ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। इस बीच, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धमकी भरे बयानों का कड़ा जवाब दिया है। टेलीविजन संबोधन में खामेनेई ने कहा, “ईरान थोपी गई जंग में सरेंडर नहीं करेगा। अमेरिकी दखल से अपूरणीय क्षति होगी।”
खामेनेई ने इजरायल के हालिया हमलों को ‘मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण’ बताया, जिसमें तेहरान सहित कई सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा, “इजरायल ने हमारी हवाई सीमा का उल्लंघन कर बड़ी गलती की है। वह इसके गंभीर परिणाम भुगतेगा।”
बता दें कि ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ पर लिखा था कि वह खामेनेई का ठिकाना जानते हैं, लेकिन ‘फिलहाल’ उन्हें निशाना नहीं बनाएँगे। उन्होंने ईरान से ‘बिना शर्त सरेंडर’ की माँग की, जिसे खामेनेई ने ‘हास्यास्पद’ करार दिया।
उन्होंने एक्स पर लिखा, “अमेरिकी राष्ट्रपति हमें धमकी देता है। एक बेहूदा बयान में वह ईरानी क़ौम से कहता है कि आओ और समर्पण कर दो। धमकियाँ उन्हें दी जाएँ जो इन धमकियों से डरते हों। ईरानी क़ौम धमकी देने वालों से कभी मरऊब नहीं होती।”
The US President threatens us. With his absurd rhetoric, he demands that the Iranian people surrender to him. They should make threats against those who are afraid of being threatened. The Iranian nation isn’t frightened by such threats.
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने अल जज़ीरा से कहा, “अमेरिकी हस्तक्षेप पूरे क्षेत्र को पूर्ण युद्ध में झोंक देगा।” वहीं, खामेनेई ने एक्स पर पोस्ट कर जंग का ऐलान किया और कहा, “ईरान इजरायल के साथ कोई सुलह नहीं करेगा।” खामेनेई ने जोर देकर कहा कि उनकी सेना तैयार है और जनता व सरकार का पूरा समर्थन है।
खामनेई के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
यह तनाव तब और बढ़ गया जब इजरायल ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जिसमें कई वरिष्ठ कमांडर मारे गए। जवाब में ईरान ने इजरायल के तेल रिफाइनरी और सैन्य ठिकानों पर हमले किए। यरुशलम में अमेरिकी दूतावास बुधवार से शुक्रवार तक बंद रहेगा, और कर्मचारियों को घरों में रहने का निर्देश दिया गया है। वैश्विक समुदाय चिंतित है कि यह संघर्ष बड़ा रूप ले सकता है। कई देशों ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को बंगाल में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा स्कीम 1अगस्त 2025 से लागू करने का आदेश दिया है। मार्च 2022 को पश्चिम बंगाल में इस योजना को रोक दिया गया था।
कोर्ट ने कहा है कि केन्द्र सरकार इसको लेकर कोई शर्त लगा सकती है ताकि पहले हुई अनियमितताएँ दोबारा न हों। उस वक्त केन्द्र सरकार ने राज्य को दिये जाने वाले आवंटन राशि को रद्द कर दिया था। ये फैसला 63 कार्यस्थलों के निरीक्षण के आधार पर किया था। इस दौरान 31 कार्यस्थलों पर गड़बड़ी पाई गई थी।
संसद के बजट सत्र के दौरान 25 मार्च 2025 केन्द्रीय मंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने मनरेगा को लेकर जानकारी के दौरान भी कहा था कि बंगाल में धन का दुरुपयोग हुआ और ऐसे मामले सामने आए जब काम के बंटवारे और ठेकों को लेकर गड़बड़ियाँ पाई गई। मंत्री के मुताबिक “हमने एक ऑडिट टीम भेजी। उन्होंने 44 ऐसे काम पाए जिनमें अनियमितताएं थीं। उन्होंने 34 मामलों में पूरी वसूली की। अभी भी 10 अन्य काम पूरे किए जाने बाकी हैं। वित्तीय गड़बड़ी 5.37 करोड़ रुपये की थी। इसमें से उन्होंने 2.39 करोड़ रुपये वसूल किए हैं। कुछ चीजों पर अभी भी ध्यान देने की जरूरत है।”
साल 2021-22 में मनरेगा के तहत राज्य को ₹7507.80 करोड़ दिए गए थे। इसके बाद तीन साल तक राज्य को धनराशि नहीं दिए गए। इस पर कोर्ट का कहना है कि मनरेगा योजना को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने केन्द्र से पूछा कि पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों, जैसे मालदा, दार्जिलिंग, पूर्वी बर्धमान, हुगली को छोड़कर इस योजना को फिर से क्यों नहीं शुरू किया गया?
चीफ जस्टिस टीएस शिवगनम और जस्टिस चैताली चटर्जी की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। खंडपीठ ने कहा ” ये सभी आरोप 2022 से पहले के हैं, आप जो चाहें करें, लेकिन योजना को लागू करें “
कोर्ट ने कहा कि इस धनराशि को समेकित निधि में जमा करना होगा। साथ ही इस धनराशि का पहले जिसने दुरुपयोग किया, उससे कानूनी तरीके से निपटा जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा, ” मनरेगा योजना को अनिश्चितकाल तक ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता। केन्द्र सरकार के पास इसकी अनियमितता की जाँच के लिए पर्याप्त साधन हैं। ये जिस उद्देश्य से बनाया गया है उस हित को पूरा करना होगा। इसलिए केन्द्र सरकार को अपनी जाँच को आगे बढ़ाने के साथ साथ योजना को 1 अगस्त 2025 से लागू किया जाए”
कोर्ट ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकारें धन के वितरण पर अपनी शर्ते रखने के लिए स्वतंत्र हैं ताकि पहले जो गड़बड़ी हुई है वह न हो।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान हुए सीजफायर के फैसले में अमेरिका की कोई मध्यस्थता नहीं थी… ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से 35 मिनट लंबी बातचीत में स्पष्ट की। उन्होंने कनाडा दौरे के वक्त डोनाल्ड ट्रंप से कॉल पर बात करते हुए साफ कहा कि भारत अपने मुद्दों में तीसरे पक्ष को स्वीकार नहीं करेगा चाहे वो पक्ष अमेरिका का ही क्यों न हो। उन्होंने ये भी कहा कि भारत अब आतंक के खिलाफ पर्दे के पीछे से नहीं लड़ेगा, सामने से लड़ेगा और जवाब देगा।
भारतीय पीएम का ये रुख देखने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने भी आतंक के खिलाफ समर्थन किया। बाद में ये सारी बातें विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने मीडिया को बताई।
Foreign Secretary Vikram Misri announced that Prime Minister @narendramodi had a telephonic conversation with US President #DonaldTrump, which lasted approximately 35 minutes. During the discussion, PM Modi briefed President Trump about Operation Sindoor. PM Modi clarified that… pic.twitter.com/1RuPVc778V
ये पूरी बातचीत पिछले महीने ऑपरेशन सिंदूर के वक्त जो खबरें आईं थीं उससे संबंधित थीं, जिनमें ट्रंप के एक पोस्ट के बाद धड़ल्ले से चलाया गया कि भारत ने तो ऑपरेशन सिंदूर इसलिए रोका क्योंकि अमेरिका ने हस्तक्षेप किया था। इस एक दावे पर उन कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों को भी बोलने का मौका मिला जो चाहकर भी ऑपरेशन सिंदूर पर मोदी सरकार की आलोचना नहीं कर पा रहे थे।
ट्रंप का पोस्ट आते ही सोशल मीडिया पर मोदी सरकार की आलोचना शुरू हो गई। कहा जाने लगा कि हमेशा से कहा जाता था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष साथ नहीं दे रहा, मगर ऑपरेशन सिंदूर के समय जब सब एकजुट थे, सरकार की कार्रवाई का समर्थन दे रहे थे तो सरकार क्यों पीछे हटी…।
हर तरह से माहौल बनाया गया कि देश की आम जनता यही सोचे कि मोदी सरकार अमेरिका के आगे झुक गई और पाकिस्तान से मुँह की खा बैठी।
सोशल मीडिया पर चल रहे तमाम प्रपंच के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री इस मुद्दे पर सामने आए। उन्होंने बताया कि ये सीजफायर सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने के कारण हुआ है, अमेरिका की मध्यस्थता की वजह से नहीं।
हालाँकि, तब भी कॉन्ग्रेसी जानबूझकर झूठ फैलाते रहे। उन्होंने मोदी सरकार के प्रति कुंठा निकालने के लिए अपने ही देश पर सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया। नतीजा ये हुआ कि जब पाकिस्तान को अपनी हार के बावजूद अपने लोगों में जीत का माहौल बनाना था, तो उन्होंने कॉन्ग्रेस नेताओं के बयान का इस्तेमला किया। वहीं पाकिस्तान हैंडल्स ने भी इन्हें जमकर शेयर किया।
And it has happened yet again.
Pakistani Media is playing Rahul Gandhi's and Congress's narrative of "Surrender"
— Politics Pe Charcha (@politicscharcha) June 4, 2025
टीवी शो में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं के बयान चलाए गए जिसमें वो मोदी सरकार से जवाब माँग रहे थे कि उन्होंने अमेरिका को मध्यस्थता का मौका क्यों दिया। इस सीजफायर को ‘राष्ट्र शर्म’ तक की बात कही जाने लगी। ताना दिया गया कि नाम ‘नरेंद्र’ और किया ‘सरेंडर’। सवाल उठे कि अगर ट्रंप ने मध्यस्थता नहीं की होती तो फिर वो पोस्ट क्यों करते और क्यों इतना साफ होकर बताते कि ये जंग उनकी वजह से रुकी है।
And it has happened yet again.
Pakistani Media is playing Rahul Gandhi's and Congress's narrative of "Surrender"
— Politics Pe Charcha (@politicscharcha) June 4, 2025
कॉन्ग्रेसियों जिस समय ऑपरेशन सिंदूर को देखते हुए जब भारतीय सेना की कार्रवाई पर देश को गौरवान्वित होने के लिए कहना था, उस समय वो अपने निराधार व फर्जी सवालों से देश की जनता को सिर्फ इसलिए आशंकित कर रहे थे ताकि मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बन सके। पवन खेड़ा जैसे नेता इस प्रोपगेंडे को हवा देने में प्रमुख नाम थे।
कुछ दिन पहले की ही बात है पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 34 दिनों (10 मई 2025 से 13 जून, 2025) के बीच में, तीन अलग-अलग देशों में 13 अलग-अलग मौकों पर सार्वजनिक रूप से ढिंढोरा पीटा कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर इस पर कब बोलेंगे।
Today President Trump turns 79.
