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कॉन्ग्रेस की लगाई इमरजेंसी में बलिदान हो गए DMK के चिट्टीबाबू, स्टालिन को बचाने के लिए दे दी जान: आज वही तमिलनाडु CM हैं गाँधी परिवार के ‘वफादार’

भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय यानी आपातकाल को 50 वर्ष रहे हैं। 25 जून 1975 देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने यह कदम तब उठाया था, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी गड़बड़ियों के चलते उनके निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया।

प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की जिद में इंदिरा गाँधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 का इस्तेमाल करते हुए देश में आपातकाल लागू किया। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देते हुए इसकी मंजूरी भी दी। यह आपातकाल कुल 21 महीनों तक चला।

इस दौरान देश में नागरिको के मौलिक अधिकार छीन लिए गए, प्रेस की आज़ादी खत्म कर दी गई, अदालतों की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई और पूरे देश भर में हजारों लोगों को जेल में ठूंस दिया गया। उन्हें आरोप भी नहीं बताए गए।

इस दौरान विपक्षी नेताओं जैसे कि अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे को भी जेल में बंद कर यातनाएँ दी गईं। संजय गाँधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया, जिसमें महिलाओ को प्रसव के दौरान जंजीरों में बाँधा गया और लोगों को बलपूर्वक नसबंदी के लिए मजबूर किया गया।

यह दौर भारत में लोकतंत्र के दमन और सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बन गया। आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के करीबी लोग, जैसे संजय गाँधी, कमल नाथ और अंबिका सोनी, बहुत ताकतवर हो गए थे। इनका असर सांसदों से भी ज्यादा था।

संसद इस दौरान सिर्फ़ एक मुहर लगाने वाली संस्था बनकर रह गई थी। मीडिया की आज़ादी पूरी तरह से छीन ली गई थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इस दौर को याद करते हुए कहा था, “मीडिया से झुकने को कहा गया, लेकिन उसने रेंगना चुना।”

पुलिस ने आम लोगों पर इतनी बर्बरता की कि कई लोग जिंदगी भर के लिए अपंग हो गए। देश में ऐसा माहौल बन गया था कि सरकार की नीतियों का विरोध करना अपराध मान लिया जाता था। हर किसी से उम्मीद की जाती थी कि वे सत्ताधारी पार्टी के प्रति वफादार रहें। इस तरह भारत धीरे-धीरे एक पुलिस राज्य बन गया, जहाँ डर और दमन का राज था।

कॉन्ग्रेस के प्रताड़ित ही बाद में राजनीतिक फायदे के लिए बने सहयोगी

50 साल बीत जाने के बाद भी, जहाँ-जहाँ कॉन्ग्रेस  की सरकार है, वहाँ तानाशाही जैसा रवैया अब भी देखने को मिलता है। इसका ताजा उदाहरण कर्नाटक में देखने को मिला, जहाँ कॉन्ग्रेस सरकार ने हिंदू कार्यकर्ता चक्रवर्ती सुलीबेले  को कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक आयोग  की सिफारिशों के आधार पर निशाना बनाया।

पुलिस विभाग के डीजी और आईजीपी कार्यालय ने सभी थानों से उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जानकारी माँगी है। एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सुलीबेले ने आरोप लगाया कि सरकार ये सब आरसीबी (रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर) के एक कार्यक्रम में भगदड़ की घटना से जनता का ध्यान हटाने के लिए कर रही है।

एक और उदाहरण मध्य प्रदेश का है, जहाँ कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह को पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया गया, क्योंकि उन्होंने राहुल गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा की सार्वजनिक आलोचना की थी। इससे साफ होता है कि कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में आज भी असहमति को दबाने और विरोध की आवाज को कुचलने की प्रवृत्ति जारी है।

आपातकाल के दौरान कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया और उन पर अत्याचार किए गए। ऐसा ही एक उदाहरण राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का है। उन्हें तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मीसा कानून  के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था।

जेल में उनके साथ जो बुरा सलूक हुआ, वह उनके लिए इतना दर्दनाक था कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम ही मीसा भारती रख दिया, ताकि वह उस दौर को कभी न भूलें। हालाँकि, अब हालात बदल गए हैं। राजद और कॉन्ग्रेस आज एक साथ हैं।

सितंबर 2023 में राहुल गाँधी खुद लालू यादव के घर गए थे, जहाँ लालू ने उन्हें अपने हाथों से बना मटन खिलाया था। यह दिखाता है कि राजनीति में पुराने विरोध भी समय के साथ बदल सकते हैं।

चोकालिंगा चिट्टीबाबू: DMK नेता जिसको स्टालिन को बचाने पर मिली यातनाएँ

लालू प्रसाद यादव अकेले ऐसे नेता नहीं थे जिन्हें आपातकाल के दौरान कॉन्ग्रेस सरकार ने जेल में डाला था, लेकिन आज वे राजनीतिक फायदा उठाने के लिए कॉन्ग्रेस के साथ खड़े हैं। ऐसा ही एक उदाहरण DMK प्रमुख और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री MK स्टालिन का भी है।

स्टालिन का जन्म 1 मार्च 1953 को हुआ था और जब उन्हें 1976 में गिरफ्तार किया गया, तब वे सिर्फ 23 साल के थे। अपनी आत्मकथा ‘उंगलिल ओरुवन’ (आप में से एक) में उन्होंने जेल के उस समय को ‘यातना शिविर’ कहा है।

उनके पिता 31 जनवरी 1976 को करुणानिधि की अगुवाई वाली DMK सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। कुछ ही घंटों बाद, पुलिस स्टालिन को गिरफ्तार करने उनके घर गोपालपुरम पहुँची, लेकिन उस वक्त वे पास के शहर माथुरन्थकम में थे।

आज भले ही स्टालिन और उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस के साथ खड़ी हो, लेकिन आपातकाल के समय कॉन्ग्रेस के हाथों उन्हें भी गिरफ्तारी और अत्याचार झेलना पड़ा था। जब पुलिस करुणानिधि के घर पहुँची, तो अधिकारियो ने कहा कि वे यह देखने के लिए तलाशी लेना चाहते हैं कि स्टालिन वहाँ छिपे हुए तो नहीं हैं।

करुणानिधि ने तलाशी का विरोध नहीं किया और पुलिस को बताया कि  स्टालिन अगली सुबह लौट आएँगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जरूरत हो तो स्टालिन की जगह उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए। जब स्टालिन 1 फरवरी 1976 को घर लौटे, तो उन्होंने अपनी माँ दयालु अम्माल और पत्नी दुर्गा को रोते हुए देखा।

उनके पिता करुणानिधि ने उन्हें समझाया कि पुलिस उनकी तलाश कर रही है और राजनीति में आने वालों को बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके बाद करुणानिधि ने खुद पुलिस को बताया कि स्टालिन लौट आया है और कहा कि उसे गिरफ्तार कर लें।

पुलिस ने स्टालिन को मीसा कानून (MISA – आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत गिरफ्तार कर लिया। इस घटना से हमे समझा आता है कि आपातकाल के समय कॉन्ग्रेस सरकार ने विपक्षी नेताओं और उनके परिवारों को किस तरह से निशाना बनाया था।

