी, जगन मोहन रेड्डी के घर भी पहुँचा पैसा: TTD सदस्य भानु रेड्डी ने CCTV फुटेज जारी कर किया दावा

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम यानी टीटीडी बोर्ड के सदस्य भानु प्रकाश रेड्डी ने पूर्व जगन मोहन रेड्डी सरकार पर बालाजी मंदिर से 100 करोड़ से ज्यादा के दान की लूट के आरोप लगाए हैं और सबूत के तौर पर सीसीटीवी फुटेज जारी किया है। उन्होंने दावा किया कि सीएम जगन मोहन रेड्डी के आवास तक ये लूट का पैसा पहुँचा।

भानु प्रकाश रेड्डी का कहना है कि वाईएस जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान तिरुपति मंदिर के परकामनी (दानपेटी) से 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की चोरी हुई थी। उनका दावा है कि मंदिर के कर्मचारी रविकुमार ने दानपेटी से नकदी चुराई। पिछली सरकार के अधिकारी इस चोरी में हिस्सा लेते थे। लेकिन मामला सामने आने के बाद अब रविकुमार की जान को वाईएसआरसीपी से खतरा है।

रेड्डी ने चोरी का सीसीटीवी फुटेज जारी किया, जिसे राज्य में मंत्री और टीडीपी नेता नारा लोकेश ने रिट्वीट किया है। टीडीपी एनडीए का घटक दल है। सीसीटीवी फुटेज और दूसरे सबूत से पता चला है कि रविकुमार अमेरिकी डॉलर छिपा रहा था। टीटीडी के सतर्कता और सुरक्षा अधिकारी सतीश कुमार ने 29 अप्रैल 2023 की शाम छिपाए गए नोट के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। पुलिस में शिकायत दर्ज किए जाने के बावजूद, मामले को लोक अदालत में सुलझा लिया गया।

जाँच के दौरान आरोपित रवि कुमार की लेन-देन की जानकारी सामने आई है। उसमें कुमार दंपति की तिरुपति और चेन्नई में जमीन, घर और दूसरी अचल संपत्तियाँ थी। इन संपत्तियों के मालिकाना हक होने के बावजूद टीटीडी को दान कर दी गई थी। दान किए गए संपत्तियों की कीमत करोड़ों रुपए है।

रेड्डी ने ये दावा किया कि वाईएसआरसीपी शासन के दौरान जब श्रद्धालु दानपेटी में अपना चढ़ावा डालते थे। दरअसल उन्हें लूटा जाता था।

उच्च न्यायालय ने मामला 19 सितंबर 2025 को सीआईडी ​​को सौंप दिया है और एक महीने के भीतर जाँच करने और सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने सीआईडी से बोर्ड के फैसलों और संबंधित दस्तावेजों को भी जब्त करने का निर्देश दिया है।

यह मामला पहले लोक अदालत के माध्यम से सुलझाया गया था। उन्होंने दावा किया कि इसमें वाईएसआरसीपी के कई नेता और शीर्ष अधिकारी शामिल थे। रेड्डी के मुताबिक, एक आला पुलिस अधिकारी तिरुपति मंदिर की संपत्ति लूटने में मदद कर रहा था। अधिकारियों और नेताओं ने लूटे गए धन को आपस में बाँटा। उस वक्त भुमना करुणाकर रेड्डी टीटीडी के अध्यक्ष थे।

रेड्डी ने आरोप लगाया कि लूटी गई धनराशि का एक हिस्सा जगन रेड्डी के आवास, ताडेपल्ली पैलेस में भेज दिया गया और घोटाले के बाद महत्वपूर्ण सबूत नष्ट कर दिए गए।

रेड्डी ने आरोप लगाया कि लूट के पैसों का करोड़ों रुपए रियल एस्टेट में निवेश किए गए और कथित तौर पर अवैध धन जगन रेड्डी के घर, ताडेपल्ली पैलेस में पहुँचाया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि 100 करोड़ रुपए की यह चोरी 2019 से 2024 तक चले वाईएसआरसीपी शासन के तहत तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के इतिहास में ‘सबसे बड़ी लूट’ थी। ये मामला अप्रैल 2023 का है।