In the 34 days between May 10, 2025 and June 13, 2025, he trumpeted publicly on 13 different occasions in 3 different countries that he had brought about a cease-fire between India and Pakistan using trade with America as a carrot and stick. He,… pic.twitter.com/kOU1VxKLZB
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 35 मिनट की ट्रंप के साथ हुई बातचीत उन्हीं प्रश्नों का जवाब है। पीएम ने डोनाल्ड ट्रंप से बात करके उन्हीं के सामने ये कह दिया कि भारत किसी की मध्यस्था नहीं स्वीकार करेगा, तो ये अमेरिका से ज्यादा उन विपक्षियों को जवाब है जिन्होंने मोदी सरकार के साथ-साथ भारतीय सेना पर भी सवाल खड़े किए थे और ये पूछा था कि आखिर पता होना चाहिए कि पाकिस्तान के कितने विमान मार गिराए गए हैं।
वैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेसियों द्वारा सवाल उठाना कोई नया नहीं है। ऑपरेशन उड़ी हो या फिर ऑपरेशन बालाकोट… जब-जब इससे पहले भी मोदी सरकार ने पाकिस्तान के विरुद्ध एक्शन लिया है, तब-तब कॉन्ग्रेसी इस तरह के सवाल लेकर खड़े हुए हैं। उन्हें न तो देश की सेना पर भरोसा है और न ही देश की सरकार पर। कॉन्ग्रेसियों को तो अपने भी नेताओं से समस्या होती है अगर वो विदेश जाकर भारत के इन ऑपरेशन का बखान कर दें। शशि थरूर के साथ पार्टी द्वारा किया गया व्यवहार इसका ताजा उदाहरण है।
भारत पर शक करने की आदत विपक्ष में पुरानी
याद दिला दें कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद सरकार ने सर्वदलीय डेलीगेशन को अलग-अलग देश भेजा था ताकि वो लोग भारतीय सेना की कार्रवाई के बारे में विश्व को बता सकें। इनमें एक डेलीगेशन का प्रतिनिधित्व शशि थरूर भी कर रहे थे। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से निभाया, और भारतीय सेना के शौर्य के बारे में दुनिया को बताया, लेकिन ये प्रतिबद्धता देख उनकी पार्टी के नेता उनपर भड़क गए। उन्हें ये तक सुनना पड़ा कि वो भाजपा मे शामिल होने वाले हैं। बाद में उन्होंने इन सवालों का जवाब ये कहकर दिया कि अगर कोई देश की सेवा कर रहा है तो उसे इन बातों से फर्क नहीं पड़ना चाहिए।
वहीं 2019 की बात याद दिलाएँ तो जब पुलवामा में इस्लामी आतंकियों ने भारतीय सेना के काफिले को निशाना बनाकर फिदायीन हमला करवाया था, तब जब मोदी सरकार ने सेना को खुली छूट देकर एक्शन लेने को कहा था, उस समय ऑपरेशन बालाकोट हुआ था। वायु सेना ने चुन-चुनकर पाकिस्तानी आतंकियों को निशाने पर लिया था। पूरा देश इस पर गर्व कर रहा था मगर विपक्ष ने उसमें भी ये कहा था कि मोदी सरकार सेना की कार्रवाई पर राजनीतिक लाभ ले रही है।
पीएम मोदी कर रहे वही, जो कहा था
दिलचस्प बात ये है कि जो कॉन्ग्रेस सेना के एक्शन पर मोदी सरकार की तारीफ होने से ऐतराज जताती है उनके कार्यकाल में भी कई घटनाएँ ऐसी हुई थी जब सेना सीमा पार बैठे आतंकियों औकात दिखा सकते थे। हालाँकि, ऐसा नहीं हुआ इसके पीछे क्या वजह रही, ये कॉन्ग्रेस ही जानती होगी। मगर, नरेंद्र मोदी का ये पक्ष हमेशा से था कि पाकिस्तान को उसकी भाषा में ही जवाब देना जरूरी है।
उनकी इसपर एक वीडियो अक्सर वायरल रहती है जिसमें वो आप की अदालत में कह रहे थे- पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए ये लव लेटर लिखने बंद करना चाहिए। इंटरनेशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत भारत पे है। पूरी दुनिया पर प्रेशर हम पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान हमें मारकर चला गया, हम पर हमला बोल दिया और हमारे मंत्री अमेरिका जाकर रोने लगे। पड़ोसी मारकर चला गया तो आप अमेरिका क्यों गए, आपको अमेरिका जाना चाहिए था।
आज पीएम मोदी पर जब अपनी उस बात को पूरा करने का मौका है तो वो हर बार इसे चरितार्थ करते हैं। देश के डिफेंस सेक्टर को मजबूत करने के अलावा वो समय-समय पर देश की सेना में आत्मविश्वास भरने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उनपर विश्वास दिखाने पर पीछे नहीं हटते। नतीजा ये आता है कि पाकिस्तान को उसी की जवाब में भाषा दिया जाता है और अगर नेता अमेरिका जाते हैं तो ये साफ करने कि हम आतंरिक मामलों में और आतंकवाद के मुद्दे पर उसकी मध्यस्थता नहीं स्वीकारेंगे चाहे जो हो जाए।
किसी बीमारी से उबरना जितनी बड़ा आशीर्वाद है उतना ही कठिन है स्वास्थ्य सेवाओं का सुचारू रूप से चलना। अस्पताल, दवाओं और बुनियादी ढाँचों की जरूरत के साथ लोगों के लिए उनका आसानी से मुहैया होने जरूरी होता है। देश में कोई भी आपातकाल आने पर सबसे पहले स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ होने की दरकार होती है। मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों में स्वास्थ्य के पहलू पर ये दरकार सफल होती नजर आई है।
2014 से पहले की स्वास्थ्य क्षेत्र में लगभग हर कदम पर एक नई समस्या से जूझना पड़ रहा था। बीमारी के इलाज के लिए जितने खर्चे हो रहे थे, उससे भी कहीं अधिक मुश्किल था हर वर्ग का उस इलाज तक पहुँच पाना।
इसके अलावा डॉक्टरों की कमी, अधिक लागत और लोगों की पहुँच न हो पाना स्वास्थ्य के नजरिए से काफी बड़े मुद्दे रहे। स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी खर्चे GDP का महज 0.9 से 1.2 फीसद ही था। इसके कारण विश्व बैंक ने भी भारत को 191 देशों में 184वें स्थान पर रखा।
2014 में मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद हेल्थकेयर के मोर्चे पर अपनी मजबूत भागीदारी निभाई। स्वास्थ्य नीतियों में कई बदलाव किए गए। बुनियादी खामियों को कम करने का काम किया गया। आयुष्मान भारत, डिजिटल स्वास्थ्य मिशन, टेलीमेडिसिन और संस्थाओं के विस्तार जैसी कई शुरुआतों ने हेल्थकेयर के पैमानों पर बढ़त दर्ज की।
प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) ने 50 करोड़ से अधिक भारतीयों को ₹5 लाख तक का वार्षिक स्वास्थ्य बीमा कवरेज दिया। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) ने डिजिटल तौर पर स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढाँचे की शुरुआत की, जिससे स्वास्थ्य आईडी, टेली-परामर्श, AI-आधारित निदान, और डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड प्रबंधन संभव हुआ। इसके कारण लोगों को बेहतर इलाज मिलना शुरू हुआ।
Over the past 11 years, India has witnessed an unprecedented digital revolution under the visionary leadership of Hon'ble Prime Minister Shri @narendramodi ji. This transformation has not only connected millions but also bridged the digital divide, ensuring that technology… pic.twitter.com/4Ep93Ks6DG
11 वर्ष पहले तक ज्यादातर स्वास्थ्य सेवाएँ कागजों तक सीमित थी। डिजिटल नेटवर्क का कोई ओर-छोर नहीं था। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जानकारी को दर्ज करने के लिए कोई केंद्रीकृत विकल्प नहीं था। इसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं का समन्वय मुश्किल था। मोदी सरकार में इसकी शुरुआत होने से केंद्रीकृत डैशबोर्ड, बीमा लॉग, राष्ट्रीय रोग रजिस्टर या टीकाकरण ट्रैकर की जानकारी सुनिश्चित हुई।
गाँवों में तो बुनियादी चिकित्सा व्यवस्था ही ध्वस्त थी। लगभग तीन-चौथाई डॉक्टर शहरों में बसे थे। इसके चलते गाँवों में इलाज के लिए कई संघर्ष करने पड़ते थे। कई जिलों में 75 फीसद इलाज झोलाछाप डॉक्टर ही करते थे। जब मरीज की हालत बिगड़ने लगती तो शहरों में रेफर कर दिया जाता था।
अब शहर में इलाज की बात की जाए तो सरकारी तंत्र में जहाँ इलाज की कमी थी तो वहीं निजी अस्पताल में भीड़ के साथ खर्च भी अधिक था। आँकड़ों के अनुसार, हर 10,000 लोगों पर केवल 12 प्रशिक्षित डॉक्टर उपलब्ध थे। इस लिहाज से चिकित्सा व्यवस्था के एजेंडे पर लोगों को सेवा मिलना लगभग मुश्किल था। ये आँकड़े WHO के मानकों के आधे भी नहीं थे।
2010 के आस पास के आँकड़े कहते हैं कि महज दो तिहाई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) ही रोजाना खुलते थे। इसके अलावा एक-तिहाई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में जरूरी स्टाफ, डॉक्टर और नर्स की कमी थी। PHC में जरूरी सुविधाओं जैसे टीके, ग्लूकोज़ स्ट्रिप्स और साफ सुईओं की भी आपूर्ति पूरी नहीं थी।
2014 से पहले हेल्थकेयर के मामले पर बुनियादी ढाँचा काफी कमजोर रहा। उसका कारण बजट में कमी नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सरकार की उपेक्षा थी। इसका एक कारण ये था कि स्वास्थ्य सेवाओं को ‘राज्यों का विषय’ कहा गया। इससे केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचती नजर आती थी। इसकी वजह से स्वास्थ्य सेवाओं में न केवल पक्षपात हुआ, बल्कि राज्यों के बीच बजट और इलाज के लिए भी कई असामनता देखी गई। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी से स्वास्थ्य व्यवस्था बिगड़ती चली गई।
सुविधाओं से लैस हुआ हेल्थकेयर
मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद देश भर में स्वास्थ्य प्रणाली को एकमुश्त और बेहतर करने के लिहाज से डिजिटल करने की शुरुआत की गई। 2018 में भारत सरकार ने आयुष्मान भारत योजना शुरु की। इसमें दो महत्वपूर्ण पहल थे- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) और स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र (HWCs)। इन सेवाओं ने भारत के स्वास्थ्य सेवा के ढाँचे को पूरी तरह से बदल दिया।
वर्तमान में PM-JAY दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा प्रणाली बन गई है। ₹5 लाख तक की वार्षिक कवरेज में ये गरीब और कमजोर वर्ग के लिए वरदान सिद्ध हुई। गंभीर और असाध्य बिमारियों में ये योजना उनका सहारा बनी। अब तक लगभग 42 करोड़ से अधिक भारतीयों का स्वास्थ्य कार्ड बन चुका है।
इस योजना के तहत कैंसर जैसे गंभीर मर्ज के लिए भी इलाज शामिल किया गया और इसके लिए भी देश भर के हजारों सरकारी और निजी अस्पतालों का एक विस्तृत नेटवर्क तैयार किया गया। इससे जो लोग पहले अस्पतालों की भारी खर्च के कारण इलाज से घबराते थे, वे PM-JAY के तहत समुचित इलाज पाने में सफल हुए।