आपातकाल के दौरान जेल में रहना अपने आप में बहुत कठिन और डरावना था। पुलिस की बर्बरता  इतनी ज्यादा थी कि इससे किसी की भी हिम्मत टूट सकती थी। उस समय MK स्टालिन भी जेल में थे और उनकी हालत बहुत खराब थी। लेकिन उनकी DMK पार्टी के साथी नेताओं ने उन्हें संभाला और बचाया।

चोकलिंगा चिट्टीबाबू, जो DMK नेता और लोकसभा सांसद थे, उन्होंने स्टालिन को पुलिस की मार से बचाते हुए अपनी जान तक गँवा दी। स्टालिन ने 2009  में अपने परिवार के साथ जब जेल का दौरा किया, तो उन्होंने इस दर्दनाक घटना को याद किया। उन्होंने बताया कि चिट्टीबाबू ने उन्हें बचाने के लिए पुलिस की बर्बरता झेली और इसी कारण उनकी मौत हो गई।

करुणानिधि का मानना था कि जेल में जो अत्याचार स्टालिन ने देखे और झेले, वही उन्हें राजनीति में लाने का कारण बने। स्टालिन ने जुलाई 2019 में एक शादी समारोह के दौरान बताया कि कैसे अर्काट एन वीरासामी और चिट्टीबाबू  की मजबूत मौजूदगी और नैतिक साहस ने उन्हें जेल में जिंदा रहने में मदद की।

चिट्टीबाबू, जिन्हें ‘मेयर चिट्टीबाबू’ के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने 1967 और 1971 में लोकसभा चुनाव जीते थे। उनका जन्म 4 जनवरी 1937 को हुआ था। 1976 में आपातकाल के  दौरान मीसा (MISA) कानून के तहत उन्हें भी गिरफ्तार किया गया था।

स्टालिन ने मई 2023 में चिट्टीबाबू  के सम्मान में एक पुल का नामकरण किया और उनके बलिदान को याद करते हुए गहरा आभार व्यक्त किया। चिट्टीबाबू की कुर्बानी आज भी याद की जाती है, क्योंकि उन्होंने स्टालिन की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी।

DMK ने उसी कॉन्ग्रेस के साथ मिलाया हाथ

आपातकाल लगे हुए अब 50 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके ज़ख्म आज भी भारतीय लोकतंत्र में ताज़ा हैं। इस काले दौर की एक दर्दनाक याद DMK नेता और पूर्व सांसद चोकलिंगा चिट्टीबाबू की मौत है। उन्होंने युवा MK स्टालिन को पुलिस की बर्बरता से बचाते हुए गंभीर चोटें खाईं, जिससे उनकी मौत हो गई।

उनकी मौत कोई हादसा नहीं थी, बल्कि कॉन्ग्रेस सरकार की तानाशाही का नतीजा थी। यह दुख की बात है कि आज वही DMK, जिसकी सरकार को कॉन्ग्रेस ने गिरा दी थी और नेताओं को जेल में ठूंस दिया था वही आज राजनीतिक फायदे के लिए उसी कॉन्ग्रेस के साथ खड़ी है। उसको अपने नेता का बलिदान भी याद नहीं रहा।

कॉन्ग्रेस ने सिर्फ नेताओं को नहीं, बल्कि परिवारों को तोड़ा है और और लोकतंत्र का गला घोंटा। इसके पीछे उसने देश में ‘आंतरिक गड़बड़ी’ का हवा हवाई कारण बताया है। स्टालिन को बचाने के लिए जान देने वाले चिट्टीबाबू अगर आज होते, तो शायद DMK और कॉन्ग्रेस के इस गठबंधन को देखकर दुखी और हैरान होते।

चिट्टीबाबू के नाम पर पुल बनाना तभी सच्चा सम्मान होगा जब डीएमके उस पार्टी से नाता तोड़े जिसने उसकी आत्मा को कुचला था। ऐसा लगता है कि सत्ता की लालसा में DMK ने अपने अतीत और आत्मसम्मान को भुला दिया है। गोपालपुरम, जहाँ एक समय यातना और बलिदान की कहानियाँ थीं, अब बस राजनीतिक समझौतों का गवाह बनकर रह गया है।

देश को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आपातकाल कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी। यह कॉन्ग्रेस की विरासत पर एक काला धब्बा है, और एक चेतावनी है कि जब सत्ता का गलत इस्तेमाल होता है, तो संविधान भी बेबस हो सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप का न्योता किया ख़ारिज, ट्रंप से कॉल में पीएम मोदी ने दिखाई भारत की ताकत: 7 प्वॉइंट्स में समझें- कैसे अमेरिका का ‘चौधरी’ बनने का मंसूबा हुआ नाकाम

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बुधवार (18 जून 2025) की सुबह एक प्रेस बयान में बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई।

जी-7 समिट से ट्रंप के जल्दी लौटने की वजह से दोनों नेताओं की तय मुलाकात नहीं हो पाई थी। इसके बाद ट्रंप के अनुरोध पर दोनों के बीच 35 मिनट से ज्यादा की औपचारिक फोन बातचीत हुई।

ये फोन कॉल कई मायनों में बेहद अहम थी – न सिर्फ बातचीत के मुद्दों की वजह से, बल्कि इसके समय और उसमें दिए गए संदेशों की वजह से भी। आइए, जानते हैं कि ये बातचीत क्यों इतनी खास थी…

1- पहलगाम हमले के बाद पहली सीधी बात

विक्रम मिस्री ने साफ-साफ बताया कि 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम हमले के बाद ये पहली बार था जब पीएम मोदी और ट्रंप ने सीधे बात की। इस बातचीत में ट्रंप ने हमले में मारे गए लोगों के लिए संवेदना जताई और भारत के आतंकवाद के खिलाफ रुख का समर्थन किया।

ये बात इसलिए अहम है क्योंकि ट्रंप की बड़बोली और आत्ममुग्ध मीडिया टिप्पणियों से ऐसा लग रहा था जैसे भारत और अमेरिका के बीच कई बार बात हो चुकी हो। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने व्यापार का दबाव डालकर भारत को पाकिस्तान से बात करने और युद्धविराम के लिए ‘राजी’ किया।

मिस्री के बयान ने साफ कर दिया कि ट्रंप का ये ‘शांति स्थापित करने’ वाला दावा पूरी तरह झूठा और भ्रामक था। ये बयान ट्रंप की गलत बयानबाजी को खुलेआम बेनकाब करता है।

2- ‘गोली का जवाब गोला’ का दोहराया संकल्प

फोन बातचीत में पीएम मोदी ने ट्रंप को दो टूक याद दिलाया कि भारत ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि पहलगाम हमले का जवाब वो जबरदस्त तरीके से देगा। मोदी ने कहा कि 6-7 मई 2025 की रात को भारत की ऑपरेशन सिंदूर कार्रवाई एक संयमित, गैर-उकसावे वाली और सटीक सैन्य कार्रवाई थी, जो पीओके और पाकिस्तान में आतंकी ढाँचों पर केंद्रित थी।

पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को साफ बता दिया है कि भारत ने पहले भी पाकिस्तान की किसी भी उकसावे की कार्रवाई का जवाब दिया है और आगे भी देगा और वो भी बड़े पैमाने पर – ‘गोली का जवाब गोला’।

पीएम मोदी का ये बयान नये भारत की ताकत और आत्मविश्वास को दिखाता है। ये वो भारत है जो किसी विदेशी ताकत के इशारे पर नहीं चलता, बल्कि अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा के लिए दुश्मन को करारा जवाब देता है। ये बयान शांत लेकिन दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।