तिरुपति लड्डू प्रसादम में कथित जानवर की चर्बी मिलाने का मामला अभी सुलझा भी नहीं है। उससे पहले मंदिर में चढ़ावे की लूट का ये मामला सामने आ गया है।

हाँ भाई मामला तो गड़बड़ है… शेखी बघारते-बघारते योगेंद्र यादव ने ‘वोट चोरी’ पर राहुल गाँधी को ही कर दिया बेनकाब, चलती रहेगी केवल गलथोथी

‘आंदोलनजीवी’ सलीम उर्फ योगेंद्र यादव ने शेखी बघारने के फेर में ‘वोट चोरी’ पर राहुल गाँधी को ही बेनकाब कर दिया है। ‘द वायर’ से बातचीत में उन्होंने जो कुछ कहा है उससे स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेस नेता जो आरोप लगाए हैं, उसके समर्थन में उनके पास ठोस कुछ नहीं है। सारी बातें हवा-हवाई हैं।

यादव ने जो कुछ कहा है उससे यह भी पता चलता है कि राहुल गाँधी की यह गलथोथी आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। पर किसी भी स्थिति में इस मामले को लेकर वे न तो अदालत जाएँगे और न ही हलफनामा दायर करेंगे।

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से राहुल गाँधी ने कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को उठाया हुआ है। राहुल इस मुद्दे को इतना क्रांतिकारी समझ रहे हैं कि इस मुद्दे की तुलना कभी बम तो कभी हाइड्रोजन बम से कर रह हैं।

राहुल गाँधी जब आरोप लगाते हैं तो चुनाव आयोग उनका जवाब दे देता है। कुछ मामलों में उनसे शपथ पत्र दाखिल करने को भी कहा, लोग उनसे इस मुद्दे को अदालत में ले जाने पर सवाल पूछते हैं तो वो कतराने लगते हैं। अभी तक उन्होंने शपथ पत्र तक नहीं दिया है।

आपको लगेगा कि होना तो यही चाहिए, अगर राहुल गाँधी को लगता है कि चुनाव आयोग उनकी बात नहीं सुन रहा है तो अदालत जाएँ। अब यही उनके लिए गड़बड़ शुरू होती है, अदालत तो सबूत और साक्ष्य माँगती हैं लेकिन उसके नाम पर हैं सिर्फ मनगढ़ंत कहानियाँ। तो अब सवाल उठता है कि इस पूरी कार्रवाई की मकसद क्या है?

यह मकसद समझने के लिए राहुल गाँधी के कथित सलाहकार योगेंद्र यादव का एक वायरल बयान देखते हैं। योगेंद्र ने ‘द वायर’ से बातचीत में वोट चोरी के मुद्दे पर कहा, “कोर्ट-कचहरी, यह कहना कि आप कोर्ट जाइए, हलफनामा दीजिए, इसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि ऐसा कुछ होगा नहीं।”

वो आगे कहते हैं, “वोट चोरी की बात नीचे तक जा रही है। साधारण लोग कह रहे हैं कि हाँ भाई मामला तो गड़बड़ है…लोगों की राय इस मुद्दे के साथ जुड़ रही है। इस हद तक लोग अभी सफल हुए हैं।”

योगेंद्र के बयान से यह साफ हो जाता है कि राहुल गाँधी सच की कोई क्रांतिकारी लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वो राजनीतिक हवा बाजी के जरिए लोगों को उकसाने की कोशिश कर रहे हैं। अपने आस-पास के देशों में जिस तरह के हालात पिछले कुछ वर्षों में बने हैं उससे भी भारत में उनका समर्थक करने वाला एक तबका खुश है।

उनका बयान दिखाता है कि राहुल गाँधी और उनकी टीम के पास इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस तथ्य नहीं हैं। सारी कोशिश यही है कि वो बस किसी तरह वो हवा बना दें। राहुल गाँधी अपने ट्वीट्स में GenZ जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं यह भी लोगों को स्पष्ट समझ आता है।