इसके अलावा स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र (HWCs) ने भारत की पुरानी और कमजोर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को दोबारा मजबूत किया। इन केंद्रों ने रोजमर्रा की बीमारियों, उनके इलाज, दवाइयों, मातृ एवं शिशु देखभाल और रेफरल नेटवर्क की निःशुल्क सेवाएँ दी गईं।
2025 तक 1.7 लाख से अधिक HWCs को शुरू किया गया। इनमें से कई आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में भी स्थापित हुए। ये ऐसे क्षेत्र रहे जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच बेहद सीमित थी।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन से स्वास्थ्य सेवाओं में आई तेजी
इसके लिए 2021 में आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) लॉन्च किया गया। इसके जरिए हर एक व्यक्ति की हेल्थ आईडी बनाने की सुविधा दी गई ताकि स्वास्थ्य से जुड़ी हर जानकारी एक ही जगह पर सुरक्षित रहे। इसके कारण एक जगह से दूसरी जगह जाने पर बीमारी के साथ-साथ इलाज से जुड़ी हर एक छोटी से छोटी बात को भी समझना आसान हो गया।
इसके अलावा नई जाँच प्रयोगशालाएँ, अस्पताल, क्लिनिक, फार्मेसी आदि का राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क तैयार किया गया। इसमें टेलीमेडिसिन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित इलाज और रेफरल प्रक्रियाएँ सुगम हुईं।
आँकड़ों की मानें तो ABDM से 55 करोड़ से भी अधिक लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड एकमुश्त हुए हैं और 6.4 लाख चिकित्सकों और हेल्थ केयर वर्कर्स को एक मंच पर लाया जा सका है।
स्वास्थ्य सेवाओं में बजट की बात करें तो 2013-14 में जो बजट 37,000 करोड़ रुपए था, वह 2023-24 में 89,000 करोड़ रुपए तक पहुँच गया। 2025-26 में ये बजट 1 लाख करोड़ रुपए तक पहुँचा। इसके साथ ही कई नए मेडिकल कॉलेज बनाए गए और डॉक्टरों की संख्या में इजाफा हुआ।
बिहार, छत्तीसगढ़ और असम जैसे दूरदराज के राज्यों में भी एम्स स्थापित किया गया ताकि स्वास्थ्य सेवाओं से दूर रह रही जनसंख्या को भी गंभीर बीमारियों के लिए बेहतर इलाज मिल सके।
टेलीमेडिसिन से बेहतर हुई चिकित्सा व्यवस्था
डिजिटलाइजेशन के चलते ग्रामीण और दुरुस्त क्षेत्र में रहने वाले मरीजों के लिए टेलीमेडिसिन जैसी सुविधा बेहद कारगर सिद्ध हुई। ABDM के प्लेटफार्म से हेल्थकेयर में भ्रष्टाचार की आशंकाओं को भी काफी हद तक कम किया गया।
कोविड-19 महामारी के दौरान, जब लोगों का घरों से निकलना मुश्किल था, उस समय ई-संजीवनी प्लेटफार्म के जरिए टेलीमेडिसिन की शुरुआत की गई। इसमें 10 करोड़ से भी अधिक लोगों को ऑनलाइन परामर्श दिया गया। यहाँ तक कि शहर में बैठे डॉक्टरों ने वीडियो कॉल के जरिए गाँव के मरीजों का भी इलाज किया।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए हर समय उपलब्धता
पहले मानसिक रोगियों को ‘पागल’ करार दिया जाता था, तो वहीं अब इन बीमारियों के लिए 24 घंटे की सेवा उपलब्ध है। ‘टेली-मानस’ एप की शुरुआत के साथ 24*7 टेलीफोन हेल्पलाइन शुरू की गई। इससे लोगों में बढ़ रहे अवसाद, चिंता, घबराहट और तनाव के साथ गंभीर मानसिक बीमारियों के लिए भी मदद मिलनी सुनिश्चित हुई।
इसके अलावा ‘वैक्सीन मैत्री’ के जरिए भारत ने न केवल देशवासियों की रक्षा की बल्कि दुनिया को भी COVID-19 से बचाने में अहम भूमिका निभाई। जब दुनियाभर में लोग संक्रमण की जद में आकर मर रहे थे उस समय देश में कोविडरोधी वैक्सीन तैयार हुई और लोगों की जान बचाई।
संकट की घड़ी में वैक्सीन मैत्री बना भारत
इसके साथ ही, COVID-19 महामारी के दौरान एक ओर बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी जान गँवाई तो वहीं लोगों की जान बचाने के लिए CoWIN डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की। इस प्लेटफॉर्म पर 2.2 अरब से अधिक वैक्सीन खुराक को ट्रैक किया। इसके जरिए भारत ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में अहम योगदान दिया।
वैक्सीन मैत्री की पहल के तहत भारत ने 100 से अधिक देशों को 130 मिलियन से अधिक वैक्सीन की खुराकें भेजीं। इससे वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में मजबूती लाने में भी भारत का नाम शामिल हुआ।
एक निश्चित तौर पर भारत की स्वास्थ्य सेवाओं में मोदी सरकार ने एक मील का पत्थर स्थापित किया है। आम लोगों के लिए उनकी उंगलियों पर गंभीर और असाध्य बीमारियों के लिए भी विकल्प मौजूद कर दिए। साथ ही दूरस्थ से लेकर आदिवासी क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया करवाई। किसी भी अन्य सरकार की अपेक्षा मोदी सरकार ने इसे एक अलग स्तर पर पहुँचा दिया है।
ईरान और इजरायल की लड़ाई ने एक बार फिर अरब जगत में तनाव बढ़ा दिया है। दोनों देश एक-दूसरे पर मिसाइलें दाग रहे हैं। ईरानी हमलों में इजरायल के ‘आयरन डोम’ एयर डिफेन्स को नुकसान पहुँचा है और यरूशलम, तेल अवीव समेत कई शहरों में इमारतें तबाह हुई हैं।
ईरानी हमलों के जवाब में इजरायल ने अब पहली बार अपनी नई एयर डिफेन्स तकनीक ‘बराक मैगन’ का इस्तेमाल किया है। 15 जून, 2025 की शाम को इस प्रणाली ने ईरान के ड्रोन को मार गिराया। ये ड्रोन ईरान ने इजरायली सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हुए हमलों के बदले में भेजे थे।
इजरायली नौसेना ने ‘बराक मैगन’ और लंबी दूरी के एयर डिफेन्स इंटरसेप्टर (LRAD) का इस्तेमाल कर 8 ड्रोन को मार गिराया है। ये इंटरसेप्टर इज़राइली मिसाइल जहाज सा’आर 6 से दागे गए थे।
इस लड़ाई की शुरुआत से अब तक नौसेना ने करीब 25 ड्रोन हमलों को नाकाम किया है। इनमें से ज्यादातर ड्रोन को नौसेना की ‘सी-डोम’ प्रणाली ने मार गिराया, जो ‘आयरन डोम’ का नेवी वर्जन है। जाँच में पाया गया कि ये ड्रोन इजरायली के रिहायशी इलाकों को निशाना बना रहे थे।
इजरायली वायु सेना और नौसेना ने मिलकर दुश्मन के खतरों की पहचान की और तुरंत मार गिराया है। ईरान ने 16 जून को एक बार में 100 से ज्यादा ड्रोन भेजे, लेकिन इजरायली ने सभी को फिर नाकाम कर दिया।
Iran sent more than 100 UAVs at Israel. We intercepted them.
बराक मैगन इजरायल की सुरक्षा में एक नई और मजबूत नौसैनिक रक्षा की लेयर जोड़ता है। यह सिस्टम पहले से मौजूद रक्षा प्रणालियों जैसे आयरन डोम, डेविड स्लिंग, एरो और आने वाले लेज़र सिस्टम ‘आयरन बीम’ को और मजबूत करता है।
इसका मुख्य उद्देश्य ईरान और उसके सहयोगियों द्वारा किए जाने वाले हमलों, जैसे सटीक हथियारों और ड्रोन के झुण्ड वाले हमले (स्वार्म) से सुरक्षा देना है। बराक मैगन खासतौर पर नौसेना के इस्तेमाल के लिए बनाया गया है। यह जमीन पर लगे सिस्टम्स (जैसे आयरन डोम या डेविड स्लिंग) से अलग है, क्योंकि यह हवा और समुद्र से आने वाले खतरों का तुरंत जवाब देने में सक्षम है।
बराक मैगन क्या है?
‘लाइटनिंग शील्ड’ या ‘बराक मैगन’ इजरायल की नई नौसेना वायु रक्षा प्रणाली है। यह जमीन पर मौजूद आयरन डोम को और मजबूत करने को बनाया गया है। यह खासकर समुद्र से आने वाले खतरों जैसे ड्रोन (UAV), क्रूज मिसाइलें, तेज गति से दागे गए प्रोजेक्टाइल, समुद्र से मार करने वाली मिसाइलें और लड़ाकू विमानों को रोक सकता है।
यह प्रणाली ‘बराक MX’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम का एक खास वर्जन है, जिसे इजरायल नौसेना के जहाजों की सुरक्षा के लिए तैयार किया गया है। यह समुद्र की सतह के पास उड़ने वाली मिसाइलों, बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों, और ड्रोन जैसे हवाई खतरों का मुकाबला कर सकती है।
बराक मैगन को इजरायल के उन्नत युद्धपोतों सा’आर6 पर लगाया गया है। इसे इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) ने बनाया है ताकि यह विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों की पहचान कर सके और उन्हें तुरंत खत्म कर सके।
#BREAKING: The Israeli Navy intercepted eight attack drones launched from Iran overnight using the Barak Magen air defense system—for the first time in operational use.
Mounted on Sa’ar 6 missile ships, the system can counter a wide range of threats including drones, cruise… pic.twitter.com/8OhKOaZKzl
देश के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, बराक मैगन प्रणाली एक मल्टी मिशन वेपन सिस्टम है। इसमें तीन मुख्य चीजें शामिल हैं, एक लंबी दूरी का इंटरसेप्टर मिसाइल, एक उन्नत रडार और एक हथियार नियंत्रण प्रणाली। इसे खासतौर पर समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए डिजाइन किया गया है। इसे अभी 6 युद्धपोतों पर लगाया गया है।
इसमें EL/M-2248 MF-STAR रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर लगे हैं, जो चारों दिशाओं में 360-डिग्री तक खतरों की सटीक पहचान कर सकते हैं। इसका इंटरसेप्टर मिसाइल 150 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम है।
बराक मैगन की मॉड्यूलर डिजाइन की वजह से इसे आसानी से अलग-अलग नौसैनिक जहाजों पर भी लगाया जा सकता है। बराक मैगन प्रणाली एक उन्नत नौसैनिक रक्षा सिस्टम है जिसमें कमांड सिस्टम, आधुनिक रडार और स्मार्ट वर्टिकल लॉन्चर शामिल हैं।
ये लॉन्चर कई तरह की मिसाइलें दाग सकते हैं और किसी भी दिशा से आने वाले खतरों पर सीधे जहाज से हमला करने में सक्षम हैं। इसकी यह क्षमता सिस्टम को 360 डिग्री सुरक्षा देने और एक साथ कई लक्ष्यों को संभालने में मदद करती है।
बराक मैगन में तीन तरह के इंटरसेप्टर शामिल हैं। इसमें एक बराक MRAD 35 किलोमीटर तक के लक्ष्यों के लिए है। बराक LRAD 70 किलोमीटर तक के लिए है और बराक ER 150 किलोमीटर तक के खतरों को खत्म कर सकता है। इन सभी मिसाइलों को एक ही लॉन्चर से दागा जा सकता है, यह इस प्रणाली की खासियत है।
इजरायल के रक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2022 में अपने युद्धपोत INS मैगन से बराक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल का पहला लाइव फायर परीक्षण किया। यह परीक्षण इजरायल की सा’आर 6 श्रेणी की कोरवेट से किया गया था।
इस दौरान मिसाइल को समुद्र के पास उड़ रहे एक लक्ष्य पर दागा गया, इसे मिसाइल ने मार गिराया। इजरायल ने इस परीक्षण का वीडियो भी जारी किया, जिसमें मिसाइल के प्रक्षेपण और लक्ष्य को मार गिराने की पूरी प्रक्रिया दिखाई गई।
बराक मैगन क्यों महत्वपूर्ण है?