3- जेडी वेंस की चेतावनी और भारत का और बड़ा जवाब

पीएम मोदी ने ट्रंप को ये भी बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण के बाद 9 मई की रात को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन्हें फोन करके पाकिस्तान की ओर से एक ‘बड़े हमले’ की चेतावनी दी थी। भारत ने वेंस को बहुत साफ शब्दों में बता दिया कि पाकिस्तान की किसी भी उकसावे की कार्रवाई का जवाब भारत और जोरदार और बड़ा देगा। और भारत ने ऐसा ही किया।

पीएम मोदी ने ट्रंप को बताया कि पाकिस्तान की उकसावे की कार्रवाई के जवाब में भारत ने सटीक सैन्य हमले किए, जिन्होंने पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया और उनके हवाई अड्डों को बेकार कर दिया। भारत ने पूर्ण हवाई वर्चस्व हासिल कर लिया। इसके बाद पूरी तरह टूट चुका पाकिस्तान भारत से युद्धविराम की गुहार लगाने को मजबूर हो गया। ये भारत की सैन्य ताकत और रणनीतिक चतुराई का सबूत है।

4- व्यापार सौदे या मध्यस्थता की कोई बात नहीं

पीएम मोदी ने ट्रंप को साफ-साफ याद दिलाया कि न तो पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ और न ही अमेरिकी नेतृत्व के साथ किसी भी बातचीत में व्यापार का जिक्र तक हुआ। उन्होंने ये भी साफ किया कि भारत ने कभी भी अमेरिका के साथ ‘मध्यस्थता’ की बात नहीं की, क्योंकि भारत पाकिस्तान के साथ अपने द्विपक्षीय मुद्दों में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को कभी स्वीकार नहीं करेगा। भारत में इस मुद्दे पर पूरी राजनीतिक सहमति है।

मोदी ने ट्रंप को बताया कि सैन्य कार्रवाई को रोकने की सारी बातचीत भारत और पाकिस्तान के स्थापित सैन्य चैनलों के जरिए हुई, जिसमें कोई तीसरा देश शामिल नहीं था और न ही कोई व्यापार सौदा इसका हिस्सा था। मोदी ने ये भी दोहराया कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है और भारत अब किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई मानेगा। ये बयान भारत की स्पष्ट और अटल नीति को दर्शाता है।

5- ट्रंप का स्टॉपओवर न्योता ठुकराना एक बड़ा कदम

एक साहसिक और रणनीतिक कदम उठाते हुए, पीएम मोदी ने ट्रंप के अमेरिका में स्टॉपओवर मीटिंग के न्योते को विनम्रता से ठुकरा दिया। ट्रंप ने मोदी को कनाडा से भारत लौटते वक्त अमेरिका में रुककर मुलाकात करने का न्योता दिया था, लेकिन मोदी ने कहा कि उनके पास पहले से तय कार्यक्रम और जिम्मेदारियां हैं, इसलिए स्टॉपओवर संभव नहीं है। ये विनम्र इनकार एक ताकतवर संदेश देता है।

बिना कुछ कहे मोदी ने अमेरिका को बता दिया कि भारत अब कोई ‘छोटा देश’ नहीं है, जिसके नेता बड़े देशों के बुलावे पर दौड़ पड़ें। ये इनकार भारत की प्राथमिकताओं और आज की दुनिया में उसकी ताकत और आत्मसम्मान को दिखाता है। ये कदम भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत का प्रतीक है।

6- क्या ट्रंप ने मोदी को ‘फँसाने’ की कोशिश की?

ट्रंप के स्टॉपओवर न्योते का समय बहुत अहम है। अभी पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर अमेरिका में हैं। वो 15 जून से 5 दिन के दौरे पर हैं और ट्रंप से मुलाकात की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ट्रंप का मोदी को स्टॉपओवर के लिए बुलाना शायद इस कोशिश का हिस्सा था कि वो मोदी और मुनीर को एक साथ एक कमरे में या एक मेज पर लाकर अपनी ‘शांति स्थापक’ वाली छवि को और चमकाएँ।

ट्रंप पहले भी दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच ‘परमाणु युद्ध’ रोका। उनकी बयानबाजी और आत्मप्रचार को देखते हुए, ये सोचना गलत नहीं कि वो मोदी और मुनीर की तस्वीरों का इस्तेमाल करके अपने ‘शांति स्थापक’ दावे को और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते।

लेकिन मोदी ने स्टॉपओवर ठुकराकर ट्रंप की इस पीआर चाल को पूरी तरह नाकाम कर दिया। साथ ही मुनीर को भी बता दिया कि भारत उनकी तरह के नेताओं के साथ बेकार की नौटंकी में वक्त नहीं गँवाएगा। ये कदम ट्रंप और मुनीर दोनों को भारत की चतुराई और दृढ़ता का आइना दिखाता है।

7- भारत और पाकिस्तान बराबर नहीं: दुनिया को साफ संदेश

पीएम मोदी की इस फोन बातचीत ने चुपके से एक बहुत बड़ा संदेश दिया है। ट्रंप को भारत और पाकिस्तान के नेताओं को एक साथ बुलाने का मौका न देकर, मोदी ने साफ कर दिया है कि भारत और पाकिस्तान को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, एक मजबूत और आधुनिक सेना और एक स्थिर लोकतांत्रिक सरकार वाला भारत को एक टूटे-फूरे, आतंक से ग्रस्त, अस्थिर और गरीबी में डूबे पाकिस्तान के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। ये संदेश न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। मोदी ने बिना शब्दों के बता दिया कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर खड़ा है।

भारत यहाँ टिकने के लिए आया है। ये एक बहुध्रुवीय दुनिया है, और भारत उन ध्रुवों में से एक है जो अपने नियम बनाएगा और अपनी राह चुनेगा। भारत को नजरअंदाज करना या गलत समझना दुनिया की सबसे बड़ी भूल होगी।

ये संदेश पीएम मोदी ने जी-7 समिट से लौटते वक्त एक फोन कॉल में दे दिया। इस बातचीत ने न सिर्फ भारत की ताकत और संयम दिखाया, बल्कि ये भी साफ कर दिया कि भारत अब अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करेगा।

‘सतर्क रहने की जरूरत’- निज्जर मामले पर बोले कनाडाई पीएम, दोस्ती बढ़ाने पर की कवायद: G7 सम्मेलन में मार्क कार्नी से मिले पीएम मोदी, कई मुद्दों पर हुई चर्चा

G7 शिखर सम्मेलन के दौरान कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भारत के पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके बाद मीडिया ने कार्नी से हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर सवाल किया। इस पर कनाडाई पीएम ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया चल रही है, पर मुझे बोलने से पहले सतर्क रहना होगा।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार तीन देशों के दौरे पर हैं। इनमें साइप्रस, कनाडा और क्रोएशिया शामिल है। G7 शिखर सम्मेलन में भी कनाडा ने पीएम मोदी को आमंत्रित किया था।

भारत G-7 देशों का हिस्सा नहीं है, पर आमंत्रण के बाद आउटरीच पार्टनर के तौर पर भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुआ। इस दौरान पीएम मोदी G7 सम्मेलन के लिए आए कई देशों के नेताओं से मिले और द्विपक्षीय वार्ता भी की।