राहुल गाँधी ने कभी नोटबंदी को ‘आम जनता का विरोधी’ बताकर और कभी राफेल सौदे को ‘चौकीदार चोर है’ कहकर घोटाला साबित करने की कोशिश की है। असर के नाम पर ना तो नोटबंदी ने चुनावी नतीजों में मोदी सरकार को नुकसान पहुँचाया, ना राफेल ने कोई लहर बनाई। अब वही हाल ‘वोट चोरी’ का दिख रहा है।

जनता के बीच इस मुद्दे को लेकर कोई आंदोलन, धरना या गुस्सा नहीं है। जनता कहीं भी सड़कों पर नहीं है, बस यही हो रहा है कि कुछ कॉन्ग्रेस समर्थक सोशल मीडिया पर हैशटैग चला रहे हैं। ग्राउंड पर सन्नाटा है और यही सन्नाटा राहुल गाँधी के आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

राहुल गाँधी ने बार-बार यह निराधार आरोपों के जरिए पीएम मोदी की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है लेकिन इन सबमें राहुल की खुद की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

लोगों को लगने लगा है कि राहुल गाँधी के मुद्दों में बस हवाई बातें रहती हैं कोई ठोस सबूत या तथ्य नहीं रहते। क्योंकि अगर जनता राहुल गाँधी की बातों को मानती, जनता को लगता कि वोट चोरी हो रही है तो क्या जनता चुप रहती? क्या चुनाव नतीजे इस तरह मोदी और बीजेपी के समर्थन में होते?

इस सब आरोपों के चलते नरेंद्र मोदी की राजनीतिक लोकप्रियता तो कम नहीं होती दिख रही इसके उल्ट राहुल गाँधी की अपनी साख पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं।

पहले ट्रंप ने H-1B वीजा पर बनाई हवा, अब व्हाइट हाउस दे रहा स्पष्टीकरण: कहा- ₹88 लाख हर साल नहीं बस एक बार, वीजाधारकों को फिर से एंट्री पर नहीं चुकानी होगी बढ़ी फीस

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H-1B वीजा की फीस एक लाख डॉलर (लगभग 88 लाख रुपए) तय किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने इसे लेकर कुछ स्पष्टीकरण जारी किए हैं। व्हाइट हाउस ने बताया है कि वीजा की यह फीस हर साल के लिए नहीं होगी बल्कि यह सिर्फ एक बार देनी होगी। इससे पहले दावा किया गया था कि यह फीस हर साल देनी होगी।

साथ ही, यह नियम केवल नए H-1B वीजा आवेदनों पर लागू होगा। अगर कोई H-1B वीजा धारक अभी अमेरिका से बाहर है लेकिन फिर से अमेरिका में काम करने के लिए नए H-1B वीजा के लिए आवेदन कर रहा है, तो उसे अब नई बढ़ी हुई फीस देनी होगी।

ये नई फीस खासकर उन पर लागू होगी जो पहली बार वीजा के लिए अप्लाई कर रहे हैं और अमेरिका में एंटर नहीं हुए हैं। लेकिन अगर कोई व्यक्ति पहले से ही H-1B वीजा पर अमेरिका में रहकर काम कर रहा है, तो उसे यह एक लाख डॉलर की अतिरिक्त फीस नहीं देनी होगी।

हालाँकि, अगर वही व्यक्ति अपने वीजा को रिन्यू करवाना चाहता है या किसी नई कंपनी के लिए H-1B ट्रांसफर करवाना चाहता है, तो उस स्थिति में भी कुछ फीस देनी पड़ेगी। यानी नई फीस का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो पहली बार अमेरिका में H-1B वीजा लेकर आना चाहते हैं।

वहीं, अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) ने बताया है, “नई H-1B वीजा जरूरत केवल नए आवेदनों पर लागू होती है, जो अभी तक दायर नहीं किए गए हैं। 21 सितंबर 2025 से पहले दायर किए जा चुके आवेदनों पर इसका कोई असर नहीं होगा।”

कंपनियों और कर्मचारियों में क्यों मचा हड़कंप?