बराक मैगन प्रणाली का मुख्य उद्देश्य इजरायल के क्षेत्रीय समुद्री इलाकों और उसके महत्वपूर्ण ठिकानों की रक्षा करना है, विशेष कर भूमध्यसागर में स्थित लेविथान और तामार गैस खनन वाले इलाकों की। ये गैस क्षेत्र इजरायल की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए बहुत जरूरी हैं।
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, द ज्यूइश इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी ऑफ अमेरिका (JINSA) के वरिष्ठ फेलो जॉन हन्ना ने कहा कि बराक मैगन वायु रक्षा प्रणाली इजरायल नौसेना की वायु और मिसाइल रक्षा क्षमताओं को काफी मजबूत बनाती है।
जॉन हन्ना ने कहा कि बराक मैगन इजरायल की पहले से ही बेहद उन्नत और अनुभवी मल्टी लेयर मिसाइल सिस्टम और मज़बूत बनाता है। उन्होंने इसे इजरायल की रक्षा तरकश में एक और तीर’ कहा, जो दुनिया की सबसे आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों में से एक है।
उनके अनुसार, यह प्रणाली इजरायल के पूर्वी भूमध्यसागर में मौजूद तेल और गैस सुविधाओं, तटीय इलाकों के महत्वपूर्ण इन्फ्रा और घनी आबादी वाले क्षेत्रों को लंबी दूरी से सुरक्षा देती है। साथ ही यह इजरायली नौसेना के जहाजों की रक्षा भी करती है।
हन्ना ने यह भी बताया कि बराक मैगन इजरायल को अपनी सीमाओं से दूर, पूर्वी भूमध्यसागर और लाल सागर तक खतरों को रोकने की क्षमता देता है। इससे इजरायल की सीमाएँ एकदम सील हो सकती है।
बराक 8
बराक डिफेन्स सिस्टम की दुनिया भर में काफी चर्चा है। इसकी अब तक 1.2 बिलियन डॉलर (10,020 करोड़) की बिक्री तय हो चुकी है। इसमें एक बड़ा साझेदार भारत है। भारत सरकार के अनुसार, इजरायल ने भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के साथ मिलकर बराक-8 मिसाइल प्रणाली विकसित की है।
यह प्रणाली सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जो ड्रोन, लड़ाकू विमान, एंटी-शिप मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे हवाई खतरों से सुरक्षा देती है। बराक-8 को जमीन और समुद्र दोनों से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी अधिकतम रेंज 100 किलोमीटर और ऊँचाई 20 किलोमीटर तक है।
भारत में जनगणना न सिर्फ एक आँकड़ों का संग्रह है, बल्कि यह देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तस्वीर को सामने लाता है। यह नीतियाँ बनाने, संसाधनों का बँटवारा करने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का आधार है। 2027 में होने वाली जनगणना को लेकर केंद्र सरकार ने कई बड़े ऐलान किए हैं, जिनमें जातिगत गणना को शामिल करना एक ऐतिहासिक फैसला है। लेकिन इस बीच कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक भ्रामक प्रचार शुरू कर दिया।
कॉन्ग्रेस का दावा है कि 16 जून 2025 को जारी गजट नोटिफिकेशन में ‘जातिगत जनगणना’ का जिक्र नहीं है और यह सरकार का ‘यू-टर्न’ है। यह लेख कॉन्ग्रेस के इस झूठ को पूरी तरह बेनकाब करेगा, जनगणना की प्रक्रिया को विस्तार से समझाएगा और तेलंगाना-बिहार के सर्वे और राष्ट्रीय जनगणना के बीच अंतर को स्पष्ट करेगा। साथ ही, यह कॉन्ग्रेस के इतिहास और उनके राजनीतिक प्रचार के मकसद को भी उजागर करेगा।
आइए, अब इस मामले से जुड़े हर पहलू को हम आसान तरीके से समझने की कोशिश करते हैं।
कॉन्ग्रेस का झूठ: एक सुनियोजित प्रचार
16 जून 2025 को केंद्र सरकार ने जनगणना 2027 के लिए गजट नोटिफिकेशन जारी किया। इस नोटिफिकेशन में जनगणना की तारीखें और कुछ बुनियादी जानकारियाँ थीं। लेकिन कॉन्ग्रेस ने इसे मौके की तरह भुनाने की कोशिश की। पार्टी के नेताओं ने दावा किया कि नोटिफिकेशन में ‘जातिगत जनगणना’ शब्द का जिक्र नहीं है, और सरकार ने अपने वादे से मुकरने की कोशिश की है। यहाँ कॉन्ग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं के बयान हैं-
कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, “गजट नोटिफिकेशन में जातिगत जनगणना का कोई जिक्र नहीं है। यह सरकार का एक और यू-टर्न है। केंद्र ने 30 अप्रैल को वादा किया था, लेकिन अब पीछे हट रही है।”
Modi govt has issued the notification for census
It’s a routine decadal exercise. In fact this one is delayed by almost 5 years – so what exactly is being lauded?
पवन खेड़ा ने कहा, “तेलंगाना ने अपने सर्वे में तीन बार ‘जाति’ शब्द का जिक्र किया, लेकिन केंद्र के नोटिफिकेशन में एक बार भी नहीं। अगर यह जातिगत जनगणना है, तो ‘जाति’ शब्द कहाँ है?”
फोटो 1 – तेलंगाना की कांग्रेस सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा की, जिसमें 'जाति' शब्द का तीन बार उल्लेख किया गया है।
फोटो 2 – केंद्र की मोदी सरकार ने जनगणना (जाति जनगणना मानी जाने वाली) की घोषणा की, जिसमें 'जाति' शब्द का उल्लेख तक नहीं किया गया है। pic.twitter.com/FWXQG2YwvO
इन बयानों के जरिए कॉन्ग्रेस ने यह प्रचार शुरू किया कि सरकार अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के हितों के खिलाफ काम कर रही है। सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस समर्थकों ने इसे और हवा दी। लेकिन क्या यह दावा सच है? आइए, तथ्यों की पड़ताल करते हैं।
सच्चाई: सरकार की प्रतिबद्धता और प्रेस रिलीज
केंद्र सरकार ने कई मौकों पर साफ किया है कि जनगणना 2027 में जातिगत गणना शामिल होगी। यह घोषणा सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की आधिकारिक रिलीज और गृह मंत्रालय के बयानों में भी दर्ज है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं-
30 अप्रैल 2025 की प्रेस रिलीज: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स (CCPA) की बैठक के बाद ऐलान किया कि जनगणना में जातिगत गणना होगी। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लिए ऐतिहासिक कदम बताया।
शाह ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दशकों तक सत्ता में रहते हुए जातिगत जनगणना के खिलाफ थे, लेकिन विपक्ष में रहते हुए इसे राजनीतिक मुद्दा बनाते रहे।
सामाजिक न्याय के लिए संकल्पित मोदी सरकार ने आज एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के नेतृत्व में आज हुई CCPA की बैठक में, आगामी जनगणना में जातिगत गणना को शामिल करने का निर्णय लेकर सामाजिक समानता और हर वर्ग के अधिकारों के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता का…
4 जून 2025 की प्रेस रिलीज: गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि जनगणना 2027 दो चरणों में होगी, और इसमें जातिगत गणना शामिल होगी। इस रिलीज में जनगणना की तारीखें और कुछ तकनीकी पहलुओं का भी जिक्र था।
यह प्रेस रिलीज PIB की वेबसाइट पर उपलब्ध है और इसे कोई भी पढ़ सकता है।
फोटो साभार : पीआईबी
15 जून 2025 की प्रेस रिलीज: गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर पुष्टि की कि जनगणना में जातिगत गणना होगी। उन्होंने बताया कि इसके लिए 34 लाख गणनाकर्ता और 1.3 लाख कर्मचारी तैनात किए जाएँगे। साथ ही, यह जनगणना डिजिटल तरीके से होगी।
इस रिलीज में यह भी कहा गया कि सरकार ने डेटा सुरक्षा के लिए सख्त नियम बनाए हैं।
फोटो साभार : पीआईबी
16 जून 2025 को गृह मंत्रालय का जवाब: जब कॉन्ग्रेस ने नोटिफिकेशन में ‘जातिगत जनगणना’ शब्द न होने का मुद्दा उठाया, तो गृह मंत्रालय ने तुरंत जवाब दिया। मंत्रालय ने कहा, “कुछ लोग भ्रामक जानकारी फैला रहे हैं कि नोटिफिकेशन में जातिगत गणना का जिक्र नहीं है। हम स्पष्ट करते हैं कि 30 अप्रैल, 4 जून और 15 जून 2025 की प्रेस रिलीज में पहले ही बता दिया गया था कि जनगणना में जातिगत गणना शामिल होगी।”
The notification to conduct Census has been published in the Official Gazette today. The Census will include Caste enumeration as well. However, some misleading information is being spread that there is no mention of caste census in the notification. It has already been mentioned… pic.twitter.com/hZ5cxV13xl
— Spokesperson, Ministry of Home Affairs (@PIBHomeAffairs) June 16, 2025
इन तथ्यों से साफ है कि सरकार ने बार-बार अपनी प्रतिबद्धता जताई है। कॉन्ग्रेस का यह कहना कि सरकार ने यू-टर्न लिया है, पूरी तरह गलत है।
गजट नोटिफिकेशन का सच: क्या होता है इसमें?
कॉन्ग्रेस ने गजट नोटिफिकेशन में ‘जातिगत जनगणना’ शब्द न होने को बड़ा मुद्दा बनाया। लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि गजट नोटिफिकेशन का मकसद क्या होता है। जनगणना अधिनियाम 1948 की धारा 3 के तहत गजट नोटिफिकेशन में सिर्फ यह घोषणा की जाती है कि जनगणना होगी और उसका संदर्भ तिथि (Reference Date) क्या होगी। इसमें सवालों की सूची या प्रक्रिया का जिक्र करना जरूरी नहीं होता।
16 जून 2025 के नोटिफिकेशन में कहा गया है कि जनगणना 2027 में होगी।। देश के अधिकांश हिस्सों के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 होगी, जबकि लददाख और कुछ बर्फीले इलाकों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखण्ड) के लिए यह 1 अक्टूबर 2026 होगी।
नोटिफिकेशन में न तो चरणों (हाउसालिस्टिंग और जनसंख्या गणना) का जिक्र है, न ही सवालों की कोई विवरण। इसका मतलब यह नहीं कि ये चरण या सवाल नहीं होंगे।
क्यों नहीं होता जिक्र: गजट नोटिफिकेशन का काम सिर्फ कानूनी घोषणा करना है। सवालों की सूची और प्रक्रिया बाद में तय होती है और इसे रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) और गृह मंत्रालय तैयार करते हैं।
उदाहरण के लिए – 2011 की जनगणना के नोटिफिकेशन में भी सवालों की कोई जिक्र नहीं था, लेकिन फिर भी कई तरह की जानकारियाँ इकट्ठी की गई थीं।
कॉन्ग्रेस का भ्रम: कॉन्ग्रेस ने यह जानते हुए भी कि नोटिफिकेशन में सवालों का जिक्र नहीं होता, ‘जातिगत जनगणना’ शब्द की गैरमौजूदगी को मुद्दा बनाया। यह एक तकनीकी बिंदु को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश है।
कॉन्ग्रेस का झूठ क्यों? राजननीतिक मकसद
कॉन्ग्रेस का यह प्रचार सिर्फ भ्रामक ही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनैतिक रणनीति का हिस्सा है। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं-
चुनावी रणनीति का हथियार: 2024 के लोकसभा चुननेन में कॉन्ग्रेस ने जातिगत जनगणना को बड़ा मुद्दा बनाया। राहुल गाँधी ने ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का नारा दिया और इसे SC, ST और OBC समुदायों के बीच लोकप्रिय करने की कोशिश की।
लेकिन जब केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को अपने हाथ में लिया और जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी, तो कॉन्ग्रेस का यह सबसे बड़ा हथियार छिन गया। इससे कॉन्ग्रेस बौखलाहट में आ गई।
तेलंगाना मॉडल का गलत प्रचार: कॉन्ग्रेस बार-बार तेलंगाना के सर्वे को ‘जातिगत जनगणना’ का मॉडल बताती है। पवन खेड़ा ने तेलंगाना के नोटिफिकेशन में ‘जाति’ शब्द के इस्तेमाल को केंद्र के नोटिफिकेशन से तुलना की। लेकिन सच यह है कि तेलंगाना का सर्वे एक स्थानीय सर्वे था, न कि राष्ट्रीय जनगणना।
भाजपा को बदनाम करना: कॉन्ग्रेस का दावा है कि भाजपा SC, ST और OBC के खिलाफ है। सुप्रिया श्रीनेत ने यह तक कहा कि भाजपा ने 2021 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर जातिगत जनगणना का विरोध किया। लेकिन यह आधा सच है। उस समय सरकार ने कहा था कि सिर्फ SC और ST की गणना नीति के तहत की जाती है, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है और सरकार ने स्पष्ट रूप से जातिगत गणना को मँजूरी दे दी है।
कॉन्ग्रेस इस पुराने बयान को तोड़-मरोड़कर यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि भाजपा का सामाजिक न्याय में कोई विश्वास नहीं।
SC/ST/OBC वोट बैंक की राजनीति: कॉन्ग्रेस के लिए SC, ST और OBC समुदाय एक बड़ा वोट बैंक हैं। राहुल गाँधी ने ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों के जरिए इन समुदायों को लुभाने की कोशिश की। लेकिन जब सरकार ने जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी है, तो कॉन्ग्रेस ने नया नरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया।।
जनगणना और जाति सर्वे: अंतर को समझें
कॉन्ग्रेस बार-बार तेलंगाना और बिहार के सर्वे को राष्ट्रीय जनगणना से जोड़कर भ्रम फैला रही है। लेकिन इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। आइए, इसे विस्तार से समझते हैं-
राष्ट्रीय जनगणना
क्या है: यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है, जो संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत आती है। यह हर 10 साल में होती है और पूरे देश की जनसंख्या का हिसाब-किताब रखती है।
उद्देश्य: जनसंख्या, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जानकारी इकट्ठी करना, ताकि नीतियाँ बनाई जा सकें। इसमें अब जातिगत गणना भी शामिल होगी।
प्रक्रिया
चरण 1: हाउसलिस्टिंग ऑपरेशन (HLO): घरों की स्थिति, संपत्ति और सुविधाओं की जानकारी।
चरण 2: जनसंख्या गणना (PE): हर व्यक्ति की जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जानकारी।
विशेषता: यह डिजिटल होगी, जिसमें मोबाइल ऐप और सेल्फ-एन्यूमरेशन की सुविधा होगी। डेटा सुरक्षा के लिए सख्त नियम होंगे।
उदाहरण: 2011 की जनगणना, जिसमें SC और ST की गणना की गई थी। अब 2027 में सभी जातियों की गणना होगी।
जाति सर्वे
क्या है: यह राज्य सरकारें अपने स्तर पर करती हैं, जैसे बिहार (2023) और तेलंगाना (2025) में हुआ।
उद्देश्य: स्थानीय स्तर पर जातिगत आँकड़े इकट्ठा करना, ताकि आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर बनाया जा सके।
प्रक्रिया: यह जनगणना से छोटा और सीमित होता है। इसमें सिर्फ जाति और कुछ सामाजिक-आर्थिक जानकारी पर फोकस होता है।
उदाहरण
बिहार (2023): नीतीश कुमार की सरकार ने सर्वे कराया, जिसमें OBC और EBC 63% से ज्यादा, SC 19.65% और सामान्य वर्ग 15.52% पाए गए। इसका मकसद आरक्षण बढ़ाना था।
तेलंगाना (2025): कॉन्ग्रेस सरकार ने सर्वे कराया, जिसमें BC (पिछड़ा वर्ग) 56.33% पाए गए। यह भी स्थानीय स्तर का था।
जातिगत जनगणना और जातिगत सर्वे में अंतर
स्कोप: जनगणना पूरे देश के लिए होती है, जबकि सर्वे किसी एक राज्य तक सीमित होता है।।
प्रक्रिया: जनगणना में कई तरह की जानकारियाँ इकट्ठी की जाती हैं, जबकि सर्व में सिर्फ जाति और कुछ आर्थिक जानकारी।
कानूनी आधार: जनगणना का आधार जनगणना अधिनियाम 1948 है, जबकि सर्वे का आधार राज्य सरकार का नीतिगत फैसला होता।
विश्वसनीयता: जनगणना का डेटा ज्यादा विश्वसनीय होता है, क्योंकि यह एकसमान और व्यापक स्तर पर इकट्टा किया जाता।
कॉन्ग्रेस का तेलंगाना और बिहार के सर्वे को राष्ट्रीय जनगणना से जोड़ना सिर्फ भ्रम फैलाने की कोशिश है। यह राष्ट्रीय जनगणना की तुलना एक छोटे से स्थानीय सर्वे से करना है, जो पूरी तरह गलत है।
जन-गणना की पूरी प्रक्रिया: क्या-क्या होगा?