मीडिया से बात करते हुए कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि पीएम मोदी के साथ उन्होंने प्रवर्तन (law enforcement) के महत्व और उसके प्रत्यक्ष सहयोग पर चर्चा की इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय दमन पर भी बात की गई।

इस दौरान मीडिया ने सवाल पूछा कि निज्जर हत्या के मामले को लेकर क्या पीएम मोदी से कोई चर्चा की गई। इस पर कार्नी ने कहा, “मामले की कानूनी प्रक्रिया चल रही है, लेकिन इस पर कुछ और कहने से पहले मुझे सावधानी बरतनी होगी।”

वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक पर कनाडा पीएम से मुलाकात के बाद लिखा कि दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़ाने पर काम किया जाएगा। इसके अलावा दोनों नेताओं ने व्यापार, एनर्जी, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा, दुर्लभ मिनरल्स और फर्टिलाइजर्स समेत कई अन्य मुद्दों पर चर्चा कर इस पर आगे काम करने की बात कही।

प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, “कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ शानदार बैठक हुई। भारत और कनाडा लोकतंत्र, स्वतंत्रता और कानून के शासन के साथ विश्वास से जुड़े हुए हैं और दोनों देशों की दोस्ती को आगे बढ़ाने पर काम करेंगे।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा घोषित आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून 2023 को एक गुरुद्वारे के बाहर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। यहाँ तक कि कनाडा के पूर्व पीएम जस्टिन ट्रूडो ने दावा किया था कि निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंट जुड़े हुए हैं। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल बन गया था।

अक्टूबर 2024 में भारत ने कनाडा से अपने 6 डिप्लोमेट्स वापस बुला लिए थे। वहीं, कनाडा के डिप्लोमेट्स को भी भारत से वापस भेज दिया गया था। इसके बाद मार्च में चुने गए कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दोनों देशों के बीच के तनाव को खत्म करने के लिए G7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी को आमंत्रित कर दोबारा दोस्ताना माहौल शुरू करने की कोशिश की है।

G-7 दुनिया की 7 उन्नत अर्थव्यवस्थाओं और यूरोपीय संघ का एक अनौपचारिक समूह है। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। रूस भी पहले इस समूह का हिस्सा था, लेकिन क्रीमिया देश पर कब्जा करने के बाद समूह से उसे निष्कासित कर दिया गया।

G7 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री अल्बनीज समेत अन्य नेताओं के साथ मुलाकात कर द्विपक्षीय वार्ता की। G7 में प्रतिभाग करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी क्रोशिया के दौरे पर निकल गए हैं।

‘हमें पता है ईरान के नेता कहाँ छुपे हैं पर अभी उन्हें नहीं मारेंगे’: ट्रंप ने दी खुली चुनौती, खामेनेई ने भी किया युद्ध का ऐलान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपनी बयानबाजी काफी तेज कर दी है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर सीधा संदेश देकर कहा, “अमेरिका जानता है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई कहाँ छिपे हैं, लेकिन ‘फिलहाल’ उन्हें मारेंगे नहीं।”

ट्रंप ने ईरान से ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ करने की माँग की है, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अमेरिका, इजरायल के हमलों में शामिल होगा।

वहीं, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने युद्ध का ऐलान करते हुए X (पहले ट्वीटर) कर कहा, “हमें आतंकवादी इजरायली शासन को करारा जवाब देना होगा। हम इजरायली समर्थकों पर कोई रहम नहीं दिखाएंगे।”

ट्रंप का अल्टीमेटम और ‘आसमान पर कब्जा’

ट्रंप ने अपने ‘ट्रूथ सोशल’ प्लेटफॉर्म पर साफ शब्दों में लिखा, “हमें पता है कि तथाकथित ‘सर्वोच्च नेता’ कहाँ छिपा है। वो एक आसान निशाना है, पर फिलहाल सुरक्षित है, हम उसे मारेंगे नहीं।” ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी कि अगर मिसाइलें नागरिकों या अमेरिकी सैनिकों पर दागी गईं तो अमेरिका का धैर्य जवाब दे जाएगा।

एक और चौंकाने वाले दावे में ट्रंप ने कहा कि ‘हमारे पास ईरान के आसमान पर पूरा और संपूर्ण कंट्रोल है’, और फिर ट्रंप ने अमेरिकी हथियारों की जमकर तारीफ की। ट्रंप का इशारा साफ था कि ईरान का डिफेंस सिस्टम अमेरिकी तकनीक के सामने कुछ भी नहीं है।

सो कर जागा चीन

जी-7 शिखर सम्मेलन से लौटते हुए ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें ईरान-इजरायल संघर्ष में ‘युद्धविराम नहीं, बल्कि एक वास्तविक अंत’ चाहिए और वह ‘बातचीत के मूड में नहीं’ हैं। ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ख़त्म करने के लिए पहले प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर न करने पर भी निराशा जताई।

इस बीच, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इस लड़ाई पर पहली बार अपनी बात रखी है। शी जिनपिंग ने कहा कि चीन को मीडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ते तनाव की बहुत चिंता है। शी जिनपिंग ने साफ किया कि चीन किसी भी ऐसे काम के खिलाफ है, जो किसी देश की आज़ादी या उसकी सीमाओं को नुकसान पहुँचाए।

ट्रंप के लगातार बयान बताते हैं कि अमेरिका का इस संघर्ष में सीधा हस्तक्षेप अब नज़दीक हो सकता है, जिससे इस क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।

डियर खान सर, 4 बजे तक 1.5 GB डाटा फूँक देने वाली पीढ़ी ने ही आपको बनाया है… सवाल पूछने के उसके साहस पर गर्व नहीं कर सकते तो हगिए भी नहीं

न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) की एडिटर इन चीफ स्मिता प्रकाश ने खान सर (Khan Sir) के साथ एक पॉडकास्ट किया है। ANI के यूट्यूब चैनल पर 14 जून 2025 को अपलोड किए गए इस पॉडकास्ट को 15 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। पर उससे भी अधिक इस पॉडकास्ट के क्लिप सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे हैं जो छात्रों के खान सर की ‘बौद्धिक क्षमता’ का बखान कर रहे हैं।

सामान्य तौर पर हर व्यक्ति को अपने से पहले की पीढ़ी पिछड़ी और अपने बाद की पीढ़ी निखट्टू लगती है, पर एक कथित कोचिंग गुरु से ऐसे विषयों पर गंभीरता की अपेक्षा की जाती है। लेकिन हाल ही में गुपचुप निकाह करने वाले खान सर से जब पॉडकास्ट के दौरान स्मिता प्रकाश ने इसी को लेकर सवाल किया तो उनका जवाब हैरान करने वाला था।

उन्होंने इस सवाल को खारिज करने की कोशिश की। उसी पीढ़ी को गैर जिम्मेदार, लापरवाह बताने की कोशिश की जिसके कारण वे ‘खान सर’ बने हैं। सवाल करने की नई पीढ़ी के साहस और आत्मविश्वास का जिक्र करते हुए स्मिता प्रकाश ने पूछा कि हम जब बच्चे थे तो गाँधी-नेहरू को हीरो की तरह देखते थे। कोई दूसरा विचार नहीं हो सकता था। लेकिन आज के बच्चे बहस करते हैं, पढ़ते-सुनते हैं और कई मसलों पर उनके फैसलों को लेकर सवाल भी उठाते हैं।