ट्रंप के फैसले के बाद बड़ी टेक कंपनियाँ जैसे माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन घबरा गईं हैं। इन कंपनियों ने अपने H-1B और H-4 वीजा वाले कर्मचारियों से कहा कि वे 21 सितंबर से पहले अमेरिका लौट आएँ, वरना वापस बुलाने में 88 लाख की फीस देनी पड़ सकती है।

इसी डर से कई लोगों ने अपनी छुट्टियाँ रद्द कर दीं, टिकट कैंसिल कर दिए और अमेरिका वापस लौटने की जल्दी की। इसके चलते दिल्ली एयरपोर्ट और अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन जैसे बड़े एयरपोर्ट्स पर भीड़ देखी गई। हालाँकि, अब खुद अमेरिकी सरकार ने इसे लेकर स्पष्टीकरण दे दिया है।

कौन-कौन होगा प्रभावित और क्यों हुआ बदलाव?

इससे भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, क्योंकि हर साल सबसे ज्यादा H-1B वीजा भारतीयों को ही मिलता है। 2023 में 1.91 लाख और 2024 में 2.07 लाख भारतीयों को यह वीजा मिला था। करीब 2 लाख से ज्यादा भारतीय प्रोफेशनल्स इस नियम से प्रभावित होंगे।

व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि H-1B वीजा का गलत इस्तेमाल हो रहा है। कंपनियाँ इसका इस्तेमाल अमेरिकियों की नौकरियाँ छीनने और कम वेतन पर विदेशी कर्मचारी लाने के लिए कर रही हैं। इसलिए अब सिर्फ हाईली स्किल्ड लोग ही अमेरिका आ सकेंगे। ये फीस यह तय करेगी कि जो लोग आएँ, वे असल में टैलेंटेड हों, जिन्हें अमेरिकी कामगार रिप्लेस नहीं कर सकते।

वहीं उनके अनुसार, इस फीस से मिली रकम का इस्तेमाल टैक्स कम करने और सरकारी कर्ज चुकाने में किया जाएगा। कंपनियों को लगता है कि 88 लाख फीस चुकाकर एंट्री-लेवल या मिड-लेवल कर्मचारियों को लाना नुकसान का सौदा होगा। इसलिए वे ऐसे काम भारत या अन्य देशों में आउटसोर्स कर सकती हैं। इससे अमेरिका में भारतीय प्रोफेशनल्स के मौके घटेंगे।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस फैसले का मानवीय असर होगा क्योंकि इससे कई परिवार प्रभावित होंगे। साथ ही भारत ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका इस पर पुनर्विचार करेगा। भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल इसके संबंध में ‘X’ पर जानकारी साझा की है।

उन्होंने बताया कि सरकार ने अमेरिका में प्रस्तावित H1B वीजा कार्यक्रम पर प्रतिबंधों से जुड़ी रिपोर्टों को देखा है। इस प्रस्तावित कदम के सभी असर सरकार और भारतीय उद्योग जगत समेत सभी संबंधित पक्षों द्वारा गहराई से समझे जा रहे हैं। भारतीय उद्योग ने पहले ही कुछ गलत धारणाओं को स्पष्ट करते हुए एक प्रारंभिक विश्लेषण भी जारी किया है।

स्टेटमेंट में लिखा है कि भारत और अमेरिका दोनों के उद्योग जगत का नवाचार और रचनात्मकता में गहरा हित है और दोनों पक्ष मिलकर आगे का रास्ता तय करने पर विचार कर सकते हैं। कुशल पेशेवरों का आना-जाना और दोनों देशों के बीच प्रतिभा का आदान-प्रदान तकनीकी विकास, नवाचार, आर्थिक वृद्धि, प्रतिस्पर्धा और संपत्ति निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।

नीति-निर्माता इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हालिया कदमों का मूल्यांकन करेंगे, जिसमें दोनों देशों के बीच मज़बूत आपसी संबंध भी शामिल हैं। इस तरह के कदमों से मानवीय असर भी पड़ सकता है, जैसे परिवारों में बिछड़ाव और जीवन में अस्थिरता। सरकार को उम्मीद है कि अमेरिकी प्रशासन इन मामलों में उचित समाधान निकालेगा।