जनगणना 2027 दो चरणों में होगी, और यह पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी। यहाँ प्रक्रिया और सवालों का विस्तार से विवरण है-
चरण 1: हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन (HLO)
समय: अप्रैल 2026 से सितंबर 2026 तक।
क्या पूछा जाएगा?
घर की स्थिति: घर पक्का, कच्चा या अस्थाई। कितने कमरे, छत और दीवार की सामग्री।
सुविधाएँ: पीने का पानी (नल, कुआँ, हैंडपंप), बिजली, शौचालय, रसोई, ड्रेनेज।
घर का उपयोग: आवासीय, व्यावसायिक या अन्य (दुकान, गोदाम, स्कूल)।
उददेश्य: देश के आवासीय ढाँचे और जीवन स्तर को समझना। इससे स्लम सुधार, आवास योजनाएँ और बुनियादी सुविधाओं की नीतियाँ बनती हैं।
कैसे होगा: गणनाकर्ता घर-घर जाएँगे और मोबाइल ऐप में जानकारी दर्ज करेंगे। लोग खुद भी ऑनलाइन जानकारी भर सकते हैं।
चरण 2: जनसंख्या गणना (PE)
समय: फरवरी 2027 में
क्या पूछा जाएगा?
जनसांख्यिकीय जानकारी
नाम, उम्र, लिंग, वैवाहिक स्थिति (शादीशुदा, अविवाहित, तलाकशुदा, विधवा/विधुर)।
जन्म स्थान, माता-पिता का जन्म स्थान और प्रवास की जानकारी (क्या आप कहीं और से आए हैं?)।
शिक्षा: पढ़ाई का स्तर (अनपढ़, प्राइमरी, हाई स्कूल, ग्रेजुएट, आदि)।
क्या स्कूल/कॉलेज में दाखिल हैं। पढ़ते हैं या छोड़ चुके हैं।
रोजगार: नौकरी या व्यवसाय का प्रकार: सरकारी, निजी, मजदूरी, खेती, आदि।
आय का स्तर, बेरोजगारी की स्थिति।
काम के घंटे और काम की स्थिति (स्थाई, अस्थाई, दिहाड़ी)।
जातिगत जानकारी: हर व्यक्ति की जाति दर्ज की जाएगी। इसके लिए एक ‘अन्य’ कॉलम होगा, जिसमें जातियों की ड्रॉप-डाउन लिस्ट होगी।
यह पहली बार होगा जब स्वतंत्र भारत में सभी जातियों की गणना होगी। पहले सिर्फ SC और ST की गणना होती थी।
सामाजिक-आर्थिक स्थिति: परिवार की आय, संपत्ति और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ (राशन कार्ड, पेंशन, उज्जवला)।
क्या परिवार BPL (गरीबी रेखा से नीचे) में है। कितना है।
सांस्कृतिक जानकारी: मातृभाषा, दूसरी भाषाएँ, धर्म।
पारंपरिक रीति-रिवाज या सांस्कृतिक प्रथाएँ (वैकल्पिक)।
उददेश्य: यह चरण देश की जनसंख्या के हर पहलू को समझने के लिए होता है। इससे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक नीतियाँ बनती हैं। जातिगत गणना से OBC, SC/ST की सही संख्या पता चलेगी, जिससे आरक्षण और कल्याणकारी योजनाएँ बेहतर होंगी।
डिजिटल प्रक्रिया
मोबाइल ऐप: गणनाकार्ता मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे। यह पहली बार होगा जब जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी।
सेल्फ-एन्यूमेरेशन: लोग ऑनलाइन पोर्टल या ऐप पर खुद अपनी जानकारी भर सकते हैं। इससे प्रक्रिया तेज और पारदर्शी होगी।
डेटा सुरक्षा: डेटा कलेक्शन, ट्रांसमिशन और स्टोरेज में सख्त नियम होंगे। डेटा लीक से बचने के लिए साइबर सिक्योरिटी के उपाय होंगे।
जातिगत गणना का महत्व
ऐतिहासिक कदम: स्वतंत्र भारत में पहली बार सभी जातियों की गणना होगी। आखिरी बार 1931 में ब्रिटिश सरकार ने ऐसा किया था।
उददेश्य: OBC और अन्य समुदायों की सही संख्या जानना, ताकि आरक्षण, शिक्षा और रोजगार में उनके हक को सुनिश्चित किया जा सके।
प्रक्रिया: जातिगत डेटा को एक अलग कॉलम में दर्ज किया जाएगा। हर व्यक्ति अपनी जाति बता सकेगा और एक ड्रॉप-डाउन लिस्ट होगी जिसमें हजारों जातियाँ शामिल होंगी।
कॉन्ग्रेस का इतिहास: जातिगत जनगणना पर क्या रहा रुख?
कॉन्ग्रेस दावा करती है कि वह SC, ST और OBC के हितों की रक्षा करती है। राहुल गाँधी ने 2024 के चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाया। लेकिन कॉन्ग्रेस का इतिहास कुछ और कहता है-
1951 से 2011 तक: कॉन्ग्रेस कई दशकों तक सत्ता में रही, लेकिन उसने कभी जातिगतिगत जनगणना नहीं कराई। सिर्फ SC और ST की गणना होती थी। OBC की गणना का कोई सटीक डेटा नहीं था।
2011 का SECC (सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वेक्षण): यूपीए सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वेक्षण शुरू किया, लेकिन यह पारदर्शी नहीं था। डेटा पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुआ और कई राज्यों ने इसे अव्यवहारिक बताया।
कॉन्ग्रेस ने इस डेटा का इस्तेमाल नीतियाँ बनाने में नहीं किया, जिससे इसका मकसद अधूरा रहा।
2024 में प्रचार: राहुल गाँधी ने ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का नारा दिया और जातिगत जनगणना को बड़ा मुद्दा बनाया। लेकिन जब केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी है, तो कॉन्ग्रेस ने इसे यू-टर्न बताकर भ्रम फैलाना शुरू कर दिया है।
कॉन्ग्रेस ने यह भी वादा किया कि वह आरक्षण की 50% की सीमा हटाएगी, लेकिन यह अव्यवहारिक और कानूनी रूप से जटिल है।
कॉन्ग्रेस का यह रवैया दिखाता है कि वह इस मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करती है। जब सरकार ने उनकी माँग पूरी कर दी, तो उन्होंने नया झूठ गढ़ लिया।
तेलंगाना और बिहार के सर्वे: विस्तार से समझें
कॉन्ग्रेस बार-बार तेलंगाना और बिहार के सर्वे को राष्ट्रीय जनगणना का मॉडल बताती है। लेकिन ये दोनों अलग-अलग चीजें हैं। यहाँ विस्तार से समझते हैं-
बिहार (2023)
क्या हुआ: नीतीश कुमार की सरकार ने जाति सर्वे कराया। इसमें OBC और EBC 63.13%, SC 19.65%, ST 1.68%, और सामान्य वर्ग 15.52% पाए गए।
उददेश्य: आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 75% करना। बिहार ने इसके आधार पर नया आरक्षण कानून बनाया।
प्रक्रिया: यह एक सीमित सर्वे था, जिसमें सिर्फ जाति और कुछ आर्थिक जानकारी इकट्ठी की गई। इसमें राष्ट्रीय जनगणना की तरह व्यापक डेटा नहीं था।
विवाद: कुछ लोगों ने डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। फिर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन कोर्ट ने इसे मंजूरी दे दी।
तेलंगाना (2025)
क्या हुआ: कॉन्ग्रेस सरकार ने सर्वे कराया, जिसमें BC (पिछड़ा वर्ग) 64.33%, SC 20.37%, ST 11.76%, और सामान्य वर्ग 23.52% पाए गए।
उददेश्य: स्थानीय स्तर पर आरक्षण और कल्याणकारी योजनाएँ। कॉन्ग्रेस यह दावा करती है कि यह सर्वे राष्ट्रीय जनगणना का मॉडल है।
प्रक्रिया: यह भी एक स्थानीय सर्वे था, जिसमें सीमित जानकारी इकट्ठी की गई। इसमें जनगणना की तरह व्यापक सवाल नहीं थे।
विवाद: कॉन्ग्रेस ने इसे केंद्र के खिलाफ प्रचार के तौर पर इस्तेमाल किया, जो गलत है।
क्यों गलत है तुलना?