इसके जवाब में खान सर कहते हैं, “आजकल की जेनरेशन जो 4 बजे तक अपना डेढ़ जीबी डाटा खत्म कर देती है। हफ्ते में जिनको कोई काम नहीं करना है, फिर भी संडे को आराम करते हैं। ये जेनरेशन जो आज अपने मुखिया के खिलाफ सवाल नहीं उठाता। जिसके सामने दो कौड़ी का ठेकेदार घटिया मसाला डालकर नालियाँ बना देता है, जिसका ढक्कन टूट जाता है, ये उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। ये जेनरेशन गाँधी पर आवाज उठाती है जो गुलामी में महारानी से लड़ गया था। जो अपने विधायक से नहीं लड़ सकता है, बिना पैसा खिलाए प्रधानमंत्री आवास योजना से घर नहीं बनवा सकता है, वो आवाज उठाता है कि गाँधी सही थे या गलत।”

नीचे लगे वीडियो में आप 2:40 से यह बातचीत सुन सकते हैं।

जैसा कि अपने सवाल में ही स्मिता प्रकाश ने गाँधी-नेहरू को लेकर अपनी पीढ़ी की समस्या के बारे में बताया है, यह माना जा सकता है कि ‘खान सर’ के पास भी इनको लेकर दूसरा कोई विचार नहीं हो। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन गाँधी-नेहरू पर सवाल करने वालों को जिस गंभीरता से उन्होंने खारिज किया है, यह मसखरी से अधिक कुछ नहीं है।

बिहारी टोन वाली अपनी मसखरी में बात करते हुए ‘खान सर’ यह भी भूल गए कि जिस पीढ़ी को वे खारिज कर रहे हैं, उसने ही अपना डाटा फूँक-फूँक कर फैसल खान को ‘खान सर’ बनाया है। वे भूल गए यही पीढ़ी गाँव-गाँव गलियों का मोबाइल से वीडियो बनाकर भ्रष्टाचार उजागर करती है। यह पीढ़ी आरटीआई का इस्तेमाल कर जवाब माँगती है। सालभर सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए अपने जन प्रतिनिधियों का निकम्मापन उजागर करती है।

इस पीढ़ी के सवालों/विचारों से सहमत/असहमत होना ‘खान सर’ का अधिकार है। पर वे इस बात को खारिज नहीं कर सकते कि इस पीढ़ी के पास अपने पुरानी पीढ़ियों से सवाल पूछने का कहीं अधिक साहस है। यह पीढ़ी कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरी हुई है। तकनीक और ज्ञान को सहजता से ग्रहण कर लेने की उसकी क्षमता पुरानी पीढ़ियों से कहीं अधिक है। यह पीढ़ी यह सब कुछ उस समयकाल में कर रही है जो पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। वह उस दौर में फल-फूल रही है जब दुनिया ने कोरोना जैसा वैश्विक संकट देखा है। जब गाँव के दायरे फैलकर ग्लोबल विलेज का विस्तार पा चुकी है।

ऐसा नहीं है कि ढाई घंटे से लंबे इस पॉडकास्ट में ‘खान सर’ का छिछलापन/​मसखरापन केवल इसी एक सवाल के जवाब में उजागर होता है। ऑपरेशन सिंदूर से लेकर अग्निवीर तक, नेहरू-पटेल जैसे से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों से लेकर मौजूदा समय से जुड़े सवालों तक उन्होंने इसका भरपूर प्रदर्शन किया है।

ऐसा भी नहीं है कि ‘खान सर’ को इस नई पीढ़ी की क्षमता का पता नहीं है। उनके पास कोचिंग के लिए आने वाले लोग इसी पीढ़ी के हैं। इस पीढ़ी से ‘खान सर’ का हम जैसों से कहीं अधिक रोजाना का सीधा संवाद है। इस पीढ़ी की मेहनत की प्रशंसा करते हुए वे हाल में तब भी दिखे थे जब NEET में उनके ही संस्थान के कुछ बच्चों ने सफलता हासिल की। इस नतीजे से पहले तक ‘खान सर’ की छवि ग्रुप डी के एग्जाम क्लियर कराने वाले मास्टर के तौर पर ही थी।

बावजूद इसके इस पॉडकास्ट में जिस तरह से ‘खान सर’ ने जवाब दिए हैं, उससे पता चलता है कि वे नई पीढ़ी के डाटा से बनी प्रसिद्धि को भुनाकर उसी ‘महीन एजेंडा’ को अब आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह देश कहीं आगे की यात्रा कर चुका है। उनकी यह कोशिश बिहार में BPSC परीक्षा के नियमों में बदलाव के विरुद्ध छात्रों के प्रदर्शन के दौरान भी दिखी थी।

पर ‘खान सर’ को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके अंतर्मन की दबी-कुचली इच्छाओं का भार डाटा फूँकने वाली पीढ़ी क्लासरूम की चौहद्दी के बाहर शायद ही उठाने को तैयार हो। बेहतर होगा कि अपना डाटा फूँक वे नई पीढ़ी से इस पॉडकास्ट से दूर रहने की अपील करें, क्योंकि इसमें उन्होंने जो हगा उसका दुर्गंध फैलाने के लिए नई पीढ़ी ने अपने डाटा का इस्तेमाल कर दिया तो संकट ‘खान जीएस रिसर्च सेंटर’ के जरिए फुलाए गए गुब्बारे की हवा भी निकाल सकता है।

ममता सरकार की नई OBC आरक्षण लिस्ट पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, 76 जातियाँ की थी शामिल: भाजपा ने बताया- इनमें 67 मुस्लिमों की

कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की नई आरक्षण सूची जारी करने पर रोक लगा दी है। यह नई सूची राज्य की सत्तारूढ़ ममता बनर्जी सरकार ने बनाई है। इसमें 76 जातियों को जगह दी गई है। इनमें से 85%+ जातियाँ मुस्लिम थीं। कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले पर भाजपा नेताओं ने प्रसन्नता व्यक्त की है।

कलकत्ता हाई कोर्ट की जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस राजशेखर मंथा की बेंच ने मंगलवार (17 जून, 2025) को यह निर्णय सुनाया। बेंच ने बंगाल सरकार की इस नई OBC आरक्षण लिस्ट के जारी किए जाने पर रोक लगाई है। यह रोक अंतरिम तौर पर लगाई गई है जो 31 जुलाई, 2025 तक जारी रहेगी।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसी के साथ बंगाल सरकार के पोर्टल पर भी रोक लगा दी है। बंगाल सरकार ने इस पोर्टल के जरिए जातियों के आवेदन खोले थे। इस मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई, 2025 तक है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने यह निर्णय एक याचिका पर सुनाया है।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल नई सूची में फिर से उन जातियों को जोड़ रही है, जिनका आरक्षण पिछली बार कलकत्ता हाई कोर्ट ने खत्म कर दिया था। इस फैसले का राज्य के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने स्वागत किया है।

उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “मैं ममता बनर्जी सरकार द्वारा तैयार की गई नई OBC सूची में 76 मुस्लिम वर्गों को शामिल करने पर रोक लगाने के ऐतिहासिक निर्णय के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। यह एक अहंकारी राज्य सरकार के खिलाफ न्यायपालिका की एक शानदार जीत है… ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति, OBC सूची में लगभग 90% नए मुस्लिम वर्गों के शामिल करने से स्पष्ट है और यह समानता तथा निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।”