बता दें कि H-1B वीजा एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है। यह उन लोगों को मिलता है जो IT, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, हेल्थ जैसे तकनीकी और प्रोफेशनल क्षेत्रों में काम करते हैं। हर साल 85,000 वीजा जारी किए जाते हैं। ये वीजा लॉटरी सिस्टम से दिए जाते हैं, क्योंकि आवेदन करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होती है।

url – US President Donald Trump has fixed the application fee for H1B visa at one lakh dollars

अडानी मामले पर कॉन्ग्रेस ने लगाए मोदी सरकार पर जो इल्जाम, वो सारे बेबुनियाद: पहले की तरह बार-बार परोस रहे झूठ, किए सिर्फ फर्जी दावे

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 18 सितंबर 2025 को उद्योगपति गौतम अडानी और उनकी कंपनियों पर लगाए गए स्टॉक में हेरफेर के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। ये आरोप अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च ने लगाए थे। इस मामले में सेबी ने कहा कि लिस्टिंग समझौता या LODR (लिस्टिंग ऑबलिगेशन और डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट) का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

सेबी ने हिंडनबर्ग के आरोपों की जाँच के बाद कहा कि अडानी की संस्थाओं के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। इसलिए अडानी ग्रुप पर कोई जुर्माना नहीं लगेगा। सेबी ने गौतम अडानी, राजेश अडानी, अडानी पावर, अडानी पोर्टस के खिलाफ जाँच को भी बंद कर दिया।

सेबी ने इस बात को खारिज किया कि जानबुझ कर अडानी ग्रुप ने लेन देन को छुपाया था। हालाँकि ग्रुप ने कुछ कंपनियों जैसे माइलस्टोन और रेहवार के साथ पैसों का लेन-देन किया, लेकिन सभी मूलधन, ऋण और ब्याज चुकाए गए थे। इसके अलावा उस वक्त आरपीटी की एलओडीआर परिभाषा में ऐसे अप्रत्यक्ष लेनदेन शामिल नहीं थे। इसलिए इस नियम को पहले से लागू करना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।

सेबी से क्लीन चिट मिलने के बाद, कॉन्ग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार और अडानी ग्रुप पर अपना ‘मोदानी’ हमला फिर से शुरू कर दिया है। पार्टी नेता जयराम रमेश ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर 2023 में पूछे जाने वाले अपने 100 सवालों को दोहराया, जिसका शीर्षक था ‘हम अडानी के हैं कौन।’

इस बयान में कॉन्ग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार पर कई आरोप लगाए। इसमें कहा गया है कि अडानी समूह को फायदा पहुँचाने के लिए सरकारी एजेंसियों और कानूनों का दुरुपयोग किया गया।

कॉन्ग्रेस का आरोप है कि ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग जैसी एजेंसियों का दुरुपयोग करके कंपनियों को अपनी संपत्तियाँ अडानी समूह को बेचने के लिए मजबूर करना। कंपनियों द्वारा अपनी संपत्तियां अडानी समूह को बेचने के लिए हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की संपत्तियों का निजीकरण, केवल अडानी समूह के लाभ के लिए हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की संपत्तियों का एकतरफा निजीकरण करना।

कॉन्ग्रेस ने ये भी कहा है कि विभिन्न देशों में विशेष रूप से पड़ोस में अडानी समूह को अनुबंध दिलाने के लिए राजनयिक संबंधों का दुरुपयोग, अहली और चांग द्वारा अधिक बिल वाले कोयले का आयात, जिसने गुजरात में अडानी बिजली स्टेशनों से मिलने वाली बिजली की कीमतों को बढ़ाया, भारत में सौर ऊर्जा अनुबंधों को हासिल करने के लिए कथित तौर पर 2,000 करोड़ ($250 मिलियन) की रिश्वतखोरी योजना, जिसे गौतम अडानी और उनके सात सहयोगियों ने किया।

हालाँकि मोदी सरकार पर ये गंभीर आरोप हैं, लेकिन ये सभी निराधार हैं और ज़्यादातर पहले ही खारिज किए जा चुके हैं।