राष्ट्रीय जनगणना पूरे देश के लिए होती है और इसका डेटा एकसमान होता है। सर्वे स्थानीय होते और उनके डेटा में एकरूपता नहीं होती।
जनगणना का मकसद नीति निर्माण है, जबकि सर्वे का मकसद स्थानीय जरूरतें। दोनों की प्रक्रिया और स्कूल अलग हैं।
कॉन्ग्रेस का यह दावा कि तेलंगाना का सर्व राष्ट्रीय जनगणना का मॉडल है, सिर्फ भ्रक्ति फैलाने की कोशिश है।
जनगणना का महत्व और प्रभाव
जनगणना 2027 न सिर्फ जातिगत आँकड़े देगी, बल्कि देश के विकास के लिए कई नीतियों को आकार देगी। इसके कुछ प्रमुख प्रभाव होंगे:
सामाजिक न्याय: जातिगत आँकड़ों से OBC, SC और ST की सही संख्या पता चलेगी। इससे आरक्षण, शिक्षा और रोजगार में उनके हक को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
यह डेटा सामाजिक असमानता को कम करने में मदद करेगा।
लोकसभा सीटों का पुनर्गठन: 2026 के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्गठन होगा। जनगणना का डेटा इसके लिए आधार होगा।
इससे जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व में बदलाव आएगा।
महिला आरक्षण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने में यह डेटा मदद करेगा।
नीतिगत फैसले: शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए सटीक डेटा मिलेगा।
इससे सरकारें बेहतर योजनाएँ बना सकेंगी।
आर्थिक नियोजन: जनगणना का डेटा GDP, गरीबी और बेरोजगारी जैसे आर्थिक संकेतकों को समझने में मदद करता है।
कॉन्ग्रेस का प्रचार क्यों गलत है?
जनगणना 2027 एक ऐतिहासिक कदम है, जो न सिर्फ देश की जनसंख्या का सही आँकड़ा देगा, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को भी बढ़ावा देगा। जातिगत गणना से OBC, SC और ST समुदायों की सही संख्या पता चलेगी, जिससे उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी। लेकिन कॉन्ग्रेस इस मुद्दे पर भ्रामक प्रचार कर रही है, ताकि वह SC, ST और OBC समुदायों के बीच भ्रम फैलाकर वोट हासिल कर सके।
कॉन्ग्रेस का यह दावा कि गजट नोटिफिकेशन में ‘जातिगत जनगणना’ का जिक्र नहीं है, पूरी तरह भ्रामक है। सरकार ने पहले ही 30 अप्रैल, 4 जून और 15 जून 2025 की प्रेस रिलीज में स्पष्ट कर दिया था कि जनगणना में जातिगत गणना होगी। गजट नोटिफिकेशन का काम सिर्फ जनगणना की घोषणा करना है, न कि सवालों की सूची देना। कॉन्ग्रेस इस तकनीकी बिंदु का फायदा उठाकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रही है।
इसके अलावा, कॉन्ग्रेस का तेलंगाना और बिहार के सर्वे को राष्ट्रीय जनगणना से जोड़ना भी गलत है। ये सर्वे स्थानीय स्तर के थे, जबकि जनगणना एक राष्ट्रीय प्रक्रिया है। कॉन्ग्रेस का यह प्रचार सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए है, ताकि वह SC, ST और OBC समुदायों के बीच भ्रम फैलाकर वोट हासिल कर सके।
जनगणना 2027 एक ऐतिहासिक कदम है, जो न सिर्फ देश की जनसंख्या का सही आँकड़ा देगा, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को भी बढ़ावा देगा। कॉन्ग्रेस को इस मुद्दे पर झूठ फैलाने की बजाय सरकार के साथ मिलकर इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने में योगदान देना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के रायपुर में अवैध तरीके से रह रहे बांग्लादेशी मियाँ-बीवी को गिरफ्तार किया है। उसको लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। मियाँ दिलावर खान 16 साल पहले भारत में अवैध तरीके से घुसा था। एक साल बाद उसने उसी तरह बॉर्डर पार करवाते हुए अपनी बीवी और बेटे को भारत में दाखिल करवा दिया। ये लोग रायपुर आकर रहने लगे। यहाँ इनके घर बेटी पैदा हुई।
₹1000 में बनाई मध्यप्रदेश बोर्ड की मार्कशीट
घुसपैठिए दिलावर खान के मुताबिक ₹1000 में मध्यप्रदेश बोर्ड की फर्जी मार्कशीट बनवाई। इसमें बोर्ड से जुड़े एक कर्मचारी ने मदद की। ये मार्कशीट मध्यप्रदेश के रीवा के त्योथर माध्यमिक स्कूल का है। वह किराए पर रहता था इस आधार पर किरायानामा बनवाया। इनके आधार पर पेन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट भी बनवाया। परिवार से दूसरे सदस्यों के पास भी सरकारी पहचान पत्र मौजूद हैं।
मलेशिया में बेटा के होने की बात कही
दिलावर की बीवी परवीन खान और बेटी को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। बेटी का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ था और वह नाबालिग है। दिलावर का कहना है कि उसका बेटा रायपुर में मेकेनिक का काम करता था। दिलावर ने जब उससे पैसे माँगे तो वह घर से अलग हो गया। कुछ दिनों बाद वह रायपुर छोड़कर चला गया। तीन साल पहले बेटे ने पुणे में होने की बात कही। पिछले साल उसने कहा कि उसका निकाह हो गया है और उसके ससुर ने उसे मलेशिया भिजवा दिया है। पुलिस उसके बेटे के बारे में पता कर रही है।
पुलिस का कहना है कि फर्जी दस्तावेज बनाने में जिन लोगों ने घुसपैठिए दिलावर खान और उसके परिवार की मदद की उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसमें मकान मालिक, दस्तावेज बनाने की अनुशंसा करने वाले लोग और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। उसकी मददगार के बारे में जानकारी सामने आयी है कि ये लोग रायपुर और रीवा में छिपे हो सकते हैं।
रायपुर में घुसपैठिए दिलावर और उसके परिवार ने 4 घर बदले हैं। उसने मजदूरी और फिर सड़क किनारे ठेला लगाया जिसपर अंडे और बिरयानी बेचे।
गैंगरेप का झूठा केस दर्ज करवाने वाली एक महिला को लखनऊ की एक अदालत ने 7.5 वर्ष की सजा सुनाई है और ₹2 लाख का जुर्माना ठोंका है। अदालत ने यह भी कहा है कि रेप मामले में मिलने वाला मुआवजा अब रिपोर्ट दर्ज होने पर नहीं बल्कि चार्जशीट दायर होने पर मिलेगा। झूठे मुकदमे में लोगों को फँसाने को लेकर यह एक बड़ा निर्णय माना जा रहा है।
लखनऊ में एक कोर्ट ने रेखा देवी नाम की एक महिला द्वारा दर्ज किए गए एक गैंगरेप और SC-ST एक्ट के एक मामले में यह निर्णय सुनाया है। कोर्ट को पता चला कि अपने विरोधियों को फँसाने के लिए रेखा देवी ने राजेश और भूपेंद्र नाम के दो लोगों के खिलाफ गैंगरेप का झूठा मुकदमा दर्ज करवाया गया था।
पुलिस जाँच में यह आरोप गलत साबित हुए थे। कोर्ट ने इस सुनवाई में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मिलने वाले मुआवजे के पैसे के चलते झूठे मुकदमे बढ़ रहे हैं। कोर्ट ने लखनऊ के डीएम को आदेश दिया है कि अब पैसे तभी मिले तो जा जब पुलिस अपनी जाँच पूरी करके चार्जशीट दाखिल करे।
कोर्ट ने रेखा देवी को 7.5 वर्षों की सजा सुनाने के साथ ही ₹2.10 लाख का जुर्माना भी ठोंका है। कोर्ट यह भी आदेश दिया है कि पर लगाए गए जुर्माने का आधा हिस्सा उन लोगों को दिया जाए, जिन्हें झूठे केस में फँसाया गया था। सुनवाई के दौरान मामले में फँसाए भूपेंद्र की मौत हो चुकी थी, इसलिए मुआवजे की राशि उनके परिवार को मिलेगी।
क्या है पूरा मामला?
बाराबंकी की रेखा देवी ने 29 जून 2021 को पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। रेखा देवी ने राजेश और भूपेंद्र नाम के दो लोगों पर उन्हें जान से मारने की धमकी देने और गैंगरेप करने का आरोप लगाया था।
यह घटना लखनऊ के बीकेटी थाने के इलाके की थी, इसलिए केस की जाँच वहीं भेज दी गई। रेखा देवी SC थीं इसलिए एक बड़े अधिकारी ने मामले की जाँच की। जाँच के दौरान सीओ को पता चला कि रेखा देवी ने झूठा केस दर्ज कराया था ताकि उन दोनों को फँसाया जा सके।
जाँच के बाद पुलिस ने राजेश और भूपेंद्र को बेकसूर बताया और रेखा देवी के खिलाफ झूठी शिकायत करने के लिए कार्रवाई करने की माँग की। कोर्ट ने इस फैसले से साफ कर दिया है कि अब कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
उत्तर प्रदेश की बरेली पुलिस ने मोहम्मद जैश रिजवी और मोहम्मद शानू को गिरफ्तार किया है। ये लोग ‘हैदरी दल’ नाम के एक कट्टरपंथी समूह के मेंबर है, जो मुस्लिम लड़कियों के साथ बदसलूकी करते थे और बुर्के के साथ छेड़छाड़ करते थे।
पुलिस जाँच में पता चला है कि मोहम्मद जैश रिजवी और मोहम्मद शानू ने इंस्टाग्राम पर ‘हैदरी दल बरेली’ के नाम से एक पेज बनाया था। पेज पर महिलाओं की बदसलूकी वाली और निजता भंग करने वाली वीडियो और फोटो अपलोड करते थे। इसके अलावा ये दोनों ऑनलाइन बैंक अकाउंट और QR कोड के जरिए फंड इकट्ठा करते थे।
दिनांक 07.06.2025 को गाँधी उद्यान में कुछ युवकों द्वारा युवतियों की निजता भंग कर वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपलोड करने पर तत्समय अभियोग पंजीकरण के बाद कृत कार्यवाही के सम्बन्ध में सी0ओ0 नगर प्रथम श्री आशुतोष शिवम की बाइट#UPPolicehttps://t.co/xFige8xxtBpic.twitter.com/99U6H5MYDd
पुलिस ने इस मामले में पहले भी कार्रवाई करते हुए शहबाज रजा उर्फ सूफियान और समीर रजा को गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
पूरा मामला क्या है?