उन्होंने कहा कि 2010 में TMC के आने से पहले OBC वर्गों में केवल 20% मुस्लिम थे लेकिन ममता बनर्जी के शासन में यह संख्या आसमान छू गई है। उन्होंने कहा कि इसके चलते आरक्षण के हक़दार हिन्दुओं का हक़ मारा जा रहा है।

भाजपा नेता अमित मालवीय ने इस फैसले को तुष्टिकरण की राजनीति पर चोट बताया है। अमित मालवीय ने इससे पहले कहा था कि ममता बनर्जी की सरकार द्वारा बनाई गई नई 2 सूचियों में 76 में 67 जातियाँ मुस्लिम हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि लिस्ट A में मुस्लिमों को 84% जबकि लिस्ट B में 90% जगह दी गई है।

वहीं मीडिया रिपोर्ट्स ने बताया है ममता सरकार ने 76 में से 74 जातियाँ वही रखी हैं जिनका आरक्षण मई, 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने खत्म कर दिया था। ममता बनर्जी की सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

पेपरलेस होगी जनगणना, जाति के आँकड़े भी किए जाएँगे इकट्ठा, घर से लेकर रोजगार तक हर डिटेल होगी दर्ज: जानिए कौन से नए सवाल पूछे जाएँगे, कितनी लंबी होगी प्रक्रिया

भारत के इतिहास में पहली बार 2027 की जनगणना डिजिटल तरीके से होने जा रही है। केन्द्र सरकार ने इसके लिए नोटिफिकेशन 16 जून 2025 को जारी किया गया । गृह मंत्री अमित शाह ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 16वीं जनगणना में पहली बार जाति गणना भी होगी।

दो फेज में होगी जनगणना

नोटिफिकेशन में कहा गया है कि भारत की जनसंख्या की जनगणना वर्ष 2027 के दौरान की जाएगी। इस जनगणना की शुरुआत 1 अक्टूबर 2026 को देश के चार पहाड़ी राज्यों जम्मू कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में होगी। बाकी जगहों पर 1 मार्च 2027 से जनगणना की शुरुआत की जाएगी। डेटा इक्ठ्ठा हो जाने के बाद दिसंबर 2027 तक इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा। इसके लिए मोबाइल ऐप, ऑनलाइन और दूसरे डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। खास बात ये है कि जनगणना अधिनियम 1948 के तहत जनगणना और जातीय जनगणना दोनों कराई जाएगी।

कोरोना की वजह से हुई देरी

भारत में जनगणना 10 साल पर होती है। 2011 में आजादी के बाद की 7वीं जनगणना हुई थी। इस आधार पर 2021 में जनगणना होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इसे टाल दिया गया और अब 2025 में जनगणना के लिए नोटिफिकेशन जारी किया गया है। इससे सर्किल भी बदल रहा है। इसकी वजह से अब अगली जनगणना का नोटिफिकेशन 2035 में जारी की जा सकती है।

कितने लोग जनगणना कराने में होंगे शामिल?

16वीं जनगणना में पहली बार जाति गणना भी होगी। इसके लिए 34 लाख काउंटर और सुपरवाइजर , 1.3 लाख जनगणना पदाधिकारी काम करेंगे। इसके लिए स्टाफ की नियुक्ति और ट्रेनिंग होगी। पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाएगा और करीब 2 महीने तक सभी का प्रशिक्षण होगा। इस दौरान डिजिटल डिवाइस और मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल करना सिखाया जाएगा। जनगणना में 13 हजार करोड़ रुपए खर्च होने की संभावना है।

परिसीमन आयोग का गठन होगा

2028 में लोकसभा और राज्यसभा में सीटों के परिसीमन शुरू होने की उम्मीद है। जानकारों की मानें तो इसके बाद महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जा सकता है। जनगणना के बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा और आबादी को ध्यान में रखते हुए लोकसभा सीटों का पुनर्निधारण किया जाएगा। ऐसे में दक्षिण भारतीय राज्य काफी चिंतित हैं। हालाँकि केन्द्र सरकार ने आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु जैसे राज्यों को भरोसा दिलाया है कि परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिण राज्यों की चिंता पर विचार किया जाएगा।

कैसे अलग है 2027 की जनगणना?

2011 में हुई पिछली जनगणना के 16 साल बाद देश में जनगणना कराई जा रही है। इसमें जातियों, उपजातियों और ओबीसी के लिए नए कॉलम और मेन्यू शामिल किये जा रहे हैं। पूरी तरह पेपरलेस होने वाली इस जनगणना की प्रश्नावली में इससे जुड़े सवाल पूछे जाएँगे। डेटा पूरी तरह डिजिटल होगा और इसके लिए मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल किया जाएगा। ये ऐप्स हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा 14 क्षेत्रीय भाषाओं में होंगी। 2011 में घर-घर जाकर डेटा एकत्रित किए गए थे, लेकिन तकनीक का इस्तेमाल काफी कम हुआ था।

सेहत से जुड़े भी होंगे सवाल

जनगणना की प्रक्रिया दो चरणों में 2011 की तरह ही पूरी की जाएगी। पहले चरण में परिवार की आवासीय स्थिति, संपत्ति और सुविधाओं के बारे में जानकारी जुटाई जाएगी। इसके बाद दूसरा चरण शुरू होगा। इस चरण में हर मकान में रहने वाले व्यक्ति की उम्र, जाति, शिक्षा, लिंग, रोजगार और दूसरी जानकारियाँ इकट्ठा की जाएगी। इसमें डेमोग्राफिक अनुपात, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति के साथ- साथ लोगों के जीवन स्तर का अंदाज मिलेगा। इससे सरकार को योजनाएँ बनाने और नीति तैयार करने में मदद मिलेगी। भारत में डायबिटीज के मरीज दुनिया में सबसे अधिक हैं इसलिए सेहत से जुड़े सवाल भी पूछे जाएँगे। आप डायबिटीज के मरीज हैं या नहीं, ये भी पूछा जाएगा।

जनगणना से जुड़ी तमाम जानकारियों का ट्रांसफर और स्टोर करने की खास व्यवस्था की जाएगी, ताकि डेटा लीक न हो। व्यक्ति की निजता का भी पूरा ख्याल रखा जाएगा। जनगणना कराने की जिम्मेदारी भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त की होती है। ये दोनों गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं।

1881 में पहली बार हुई थी जनगणना

देश में पहली बार 1881 में जनगणना हुई थी। उस वक्त देश की जनसंख्या 25.38 करोड़ थी। इसके बाद हर 10 साल बाद जनगणना हो रही है। 1941 में जातीय आँकड़े जुटाए गये थे लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। आजादी के बाद 1951 में पहली जनगणना कराई गई। उस वक्त ये माना गया कि जाति जनगणना से देश विभाजित होगा और देश की एकता अखंडता को नुकसान होगा। इसलिए सिर्फ एससी-एसटी के आँकड़े जुटाए गए।

देश में पहली बार एक साथ जाति जनगणना

जनगणना 2027 में जाति जनगणना भी होगी। यानी लोगों की जातीय पहचान के आधार पर आँकड़े जुटाए जाएंगे। इससे पता चलेगा की कौन-सी जाति किस क्षेत्र में कितनी है और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति कैसी है? इसका इस्तेमाल सामाजिक कल्याण और दूसरी योजनाओं को बनाने और लोगों के जीवन स्तर को सुधारने में किया जा सकेगा। देश में पहली बार होगा जब एक साथ सभी जातियों का आँकड़ा सरकार के पास होगा।