सरकारी दबाव का आरोप

कॉन्ग्रेस का दावा है कि सरकार ने अडानी को संपत्तियाँ बेचने के लिए केंद्रीय जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग किया। हालाँकि उन्होंने अपने बयान में किसी कंपनी का नाम नहीं लिया, लेकिन जयराम रमेश ने 2014 में अडानी पोर्ट्स द्वारा एलएंडटी और टाटा स्टील से ओडिशा में धामरा पोर्ट खरीदने का ज़िक्र किया। इस पोर्ट का निर्माण एलएंडटी और टाटा ने 2011 में किया था और उन्होंने इसे 2014 में अडानी को बेच दिया था। इस सौदे की घोषणा मई 2014 में हुई थी। इस महीने में ही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे।

चूँकि यह सौदा मई 2014 में पूरा हुआ था, इसलिए यह स्पष्ट है कि इस सौदे पर बातचीत कई महीनों से चल रही थी, क्योंकि ऐसे कॉर्पोरेट सौदे कुछ ही दिनों में नहीं होते। इसका मतलब है कि यह पूरा सौदा डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए हुआ था। यदि एलएंडटी और टाटा पर अडानी को बंदरगाह बेचने के लिए सरकारी एजेंसियों की ओर से कोई दबाव था, तो इसका मतलब यह होगा कि ऐसा दबाव कॉन्ग्रेस सरकार की ओर से आया होगा।

इसके अलावा, एलएंडटी और टाटा स्टील भारत के प्रमुख कॉर्पोरेट घराने हैं और उनके पास पर्याप्त कानूनी ताकत है। अपनी ईमानदारी के लिए वे सबसे सम्मानित कंपनियों में से एक हैं। अगर उन पर कोई दबाव होता, तो वे झुकने के बजाय उसका विरोध करते। मोदी सरकार और अडानी समूह पर आरोप लगाकर, कांग्रेस टाटा स्टील और एलएंडटी पर भी महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा न करने का आरोप लगा रही है।

इससे पहले कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया था कि जीवीके को मुंबई हवाई अड्डे में अपनी हिस्सेदारी अदानी एयरपोर्ट्स को बेचने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवीके भारी कर्ज के बोझ तले दबी थी और उसे मुंबई हवाई अड्डा बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। संसद में राहुल गांधी द्वारा कंपनी पर सरकार द्वारा दबाव डालने के आरोपों का जवाब देते हुए, जीवीके ने ऐसे किसी भी दबाव से इनकार किया था।

कंपनी ने एक बयान में कहा था, “जीवीके प्रबंधन द्वारा मुंबई हवाई अड्डे में अपनी हिस्सेदारी अदानी को बेचने का फैसला लिया गया था और हम पर किसी भी तरह के बाहरी दबाव का कोई सवाल ही नहीं उठता।”

जीवीके समूह के उपाध्यक्ष संजय रेड्डी ने कहा था, “हमने जो कुछ भी किया, वह कंपनी और उन कर्जदाताओं के हित में था। हमें अदानी के साथ लेनदेन किया, क्योंकि दूसरे निवेशकों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।”

बंदरगाहों और हवाई अड्डों के निजीकरण को लेकर आरोप

इसके बाद कॉन्ग्रेस ने ‘हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी संपत्तियों के निजीकरण’ का आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि देश के कई बंदरगाहों और हवाई अड्डों के संचालन के लिए लगाई गई बोली अडानी समूह ने जीत ली, क्योंकि इसमें कथित तौर पर गड़बड़ी हुई। जयराम रमेश चाहते हैं कि लोग यह मान लें कि ऐसे हवाई अड्डों और बंदरगाहों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से गौतम अडानी को सौंप दिया था।

लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे सभी निजीकरण की लंबी प्रक्रिया होती है। इनमें कई कंपनियाँ बोली लगाती है। बंदरगाहों का निजीकरण राज्य स्तर पर किया जाता है, जबकि हवाई अड्डों का आवंटन बोली के आधार पर किया जाता है। हवाई अड्डों के मामले में, हर यात्री की सुरक्षा, सहुलियत को लेकर सबसे अधिक बोली लगाने वाली कंपनी या संस्थान हवाई अड्डे का संचालन करती है।