बरेली और उत्तर भारत के कई शहरों में ‘हैदरी दल’ नाम का एक ग्रुप एक्टिव है। ये लोग खुद को इस्लाम और ‘बुर्का’ का रखवाला बताते हैं। इनका मुख्य काम मुस्लिम लड़कियों को गैर-मुस्लिम लड़कों के साथ देखने पर धमकाना और परेशान करना है।
ये ग्रुप ऐसी लड़कियों और लड़कों के वीडियो बनाता है, जिनमें उनकी निजी जानकारी (नाम, पता) उजागर की जाती है। ये वीडियो सोशल मीडिया पर डाले जाते हैं। कुछ वीडियो में ये सदस्य मुस्लिम लड़कियों से बदसलूकी करते हुए ‘घर पर कोई नहीं है तो अय्याशी करोगी?’ जैसी बातें कहते थे, और उनसे व उनके साथ मौजूद लड़कों से सारी जानकारी माँगते और वायरल करते थे।
ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के गिरोहों द्वारा यौन शोषण के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले ब्रिटेन के रॉदरहैम बाल यौन शोषण के 64% मामलों के लिए 4% पाकिस्तानी जिम्मेदार हैं। फिर भी इसमें ‘पाकिस्तानी मुसलमानों’ का नाम नहीं है। बल्कि आरोपितों को ‘एशियाई’ कहा जा रहा है।
‘बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार’ पर राष्ट्रीय लेखा परीक्षक ने ब्रिटेन के ‘ग्रूमिंग गिरोह’ को लेकर कई खुलासे किए हैं। ब्रिटेन की गृह सचिव एयवेटे कूपर ने संसद को बैरोनेस लुईस की रिपोर्ट की जानकारी दी। 197 पेज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘अज्ञानता और पूर्वाग्रह की संस्कृति’ की वजह से ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा नाबालिगों के यौन शोषण के मामलों की जाँच ठीक से नहीं हो पाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन ग्रूमिंग गिरोहों में से अधिकांश पाकिस्तानी और ‘एशियाई’ पुरुष थे।
गौरतलब है कि ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों के नेतृत्व वाले ग्रूमिंग गिरोहों के हाथों बाल यौन शोषण का मुद्दा वर्षों से ब्रिटेन की एक ‘गंभीर समस्या’ रही है। 90 के दशक में करीब 11 साल की बच्चियों को ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा उठाया गया। उसका चालीस सालों तक रेप किया गया। बच्चियों को पीटा गया, बेचा गया और यहाँ तक कि मार भी दिया गया। अकेले रॉदरहैम में ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों ने पिछले 16 वर्षों में 1,400 मासूमों को अपने हवस का शिकार बनाया।
रिपोर्ट की प्रस्तावना में ही लेडी केसी ने ‘समूह-आधारित बाल यौन शोषण’ शब्दों का इस्तेमाल कई बार कई पुरुषों द्वारा बच्चों के खिलाफ किए गए यौन शोषण से जुड़े अपराध के लिए किया है। इसमें बच्चियों के साथ किए गए बदसलूकी, जबरन गर्भपात, यौन संक्रमित बीमारियाँ और बच्चे के पैदा होने पर उन्हें माँ से अलग कर देने का जिक्र है।
अपराध और सोशल मीडिया का बाल यौन शोषण में इस्तेमाल
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि हर साल 500,000 से ज़्यादा बच्चे यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं। पुलिस ने 2024 में लगभग 100,000 अपराध दर्ज किए हैं। इनमें से करीब 17,100 बाल यौन शोषण से जुड़े थे। हालाँकि पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग का द्वारा अपराध का आँकड़ा मात्र 700 बताया गया है। लेडी केसी ने कहा कि यह ‘बेहद असंभव’ है।
यू.के. में ग्रूमिंग गैंग के अपराधों की प्रकृति के बारे में रिपोर्ट कहती है, “ऐसे मामलों में अक्सर बदमाश एक कमजोर बच्ची को अपना निशाना बनाता है। गरीब, नौकर या शारीरिक रूप से अक्षम बच्चियाँ। इन बच्चों को ये बताया जाता है कि ये उनके ‘बॉयफ्रेंड’ हैं। उन्हें प्यार और उपहार दिए जाते हैं। घूमाने के लिए बाहर ले जाते हैं। इसके बाद उन्हें सेक्स के लिए दूसरे पुरुषों को देते हैं। बच्चे को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स और अल्कोहल दिया जाता है और उनके साथ हिंसा और जबरदस्ती भी किया जाता है।”
रिपोर्ट में कहा गया है, “समय के साथ इस मॉडल में कोई खास बदलाव नहीं आया है, हालाँकि अब ग्रूमिंग गैंग ऑनलाइन भी काम कर रहे हैं, और हॉटस्पॉट्स भी बदल रहे हैं।” ‘समूह-आधारित बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार’ पर राष्ट्रीय ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि ये ग्रूमिंग गिरोह अक्सर सामाजिक संबंधों के आधार पर आपस में जुड़े होते हैं और इसलिए अक्सर उम्र, जातीय पृष्ठभूमि और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में मोटे तौर पर एक जैसे होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “समूह में काम करने से अपराधियों पर इस खौफनाक करतूतों का कोई असर नहीं पड़ता है। महिलाओं के प्रति घृणा और असम्मान की स्थिति की वजह से ये पीड़िताओं की अनदेखी करते है।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन यौन शोषण अपराध की वृद्धि से सामान्य रूप से बाल यौन शोषण की प्रकृति बदल गई है, जो अब सभी यौन शोषण अपराधों का 40% है।
खौफनाक आँकड़े
यू.के. के राष्ट्रीय पुलिस डेटा से पता चलता है कि 2023 में 78% बाल यौन शोषण की शिकार लड़कियाँ थी, जिनकी आयु 10 से 15 वर्ष के बीच थी। रिपोर्ट में लिखा गया है, “डेटा से पता चलता है कि अपराधियों की आयु अलग-अलग है, 2023 में 39% संदिग्ध 10 से 15 वर्ष की आयु के थे और 18% 18 से 29 वर्ष की आयु के थे। संदिग्धों की कम आयु बाल अपराध की रिपोर्टिंग में वृद्धि और ऑनलाइन गिरोह के काम करने की वजह से है। समूह-आधारित बाल यौन शोषण के पीड़ितों और अपराधियों के लिए एकत्र किया गया जातीय डेटा राष्ट्रीय स्तर पर कोई निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है,”
रिपोर्ट में बताया गया है कि दुर्व्यवहार के पैटर्न में बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन सोशल मीडिया की वजह से बच्चियों से संपर्क करने के तरीकों में थोड़ा बदलाव आया है। जहाँ पहले पीड़िता के साथ शुरुआती संपर्क शॉपिंग सेंटर, पार्क में शुरू होता था, वहीं आज संपर्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए हो रहा है। रिपोर्ट कहती है कि ग्रूमिंग और शोषण के लिए स्थान भले ही बदल गए हों, लेकिन मॉडल समान है। बार-बार लापता होना, शोषण के लिए बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, उन्हें ‘आज्ञाकारी’ बनाने के लिए ड्रग्स और शराब का इस्तेमाल, होटलों में गुमनाम चेक इन और चेक आउट करना और बच्चों को आकर्षित करने वाले हॉट स्पॉट जैसे कि वेप शॉप ले जाना शामिल है।
अपराधी यौन शोषण के लिए पीड़िताओं की अश्लील तस्वीरों का इस्तेमाल करते हैं। ग्रूमिंग गिरोह नाबालिग लड़कियों को अपनी तस्वीरें साझा करने के लिए लुभाते हैं और फिर उन तस्वीरों का इस्तेमाल करके उन्हें ब्लैकमेल करते हैं और उन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की धमकी देते हैं। इस तरीके से पीड़िताओं को और अधिक यौन शोषण सहने के लिए मजबूर किया जाता है और यह कई सालों तक चलता रहता है।
रिपोर्ट में बच्चियों की अश्लील तस्वीरें लेने के अपराधों (IIOC) में वृद्धि का भी जिक्र किया गया है। दिसंबर 2014 में ऐसे मामले 4,261 थे जो दिसंबर 2024 में 41,033 हो गए यानी पिछले 10 सालों में ऐसे अपराधों में 863% की वृद्धि हुई है। यह पाया गया कि इनमें से ज़्यादातर अपराध सोशल मीडिया पर होते हैं।
ग्रूमिंग गिरोहों की और जानकारी देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, ” कई मामलों में उन्होंने जाँच की, जिसमें अपराधी और पीड़िता अलग-अलग समुदायों से आए थे। अपराधियों द्वारा ऐसी बच्चियों के प्रति क्रूरता ज्यादा दिखी।”
हालाँकि 2020 के गृह मंत्रालय के रिपोर्ट में समुदाय के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन इससे साफ होता है कि मुस्लिम बलात्कार गिरोह यानी ग्रूमिंग गैंग, जिनमें से ज्यादातर पाकिस्तानी मूल के हैं, गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा रखते हैं और गैर-मुस्लिम महिलाओं का यौन शोषण करके धार्मिक प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं। यह विकृत मानसिकता इन अपराधों के पीछे अहम वजह है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि “ऑपरेशन स्टोववुड का मानना है कि रॉदरहैम में लगभग दो-तिहाई अपराधी पाकिस्तानी पृष्ठभूमि से थे, और अधिकांश लड़कियाँ श्वेत थीं।” रॉदरहैम में बाल यौन शोषण के 64 प्रतिशत मामलों के लिए पाकिस्तानी पुरुष जिम्मेदार हैं।
इसके अलावा, ऑपरेशन स्टोववुड के तहत बाल यौन शोषण अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए कुल 42 अपराधियों में से 62 प्रतिशत पाकिस्तानी पुरुष थे।
ब्रिटेन के अधिकारी जिहादियों का धर्म बताने से कतराते हैं। ऑडिट में पाया गया कि अधिकारियों ने जानबूझकर अपराधियों की धर्म- जाति दर्ज करने से परहेज किया। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमने पाया कि अपराधियों की धर्म और जाति बताने से कतराया जाता है और दो तिहाई अपराधियों की जाति अभी भी दर्ज नहीं की गई है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एकत्र किए गए डेटा से कोई सटीक आकलन देने में हम असमर्थ हैं।” रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि सीमित डेटा के बावजूद यह पाया गया कि अधिकांश अपराधी एशियाई जातीय पृष्ठभूमि के थे।
रिपोर्ट में पाया गया कि यू.के. के अधिकारी बाल यौन शोषण के मामलों में सटीक डेटा बेस तैयार करने और गंभीर केस की समीक्षा करने में विफल रहे हैं, अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर की बात है।
इसमें कहा गया है कि अभियोजन पर आपराधिक न्याय डेटा में वृद्धि देखी गई, लेकिन इसने बाल यौन शोषण के विभिन्न रूपों या समूहों में काम करने वाले अपराधियों के बीच अंतर नहीं किया गया। केसी रिपोर्ट ने इसे “सामूहिक विफलता” करार दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एशियाई या पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों को तैयार करने और उनका यौन शोषण करने के बारे में कई रिपोर्ट, समीक्षा सामने आई है। फिर भी सिस्टम “लगातार इसे पूरी तरह से स्वीकार करने या सटीक डेटा एकत्र करने में विफल रहा है ताकि इसकी प्रभावी रूप से जाँच की जा सके।” रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘एशियाई ग्रूमिंग गिरोहों’ के बारे में दावों को खारिज करने के लिए बार-बार त्रुटिपूर्ण डेटा का इस्तेमाल किया जाता है। ये पीड़िताओं के लिए नुकसानदेह है, साथ ही यूके में कानून का पालन करने वाले एशियाई समुदायों के लिए भी नुकसानदेह है।
हालाँकि यूनाइटेड किंगडम ने आखिरकार ग्रूमिंग गिरोह के सदस्यों के पाकिस्तानी मूल के होने की बात कबूल कर ली है। अपराधियों की जाति के बारे में जाँच कर रहा है, लेकिन देश अभी भी खतरे को भाँप नहीं पाया है। यह जाति की समस्या नहीं है, यह धार्मिक रूप से प्रेरित विकृति मानसिकता की समस्या है। इस विकृति को बढ़ावा देने में न केवल पुलिस ने मदद की है, बल्कि राजनेताओं ने भी हर संभव कोशिश की कि इन पाकिस्तानियों ‘बलात्कारी जिहादी’ न बोला जाए। उनकी धार्मिक कट्टरता की कभी निंदा न की जाए। ये लोग मुस्लिम ग्रूमिंग गिरोहों के खिलाफ़ कार्रवाई करके ‘नस्लवादी’ कहलाने से बचना चाहते हैं।