इंदौर में लव जिहाद के लिए मुस्लिम लड़कों को पैसा देने वाला कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी अब भी फरार, ‘डकैत’ नाम से भी पहचान: हत्या-लूट में भाई भी जा चुका है जेल

इंदौर की बाणगंगा पुलिस अनवर डकैत उर्फ कादरी की तलाश कर रही है। पुलिस ने उसके घर और रिश्तेदारों के यहाँ भी दबिश दी है, लेकिन अभी तक उसकी कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। पकड़े गए आरोपितों ने पुलिस को बताया कि साहिल के पिता की अनवर से दोस्ती थी और साहिल भी अनवर से मिलता-जुलता था।

इसी दौरान अनवर ने साहिल और उसके साथी अफजल को हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने के लिए पैसे का लालच दिया। इसके बाद साहिल और अफजल ने सोशल मीडिया पर हिंदू लड़कियों से दोस्ती कर उन्हें अपने जाल में फँसाया। अनवर के भाई अज्जू डकैत और फिरोज पर भी कई अपराधिक मामले दर्ज हैं। अज्जू हत्या और लूट के मामले में जेल जा चुका है।

मामला क्या है?

यह मामला 15 जून 2025 को सामने आया, जब लव जिहाद के आरोप में पकड़े गए दो लड़कों ने कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी पर गंभीर आरोप लगाए। लड़कों का कहना है कि कादरी ने उन्हें हिंदू लड़कियों से शादी करने और उनसे देह व्यापार करवाने के लिए पैसे दिए थे।

इंदौर में हिंदू युवतियों से दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन के बढ़ते मामलों के बीच, कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी का नाम एक नई साजिश में सामने आया है। पुलिस ने कादरी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और उसकी तलाश कर रही है।

पुलिस कार्रवाई और खुलासा

शनिवार (14 जून 2025) रात को बाणगंगा पुलिस ने दो युवतियों की शिकायत पर अल्ताफ खान और साहिल खान के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया था। ये युवतियाँ सांवेर रोड पर रहती हैं। पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपितों ने पार्षद अनवर कादरी का नाम लिया।

आरोपितों ने पुलिस को बताया कि अनवर कादरी ने उनसे कहा था कि वे हिंदू युवतियों से शादी करें और उन्हें देह व्यापार के धंधे में धकेलें। TI सियारामसिंह गुर्जर ने मीडिया को बताया कि आरोपितों के बयानों के आधार पर अनवर कादरी को इस साजिश का मुख्य आरोपित बनाया गया है।

पुलिस ने कादरी के घर पर छापा मारा, लेकिन वह फरार हो गया। दोनों आरोपितों को सोमवार (16 जून 2025) तक पुलिस रिमांड पर रखा गया और उनसे आगे की पूछताछ की जा रही है।

साहिल खान का मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक आरोपित साहिल खान पर 18 वर्षीय युवती से दुष्कर्म का आरोप है। साहिल ने करीब पाँच महीने पहले इंस्टाग्राम पर खुद को हिंदू बताकर युवती से दोस्ती की थी। 12 मई 2025 को वह युवती को बातचीत के लिए दोस्त के कमरे पर ले गया और शादी का झाँसा देकर उसका रेप किया।

इसके बाद 30 मई 2025 को उसने युवती को स्कीम-54 में एक कैफे पर बुलाया और वहाँ भी जबरदस्ती की। साहिल ने युवती को बताया कि वह मुस्लिम है और उसे भी इस्लाम अपनाने के लिए कहा। साहिल ने युवती को यह भी कहा कि ‘तू जितना पैसा माँगेगी मैं दूँगा।’ इसके बाद उसने युवती को जबरदस्ती बुर्का भी पहनाया।

गिरफ्तारी के बाद साहिल ने बताया कि उसकी मुलाकात अनवर कादरी से एक सामाजिक कार्यक्रम में हुई थी। कादरी ने उसे दो लाख रुपये दिए थे और कहा था कि इस ‘काम को आगे बढ़ाओ।’

टीआई के मुताबिक, दूसरे आरोपित अल्ताफ ने भी अनवर कादरी से एक लाख रुपए लेने की बात कबूली है। पुलिस अब आरोपितों के बैंक खातों की जाँच कर रही है। पुलिस कादरी के अलावा अन्य लोगों की भी जाँच कर रही है जो इस मामले में शामिल हो सकते हैं।

तेल को तरस जाएगी दुनिया, इस्लामी मुल्कों की ही कमाई हो जाएगी बंद: क्या है ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’, ईरान-इजरायल युद्ध के बीच चर्चा में क्यों?

इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक नई समस्या भी मुँह बाए खड़ी है। समस्या की जड़ असल में ईरान से जुड़ी है। दोनों देशों का युद्ध में दुनिया भर के लिए गैस और तेल की कीमतें बढ़ा सकता है।

असल में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) को लेकर कयास लग रहे हैं कि ईरान इस रास्ते को बंद कर सकता है। हालाँकि अब तक तो ऐसा नहीं हुआ है लेकिन भविष्य में अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनियाभर के लिए काफी महत्वपूर्ण रास्ता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच स्थित है। ये फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। ये इतना गहरा और चौड़ा है कि दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के टैंकर्स को भी आराम से संभाल सकता है। इसके साथ ही यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट्स में भी शामिल है।

क्यों जरूरी है ये जलडमरूमध्य

इस रास्ते से काफी बड़ी मात्रा में तेल को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाया जाता है। अगर ईरान इस रास्ते को बंद करता है तो दुनियाभर के कई देशों को इसका नुकसान झेलना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस तेल के लिए रास्ते से परे अन्य वैकल्पिक रास्ते काफी कम और लंबे हैं।

अगर किसी एक चोकप्वाइंट से दूसरे तक के बीच कोई भी परेशानी होती है तो सबसे पहले आपूर्ति में देरी होगी। इसके चलते शिपिंग की लाग बढ़ेगी और अतंतः वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में इजाफा होगा।

इस बात को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी नौसेना का पाँचवाँ बेड़ा बहरीन के मनामा में रहकर जलडमरूमध्य की निगरानी करता है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह से रुकावट आती है या इसे अस्थायी रूप से बंद किया जाता है, तो इससे वैश्विक तेल बाजार में झटके लग सकते हैं।

अगर आँकड़ों की बात करें तो इस जलडमरूमध्य से 2024 में प्रतिदिन 2 करोड़ बैरल तेल का आवागमन हुआ था। ये आँकड़ा वैश्विक पेट्रोलियम खपत का लगभग 20% के बराबर था। वहीं 2025 के शुरुआती तीन महीनों में पेट्रोल का कारोबार 2024 की अपेक्षा स्थिर ही रहा। 2024 और 2025 के आँकड़ों में होर्मुज से होकर जाने वाले तेल वैश्विक तेल व्यापार का एक चौथाई से अधिक और पेट्रोलियम उत्पाद और तेल के खपत का लगभग 5वाँ हिस्सा होगा।

बैरल, पेट्रोल या कच्चे तेल को मापने की इकाई है जिसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार का लिए होता है। एक बैरल 159 लीटर के बराबर होता है।