अडानी समूह ने भारतीय यात्रियों के लिए सबसे अधिक बोली लगाई इसलिए ग्रुप को संचालन का जिम्मा मिला। अगर कॉन्ग्रेस पार्टी को इससे समस्या है, तो इसका मतलब है कि वह नहीं चाहती कि निजी कंपनियाँ हवाई अड्डों पर भारतीय यात्रियों के लिए सबसे अधिक मूल्य चुकाएँ।

केंद्र सरकार ने नवंबर 2018 में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर आधारित 6 हवाई अड्डों के संचालन को स्वीकृति दी। ये हवाई अड्डों हैं- अहमदाबाद, गुवाहाटी, जयपुर, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु और लखनऊ हवाई अड्डा। इन छह हवाई अड्डों के संचालन के लिए 10 कंपनियों से 32 बोलियाँ लगाई थी।

अडानी एयरपोर्ट्स को 50 साल की लीज़ के लिए सभी छह सरकारी हवाई अड्डों के संचालन का अधिकार मिला। अडानी समूह ने अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु और गुवाहाटी हवाई अड्डों के लिए ₹177, ₹174, ₹171, ₹168, ₹115 और ₹160 की बोली लगाई थी। ये इन सभी के लिए सबसे अधिक बोली थी।

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि बोली जीतने से कंपनी हवाई अड्डे की मालिक नहीं बन जाती, बल्कि उसे केवल एक निश्चित अवधि के लिए हवाई अड्डे के संचालन का अधिकार मिलता है।

हवाई अड्डे के सौदों पर कॉन्ग्रेस पार्टी के आरोप नए नहीं हैं। वे उन आरोपों को दोहराते आ रहे हैं, जिसका खंडन किया जा चुका है। अपने 100 सवालों में, कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि अडानी को हवाई अड्डे चलाने का कोई अनुभव न होने के बावजूद 6 हवाई अड्डे दिए गए। लेकिन जब मनमोहन सिंह सरकार के दौरान जीएमआर और जीवीके को क्रमशः दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डे दिए गए, तो इन कंपनियों के पास भी हवाई अड्डे का कोई अनुभव नहीं था।

राजनयिक दबाव का दावा गलत

कॉन्ग्रेस ने ये भी दावा किया है कि मोदी सरकार ने विदेशी सरकारों पर अडानी समूह को परियोजनाएँ सौंपने के लिए राजनयिक दबाव डाला। यह सोचना भी काफी हास्यास्पद और बेमानी है कि मजबूत अर्थव्यवस्थाओं वाली संप्रभु देश की सरकारें राजनयिक दबाव में आकर आर्थिक फैसले लेंगी।

इसके अलावा, जयराम रमेश शायद यह भूल गए हैं कि जब अडानी समूह ने ऑस्ट्रेलिया में खनन की बोली जीती थी, तब उनकी ही पार्टी सत्ता में थी। क्वींसलैंड स्थित कारमाइकल कोयला खदान 2011-12 में अडानी समूह को सौंपी गई थी, जब डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार सत्ता में थी।

अडानी पोर्ट ने 2022 में, इजराइल की कंपनी गैडोट समूह के साथ मिलकर इजराइल के हाइफा पोर्ट के अधिग्रहण की बोली जीती थी। इसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण और रणनीतिक डील माना गया। अडानी-गैडोट ने स्थानीय और वैश्विक कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद यह डील जीती। यह इजराइल सरकार द्वारा किए गए सबसे बड़े निजीकरणों में से एक था। ऐसी स्थिति में मोदी सरकार पर आरोप लगाना कि उसने अडानी ग्रुप की मदद की, सरासर गलत है।

इसके अलावा, अगर किसी भी गड़बड़ी का कोई संकेत होता, तो बोली लगाने वाली दुनियाभर की दूसरी बड़ी कंपनियाँ कोर्ट जातीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत में कंपनी द्वारा जीती गई बोलियों के संबंध में भी यही बात सही है। बोलियाँ हारने वाली कंपनियों ने बोली को लेकर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया।

उल्लेखनीय है कि हाइफ़ा बंदरगाह भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे के आवागमन का अहम पोर्ट होगा। इस बंदरगाह का भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व है। ऐसे में बंदरगाह का स्वामित्व किसी भारतीय कंपनी के पास है। ये देशहित में है। इस सौदे पर सवाल उठाकर, कॉन्ग्रेस पार्टी वैश्विक मंच पर भारत को रणनीतिक बढ़त मिलने का ही विरोध कर रही है।