यह याद रखना चाहिए कि 2019 में यूके की सत्ताधारी लेबर पार्टी ने इस्लामोफोबिया की ऑल-पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप ऑन ब्रिटिश मुस्लिम्स (APPG) परिभाषा को अपनाया था। इसके मुताबिक पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गिरोहों/बलात्कार गिरोहों की आलोचना करना मुसलमानों के खिलाफ़ ‘नस्लवादी’ है।
ब्रिटिश समाज की नजर में पीड़िता ही दोषी- ठहराने की शर्मनाक प्रवृत्ति पर प्रकाश डालती है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “नस्लीय मुद्दों से बचने के अलावा, हम समाज में टीनएज लड़कियों के प्रति एक अस्पष्ट रवैया भी बनाए रखते हैं। हम अक्सर उन्हें वयस्कों (तथाकथित ‘वयस्कीकरण’) के रूप में आँकते हैं। खासकर असहाय लड़कियों को, जिन्हें अक्सर समय से पहले ‘बड़ा होने’ के लिए मजबूर किया जाता है। वे अपने खुद के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के लिए दोषी करार दिए जाते हैं।”
इसमें आगे कहा गया है, ” अज्ञानता, पूर्वाग्रह और गलत इरादे अपराधियों को सजा दिलाने, उन पर मुकदमा चलाने और बच्चों को नुकसान से बचाने में मददगार साबित होते हैं।” रिपोर्ट में आगे पाया गया कि बाल यौन शोषण के कई मामलों को बलात्कार से हटा दिया गया और कम अपराध वाले श्रेणी में बदल दिया गया। यहाँ तक कि 13 से 15 साल की उम्र के बच्चे को अपराधी के साथ ‘प्रेम में’ या ‘सहमति’ के साथ सेक्स के रूप में लिया गया। केसी रिपोर्ट ने सहमति की उम्र और बाल यौन शोषण के मामलों से निपटने के लिए पुलिस के दृष्टिकोण के बारे में कई सिफारिशें कीं। केसी की रिपोर्ट ने ग्रूमिंग गिरोहों की राष्ट्रीय जाँच को प्रेरित किया है। हालाँकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ब्रिटिश पीएम कीर स्टारमर ने इस साल की शुरुआत में बाल यौन शोषण को लेकर राष्ट्रीय जाँच की मांगों को खारिज कर दिया था।
केसी ने 1990 के दशक के पुलिस डेटा का हवाला देते हुए बताया कि 10 से 18 साल की उम्र के 4,000 से ज़्यादा बच्चों को वेश्यावृत्ति से जुड़े अपराध में शामिल थे। 2015 में गंभीर अपराध अधिनियम में संशोधन के बाद “बाल वेश्यावृत्ति” शब्द को हटाया गया और उसकी जगह “बाल यौन शोषण” शब्द को लाया गया।
ग्रूमिंग गिरोहों को हमेशा बचाने की कोशिश की गई
जाहिर है, इस्लामोफोबिक और नस्लीय रूप से असंवेदनशील दिखने के डर ने ब्रिटेन के अधिकारियों को वर्षों तक पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमर्स/बलात्कारियों के खिलाफ प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने से रोका है। यूनाइटेड किंगडम के मुस्लिम-तुष्टीकरण करने वाले राजनीतिक दलों ने यह भी सुनिश्चित किया कि मुस्लिम समुदाय की आलोचना न की जाए। हालाँकि इस समुदाय के सदस्य विशेष रूप से पाकिस्तानी मूल के लोग, श्वेत और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों का यौन शोषण करते रहे।
हमें याद रखना चाहिए कि लेबर पार्टी की सांसद सारा चैंपियन को 2017 में द सन में प्रकाशित एक लेख के लिए माफी माँगनी पड़ी थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि “ब्रिटेन को ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों का बलात्कार और शोषण करने की समस्या है”। उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में रिपोर्ट किए जा रहे बाल यौन शोषण में “मुख्य रूप से पाकिस्तानी पुरुष” शामिल हैं, उन्होंने कहा कि ‘नस्लवादी’ लेबल से बचने की प्रवृति अधिकारियों को जाँच करने से रोकती है।
2012 में, लेबर पार्टी के नेता और गृह मामलों की चयन समिति के अध्यक्ष कीथ वाज़ ने ग्रूमिंग जिहाद अपराधों को कम करके आँका और कहा कि वे नस्लीय रूप से प्रेरित नहीं हैं। उन्होने इस बात पर जोर दिया कि पूरे समुदाय को ‘कलंकित’ नहीं किया जाना चाहिए। ग्रूमिंग गिरोह के सदस्यों की पहचान उजागर न करने पर लेबर पार्टी का शुरू से जोर रहा है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति को दर्शाता है। 2011 में, पूर्व गृह सचिव जैक स्ट्रॉ ने पाकिस्तानी पुरुषों की सांस्कृतिक प्रथाओं को श्वेत लड़कियों के खिलाफ़ उनके अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी पुरुष श्वेत लड़कियों को “आसान शिकार” के रूप में देखते हैं। नॉटिंघम क्राउन कोर्ट के न्यायाधीश ने दो पाकिस्तानी व्यक्तियों को कई नाबालिग श्वेत लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनके साथ बलात्कार करने का दोषी ठहराया। हालाँकि अपराधियों की पहचान को कम आंका गया।
गलत सहानुभूति, नस्लीय भेदभाव, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के नाम पर यूनाइटेड किंगडम के नेता और पुलिस पाकिस्तानी पुरुषों को देश में लगभग चार दशकों तक कमज़ोर लड़कियों का बलात्कार करने और उनका शोषण करने से नहीं रोका और जवाबदेही से बचते रहे।
उपहार, ध्यान, प्यार का भ्रम, ड्रग्स, यौन शोषण और हिंसा: बलात्कार जिहादियों ने अपने गैर-मुस्लिम लक्ष्यों को कैसे ‘तैयार’ किया
बलात्कार जिहादी यानी ग्रूमिंग गैंग पहले लड़कियों पर पूरा नियंत्रण करते हैं। “इसकी शुरुआत किसी लड़की को बहुत से गिफ्ट देने, बॉयफ्रेंड बनने का झाँसा देकर उनके साथ अच्छा व्यवहार करना, उन पर ध्यान देना, उनके साथ रहस्य साझा करना हो सकता है। इस तरह वे बच्चों को दोस्तों और परिवार से अलग कर देते हैं। इससे बच्चियों को अपने दुर्व्यवहार करने वाले पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, जिसे वे अपना ‘बॉयफ्रेंड’ मान सकते हैं। निर्भरता बढ़ाने और एक या अधिक पुरुषों के साथ सेक्स के बदले में ड्रग्स और शराब की पेशकश की जा सकती है। पीड़ितों के विरोध करने पर हिंसा और जबरदस्ती किया जाता है।
रिपोर्ट में 2010 में डर्बीशायर में 10 ब्रिटिश पाकिस्तानी और 1 श्वेत ब्रिटिश व्यक्ति को 26 लड़कियों को ‘इसी तरह तैयार करने’ और उनका यौन शोषण करने पर दोषी ठहराया गया। रॉदरहैम में 5 ‘एशियाई’ पुरुषों को दोषी ठहराया गया जो ग्रूमिंग गिरोह से जुड़े थे और पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम थे। इसी तरह रोशडेल में 2012 में नौ ‘एशियाई’ पुरुषों को सजा दी गई।
केसी रिपोर्ट ने अपराधियों की पाकिस्तानी मूल के होने का उल्लेख बहुत कम है, ऑपइंडिया ने विस्तार से बताया है कि कैसे ये ग्रूमिंग गिरोह मूल रूप से पाकिस्तानी मुसलमानों के समूह थे जो विशेष रूप से श्वेत और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों को निशाना बनाते थे।
रिपोर्ट में ऑक्सफोर्डशायर और नॉर्थम्ब्रिया के 2013 के मामलों का भी उल्लेख है। इनमें अपराधी ज्यादातर पाकिस्तानी, अल्बानियाई, कुर्द, बांग्लादेशी, तुर्की, ईरानी, इराकी, पूर्वी यूरोपीय थे। इनकी आयु 27 से 44 वर्ष के बीच थी, जबकि पीड़ितों की आयु 13 से 25 वर्ष के बीच थी।
2015 में बर्मिंघम मेल में एक खबर वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस के हवाले से की गई। इसमें रॉदरहैम में उन लोगों के साथ सड़क पर और ऑनलाइन ग्रूमिंग गिरोहों की कार्यप्रणाली में समानताओं का विवरण दिया गया था।
2015 की रिपोर्ट में पाया गया कि पहचाने गए 75 ग्रूमिंग संदिग्धों में से एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी जातीय पृष्ठभूमि (62%) से है, 12% श्वेत हैं और 5% अफ्रीकी कैरिबियन हैं।
केसी रिपोर्ट ने ये बात भी कही गई है कि स्थानीय पुलिस को कई वर्षों से ठीक-ठीक पता था कि क्या हो रहा है? लेकिन पुलिस को पाकिस्तानी पुरुषों से संबंधों के कारण समुदाय में तनाव की चिंता थी। केसी रिपोर्ट में ऑपरेशन टेंडरसी, ऑपरेशन लेंटेन, ऑपरेशन सैंक्चुअरी, ऑपरेशन शेल्टर, ब्रैडफोर्ड और कीघली के मामलों का उल्लेख है, जिसमें अधिकांश अपराधी पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, तुर्की और अल्बानियाई मूल के पाए गए, जो मूल रूप से मुस्लिम थे। हालाँकि कुछ मामलों में अपराधी श्वेत पृष्ठभूमि के भी थे।
पुलिस की मिलीभगत और पीड़ित परिवारों पर ही कार्रवाई
1980 के दशक में टेलफ़ोर्ड शहर में 11 साल की कम उम्र की कमज़ोर लड़कियों को ग्रूमिंग गिरोहों या बलात्कार गिरोहों द्वारा पूरे चालीस साल तक उठाया गया, बलात्कार किया गया, पीटा गया, बेचा गया और यहाँ तक कि मार भी दिया गया। इनमें ज्यादातर श्वेत लड़कियाँ थी। इन्हें एक बलात्कारी से दूसरे बलात्कारी के पास भेजा जाता था। ये लोग ज़्यादातर ब्रिटिश पाकिस्तानी मूल के थे। इस दौरान तीन लड़कियों की हत्या कर दी गई और दो की मौत हो गई। 170,000 की आबादी वाले शहर में 1,000 से ज़्यादा लड़कियों को पीड़ित होना पड़ा। टेलफ़ोर्ड शहर में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गिरोह सचमुच एक ‘रेप सेंटर’ चला रहे थे। हालाँकि पीड़ितों को शराब, सिगरेट खरीदकर, उनके मोबाइल टॉप-अप करके, उपहार खरीदकर उन्हें यह विश्वास दिलाते थे कि वे प्यार में हैं।
रॉदरहैम में भी इसी तरह का एक रैकेट चल रहा था, जिसमें 260,000 की आबादी वाले शहर में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों द्वारा लगभग 1,500 लड़कियों का बलात्कार किया गया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें बेचा गया और खरीदा गया। कई पीड़ितों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और 1997 से 2013 तक यह दुर्व्यवहार बेरोकटोक चलता रहा। रोशडेल में ये मामला 2002 में सामने आया। यहाँ कम से कम 47 युवा लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके बाद ये प्रतिक्रिया आ रही है कि ग्रूमिंग गिरोह “ग्रेट ब्रिटेन” की सड़कों पर खुलेआम घूमते रहते हैं।
हडर्सफ़ील्ड, रॉदरहैम, रोशडेल, ऑक्सफ़ोर्ड, ब्रिस्टल, पीटरबोरो और न्यूकैसल सहित यू.के. में कई स्थानों पर यौन शोषण के घोटाले व्यापक रूप से उजागर हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इंग्लैंड में लगभग 19,000 बच्चियों का यौन शोषण किया गया।
ये ‘ग्रूमिंग’ अपराध यूनाइटेड किंगडम को परेशान करना जारी रखते हैं क्योंकि नेशनल सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएल्टी टू चिल्ड्रन (NSPCC) ने 2023 में रिपोर्ट की थी कि पिछले पाँच वर्षों में युवाओं के खिलाफ़ ऑनलाइन ग्रूमिंग अपराधों में 82% की वृद्धि हुई है।
पाकिस्तानी मूल के पुरुषों द्वारा संचालित ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा कमजोर श्वेत और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ बलात्कार करने का मुद्दा सबसे पहले रॉदरहैम, रोशडेल और टेलफ़ोर्ड जैसे शहरों में सामने आया। रॉदरहैम पर 2014 की जे रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 1,400 बच्चों का 16 वर्षों में यौन शोषण किया गया। शोषण करने वाले अधिकांश पाकिस्तानी मूल के पुरुष थे।
कई मामलों में, बलात्कारियों को गिरफ्तार करने के बजाय, पुलिस ने पीड़ितों और उनके परिवारों को ही गिरफ्तार कर लिया। यह आमतौर पर स्थिति को ‘गलत तरीके से समझने’, ग्रूमिंग वाले हिस्से की जाँच करने में विफलता और ज़्यादातर मामलों में जानबूझकर मामले को छिपाने के कारण होता है। ऐसे मामलों में पीड़ितों को अपराधी माना जाता है।
कई सालों तक, यू.के. में ग्रूमिंग गिरोहों को मीडिया और इस्लाम समर्थक राजनेताओं द्वारा “एशियाई” या “दक्षिण एशियाई ग्रूमिंग गिरोह” बताकर बचाया जाता रहा। हालाँकि लुईस केसी की ऑडिट रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि ग्रूमिंग गिरोहों में ज्यादातर पाकिस्तानी मुसलमान शामिल हैं।