वोर्टेक्सा द्वारा प्रकाशित टैंकर ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, सऊदी अरब होर्मुज जलडमरूमध्य से किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे अधिक कच्चा तेल और कंडेनसेट का आवागमन करता है। 2024 में सऊदी अरब से कच्चे तेल और कंडेनसेट का निर्यात पूरे कारोबार का 38% था।

अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कार्रवाई करता है तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को नुकसान पहुँचेगा। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए सऊदी और UAE ने इस रास्ते को बायपास करने का एक बुनियादी ढाँचा तैयार कर रखा है।

इसके तहत पाइपलाइनें बिछाई गई हैं जो इस रास्ते में आने वाले अड़ंगों को कुछ हद तक कम कर सकता है। हालाँकि ये पाइपलाइनें पूरी तरह से संचालित नहीं होतीं, फिर भी किसी तरह के व्यवधान होने पर सऊदी अरब और UAE होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास कर प्रतिदिन 260 लाख बैरल प्रतिदिन के आवागमन की क्षमता रखती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में आठ प्रमुख द्वीप हैं। इनमें से सात पर ईरान का नियंत्रण है। अबू मूसा, ग्रेटर टुंब और लेसर टुंब द्वीपों को लेकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच विवाद है। ये तीनों द्वीप रणनीतिक रूप से दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

1970 के दशक से, ईरान ने इन द्वीपों पर अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है। इसके अलावा, चाबहार, बंदर अब्बास और बुशहर में स्थित नौसैनिक अड्डों से ईरान की नौसेना सागर पर नियंत्रण करती है। इससे जलडमरूमध्य पर इसका मजबूत प्रभाव देखने को मिलता है।

ईरानी खाड़ी के तट पर जलवायु अत्यधिक गर्म और शुष्क है। जुलाई और अगस्त के महीने इस क्षेत्र के लिए सबसे अधिक गर्म होते हैं। इसके चलते वहाँ रहना मुश्किल है। फिर भी तेल का क्षेत्र होने के कारण थोड़ा बहुत विकास किया गया है। जलडमरूमध्य के आसपास के क्षेत्रों में धूल, सुबह की धुंध और धुंधलापन होता है। इससे भी वहाँ की दृश्यता प्रभावित होती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य का भू-राजनीतिक महत्व

होर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक स्थिति इसे काफी अहम बना देती है। ओमान और ईरान के बीच होने के कारण ये कुवैत, सऊदी अरब, इराक, कतर, बहरीन और UAE को अरब सागर और उससे आगे जोड़ता है।

जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है, होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। भारत के लिए यह संकट देश की रणनीतिक साझेदारी को बेहतर बनाने और नए ऊर्जा स्रोतों पर काम करने की जरूरत बता रहा है।

होर्मुज को बंद करने पर ईरान की क्या है स्थिति

इजरायल की ओर से ईरान पर हमले किए जाने के बाद शिया मुल्क के कई सैन्य ठिकाने और परमाणु कार्यक्रम तबाह हो गए हैं। बौखलाए ईरान ने जलडमरूमध्य बंद करने की धमकी दी है। हालाँकि इस रास्ते को पूरी तरह से बंद करने की आशंका कुछ कम ही जताई जा रही है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। इन कारणों में ईरान के कुछ देशों के साथ बेहतर संबंध और आर्थिक स्थिरता समेत कई पहलू शामिल हैं।

ईरान और चीन के संबंध काफी बेहतर हैं। चीन ईरान के तेल का तीन- चौथाई हिस्से का आयात करता है जो कि सबसे अधिक है। ऐसे में जलडमरूमध्य का रास्ता बंद होने से चीन के लिए भी आपूर्ति बाधित होगी।

इसके अलावा इस रास्ते के बंद होने से ईरान के ओमान के साथ रिश्ते खराब हो सकते हैं। ओमान समुद्री रास्तों के जरिए कारोबार की आजादी का समर्थन करता रहा है। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से पर अपना नियंत्रण भी रखता है।

इजरायल के साथ तनाव के चलते ईरान पहले से ही कई संघर्षों का सामना कर रहा है। ऐसे में अगर ये रास्ता बंद होता है तो ईरान को ही भारी कीमतों को ईरान को भी झेलना पड़ेगा। इससे ये मुल्क भी आर्थिक अस्थिरता के संकट से दो चार होगा।

असल में दुनिया के ज्यादातर देश इस बात को जान चुके हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य में कोई भी रुकावट वैश्विक संकट को जन्म दे सकता है। ऐसे में ईरान अपनी धमकी को मूर्त रूप में देने से पहले कई देशों के साथ अपने बचे कुचे रिश्तों से भी हाथ धो सकता है।

मुस्लिम महिला से बात कर रहा था देवेंद्र, चाकुओं से गोद डाला-सिर में मारी गोली: एनकाउंटर के बाद नदीम गिरफ्तार, हिंदुओं के पलायन के लिए कुख्यात कैराना की घटना

उत्तर प्रदेश के कैराना के मामौर गाँव में सोमवार (16 जून 2025) सुबह देवेंद्र देशवाल (45) नाम के एक किसान की चाकू और सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह किसान हरियाणा के पानीपत जिले के कुराड़ गाँव का रहने वाला था। हमले में देवेंद्र का दोस्त इस्लाम, उसका बेटा शहजाद और एक आरोपित नदीम भी घायल हुआ है।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 4 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इसमें 2 आरोपित नदीम और सोबान को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित नदीम के पास से तमंचा, जिंदा कारतूस, खोखा कारतूस बरामद हुए है। पुलिस मुठभेड़ में नदीम को पैर में गोली लगी।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों ने अवैध संबंधों के शक में देवेंद्र की हत्या करने की बात कबूली है। पुलिस अन्य फरार आरोपितों की तलाश में जुटी हुई है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक किसान की हत्या जमीनी विवाद को लेकर हुई है।

क्या है पूरा मामला?

इस मामले में मृतक किसान देवेंद्र देशवाल के बेटे रोहित ने कैराना थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई है। रोहित ने बताया कि सोमवार (16 जून 2025) सुबह करीब 9 बजे देवेंद्र अपने दोस्त इस्लाम के साथ बाइक से खेत के पास जा रहे थे।

रास्ते में मामौर के दो सगे भाई फरमान और सोबान, और दो अन्य लोगों ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने देवेंद्र के साथ मारपीट की और फिर चाकू से हमला किया। इसके बाद तमंचे से गोलियाँ भी चलाई गईं।

देवेंद्र को बचाने आए उनके दोस्त इस्लाम और इस्लाम के बेटे शहजाद पर भी हमला हुआ और वे घायल हो गए। आरोपितों ने देवेंद्र को सिर और पैर समेत तीन गोलियाँ मारीं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। इस हमले में आरोपित पक्ष का सोबान भी घायल हुआ था।

सूचना मिलते ही SP रामसेवक गौतम, ASP संतोष कुमार और CO अमरदीप मौर्य मौके पर पहुँचे। घायल देवेंद्र, इस्लाम और शहजाद को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने देवेंद्र देशवाल को मृत घोषित कर दिया। आपको बता दें, कि कैराना हिंदूओं के पलायन के लिए काफी चर्चित रहा है। योगी सरकार के आने के बाद से स्थिति में सुधार हुआ है।