बिजली की कीमतें बढ़ाने का दावा

जयराम रमेश ने दावा किया कि गुजरात में अडानी पावर स्टेशनों द्वारा आपूर्ति की जाने वाली बिजली की कीमतें कोयले की कथित रूप से अधिक कीमत वसूलने के कारण बढ़ी हैं। यह एक और निराधार आरोप है, क्योंकि यदि किसी बिजली संयंत्र की कीमत दूसरों की तुलना में बहुत अधिक है, तो उसे कोई खरीदार नहीं मिलेगा।

बिजली वितरण कंपनियाँ बिजली उत्पादकों के साथ बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर करती हैं, जहाँ कीमत निर्धारित होती है। बिजली उत्पादक कीमत तय नहीं कर सकते, जैसा कि कॉन्ग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है। हालाँकि अडानी पावर भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी है, लेकिन देश में अधिकांश बिजली का उत्पादन एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ करती हैं। इसलिए निजी क्षेत्र के बिजली उत्पादक मनमाने ढंग से कीमतें नहीं वसूल सकते।

अडानी पावर ने कॉन्ग्रेस सरकारों वाले कई राज्यों को बिजली की आपूर्ति की है। इसका मतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी ही राज्य सरकारों पर अडानी पावर से ऊँची कीमतों पर बिजली खरीदने का आरोप लगा रही है।

सौर ऊर्जा रिश्वतखोरी का आरोप

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह भी आरोप लगाया कि अडानी समूह ने भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) के साथ बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कई राज्यों के अधिकारियों को करीब ₹2,000 करोड़ की रिश्वत दी। एक अमेरिकी कोर्ट द्वारा कंपनी के खिलाफ आरोप लगाए जाने के बाद ये आरोप सामने आए थे।

हालाँकि अमेरिका में लगे आरोप के अलावा , इस तरह की रिश्वतखोरी का कोई और आरोप कंपनी पर नहीं लगे हैं। ₹2,000 करोड़ बहुत बड़ी रकम है, और जब तक जाँच में सच सामने नहीं आ जाता, ये एक आरोप ही रहेगा।

अडानी समूह ने आरोपों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र कानूनी फर्म नियुक्त की थी। फर्म ने समीक्षा बैठक की। इसमें सामने आया कि अडानी ग्रीन और दूसरी कंपनियाँ सभी लागू कानूनों और नियमों का पालन कर रही थीं। आंध्र प्रदेश सरकार भी उन राज्य सरकारों में शामिल हैं, जिन पर रिश्वत लेने के आरोप हैं। हालाँकि इन आरोपों के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला।

गौरतलब है कि अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) की फाइलिंग के अनुसार, गौतम अडानी ने 2021 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। उस समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएसआरसीपी प्रमुख वाईएस जगन मोहन रेड्डी थे। दरअसल, 2021 से 2022 के बीच जिन राज्यों पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया है, उनमें से कोई भी उस दौरान भाजपा शासित नहीं था, बल्कि उन सभी राज्यों में भाजपा विरोधी दल सत्ता में थे।

इसलिए, कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा लगाए गए सभी आरोप झूठे, निराधार और अजीब हैं। भारत और विदेशों में अडानी समूह ने टेंडर अपने नाम किया। उन बोलियों पर मोदी सरकार द्वारा अनुचित दबाव डालने के कोई सबूत या आरोप भी नहीं हैं। यह आरोप लगाना भी हास्यास्पद है कि मोदी सरकार ऑस्ट्रेलिया और इजराइल जैसी विदेशी सरकारों के फैसले को प्रभावित कर सकती है।

ये कोई नए आरोप नहीं हैं, कॉन्ग्रेस पार्टी वर्षों से ये आरोप लगाती रही है। इन सभी का पहले खंडन किया जा चुका है। फिर भी, आर्थिक मामलों को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी न केवल मोदी सरकार पर हमला कर रही है, बल्कि भारत की विकास को अवरुद्ध करने की कोशिश कर रही है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)